
PART 1
—अगर मेरे बेटे को मेरी आँखों से देखे बिना इस चिता पर चढ़ाया, तो पहले मुझे उसी आग में फेंक देना।
सरला मेहरा की चीख ने जयपुर के उस महंगे श्मशान घाट की संगमरमर वाली शांति को चीर दिया। 67 साल की सरला, मिट्टी से सनी चप्पलों में, हल्की सूती शॉल ओढ़े, हाथ में पुराना कपड़े का थैला दबाए, दरवाजे पर खड़ी थी। उसके सफेद बाल आधे खुले थे, चेहरा रातभर के सफर से सूजा हुआ था, और आँखों में ऐसा डर था जैसे दुनिया ने उससे उसका आखिरी सहारा छीन लिया हो।
सामने, फूलों से घिरी अर्थी पर उसका इकलौता बेटा आर्यन मेहरा सफेद कफन में लिपटा पड़ा था। चारों तरफ गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा की मालाएँ थीं। बड़े-बड़े कारोबारी, वकील, निवेशक और आर्यन की साइबर सुरक्षा कंपनी के कर्मचारी सिर झुकाए खड़े थे। मगर रो कोई नहीं रहा था।
सबसे आगे खड़ी थी आर्यन की पत्नी, नंदिता। काली साड़ी, मोतियों की पतली माला, चेहरा सख्त, आँखें सूखी। वह विधवा कम, किसी सौदे की आखिरी मुहर लगने का इंतजार करती औरत ज्यादा लग रही थी।
—माँजी, अब तमाशा मत कीजिए, नंदिता ने धीमी मगर ठंडी आवाज में कहा। आर्यन ने खुद कहा था कि अंतिम दर्शन न करवाए जाएँ।
सरला की आँखें अंगार हो गईं।
—मेरा बेटा 38 साल की उम्र में भी मुझे फोन करके पूछता था कि दाल में नमक कब डालना है। तू मुझे बताएगी कि वह क्या चाहता था?
भीड़ में फुसफुसाहट फैल गई। कुछ लोगों ने निगाहें चुरा लीं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि मृतक की माँ को खबर क्यों नहीं दी गई थी। मगर सरला समझ रही थी।
उसे जानबूझकर नहीं बताया गया था।
पिछली रात उसे पुराने मोहल्ले की एक औरत का फोन आया था—“सरला दीदी, आर्यन के जाने की खबर सुनी। अंतिम संस्कार कल सुबह है न?”
उसके हाथ से स्टील का गिलास गिरकर टूट गया था। उसने आर्यन को 14 बार फोन किया। कोई जवाब नहीं। नंदिता को फोन किया। फोन बंद। कंपनी के दफ्तर, एक पुराने कर्मचारी, फिर नगर निगम तक फोन मिलाए, तब जाकर किसी झिझकती आवाज ने बताया कि अंतिम संस्कार जल्दी-जल्दी रखा गया है।
सरला ने उसी रात उदयपुर के पास अपने छोटे कस्बे से बस पकड़ी। रास्ते भर उसने थैले में रखी आर्यन की बचपन की फोटो छाती से लगाए रखी—स्कूल यूनिफॉर्म में दुबला बच्चा, टेढ़ी टाई, हाथ में गणित प्रतियोगिता का प्रमाणपत्र।
वह उसे अकेले पालकर यहाँ तक लाई थी। पति उसके जन्म से पहले ही भाग गया था, 3 कर्ज और एक टूटी चारपाई छोड़कर। सरला ने घरों में खाना बनाया, लोगों के बर्तन मांजे, रात में अस्पतालों में अटेंडेंट का काम किया, करवाचौथ और दिवाली पर मिठाइयाँ बेचकर फीस भरी। उसने अपने बेटे से हमेशा कहा था—“तू बड़ा आदमी बन, पर माँ को छोटा मत समझना।”
लेकिन शादी के बाद आर्यन बदल गया था। नंदिता पढ़ी-लिखी, तेज, महत्वाकांक्षी और कंपनी की सह-संस्थापक थी। उसने धीरे-धीरे आर्यन के फोन कम करवा दिए, रविवार के भोजन रद्द करवा दिए, हर बात में बोलना शुरू कर दिया। सरला ने एक बार बेटे से कहा था—“ये लड़की तुझे पति नहीं, दस्तखत समझती है।”
आर्यन नाराज हो गया था।
—माँ, आपको मेरी जिंदगी में किसी औरत की जगह सहन नहीं होती।
उसके बाद फोन कम हो गए। मगर माँ का दिल कम नहीं हुआ।
अब जब नंदिता अर्थी के सामने दीवार बनकर खड़ी हुई, सरला के भीतर दबा हुआ सारा अपमान एक आग बन गया।
—कफन हटाओ।
—नहीं, नंदिता बोली।
—मैंने कहा, कफन हटाओ।
—आप दोनों महीनों से ठीक से बात भी नहीं करते थे। अब सबके सामने माँ बनने का नाटक मत कीजिए।
यह बात सरला को चीर गई, क्योंकि उसमें थोड़ा सच था। मगर 38 साल की ममता को कुछ महीनों की दूरी मिटा नहीं सकती थी।
सरला ने अपना थैला जमीन पर फेंका, आगे बढ़ी और नंदिता को धक्का देकर हटाया। 2 कर्मकांडी पुरुष और एक कर्मचारी उसे रोकने दौड़े, पर वह ऐसे छूटी जैसे जलते घर में घुसती माँ को कोई रोक नहीं सकता।
उसके काँपते हाथों ने कफन का किनारा पकड़ा।
—माताजी, मत कीजिए, किसी ने कहा।
—चुप रहो।
उसने कफन हटाया।
आर्यन का चेहरा पीला था। होंठ नीले, गाल धँसे हुए, माथे पर हल्का पसीना जैसा कुछ जमा था। सरला के मुँह से टूटी हुई कराह निकली। वह झुकी, उसके माथे को चूमा, जैसे बुखार में तपते बच्चे को चूमा करती थी।
तभी उसने देखा।
आर्यन की बाईं पलक बहुत हल्की काँपी।
सरला पत्थर हो गई।
फिर उसके सीने ने बेहद धीमे, लगभग अदृश्य ढंग से साँस ली।
सरला पीछे हटी। उसकी आँखें फैल गईं।
—मेरा बेटा साँस ले रहा है।
किसी ने जवाब नहीं दिया।
उसने आर्यन के चेहरे को दोनों हथेलियों में थाम लिया।
—आर्यन जिंदा है! मेरा बेटा जिंदा है!
नंदिता का चेहरा पहली बार सफेद पड़ गया।
—ये संभव नहीं…
ये 3 शब्द इतने जल्दी और इतने डर में निकले कि पूरा श्मशान काँप गया।
सरला ने पलटकर उसे घूरा।
—किसके लिए संभव नहीं, नंदिता?
PART 2
कंपनी का पुराना कर्मचारी रोहित तुरंत एम्बुलेंस को फोन करने लगा। सरला अर्थी के पास बैठ गई और आर्यन का सिर अपनी गोद में लेने की कोशिश करने लगी।
—कोई मेरे बेटे को हाथ नहीं लगाएगा जब तक डॉक्टर नहीं आते, वह चीखी। और पुलिस को बुलाओ।
नंदिता आगे बढ़ी।
—मैं उसकी पत्नी हूँ। मुझे उसके साथ रहना है।
सरला की आवाज पत्थर जैसी हो गई।
—इसीलिए तुझे यहीं रुकना होगा।
एम्बुलेंस आई। डॉक्टरों ने ऑक्सीजन मास्क लगाया, नाड़ी देखी, आँखों पर टॉर्च डाली। एक डॉक्टर का चेहरा अचानक बदल गया।
—यह जीवित है, पर हालत नाजुक है। तुरंत अस्पताल ले चलो।
सरला एम्बुलेंस में चढ़ गई। नंदिता को पुलिस ने रोक लिया।
जयपुर के एसएमएस अस्पताल के बाहर सरला पूरी रात बैठी रही। तभी रोहित आया, हाथ में फोन काँप रहा था।
—आंटी, आर्यन सर ने 2 दिन पहले मुझे मैसेज किया था।
स्क्रीन पर लिखा था—
“कंपनी के खातों में गड़बड़ है। नंदिता को मत बताना। अगर मुझे कुछ हो जाए, माँ को खबर करना।”
सरला की साँस अटक गई।
तभी एक महिला पुलिस अधिकारी आई।
—मैं इंस्पेक्टर काव्या राठौड़। यह सामान्य मौत का मामला नहीं है।
सरला ने आईसीयू के दरवाजे को देखा।
—तो उस औरत से शुरू कीजिए, जिसने मेरे बेटे को जलने से पहले ही मरवा दिया था।
PART 3
सुबह होते-होते परतें खुलने लगीं। मृत्यु प्रमाणपत्र एक निजी डॉक्टर के नाम से बना था, पर हस्ताक्षर स्कैन किए हुए थे। डॉक्टर ने पूछताछ में कहा कि उसने आर्यन को देखा ही नहीं था। श्मशान घाट की बुकिंग नंदिता ने “तुरंत संस्कार” के नाम पर करवाई थी—कोई लंबी विधि नहीं, कोई अंतिम दर्शन नहीं, सीधे चिता।
सबसे बड़ा झटका कंपनी के दस्तावेजों से मिला। आर्यन की कथित मृत्यु से 48 घंटे पहले पावर ऑफ अटॉर्नी बदली गई थी। अगर आर्यन मर जाता या अक्षम घोषित होता, तो कंपनी के खाते, शेयर, पेटेंट और चल रहे सरकारी अनुबंधों पर पूरा नियंत्रण नंदिता को मिल जाता। कंपनी की कीमत कई करोड़ थी।
इंस्पेक्टर काव्या ने सरला को बताया तो उसके चेहरे पर आँसू नहीं आए। वह बस दीवार को देखती रही।
—मैंने कहा था, वह मेरे बेटे को आदमी नहीं, सीढ़ी समझती है।
नंदिता को उसी दिन हिरासत में लिया गया। पहले उसने विधवा की तरह बोलना शुरू किया—दुख, सदमा, आर्यन की इच्छा, बंद चेहरा, जल्द संस्कार। मगर जब उसके सामने बैंक ट्रांसफर, नकली सलाहकारों के ईमेल, डॉक्टर को भेजी रकम, रोहित को भेजा आर्यन का संदेश और सीसीटीवी फुटेज रखे गए, तो उसके चेहरे से शोक उतर गया।
—आर्यन कंपनी बर्बाद कर देता, उसने आखिरकार कहा।
काव्या ने पूछा—
—तुमने उसे क्या दिया था?
नंदिता ने होंठ भींचे।
—एक दवा। कहा गया था कि शरीर धीमा पड़ जाएगा। साँस, नाड़ी, प्रतिक्रिया… सब इतना कम कि लोग मृत समझें। बस कुछ घंटों के लिए।
—तुम उसे जिंदा जलाने वाली थीं।
नंदिता ने पहली बार आँखें हटाईं, शर्म से नहीं, चिढ़ से।
—मुझे नहीं पता था कि उसकी माँ गाँव की पागल औरत की तरह आकर कफन खोल देगी।
जब काव्या बाहर आई, सरला उसी गलियारे में खड़ी थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, मगर वह बैठी नहीं। जैसे बैठने का मतलब हार मानना हो।
—उसने माना? सरला ने पूछा।
—इतना कि अदालत तक सच पहुँच सके।
तभी आईसीयू से एक जूनियर डॉक्टर दौड़ता हुआ आया।
—सरला जी?
सरला का गला सूख गया।
—आपका बेटा होश में आ गया है।
उसने दौड़ना चाहा, मगर पैर काँप गए। रोहित ने संभाल लिया। कमरे में आर्यन मशीनों से घिरा पड़ा था। हाथ में सलाइन, चेहरे पर मास्क, गर्दन के पास गहरा निशान। मगर उसकी आँखें खुली थीं।
—माँ…
बस एक शब्द। टूटा हुआ। शर्म से भीगा हुआ।
सरला उसके पास गई और उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया।
—मैं आ गई, बेटा। अब कहीं नहीं जाऊँगी।
आर्यन रो पड़ा। वह किसी करोड़ों की कंपनी का मालिक नहीं लग रहा था। वह वही बच्चा था जो डर लगने पर माँ की साड़ी पकड़ लेता था।
—माफ कर दो, माँ।
—चुप।
—मैंने तुम्हें दूर कर दिया। मैंने नंदिता की बातों में आकर सोचा कि तुम छोटी सोचती हो। मुझे लगा तुम मेरी दुनिया नहीं समझतीं।
सरला की आँखें भर आईं।
—माँ को हर बात समझनी जरूरी नहीं, बेटा। माँ को बस अपने बच्चे की साँस पहचाननी होती है।
आर्यन ने आँखें बंद कर लीं।
—तुम सही थीं।
—काश मैं गलत होती।
अगले दिन उसने इंस्पेक्टर काव्या को बयान दिया। सरला बाहर जाना चाहती थी, पर आर्यन ने उसकी उँगलियाँ पकड़ लीं।
—रुको। मैंने बहुत कुछ तुमसे छिपाया है।
उसकी आवाज कमजोर थी, मगर शब्द साफ थे।
—2 महीने पहले मैंने खातों में अजीब लेन-देन देखे। नंदिता कहती थी कि ये विदेशी विस्तार, सलाहकार और निवेशकों के खर्च हैं। पर बिल झूठे थे। शेल कंपनियाँ थीं। कुछ पैसे ऐसे खातों में जा रहे थे जिन्हें मैं जानता भी नहीं था। जब मैंने विरोध किया तो उसने कहा कि मैं इतने बड़े कारोबार के लायक नहीं हूँ। मैं अभी भी एक नौकरानी का बेटा सोचता हूँ।
सरला के चेहरे पर चोट उतर आई।
—फिर मैंने देखा कि मेरी नकली हस्ताक्षर से कुछ कागज बने हैं। मेरी मृत्यु या बीमारी की हालत में सब कुछ नंदिता के हाथ में चला जाता। पेटेंट तक उसकी अलग कंपनी में ट्रांसफर होने वाले थे।
काव्या ने पूछा—
—घटना वाली रात?
आर्यन ने मुश्किल से पानी पिया।
—मैंने उसे कहा कि मैं पुलिस में शिकायत करूँगा। वह अचानक रोने लगी। बोली उसने सब हमारे भविष्य के लिए किया। फिर उसने मेरे लिए काढ़ा बनाया। स्वाद बहुत कड़वा था। उसके बाद मेरे पैर सुन्न हो गए। मैं फोन उठाना चाहता था… माँ को कॉल करना चाहता था… पर शर्म आई। लगा माँ नहीं उठाएगी।
सरला झुक गई।
—मैं 3 बजे भी उठाती, 10 साल बाद भी उठाती।
आर्यन फिर रोया।
—उसके बाद अंधेरा था। कभी-कभी आवाजें सुनाई देती थीं। नंदिता कह रही थी, “कल सब खत्म हो जाएगा।” मुझे ठंड लग रही थी। मैं हिल नहीं पा रहा था। बोल नहीं पा रहा था। फिर श्मशान में तुम्हारी आवाज सुनाई दी। तुम चिल्लाईं कि पहले तुम्हें जलाना पड़ेगा। माँ, मैंने उसी आवाज को पकड़कर साँस ली।
काव्या की आँखें भी नम हो गईं।
—आपकी माँ ने आपको सचमुच मौत से खींच लिया।
आर्यन ने सरला को देखा।
—हमेशा की तरह।
मामला पूरे राजस्थान में फैल गया। अखबारों ने लिखा—“पत्नी ने पति को जिंदा जलाने की साजिश रची।” टीवी चैनलों पर बहस होने लगी। सोशल मीडिया पर लोग गुस्से से भर उठे। कोई निजी डॉक्टरों की लापरवाही पर बोल रहा था, कोई पैसे की भूख पर, कोई रिश्तों के नाम पर होने वाले धोखे पर। मगर सबसे ज्यादा एक बात कही गई—माँ की नजर धोखा नहीं खाती।
सरला को कैमरे नहीं चाहिए थे। उसे सिर्फ इतना चाहिए था कि आर्यन बिना मशीन के साँस ले, रात में डरकर न उठे, और एक कटोरी खिचड़ी अपने हाथ से खा ले।
अस्पताल के दिन कठिन थे। आर्यन दरवाजा बंद होते ही घबरा जाता। अगर कोई स्टील की ट्रे जोर से बंद कर देता, उसका चेहरा नीला पड़ जाता। रात में वह चिल्लाता—“मुझे मत ढको!” सरला कुर्सी पर बैठकर सोती, उसका हाथ पकड़े रहती। वह घर से दाल, नरम रोटियाँ, सूजी का हलवा, गरम मोजे और तुलसी की चाय लाती। ये वही चीजें थीं जिन्हें नंदिता “मिडिल क्लास ड्रामा” कहकर हँसा करती थी।
एक शाम सरला ने पूछा—
—याद है, तूने 7 साल की उम्र में अपनी नई पतंग बेचकर बाहर बैठे बूढ़े मोची को दवा दिलाई थी?
आर्यन ने हल्की मुस्कान दी।
—तुमने डाँटा था।
—क्योंकि तू खुद बिना पतंग रो रहा था, बेवकूफ। लेकिन अगले दिन मैं भी उसे खिचड़ी देकर आई थी।
—मुझे पता था। मैंने खिड़की से देखा था।
ऐसे ही छोटे-छोटे स्मृतियों के धागे माँ-बेटे के बीच फटे रिश्ते को फिर सिलने लगे।
1 साल बाद मुकदमा जयपुर सेशन कोर्ट में शुरू हुआ। अदालत खचाखच भरी थी। पत्रकार, कंपनी के कर्मचारी, पुराने पड़ोसी, और वे लोग भी जो सिर्फ उस औरत का चेहरा देखना चाहते थे जिसने शादी को हत्या की योजना बना दिया था।
नंदिता हथकड़ी में आई। ग्रे सूट, सधे बाल, ठंडा चेहरा। उसमें पछतावा नहीं था। वह बस नाराज लग रही थी कि खेल पूरा होने से पहले पकड़ी गई।
जज ने आरोप पढ़े—हत्या की कोशिश, जालसाजी, धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र, मेडिकल दस्तावेजों की फर्जीकरण और कंपनी पर अवैध कब्जे की योजना। डॉक्टर ने मान लिया कि उसने पैसे लेकर कागज बनाए, शरीर देखे बिना। श्मशान कर्मचारी ने स्वीकार किया कि नंदिता ने जल्दी से जल्दी संस्कार कराने पर जोर दिया था।
फिर आर्यन गवाही देने खड़ा हुआ। वह अब भी धीरे चलता था, मगर उसकी आवाज नहीं काँपी।
—मैंने नंदिता से शादी इसलिए की थी क्योंकि मुझे लगा वह मुझमें आदमी देखती है। असल में वह रास्ता देखती थी—मेरे विचारों तक, मेरे पैसों तक, मेरी कंपनी तक, मेरे हस्ताक्षर तक। उसने जीवन नहीं माँगा, कब्जा माँगा।
अदालत में सन्नाटा फैल गया।
उसने सामने बैठी सरला की तरफ देखा।
—मैंने बहुत देर से समझा कि सफलता का मतलब माँ से दूर होना नहीं होता। मुझे उसकी पुरानी साड़ी, उसका देसी लहजा, उसकी बार-बार की चिंता शर्मनाक लगने लगी थी। मैं सोचता था वह मेरी नई दुनिया नहीं समझती। लेकिन उसने नंदिता की आँखों में वह देख लिया जो मैं रोज देखकर भी नहीं देख पाया।
सरला चुपचाप रो रही थी।
—मैं आज यहाँ इसलिए हूँ क्योंकि मेरी माँ ने शिष्टाचार नहीं निभाया। उसने शोर किया। उसने मना किया हुआ कफन खोला। उसने दुनिया को परेशान किया, और उसी परेशानी ने मेरी जान बचाई।
जब सरला को गवाही के लिए बुलाया गया, तो लोग एक टूटी हुई बूढ़ी औरत की उम्मीद कर रहे थे। मगर वह सीधी बैठी। उसने माइक्रोफोन के पास झुककर जीवन की पूरी गाथा खोल दी—पति का छोड़ जाना, किराए के कमरे की सीलन, 12 रुपये में पूरा दिन निकालना, बेटे की फीस के लिए करवाचौथ पर मेहंदी लगाना, दिवाली पर लड्डू बनाकर बेचना, अपनी भूख छिपाकर बेटे की थाली भरना, रात की ड्यूटी से लौटकर उसके स्कूल प्रोजेक्ट बनाना।
फिर उसने नंदिता की तरफ देखा।
—तुमने मुझे गरीब, अनपढ़ और बोझ समझा। तुम्हें लगा महंगे फूलों से विदाई हो जाएगी और माँ गाँव में बैठी रोती रह जाएगी। पर माँ को बुलावा नहीं चाहिए होता। माँ को शक काफी होता है। मैंने अपने बेटे को पेट में 9 महीने रखा था। उसकी साँस कैसी चलती है, ये मैं फूलों और कफन के नीचे भी पहचान सकती हूँ।
नंदिता ने नजर नहीं झुकाई।
जज ने उससे पूछा कि क्या वह कुछ कहना चाहती है।
नंदिता बोली—
—मैंने भी कंपनी के लिए मेहनत की थी। मुझे पत्नी बनकर किनारे नहीं रहना था।
जज की आवाज ठंडी हो गई।
—अधिक अधिकार की इच्छा किसी जीवित आदमी को चिता पर चढ़ाने का अधिकार नहीं देती।
फैसला कठोर था। नंदिता को 18 साल की सजा मिली। उसकी संपत्तियाँ जब्त हुईं। डॉक्टर और साजिश में शामिल 2 सहयोगियों को भी सजा दी गई। कंपनी से जुड़े फर्जी खातों की जाँच अलग शुरू हुई।
कोर्ट से बाहर पत्रकारों ने सरला और आर्यन को घेर लिया।
—सरला जी, उन माँओं से क्या कहेंगी जिनके बच्चे शादी या सफलता के बाद दूर हो जाते हैं?
सरला ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ा।
—बच्चा दूर चला जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि वह प्यार करना भूल गया। कभी-कभी वह खुद को बड़ा साबित करते-करते रास्ता भूल जाता है। पर अगर माँ को कुछ गलत लगे, तो उसे चुप रहने की जरूरत नहीं। माँ को दुनिया की शांति तोड़ने का हक है।
एक पत्रकार ने आर्यन से पूछा—
—आपने क्या सीखा?
आर्यन ने माँ की तरफ देखा।
—कि करोड़ों कमाकर भी आदमी गरीब रह सकता है, अगर वह उस हाथ को छोड़ दे जिसने उसे तब संभाला था जब उसके पास कुछ नहीं था।
धीरे-धीरे जीवन पटरी पर लौटा। आर्यन ने कंपनी संभाली, मगर इस बार हर खाते की जाँच करवाई। जिन कर्मचारियों ने धोखे में साथ दिया था, उन्हें हटाया। जिन ग्राहकों को नुकसान हुआ था, उन्हें पैसा लौटाया। उसने कई बड़े अनुबंध छोड़े, पर कंपनी का नाम साफ रखा।
इस बार उसने सरला को बाहर नहीं रखा।
एक शुक्रवार वह उसे जयपुर के बड़े ऑफिस में ले गया। काँच की इमारत, चमकते फर्श, कंप्यूटरों की कतारें। सरला नीली साड़ी में संकोच से दरवाजे पर रुक गई।
—मैं यहाँ क्या करूँगी, बेटा? मुझे तो ये मशीनें भी नहीं समझ आतीं।
आर्यन मुस्कुराया।
—आज इन्हें वही सुनना है जो मुझे बहुत पहले सुन लेना चाहिए था।
पूरी टीम के सामने उसने कहा—
—ये मेरी माँ हैं। इन्होंने मुझे वह सिखाया जो किसी बिजनेस स्कूल ने नहीं सिखाया।
सरला घबरा गई, फिर धीरे से बोली—
—मुझे कोडिंग नहीं आती। मुझे अंग्रेजी के बड़े शब्द नहीं आते। मगर इतना जानती हूँ कि भरोसा बेचने की चीज नहीं होता। जिस रोटी में किसी की मेहनत लगी हो, उसे धोखे से नहीं खाना चाहिए। और अगर सफलता तुम्हें अपनी जड़ों से शर्म दिलाए, तो समझो वह सफलता नहीं, भागना है।
पहले सन्नाटा रहा। फिर रोहित खड़ा हुआ और ताली बजाई। धीरे-धीरे पूरा हॉल तालियों से भर गया।
उस दिन के बाद हर शुक्रवार आर्यन माँ के घर खाने जाने लगा। कभी वह राजमा बनाती, कभी बाजरे की रोटी और गुड़, कभी सिर्फ आलू की सब्जी। आर्यन फूल लेकर आता, मगर सरला को ज्यादा खुशी तब होती जब वह समय से पहले आकर प्याज काटने बैठ जाता।
—पहले मैं तुम्हें तब फोन करता था जब समय मिलता था, उसने एक रात कहा।
सरला ने पूछा—
—अब?
—अब मैं समय बनाता हूँ।
सरला मुस्कुराई।
—ये समझने के लिए तुझे 38 साल और एक चिता चाहिए थी।
दोनों हँसे, मगर आँखें गीली रहीं।
कुछ महीनों बाद आर्यन ने गरीब परिवारों के बच्चों के लिए टेक्नोलॉजी और साइबर सुरक्षा की पढ़ाई में मदद करने वाली संस्था बनाई। उसका नाम रखा—“जड़ें”। उद्घाटन पर उसने रिबन काटने के लिए सरला को बुलाया।
—मैंने क्या किया है? वह शर्माते हुए बोली।
आर्यन ने उसका हाथ थाम लिया।
—सब कुछ।
1 साल बाद वे अपने पुराने मोहल्ले गए। वह छोटा किराए का कमरा अब रंगा-पुता था, गली में नई दुकानें खुल गई थीं, पर सीढ़ियों के पास दीवार पर पेंसिल की धुंधली रेखाएँ अभी भी थीं। वहीं सरला आर्यन की ऊँचाई नापती थी।
आर्यन ने उन निशानों पर हाथ फेरा।
—मैं यहाँ से इतना भागना चाहता था कि लौटना मुझे हार लगता था।
सरला ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
—बेटा, जाना गलत नहीं होता। भूल जाना गलत होता है।
आर्यन ने माँ को लंबे समय तक गले लगाए रखा। उसी गली में, जहाँ कभी वह स्कूल बैग लेकर भागता था, उसे लगा कि उसने दूसरी बार जन्म लिया है।
सरला और आर्यन की कहानी इसलिए नहीं फैली कि एक माँ ने कफन हटाकर अपने बेटे को जिंदा पाया। वह इसलिए लोगों के दिल में उतर गई क्योंकि उसने एक गहरी बात याद दिलाई—कभी-कभी जो आवाज हमें सबसे ज्यादा चुभती है, वही हमें सबसे सच्चाई से बचाना चाहती है।
नंदिता ने अपनी आजादी खो दी, क्योंकि उसने विवाह को सौदा और पति को संपत्ति समझा।
आर्यन ने अपना भ्रम खो दिया, पर माँ को फिर पा लिया।
और सरला—वह छोड़ी हुई पत्नी, फटे हाथों वाली माँ, जिसने दूसरों के घरों में बर्तन मांजे, त्योहारों पर मिठाई बेची, भूखी रहकर बेटे को खिलाया—उसने साबित कर दिया कि सच्चा प्यार हमेशा मीठा, सभ्य और चुप नहीं होता।
कभी-कभी वह देर से श्मशान पहुँचता है।
कभी वह भीड़ को धक्का देता है।
कभी वह कफन खोल देता है जिसे सब बंद मान चुके होते हैं।
और कभी उसकी चीख इतनी सच्ची होती है कि मौत भी एक कदम पीछे हट जाती है।
क्योंकि माँ बहुत बातों में गलत हो सकती है।
लेकिन जब उसे अपने बच्चे की साँस महसूस हो जाए, तो दुनिया का कोई कफन, कोई चिता, कोई साजिश उसे झूठा साबित नहीं कर सकती।
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