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अंधी सितारवादक बारिश से बचने एक आलीशान होटल में घुसी, डॉन से टकराते ही 6 बंदूकें उठीं, लेकिन उसने फुसफुसाया, “यह मेरी है”… फिर पिता का 10 साल पुराना राज खुला

भाग 1

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बारिश से बचने आई अंधी लड़की जैसे ही मुंबई के सबसे खतरनाक आदमी से टकराई, उसके 6 अंगरक्षकों ने एक साथ पिस्तौलें तान दीं।

ताज कोलाबा के चमकते संगमरमर वाले प्रवेश द्वार पर उस शाम अफरा-तफरी मची हुई थी। बाहर अरब सागर से उठी हवा बारिश को चाबुक की तरह सड़कों पर पटक रही थी। पीली-काली टैक्सियों के हॉर्न, भीगी भीड़ की चीखें और पानी में फिसलते कदमों के बीच नैना रावल अपनी सफेद छड़ी आगे बढ़ाती हुई बस किसी सुरक्षित जगह की तलाश कर रही थी।

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उसके कंधे पर पुराने लकड़ी के सितार का बड़ा काला डिब्बा टंगा था। वही सितार उसके पिता की आखिरी निशानी था। नैना 22 साल की थी, मगर उसकी चाल में वह थकान थी जो किसी 82 साल के दुख को ढोने वाले इंसान में होती है। 10 साल पहले एक सड़क हादसे में उसने अपनी आंखें खो दी थीं और अपने पिता को भी। दुनिया ने कहा था, हादसा था। नैना ने मान लिया था, क्योंकि उसके पास सच देखने के लिए आंखें नहीं थीं।

होटल के भीतर कदम रखते ही शोर अचानक दब गया। हवा में चंदन, महंगे इत्र और चमकाए गए फर्श की गंध थी। कहीं दूर शहनाई जैसी नरम धुन बज रही थी। नैना ने राहत की सांस ली, लेकिन उसे पता नहीं था कि वह किसी शादी या मेहमानों की महफिल में नहीं, बल्कि मुंबई के अंडरवर्ल्ड की सबसे खतरनाक बैठक के बीच आ चुकी थी।

सामने सीढ़ियों से आर्यन मेहरा उतर रहा था। काले बंदगले में उसका चेहरा पत्थर जैसा ठंडा था। वह मेहरा गिरोह का मुखिया था, ऐसा आदमी जिसका नाम सुनकर बिल्डर, मंत्री और पुलिस अफसर भी आवाज धीमी कर लेते थे। उसके पीछे 6 आदमी चल रहे थे, जिनमें सबसे आगे कबीर था, उसका दायां हाथ।

आर्यन ने अभी-अभी अपने दुश्मन भानु प्रताप के लोगों से समझौता तोड़ा था। उसकी आवाज धीमी थी, मगर आदेश मौत जैसा साफ था।

— धारावी वाले गोदाम खाली नहीं होने चाहिए। रात 12 बजे से पहले सब जल जाना चाहिए।

कबीर ने सिर झुकाया।

उसी पल नैना का पैर गीले संगमरमर पर फिसला। सितार का भारी डिब्बा उसके कंधे से खिंचा और वह सीधी आर्यन की छाती से जा टकराई। उसकी सफेद छड़ी फर्श पर गिरकर ऐसी आवाज से उछली जैसे गोली चली हो।

एक ही पल में 6 बंदूकें उसकी ओर उठ गईं।

— पीछे हट! — कबीर गरजा।

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नैना जम गई। वह बंदूकें नहीं देख सकती थी, मगर धातु की ठंडी गंध, भारी सांसें और घातक सन्नाटा महसूस कर सकती थी। उसका शरीर कांपने लगा।

आर्यन ने पहले उसे धक्का देने के लिए कंधे पकड़े, मगर फिर उसकी नजर नैना के जबड़े के नीचे बने छोटे अर्धचंद्र जैसे निशान पर अटक गई। उसका चेहरा बदल गया। जैसे किसी ने 10 साल पुराना जख्म उसकी छाती में फिर खोल दिया हो।

उसकी पकड़ कठोर से कोमल हो गई।

— साहब, आदेश दीजिए — कबीर ने कहा।

आर्यन ने बंदूकों की ओर देखे बिना कहा।

— सब हथियार नीचे करो।

कबीर चौंक गया।

— लेकिन साहब—

— मैंने कहा, नीचे करो।

नैना ने कांपती आवाज में कहा।

— मुझे माफ कीजिए। मैं देख नहीं सकती। बस मेरी छड़ी दे दीजिए, मैं चली जाऊंगी।

आर्यन ने झुककर उसकी छड़ी उठाई और उसके हाथ में रख दी।

— तुम बाहर नहीं जाओगी, नैना।

अपना नाम सुनते ही नैना की सांस अटक गई।

— आप मुझे कैसे जानते हैं?

आर्यन ने अपना सूखा शॉल उसके भीगे कंधों पर डाल दिया।

— क्योंकि 10 साल से तुम्हारी हर सांस पर मेरी नजर है।

नैना पीछे हटना चाहती थी, मगर तभी आर्यन ने उसके कान के पास झुककर वह बात कही जिसने उसके पैरों तले जमीन खींच ली।

— तुम्हारे घर पर अभी भानु प्रताप के लोग दरवाजा तोड़ रहे हैं। अगर तुम आज रात वहां लौटी, तो जिंदा नहीं बचोगी।

भाग 2

नैना को काली बुलेटप्रूफ कार में बैठाया गया। दरवाजा बंद होते ही बारिश, हॉर्न और शहर का शोर गायब हो गया। भीतर सिर्फ आर्यन की धीमी सांसें और नैना के कांपते हाथों की आवाज थी।

— मेरे पीछे कौन पड़ा है? — उसने पूछा। — मैं तो बस मंदिरों और छोटे कार्यक्रमों में सितार बजाती हूं।

आर्यन ने जवाब दिया।

— तुम्हारे पीछे नहीं। तुम्हारे पिता की छोड़ी हुई चीज के पीछे।

नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।

— मेरे पिता बैंक में काम करते थे।

— नहीं। वे मेरे पिता के लिए काले पैसे के सबसे बड़े हिसाब रखते थे। हजारों करोड़ का राज उनके पास था।

नैना ने सिर झटका।

— झूठ।

— 10 साल पहले जो ट्रक तुम्हारी कार से टकराया था, वह हादसा नहीं था। वह भानु प्रताप का हमला था। तुम्हारे पिता ने गाड़ी मोड़कर टक्कर खुद झेली, ताकि तुम बच जाओ।

नैना की आंखों से आंसू बह निकले। उसे शीशे टूटने की आवाज, पिता की उंगलियों की आखिरी पकड़ और खून में भीगी रात याद आ गई।

कार मालाबार हिल की एक ऊंची इमारत के भूमिगत दरवाजे से अंदर गई। आर्यन ने उसका हाथ थामते हुए कहा।

— तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारी आंखों का इलाज, तुम्हारा किराया, सब मैंने छिपकर कराया। तुम्हारे पिता का कर्ज था मुझ पर।

नैना ने धीमे से पूछा।

— और अब?

— अब अंधेरा तुम्हें ढूंढ चुका है। जब तक भानु प्रताप जिंदा है, तुम यहीं रहोगी।

3 दिन तक नैना उस आलीशान घर में रही। वहां रेशमी चादरें थीं, चांदी के बर्तन थे, सुरक्षा थी, मगर आजादी नहीं थी। आर्यन उसे छूता नहीं था, मगर उसकी मौजूदगी हर पल दीवार की तरह उसके चारों ओर खड़ी रहती थी।

चौथी रात कबीर घबराकर भीतर आया।

— साहब, नवी मुंबई वाले अड्डे पर हमला हुआ है। हमारे आदमी फंसे हैं।

आर्यन ने हथियार उठाया।

— मैं जा रहा हूं। नैना की सुरक्षा विक्रम देखेगा।

दरवाजा बंद हुआ। घर शांत हो गया।

कुछ मिनट बाद नैना ने विक्रम की सांसों में डर नहीं, लालच महसूस किया। उसने धीरे से पिस्तौल पर साइलेंसर चढ़ाया।

— अंधी राजकुमारी — वह हंसा। — भानु प्रताप ने 3 करोड़ दिए हैं। मुझे बस वह खाता चाहिए जो तेरे बाप ने छिपाया था।

नैना सिमट गई।

— मुझे कुछ नहीं पता।

विक्रम ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।

— फिर तेरी उंगलियां तोड़नी पड़ेंगी।

नैना की उंगलियां फर्श पर पड़ी सफेद छड़ी तक पहुंच गईं। उसका रोना अचानक थम गया।

— खाता किताब में नहीं है, विक्रम।

वह झुका।

— क्या?

नैना की आवाज बर्फ जैसी हो गई।

— वह मेरे सितार के रागों में है।

भाग 3

विक्रम को समझने में 1 पल देर हुई, और वही उसकी पहली गलती थी।

नैना बिजली की तरह उठी। उसने उसके हाथ को अपनी ओर खींचा, शरीर मोड़ा और हथेली की एड़ी उसके जबड़े के नीचे दे मारी। विक्रम की सांस गले में अटक गई। पिस्तौल ऊपर उठने से पहले ही नैना की सफेद छड़ी हवा में घूमी। उसके अंगूठे ने हत्थे पर छिपा बटन दबाया। एक पतली, चमकदार धार छड़ी के सिरे से बाहर निकली।

विक्रम ने दहाड़ते हुए गोली चलानी चाही, मगर नैना ने उसकी कलाई पर ऐसा वार किया कि पिस्तौल संगमरमर पर खनकती हुई दूर जा गिरी। वह पीछे लड़खड़ाया।

नैना ने उसके कदमों की दिशा सुन ली थी। 10 साल की अंधेरी दुनिया ने उसकी सुनने की ताकत को हथियार बना दिया था। वह आगे बढ़ी, छड़ी नीचे घुमाई और विक्रम का घुटना मोड़ दिया। वह चीखते हुए गिर पड़ा।

नैना ने धार उसकी गर्दन पर रख दी।

— मेरे पिता ने मुझे रोना नहीं सिखाया था, विक्रम। उन्होंने मुझे जिंदा रहना सिखाया था।

विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।

— तू… तू अंधी है।

— अंधी हूं, बेवकूफ नहीं।

नैना की आवाज में अब वह डर नहीं था, जो आर्यन ने होटल में सुना था। उसमें वही ठंडक थी जो किसी पुराने बदले में होती है।

— मेरे पिता जानते थे कि एक दिन भानु प्रताप मुझे ढूंढेगा। उन्होंने मुझे 12 साल की उम्र से आवाज पहचानना, कदम गिनना, झूठ सूंघना और हमला रोकना सिखाया। हर रात वे मुझे कमरे की चीजें बदलकर चलना सिखाते थे। हर रविवार वे मुझे सितार सिखाते थे, मगर असल में मैं रागों में छिपे अंक याद कर रही थी।

विक्रम कांपने लगा।

— कौन से अंक?

नैना हल्का सा मुस्कुराई।

— वे खाते जिनसे तुम्हारे जैसे गद्दार खरीदे जाते हैं। दुबई, सिंगापुर, मॉरीशस और स्विट्जरलैंड के रास्ते घूमता हुआ पैसा। मेहरा और भानु दोनों की जड़ें। सब मेरे दिमाग में है।

विक्रम ने पसीने से भीगी आवाज में कहा।

— आर्यन को पता है?

— उसे उतना ही पता है जितना मैंने उसे जानने दिया।

यह सच था। नैना ने 10 साल तक आर्यन की छाया महसूस की थी। जब वह संगीत विद्यालय में दाखिल हुई, फीस अचानक किसी अज्ञात ट्रस्ट ने भर दी। जब आंखों के इलाज के लिए विदेश से डॉक्टर आया, बिल किसी ने नकद चुका दिया। जब उसके कमरे के बाहर रातों में एक ही तरह के जूतों की आहट रुकती थी, वह समझ गई थी कि कोई उसे देख रहा है।

पहले उसे लगा, यह पिता के दुश्मन हैं। फिर उसे खबरों, फुसफुसाहटों और छिपी हुई सुरक्षा से धीरे-धीरे समझ आया कि यह आर्यन मेहरा है। वही आदमी जिसके पिता के लिए उसके पिता ने काम किया था।

नैना ने भागने की कोशिश नहीं की। उसने इंतजार किया। वह जानती थी कि असली शिकारी को पकड़ने के लिए कभी-कभी खुद को चारे जैसा दिखाना पड़ता है।

ताज कोलाबा की उस रात भी वह सचमुच बारिश से नहीं भाग रही थी। वह जानती थी कि भानु प्रताप के लोग उसके घर के आसपास मंडरा रहे हैं। वह यह भी जानती थी कि आर्यन वहीं मौजूद है। उसने फिसलने का नाटक नहीं किया था, मगर उसने खुद को इतना असहाय जरूर दिखाया था कि आर्यन उसे अपने किले में ले आए।

और अब जाल बंद हो चुका था।

तभी भारी दरवाजा टूटने जैसा खुला। आर्यन अंदर आया। उसके कपड़ों पर धूल, बारिश और खून के धब्बे थे। हाथ में बंदूक थी। कबीर और 3 आदमी पीछे थे।

दृश्य देखकर सब रुक गए।

विक्रम फर्श पर पड़ा था। नैना उसकी गर्दन पर छड़ी की धार रखे खड़ी थी। उसके चेहरे पर आंसू नहीं, बल्कि खतरनाक शांति थी।

कबीर के मुंह से निकला।

— साहब… इसने विक्रम को अकेले गिरा दिया।

आर्यन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। वही लड़की, जिसे उसने 10 साल तक कांच की गुड़िया समझकर बचाया था, आज उसके अपने सबसे भरोसेमंद आदमी को पैरों के नीचे दबाए खड़ी थी।

नैना ने उसकी ओर मुड़े बिना कहा।

— विक्रम ने तुम्हें 3 करोड़ में बेच दिया। नवी मुंबई वाला हमला झांसा था। भानु प्रताप चाहता था कि तुम घर से बाहर जाओ।

आर्यन के चेहरे पर पहले सदमा आया, फिर एक अजीब गर्व। उसने कबीर से कहा।

— इसे नीचे ले जाओ। जब तक भानु प्रताप का असली ठिकाना न बता दे, सांस चलती रहनी चाहिए।

विक्रम को घसीटकर बाहर ले जाया गया। उसके जाने के बाद कमरे में सिर्फ आर्यन और नैना बचे।

आर्यन धीरे-धीरे उसके पास आया। इस बार उसके कदमों में आदेश नहीं, सावधानी थी। जैसे वह पहली बार सच में उसे पहचान रहा हो।

— तुमने मुझे भी खेला।

नैना ने छड़ी की धार वापस बंद कर दी।

— तुम मुझे बचा रहे थे, यह तुम्हारा भ्रम था। मैं तुम्हारी सुरक्षा का इस्तेमाल कर रही थी।

— और अगर मैं सचमुच तुम्हें कैद कर लेता?

— तो तुम भी मेरे दुश्मन बन जाते।

आर्यन के होंठों पर हल्की, थकी मुस्कान आई।

— तुम्हारे पिता बहुत खतरनाक आदमी थे।

नैना की पलकों के नीचे अंधेरा हिला, जैसे कोई पुरानी रोशनी फिर जल गई हो।

— वे अच्छे आदमी थे। फर्क बस इतना था कि उन्होंने बुरे लोगों के बीच जीना सीख लिया था।

आर्यन ने धीरे से कहा।

— उन्होंने मेरी जान भी बचाई थी। 10 साल पहले भानु प्रताप सिर्फ उन्हें नहीं मारना चाहता था। उस रात हमारे गिरोह के खातों की असली चाबी भी उसी कार में थी। तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मेरे पिता को संदेश भेजा था कि लड़की को बचा लेना। मेरे पिता ने वादा किया। फिर उनके मरने के बाद मैंने।

नैना ने पहली बार उसकी तरफ चेहरा उठाया।

— तुमने मुझे बचाया, लेकिन सच छिपाया।

— सच तुम्हें तोड़ देता।

— नहीं, आर्यन। झूठ इंसान को ज्यादा तोड़ता है।

कमरे में लंबी चुप्पी पसर गई। बाहर शहर में कहीं दूर सायरन बज रहे थे। समुद्र की हवा शीशों से टकरा रही थी। मुंबई सो नहीं रही थी, क्योंकि उसके अंधेरे हिस्से में युद्ध शुरू हो चुका था।

नैना ने अपने सितार का डिब्बा खोला। लकड़ी की पुरानी देह से हल्की सी गंध उठी। उसने तार छुए। कमरे में पहला स्वर गूंजा। आर्यन ने उसे पहले भी सैकड़ों बार बजाते सुना था, मगर आज हर सुर में उसे कुछ और सुनाई दे रहा था।

— राग दरबारी — नैना ने कहा। — इसके पहले 7 आलाप स्विट्जरलैंड के खाते हैं। बीच की मींड मॉरीशस की कंपनियां। आखिरी तान भानु प्रताप के गुप्त गोदामों की श्रृंखला है।

आर्यन आगे झुक गया।

नैना ने बजाना शुरू किया। हर सुर के साथ वह अंक बोलती गई। कबीर को बुलाया गया। लैपटॉप खुले। फोन घूमे। पुराने छिपे खाते खुलने लगे। उन खातों से भानु प्रताप के खरीदे हुए पुलिस अफसरों, बंदरगाह के ठेकेदारों और नकली दवा के कारखानों का पता निकलने लगा।

भानु प्रताप समझ रहा था कि वह एक अंधी लड़की का पीछा कर रहा है। उसे पता ही नहीं था कि वह अपने साम्राज्य की कब्र के पीछे भाग रहा है।

रात 2 बजे पहला गोदाम खाली कराया गया। वहां से नकली दवाइयां मिलीं, जिन्हें छोटे शहरों के अस्पतालों में भेजा जाना था। रात 3 बजे भानु के 2 हवाला एजेंट पकड़े गए। रात 4 बजे उसके सबसे बड़े आदमी ने डरकर ठिकाना बता दिया।

भानु प्रताप अलीबाग के पास एक पुराने फार्महाउस में छिपा था।

आर्यन जाने लगा तो नैना ने कहा।

— मैं भी चलूंगी।

— नहीं।

— यह मेरे पिता का हिसाब है।

आर्यन ने कठोर स्वर में कहा।

— वहां खतरा है।

नैना हंसी नहीं, मगर उसकी मुस्कान में चोट थी।

— तुम अभी भी वही गलती कर रहे हो। मुझे बचाने की कोशिश में मुझे छोटा मत बनाओ।

आर्यन कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने कबीर की ओर देखा।

— उसके लिए बुलेटप्रूफ गाड़ी तैयार करो।

अलीबाग के फार्महाउस पर सुबह से पहले धुंध उतरी हुई थी। नारियल के पेड़ों के बीच पीली रोशनी जल रही थी। दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। नैना कार से उतरी तो मिट्टी की गंध ने उसे उसके बचपन की याद दिला दी, जब पिता उसे छुट्टियों में कोंकण ले जाते थे। तब वह देख सकती थी। तब दुनिया में रंग थे।

भानु प्रताप को भीतर से घसीटकर लाया गया। वह 58 साल का था, मगर अब उसके चेहरे पर राज करने वाला घमंड नहीं, पकड़े गए जानवर का डर था।

— आर्यन, सौदा कर लेते हैं — उसने हांफते हुए कहा। — जो चाहिए ले लो।

नैना आगे बढ़ी।

भानु की नजर उस पर पड़ी। पहले उसने उसे पहचानने की कोशिश की, फिर उसके चेहरे पर भूत देखने जैसा डर आया।

— थॉमस की बेटी…

नैना शांत खड़ी रही।

— मेरे पिता का भारतीय नाम तेजस्वी रावल था। तुमने उन्हें दुनिया के सामने थॉमस बनाकर छिपाया, फिर मार दिया।

भानु ने थूक निगला।

— उसने मुझे धोखा दिया था।

— उसने अपनी बेटी को बचाया था।

भानु हंसा, मगर आवाज टूट रही थी।

— वह मरते समय भी रो रहा था। कह रहा था, मेरी बेटी को मत छूना।

नैना की उंगलियां कांपीं। आर्यन आगे बढ़ना चाहता था, मगर उसने हाथ उठाकर रोक दिया।

— फिर?

भानु ने जहर भरी मुस्कान से कहा।

— फिर मैंने उसके सामने कहा था कि एक दिन वही बेटी मेरे पैरों में गिड़गिड़ाएगी।

नैना ने अपनी छड़ी जमीन पर टिका दी। उसकी आवाज धीमी थी, मगर आसपास खड़े सभी आदमी चुप हो गए।

— आज मैं गिड़गिड़ाने नहीं आई। आज मैं तुम्हें वह सुनाने आई हूं जो मेरे पिता ने आखिरी रात मेरे लिए छोड़ा था।

उसने सितार उठाया। फार्महाउस के आंगन में, जहां अपराधियों की बंदूकें और डर की गंध भरी थी, नैना ने राग भैरवी छेड़ दिया। भोर से ठीक पहले वह राग हवा में फैल गया। सुर इतने करुण थे कि कबीर जैसे आदमी ने भी सिर झुका लिया।

हर तान में पिता की उंगलियां थीं। हर कंपन में उस रात का टूटता शीशा था। हर ठहराव में एक बेटी की बची हुई चीख थी।

भानु प्रताप पहले हंसा, फिर बेचैन हुआ, फिर उसकी आंखों में आतंक उतर आया। वह राग पहचान गया। उसी धुन के भीतर वे खाते छिपे थे, जिनसे उसका साम्राज्य चलता था। नैना ने आखिरी सुर बजाया और कबीर ने फोन पर पुष्टि की।

— सब खाते फ्रीज हो गए। सारे दस्तावेज बाहर भेज दिए गए हैं। उसके लोग भाग रहे हैं।

आर्यन ने भानु की ओर देखा।

— तूने एक आदमी को मारा था। आज उसकी अंधी बेटी ने तेरा पूरा साम्राज्य दफना दिया।

भानु चीखा, गालियां दीं, मगर अब उसके पास कुछ नहीं बचा था। उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई, क्योंकि उस दुनिया में अदालतें हमेशा सबसे पहले नहीं आतीं। लेकिन उस सुबह से उसका नाम डर का नहीं, पतन का नाम बन गया। उसके आदमी छिप गए। उसके खरीदे हुए चेहरे मुकर गए। उसके गोदाम सील हुए। उसके खाते खाली हो गए।

मुंबई में खबर फैली कि भानु प्रताप एक रात में मिट गया। किसी को नहीं पता था कि उसकी हार की असली वजह एक अंधी लड़की का राग था।

कुछ दिन बाद नैना वापस अपने छोटे से कमरे में नहीं लौटी। वह मालाबार हिल के उसी घर में भी कैदी बनकर नहीं रही। आर्यन ने उसके लिए एक संगीत विद्यालय खुलवाया, लेकिन इस बार नाम किसी नकली ट्रस्ट का नहीं था। दरवाजे पर साफ लिखा गया था।

तेजस्वी रावल स्मृति संगीत केंद्र

वहां ऐसे बच्चों को मुफ्त संगीत सिखाया जाने लगा, जो देख नहीं सकते थे, सुन नहीं सकते थे, या जिन्हें दुनिया ने बेकार समझ लिया था।

आर्यन कई बार दूर खड़ा होकर उसे सुनता। अब वह छिपता नहीं था। नैना भी जानती थी कि वह आया है, क्योंकि उसके कदमों की आहट अब उसे डराती नहीं थी।

एक शाम जब बारिश फिर मुंबई पर टूट रही थी, वही बारिश जैसी 10 साल पहले थी, नैना ने अभ्यास रोककर कहा।

— आर्यन।

वह चौंका।

— तुमने सुना?

— मैं तुम्हें हमेशा सुन लेती हूं।

आर्यन पास आया।

— अब क्या आदेश है, महारानी?

नैना ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

— मेरे लिए किसी को मत मारना। मेरे साथ किसी को बचाना सीखो।

आर्यन ने पहली बार बिना जवाब दिए सिर झुका दिया। वह आदमी जिसे शहर डॉन कहता था, उस अंधी लड़की के सामने विद्यार्थी बन गया था।

नैना ने सितार उठाया और नया राग शुरू किया। उसमें दर्द था, धोखा था, बदला था, मगर उसके अंत में एक ऐसी शांति थी जो सिर्फ वही लोग समझते हैं जो अंधेरे से गुजरकर लौटे हों।

उस रात मुंबई की बारिश फिर संगमरमर, सड़कों और समुद्र पर गिरती रही। फर्क बस इतना था कि इस बार नैना किसी दरवाजे पर शरण मांगने नहीं भाग रही थी।

इस बार दरवाजा उसका था।

और अंधेरा, जो कभी उसे निगलना चाहता था, अब उसके सुरों के सामने चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.