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मेरे पूर्व पति ने फैमिली कोर्ट के जज से कहा कि वह हमारे बच्चों के खाने, स्कूल और दवाइयों का खर्च उठाने के लिए बहुत गरीब है। फिर उसने हमारे बेटे को समुद्र किनारे की छत से अपनी मुस्कुराती हुई एक तस्वीर भेजी, और मेरे बच्चों ने अनजाने में मुझे वह सबूत दे दिया जिसने उसके झूठ को चकनाचूर कर दिया। ⚖️

मेरे पूर्व पति ने फैमिली कोर्ट के जज से कहा कि वह हमारे बच्चों के खाने, स्कूल और दवाइयों का खर्च उठाने के लिए बहुत गरीब है। फिर उसने हमारे बेटे को समुद्र किनारे की छत से अपनी मुस्कुराती हुई एक तस्वीर भेजी, और मेरे बच्चों ने अनजाने में मुझे वह सबूत दे दिया जिसने उसके झूठ को चकनाचूर कर दिया। ⚖️

मेरा नाम लावण्यश्री राव है।

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मैं तैंतालीस साल की हूँ।

और दो साल तक मेरे बच्चों के पिता ने उन्हें मेरी थकान खिलाई, जबकि उसे गरीबी का नाम दिया।

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उसने पैसों से प्यार करना बंद नहीं किया था।

उसने बस यह मानना बंद कर दिया था कि उसके पास पैसा है।

तीन साल पहले जब मैं रुद्रवेश से अलग हुई, तो बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट ने उसे हमारे दोनों बच्चों के लिए हर महीने गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया था।

आरिव, पंद्रह साल का।

मिहिका, बारह साल की।

वह कोई ऐशो-आराम की रकम नहीं थी।

वह स्कूल फीस, दवाइयाँ, बस का किराया, यूनिफ़ॉर्म, राशन और हर महीने चोरों की तरह आ जाने वाली छोटी-छोटी आपात ज़रूरतों के लिए थी।

तीन महीने तक उसने पैसे दिए।

फिर बहाने शुरू हो गए।

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उसकी कंपनी बंद हो गई थी।

उसकी तनख्वाह रुकी हुई थी।

उसके बिज़नेस पार्टनर ने उसे धोखा दिया था।

उसकी तबीयत ख़राब थी।

उसके बैंक खाते खाली थे।

अदालत में वह अपनी आँखें झुकाकर ऐसे खड़ा हुआ जैसे पूरी तरह बर्बाद आदमी हो, और ऐसे कागज़ जमा किए जिनसे वह लगभग बेघर दिख रहा था।

जज ने रकम कम कर दी।

लगभग न के बराबर।

मैं वहाँ अपना हैंडबैग पकड़े खड़ी रही, आदेश सुनती रही, और मुझे लगा मेरे भीतर कुछ मुड़कर टूट गया।

उसके बाद दो साल तक मैंने डबल शिफ़्ट की।

दिन में अकाउंट्स असिस्टेंट।

रात में एक क्लिनिक का बिलिंग काम।

मैंने स्कूल के रिमाइंडर आने पर मुस्कुराना सीख लिया।

मैंने फल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटना सीख लिया, ताकि दोनों बच्चों को लगे कि उन्होंने पर्याप्त खा लिया है।

मैंने “अगले महीने, बेटा” कहना सीख लिया, बिना अपनी आवाज़ टूटने दिए।

मेरे बच्चों को कभी पता नहीं चला।

मैं नहीं चाहती थी कि आरिव अपने पिता से नफ़रत करे।

मैं नहीं चाहती थी कि मिहिका चावल के दाने गिने और उसे बलिदान कहे।

इसलिए जब रुद्रवेश जन्मदिन भूल गया, मैंने उसकी तरफ़ से बहाना बनाया।

जब उसने देर से सस्ते उपहार भेजे, मैंने कहा, “कम से कम पापा को याद तो रहा।”

जब उसने बच्चों से कहा, “तुम्हारी माँ हमेशा पैसों को लेकर गुस्सा करती रहती है,” तो मैंने खून का घूँट पीकर चुप्पी साध ली।

फिर पिछले रविवार, इंसाफ़ मेरे बेटे की स्कूल टी-शर्ट पहनकर मेरी रसोई में चला आया।

आरिव और मिहिका अपने पिता के वीकेंड विज़िट से लौटे थे।

वे खुश थे।

यह भी चुभा, लेकिन मुझे राहत थी कि उन्होंने वह नहीं देखा था जो मैं जानती थी।

आरिव ने अपना बैग डाइनिंग कुर्सी के पास गिराया और कहा, “अम्मा, पापा हमें एक नए रेस्टोरेंट ले गए थे। देखो।”

उसने मुझे तस्वीरें दिखाईं।

पिज़्ज़ा।

मॉकटेल।

मिहिका का मज़ेदार चेहरा बनाना।

रुद्रवेश एक उदार पिता की तरह मुस्कुरा रहा था।

ठीक एक वीकेंड के लिए।

मैंने सिर हिलाया।

“अच्छा लग रहा है।”

फिर आरिव ने अगली तस्वीर पर स्वाइप किया।

“पापा ने मुझे यह बुधवार को भेजी थी,” उसने कहा। “यह जगह कहाँ है? कितनी सुंदर लग रही है।”

मैंने देखा।

और कटिंग बोर्ड के ऊपर मेरा हाथ जम गया।

वह रुद्रवेश था।

सफ़ेद लिनेन की शर्ट।

धूप का चश्मा।

सोने की घड़ी।

उसके आसपास दोस्त।

मेज़ पर वाइन की बोतलें।

उसके पीछे समुद्र की ओर खुलती एक चौड़ी छत।

यह कोई सस्ता समुद्र किनारा नहीं था।

यह कोई थका हुआ आदमी नहीं था जो बस गुज़ारा कर रहा हो।

यह एक अमीर आदमी था…

जो नमकीन समुद्री हवा में साँस ले रहा था, ऐसी जगह पर जिसे मेरे जैसे लोग ऑनलाइन खोजते हैं और फिर जल्दी से बंद कर देते हैं।

मैंने अपना चेहरा स्थिर रखा।

मेरा बेटा मुझे देख रहा था।

“अच्छी है ना?” उसने पूछा।

“बहुत अच्छी,” मैंने कहा।

“आपको पता है यह कहाँ है?”

“नहीं, बेटा,” मैंने झूठ बोला। “शायद गोवा।”

वह हँसा और अपना फ़ोन वापस ले लिया।

उस रात, जब दोनों बच्चे सो गए, मैं डाइनिंग टेबल पर अकेली बैठी रही।

वही मेज़…

जहाँ मैंने दूध के लिए सिक्के गिने थे।

वही मेज़…

जहाँ मैंने न भरे गए बिल रेसिपी की किताबों के नीचे छिपाए थे।

मैंने वह तस्वीर खोली जो आरिव ने मुझे भेजी थी।

मैंने ज़ूम किया।

पहले बोतलों पर।

फिर प्लेटों पर।

फिर रेलिंग पर।

फिर रुद्रवेश के धूप के चश्मे में दिख रहे प्रतिबिंब पर।

मेरी साँस बदल गई।

वहाँ…

उसके कंधे के पीछे आधा छिपा हुआ…

कुछ ऐसा था जिसे वह भेजना नहीं चाहता था।

एक नाम।

एक लोगो।

मेज़ पर रखे एक लक्ज़री रिज़र्वेशन कार्ड पर छपी तारीख़।

मैंने फिर से ज़ूम किया।

और इस बार…

मुझे साफ़ समझ आ गया कि मेरे बच्चों के हिस्से का पैसा कहाँ जा रहा था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.