
भाग 1
नए साल की रात अर्जुन ने 18 रिश्तेदारों के सामने नंदिनी की तरफ उंगली उठाकर कहा, “मेरी मां से माफी मांगो, वरना अपने बेटे को लेकर अभी इस घर से निकल जाओ।”
लखनऊ के गोमती नगर में मल्होत्रा परिवार का वह बंगला बाहर से किसी शादी के महल जैसा चमक रहा था। संगमरमर की सीढ़ियां, पीतल के बड़े दिए, दरवाजे पर गेंदे की मालाएं, अंदर चांदी के बर्तनों में खाना और दीवारों पर अर्जुन के पिता के बड़े-बड़े फोटो। हर कोना जैसे यही कह रहा था कि इस घर में इज्जत सबसे बड़ी चीज है। मगर उस रात नंदिनी को पहली बार साफ दिख गया कि वहां इज्जत सिर्फ बेटों की होती है, बहुओं की नहीं।
तीन साल का विहान ड्रॉइंग रूम के कोने में सोफे पर सोया हुआ था। उसके हाथ में उसकी छोटी लाल कार दबे हुए थी। पार्टी की आवाज, हंसी, चम्मचों की खनक और टीवी पर चल रहे काउंटडाउन के बीच वह मासूम नींद में था, जैसे दुनिया की सबसे गंदी बातों से अभी भी बचा हुआ हो।
सावित्री देवी ने प्लेट में मलाई कोफ्ता डालते हुए नंदिनी को ऊपर से नीचे तक देखा।
—आज भी ऑफिस गई थी क्या?
नंदिनी ने धीरे से कहा।
—हां, आधे दिन के लिए। क्लाइंट की मीटिंग थी।
सावित्री देवी हंसीं। वह हंसी सीधी नहीं थी, अंदर से चुभती हुई थी।
—बहुत बड़ी कंपनी चलाती हो तुम। बच्चे को आया के भरोसे छोड़कर पैसे कमाने वाली औरतें आजकल खुद को सफल मां कहती हैं।
टेबल पर बैठे लोगों के हाथ रुक गए। अर्जुन के बड़े भाई निखिल ने पानी का गिलास उठाया, मगर आंखें नंदिनी पर टिक गईं। भाभी रीमा ने होंठ दबाकर मुस्कुराने की कोशिश की। अर्जुन ने जैसे कुछ सुना ही नहीं, बस अपने प्लेट में कबाब काटता रहा।
नंदिनी ने अपनी आवाज शांत रखने की कोशिश की।
—विहान आया के भरोसे नहीं रहता। वह अच्छे डे-केयर में जाता है। और मैं काम इसलिए करती हूं क्योंकि इस घर का खर्च भी मैं उठाती हूं।
सावित्री देवी ने भौंहें चढ़ाईं।
—हमारे जमाने में बहुएं घर संभालती थीं, बैंक बैलेंस नहीं।
नंदिनी के भीतर महीनों से जमा हुआ अपमान धीरे-धीरे गर्म होने लगा। उसने अर्जुन की तरफ देखा। वह अभी भी चुप था। वही चुप्पी जो हर बार उसकी मां के जहर को आशीर्वाद बना देती थी।
—आपके जमाने में बहुत सी औरतें टूटती भी थीं, मगर बोलती नहीं थीं।
कमरे में सन्नाटा उतर गया।
अर्जुन ने चाकू प्लेट पर रख दिया।
—नंदिनी, तमाशा मत शुरू करो।
—तमाशा मैंने शुरू नहीं किया। मुझे खराब मां कहा जा रहा है, मैं बस जवाब दे रही हूं।
निखिल तुरंत बीच में आया।
—मां तो बस विहान की चिंता करती हैं। तुम्हें हर बात में अपने अधिकार दिखाई देते हैं।
नंदिनी ने उसकी तरफ सीधा देखा।
—अगर इतनी चिंता है, तो मेरे बच्चे के सामने उसकी मां को नीचा दिखाना बंद कीजिए।
सावित्री देवी ने मेज पर हाथ पटका।
—तमीज देखो इसकी। इसी ने मेरे बेटे को बर्बाद कर दिया। शादी से पहले अर्जुन कितना हंसमुख था। अब हर वक्त परेशान, चुप, थका हुआ रहता है। कुछ तो कर रही है यह लड़की मेरे बेटे के साथ।
नंदिनी के भीतर कुछ टूटने के बजाय सीधा खड़ा हो गया।
—अर्जुन परेशान इसलिए है क्योंकि वह 8 महीने से आप सब से झूठ बोल रहा है।
अर्जुन की गर्दन अचानक तन गई।
—चुप रहो।
नंदिनी अब रुकने वाली नहीं थी।
—पूछिए उससे हमारी संयुक्त बचत खाते में सिर्फ 17 हजार क्यों बचे हैं। पूछिए उसने मेरे पापा से 12 लाख रुपये उधार लेकर आपको क्यों बताया कि वह गिफ्ट था। पूछिए हर महीने क्रेडिट कार्ड का बिल कौन भरता है। पूछिए वह रात-रात भर ऑनलाइन ट्रेडिंग में पैसे क्यों डुबाता है और मुझसे कहता है कि स्टेटमेंट मत देखो।
रीमा का चेहरा सफेद पड़ गया। निखिल ने अर्जुन की तरफ देखा। सावित्री देवी की आंखें आग जैसी हो गईं।
—झूठ! मेरे बेटे पर इतना घिनौना इल्जाम? मेरे घर में?
अर्जुन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
—तुम पागल हो गई हो, नंदिनी। मैंने तुम्हारी बहुत बेइज्जती सह ली।
नंदिनी भी खड़ी हो गई।
—मेरी बेइज्जती? तुम्हारी मां ने अभी सबके सामने मुझे खराब मां कहा।
अर्जुन ने दांत भींचकर कहा।
—क्योंकि तुम वैसी हरकत करती हो।
यह वाक्य नंदिनी के सीने में किसी चाकू की तरह उतरा। उसने विहान की तरफ देखा। वह सोते हुए हल्का सा हिला, उसकी लाल कार नीचे गिरते-गिरते बची। वह बच्चा, जिसके लिए नंदिनी ने नौकरी, रातों की नींद, अपना शरीर, अपना मन सब बांट दिया था, उसी बच्चे के नाम पर उसे जलील किया जा रहा था।
सावित्री देवी ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा।
—बेटा, आज फैसला कर ले। ऐसी औरतें घर नहीं बसातीं।
अर्जुन ने दरवाजे की तरफ इशारा किया।
—मेरी मां से अभी माफी मांगो। नहीं तो इस घर से निकल जाओ। लेकिन फिर रोते हुए वापस मत आना।
18 लोग उसे देख रहे थे। किसी की आंखों में दया नहीं थी। बस इंतजार था कि बहू झुके, हाथ जोड़े, गलती माने और खाना फिर से शुरू हो जाए।
नंदिनी ने धीरे से सांस ली।
—ठीक है।
अर्जुन चौंका।
—क्या?
—मैं जा रही हूं।
सावित्री देवी ने तिरस्कार से हंसते हुए कहा।
—नाटक मत कर। सुबह तक अक्ल ठिकाने आ जाएगी।
नंदिनी ने विहान को गोद में उठाया। वह नींद में बुदबुदाया।
—मम्मा… घर?
नंदिनी ने उसके बालों को चूमा।
—हां बेटा, अब सचमुच घर चलेंगे।
अर्जुन ने आगे बढ़कर विहान को रोकने की कोशिश नहीं की। निखिल ने कुछ नहीं कहा। रीमा ने सिर झुका लिया। सावित्री देवी की आवाज पीछे से आई।
—जाने दो। कल खुद आएगी पैर पकड़कर।
नंदिनी ने दरवाजा खोला। बाहर जनवरी की ठंडी हवा थी। बंगले की रोशनी पीछे रह गई, मगर उसके कानों में अभी भी अर्जुन की आवाज गूंज रही थी। “माफी मांगो या निकल जाओ।”
उस रात अर्जुन अपने मायके जैसे घर में ही रुक गया, यह कहकर कि वह मां को संभालना चाहता है। नंदिनी अपने किराए के फ्लैट में पहुंची, विहान को बिस्तर पर सुलाया और अलमारी खोल दी। उसने रोया नहीं। शायद आंसू भी तब आते हैं जब आदमी को उम्मीद बची हो।
उसने 2 सूटकेस निकाले। विहान के कपड़े, उसकी दवाइयां, उसकी लाल कार, स्कूल की फाइल, जन्म प्रमाणपत्र, अपने दस्तावेज, आधार, पासपोर्ट, विहान का पासपोर्ट, और वह नीली फाइल जिसमें 8 महीने से इकट्ठे किए हुए बैंक स्टेटमेंट, चैट स्क्रीनशॉट, कॉल रिकॉर्डिंग और कानूनी कागज रखे थे।
उसकी नानी ने मरने से पहले उसे 9 लाख रुपये दिए थे और कहा था, “औरत के पास एक ऐसा रास्ता हमेशा होना चाहिए, जिसका पता किसी मर्द को न हो।”
सुबह 4:20 पर उसने दिल्ली से दुबई के लिए 2 वन-वे टिकट बुक किए, जहां उसकी कॉलेज की दोस्त मीरा रहती थी। 5:10 पर उसने 3 ईमेल शेड्यूल किए। एक अपने वकील को, एक अर्जुन को, और एक सावित्री देवी को।
6:35 पर जब मल्होत्रा परिवार सोकर उठा, नंदिनी इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर थी। विहान उसकी गोद में सो रहा था, लाल कार उसकी मुट्ठी में थी। फोन पर अर्जुन की 11 मिस्ड कॉल चमक रही थीं।
और जो मेल उसने भेजा था, वह सफाई नहीं था। वह वह सबूत था, जो मल्होत्रा परिवार की इज्जत के कांच को अंदर से चटका देने वाला था।
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भाग 2
दुबई की सुबह कांच की इमारतों, ठंडी हवा और अनजान सड़कों के साथ नंदिनी के सामने खुली, मगर उसके भीतर अभी भी लखनऊ की वही मेज जल रही थी। विहान एयरपोर्ट टैक्सी में जागा तो उसने सबसे पहले पूछा कि पापा कहां हैं, और नंदिनी ने उसके गाल पर हाथ फेरकर बस इतना कहा कि पापा भारत में हैं और वे कुछ दिन मीरा मौसी के घर रहेंगे। मीरा खून की रिश्तेदार नहीं थी, मगर वह उन रिश्तेदारों से कहीं ज्यादा अपनी थी जो सिर्फ सरनेम देखकर रिश्ता निभाते थे। 6 साल पहले कॉलेज में दोनों ने साथ पढ़ाई की थी, फिर मीरा शादी के बाद दुबई आ गई थी। जब नंदिनी ने कभी आधी बातों में बताया था कि अर्जुन के घर में उसकी आवाज धीरे-धीरे दबाई जा रही है, मीरा ने सिर्फ इतना कहा था कि जिस दिन सांस रुकने लगे, टिकट मत देखना, दरवाजा देखना। अब वही दरवाजा खुला था। मीरा ने नंदिनी को 2 सूटकेस, सोए हुए बच्चे और टूटी हुई आंखों के साथ देखा तो कोई सवाल नहीं पूछा, बस गले लगा लिया। उसी गले में नंदिनी पहली बार बिखरी। उधर भारत में आग लग चुकी थी। अर्जुन ने 29 कॉल किए। पहले गालियां, फिर धमकियां, फिर रोना। सावित्री देवी ने वॉइस मैसेज भेजे कि नंदिनी ने उनका पोता चुरा लिया है, पुलिस, कोर्ट और मीडिया सब लगा देंगी। निखिल ने लिखा कि भाई कुछ भी कर सकता है, वापस आकर बात खत्म कर दो। मगर उन्हें नहीं पता था कि नंदिनी भागी नहीं थी, वह तैयारी करके निकली थी। उसने 8 महीने पहले ही फैमिली वकील आरती सक्सेना से बात कर ली थी। विहान का पासपोर्ट कानूनी रूप से वैध था, नंदिनी के पास रिमोट काम था, और अर्जुन की धमकियों, आर्थिक धोखे और मानसिक प्रताड़ना के सबूत जमा थे। नए साल की रात उसने पूरी बातचीत रिकॉर्ड की थी, बदला लेने के लिए नहीं, खुद को झूठा साबित होने से बचाने के लिए। 14 दिन बाद वर्चुअल सुनवाई हुई। आरती ने अदालत के सामने रिकॉर्डिंग चलाई। सावित्री देवी की आवाज आई कि कामकाजी मांएं बच्चे छोड़ देती हैं। फिर अर्जुन की आवाज आई कि माफी मांगो या निकल जाओ। फिर बैंक स्टेटमेंट खुला। संयुक्त खाते से निकासी, क्रेडिट कार्ड की देनदारी, अजीब ट्रेडिंग ऐप्स में ट्रांसफर, महंगे फोन, गेमिंग कंसोल, और नंदिनी के पिता से लिए गए 12 लाख रुपये। अर्जुन का चेहरा स्क्रीन पर राख जैसा हो गया। जज ने अस्थायी कस्टडी नंदिनी को दी, अर्जुन की कॉल्स निगरानी में रखने का आदेश दिया और उसके वित्तीय खातों की जांच शुरू करवाई। उसी क्षण अर्जुन ने आंखें झुका लीं, और नंदिनी को समझ आ गया कि एक और सच अभी जमीन के नीचे दबा है।
भाग 3
वह दबा हुआ सच 3 दिन बाद बाहर आया।
दुबई में रात के 11 बजे थे। मीरा की छोटी बालकनी से नीचे सड़क की रोशनी सोने जैसी दिख रही थी। विहान कमरे में सो रहा था, उसकी लाल कार तकिए के पास पड़ी थी। नंदिनी लैपटॉप बंद करके चाय का कप उठाने ही वाली थी कि वकील आरती सक्सेना का वीडियो कॉल आया।
आरती का चेहरा सामान्य नहीं था।
—नंदिनी, बैठ जाओ।
नंदिनी के हाथ अपने आप ठंडे हो गए।
—क्या हुआ?
—विहान के एजुकेशन फंड से पैसे निकले हैं।
कमरे की सारी आवाज जैसे अचानक गायब हो गई।
—कितने?
आरती ने एक पल आंखें झुका लीं।
—लगभग आधे। 5 लाख 80 हजार।
नंदिनी कुर्सी पकड़कर बैठ गई। वह खाता विहान के जन्म के बाद खुला था। उसके पिता हर जन्मदिन पर उसमें पैसे डालते थे। नंदिनी हर महीने कुछ न कुछ जोड़ती थी। वह पैसा किसी कार, किसी फोन, किसी अहंकार के लिए नहीं था। वह विहान की किताबों, स्कूल, कॉलेज, और उस भविष्य के लिए था जिसमें वह अपने पिता की गलतियों का बोझ न ढोए।
उस रात नंदिनी रोई नहीं। उसने सिर्फ विहान के माथे पर हाथ रखा और देर तक उसे देखती रही। उसे लगा, अर्जुन ने सिर्फ उसे नहीं लूटा। उसने अपने ही बेटे की कल की सुबह से चोरी की थी।
अगली सुनवाई में अर्जुन बदला हुआ दिख रहा था। उसके पीछे सावित्री देवी नहीं थीं। निखिल नहीं था। कोई पारिवारिक शान नहीं थी। सिर्फ अर्जुन, उसका वकील और उसकी झुकी हुई गर्दन थी।
जज ने पूछा।
—एजुकेशन फंड से निकासी आपने की?
अर्जुन ने होंठ खोले, फिर बंद कर लिए।
—हां।
—किस अधिकार से?
—मुझे लगा मैं जल्दी वापस डाल दूंगा।
—पैसा कहां गया?
अर्जुन की आवाज बैठ गई।
—ट्रेडिंग में नुकसान हुआ। कुछ कर्ज चुकाए। कुछ मां को बताए बिना घर के खर्च में लगाया।
आरती ने तुरंत कहा।
—घर के खर्च में नहीं, माननीय। यहां रिकॉर्ड है। 1 लाख 40 हजार एक लक्जरी फोन के लिए, 90 हजार ऑनलाइन गेमिंग और 2 लाख से ज्यादा जोखिम भरे निवेश में।
अर्जुन ने चेहरा ढक लिया।
जज की आवाज कड़ी हो गई।
—आपने न केवल पत्नी से आर्थिक सच छिपाया, बल्कि नाबालिग बच्चे के भविष्य का पैसा भी इस्तेमाल किया। आगे से बच्चे से आपकी बातचीत निगरानी में होगी। रकम वापस जमा होगी। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, वित्तीय रिपोर्ट और पैरेंटिंग काउंसलिंग अनिवार्य होगी।
स्क्रीन बंद होने के बाद नंदिनी लंबे समय तक चुप बैठी रही। मीरा ने उसके सामने पानी रखा।
—अब डर लग रहा है?
नंदिनी ने धीरे से सिर हिलाया।
—नहीं। अब गुस्सा भी कम है। बस समझ आ रहा है कि मैं कितने साल अंधेरे कमरे में खड़ी थी।
उसी रात कोर्ट की पैरेंटिंग ऐप पर अर्जुन का संदेश आया।
“कृपया बिना वकील के बात कर लो। मैं टूट गया हूं।”
नंदिनी ने वह संदेश कई बार पढ़ा। उसे वह अर्जुन याद आया जो शादी से पहले बनारस की गलियों में उसके लिए कुल्हड़ वाली चाय लाया था। वह अर्जुन जिसने विहान की पहली सोनोग्राफी देखकर रोया था। वह अर्जुन जिसने अस्पताल में कहा था कि वे हमेशा टीम रहेंगे।
वह आदमी कभी था।
लेकिन वही आदमी बाद में हर मेज पर उसे अकेला छोड़ देता था। वही आदमी अपनी मां की बातों को संस्कार बताकर उसके दर्द को ओवररिएक्शन कहता था। वही आदमी हर कर्ज को उसकी जिद, हर झूठ को उसकी गलती, और हर अपमान को परिवार की मर्यादा बना देता था।
नंदिनी ने जवाब लिखा।
“विहान से जुड़ी हर बात सिर्फ इस ऐप पर होगी।”
बस इतना।
धीरे-धीरे दुबई किराए की जगह से घर बनने लगी। मीरा के अपार्टमेंट से कुछ ही दूर नंदिनी ने एक छोटा सा स्टूडियो फ्लैट लिया। वहां महंगे झूमर नहीं थे, मगर रात को कोई उसे नीचा दिखाकर खाना नहीं खिलाता था। वहां संगमरमर की सीढ़ियां नहीं थीं, मगर विहान बिना डर के हंसता था। वहां दीवारों पर परिवार की बड़ी तस्वीरें नहीं थीं, मगर पहली बार मां-बेटे की सांसें अपनी थीं।
विहान सुबह नर्सरी जाता, शाम को पार्क में रेत से घर बनाता। वह अरबी और अंग्रेजी शब्दों के बीच अपनी छोटी हिंदी में दुनिया को समझता। कभी-कभी पूछता।
—मम्मा, पापा नाराज हैं?
नंदिनी उसके जूते के फीते बांधते हुए कहती।
—पापा बड़े लोगों वाली गलती सुधार रहे हैं।
एक रात उसने पूछा।
—क्या पापा मुझसे नाराज हैं?
नंदिनी का दिल भर आया। उसने उसे गोद में खींच लिया।
—नहीं बेटा। बड़े लोगों की गलतियां बच्चों की वजह से नहीं होतीं।
विहान ने फिर पूछा।
—आपकी वजह से?
नंदिनी ने पहली बार बिना कांपे कहा।
—नहीं। मेरी वजह से भी नहीं।
उस जवाब में सिर्फ बेटे को समझाना नहीं था। वह खुद को भी वापस लौटा रही थी।
अर्जुन की निगरानी वाली वीडियो कॉल्स शुरू हुईं। पहले वह बहुत अटपटा था। विहान उसे अपनी ड्रॉइंग दिखाता, फिर खिलौने लेकर भाग जाता। अर्जुन मुस्कुराने की कोशिश करता, मगर उसकी आंखें हर बार नंदिनी को खोजतीं। नंदिनी स्क्रीन के पास रहती, मगर बात नहीं करती।
एक दिन अर्जुन ने सीमा पार कर दी।
—विहान, मम्मा से बोलो कि तुम्हें अपने असली घर वापस जाना है।
विहान ने मासूमियत से स्क्रीन को देखा।
—मेरा घर तो यहां है।
नंदिनी ने तुरंत कॉल काट दी और रिपोर्ट दर्ज करवाई।
अगले दिन अर्जुन का संदेश आया।
“माफ करना। मुझे उसे बीच में नहीं लाना चाहिए था।”
यह अर्जुन की पहली माफी थी जिसमें “लेकिन” नहीं था।
महीने बीत गए। तलाक की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अर्जुन ने मुख्य कस्टडी नंदिनी के पास रहने पर सहमति दी। उसने विहान के एजुकेशन फंड में 5 लाख 80 हजार वापस जमा करने और नंदिनी के पिता के 12 लाख रुपये किस्तों में लौटाने का लिखित समझौता किया। उसे थेरेपी, वित्तीय सलाह और नियमित रिपोर्ट देनी थी।
सावित्री देवी ने शुरुआत में बहुत शोर मचाया। रिश्तेदारों को फोन करके कहा कि बहू ने घर तोड़ दिया। मंदिर में लोगों से बोलीं कि आजकल की लड़कियां बच्चे को हथियार बना लेती हैं। मगर जब वित्तीय कागज कुछ करीबी रिश्तेदारों तक पहुंचे, आवाजें बदलने लगीं। निखिल ने भी दूरी बना ली, क्योंकि उसे डर था कि अर्जुन की देनदारियां परिवार के नाम तक न पहुंच जाएं।
सावित्री देवी को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अदालत ने साफ कहा कि दादी का मिलना मां की सहमति और बच्चे की सुरक्षा योजना के बिना नहीं होगा। पहली बार उनके हाथ से वह अधिकार छिना, जिसे वे जन्मसिद्ध मानती थीं।
आखिरी सुनवाई में अर्जुन अकेला था। उसका चेहरा दुबला, आंखें थकी हुई और आवाज पहले जैसी ऊंची नहीं थी।
जज ने पूछा कि क्या वह कुछ कहना चाहता है।
अर्जुन ने स्क्रीन की तरफ देखा। इस बार उसने नंदिनी को नहीं, जमीन को देखा।
—मैंने हमेशा कहा कि नंदिनी मुझे नीचा दिखाती है। सच यह है कि मैं खुद अपनी नाकामी से डरता था। मैंने मां को आगे कर दिया, ताकि मुझे जवाब न देना पड़े। मैंने झूठ बोला। मैंने पैसे छिपाए। मैंने अपने बेटे का पैसा इस्तेमाल किया। मैं यह नहीं कह रहा कि मुझे तुरंत माफ कर दिया जाए। मैं बस यह दर्ज करना चाहता हूं कि उसने घर नहीं तोड़ा। मैंने भरोसा तोड़ा।
नंदिनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसे नहीं पता था कि यह पछतावा था या हार। मगर अब उसे यह जानना जरूरी भी नहीं था।
उस दिन तलाक मंजूर हो गया।
जब कॉल खत्म हुई, नंदिनी के छोटे फ्लैट में बहुत गहरा सन्नाटा था। बाहर किसी कार का हॉर्न बजा। रसोई में दाल उबल रही थी। विहान नर्सरी में था। फोन चुप था।
और पहली बार नंदिनी को सन्नाटा डरावना नहीं लगा।
वह सहारा जैसा लगा।
करीब 1 साल बाद नंदिनी विहान को लेकर भारत आई, अपने पिता से मिलाने। लखनऊ नहीं, पहले दिल्ली। फिर कोर्ट के तय केंद्र में अर्जुन की निगरानी वाली मुलाकात रखी गई। अर्जुन एक छोटी लाल कार लेकर आया था, बिल्कुल वैसी जैसी उस रात विहान की मुट्ठी में थी।
विहान उसे देखते ही भागा।
—पापा!
अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया। उसने बेटे को ऐसे पकड़ा जैसे पहली बार समझ रहा हो कि प्यार बांहों से नहीं, भरोसे से थामा जाता है।
नंदिनी को वह दृश्य देखकर दर्द हुआ। मगर वह पुराना दर्द नहीं था। उसमें डर नहीं था। उसमें सिर्फ यह स्वीकार था कि अर्जुन विहान का पिता है, लेकिन अब वह उसकी शांति का मालिक नहीं है।
मुलाकात के बाद अर्जुन दरवाजे तक आया।
—मां को पता है कि तुम भारत आई हो।
नंदिनी का शरीर पुरानी आदत से तन गया।
अर्जुन ने जल्दी से कहा।
—वह विहान से मिलना चाहती हैं। मैंने उन्हें कह दिया कि यह मेरे कहने से नहीं होगा। और दबाव डालना वही गलती है जिससे सब यहां तक पहुंचा।
नंदिनी ने उसे ध्यान से देखा।
—अच्छा किया।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
उसी शाम नंदिनी अपने पिता के घर बैठी थी। विहान आंगन में नाना के साथ पतंग की डोर पकड़ रहा था। तभी अनजान नंबर से संदेश आया।
“तुमने मेरा परिवार बर्बाद कर दिया।”
भेजने वाली सावित्री देवी थीं।
नंदिनी ने फोन को देर तक देखा। पहले वह ऐसे संदेशों से कांप जाती थी। उसे लगता था कि शायद सचमुच गलती उसी की है। शायद बहू को इतना नहीं बोलना चाहिए। शायद मां को बच्चे के पिता से दूर नहीं करना चाहिए। शायद घर बचाने के लिए और चुप रहना चाहिए था।
लेकिन अब उसके भीतर वह औरत नहीं थी जो हर जहर को संस्कार समझकर पी जाती थी।
उसने सिर्फ 1 जवाब लिखा।
“मैंने आपका परिवार बर्बाद नहीं किया। मैंने अपने बच्चे को आपके झूठ से बचाया।”
फिर उसने नंबर ब्लॉक कर दिया।
3 दिन बाद जब विमान दुबई के लिए उड़ा, विहान खिड़की से नीचे झिलमिलाती रोशनियां देख रहा था।
—बाय इंडिया।
नंदिनी ने उसकी लाल कार अपने बैग में सुरक्षित रखी और बाहर देखा। वह अपने देश को अलविदा नहीं कह रही थी। वह उन मेजों को अलविदा कह रही थी, जहां उसे अपनी ही जिंदगी में मेहमान बनाया गया था। उन कर्जों को, जो उसके नहीं थे। उन माफियों को, जो उससे सिर्फ इसलिए मांगी गईं ताकि एक बेटा अपनी मां की नजर में साफ बचा रहे। उन रिश्तों को, जहां परिवार का मतलब सच नहीं, सिर्फ आज्ञा माना जाता था।
मल्होत्रा परिवार को जब समझ आया कि चुप रहने वाली औरत भी सबूत जमा कर सकती है, तब तक नंदिनी अपने बेटे, पासपोर्ट, कागजों और उस हिम्मत के साथ समुद्र पार कर चुकी थी जिसे कोई अदालत, कोई सास, कोई पति वापस नहीं मांग सकता था।
उसकी जीत चमकदार नहीं थी। वह महंगी थी, अकेली थी, थकाने वाली थी। कई रातें रोते हुए गुजरीं। कई सुबह डर के साथ शुरू हुईं। मगर फिर भी वह जीत थी, क्योंकि अब उसका बेटा यह सीखकर बड़ा होगा कि घर वह जगह नहीं जहां मां चुप रहे, बल्कि वह जगह है जहां सच बोलने पर दरवाजा नहीं दिखाया जाता।
और नंदिनी ने उस रात के बाद एक बात कभी नहीं भूली।
कभी-कभी परिवार तब नहीं टूटता जब एक औरत घर छोड़ती है। परिवार तब टूटता है जब वह पहली बार सबके झूठ उठाना बंद कर देती है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.