
PART 1
7 साल का आरव मेहरा नीले रंग के महंगे बंदगले में पसीने से भीगा खड़ा था, लेकिन वह कार की सीट पर बैठने से ऐसे डर रहा था जैसे चमड़ा उसकी हड्डियां तोड़ देगा।
—ज्यादा कसकर मत पकड़ना उसे, रिया ने ठंडी आवाज में कहा। सुबह से नाटक कर रहा है।
अर्जुन मेहरा 3 महीने बाद दिल्ली लौटा था। दुबई, सिंगापुर और बेंगलुरु के बीच भागते हुए उसने अपनी साइबर सिक्योरिटी कंपनी का सबसे बड़ा सरकारी कॉन्ट्रैक्ट बचाया था। इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के निजी टर्मिनल से बाहर आते समय उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक बेचैन चमक थी—अपने बेटे को देखने की।
आरव काले वैन के पास खड़ा था। बाल तेल से चिपकाए हुए, जूते चमकते हुए, सफेद कुर्ते का कॉलर गले तक बंद। वह किसी शादी की फोटो के लिए तैयार बच्चे जैसा लग रहा था।
लेकिन उसका चेहरा फोटो जैसा नहीं था।
वह मुस्कुरा नहीं रहा था। दौड़कर नहीं आया। उसने “पापा” भी नहीं कहा। उसके दोनों हाथ शरीर से चिपके थे, उंगलियां कांप रही थीं, और नजरें जमीन पर टिकी थीं, जैसे सांस लेने की भी अनुमति मांगनी पड़ती हो।
अर्जुन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
—मेरा शेर… पापा आ गए।
आरव के होंठ कांपे। माथे से पसीने की एक बूंद कान तक उतर गई।
अर्जुन ने बाहें फैलाईं, लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियां बच्चे की पीठ से छुईं, आरव का पूरा शरीर अकड़ गया।
—आह…
वह चीख नहीं थी। चीख से भी कम। एक दबी हुई कराह, जैसे किसी बच्चे ने सीख लिया हो कि दर्द को निगल लेना ही सुरक्षित है।
रिया ने काला चश्मा उतारे बिना सांस छोड़ी।
—देखा? यही चल रहा है। तुम्हारे जाने के बाद से बस जिद, मुंह फुलाना और नकली दर्द।
अर्जुन ने उसे देखा। रिया क्रीम रंग की महंगी साड़ी में थी, हीरे के छोटे झुमके, हाथ में डिज़ाइनर बैग, चेहरे पर ऐसी सख्ती जैसे हर भावना उसके मेकअप को खराब कर देगी।
वैन में आरव फिर भी नहीं बैठा। वह दरवाजे की पकड़ थामे खड़ा रहा। एसी चल रहा था, फिर भी उसका माथा चमक रहा था।
—बैठ जाओ बेटा, अर्जुन ने धीरे से कहा।
आरव ने बहुत हल्का सिर हिलाया।
—मैं ऐसे ठीक हूं।
रिया हंस पड़ी।
—उसे पता है तुम्हें कैसे डराना है। तुम्हें मिस कर रहा था, अब तुम्हें सजा दे रहा है। बच्चे बहुत चालाक होते हैं।
अर्जुन चुप रहा। वह हर मोड़ पर आरव की सांस अटकते देख रहा था।
वसंत विहार वाले बंगले में सब कुछ वैसा ही था—सफेद संगमरमर, ताजे फूल, महंगे परदे, और ऐसा सन्नाटा जैसे घर नहीं, किसी पत्रिका का सेट हो। अर्जुन ने जर्मनी से लाए खिलौने सोफे के पास रखे—रोबोट, ट्रेन सेट, स्पेस की किताब, चॉकलेट।
1 सेकंड के लिए आरव की आंखों में हल्की रोशनी लौटी।
रिया ने उंगलियां चटकाईं।
—बैठो और पापा के साथ खेलो। मुझे 7 बजे निकलना है।
आरव ने आदेश माना।
उसने घुटने बहुत धीरे मोड़े। जैसे ही उसका शरीर कालीन से छुआ, उसके मुंह से टूटी हुई चीख निकली। वह एक तरफ गिर पड़ा।
अर्जुन उछलकर उसके पास पहुंचा।
—आरव!
रिया वहीं खड़ी रही, चिढ़ी हुई।
—बस, यही ड्रामा है।
अर्जुन ने कांपते हाथों से बेटे की बेल्ट ढीली की। तभी बदबू उठी। खट्टी, बंद, घुटी हुई। जैसे त्वचा को कई दिनों तक कैद रखा गया हो। जैसे बच्चा नहीं, कोई छिपाया हुआ घाव घर लाया गया हो।
जब अर्जुन ने कपड़ा उठाया, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
आरव की त्वचा सूजी हुई थी। लाल-भूरी जलन, पुराने जख्मों पर नई खरोंचें, कमर और जांघों पर रगड़ के निशान। महंगे बंदगले के नीचे उसका बेटा नाटक नहीं कर रहा था।
वह बचने की कोशिश कर रहा था।
—एम्बुलेंस बुलाओ! अर्जुन चीखा।
रिया एक कदम पीछे हटी।
—मुझे लगा बस रैशेज हैं…
अर्जुन ने आरव को उठाया, इतनी सावधानी से जैसे हाथों में बच्चा नहीं, टूटा हुआ कांच हो।
फिर रिया के पास से गुजरते हुए उसने दांत भींचकर कहा—
—कहीं मत जाना। इस बार जवाब तुम्हें देना पड़ेगा।
और उस चमकते बंगले की दीवारों के भीतर 3 महीने से जो छिपा था, वह अभी बाहर आना शुरू ही हुआ था।
PART 2
मैक्स साकेत के बच्चों वाले इमरजेंसी वार्ड के बाहर अर्जुन पूरी रात खड़ा रहा। नर्सें आती-जाती रहीं। आरव को ड्रिप लगी थी। रिया कोट ओढ़े फोन पकड़े बैठी थी, जैसे किसी पार्टी का इंतजार खराब हो गया हो।
डॉक्टर निधि अरोड़ा बाहर आईं। उनका चेहरा भारी था।
—मिस्टर मेहरा, आरव को गंभीर इन्फेक्शन है। लंबे समय तक सफाई की कमी, खतरनाक वजन घटना और कई पुराने घाव हैं। लेकिन एक बात और है।
अर्जुन की सांस रुक गई।
—कहिए।
—किसी ने हाल ही में उसकी त्वचा बहुत जोर से रगड़ी है। जैसे निशान मिटाने की कोशिश की गई हो। यह इलाज नहीं था। यह छिपाने की कोशिश थी।
अर्जुन ने धीरे से रिया की तरफ देखा।
रिया पीली पड़ गई।
—मैं घर से उसका पायजामा ले आती हूं।
—तुम यहीं रहोगी।
—तुम मुझे आदेश नहीं दे सकते।
वह निकल गई।
रात में बुखार में तपते आरव ने अर्जुन की उंगली पकड़कर बुदबुदाया—
—मम्मा… दरवाजा खोल दो… पानी पी लूंगा… आवाज नहीं करूंगा…
अर्जुन ने माथा चादर पर रख दिया।
सुबह आरव को दलिया दिया गया। वह ऐसे खाने लगा जैसे कोई छीन लेगा। पानी गिरा तो वह सिकुड़ गया।
—सॉरी… मैं साफ कर दूंगा…
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—भूख लगना गलती नहीं है, बेटा।
आरव सोया तो अर्जुन ने अपने पुराने सुरक्षा प्रमुख समीर को फोन किया।
—घर, कैमरे, पड़ोसी, स्टाफ, खर्चे—सब निकालो।
शाम 4:12 पर समीर का फोन आया।
—सर, पड़ोस वाली आंटी ने बहुत कुछ देखा है। और यह सिर्फ लापरवाही नहीं थी।
स्क्रीन पर सफेद बालों वाली बूढ़ी औरत आई।
अर्जुन समझ गया—उसके बेटे का बचपन किसी बंद दरवाजे के पीछे कैद था।
PART 3
मिसेज अरोड़ा उस गली में 32 साल से रहती थीं। उन्होंने मेहरा परिवार को बनते, टूटते, फिर पैसे की चमक में और ठंडा होते देखा था। वह हर ड्राइवर, हर माली, हर डिलीवरी बॉय और हर रात की आवाज पहचानती थीं। लेकिन पिछले 3 महीनों में जो उन्होंने देखा, वह उनके भीतर कांटे की तरह अटका रहा।
—मुझे पहले पुलिस को फोन करना चाहिए था, उन्होंने वीडियो कॉल पर रोते हुए कहा। मुझे शर्म आती है। लेकिन रिया कहती थी कि बच्चा बहुत जिद्दी है, उसे थेरेपी चल रही है, डॉक्टर ने कम खाना बताया है। घर में बड़े लोग आते थे, शराब, संगीत, सिक्योरिटी गार्ड… मैं डर गई थी।
अर्जुन अस्पताल के कॉरिडोर में खड़ा था। पीछे कांच के उस पार आरव सो रहा था।
—आपने क्या देखा?
मिसेज अरोड़ा ने पल्लू से आंख पोंछी।
—पहले तो लगा रिया बिजी रहती है। फिर पार्टियां शुरू हुईं। लगभग हर रात। बड़ी गाड़ियां, तेज म्यूजिक, हंसी, 3 बजे तक शोर। आपका बेटा कभी-कभी सुबह बगीचे में दिखता था। नंगे पैर। ठंड में भी। वह टेरेस के पास गिरे बिस्कुट उठाता था, कभी पेड़ के नीचे पड़े सड़े अमरूद।
अर्जुन ने दीवार पकड़ ली।
3 महीनों तक रिया उसे मैसेज भेजती रही थी—“आरव ने डिनर कर लिया”, “वह सो गया”, “आज वीडियो कॉल मत करना, वह इमोशनल हो जाता है”, “नई रूटीन से खुश है”।
वे सारे वाक्य अब झूठ नहीं, अपराध लग रहे थे।
—एक रात उसने किचन के पिछले दरवाजे पर बहुत धीरे दस्तक दी, मिसेज अरोड़ा बोलीं। किसी ने नहीं खोला। फिर उसने बाहर वाले नल से पानी पिया। वह कांप रहा था। मैंने दीवार के ऊपर से उसे 2 परांठे फेंके। उसने उन्हें टी-शर्ट में छिपा लिया। बस सिर झुकाकर धन्यवाद किया।
मिसेज अरोड़ा रो पड़ीं।
अर्जुन ने मुट्ठी मुंह पर रख ली। वह दुनिया की सबसे खतरनाक डिजिटल सेंध रोकने वाली कंपनी चलाता था, लेकिन अपने ही घर में लगाई गई क्रूरता की सेंध नहीं पहचान पाया।
समीर उसी शाम कोर्ट की अनुमति, पुलिस और अर्जुन की वकील अनन्या भसीन के साथ वसंत विहार वाले घर में दाखिल हुआ। रिया ने दरवाजे के कोड बदल दिए थे। पुरानी कामवाली शकुंतला को 2 महीने पहले निकाल दिया गया था। स्कूल की कैंटीन बंद करवाई गई थी, मेल में लिखकर—“आरव घर पर नियंत्रित आहार ले रहा है।”
घर में परफ्यूम, बासी शराब और महंगे कैटरिंग के बचे खाने की मिली-जुली गंध थी।
फ्रिज खोला गया तो उसमें आयातित चीज, वाइन की बोतलें, स्किन क्रीम, आधा केक और महंगी चॉकलेट थी। 7 साल के बच्चे के लिए कुछ नहीं। न दूध, न दही, न फल, न टिफिन का सामान।
आरव के कमरे में समीर कई मिनट चुप खड़ा रहा। फिर उसने अर्जुन को फोन किया।
—सर… मैं वीडियो पर नहीं दिखाना चाहता था।
—बोलो।
—बिस्तर के नीचे रैपर हैं। पुराने बिस्कुट, सूखी ब्रेड, पिज्जा की जली किनारियां। वह खाना छिपाकर रखता था।
अर्जुन अस्पताल की प्लास्टिक कुर्सी पर बैठ गया। आरव की पतली कलाई ड्रिप से जुड़ी थी। 7 साल का बच्चा भूख से बचने के लिए घायल जानवर की तरह राशन जमा करना सीख चुका था।
फिर लॉन्ड्री रूम से तौलिए मिले।
वे कूड़े के काले बैग में दबे थे। खुरदरे, गंदे, फर्श पोंछने वाले कपड़े। डॉक्टर निधि ने तस्वीरें देखकर कहा कि आरव की त्वचा पर जो ताजा रगड़ के निशान हैं, वे ऐसे ही खुरदरे कपड़े से हो सकते हैं।
—उसे साफ नहीं किया गया, डॉक्टर बोलीं। उसे पेश करने लायक बनाया गया। ताकि आप तुरंत सवाल न पूछें।
लेकिन असली डरावनी चीज रिया के बाथरूम की दराज से मिली।
नींद लाने वाली बूंदों की शीशी। दवा रिया के नाम पर थी, पर लगभग खाली।
समीर ने घरेलू कंप्यूटर से डिलीट किए गए चैट भी रिकवर किए।
“फिर रो रहा है।”
“8 बूंदें दे दो, सो जाएगा।”
“तुम सच में अपनी शाम इस बच्चे के कारण खराब करोगी?”
“सो गया। आ जाओ।”
दूसरी तरफ था कबीर मल्होत्रा—दिल्ली का आर्ट डीलर, जिसके साथ रिया पिछले 6 महीनों से दिख रही थी।
बैंक स्टेटमेंट ने बाकी सच उगल दिया। 3 महीनों में 78 लाख रुपये—डिज़ाइनर कपड़े, स्पा, जयपुर रिसॉर्ट, गोवा वीकेंड, हीरे का ब्रेसलेट, होटल सुइट, कबीर के नाम खरीदी शर्टें। जो पैसा अर्जुन आरव के लिए भेजता रहा, वह रिया की रातों की चमक में जल रहा था। उसी समय आरव बंद दरवाजे पर पानी मांग रहा था।
अर्जुन ने चीखा नहीं।
कुछ दर्द आवाज से आगे निकल जाता है।
उसने बस पूछा—
—कैमरे?
समीर कुछ पल चुप रहा।
—कुछ फुटेज डिलीट है, पर क्लाउड बैकअप बच गया है।
अर्जुन ने केवल 1 वीडियो देखा।
तारीख: 14 अप्रैल। समय: 2:26 रात।
पहली मंजिल का कॉरिडोर नीली हल्की रोशनी में डूबा था। आरव पायजामा पहने कमरे से निकला। वह दीवार पकड़कर चल रहा था। उसने रिया के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी।
1 बार।
2 बार।
3 बार।
दरवाजा नहीं खुला।
अंदर से संगीत, हंसी और ग्लास गिरने की आवाज आई। दरवाजे के नीचे रंगीन रोशनी कांप रही थी।
आरव वहीं खड़ा रहा। फिर वह धीरे-धीरे लिनेन क्लोजेट तक गया, दरवाजा खोला और चादरों के बीच घुस गया। उसने घुटने सीने से लगा लिए।
3:41 पर रिया बाहर निकली। उसके पीछे कबीर था। रिया के बाल खुले थे, हाथ में ग्लास था, वह हंस रही थी। वह उस क्लोजेट के सामने से गुजरी। उसका बेटा उससे 1 मीटर से भी कम दूर था।
उसने सिर भी नहीं घुमाया।
अर्जुन ने टैबलेट नीचे रख दिया। देर तक अपनी हथेलियों को देखता रहा। इन्हीं हाथों ने करोड़ों के सौदे साइन किए थे, मंत्रियों से हाथ मिलाए थे, दुनिया के डेटा बचाए थे। लेकिन ये हाथ उस रात वहां नहीं थे, जब उसका बेटा अंधेरे में 3 बार दरवाजा खटखटा रहा था।
अगली सुबह अर्जुन ने रिया को मैसेज किया—
“10 बजे अस्पताल आओ। आरव के मेडिकल पेपर साइन करने हैं।”
रिया ने 3 मिनट में जवाब दिया—
“ठीक है। जल्दी करना। 12:30 पर खान मार्केट में अपॉइंटमेंट है।”
10:08 पर रिया अस्पताल के मीटिंग रूम में दाखिल हुई। सफेद सूट, बड़े चश्मे, सधी हुई लिपस्टिक। लेकिन अंदर आते ही वह रुक गई।
मेज के एक छोर पर अर्जुन बैठा था। उसके साथ वकील अनन्या, डॉक्टर निधि, बाल कल्याण समिति की प्रतिनिधि, 2 पुलिस अधिकारी और महिला थाना की इंस्पेक्टर थीं।
—यह क्या तमाशा है? रिया ने कहा।
दरवाजा बंद हो गया।
अर्जुन नहीं उठा।
—बैठो।
—मैं उसकी मां हूं, अर्जुन। तुम मुझे अपराधी की तरह ट्रीट नहीं कर सकते।
अर्जुन ने मेडिकल फाइल उसकी तरफ सरका दी।
—आरव को भूखा रखा गया। इलाज नहीं दिया गया। घाव छिपाने के लिए उसकी त्वचा रगड़ी गई। उसे चुप रखने के लिए दवा दी गई।
रिया ने एक घबराई हुई हंसी निकाली।
—बकवास। डॉक्टर लोग हर चीज बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। उसकी स्किन सेंसिटिव है।
अर्जुन ने बैंक स्टेटमेंट रखे।
—78 लाख रुपये। होटल। जेवर। रिसॉर्ट। कबीर। लेकिन आरव के लिए 1 बाल रोग विशेषज्ञ की फीस नहीं। 1 कैंटीन बिल नहीं। 1 किराने की खरीद नहीं।
रिया का चेहरा कठोर हो गया।
—तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया था। 3 महीने! तुम अपने कॉन्ट्रैक्ट बचाते रहे। क्या मैं नौकरानी हूं? उसका खाना, उसका स्कूल, उसकी चुप्पी, उसकी रोना-धोना… मैं इस जिंदगी के लिए पैदा नहीं हुई थी।
बाल कल्याण समिति की महिला ने घृणा से कहा—
—आप 7 साल के बच्चे की बात कर रही हैं।
रिया ने मेज पर हाथ मारा।
—और मेरी? मेरा क्या? अर्जुन पैसे भेजकर समझता था जिम्मेदारी खत्म। सब मुझे परफेक्ट मां बनाना चाहते थे। मुझे भी सांस चाहिए थी।
अर्जुन ने टैबलेट चालू कर दिया।
वीडियो कमरे में फैल गया। आरव दरवाजे पर। आरव इंतजार करता हुआ। आरव क्लोजेट में। रिया बिना देखे निकलती हुई।
इस बार रिया चुप हो गई।
उसके होंठ हिले, पर शब्द नहीं निकले।
इंस्पेक्टर ने फाइल बंद की।
—रिया मेहरा, आपको नाबालिग बच्चे पर क्रूरता, देखभाल से वंचित रखने, बिना चिकित्सकीय जरूरत दवा देने और बच्चे के भरण-पोषण के पैसों के दुरुपयोग के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है।
—नहीं… रुको… अर्जुन, कुछ बोलो…
पुलिस आगे बढ़ी।
रिया ने उसकी तरफ देखा।
—वह मेरा भी बेटा है। उसे मां की जरूरत पड़ेगी।
अर्जुन पहली बार खड़ा हुआ।
—मां बच्चे को बगीचे के नल से पानी पीने नहीं छोड़ती, जबकि वह अंदर शैंपेन खोल रही हो। मां उसे दवा देकर चुप नहीं कराती। मां डर को साफ कपड़ों के नीचे नहीं छिपाती।
जब हथकड़ी लगी, रिया रोने लगी। लेकिन वे आंसू पछतावे के नहीं थे। वे उस औरत की घबराहट थे जिसका सजाया हुआ झूठ टूट गया था।
आरव ने उस दिन उसे नहीं पुकारा।
अर्जुन जब कमरे में लौटा, आरव जाग रहा था। वह पीली कंबल को सीने से लगाए पड़ा था, जो एक नर्स ने उसे दी थी।
—पापा?
अर्जुन धीरे से पास गया।
—हां, बेटा।
—वह वापस आएगी?
उसकी आवाज में गुस्सा नहीं था। बस डर था। ऐसा डर, जिसमें उम्मीद भी खतरा लगती है।
अर्जुन बिस्तर के किनारे बैठा, बिना छुए।
—नहीं। वह अब तुम्हें चोट नहीं पहुंचाएगी।
आरव ने लंबे समय तक उसे देखा।
—अगर मैं पानी गिरा दूं तो?
—तब भी नहीं।
—अगर मैं रोऊं तो?
—तब तो बिल्कुल नहीं।
—अगर मुझे भूख लगे?
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—तो हम खाना खाएंगे। जितनी बार भूख लगे।
आरव कुछ देर स्थिर रहा। फिर उसके दोनों हाथ बहुत धीरे उठे। अर्जुन ने उसे सीने से लगा लिया। वह कांप रहा था, लेकिन इस बार उसने “सॉरी” नहीं कहा। उसने अपना चेहरा नहीं छिपाया। उसने रोना रोकने की कोशिश नहीं की।
अगले महीने आसान नहीं थे।
आरव रात में चीखकर उठता। तकिए के नीचे ब्रेड छिपाता। फ्रिज खोलने से पहले पूछता—“ले सकता हूं?” दरवाजा बंद होने की आवाज पर सहम जाता। प्लेट गिरने पर चेहरा सफेद पड़ जाता। अर्जुन कई रातें उसके कमरे के फर्श पर बैठा रहा, सिर्फ यह दोहराते हुए कि कोई उसे बंद नहीं करेगा, कोई उसका खाना नहीं छीनेगा, कोई उसे दर्द होने पर सजा नहीं देगा।
अर्जुन ने सीखा कि अपराधबोध को खिलौनों से नहीं भरा जा सकता। उसने कंपनी की रोज की कमान छोड़ दी। बिजनेस चैनलों ने लिखा—“मेहरा समूह में संकट”, “सीईओ का निजी टूटना”, “उत्तराधिकारी कमजोर।” अर्जुन ने किसी को जवाब नहीं दिया।
उसने गुरुग्राम की चमकदार दुनिया छोड़कर देहरादून के पास एक शांत घर लिया। वहां छोटी रसोई थी, खुला आंगन था और आरव के कमरे का दरवाजा कभी लॉक नहीं होता था।
एक शाम आरव नई साइकिल चलाते हुए घास पर गिर पड़ा। बस घुटना मिट्टी से भर गया था, पैंट गंदी हो गई थी। लेकिन वह तुरंत सिकुड़ गया, दोनों हाथ सिर पर रख लिए।
अर्जुन 2 कदम दूर रुक गया।
—आरव, मेरी तरफ देखो। चोट लगी?
बच्चे ने उंगलियों के बीच से देखा।
—पैंट गंदी हो गई।
अर्जुन का सीना फिर टूट गया, मगर उसने मुस्कुराकर कहा—
—पैंट धुल जाती है। बच्चे गिरते हैं। तुमने कुछ गलत नहीं किया।
आरव चुप रहा। फिर उसने एक छोटी-सी हथेली आगे बढ़ाई।
अर्जुन ने वह हाथ पकड़ लिया।
वह स्पर्श किसी भी कॉन्ट्रैक्ट से बड़ा था।
उसने आरव को उठाया, उसे गले लगाया और अपनी महंगी शर्ट पर लगी मिट्टी को साफ नहीं किया।
बाद में दोनों आंगन में बैठे। आरव ने रोटी पर घी लगाया और आधी रोटी प्लेट में छोड़ दी। फिर डरते-डरते बोला—
—कल खा सकता हूं?
अर्जुन ने प्लेट उसकी तरफ सरकाई।
—यह घर तुम्हारा है। आज भी, कल भी।
आरव ने पहली बार बिना पूछे फ्रिज खोला। उसने पानी की बोतल निकाली। ढक्कन खोलते समय उसकी उंगलियां अब भी कांप रही थीं, लेकिन वह भागा नहीं।
अर्जुन दरवाजे से उसे देखता रहा।
उसे समझ आया कि न्याय सिर्फ रिया की गिरफ्तारी से शुरू नहीं हुआ था। न्याय हर सुबह शुरू होता था, जब एक घायल बच्चा थोड़ा-सा और भरोसा करता था कि दुनिया अब उसके खिलाफ बंद दरवाजा नहीं, बल्कि खुली रसोई, गर्म रोटी और इंतजार करती हुई एक सुरक्षित आवाज हो सकती है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.