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पति दूसरी औरत के लिए घर छोड़ गया, लेकिन जब पत्नी ने बिना रोए तलाक भेजा, तो उसे पता चला कि जिस कंपनी पर वह घमंड करता था, उसकी असली मालकिन वही थी

भाग 1

राघव ने रविवार की सुबह नाश्ते की मेज पर अपनी 2 बेटियों के सामने घोषणा कर दी कि वह घर छोड़कर जा रहा है, क्योंकि उसकी जिंदगी में कोई और औरत आ चुकी थी।

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स्टील की थाली में रखा आलू का पराठा ठंडा हो गया। छोटी बेटी मीरा ने चम्मच रोक दिया और बड़ी बेटी तारा ने पिता की तरफ ऐसे देखा जैसे उसने कोई मजाक सुना हो, पर राघव के चेहरे पर मजाक नहीं था। वह सफेद कमीज पहने खड़ा था, उसके पास चमड़े का बैग रखा था, जैसे वह पहले से तय करके आया हो कि आज से यह घर उसका नहीं रहेगा।

अनन्या ने बस चाय का प्याला नीचे रखा। न कोई चीख, न रोना, न हाथ जोड़ना।

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राघव को यही बात सबसे ज्यादा चुभी।

—तुम कुछ कहोगी नहीं? —उसने पूछा।

अनन्या ने शांत आवाज में कहा—

—क्या कहूं?

—कम से कम पूछो तो सही कि कौन है वह।

—जरूरत नहीं।

राघव की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे लगा था अनन्या टूट जाएगी, बेटियों के सामने उसका रास्ता रोकेगी, सास को फोन करेगी, मोहल्ले में शोर होगा। मगर वह इतनी शांत थी कि राघव को अपनी जीत भी हार जैसी लगने लगी।

—तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता?

अनन्या ने उसकी आंखों में देखकर कहा—

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—जिस आदमी ने सालों पहले मन से घर छोड़ दिया था, आज बस सामान लेकर जा रहा है। फर्क किस बात का पड़े?

तारा की आंखों में पानी भर आया।

—पापा, आप सच में नहीं रहेंगे हमारे साथ?

राघव ने नजरें फेर लीं।

—मैं तुम दोनों से मिलने आता रहूंगा।

मीरा ने धीमे से पूछा—

—क्या मम्मी ने कुछ गलत किया?

कमरे में कुछ पल के लिए ऐसी खामोशी छा गई, जिसमें घड़ी की टिक-टिक भी भारी लग रही थी। राघव जवाब नहीं दे पाया। अनन्या ने बेटियों की प्लेट आगे सरका दी।

—नाश्ता खत्म करो। कल स्कूल है।

राघव तिलमिला गया।

—बस? इतने साल की शादी का यही जवाब है?

—शादी एक इंसान अकेले नहीं बचा सकता, राघव।

—तुम्हारा यह घमंड ज्यादा दिन नहीं चलेगा।

—यह घमंड नहीं, थकान है।

वह बैग उठाकर दरवाजे तक गया, फिर मुड़ा। उसे उम्मीद थी कि आखिरी पल में अनन्या टूट जाएगी। मगर वह बेटियों के बाल सहला रही थी।

—मुझे मत फोन करना जब पछताओ।

अनन्या ने बिना आवाज ऊंची किए कहा—

—नहीं करूंगी। कृपया दरवाजा धीरे से बंद करना।

राघव चला गया।

उस रात वह गुरुग्राम के एक आलीशान फ्लैट में काव्या के पास पहुंचा। काव्या ने मुस्कुराकर दरवाजा खोला।

—आखिरकार, अब छिपना नहीं पड़ेगा।

लेकिन राघव का चेहरा बुझा हुआ था।

—उसने क्या किया? रोई? चिल्लाई? बेहोश हुई? —काव्या ने उत्सुकता से पूछा।

—कुछ नहीं।

—मतलब?

—वह बस बैठी रही। जैसे उसे फर्क ही नहीं पड़ा।

काव्या की मुस्कान फीकी पड़ गई।

उसी वक्त राघव के फोन पर स्कूल से कॉल आया। अगले दिन पिता-बेटी नाश्ते का कार्यक्रम था। तारा और मीरा ने सबको बताया था कि उनके पापा जरूर आएंगे।

राघव ने फोन काटा तो काव्या ने ठंडी आवाज में पूछा—

—अब तुम वापस जाओगे?

राघव ने कहा—

—वे मेरी बेटियां हैं।

काव्या ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा—

—या अनन्या अभी भी तुम्हारे दिमाग में है?

और पहली बार राघव को समझ नहीं आया कि वह जवाब किसे दे रहा था।

भाग 2

अगली सुबह स्कूल के मैदान में रंग-बिरंगे गुब्बारे लगे थे। पिता अपनी बेटियों के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे थे। तारा बार-बार गेट की तरफ देख रही थी। मीरा की उंगलियां उसकी फ्रॉक के किनारे को मरोड़ रही थीं।

जब राघव अंदर आया, दोनों बच्चियां दौड़कर उससे लिपट गईं।

—पापा आ गए!

राघव ने उन्हें बांहों में भर लिया, मगर उसकी नजर अनायास गेट पर चली गई। अनन्या हल्की नीली साड़ी में आई। चेहरा शांत था, आंखें साफ थीं। वह किसी छोड़ी हुई औरत जैसी नहीं, अपने आप में खड़ी औरत जैसी लग रही थी।

एक मां ने धीरे से कहा—

—इनकी पत्नी हैं? बहुत गरिमा है इनमें।

राघव के चेहरे पर अजीब बेचैनी आ गई।

तभी काव्या स्कूल के मैदान में दाखिल हुई। चमकदार कुर्ता, तेज चाल और आंखों में चुनौती।

—मैं तुम्हें सहारा देने आई हूं, राघव।

राघव फुसफुसाया—

—यहां आने की क्या जरूरत थी?

काव्या की आवाज ऊंची हो गई—

—जरूरत इसलिए थी क्योंकि तुम्हारी पूर्व पत्नी अभी भी नाटक कर रही है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

तारा का चेहरा सफेद पड़ गया। मीरा ने पूछा—

—पापा, क्या यही वो आंटी हैं जिनकी वजह से आप घर छोड़कर गए?

चारों तरफ नजरें मुड़ गईं।

अनन्या आगे आई। उसने बेटियों को अपने पीछे किया और शांत स्वर में काव्या से कहा—

—अगर तुम जीत चुकी हो, तो अब भी लड़ क्यों रही हो?

काव्या तड़प गई।

—क्योंकि तुम झूठ बोल रही हो। तुम्हें छोड़ा गया है।

अनन्या ने पहली बार हल्की मुस्कान के साथ कहा—

—नहीं। मुझे छोड़ा नहीं गया। मुझे मुक्त किया गया है।

राघव ठिठक गया।

तभी घोषणा हुई कि पिता-बेटी तस्वीरों के लिए मंच पर आएं। तारा ने धीरे से कहा—

—मम्मी, हम घर चलें?

अनन्या ने राघव की तरफ देखा।

—आज का दिन तुम्हारे अहंकार का नहीं, तुम्हारी बेटियों का है। अगर कुछ सुधारना है, तो पहले उनकी तस्वीर बचाओ।

राघव बेटियों को लेकर मंच की ओर गया, लेकिन उसके कानों में सिर्फ अनन्या की आवाज गूंज रही थी—

“मुझे मुक्त किया गया है।”

उसी शाम राघव को तलाक के कागज मिले।

अनन्या ने एक दिन पहले ही अर्जी दाखिल कर दी थी।

भाग 3

राघव ने तलाक के कागजों को इतनी देर तक देखा कि कागज के कोने उसकी उंगलियों से मुड़ गए। वह काव्या के फ्लैट की खिड़की के पास खड़ा था। नीचे गुरुग्राम की रोशनियां चमक रही थीं, लेकिन उसके भीतर अंधेरा उतर रहा था।

काव्या ने सोफे से पूछा—

—क्या लिखा है?

—अनन्या ने तलाक दाखिल कर दिया।

—तो अच्छी बात है। यही तो चाहते थे तुम।

राघव ने धीमे से कहा—

—उसने मुझसे बात तक नहीं की।

काव्या हंस पड़ी, लेकिन वह हंसी नरम नहीं थी।

—बात? तुम घर छोड़कर आए, उसके बच्चों के सामने उसे तोड़ा, दूसरी औरत के पास रहने लगे, और अब तुम्हें शिकायत है कि उसने तुमसे सलाह नहीं ली?

राघव ने जवाब नहीं दिया।

अगले दिन उसके पास अधिवक्ता सिन्हा का फोन आया।

—श्री राघव मल्होत्रा, आपकी पत्नी ने गुजारा भत्ता लेने से इंकार किया है। वह आपसे कोई मासिक सहायता, कोई निजी खर्च, कोई अलग समझौता नहीं चाहतीं।

राघव चौंक गया।

—कुछ भी नहीं?

—कुछ भी नहीं।

—यह गलती है।

—नहीं। दस्तावेज पूरी तरह साफ हैं।

—मैं अनन्या से बात करना चाहता हूं।

—अब सभी बातचीत कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से होगी।

फोन कट गया।

राघव के लिए यह तलाक से बड़ा झटका था। उसने सोचा था अनन्या दुखी होगी, गुस्से में होगी, पैसों को लेकर झगड़ा करेगी, बच्चों के नाम पर उसे फोन करेगी। मगर उसने दरवाजा बंद कर दिया था, और बंद दरवाजे के पीछे से कोई आवाज नहीं आ रही थी।

उसी शाम राघव अपनी मां सावित्री देवी के साथ अनन्या के घर पहुंच गया। वही दक्षिण दिल्ली का बंगला, वही तुलसी का गमला, वही दरवाजा जिसके भीतर कभी वह खुद को राजा समझता था।

दरवाजा अनन्या ने खोला। तारा और मीरा पीछे कमरे में थीं।

सावित्री देवी अंदर घुसते ही बोलीं—

—बहू, यह क्या तमाशा है? मेरा बेटा गुस्से में घर से चला गया तो तुमने तलाक लगा दिया?

अनन्या ने उन्हें बैठने का इशारा किया।

—चाय लाऊं?

—चाय नहीं चाहिए। जवाब चाहिए। मर्दों से गलती हो जाती है। घर की औरतें घर बचाती हैं।

अनन्या ने शांत स्वर में कहा—

—गलती एक बार होती है, मांजी। आदत बार-बार होती है।

सावित्री देवी की आंखें फैल गईं।

—तुम्हारी यही जबान है, इसलिए दूसरी औरत घर में आई। मेरे बेटे ने तुम्हें सब दिया। यह घर, गाड़ी, नौकर, नाम, इज्जत। उसके बिना तुम्हारे पास क्या है?

राघव ने धीमे से कहा—

—मां, रहने दीजिए।

—नहीं, आज सच बोलने दो। बहू, 2 बेटियां हैं तुम्हारी। जिद छोड़ो। मेरे बेटे से माफी मांगो। वह चाहे तो तुम्हें वापस रख सकता है।

अनन्या ने पहली बार जोर से सांस छोड़ी। वह हंसी नहीं, पर उसके चेहरे पर अजीब-सी करुणा आई।

—आप लोग सचमुच मानते हैं कि मैं यहां रखी गई थी?

सावित्री देवी बोलीं—

—और क्या? मेरे बेटे ने तुम्हें उठाकर रानी बना दिया।

अनन्या ने घड़ी देखी।

—अच्छा हुआ आप दोनों आ गए। बस 2 मिनट में वह व्यक्ति भी आ जाएगा जो यह बात खत्म कर देगा।

राघव ने पूछा—

—कौन?

उसी पल दरवाजे की घंटी बजी।

अधिवक्ता सिन्हा अंदर आए। उनके हाथ में फाइल थी। अनन्या ने उन्हें बैठक में बैठाया।

—चूंकि आज मेरे भविष्य पर चर्चा हो रही है, बेहतर है कि बात भावनाओं से नहीं, कागजों से हो।

राघव चिढ़ गया।

—यह नाटक बंद करो, अनन्या।

सिन्हा ने फाइल खोली।

—यह नाटक नहीं, स्वामित्व का विवरण है।

सावित्री देवी बोलीं—

—किस चीज का स्वामित्व?

सिन्हा ने चश्मा ठीक किया।

—मल्होत्रा इंफ्रा एंड फूड्स प्राइवेट लिमिटेड का।

राघव का चेहरा कड़ा हो गया।

—मेरी कंपनी का इसमें क्या लेना-देना?

अनन्या ने सीधा जवाब दिया—

—तुम्हारी कंपनी?

सिन्हा ने पन्ना आगे सरकाया।

—कृपया पृष्ठ 3 देखिए। 51% हिस्सेदारी श्रीमती अनन्या मल्होत्रा के नाम है। नियंत्रक अधिकार भी इन्हीं के पास हैं।

कमरे में जैसे हवा रुक गई।

सावित्री देवी ने फाइल छीनकर देखी।

—यह झूठ है।

—दस्तावेज पंजीकृत हैं, —सिन्हा ने कहा। —शुरुआती पूंजी, विस्तार का खर्च, जयपुर वाला अधिग्रहण, पुणे की शाखा, और 2 बार कंपनी को घाटे से निकालने वाला निवेश, सब श्रीमती अनन्या के निजी निवेश खातों से आया था।

राघव के होंठ सूख गए।

—अनन्या…

—नहीं, मेरा नाम उस आवाज में मत लो, —अनन्या ने कहा। —10 साल तक मैंने सुना कि तुमने मुझे बनाया। 10 साल तक तुम्हारी मां ने रिश्तेदारों के सामने कहा कि मैं तुम्हारे पैसों पर जीती हूं। तुम्हारे दोस्त मजाक में कहते थे कि मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे तुम मिले। मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मुझे घर बचाना था। बेटियों को पिता के साथ बड़ा करना था। मैं हर रात खुद को समझाती थी कि शायद एक दिन तुम बदलोगे।

राघव कुर्सी पर बैठ गया।

अनन्या की आवाज कांपी, मगर टूटी नहीं।

—तुम देर रात आते रहे, मैं चुप रही। तुम्हारे फोन पर संदेश देखे, मैं चुप रही। तुम्हारे झूठ पकड़े, मैं चुप रही। काव्या का नाम पहली बार नहीं सुना मैंने। बहुत पहले से जानती थी। लेकिन मैंने अपनी बच्चियों के लिए सहा। सोचा घर टूटेगा तो तारा और मीरा का मन टूट जाएगा।

सावित्री देवी ने बीच में बोलना चाहा, मगर अनन्या ने हाथ उठा दिया।

—आज नहीं। आज कोई मुझे रोकेगा नहीं।

कमरे के दरवाजे पर तारा और मीरा खड़ी थीं। शायद वे पानी लेने आई थीं, पर अब सब सुन रही थीं। अनन्या ने उन्हें देखा, फिर अपनी आवाज और नरम कर ली।

—तलाक मैंने इसलिए नहीं दाखिल किया कि तुम दूसरी औरत के पास गए। वह तो बहुत पहले हो चुका था। तलाक मैंने इसलिए दाखिल किया क्योंकि तुमने हमारी बेटियों को उनके स्कूल में शर्मिंदा कर दिया। उस दिन मीरा ने मुझसे पूछा कि क्या बच्चे उसे चिढ़ाएंगे। तारा ने पूछा कि क्या अब सब हमारे घर की बातें करेंगे। मैं जवाब नहीं दे पाई। उसी दिन समझ गई कि मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं, लेकिन अपनी बेटियों की आंखों में तुम्हारे कारण आई शर्म को नहीं।

राघव ने धीमे से कहा—

—मैंने जानबूझकर नहीं किया।

—इरादे घाव नहीं भरते, राघव। नतीजे भरते हैं या उन्हें सड़ने देते हैं।

तारा धीरे से बोली—

—मम्मी, क्या हमें इस घर से जाना पड़ेगा?

अनन्या ने तुरंत सिर हिलाया।

—नहीं। यह घर हमारा है।

मीरा ने पूछा—

—और पापा?

कमरे में कोई उत्तर नहीं था।

अनन्या ने बच्चियों को अपने पास बुलाया।

—तुम्हारे पापा तुम्हारे पापा रहेंगे। लेकिन अब यह घर डर से नहीं चलेगा। यहां कोई दरवाजा धड़ाम से बंद नहीं करेगा। कोई हंसी को रोक नहीं देगा। कोई यह नहीं जताएगा कि प्यार भी एहसान है।

राघव ने पहली बार अपनी बेटियों के चेहरे सचमुच देखे। तारा उससे दूर खड़ी थी। मीरा मां की साड़ी का पल्लू पकड़े थी। उन्हें वह आदमी नहीं दिख रहा था जो घर का मालिक था। उन्हें वह आदमी दिख रहा था जिसने उनके नाश्ते की सुबह बिगाड़ी, स्कूल का दिन बिगाड़ा, और अब सच के सामने छोटा पड़ गया था।

सिन्हा ने अगला दस्तावेज खोला।

—कंपनी में पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। श्रीमती अनन्या नियंत्रक निदेशक के रूप में अधिकार ग्रहण करेंगी। श्री राघव की भूमिका अब बोर्ड की समीक्षा के अधीन होगी।

सावित्री देवी लगभग चीख पड़ीं—

—मेरे बेटे को उसकी ही कंपनी से निकालोगी?

अनन्या ने थकी हुई आंखों से उन्हें देखा।

—नहीं। मैं सिर्फ वह वापस ले रही हूं जो मैंने चुपचाप बचाया था।

राघव के पास कोई शब्द नहीं था।

अनन्या ने दरवाजे की ओर इशारा किया।

—अब आप लोग जाइए। बच्चियों को खाना खाना है।

सावित्री देवी ने गुस्से से पल्लू संभाला और बाहर चली गईं। राघव दरवाजे तक गया, फिर मुड़ा।

—क्या सच में इतना खत्म हो गया?

अनन्या ने जवाब दिया—

—खत्म तो बहुत पहले हो गया था। आज बस तुम्हें पता चला।

राघव घर से बाहर निकला तो आंगन में लगे आम के पेड़ के नीचे कुछ पत्ते गिर रहे थे। कभी इसी पेड़ के नीचे उसने तारा को साइकिल चलाना सिखाया था। कभी मीरा ने वहीं मिट्टी में हाथ गंदे करके उसके लिए छोटा-सा घर बनाया था। आज वही घर उसके लिए बंद हो चुका था।

जब वह काव्या के फ्लैट पहुंचा, रात गहरी हो चुकी थी। काव्या दरवाजे पर ही खड़ी थी।

—क्या हुआ?

राघव ने जूते उतारे बिना कहा—

—कंपनी अनन्या की है। ज्यादातर हिस्सा उसी के नाम है।

काव्या का चेहरा बदल गया।

—क्या?

—उसने सब में पैसा लगाया था। शुरुआत से।

कुछ पल के लिए काव्या चुप रही। फिर वह हंसी, पर इस बार वह हंसी तिरस्कार से भरी थी।

—मतलब जिस सफलता पर तुम मुझे भरोसा दिलाते रहे, वह तुम्हारी थी ही नहीं?

राघव ने सिर झुका लिया।

—मैंने मेहनत की थी।

—पर नींव उसकी थी।

राघव ने काव्या की ओर देखा।

—तुम क्या कहना चाहती हो?

काव्या अंदर गई, अलमारी खोली और अपना बैग निकालने लगी।

—मैं घर जा रही हूं।

—यह भी तुम्हारा घर है।

—नहीं, राघव। यह तो मुझे लगा था कि मेरी जिंदगी का उन्नत रास्ता है। अब लग रहा है मैं किसी टूटे हुए आदमी की मरम्मत करने बैठ गई थी।

—काव्या, तुम भी?

वह मुड़ी।

—अनन्या ने तुम्हें इसलिए छोड़ा क्योंकि तुमने उसे झूठ, अपमान और अकेलापन दिया। मैं जा रही हूं क्योंकि तुमने मुझे झूठी तस्वीर दिखाई। फर्क समझो।

राघव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन काव्या पीछे हट गई।

—सबसे मजेदार बात पता है? मैं सोचती थी अनन्या तुम्हारे बिना कुछ नहीं। सच यह निकला कि तुम उसके बिना कुछ साबित करने में लगे थे। वह तो पहले ही मजबूत थी, इसलिए उसने तुम्हें रोका नहीं।

—काव्या…

—नहीं। तुमने एक ऐसी औरत छोड़ी जिसने तुम्हें बनाया, संभाला, छिपाया और अंत में गरिमा से जाने दिया। और तुम इंतजार करते रहे कि वह रोए, ताकि तुम्हें लगे कि तुम अभी भी महत्वपूर्ण हो। यही तुम्हारी हार है।

काव्या चली गई।

फ्लैट में पहली बार सचमुच सन्नाटा था। न अनन्या की चाय की आवाज, न बेटियों की हंसी, न घर की वह हलचल जिसे राघव ने कभी बोझ समझा था। उसने फोन उठाया और अनन्या का नंबर खोला। फिर याद आया, अब सभी बात वकीलों के जरिए होगी।

उधर अनन्या ने उसी रात बेटियों के साथ फर्श पर बैठकर खाना खाया। तारा ने पहली बार खुलकर हंसी। मीरा ने कहा—

—मम्मी, आज घर हल्का लग रहा है।

अनन्या ने दोनों को अपने करीब कर लिया।

बाहर दिल्ली की रात में दूर कहीं ट्रैफिक की आवाज थी, लेकिन उस घर के भीतर एक नई शांति जन्म ले चुकी थी। अनन्या ने खिड़की बंद की, बेटियों को चादर ओढ़ाई और धीरे से बत्ती बुझा दी।

राघव ने उसी रात सब कुछ नहीं खोया था। उसने बस पहली बार देखा था कि जिसे वह अपनी परछाई समझता था, वही असल रोशनी थी। और जब तक उसे यह समझ आया, रोशनी ने उसके लिए दरवाजा बंद कर दिया था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.