
भाग 2
मुख्य दरवाज़े ऐसी आवाज़ के साथ खुले जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था।
न वह चरमराहट थी।
न हवा का झोंका।
कुछ ऐसा जैसे कोई धीरे से आत्मसमर्पण कर रहा हो।
शाम की ठंडी हवा रेस्तराँ में दाखिल हुई, अपने साथ फुटपाथ पर पड़ी बारिश की गंध लाती हुई।
कुछ ग्राहकों ने सिर उठाया।
पहले झुंझलाकर।
फिर उत्सुकता से।
मेत्रे डी इतनी तेज़ी से आगे बढ़ा कि वह लगभग एस्प्रेसो के कपों की ट्रे लिए एक वेटर से टकरा गया।
डेरेक बोलता ही जा रहा था।
—तिमाही रिपोर्टें, टैक्स रणनीति, एसेट स्ट्रक्चरिंग —वह उँगलियों पर गिनते हुए कह रहा था—। मॉरिसन इंडस्ट्रीज़ किसी को भी नौकरी नहीं देती। उनका सीईओ बेहद चुनिंदा है।
—मुझे यकीन है —मैंने कहा।
जेसिका आगे झुकी।
—क्या अलेक्ज़ेंडर मॉरिसन किसी अरबपति सूची में नहीं है?
—फोर्ब्स —डेरेक ने कहा, मानो अपनी खुशी छिपाने की कोशिश कर रहा हो—। कई बार।
माँ की आँखें उसी खास दिलचस्पी से चमक उठीं जो उन्हें अमीर अविवाहित पुरुषों और दूसरों के विशाल घरों में होती थी।
—क्या उसकी शादी हो चुकी है?
डेरेक ने मुँह बनाया।
—नहीं, लेकिन अब शुरू मत हो जाओ।
—क्या? —माँ ने मासूमियत से कहा—। मैं तो बस पूछ रही थी।
जेसिका ने मेरी ओर देखा और ऐसी मुस्कान दी जिससे मेरी त्वचा में खुजली होने लगी।
—शायद वह कला संग्रह करता हो। शायद नताली उसे कोई फूलदान बेच सके।
—मैं फूलदान नहीं बनाती —मैंने कहा।
—तो कटोरा ही सही।
डेरेक हँसा।
—अलेक्ज़ेंडर मॉरिसन जैसा आदमी कबाड़ी बाज़ार के कटोरे नहीं खरीदता।
हमारे चारों ओर रेस्तराँ की आवाज़ें बदलने लगीं।
बातचीत धीमी हो गई।
लोगों के हाथों में उठे गिलास रुक गए।
प्रवेश द्वार के पास कहीं किसी महिला ने फुसफुसाकर कहा—
—क्या वही है?
पिताजी ने आवाज़ की दिशा में देखा और सीधे बैठ गए।
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मुझे पहले से पता था कि अलेक्ज़ेंडर मॉरिसन के किसी कमरे में प्रवेश करने की लय कैसी होती है।
वह अहंकार नहीं था।
अहंकारी लोग ध्यान माँगते हैं।
अलेक्ज़ेंडर को कभी माँगना नहीं पड़ता था।
ध्यान अपने आप उसकी ओर खिंच जाता था।
जैसे लोहे के बुरादे चुंबक की ओर।
जब मैं उससे पहली बार मिली थी, वह जनवरी के तूफ़ान में भीगा हुआ गहरे भूरे रंग का कोट पहनकर मेरे वेयरहाउस आया था।
वह मेरी अधूरी कांस्य मूर्ति के सामने सत्ताईस मिनट तक खड़ा रहा।
बिना कुछ बोले।
ज़्यादातर अमीर संग्राहक बहुत बोलते हैं।
वे कलाकारों को यह जताना चाहते हैं कि वे पीड़ा, सुंदरता, इतिहास और बाज़ार को समझते हैं।
अलेक्ज़ेंडर ने सिर्फ़ इतना कहा था—
—ऐसा लगता है जैसे इसे कुछ याद है, जिसे मैं भूल चुका हूँ।
उसी पल मुझे पता चल गया था कि वह खतरनाक है।
पैसे की वजह से नहीं।
इसलिए कि वह देखता था।
मेरे परिवार जैसे लोग कीमत देखते थे।
करियर।
पड़ोस।
जींस पर लगे दाग।
अलेक्ज़ेंडर दबाव बिंदु देखता था।
खाली जगहें।
खामोशी का भार।
—नताली।
उसकी आवाज़ उसके पहुँचने से पहले मेरे पास आ गई।
गर्म।
मनोरंजित।
और कमरे के लिए थोड़ी ज़्यादा ऊँची।
माँ वाइन का गिलास हवा में थामे जम गईं।
डेरेक बीच वाक्य में रुक गया।
मैं मुड़ी।
अपने चेहरे पर आश्चर्य का भाव लाते हुए।
हालाँकि मुझे पहले से उसके आने का एहसास हो चुका था।
अलेक्ज़ेंडर मॉरिसन भोजन कक्ष पार करते हुए हमारी ओर आया।
उसने नेवी रंग का सूट पहना था जिसकी कीमत शायद रेस्तराँ के एक महीने के किराए जितनी होगी।
उसके कनपटियों पर चाँदी जैसी सफेदी झलक रही थी।
मुझे देखते ही उसके चेहरे का भाव नरम पड़ गया।
और सबसे पहले इसी चीज़ ने मेज़ पर तबाही मचाई।
उसकी प्रसिद्धि ने नहीं।
स्टाफ़ की घबराहट ने नहीं।
बल्कि उसकी मुस्कान में दिखती स्पष्ट आत्मीयता ने।
—मेरी पसंदीदा मूर्तिकार —उसने कहा।
डेरेक का काँटा उसके हाथ से फिसलकर प्लेट से टकराया।
धातु की वह छोटी-सी आवाज़ पूरे सन्नाटे में गूँज गई।
—अलेक्ज़ेंडर —मैंने खड़े होते हुए कहा।
वह मेरे पास आया और यूरोपीय अंदाज़ में हल्के से मेरे गाल पर चुंबन दिया।
उससे देवदार, बारिश और एयरपोर्ट लाउंज की हल्की खुशबू आ रही थी।
—तुमने कहा था कि परिवार के साथ डिनर है —उसने कहा—। यह नहीं बताया था कि यहाँ है।
—मुझे नहीं पता था कि तुम यहाँ आओगे।
—मुझे भी नहीं पता था, जब तक कि एक निवेशक ने यह न सोच लिया कि वह तीन अरब डॉलर की समस्या डक कॉन्फी खाते-खाते हल कर सकता है।
उसकी नज़र मेज़ पर घूमी।
—क्या मैं बैठ सकता हूँ?
मेरा परिवार उसे ऐसे घूर रहा था जैसे संग्रहालय के दर्शकों को अचानक पता चल गया हो कि मूर्ति साँस ले रही है।
सबसे पहले माँ संभलीं।
लगभग अपना पानी का गिलास गिराते हुए।
—बिल्कुल। कृपया। मिस्टर मॉरिसन, यह हमारे लिए सम्मान की बात है।
—अलेक्ज़ेंडर —उसने कहा।
डेरेक इतनी तेजी से खड़ा हुआ कि उसकी कुर्सी फर्श पर घिसट गई।
—मिस्टर मॉरिसन। डेरेक मॉरिसन। मॉरिसन अकाउंटिंग। हमारी कल बात हुई थी।
अलेक्ज़ेंडर ने विनम्रता से उसे देखा।
—हाँ। अकाउंटेंट।
डेरेक की मुस्कान आधे सेकंड के लिए तन गई।
उसे किसी एक काम तक सीमित कर दिए जाने की आदत नहीं थी।
—दुनिया कितनी छोटी है —डेरेक ने कहा।
—लोग जितनी समझते हैं, उससे भी छोटी।
अलेक्ज़ेंडर फिर मेरी ओर मुड़ा।
—उम्मीद है मैं बीच में नहीं आया।
—आए हो —डेरेक ने जल्दी से कहा, फिर हँसा जैसे वह आकर्षक बनने की कोशिश कर रहा हो—। लेकिन कृपया, बीच में आइए।
किसी के कहने से पहले ही वेटर एक कुर्सी लेकर आ गया।
अलेक्ज़ेंडर मेरे बगल में बैठा।
डेरेक के बगल में नहीं।
एक और छोटी तबाही।
माँ बार-बार हम दोनों को देख रही थीं।
पिताजी चुप हो गए थे, जिसका मतलब था कि उनके दिमाग में संख्याएँ घूम रही थीं।
जेसिका मेरी जींस की ओर देखती, फिर अलेक्ज़ेंडर के हाथ की ओर जो आराम से मेरे पानी के गिलास के पास रखा था।
मानो वह दृश्य उसे अपमानजनक लग रहा हो।
—तो —अलेक्ज़ेंडर ने नैपकिन खोलते हुए कहा—। आप लोग नताली का परिवार हैं।
—हाँ —माँ ने कहा—। हमें उस पर बहुत गर्व है।
मैं लगभग हँस पड़ी।
यह झूठ इतना नाज़ुक और हास्यास्पद था कि हवा में तैरता हुआ महसूस हो रहा था।
अलेक्ज़ेंडर की नज़र मेरी ओर गई।
बहुत देर तक नहीं।
बहुत स्पष्ट भी नहीं।
लेकिन उसने देख लिया।
—यह सचमुच अद्भुत होगा —उसने कहा—। किसी कलाकार को खुद में बदलते हुए देखना बहुत दुर्लभ सौभाग्य है।
डेरेक ने गला साफ़ किया।
—नताली हमेशा से बहुत… रचनात्मक रही है।
यह शब्द गीले तौलिये की तरह मेज़ पर गिरा।
अलेक्ज़ेंडर मुस्कुराया।
—रचनात्मक।
उसने दोहराया।
—इसे कहने का यह भी एक तरीका है।
जेसिका बातचीत में शामिल होने को बेताब होकर आगे झुकी।
—हम अभी नताली की कला के बारे में ही बात कर रहे थे।
—सच?
—हाँ —डेरेक ने तुरंत संभलते हुए कहा—। मैंने हमेशा उसे बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया है।
मैं अपने भाई को घूरती रही।
वह पलक तक नहीं झपकाया।
यही उसकी असली प्रतिभा थी।
न अकाउंटिंग।
न नेटवर्किंग।
बल्कि इतिहास बदल देना।
वह पूरी ज़िंदगी को दोबारा रंग सकता था जबकि कैनवास अभी भी गीला हो।
अलेक्ज़ेंडर का चेहरा अब भी विनम्र था।
—कितना उदार।
माँ की मुस्कान हल्की काँपी।
—नताली हमें सब कुछ नहीं बताती। वह बहुत निजी स्वभाव की है।
—अच्छे कलाकार ऐसे ही होते हैं —अलेक्ज़ेंडर ने कहा—। बहुत सारे लोग उनके हिस्सों पर मालिकाना हक़ जमाने की कोशिश करते हैं।
वह वाक्य मेरे सीने के भीतर उतर गया।
आख़िरकार पिताजी बोले।
—और आप हमारी बेटी को आखिर जानते कैसे हैं?
मेज़ पर एक अजीब-सा सन्नाटा उतर आया।
अलेक्ज़ेंडर ने शांति से अपना पानी उठाया।
—पेशेवर रूप से —उसने कहा।
डेरेक थोड़ा ढीला पड़ा।
जेसिका निराश दिखी।
माँ की आँखों में एक नई और कहीं ज़्यादा ख़तरनाक उम्मीद चमक उठी।
फिर अलेक्ज़ेंडर ने गिलास नीचे रखा और कहा—
—हालाँकि मुझे लगता है कि यह शब्द उस चीज़ के लिए बहुत छोटा है जो वह बना रही है।
मेरे नैपकिन के नीचे रखा फोन फिर कंपन करने लगा।
A.M.: Should I behave?
मैंने संदेश देखा।
फिर डेरेक की ओर देखा, जिसने कुछ देर पहले वेटरों के सामने मुझे गरीब कहा था।
मैंने एक शब्द टाइप किया।
No.
अलेक्ज़ेंडर की मुस्कान इतनी हल्की बदली कि सिर्फ़ मैं ही समझ सकती थी।
वह मेरे परिवार की ओर मुड़ा।
उसकी विनम्रता उजली थी।
और घातक।
—मुझे बताइए —उसने कहा—। क्या नताली ने आपको कभी मॉरिसन एट्रियम का पहला मॉडल दिखाया था?
डेरेक पलक झपकाने लगा।
माँ का माथा सिकुड़ गया।
पिताजी की उँगलियाँ काँटे पर कस गईं।
और तभी मुझे एक अजीब, ठंडी उत्तेजना महसूस हुई।
वह रहस्य जिसे मैंने वर्षों तक छिपाकर रखा था, अब एक शानदार सिलवाए हुए सूट में हमारे सामने बैठा था।
और पूछ रहा था कि क्या अब उसे अपना परिचय दे देना चाहिए।