
भाग 1:
जिस औरत को सबने चोर और खतरनाक कहा था, उसी ने 7 साल के बच्चे की दूध की कटोरी से वह जहर पकड़ा, जिसे घर की होने वाली मालकिन अपने हाथों से पिला रही थी।
दिल्ली के छतरपुर फार्महाउस की तीसरी मंजिल पर बने बंद कमरे में आरव राजवंश अपनी व्हीलचेयर वाली खास कुर्सी पर आधा लेटा था। उसकी आंखें खुली थीं, मगर उनमें बच्चों वाली चमक नहीं थी। उसकी टांगें पिछले 14 महीनों से जवाब दे चुकी थीं, और उसकी आवाज जैसे किसी ने भीतर से बंद कर दी थी।
नीचे लॉन में सुरक्षा गार्ड बंदूकें लेकर घूमते थे। बाहर लोहे का गेट था, जिस पर बिना इजाजत परिंदा भी नहीं उतर सकता था। उस घर का मालिक विक्रम राजवंश था, दिल्ली और गुरुग्राम की आधी रियल एस्टेट डीलों का नाम जिसके इशारे पर बदल जाता था। लोग उसे बिल्डर कहते थे, कुछ कारोबारी, और कुछ डरते हुए फुसफुसाकर माफिया।
लेकिन तीसरी मंजिल पर अपने बेटे के सामने वही आदमी टूटे हुए पिता से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता था।
14 महीने पहले जयपुर हाईवे पर रात की बारिश में उसकी बुलेटप्रूफ गाड़ी को एक ट्रक ने साइड से टक्कर मारी थी। उसकी पत्नी मीरा वहीं मर गई थी। आरव बच गया, मगर रीढ़ की चोट के बाद न चला, न बोला। डॉक्टरों ने कहा था कि सदमे ने उसकी भाषा छीन ली है।
विक्रम ने उस दिन के बाद घर का पूरा स्टाफ बदल दिया। ड्राइवर, नर्स, रसोइया, गार्ड, सब पर शक हुआ। उसे लगता था किसी ने उसकी रूट जानकारी बाहर बेची थी। वह अपने बेटे को बचाने के लिए दीवारें ऊंची करता गया, कैमरे लगाता गया, नियम बनाता गया। लेकिन आरव की आंखों में डर कम नहीं हुआ।
तभी नैना भटनागर आई।
वह 26 साल की थी, पहले दिल्ली के एक बड़े बच्चों के अस्पताल में नर्स थी। उसके कागजों में एक काला धब्बा था। उस पर महंगी दवाइयां चोरी करने का आरोप लगा था। केस साबित नहीं हुआ, मगर नौकरी चली गई। एजेंसी वाले ने साफ कहा था कि कोई शरीफ परिवार उसे नहीं रखता।
विक्रम ने उसे उसी वजह से रखा।
—मुझे शरीफ चेहरा नहीं चाहिए। मुझे सच देखने वाली आंख चाहिए।
नैना ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा था।
—अगर मैं आरव की देखभाल करूंगी, तो उसे बीमार शरीर नहीं, जिंदा बच्चा मानकर करूंगी।
विक्रम को उसका जवाब पसंद नहीं आया, मगर वही जवाब उसके भीतर कहीं अटक गया।
नैना को नहीं पता था कि कमरे में 4 गुप्त कैमरे लगे हैं। एक भगवान गणेश की छोटी मूर्ति के पीछे, एक स्मोक डिटेक्टर में, एक टेडी बियर की आंख में और एक पुराने फोटो फ्रेम में। विक्रम अपने ऑफिस से हर हरकत देखता था।
पहले 10 दिन उसने नैना में गलती ढूंढी। उसे लगा वह थकेगी, चिड़चिड़ाएगी, आरव को बोझ समझेगी। लेकिन नैना हर सुबह पर्दे खोलती, आरव से मौसम पूछती, उसके बाल बनाती, पैरों की मालिश करती, फिर उससे ऐसे बात करती जैसे वह किसी भी पल जवाब दे देगा।
—आज बादल हैं, छोटे साहब। बारिश पसंद है या धूप?
आरव नहीं बोलता।
—चलो, आंखों से बताओ। दाईं तरफ देखोगे तो बारिश, बाईं तरफ देखोगे तो धूप।
पहले दिन कोई हलचल नहीं हुई। पांचवें दिन आरव की आंखें हल्की सी दाईं तरफ गईं। नैना मुस्कुरा दी।
—समझ गई। बारिश जीत गई।
विक्रम स्क्रीन के सामने बैठा था। उसने पहली बार कई महीनों बाद अपने बेटे की आंखों में प्रतिक्रिया देखी।
घर में एक और औरत थी, सान्वी मल्होत्रा। वह विक्रम की मंगेतर थी। हरियाणा के ताकतवर मंत्री धर्मवीर मल्होत्रा की बेटी। खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, महंगी साड़ियों और धीमी आवाज वाली। सबके सामने आरव को बेटा कहती थी। मगर जब वह कमरे में आती, नैना का चेहरा बदल जाता।
उसकी मुस्कान गायब हो जाती। हाथ ठंडे हो जाते। आंखें सान्वी की ट्रे, कटोरी, दवा और गिलास पर टिक जातीं।
एक शाम सान्वी चांदी की ट्रे में बादाम वाला दूध लेकर आई। आरव की दवा का समय था।
—मेरे शेर के लिए खास दूध। इसमें केसर है, ताकत आएगी।
नैना तुरंत आगे बढ़ी।
—मैं पिला देती हूं, मैडम।
सान्वी ने उसे देखा। वह मुस्कुरा रही थी, मगर आंखों में नफरत साफ थी।
—तुम्हें हर चीज में बीच में आने की आदत है?
—डॉक्टर ने कहा है कि दूध धीरे-धीरे देना है।
सान्वी ने गिलास मेज पर रखते हुए कहा।
—एक बूंद भी बचनी नहीं चाहिए।
फिर वह बाहर चली गई।
नैना ने दरवाजा बंद किया और अंदर से कुंडी लगा दी।
ऑफिस में स्क्रीन देख रहे विक्रम की मुट्ठी कस गई। उसके घर का नियम था कि आरव के कमरे की कुंडी कोई नहीं लगाएगा। उसने फोन उठाया। बस एक आदेश देता और गार्ड नैना को घसीटकर बाहर फेंक देते।
पर तभी नैना ने गिलास आरव के मुंह के पास नहीं ले गई। वह तेजी से अलमारी की तरफ गई। अपने एप्रन की जेब से एक साफ सिरिंज, छोटा शीशे का वायल और रंगहीन रसायन निकाला। उसने दूध से कुछ बूंदें खींचीं और वायल में डालीं।
कुछ ही पल में वह तरल काला पड़ गया।
नैना के होंठ कांप गए। उसने मुंह पर हाथ रखा, जैसे चीख रोक रही हो। फिर वह आरव के पास घुटनों के बल बैठ गई।
—मुझे शक था, बाबू। अब यकीन हो गया। डरना मत। जब तक मैं हूं, कोई तुम्हें खत्म नहीं करेगा।
आरव की आंखों में पानी भर आया। उसका शरीर हिल नहीं सकता था, आवाज निकल नहीं सकती थी, लेकिन उसके चेहरे पर वह डर था जो किसी गवाह के चेहरे पर होता है।
विक्रम जम गया।
जिस औरत से वह शादी करने वाला था, वही उसके बेटे को हर रात धीमा जहर दे रही थी।
उसी समय स्क्रीन पर कमरे के बाहर एक और परछाईं दिखी। दरवाजे के पास करण खड़ा था, विक्रम का सबसे भरोसेमंद आदमी। वही करण जिसने मीरा की चिता को कंधा दिया था। वही करण जिसने 15 साल तक विक्रम की जान बचाई थी।
करण ने सान्वी से धीमे स्वर में कहा।
—आज असर होना चाहिए। ज्यादा देर नहीं कर सकते।
सान्वी ने जवाब दिया।
—विक्रम को उसके बेटे से आजाद करना ही होगा।
विक्रम के हाथ से फोन गिर गया।
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भाग 2:
विक्रम कई सेकंड तक स्क्रीन के सामने पत्थर बना बैठा रहा। कैमरे में नैना दूध को बाथरूम के सिंक में उड़ेल रही थी, गिलास धो रही थी और अपने बैग से लाया हुआ बंद पैकेट निकालकर आरव को पिला रही थी। वह उसके माथे पर हाथ फेरते हुए फुसफुसाई, —यह साफ है, बाबू। इसे पी लो। कोई तुम्हें छू नहीं पाएगा। विक्रम की उंगलियों में पकड़ा कांच का गिलास टूट गया, खून बहा, मगर उसे दर्द नहीं हुआ। उसे सिर्फ यह समझ आया कि सान्वी अकेली यह नहीं कर सकती थी। दवाएं लॉक में रहती थीं। रसोई पर नजर रहती थी। अस्पताल से आने वाली हर रिपोर्ट करण के हाथ से गुजरती थी। अगर जहर अंदर आ रहा था, तो गेट किसी अपने ने खोला था। आधी रात को विक्रम बिना किसी को बताए फार्महाउस पहुंचा। कमरे में आरव सो रहा था और नैना कुर्सी पर बैठी-बैठी झपक रही थी, उसका हाथ बच्चे की चादर पर था। विक्रम ने दरवाजा बंद कर कुंडी लगा दी। नैना चौंककर उठी। वह सफेद पड़ गई, पर तुरंत आरव के सामने खड़ी हो गई। —मैंने कुछ गलत नहीं किया। विक्रम ने मोबाइल पर वीडियो दिखाया। नैना की सांस अटक गई। उसे लगा अब वह मारी जाएगी। मगर विक्रम ने धीमे कहा, —सारे सबूत दिखाओ। और बताओ इन्हें कैसे गिराना है। नैना ने गद्दे के नीचे से धातु का छोटा डिब्बा निकाला। उसमें तारीखें, रिएक्शन नोट्स, दूध के नमूने, दवा की पर्चियां और कुछ फोटो थे। उसने बताया कि अस्पताल में उसने दवा चोरी नहीं की थी, बल्कि नकली बिलिंग और दवा बदलने वाला गिरोह पकड़ा था, इसलिए उसे फंसा दिया गया। आरव की सिकुड़ी पुतलियां, भारी सांस, अचानक नींद, कमजोर गला—सब सामान्य चोट से ज्यादा था। सान्वी जो भी लाती, वह जांचती रही। —यह तेज नींद की दवा और मांसपेशियों को ढीला करने वाला मिश्रण है। धीरे-धीरे आवाज, सांस और चेतना बंद कर देता है। वे इसे दुर्घटना की जटिलता दिखाएंगे। विक्रम ने पूछा, —कितना समय? नैना ने सिर झुका लिया। —अगर यह हफ्ता चलता रहा, तो शायद 1 महीना भी नहीं। विक्रम की आंखों में मीरा की जलती चिता, आरव की पुरानी हंसी और सान्वी की झूठी मुस्कान एक साथ घूम गई। नैना ने कहा, —अभी हमला मत कीजिए। वे मुझे पागल कहेंगे। उन्हें वहीं पकड़ना होगा जहां वे खुद मानें कि कोई नहीं देख रहा। अगले दिन विक्रम ने सबके सामने एलान किया कि वह 3 दिनों के लिए मुंबई जा रहा है। उसने सान्वी के माथे को छुआ, करण को गले लगाया। —घर संभालना। करण मुस्कुराया। —जान देकर भी। लेकिन विक्रम एयरपोर्ट नहीं गया। रात 11:30 बजे वह फार्महाउस के भूमिगत सर्वर रूम में 4 ऐसे लोगों के साथ बैठा था जिन्हें करण नहीं जानता था। स्क्रीन पर आरव का दरवाजा खुला। सान्वी दूध लेकर अंदर आई। उसके पीछे करण आया। इस बार दोनों के चेहरे पर कोई नकाब नहीं था।
भाग 3:
नैना खिड़की के पास खड़ी थी। कमरे की पीली रोशनी बंद थी, सिर्फ नाइट लैंप जल रहा था। आरव आंखें आधी बंद किए पड़ा था, लेकिन उसकी उंगलियां चादर पर कांप रही थीं। नैना ने उसकी हथेली पर हल्का दबाव दिया, जैसे कह रही हो कि वह अकेला नहीं है।
सान्वी रेशमी क्रीम रंग की नाइट गाउन में थी। उसके बाल वैसे ही सजे थे जैसे किसी पार्टी में जाने वाली औरत के होते हैं। उसकी ट्रे में चांदी का गिलास था। दूध से केसर की खुशबू आ रही थी, मगर कमरे में डर की गंध ज्यादा तेज थी।
करण ने पीछे से दरवाजा बंद किया।
नैना ने धीमे स्वर में कहा।
—आरव सो चुका है। दूध की जरूरत नहीं है।
सान्वी ने ट्रे मेज पर रखी।
—आज मैं दूंगी।
—डॉक्टर ने मना किया है।
सान्वी हंसी।
—डॉक्टर? या तुम? एक बदनाम नर्स अब मेरे घर के नियम बताएगी?
नैना ने जवाब नहीं दिया। वह बस बिस्तर के सामने आ गई।
करण आगे बढ़ा।
—हटो, नैना। जितना बोलना था बोल लिया।
—मैं नहीं हटूंगी।
सान्वी का चेहरा पल भर में बदल गया। बनावटी मिठास उतर गई। उसके नीचे एक ऐसी औरत खड़ी थी जो बहुत दिनों से अपनी असली आवाज दबाए बैठी थी।
—तुम्हें पता भी है यह बच्चा क्या है? यह इस घर की चिता है। इसकी वजह से विक्रम हर रात मरता है। इसकी वजह से हमारा विवाह 3 बार टला। इसकी वजह से हर दीवार पर मीरा की तस्वीर अब भी लटकती है। मैं कब तक एक मरी हुई औरत की छाया से लड़ती?
नैना की आंखें जल उठीं।
—मरी हुई औरत से नहीं, उसके बच्चे से लड़ रही हैं आप।
—बच्चा? यह अब बच्चा नहीं रहा। यह बिस्तर, मशीन और विरासत है। विक्रम कभी आगे नहीं बढ़ेगा जब तक यह सांस लेता रहेगा।
आरव की आंखें पूरी खुल गईं। उसके होंठ हिले, मगर आवाज नहीं आई।
नैना ने उसकी तरफ देखा और उसकी आत्मा तक कांप गई। वह सब समझ रहा था। वह हमेशा समझता था।
सान्वी ने अपनी गाउन की जेब से एक सिरिंज निकाली। उसमें साफ तरल भरा था।
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
—यह पिछली खुराक नहीं है।
सान्वी ने ठंडे स्वर में कहा।
—नहीं। आज आखिरी रात है। सुबह डॉक्टर कहेगा कि बच्चे की सांस अचानक बंद हुई। सब रोएंगे। विक्रम टूट जाएगा। और फिर मैं उसे संभालूंगी।
करण ने नैना की कलाई पकड़ ली।
—तुम्हारे लिए गाड़ी तैयार है। बस अड्डे पर छोड़ देंगे। 5 लाख नकद मिलेंगे। भाग जाओ। तुम्हारा पुराना केस खोल दिया तो जिंदगी भर जेल में सड़ोगी।
—मैंने उस बच्चे को जहर पीते देखा है। अब भागकर कैसे जिऊंगी?
करण ने उसकी बांह मरोड़ दी।
—तो चलकर नहीं जाओगी।
नैना दर्द से झुकी, लेकिन उसने बिस्तर का किनारा नहीं छोड़ा। सान्वी आगे बढ़ी। उसने आरव की ड्रिप लाइन की तरफ हाथ बढ़ाया।
तभी बाथरूम के अंधेरे से एक आवाज आई।
—हाथ वहीं रोक लो।
सान्वी जम गई।
करण पीछे मुड़ा।
विक्रम राजवंश बाहर आया। उसके पीछे 4 आदमी थे, काले कपड़ों में, शांत और खतरनाक। उनके हाथों में हथियार थे, मगर बंदूकें नीचे थीं। असली डर विक्रम के चेहरे पर था।
वह चिल्लाया नहीं। बस चला और सान्वी के सामने आकर खड़ा हो गया।
सान्वी की उंगलियां कांपने लगीं। सिरिंज उसके हाथ में थी।
—विक्रम… तुम मुंबई नहीं गए?
—काश चला जाता। शायद तुम्हें आखिरी बार इंसान समझकर मर जाता।
सान्वी ने तुरंत रोने की कोशिश की।
—यह वैसा नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो। करण ने मजबूर किया। उसने कहा कि आरव की हालत में अब कोई उम्मीद नहीं…
करण चीखा।
—झूठ बोल रही है! योजना इसकी थी। इसके पिता का डॉक्टर दवा भेजता था।
विक्रम ने एक इशारा किया। उसके आदमी ने करण को पकड़ लिया। दूसरे ने सान्वी के हाथ से सिरिंज कपड़े में लपेटकर ली।
विक्रम ने अपनी जेब से मोटा लिफाफा निकाला और बिस्तर पर फेंक दिया। फोटो, बैंक ट्रांसफर, चैट प्रिंट, दवा बिल, अस्पताल की नकली पर्चियां, सब चादर पर फैल गए।
—तुम दोनों की बातचीत। मंत्री धर्मवीर मल्होत्रा की फाउंडेशन से हुए भुगतान। गुरुग्राम अस्पताल के डॉक्टर पवन सूद को भेजे गए पैसे। करण के गुप्त खाते। और वह संदेश जिसमें तुमने लिखा था कि विवाह से पहले वारिस खत्म होना चाहिए।
सान्वी का रोना रुक गया। चेहरा सख्त हो गया।
—तुमने मेरी जासूसी की?
—अपने बेटे को बचाया।
—तुमने कभी मुझे पत्नी माना ही नहीं। इस घर में हर जगह मीरा थी। तुम्हारे फोन में, कमरे में, पूजा में, आरव की आंखों में। मैं क्या थी? सजावट?
विक्रम ने धीमे कहा।
—तुम खतरा थी। बस मुझे देर से दिखी।
सान्वी ने गुस्से से कहा।
—हां, मैं चाहती थी कि वह हट जाए। क्या गलत था? तुम्हारा साम्राज्य उसके नाम है। तुम्हारी सारी संपत्ति उस बच्चे के ट्रस्ट में बंधी है। शादी के बाद भी मुझे कुछ नहीं मिलता। मेरे पिता ने कहा था कि एक अपाहिज बच्चे की वजह से मल्होत्रा परिवार खाली हाथ नहीं बैठेगा।
करण हंस पड़ा, कड़वाहट से।
—अब सच सुन लिया, मालिक? तुम राजा बने बैठे थे, पर सिंहासन इस बच्चे के नाम कर रखा था। लोग तुम्हारे सामने झुकते थे, लेकिन तुम एक व्हीलचेयर से बंधे हुए थे। तुम्हें कमजोर होते देखना मुश्किल था। बिजनेस छूट रहा था। दुश्मन सिर उठा रहे थे। मैंने सोचा अगर आरव चला गया, तो तुम फिर वही विक्रम बनोगे।
विक्रम की आंखों में पहली बार दर्द ने गुस्से को पीछे धकेल दिया।
—तूने मेरी पत्नी की चिता को कंधा दिया था।
—और तूने उसके बाद जीना छोड़ दिया था।
करण की आवाज ऊंची हुई।
—मैंने 15 साल तेरे लिए खून बहाया। और तूने सब कुछ उस बच्चे के नाम कर दिया जो बोल भी नहीं सकता!
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
आरव की आंखों से आंसू बह रहे थे। वह सब सुन चुका था। नैना ने उसके माथे पर हाथ रखा।
विक्रम ने अपने बेटे को देखा। फिर करण को।
—मेरा बेटा बोल नहीं सकता था, इसलिए तुमने समझ लिया कि वह जीता नहीं है।
उसने दरवाजे की तरफ इशारा किया।
—ले जाओ इन्हें।
सान्वी घुटनों पर गिर गई।
—विक्रम, प्लीज। मेरे पिता को इसमें मत घसीटना। राजनीतिक तूफान आ जाएगा।
—तूफान शुरू हो चुका है। अभी तक आयकर विभाग उनके दिल्ली और चंडीगढ़ दफ्तरों में छापा मार चुका होगा। अस्पताल के रिकॉर्ड सील हो चुके हैं। डॉक्टर सूद बयान दे रहा है। जो जहर तुमने मेरे घर में लाया, अब उसी से तुम्हारा नाम डूबेगा।
सान्वी चीखी।
—तुम मुझे बर्बाद कर दोगे!
—नहीं। तुमने खुद को उस दिन बर्बाद किया जब तुमने मेरे बच्चे को दूध में मौत मिलाकर दी।
करण को पहले ले जाया गया। उसने छूटने की कोशिश की, मगर 2 कदम भी नहीं चला। जाते-जाते उसने विक्रम को देखा।
—मैं भाई था तेरा।
विक्रम ने बिना आवाज ऊंची किए कहा।
—मेरा भाई उस रात मर गया जब उसने 7 साल के बच्चे की सांस बेच दी।
सान्वी को ले जाते हुए उसके महंगे कंगन बज रहे थे। उसकी चीखें गलियारे, संगमरमर की सीढ़ियों और खाली लॉन से टकराकर दूर चली गईं।
कमरा अचानक बहुत शांत हो गया।
नैना ने सबसे पहले आरव की जांच की। उसने उसकी पुतलियां देखीं, सांस देखी, ड्रिप हटाई, नब्ज पकड़ी। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन काम सटीक था।
—आरव ठीक है। अभी सुरक्षित है।
विक्रम बिस्तर के पास आया। वह पहली बार उस कमरे में मालिक जैसा नहीं, अपराधी पिता जैसा लग रहा था।
—आरव…
बच्चे की आंखें उसकी तरफ उठीं।
विक्रम घुटनों पर बैठ गया।
—मुझे माफ कर दे। मैंने सोचा तुझे बंद कमरे, गार्ड और कैमरे बचाएंगे। असल में मैंने तुझे उन्हीं लोगों के बीच अकेला छोड़ दिया जो तुझे मिटाना चाहते थे।
आरव ने जवाब नहीं दिया। उसकी उंगलियां हल्की सी हिलीं। वे नैना की साड़ी के किनारे को ढूंढ रही थीं।
नैना पीछे हटने लगी, मगर आरव ने अपनी पूरी बची हुई ताकत से कपड़ा पकड़ लिया।
विक्रम ने वह देखा। उसके चेहरे पर जलन नहीं, सिर्फ शर्म और कृतज्ञता आई।
—तूने उसे सुना, जब मैं नहीं सुन पाया।
नैना की आंखें भर आईं।
—वह कभी खाली नहीं था। वह सब समझता था। बस उसके शरीर ने धोखा दिया, और हमने उसे खामोश समझ लिया।
विक्रम ने धीरे से कहा।
—आज से इस घर में कोई दरवाजा उसकी मर्जी के बिना बंद नहीं होगा।
उस रात विक्रम ने पहली बार करण की सुरक्षा व्यवस्था हटाई। पुराने गार्डों को बाहर किया गया। नैना ने अपनी पुरानी प्रोफेसर डॉक्टर अर्चना को बुलाया, जो बच्चों की न्यूरोलॉजिस्ट थीं और नैना पर अब भी भरोसा करती थीं। सुबह होते-होते निजी एंबुलेंस आई, जांच हुई, नमूने सील हुए।
रिपोर्ट ने नैना की हर बात सच साबित कर दी।
आरव की चुप्पी सिर्फ हादसे का सदमा नहीं थी। उसके शरीर में महीनों से ऐसी दवाएं जा रही थीं जो उसकी सांस, मांसपेशियों और आवाज को दबा रही थीं। हर गिलास दूध, हर कटोरी दलिया, हर मिठी दवा उसके भीतर कैद को गहरा करती गई थी।
विक्रम ने रिपोर्ट हाथ में लेकर लंबी देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर उसने मीरा की तस्वीर के सामने सिर झुका दिया।
—मैंने वादा किया था उसे बचाऊंगा। मैं हार गया था। अब नहीं हारूंगा।
ठीक होना आसान नहीं था। कोई चमत्कार नहीं हुआ। 3 दिन तक आरव बेचैन रहा। कभी पसीना आता, कभी सांस भारी होती, कभी वह डरकर आंखें खोल देता और दरवाजे को देखता। नैना हर बार पास बैठी मिलती। विक्रम भी वहीं रहता। फोन बंद, मीटिंग रद्द, बिजनेस दूसरे लोगों के हवाले।
लोगों ने बाहर बातें बनाईं कि विक्रम राजवंश कमजोर हो गया है। किसी ने कहा वह बेटे के डर से पागल हो गया। किसी ने कहा नैना नाम की नर्स ने उस पर जादू कर दिया।
विक्रम ने किसी को जवाब नहीं दिया।
12वें दिन सुबह नैना खिड़की के पास बैठकर आरव को कहानी सुना रही थी। कहानी एक छोटे राजकुमार की थी जो किले के बंद कमरे में कैद था और जिसे बगीचे का खुला दरवाजा पुकारता था। विक्रम कमरे के कोने में मेडिकल रिपोर्ट पढ़ने का अभिनय कर रहा था, हालांकि उसे आधे शब्द समझ नहीं आ रहे थे।
नैना ने पन्ना पलटा।
—फिर राजकुमार ने दरवाजा धक्का देकर खोला…
आरव के होंठ हिले।
नैना रुक गई।
विक्रम ने सिर उठाया।
पहले कुछ नहीं सुनाई दिया। फिर एक बहुत हल्की, टूटी हुई आवाज निकली।
—नहीं…
नैना का हाथ हवा में रुक गया।
—क्या कहा, बाबू?
आरव ने गले को जैसे भीतर से खरोंचकर आवाज निकाली।
—दरवाजा… मत… बंद…
विक्रम के हाथ से रिपोर्ट गिर गई।
नैना तुरंत उठी। उसने कमरे का दरवाजा पूरा खोल दिया। बाहर की रोशनी अंदर फैल गई।
—कभी नहीं। जब तक तुम नहीं चाहोगे, यह दरवाजा बंद नहीं होगा।
आरव की आंखों से आंसू बहने लगे।
विक्रम बिस्तर के पास आया। उसने बेटे का हाथ पकड़ा।
—कभी नहीं, मेरे शेर।
आरव ने उसे देखा। होंठ कांपे। आवाज कमजोर थी, मगर जिंदा थी।
—पापा…
विक्रम का शरीर जैसे भीतर से टूट गया। उसने आरव की छोटी हथेली अपने माथे से लगाई और पहली बार बिना छिपाए रोया।
नैना मुड़कर खिड़की की तरफ देखने लगी, ताकि पिता और बेटे को अकेला पल मिले। पर आरव की उंगलियां फिर हिलीं।
—नैना… मत… जाना…
नैना लौट आई।
—नहीं जाऊंगी।
विक्रम ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी नजर में मालिक का आदेश नहीं, एक पिता की विनती थी।
—रहोगी? नौकरी की तरह नहीं। आरव की दुनिया फिर से बनाने में हमारे साथ?
नैना ने आरव को देखा। उस बच्चे की आंखों में पहली बार डर के साथ एक पतली सी उम्मीद भी थी।
—रहूंगी। लेकिन शर्त मेरी होगी।
विक्रम ने सिर हिलाया।
—जो कहोगी।
—यह घर जेल नहीं रहेगा। आरव को सूरज चाहिए, आवाजें चाहिए, बच्चे चाहिए, रंग चाहिए। उसे ऐसे मत बचाइए जैसे वह टूट जाएगा। उसे जीने दीजिए।
विक्रम ने कमरे को देखा। महंगे परदे, सफेद दीवारें, मशीनें, चुप्पी। सब कुछ सुरक्षित था, पर जिंदा नहीं।
—आज से बदलता है।
और सचमुच बदला।
कुछ ही हफ्तों में तीसरी मंजिल का कमरा अस्पताल जैसा नहीं रहा। दीवारों पर रंग आए। किताबें आईं। संगीत आया। फिजियोथेरेपी के लिए बगीचे का रास्ता खुला। आरव को नीचे लॉन में ले जाया जाने लगा। वह पहले डरता था। हवा तेज लगती थी, आवाजें चुभती थीं। फिर धीरे-धीरे उसने पेड़ों को देखना शुरू किया।
सान्वी, करण, डॉक्टर सूद और मंत्री धर्मवीर मल्होत्रा के खिलाफ केस चला। खबरें फैलीं। टीवी चैनलों ने इसे दिल्ली का सबसे बड़ा पारिवारिक षड्यंत्र कहा। सान्वी के पिता ने बचने की कोशिश की, मगर बैंक रिकॉर्ड, दवा खरीद और कैमरे के वीडियो ने सब रास्ते बंद कर दिए।
नैना का पुराना केस भी खुला। जिस अस्पताल ने उसे चोर कहा था, वहीं से असली दवा घोटाले के सबूत मिले। उसका नाम साफ हुआ। वही लोग जो उसे बदनाम कहते थे, अब इंटरव्यू मांगते थे।
लेकिन नैना को किसी कैमरे की जरूरत नहीं थी।
उसे सबसे बड़ा जवाब एक शाम मिला।
फार्महाउस के बगीचे में नीम के पेड़ के नीचे आरव अपनी व्हीलचेयर पर बैठा था। विक्रम सामने घुटनों के बल बैठा था। नैना उसके पास खड़ी थी। आरव के हाथ में छोटी लाल गेंद थी। उसकी टांगें अब भी नहीं चलती थीं, लेकिन उसकी गर्दन मजबूत हो रही थी, आवाज लौट रही थी, आंखों में जीवन लौट रहा था।
विक्रम ने मुस्कुराकर पूछा।
—तैयार?
आरव ने सांस भरी।
—तैयार।
उसने गेंद बहुत धीरे से फेंकी। गेंद विक्रम की छाती से टकराकर गोद में गिर गई। विक्रम ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे किसी ने उसे पूरा संसार दे दिया हो।
आरव हंसा।
हल्की, टूटी, मगर सच्ची हंसी।
उस हंसी ने उस घर से 14 महीनों का सन्नाटा काट दिया। मीरा वापस नहीं आई। हादसा मिटा नहीं। घाव खत्म नहीं हुए।
लेकिन उस दिन सबने समझा कि कभी-कभी किसी बच्चे को बचाने के लिए सबसे ताकतवर आदमी नहीं, सबसे बदनाम औरत सबसे पहले खड़ी होती है।
और कभी-कभी जहर दूध में नहीं, रिश्तों की मुस्कान में छिपा होता है।
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