
उन पर नहीं।
दुनिया पर।
उस शादी के लॉन पर, जहाँ इतना खाना फेंक दिया गया था कि उससे सौ लोगों का पेट भर सकता था, जबकि दो बच्चे आवारा पिल्लों की तरह कूड़े में खाना ढूँढ़ रहे थे।
तभी लंबी लड़की मुड़ी।
रोहन साँस लेना ही भूल गया।
उसकी ठोड़ी।
बीच में वह छोटा-सा गड्ढा।
बाईं भौंह, जो दाईं से थोड़ी ऊँची थी।
और वे आँखें।
बड़ी, धूसर-हरी, जिनकी पुतलियों के पास भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे थे।
अनन्या की आँखें।
उसकी पत्नी छह साल पहले एक निजी अस्पताल में प्रसव के बाद मर गई थी। वह उसके लिए एक जीवित बेटे और ऐसी ख़ामोशी छोड़ गई थी जिसे कोई दौलत कभी भर नहीं सकती थी।
ड्राइवर के रोकने से पहले ही रोहन ने कार का दरवाज़ा खोल दिया।
“सर, यह इलाका सुरक्षित नहीं है।”
रोहन ने उसकी बात नहीं सुनी।
उसके जूते कीचड़ भरे पानी में उतर गए।
उसकी सफेद शर्ट में कूड़े के ढेर की बदबू समा गई।
लड़कियों ने उसे अपनी ओर आते देखा और वहीं ठिठक गईं।
छोटी लड़की बड़ी के पीछे छिप गई।
लंबी लड़की ने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए, जैसे आत्मसमर्पण कर रही हो।
“हम जा रहे हैं, साहब। हमने कुछ नहीं चुराया।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन डर ने उसे ऐसा बोलना सिखा दिया था।
रोहन वहीं रुक गया।
उसके भीतर कुछ टूट गया, जिस तरह उसने “साहब” कहा था।
चाचा नहीं।
भैया नहीं।
सर नहीं।
साहब।
एक ऐसा शब्द, जिसे वे बच्चे इस्तेमाल करते हैं जिन्होंने दुनिया में अपनी जगह बहुत जल्दी समझ ली हो।
ड्राइवर के पकड़ने से पहले ही ईशान कार से कूद पड़ा।
“पापा, इन्हें भूख लगी है।”
वह अपने स्कूल बैग के पास दौड़ा, ज़िप खोली और उसमें से चाँदी का टिफ़िन बॉक्स निकाल लिया।
उसके अंदर शाम के नाश्ते के दो पनीर रोल रखे थे।
वह लड़कियों के पास गया और टिफ़िन उनकी ओर बढ़ा दिया।
“लो। मम्मी कहती हैं कि खाना कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।”
इन शब्दों ने रोहन को उन लड़कियों के दृश्य से भी ज़्यादा गहरा आघात पहुँचाया।
मम्मी।
ईशान आज भी अनन्या को मम्मी कहता था, जबकि उसने उन्हें सिर्फ़ तस्वीरों, कहानियों और अपने बिस्तर के पास रखे चंदन की लकड़ी के फ़्रेम के ज़रिए ही जाना था।
लंबी लड़की ने तुरंत खाना नहीं लिया।
उसने पहले रोहन की ओर देखा।
अपनी आँखों से अनुमति माँगते हुए।
इसने उसे भूख से भी ज़्यादा तोड़ दिया।
“ले लो, बेटा,” उसने धीरे से कहा।
लड़की ने रोल लिया, उसे दो हिस्सों में तोड़ा, फिर अपने हिस्से को भी दो भागों में बाँटा और सबसे बड़ा टुकड़ा छोटी लड़की को दे दिया।
छोटी लड़की बहुत जल्दी-जल्दी खाने लगी और उसे खाँसी आ गई।
बड़ी लड़की ने उसकी पीठ थपथपाई।
“धीरे, तारा। धीरे।”
रोहन का दिल उसकी पसलियों से ज़ोर से टकराया।
तारा।
अनन्या को यह नाम बहुत पसंद था।
गर्भावस्था के दौरान, जब वह आधी रात को नंगे पैर बालकनी में टहलती थी और चाँद से बहस करती थी, तब उसने एक बार कहा था,
“अगर कभी हमारी बेटी हुई, तो मैं उसका नाम तारा रखना चाहूँगी। एक सितारे को अँधेरे से डरना नहीं चाहिए।”
रोहन लड़कियों को घूरता रह गया।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
बड़ी लड़की ने नज़रें झुका लीं।
“मीरा।”
मीरा।
यह भी वही नाम था जो अनन्या ने चुना था।
एक बार नहीं।
कई बार।
अस्पताल की नोटपैड पर।
रेस्तराँ के बिलों के पीछे।
उसके फोन के नोट्स में, राशन की सूचियों और बच्चे के कंबल के रंगों के बीच।
मीरा और तारा।
उन बेटियों के नाम, जिनके बारे में उन्हें बताया गया था कि वे कभी अस्तित्व में ही नहीं थीं।
रोहन को लगा जैसे सड़क उसके पैरों के नीचे झुक गई हो।
“तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं?”
मीरा का चेहरा एकदम भावहीन हो गया।
“हमारे नहीं हैं।”
“तुम्हें यहाँ कौन छोड़ गया?”
तारा ने डरते हुए मीरा की ओर देखा।
मीरा ने तारा का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“शांति आंटी ने कहा था कि बड़ी शादी वाली जगह के पास इंतज़ार करना। उन्होंने कहा था कि कोई हमें लेने आएगा।”
रोहन धीरे-धीरे नीचे बैठ गया।
“यह शांति आंटी कौन हैं?”
“वह हमें रेलवे लाइन के पास वाले कमरे में रखती थीं।”
“कहाँ?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
अब वह उसके चेहरे को देख रही थी।
किसी अजनबी से मिलने वाले बच्चे की तरह नहीं।
बल्कि ऐसे जैसे किसी तस्वीर को याद करने की कोशिश कर रही हो।
तभी तारा फुसफुसाई,
“दीदी, ये उसी पुराने फोटो वाले आदमी जैसे दिखते हैं।”
रोहन का गला सूख गया।
“कौन-सी फोटो?”
मीरा ने सिर हिला दिया।
“कोई फोटो नहीं। वह अब नहीं है।”
लेकिन उसकी दाहिनी मुट्ठी किसी चीज़ पर और कस गई।
तभी रोहन की नज़र उस पर पड़ी।
उसकी कलाई पर एक गंदा लाल धागा बँधा था।
उससे एक छोटा-सा प्लास्टिक का अस्पताल वाला एंकलेट जुड़ा हुआ था, जो उम्र के साथ पीला पड़ चुका था और किनारों से फट गया था।
उसने बहुत सावधानी से हाथ बढ़ाया।
“क्या मैं इसे देख सकता हूँ?”
मीरा एक कदम पीछे हट गई।
“नहीं। आंटी ने कहा था कि इसे कभी मत देना। उन्होंने कहा था कि अगर यह खो गया, तो पापा हमें कभी नहीं ढूँढ़ पाएँगे।”
रोहन के पीछे खड़े ड्राइवर ने धीमे से कहा,
“सर…”
रोहन ने हाथ उठाकर उसे चुप करा दिया।
“तुम्हें पापा के बारे में किसने बताया?”
मीरा के होंठ काँपने लगे।
उसने ईशान की ओर देखा।
फिर रोहन की ओर।
फिर मर्सिडीज़ की ओर।
और फिर उसने वह सवाल पूछा जिसने रोहन के भीतर पूरी सड़क को खामोश कर दिया।
“क्या आप हमारे पापा हैं, या दादी ने आपको भी हमें कहीं और छोड़ आने के लिए भेजा है?”
रोहन हिल भी नहीं पाया।
ईशान ने उलझन से उसकी ओर देखा।
“पापा, ये दादी किसे कह रही है?”
जैसे ही मीरा ने ईशान के मुँह से “पापा” सुना, उसके चेहरे का भाव बदल गया।
उसका डर किसी गुस्से में बदल गया।
उसने अपनी मुट्ठी में अब भी पकड़े टूटे हुए अस्पताल के एंकलेट के साथ ईशान की ओर उँगली उठाई।
“तो फिर सिर्फ़ इसे ही बड़े घर में रहने का हक़ क्यों मिला?”
तारा बिना आवाज़ के रोने लगी।
मीरा की आवाज़ ऊँची हो गई, पतली और काँपती हुई।
“दादी ने ऐसा क्यों कहा कि सिर्फ़ लड़के को ही परिवार के साथ रहने की इजाज़त है?”
रोहन को लगा जैसे किसी ने उसकी पत्नी की कब्र खोदकर नंगे हाथों से एक भयानक राज़ बाहर निकाल लिया हो।
उसकी माँ।
सावित्री देवी मल्होत्रा।
वही महिला जो सफेद साड़ियाँ पहनती थीं, हर सर्दी में कंबल दान करती थीं, हर मंदिर के कार्यक्रम की पहली पंक्ति में बैठती थीं और दुनिया से कहती थीं कि अपनी बहू की मौत के बाद उन्होंने ईशान को पाला है।
रोहन गीले कूड़े और शादी के बचे हुए खाने की बदबू के बीच खड़ा था, उन दो बच्चों को घूरते हुए जिनके चेहरे पर उसकी शक्ल थी और आँखों में अनन्या बसती थी।
उसके पीछे ट्रैफिक के हॉर्न बजने लगे।
उसके सामने मीरा अपनी बहन को इस तरह पकड़े हुए थी, जैसे उसे एक और धोखे की उम्मीद हो।
और उसकी जेब में रखा रोहन का फोन बजने लगा।
स्क्रीन पर सिर्फ़ एक नाम दिखाई दे रहा था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.