भाग 2
मेहर ने उसकी बात अनसुनी कर दी और मेरी ओर देखा।
“मुझे उसकी कार में कुछ मिला,” उसने कहा। “पुलिस ने मुझे इंतज़ार करने के लिए कहा क्योंकि मेरा बैग अभी भी अंदर था। कार में कुछ दस्तावेज़ थे।”
मेरे दिल की धड़कन बदल गई।
“कौन से दस्तावेज़?”
उसने फ़ोल्डर मेरी ओर बढ़ा दिया।
सबसे ऊपर हमारी शादी के प्रमाणपत्र की एक फ़ोटोकॉपी थी।
उसके नीचे संपत्ति कर की रसीदें।
बैंक के दस्तावेज़।
आपसी सहमति से तलाक़ की एक प्रारूप याचिका।
मेरा नाम साफ़-साफ़ टाइप किया हुआ था।
नीचे मेरे हस्ताक्षर भी बने हुए थे।
लेकिन…
मैंने कभी उन पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
मेरे पेट में ठंड-सी उतर गई।
मेहर ने धीरे से कहा,
“उसने मुझसे कहा था कि तुम पहले ही राज़ी हो चुकी हो। उसने कहा था कि बस कानूनी प्रक्रिया में देर हो रही है।”
मैंने अगला पन्ना पलटा।
समझौते की शर्तें।
कोई गुज़ारा भत्ता नहीं।
कोई भरण-पोषण नहीं।
वैवाहिक घर पर कोई अधिकार नहीं।
संयुक्त संपत्तियों पर कोई दावा नहीं।
वैवाहिक अपार्टमेंट के हस्तांतरण पर कोई आपत्ति नहीं।
आख़िरी पंक्ति पढ़ते ही मेरी आँखों के आगे धुंध छा गई।
वैवाहिक अपार्टमेंट।
इंदिरानगर वाला फ्लैट।
जो मेरे पिता की छोड़ी हुई रकम से खरीदा गया था।
जो शादी से पहले मेरे नाम पर पंजीकृत था।
वही फ्लैट…
जिसे राघव मेहमानों के सामने “हमारा घर” कहता था…
और गुस्से में “तुम्हारा घर”।
अब उसी फ्लैट को इन कागज़ों में ऐसे लिखा गया था…
मानो मैंने स्वेच्छा से उस पर रहने का अधिकार छोड़ दिया हो।
मैंने सुलोचना की ओर देखा।
उन्होंने नज़रें फेर लीं।
बस वही छोटा-सा हावभाव…
उनका अपराध स्वीकार करने के लिए काफ़ी था।
मेहर ने दूसरा पन्ना आगे किया।
“और भी है।”
वह एक मेडिकल रिपोर्ट थी।
फ़र्टिलिटी स्पेशलिस्ट कंसल्टेशन।
रोगी: अद्विका सूर्यवंशी।
मैं उस क्लिनिक में कभी गई ही नहीं थी।
मेरे हाथ काँपने लगे।
रिपोर्ट में एक पंक्ति को विशेष रूप से हाईलाइट किया गया था।
अंडाशय की क्षमता कम। भविष्य की संभावना कमज़ोर।
नीचे…
पति को परामर्श दिया गया।
राघव के हस्ताक्षर।
और उसके नीचे…
अभिभावक उपस्थित।
सुलोचना प्रताप सूर्यवंशी।
मेरी साँस रुक गई।
मैंने वर्षों तक राघव से साथ में जाँच कराने की विनती की थी।
वह हमेशा कहता था,
“मेरा अपमान क्यों कर रही हो? सब जानते हैं कि मर्दों में कोई समस्या नहीं होती।”
लेकिन…
वह गया था।
मेरे बिना।
अपनी माँ के साथ।
मेरे शरीर के बारे में चर्चा करने…
उस क्लिनिक में…
जहाँ मैं कभी गई ही नहीं थी।
मेहर की आवाज़ काँप रही थी।
“उसने मुझसे कहा था कि तुमने इलाज कराने से मना कर दिया। उसने कहा था कि तुम्हें बच्चे ही नहीं चाहिए।”
मैं हँस पड़ी।
इसलिए नहीं कि बात मज़ेदार थी।
बल्कि इसलिए…
क्योंकि कभी-कभी दर्द शरीर से बाहर निकलने के लिए ग़लत रास्ता चुन लेता है।
“मुझे बच्चा इतना चाहिए था,” मैंने कहा,
“कि मैं दुकानों में बच्चों के कपड़े मोड़-मोड़कर देखती थी…
और दिखावा करती थी कि मैं सिर्फ़ कपड़े की गुणवत्ता जाँच रही हूँ।”
मेहर की आँखें भर आईं।
सुलोचना झल्लाकर बोलीं,
“बस करो यह सब बकवास। वे कागज़ निजी हैं।”
“नहीं,” मैंने कहा।
“मेरे जाली हस्ताक्षर अब निजी नहीं रहे।”
मैंने अस्पताल के गलियारे से अधिवक्ता तारा मेनन को फ़ोन किया।
उन्होंने पहले मेरी एक सहकर्मी का वैवाहिक संपत्ति विवाद संभाला था।
सालों पहले मैंने उनका नंबर बिना किसी वजह के सेव कर लिया था।
अब समझ आया…
दरअसल मैं उसी दिन खुद को बचा रही थी।
एक घंटे बाद जब तारा पहुँचीं…
राघव को निजी कमरे में शिफ़्ट किया जा चुका था।
सुलोचना दो बार उसका फ़ोन वापस लेने की कोशिश कर चुकी थीं।
मेहर वहीं रुकी रही।
मेरे साथ नहीं।
मेरे पक्ष में भी नहीं।
बस…
एक गवाह की तरह…
जिसकी किसी ने योजना नहीं बनाई थी।
तारा ने सारे दस्तावेज़ पढ़े।
जाली तलाक़ याचिका।
संपत्ति के कागज़।
फ़र्टिलिटी रिपोर्ट।
अंगूठी के डिब्बे में मिला नोट।
सुलोचना का संदेश।
फिर उन्होंने मेरी ओर देखा।
“अद्विका…
अब यह मामला सिर्फ़ विवाहेतर संबंध का नहीं रह गया है।”
मैंने सिर हिला दिया।
मेरा गला जैसे काँच से भर गया था।
“यह जालसाज़ी है।”
“संपत्ति हड़पने की कोशिश है।”
“संभवतः चिकित्सकीय गोपनीयता का उल्लंघन है।”
“मानसिक क्रूरता है।”
“और आपराधिक साज़िश भी।”
अस्पताल के लाउंज में सामने बैठी सुलोचना ने ठुड्डी ऊँची कर ली।
“तुम वकील लोग बड़े-बड़े शब्द इस्तेमाल करते हो। परिवार के मामले परिवार के अंदर ही सुलझते हैं।”
तारा ने पलक तक नहीं झपकाई।
“आपका परिवार तो औरतों के हस्ताक्षर जाली बनाकर मामले सुलझाता हुआ दिखाई दे रहा है।”
मेहर ने धीरे से कहा,
“उसने मुझसे भी पैसे लिए थे।”
सबकी नज़र उसकी ओर घूम गई।
उसने अपना हैंडबैग खोला और बैंक ट्रांसफ़र की रसीदें बाहर निकालीं।
“आठ महीनों में मैंने उसे बारह लाख रुपये दिए,” उसने कहा।
“उसने कहा था कि उसका तलाक़ अटका हुआ है क्योंकि अद्विका बहुत ज़्यादा पैसे माँग रही है।”
“उसने कहा था कि आज़ाद होने के लिए उसे अस्थायी मदद चाहिए।”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
उसने मेरा नाम इस्तेमाल करके…
उसे भी ठगा था।
वह मेरी प्रतिद्वंद्वी नहीं थी।
मेरी दुश्मन नहीं थी।
वह भी…
मेरी तरह…
धोखे के उसी धुँधलके में भटक रही एक और औरत थी।
सुलोचना बोलीं,
“तुम झूठ बोल रही हो।”
मेहर ने उनकी ओर देखा।
“दीवाली पर आपने ही मुझसे कहा था कि धैर्य रखने वाली औरत ही अच्छी पत्नी बनती है।”
वे शब्द पत्थरों की तरह गिरे।
मैंने सुलोचना की ओर देखा।
“आप उससे मिली थीं?”
अब उनके पास कोई जवाब नहीं था।
मेहर आगे बोली,
“आपने कहा था कि अद्विका मानसिक रूप से अस्थिर है।”
“कि राघव सिर्फ़ दया करके उसके साथ रह रहा है।”
“और तलाक़ के बाद मुझे समाज के सवालों के लिए तैयार रहना चाहिए।”
मेरे भीतर कुछ टूट गया।
लेकिन उससे खून नहीं निकला।
वह जलने लगा।
तारा ने मेहर की बैंक रसीदें अपने पास रख लीं।
“हम इसमें आर्थिक धोखाधड़ी भी जोड़ेंगे।”
रात 8 बजे हम सब साथ में राघव के कमरे में दाख़िल हुए।
मैं।
मेरी वकील।
मेहर।
सुलोचना हमारे पीछे-पीछे विरोध करती हुई अंदर आईं।
लेकिन तारा पहले ही अस्पताल प्रशासन को सूचित कर चुकी थीं कि कानूनी साक्ष्य सुरक्षित किए जा रहे हैं।
तकियों के सहारे लेटा राघव पहले से छोटा दिखाई दे रहा था।
चोट…
कुछ पुरुषों को कमज़ोर दिखाती है।
लेकिन…
सच…
उन्हें साधारण बना देता है।
उसकी नज़र पहले मुझ पर गई।
फिर मेहर पर।
“यह यहाँ क्यों आई है?”
मेरे जवाब देने से पहले ही मेहर बोली,
“उस आदमी को देखने…
जो कभी था ही नहीं।”
वह सिहर उठा।
मैंने जाली तलाक़ याचिका उसके कंबल पर रख दी।
“क्या तुमने मेरे हस्ताक्षर जाली बनाए?”
उसने अपनी माँ की ओर देखा।
एक पल के लिए…
मुझे उस पर तरस आ गया।
इतना बड़ा आदमी…
और अब भी झूठ बोलने की अनुमति अपनी माँ से ढूँढ़ रहा था।
तारा बोलीं,
“संभलकर बोलिए। रिकॉर्डिंग चल रही है।”
राघव के होंठ कस गए।
“अद्विका…
मैं तुम्हें बताने वाला था।”
“कब?”
“जब मेहर को मेरे फ्लैट में ले आते?”
“वह फ्लैट शादी के बाद हमारा हो गया था।”
“नहीं।”
“मैं शादी के बाद तुम्हारी पत्नी बनी थी।”
“फ्लैट नहीं।”
उसकी आँखों में गुस्सा चमका।
“यही वजह थी कि मुझे पहले से योजना बनानी पड़ी।”
“तुम हमेशा पैसों का रौब दिखाती थीं।”
मैं उसे देखती रही।
“उन पैसों का…
जो मेरे पिता मेरे लिए छोड़ गए थे?”
“उस घर का…
जिसकी देखभाल मैं करती रही?”
“उन बिलों का…
जो मैंने तुम्हारा कारोबार दो बार डूबने के बाद भी भरे?”
वह दर्द से कराहते हुए उठकर बैठ गया।
“मैं दबाव में था।”
“माँ को पोता-पोती चाहिए था।”
“तुम हमेशा दुखी रहती थीं।”
“वह घर मर चुका था।”
मेहर ने धीरे से कहा,
“तो तुम एक नया बैठकखाना ढूँढ़ने निकल पड़े?”
राघव ने उसकी ओर देखा।
“मेहर…
मैं तुमसे प्यार करता था।”
उसने सिर हिला दिया।
“तुम्हें सिर्फ़ यह पसंद था…
कि मैं तुम पर विश्वास करती थी।”
एक पल के लिए उसका चेहरा टूट गया।
फिर फिर से कठोर हो गया।
“माँ ने कहा था कि अद्विका कभी शांति से नहीं जाएगी।”
“उन्होंने कहा था कि हमें संपत्ति बचानी होगी।”
हमें।
बस…
यही शब्द सब कुछ बता गया।
राघव और सुलोचना।
माँ और बेटा।
कोई दुर्घटना नहीं।
एक साझेदारी।
सुलोचना फुसफुसाईं,
“चुप हो जाओ।”
तारा मुस्कुराईं।
“कृपया इन्हें रोकने की कोशिश करती रहिए।”
“इससे हमें बहुत मदद मिल रही है।”
अब राघव सचमुच घबरा गया।
“माँ…
आपने तो कहा था कि वे कागज़ सिर्फ़ एहतियात के लिए हैं।”
सुलोचना पत्थर की तरह खड़ी रह गईं।
मैं धीरे-धीरे उनकी ओर मुड़ी।
“वे कागज़ आपने बनवाए थे?”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“आप मेरी मेडिकल रिपोर्ट लेने क्लिनिक गई थीं?”
उन्होंने झुँझलाकर कहा,
“मैं सिर्फ़ रिपोर्ट लेने गई थी।”
“एक माँ को यह जानने का अधिकार है कि उसके बेटे के घर में बच्चा क्यों नहीं है।”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,
“मेरा शरीर…
आपके बेटे का घर नहीं है।”
पूरा कमरा शांत हो गया।
यहाँ तक कि राघव ने भी नज़रें झुका लीं।
मैं उसके बिस्तर के पास चली गई।
“छह साल तक तुमने मुझे हर नकारात्मक रिपोर्ट पर रोने दिया।”
“मुझे यह विश्वास करने दिया कि कमी मुझमें है।”
“क्या तुमने कभी अपनी जाँच कराई थी?”
उसने नज़रें फेर लीं।
मेरी साँस अटक गई।
“राघव।”
तारा की नज़रें तेज़ हो गईं।
मैंने मेडिकल फ़ाइल उठाई और पन्ने पलटने लगी।
वहीं था।
मेरी रिपोर्ट के पीछे आधा छिपा हुआ दूसरा दस्तावेज़।
पुरुष संबंधी बांझपन।
गंभीर ओलिगोस्पर्मिया।
रोगी—
राघव प्रताप सूर्यवंशी।
तारीख़—
चार साल पहले।
मेरे घुटने लगभग जवाब दे गए।
चार साल।
उसे पता था।
सुलोचना को भी पता था।
दोनों को सब पता था।
फिर भी…
उन्होंने सारी शर्म…
सारा दोष…
मेरे कंधों पर रख दिया।
जैसे मैं अपने पेट से सुलगते कोयले का बर्तन लगाए घूमती रही।
कमरा धुँधला हो गया।
“तुम जानते थे?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
“इलाज संभव था।”
“तुम जानते थे?”
“माँ ने कहा था…
अगर तुम्हें पता चल गया…
तो तुम मुझे कम समझोगी।”
मैं हल्के से हँसी।
“तुम्हारी माँ ग़लत थीं।”
“तुम्हारी बांझपन ने तुम्हें मेरी नज़रों में कभी छोटा नहीं किया होता।”
“लेकिन यह…”
मैंने रिपोर्ट उसके सीने पर रख दी।
“इसने तुम्हें कुछ भी नहीं छोड़ा।”
सुलोचना फिर रोने लगीं।
“मेरा बेटा बहुत दुखी था।”
“तो आपने मेरा दुख और बड़ा कर दिया?”
उन्होंने गुस्से में आँसू पोंछे।
“औरत सब सह सकती है।”
“मर्द नहीं।”
मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा।
फिर कहा,
“यही वाक्य…
इस परिवार की असली बीमारी है।”
तारा ने सारी मेडिकल रिपोर्ट अपने पास रख लीं।
मेहर ने अपने बैंक के दस्तावेज़ जोड़ दिए।
अस्पताल के सुरक्षा अधिकारी को बुलाया गया।
उसी रात पुलिस में शिकायत दर्ज हुई।
इसलिए नहीं…
कि राघव की ज़िंदगी में दूसरी औरत थी।
मैं विश्वासघात सह सकती थी।
औरतें हर दिन विश्वासघात सहती हैं…
और फिर भी अगली सुबह नाश्ता बनाती हैं।
शिकायत दर्ज हुई…
जाली हस्ताक्षरों के लिए।
अवैध रूप से संपत्ति हड़पने की कोशिश के लिए।
आर्थिक धोखाधड़ी के लिए।
मानहानि के लिए।
और मेडिकल दस्तावेज़ों के दुरुपयोग के लिए।
आधी रात तक…
सुलोचना ने मुझे “बेटी” कहना बंद कर दिया।
यह भी एक तरह की प्रगति थी।
घर लौटकर…
मैं सोई नहीं।
मैंने हर फ़ाइल देखी।
हर अलमारी खोली।
हर लिफ़ाफ़ा जाँचा।
रात 2:40 बजे, मुझे उस दराज़ के नीचे चिपकी हुई एक छोटी-सी चाबी मिली…
जहाँ राघव पुराने वारंटी कार्ड रखता था।
उससे उसके अध्ययन कक्ष में रखा स्टील का नक़दी वाला डिब्बा खुल गया।
अंदर…
और भी प्रतियाँ थीं।
मेरा आधार कार्ड।
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