
PART 1
—अगर बच्चे के पिता का नाम साबित नहीं कर सकतीं, मैडम, तो हमें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को खबर करनी पड़ेगी।
यह वाक्य काव्या शर्मा के चेहरे पर किसी तमाचे की तरह पड़ा, जबकि उसकी गोद में 8 महीने का ईशान 40 बुखार में जल रहा था।
मुंबई की जुलाई वाली बरसात उस रात जैसे आसमान से नहीं, शहर की थकी हुई छतों से गिर रही थी। काव्या भीगती हुई परेल के बड़े सरकारी अस्पताल की बाल इमरजेंसी में पहुँची थी। उसके बाल गालों से चिपके थे, सलवार-कुर्ता घुटनों तक भीग चुका था, कंधे पर पुराना डायपर बैग था और गोद में नीली चादर में लिपटा उसका बच्चा, जिसकी साँसें छोटी-छोटी टूटती लहरों जैसी चल रही थीं।
—मेरे बच्चे को डॉक्टर चाहिए, अभी, उसने काँपती आवाज़ में कहा।
रिसेप्शन पर बैठी औरत ने पहले काव्या के कपड़े देखे, फिर उसका खाली गला, फिर बाएँ हाथ की बिना अंगूठी वाली उँगली।
—पिता का नाम?
काव्या का गला सूख गया।
—वह यहाँ नहीं हैं।
—मैंने यह नहीं पूछा।
—ऑटो में उसे झटका आया था। प्लीज, पहले उसे देख लीजिए।
तभी सफेद कोट पहने डॉक्टर निखिल अरोड़ा तेज़ी से बाहर आए। उन्होंने बच्चे की गर्दन, आँखें और साँसें देखीं, फिर नर्सों को आवाज़ दी।
—बेड 5। ऑक्सीजन, तापमान, ब्लड सैंपल, और तुरंत ड्रिप। देर मत करो।
नर्सें ईशान को लेकर अंदर चली गईं। काव्या पीछे भागना चाहती थी, मगर रिसेप्शन वाली ने फॉर्म आगे सरका दिया।
—पिता की जानकारी खाली नहीं छोड़ी जा सकती।
—मेरा बच्चा मर सकता है।
—और अस्पताल को कानूनी जिम्मेदारी भी समझनी होती है।
आसपास बैठे लोग अब खुलकर देखने लगे। कोई सहानुभूति से, कोई शक से, कोई उस घिनौनी जिज्ञासा से जिससे अकेली माँ को हमेशा नापा जाता है। काव्या ने होंठ काट लिए। 15 महीने से वह इसी दिन से डर रही थी।
15 महीने पहले उसने तलाक के बाद दिल्ली छोड़ी थी। 2 बार घर बदला था। मुंबई में अपनी माँ के नाम से छोटा कमरा लिया था। एक बुटीक में सिलाई का काम किया था। पुराने नंबर बंद किए थे। दरवाजे की घंटी बजने पर साँस रोकना सीख लिया था।
सब कुछ ईशान को अर्जुन मल्होत्रा से दूर रखने के लिए।
अर्जुन सिर्फ उसका पूर्व पति नहीं था। दिल्ली से मुंबई तक मल्होत्रा लॉजिस्टिक्स का नाम पैसे, राजनीति और डर के साथ लिया जाता था। उसके परिवार के ट्रक बंदरगाहों से चलते थे, गोदाम शहरों के बाहर खड़े थे, और जिन लोगों ने उनके खिलाफ गवाही दी थी, वे अक्सर शहर बदल लेते थे।
काव्या ने अर्जुन से प्यार किया था। सचमुच किया था। उसे वह लड़का याद था जो जयपुर की शादी में उसके लिए चुपके से जलेबी छुपाकर लाता था, जो कहता था कि वह अपने पिता और चाचा जैसा नहीं बनेगा। मगर शादी के बाद उसने बंद दरवाजों के पीछे धमकियाँ सुनीं, नकद से भरे बैग देखे, और वह रात भी देखी जब अर्जुन ने कहा था, “इस घर में जो सुरक्षित है, वही कैद भी है।”
तभी डॉक्टर निखिल बाहर आए। उनका चेहरा गंभीर था।
—बुखार बहुत तेज़ है। गर्दन अकड़ रही है। हमें मेनिन्जाइटिस का शक है, पर ब्लड रिपोर्ट में क्लॉटिंग की भी अजीब गड़बड़ी दिख रही है। पिता के परिवार में कोई खून की बीमारी, इम्यून या जेनेटिक समस्या?
रिसेप्शन वाली ने धीमे से ताना मारा।
—पहले मैडम को पता तो हो कि फोन किसे करना है।
काव्या ने उसकी तरफ देखा। उसे लगा 15 महीने की चुप्पी कोई दीवार नहीं थी, वह जेल थी। और ईशान उसके साथ उसी जेल में बंद था।
उसने काँपते हाथों से पुराना फोन निकाला। उसने अपनी वकील राधिका सेन को फोन किया, वही जिसने तलाक के बाद कहा था, “अगर बच्चे को बचाना है तो पिता का नाम मत जोड़ना।”
—मुझे अर्जुन का सीधा नंबर भेजिए, काव्या ने कहा।
—तुम पागल हो गई हो?
—मेरा बेटा इमरजेंसी में है।
5 मिनट बाद नंबर आया। काव्या ने उसे ऐसे देखा जैसे किसी ने उसके हाथ में जलता कोयला रख दिया हो।
फिर उसने कॉल किया।
3 घंटियाँ।
—कौन? ठंडी, भारी आवाज़ आई।
काव्या ने आँखें बंद कर लीं।
—अर्जुन।
दूसरी तरफ खामोशी जम गई।
—काव्या?
—मुझे तुम्हारे परिवार की मेडिकल हिस्ट्री चाहिए।
—क्यों?
काव्या का गला भर आया।
—हमारा बेटा इमरजेंसी में है।
इस बार खामोशी इतनी गहरी थी कि काव्या को अपना दिल धड़कता सुनाई दिया।
—दोबारा बोलो।
—हमारा बेटा। ईशान। वह 8 महीने का है। वह परेल के अस्पताल में है।
अर्जुन की साँस बदल गई।
—डॉक्टर को फोन दो।
काव्या ने मोबाइल डॉक्टर निखिल को पकड़ा दिया। डॉक्टर ने सवाल पूछे, जवाब लिखे, फिर अचानक उनका माथा सिकुड़ गया।
—आपकी माँ को खून की कोई दुर्लभ बीमारी थी?
कुछ देर बाद डॉक्टर ने फोन लौटाया।
—वह आ रहे हैं।
—कैसे? काव्या ने पूछा।
उसी पल छत के ऊपर से गड़गड़ाहट आई।
धड़। धड़। धड़।
पूरी इमरजेंसी की खिड़कियाँ काँप उठीं।
किसी ने कहा, —हेलिकॉप्टर?
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने केवल एक नाम फॉर्म पर लिखवाना चाहा था। उसने वह दरवाज़ा खोल दिया था, जिसे बंद करने में 15 महीने लगे थे।
PART 2
20 मिनट बाद अस्पताल का वीआईपी प्रवेश द्वार खुला। पहले 3 आदमी काले रेनकोट में अंदर आए, फिर अर्जुन मल्होत्रा।
भीगा हुआ, लंबा, आँखों में आग, और चेहरे पर ऐसा सन्नाटा जैसे उसने रास्ते भर कोई फैसला निगल लिया हो।
वह सीधे काव्या के सामने रुका। एक पल को उसकी आँखें काव्या के सूखे चेहरे, काँपते हाथों और भीगे कपड़ों पर अटक गईं। फिर उसने रिसेप्शन वाली की ओर देखा।
—मेरे बेटे की माँ को किसने भिखारिन की तरह रोका?
डॉक्टर निखिल बीच में आ गए।
—बच्चे का इलाज तुरंत शुरू हुआ। गलती मेडिकल नहीं, प्रशासनिक और मानवीय है।
अर्जुन ने दाँत भींचे।
काव्या ने कमजोर मगर सख्त आवाज़ में कहा, —अस्पताल को युद्ध का मैदान मत बनाओ।
अर्जुन ने उसे देखा। जैसे यह वार किसी भी गोली से गहरा था।
—मुझे पता चल रहा है कि मेरा बेटा है, वह भी तब जब वह मौत से लड़ रहा है।
—तो उसके पिता बनो। मल्होत्रा मत बनो।
अर्जुन चुप हो गया।
वह ईशान के बेड तक गया। छोटे हाथ में ड्रिप लगी थी। ईशान ने कमजोर उँगलियों से अर्जुन की तर्जनी पकड़ ली।
अर्जुन का चेहरा टूट गया।
—मेरा बेटा, उसने फुसफुसाया।
तभी अर्जुन का आदमी अंदर आया।
—सर, सावित्री आंटी की कार मिल गई। सीट के नीचे फोन था। उसमें वीडियो है।
काव्या जम गई। सावित्री आंटी उसकी पड़ोसन थीं, जो कभी-कभी ईशान को 10 मिनट संभालती थीं।
वीडियो चला।
सावित्री का घायल चेहरा स्क्रीन पर था।
—काव्या बेटा, ईशान की दवा बदली गई है। उसे मारना नहीं था, अस्पताल लाना था। पिता का नाम साबित करवाना था। राधिका सेन पर भरोसा मत करना।
काव्या चीख भी नहीं पाई।
तभी रिसेप्शन वाली लौटी। अब उसके हाथ में पुलिस आईडी थी।
—इंस्पेक्टर माधवी देसाई, आर्थिक अपराध शाखा।
और उसी पल ईशान के मॉनिटर ने तेज़ अलार्म बजाना शुरू कर दिया।
PART 3
काव्या दौड़कर बेड के पास पहुँची। ईशान का छोटा शरीर फिर तपने लगा था। नर्सें उसके आसपास झुक गई थीं। डॉक्टर निखिल आदेश दे रहे थे, पर उनकी आवाज़ में वह शांति थी जो केवल खतरनाक क्षणों में आती है।
—तापमान फिर बढ़ा है। कूलिंग शुरू करो। प्लेटलेट्स और क्लॉटिंग प्रोफाइल दोबारा भेजो। माँ को पीछे करो, लेकिन दूर मत करो।
—वह साँस ले रहा है? काव्या लगभग चिल्लाई।
—हाँ। अभी ले रहा है। हमें जगह चाहिए।
अर्जुन उसके पीछे खड़ा था। इस बार उसने किसी को धक्का नहीं दिया, किसी पर गरजा नहीं। उसने सिर्फ काव्या का हाथ पकड़ लिया।
काव्या ने हाथ छुड़ाना चाहा। गुस्सा था। अपमान था। वह सारी रातें थीं जब उसने ईशान को छाती से चिपकाकर डर में काटी थीं। मगर उसी क्षण ईशान के होंठों से एक टूटी हुई कराह निकली।
काव्या ने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।
अगले 12 मिनट में हर सेकंड किसी युग जैसा था। मशीनों की आवाज़, डॉक्टर की आँखें, नर्सों की दौड़ती उँगलियाँ, और बीच में ईशान, इतना छोटा कि लगता था दुनिया की सारी साज़िशें उसके शरीर से बड़ी हैं। फिर धीरे-धीरे मॉनिटर की आवाज़ शांत हुई। तापमान नीचे आने लगा।
डॉक्टर निखिल ने दस्ताने उतारे।
—वह अभी स्थिर है।
काव्या की टाँगें जवाब दे गईं। अर्जुन ने उसे संभाला, मगर उसने तुरंत खुद को सीधा कर लिया।
—पुराने मेडिकल रिकॉर्ड आ रहे हैं, डॉक्टर ने कहा। अर्जुन जी, आपने फोन पर अपनी माँ की बीमारी की बात की थी। शायद वही पैटर्न बच्चे में है।
अर्जुन का चेहरा कठोर हो गया।
—मेरी माँ की मौत तब हुई थी जब मैं 11 साल का था।
इंस्पेक्टर माधवी ने दरवाजे की तरफ देखा। बाहर से 2 पुलिसकर्मी एक बुजुर्ग औरत को सहारा देकर ला रहे थे। उसके माथे पर पट्टी थी, आँखों में पछतावा और थकान का गहरा पानी।
काव्या हाँफ उठी।
—सावित्री आंटी?
सावित्री ने पहले काव्या को देखा, फिर अर्जुन को।
—नहीं बेटा, तुम्हारी माँ मरी नहीं थी।
अर्जुन की आँखों में जैसे कोई पुराना कमरा खुल गया।
—क्या कहा आपने?
सावित्री की आवाज़ काँपी।
—सुचित्रा मल्होत्रा यहीं अस्पताल में हैं। 8वीं मंज़िल पर। उन्हें 3 दिन पहले दूसरे नाम से भर्ती कराया गया।
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। मगर काव्या ने देखा, मुंबई और दिल्ली को डराने वाला आदमी अचानक 11 साल का बच्चा बन गया था, जो अपनी माँ के खाली बिस्तर के पास खड़ा है।
वे विशेष लिफ्ट से ऊपर गए। काव्या को नहीं पता था कि वह क्यों साथ चल रही है, बस इतना जानती थी कि इस सच का हर सिरा ईशान से जुड़ा है। कमरा 812 के बाहर पुलिस खड़ी थी। दरवाजा खुला।
खिड़की के पास चाँदी जैसे बालों वाली एक कमजोर औरत बैठी थी। उसकी आँखें अर्जुन पर टिकते ही भर आईं।
—अर्जुन।
वह आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने राख के नीचे दबी चिंगारी को छू लिया हो।
—मैंने तुम्हारा अंतिम संस्कार देखा था, अर्जुन ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर उसमें वर्षों का ज़हर था।
—खाली चिता थी, बेटा।
—क्यों?
सुचित्रा ने आँखें बंद कर लीं।
—क्योंकि तुम्हारे पिता और तुम्हारे चाचा देवेंद्र ने मुझे गायब कर दिया था। मैं उनके गैरकानूनी धंधों के खिलाफ मजिस्ट्रेट के सामने बयान देने वाली थी। उन्होंने कहा, अगर मैं तुम्हें लेने लौटी, तो तुम्हें मेरी सजा देंगे।
अर्जुन की मुट्ठियाँ बंध गईं।
काव्या आगे आई।
—आप जानती थीं कि आपके पोते को यह बीमारी हो सकती है?
सुचित्रा का चेहरा दर्द से भर गया।
—अगर मुझे पता होता कि मेरा पोता है, मैं रेंगकर भी आती। मेरे खून की बीमारी दुर्लभ है, पर इलाज है। नियमित दवा और निगरानी से बच्चा सुरक्षित रह सकता है।
—फिर सबने झूठ क्यों बोला? काव्या की आवाज़ तेज़ हो गई। —आप, सावित्री आंटी, पुलिस, वकील, सब। हर किसी ने कहा कि वह बच्चे को बचा रहा है। लेकिन बच्चा तो झूठ के बीच मरने वाला था।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
इंस्पेक्टर माधवी ने फाइल मेज पर रखी।
—राधिका सेन केवल आपकी वकील नहीं थी, काव्या। वह देवेंद्र मल्होत्रा को जानकारी दे रही थी। तलाक के बाद जब उसे पता चला कि आप गर्भवती हैं, उसने आपको गायब होने की सलाह दी ताकि बच्चा बिना पिता के नाम के जन्मे। योजना थी कि बाद में किसी नकली आदमी को पिता दर्ज कराकर ईशान को मल्होत्रा परिवार की कानूनी विरासत से हटाया जाए।
काव्या की आँखों में खून उतर आया।
—मेरा बच्चा कोई संपत्ति का कागज नहीं है।
—हमें पता है, माधवी ने कहा।
—नहीं, आपको नहीं पता। अगर पता होता तो आप मुझे चारे की तरह इस्तेमाल नहीं करतीं।
माधवी की गर्दन झुक गई।
—हमने गलती की। मुझे उसका जवाब देना पड़ेगा।
सावित्री ने काव्या के पुराने डायपर बैग की तरफ हाथ बढ़ाया, जो वह घबराहट में साथ लिए घूम रही थी। उसने बैग की अंदरूनी सिलाई उधेड़ी और एक प्लास्टिक कवर में बंद लिफाफा निकाला।
काव्या स्तब्ध रह गई।
—यह मेरे बैग में था?
सावित्री ने फीकी मुस्कान से कहा, —किसी को सत्ता उस बैग में नहीं दिखती जिसमें दूध की गंध और गीले कपड़े हों।
लिफाफे में एक पुराना नोटरी दस्तावेज़ था। सुचित्रा ने काँपते हाथों से उसे छुआ।
—यह मेरे पति ने अपनी मौत से पहले बनाया था। मल्होत्रा परिवार की वैध कंपनियों का नियंत्रण देवेंद्र को नहीं जाना था। अगर अर्जुन का कोई नाबालिग बच्चा होता, तो उसके 30 साल का होने तक नियंत्रण बच्चे की माँ के पास रहता।
काव्या पीछे हट गई।
—मेरे पास?
—हाँ, सुचित्रा ने कहा। —क्योंकि मेरे पति ने देर से सही, समझ लिया था कि इस घर के मर्द खून को भी सौदा बना देते हैं। उन्होंने सोचा, एक माँ बच्चे को बेहतर बचाएगी।
काव्या की हँसी कड़वी थी।
—कमाल है। एक दस्तावेज़ माँ पर भरोसा करता था, और उसे बचाने के लिए सबने माँ से ही झूठ बोला।
किसी के पास जवाब नहीं था।
तभी माधवी का फोन बजा। उसने स्पीकर ऑन किया। एक चिकनी, ठंडी पुरुष आवाज़ कमरे में गूँजी।
—सुचित्रा भाभी, कागज दे दीजिए। सावित्री बूढ़ी है, चैन से जी लेगी।
सावित्री ने सिर उठाया।
—देवेंद्र, देर हो चुकी है।
माधवी ने दरवाजे पर खड़े पुलिसकर्मियों को इशारा किया।
—देवेंद्र मल्होत्रा, आपके बैंक खाते 35 मिनट पहले फ्रीज हो चुके हैं। नवी मुंबई, गुरुग्राम और कांडला के दफ्तरों पर छापे चल रहे हैं। राधिका सेन हिरासत में हैं। फार्मेसी की सीसीटीवी फुटेज मिल गई है। बच्चे की दवा बदलने वाला आदमी भी पकड़ा गया है।
दूसरी तरफ आवाज़ का नशा उतर गया।
—अर्जुन, तू एक दर्जिन और उसके बच्चे के लिए अपना खानदान डुबो देगा?
अर्जुन ने काव्या की तरफ देखा। फिर उसने नीचे की मंज़िल की दिशा में देखा, जहाँ उसका बेटा मशीनों से जुड़ा पड़ा था।
—मेरा खानदान उसी दिन डूब गया था जिस दिन बच्चों को दस्तावेज़ और औरतों को ताले समझा गया।
कॉल कट गया।
देवेंद्र उसी रात अलीबाग के फार्महाउस से गिरफ्तार हुआ। कोई निजी बदला नहीं लिया गया। कोई आदमी गायब नहीं हुआ। कोई बंदरगाह में नहीं फेंका गया। इस बार कैमरे थे, वॉरंट थे, जब्त खाते थे, गवाह थे, और उन कागजों पर सरकारी मुहरें थीं जिनसे ताकतवर लोग हमेशा दूसरों को डराते आए थे।
पहली बार अर्जुन ने अपने गुस्से को कानून से छोटा माना।
ईशान ने वह रात आईसीयू निगरानी में काटी। इलाज शुरू हुआ और सुबह तक उसका बुखार कम होने लगा। रिपोर्ट ने पुष्टि की कि उसे दुर्लभ क्लॉटिंग डिसऑर्डर था, गंभीर मगर संभाला जा सकने वाला। काव्या उसके पास बैठी रही। अर्जुन भी वहीं था, कुर्सी पर झुका, टाई ढीली, आँखें बच्चे की उँगलियों पर टिकाए।
सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से अंदर आई तो अर्जुन ने धीरे से कहा, —मैं उसे तुमसे छीनूंगा नहीं।
काव्या ने थकी आँखों से उसकी तरफ देखा।
—यह काफी नहीं है।
—जानता हूँ।
—तुम मेरे घर के बाहर आदमी खड़े नहीं करोगे।
—नहीं।
—मेरी जिंदगी की सुरक्षा के नाम पर मेरी निगरानी नहीं होगी।
—नहीं।
—वकील, पुलिस, परिवार, कोई भी मेरे बेटे के बारे में मुझसे बड़ा फैसला नहीं करेगा।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—नहीं।
—और अगर पिता बनना है, तो नाम से नहीं, काम से बनो। समय पर आना सीखो। दवा का शेड्यूल याद रखो। डॉक्टर की बात सुनो। उसका बैग खुद तैयार करो। उसे क्या खिलाना है, क्या नहीं, यह जानो। डायपर बदलना सीखो।
अर्जुन ने पहली बार असहज होकर कहा, —मुझे डायपर बदलना नहीं आता।
काव्या की आँखों में महीनों बाद हल्की मुस्कान आई।
—दिख रहा है।
यह माफी नहीं थी। यह वापसी नहीं थी। यह बस एक दीवार में पड़ी छोटी सी दरार थी, जिससे हवा आने लगी थी।
4 दिन बाद ईशान अस्पताल से घर लौटा। काव्या अर्जुन के बंगले में नहीं गई। वह दादर के अपने छोटे किराए के कमरे में लौटी, जहाँ नीचे वडा पाव की दुकान थी, ऊपर की छत से पानी टपकता था, और लिफ्ट महीने में 5 दिन खराब रहती थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब कोई संदिग्ध कार गली के मोड़ पर खड़ी नहीं रहती थी। सुरक्षा की जरूरत हुई तो काव्या ने चुनी, कोर्ट ने मंजूर की, और उसका भुगतान एक स्वतंत्र खाते से हुआ।
अर्जुन ने ईशान को कानूनी रूप से अपना बेटा माना, मगर तुरंत कस्टडी नहीं माँगी। शुरू में छोटी मुलाकातें हुईं, निगरानी में। वह 1 बार 12 मिनट देर से आया। काव्या ने झगड़ा नहीं किया। बस मुलाकात रद्द कर दी। अगले दिन वह 25 मिनट पहले पहुँचा, हाथ में ऐसे खिलौने लेकर जो 3 साल के बच्चे के लिए थे और ऐसे बेबी फूड के जार जिनका स्वाद ईशान ने मुँह बनाकर ठुकरा दिया।
वह सीख रहा था। खराब तरीके से, धीरे-धीरे, पर सीख रहा था।
उसने नारियल तेल को बेबी लोशन समझ लिया। डायपर उल्टा पहनाया। लोरी के नाम पर बेसुरी आवाज़ में पुरानी राजस्थानी धुन गाने लगा, जिसके सिर्फ 4 शब्द उसे आते थे। ईशान फिर भी उसे देखकर हँसता था, बच्चों की उस निर्दयी सुंदरता के साथ जिसमें वे अतीत का हिसाब नहीं रखते।
काव्या ने मल्होत्रा कंपनियों का अस्थायी नियंत्रण संभाला। राज करने के लिए नहीं, सफाई के लिए। जिन खातों में गंदगी थी, वे खोले गए। जिन सौदों में डर था, वे रोके गए। जिन कर्मचारियों का अपराध से कोई लेना-देना नहीं था, उन्हें बचाया गया। जिन गुंडों को नौकरी के नाम पर रखा गया था, उन्हें बाहर किया गया। कुछ मीडिया चैनलों ने उसे लालची कहा। सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा कि उसने बच्चा पैसे के लिए पैदा किया था। काव्या ने जवाब नहीं दिया। वह जानती थी कि दुनिया अकेली माँ की थाली में रोटी से पहले शक परोसती है।
सुचित्रा ने अपना इलाज मुंबई में जारी रखा। अर्जुन उनसे तुरंत नहीं पिघला। पहले 10 मिनट बैठता, फिर चला जाता। फिर 30 मिनट। फिर एक रविवार पूरा, जब ईशान उसकी गोद में था और सुचित्रा 3 पीढ़ियों को एक कमरे में साँस लेते देखती हुई चुपचाप रो रही थी।
सावित्री आंटी ने पर्दों के पीछे से लोगों की जिंदगी देखना छोड़ दिया। उन्होंने प्रभादेवी के पास छोटी फूलों की दुकान खोली—नाम रखा “सावित्री के गजरे”। जिस दिन ईशान ने पहला कदम रखा, उन्होंने काव्या को तुलसी का पौधा दिया और कहा, —घर वह नहीं जहाँ डर कम हो, घर वह है जहाँ सच छुपाना न पड़े।
इंस्पेक्टर माधवी देसाई को काव्या को पूरी सच्चाई न बताने के लिए विभागीय कार्रवाई झेलनी पड़ी। लेकिन उनकी जांच से देवेंद्र मल्होत्रा, राधिका सेन और कई ऐसे लोग गिरे जो सोचते थे कि अकेली माँ सबसे आसान शिकार होती है।
1 साल बाद, काव्या ईशान को मरीन ड्राइव पर लेकर गई। बारिश थम चुकी थी। समुद्र की हवा नम थी, मगर साफ। अर्जुन उसके साथ चल रहा था—आगे नहीं, बराबर। राहगीरों को यह फर्क छोटा लगता, काव्या को नहीं।
ईशान बीच में था। 1 हाथ से काव्या की उँगली पकड़े, 1 हाथ से अर्जुन की। वह ऐसे चल रहा था जैसे पूरी दुनिया उसी की जेब में हो।
अर्जुन ने धीमे से पूछा, —तुम्हें मुझे फोन करने का पछतावा है?
काव्या ने समुद्र की तरफ देखा। उसे अस्पताल की वह रात याद आई। रिसेप्शन की बेइज्जती। छत पर हेलिकॉप्टर। झूठ। दवा। अलार्म। वह नन्हा हाथ जो अपने पिता की उँगली पकड़ रहा था, बिना जाने कि बड़े लोग कितने टूटे हुए होते हैं।
—मुझे इस बात का पछतावा है कि मेरे पास तुम्हें फोन न करने की वजहें थीं।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—मुझे पछतावा है कि वे वजहें मैंने दीं।
उसने माफी ऐसे नहीं माँगी जैसे बीता हुआ समय मिट सकता है। उसने यह ऐसे कहा जैसे कोई आदमी पहली बार अपने कर्मों का बोझ उठाने को तैयार हो।
ईशान अचानक समुद्र के ऊपर उड़ती पतंग देखकर खिलखिला पड़ा। काव्या ने उसकी छोटी उँगली कस ली।
लंबे समय तक सबको लगा था कि राज बच्चे को बचाते हैं। नकली नाम, बंद दरवाजे, गुप्त कागज, छुपी हुई दवाएँ, निगरानी करती पड़ोसन, और डर को सुरक्षा कहने की आदत।
लेकिन ईशान ने अपनी बुखार से तपती देह और नन्ही साँसों से सबको सिखा दिया था कि किसी बच्चे को कोई राज उतना सुरक्षित नहीं रख सकता, जितना एक सम्मानित माँ, बदलना सीखता पिता, और वह सच जो बहुत देर होने से पहले बोल दिया जाए।
उस शाम मरीन ड्राइव पर ईशान कोई वारिस नहीं था, कोई सबूत नहीं था, कोई खतरा नहीं था, कोई मोहरा नहीं था।
वह सिर्फ हवा में हँसता हुआ एक छोटा बच्चा था।
और पहली बार, सबके लिए इतना ही काफी था।
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