भाग 1
दरवाजे पर खड़ी रिसेप्शनिस्ट ने जब गौरी को सिर से पांव तक देखकर हंसते हुए कहा, “तुम राजीव मेहरा की पत्नी हो तो मैं प्रधानमंत्री की बेटी हूं,” तो पूरे ऑफिस की लॉबी में सन्नाटा छा गया।
गौरी के हाथ में गरम आलू पराठों का डिब्बा था, माथे पर छोटी सी बिंदी, बालों में चमेली का गजरा और आंखों में वही भोला भरोसा, जिसके सहारे वह बिहार के अपने छोटे से गांव से दिल्ली आई थी। उसने धीमे से कहा, “दीदी, सच में, राजीव मेरे पति हैं। उन्होंने ही कहा था कि कभी भी आ जाना।”
रिसेप्शनिस्ट ने होंठ टेढ़े किए। “बिना अपॉइंटमेंट? और तुम? देखो लड़की, बड़े आदमी का नाम लेकर अंदर घुसने की कोशिश मत करो। तुम ज्यादा से ज्यादा उनकी कोई फैन लगती हो।”
गौरी के गले में कुछ अटक गया। शादी को 6 महीने हुए थे, पर शहर की चमक में वह अब भी गांव की मिट्टी जैसी ही सादी थी। राजीव मेहरा, दिल्ली का बड़ा बिल्डर, वही आदमी जिसने उसे गांव के मेले में पहली बार देखा था, जब गौरी अपनी मां के साथ फूल बेच रही थी। राजीव की मां ने रिश्ता करवाया था, पर राजीव ने हमेशा कहा था, “मैंने तुम्हें किसी मजबूरी में नहीं, अपने मन से चुना है।”
गौरी ने कांपते हाथों से फोन मिलाया। “राजीव जी… नीचे कोई मुझे आपकी पत्नी मान ही नहीं रहा।”
कुछ ही मिनट में लिफ्ट खुली और राजीव तेज कदमों से बाहर आया। उसका चेहरा गुस्से से लाल था। उसने सबके सामने गौरी का हाथ पकड़ा और कहा, “ये मेरी पत्नी है। इस ऑफिस की मालकिन। किसी गरीब घर की बेटी को देखकर उसकी इज्जत छोटी मत समझिए।”
रिसेप्शनिस्ट का चेहरा उतर गया। गौरी की आंखें भर आईं, मगर राजीव ने उसे अपने केबिन में ले जाकर पराठा खाया और बच्चे की तरह खुश हो गया। “तुमने बनाया?”
गौरी मुस्कुराई। “यूट्यूब देखकर। पिछली बार खिचड़ी जल गई थी न, इसलिए इस बार पूरी कोशिश की।”
राजीव ने प्यार से कहा, “जो चाहो मांगो।”
गौरी ने बिना सोचे कहा, “एक बच्चा।”
राजीव चुप हो गया। “अभी नहीं। तुम्हारी पढ़ाई पहले। कॉलेज में एडमिशन लिया है, तुम पढ़ोगी।”
गौरी का चेहरा बुझ गया, लेकिन उसने सिर हिला दिया।
कुछ दिनों बाद कॉलेज शुरू हुआ। वहां एक लड़के ने उसका रास्ता रोककर कहा, “तुम शादीशुदा नहीं लगतीं। दोस्ती कर लो।” गौरी डर गई, पर राजीव ने उसे समझाया। उसी रात उसने सोचा, राजीव उसके लिए इतना करता है, बदले में वह क्या करती है?
अगली सुबह उसने राजीव की महंगी कार धोनी शुरू की। बाहर से धोकर उसने अंदर भी बाल्टी भर साबुन वाला पानी डाल दिया। सीटों से पानी टपकने लगा, स्क्रीन बंद हो गई, कार की लाइटें झिलमिलाने लगीं।
राजीव ने देखा तो चीख पड़ा, “तुम्हें पता है ये कार कितने की है? क्या तुम इसे खरीद सकती हो?”
गौरी का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने बस इतना कहा, “हां, मैं गरीब हूं। मुझे आपकी चीजों को छूना नहीं चाहिए था।”
और उसी रात गौरी ने अपना छोटा बैग पैक कर लिया।
भाग 2
राजीव ने जब कमरे के कोने में रखा गौरी का बैग देखा, उसका गुस्सा पलभर में टूट गया। गौरी फर्श पर बैठी रो रही थी। “मैं बस आपकी मदद करना चाहती थी। गांव में चीज धोते हैं तो पूरी धोते हैं। मुझे क्या पता कार के अंदर पानी नहीं डालते।”
राजीव ने माथा पकड़ लिया। उसने कार की मरम्मत पर 12 लाख खर्च किए थे, लेकिन उससे ज्यादा चोट उसे गौरी की बात से लगी थी। उसने पहली बार समझा कि उसकी खामोशी ने गौरी को डरा दिया था।
“तुम मेरी पत्नी हो, नौकरानी नहीं,” उसने धीरे से कहा। “तुम्हें मुझे खुश करने के लिए कुछ साबित नहीं करना।”
गौरी ने रोते हुए पूछा, “तो आप मुझे छोड़ेंगे नहीं?”
राजीव ने उसे सीने से लगा लिया। “तुम चली गईं तो मेरे इतने बड़े घर में सिर्फ खाली दीवारें बचेंगी।”
अगली सुबह गौरी को चक्कर आया। उल्टियां रुक नहीं रही थीं। राजीव घबरा गया और उसे अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो, आपकी पत्नी 1 महीने की गर्भवती हैं।”
गौरी की आंखें चमक उठीं। राजीव चुप था। वह खुश था, मगर डर भी गया था। गौरी अभी कॉलेज शुरू ही कर रही थी। उसका शरीर कमजोर रहने लगा, फिर भी वह पढ़ना चाहती थी।
रात को रसोई में बैठकर वह इमली, आइसक्रीम, भेलपुरी और आम का अचार एक साथ खा रही थी। राजीव ने माथा पीट लिया। “ये कैसा खाना है?”
गौरी बोली, “आपकी बेटी को यही चाहिए।”
“बेटी,” राजीव मुस्कुराया। “मुझे भी बेटी ही चाहिए।”
गौरी ने तुरंत कहा, “मुझे बेटा चाहिए। मैं अकेली आपकी राजकुमारी रहूंगी।”
महीने बीतते गए। गौरी कॉलेज जाती, क्लास की अंग्रेजी से परेशान होती, फोन में लेक्चर रिकॉर्ड करती और रात को राजीव से पढ़ती। टेस्ट में उसे 80% मिले। राजीव ने पूरे घर में मिठाई बंटवाई।
लेकिन एक डर धीरे-धीरे गौरी के मन में उतरने लगा। राजीव आधी रात को फोन लेकर बाहर जाने लगा। वह कमरे से निकलकर धीमी आवाज में बात करता। गौरी का मन कांपता। एक रात उसने पूछ ही लिया, “क्या आपकी जिंदगी में कोई और है?”
राजीव ने उसका चेहरा पकड़कर कहा, “तुम्हें सच बहुत जल्द पता चल जाएगा। बस मुझ पर भरोसा रखो।”
अगले दिन राजीव उसे तैयार करवाकर एक बड़े बैंक्वेट हॉल में ले गया। दरवाजा खुलते ही सब चिल्लाए, “सरप्राइज!”
गौरी जड़ हो गई। पूरा हॉल उसके नाम, बच्चे की तस्वीरों और फूलों से सजा था। रंगीन गुब्बारे फूटे और गुलाबी धुआं उठा।
राजीव रो पड़ा। “हमारी बेटी आ रही है।”
गौरी मुस्कुराई, मगर तभी उसके पेट में तेज दर्द उठा।
भाग 3
पहले तो गौरी ने दर्द छिपाने की कोशिश की। उसने होंठ भींचकर कुर्सी पकड़ ली, क्योंकि वह राजीव का सरप्राइज खराब नहीं करना चाहती थी। इतने लोगों के बीच वह डर दिखाना नहीं चाहती थी। मगर दूसरी लहर इतनी तेज थी कि उसके मुंह से चीख निकल गई। राजीव ने जैसे ही उसकी हथेली ठंडी महसूस की, उसके चेहरे की सारी खुशी डर में बदल गई।
“गौरी, सांस लो। मेरी तरफ देखो,” वह घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया।
गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया। “राजीव जी… लगता है हमारी बेटी को पार्टी पसंद नहीं आई।”
लोगों के बीच हल्की हंसी फैली, लेकिन राजीव की आंखों में आंसू आ गए। उसने तुरंत डॉक्टर को फोन किया, कार मंगवाई और गौरी को अस्पताल ले गया। रास्ते भर वह उसके माथे पर हाथ रखे रहा। गौरी बीच-बीच में आंखें बंद करती तो वह घबरा जाता।
“सोना मत, गौरी। मुझसे बात करो।”
“इतने डरपोक हो गए हैं आप?” गौरी ने दर्द के बीच मुस्कुराने की कोशिश की।
“तुम्हारे मामले में मैं सबसे बड़ा डरपोक हूं,” राजीव ने कहा। “पैसे, बिजनेस, जमीन, सब हार सकता हूं, पर तुम्हें नहीं।”
अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने बताया कि अभी असली डिलीवरी का समय नहीं आया था, मगर कमजोरी और तनाव से शरीर पर असर पड़ा था। गौरी को भर्ती कर लिया गया। राजीव पूरी रात उसके बेड के पास बैठा रहा। उसकी मां सावित्री देवी और गौरी की मां कमला देवी सुबह-सुबह गांव से पहुंचीं। दोनों के चेहरे पर चिंता थी, मगर गौरी ने उन्हें देखते ही बच्ची की तरह हाथ फैला दिए।
सावित्री देवी ने राजीव को अलग ले जाकर डांटा। “तू बड़ा आदमी बन गया, पर गर्भवती औरत का मन समझना अभी नहीं सीखा। बच्चा सिर्फ पेट में नहीं पलता, पूरे घर के व्यवहार में पलता है।”
राजीव ने सिर झुका लिया। वह जानता था, मां सही कह रही थी। उसने गौरी को सुरक्षित रखने के नाम पर सबको दूर रखा, पर इसी दूरी ने उसे अकेला बना दिया था। वह उसे हर चीज देना चाहता था, लेकिन कभी-कभी साथ देना भूल जाता था।
अगले कुछ हफ्तों में घर बदल गया। सावित्री देवी ने गौरी के लिए देसी घी के लड्डू बनाए, कमला देवी ने सत्तू, दाल-पूड़ी और आम का मीठा अचार तैयार किया। राजीव ने ऑफिस से लंबी छुट्टी ले ली। वह सुबह उसके पैरों की सूजन दबाता, दोपहर में कॉलेज के नोट्स पढ़कर सुनाता और रात में बच्चे से बातें करता।
गौरी ने पढ़ाई छोड़ने से साफ मना कर दिया। “बेटी आएगी तो उसे बताऊंगी कि उसकी मां डरकर नहीं बैठी थी।”
राजीव ने उसकी कॉपियां उठाईं। “फिर मैं भी बताऊंगा कि उसके पिता ने अकाउंटिंग पढ़ते-पढ़ते हार मान ली थी।”
गौरी हंस पड़ी। उसकी हंसी वापस आ रही थी। वही हंसी जिसने राजीव को पहली बार गांव के मेले में रोक लिया था।
लेकिन कहानी यहीं आसान नहीं हुई। डिलीवरी से 3 हफ्ते पहले रात को गौरी को फिर दर्द उठा। इस बार वह अलग था। बारिश तेज थी। सड़क पर पानी भर गया था। राजीव ने उसे गोद में उठाकर कार तक पहुंचाया। कमला देवी पीछे से भगवान का नाम लेती रहीं और सावित्री देवी डॉक्टर से फोन पर बात करती रहीं।
अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “हमें तुरंत तैयारी करनी होगी।”
राजीव के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने गौरी का हाथ पकड़ा, मगर नर्सों ने उसे बाहर रोक दिया। गौरी अंदर जाते-जाते मुड़ी। “राजीव जी, अगर मैं रोऊं तो आप बाहर से डांटना मत।”
राजीव की आंखें भर आईं। “तुम रो सकती हो। बस वापस आ जाना।”
ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा बंद हुआ और राजीव की दुनिया वहीं रुक गई। घड़ी की टिक-टिक उसके सीने पर हथौड़े जैसी लग रही थी। सावित्री देवी चुपचाप माला फेर रही थीं। कमला देवी कुर्सी पर बैठी अपनी साड़ी का पल्लू मसल रही थीं। राजीव पहली बार इतना असहाय था। इतने सालों में उसने करोड़ों के सौदे किए थे, अदालतें देखी थीं, धोखे खाए थे, जमीनें बचाई थीं, पर उस दरवाजे के बाहर खड़े होकर उसे लगा कि आदमी कितना भी अमीर हो, जिनसे प्यार करता है, उनके सामने बिल्कुल गरीब हो जाता है।
करीब 2 घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। राजीव खड़ा भी नहीं हो पाया, बस दीवार पकड़ ली।
डॉक्टर मुस्कुराए। “मां और बच्ची दोनों सुरक्षित हैं।”
राजीव की आंखों से आंसू बह निकले। वह बैठ गया, जैसे किसी ने उसके कंधों से पहाड़ उतार दिया हो। सावित्री देवी ने भगवान को धन्यवाद दिया। कमला देवी रोते हुए बोलीं, “मेरी बच्ची मां बन गई।”
जब राजीव को कमरे में जाने दिया गया, गौरी थकी हुई थी, मगर उसकी बाहों में एक छोटी सी बच्ची लिपटी थी। बच्ची की मुट्ठी बंद थी, चेहरा गुलाबी, आंखें बंद। राजीव धीरे से पास गया। उसे डर लग रहा था कि कहीं वह इस नन्ही जान को छूते ही रो न पड़े।
गौरी ने फुसफुसाकर कहा, “देखिए, आपकी राजकुमारी आ गई। अब मेरी पदवी चली गई।”
राजीव ने झुककर उसके माथे को चूमा। “नहीं। अब मेरे घर में 2 राजकुमारियां हैं।”
गौरी की आंखें भीग गईं। “आप सच में खुश हैं?”
“इतना खुश कि डर लग रहा है कहीं सपना न हो।”
राजीव ने बच्ची की उंगली छुई। नन्ही उंगली ने उसकी उंगली कसकर पकड़ ली। उसी क्षण राजीव टूट गया। वह रो पड़ा, बिना शर्म, बिना रोक। उसने कहा, “तुम दोनों ने मुझे नया आदमी बना दिया।”
कुछ दिनों बाद घर लौटने पर पूरा घर फूलों से सजा था। गांव से आए लोगों ने ढोलक बजाई। कॉलेज की गौरी की दोस्तें भी आईं। वही रिसेप्शनिस्ट, जिसने कभी उसे अपमानित किया था, अब फूलों का गुलदस्ता लेकर खड़ी थी। उसने झुककर कहा, “मैम, उस दिन मैंने बहुत गलत किया था।”
गौरी ने बच्ची को गोद में संभालते हुए मुस्कुराकर कहा, “गलती से आदमी छोटा नहीं होता, गलती के बाद भी अकड़ में रहे तो छोटा होता है।”
रिसेप्शनिस्ट की आंखें झुक गईं। राजीव ने गर्व से गौरी की तरफ देखा। वह गांव की वही भोली लड़की थी, पर अब उसकी आवाज में अपना सम्मान था।
नामकरण के दिन राजीव ने बेटी का नाम “आराध्या” रखा। सावित्री देवी ने पूछा, “क्यों?”
राजीव ने कहा, “क्योंकि इसके आने से मुझे समझ आया कि प्रेम पूजा जैसा होता है। जिसे निभाया जाता है, दिखाया नहीं जाता।”
कुछ महीने बाद गौरी फिर कॉलेज जाने लगी। कभी बच्ची को दादी संभालती, कभी नानी, कभी राजीव मीटिंग छोड़कर घर आ जाता। लोग बातें बनाते थे। कोई कहता, “इतने बड़े घर की बहू पढ़ने जाती है?” कोई कहता, “बच्चा हुआ है, अब पढ़ाई की क्या जरूरत?” मगर गौरी हर बात सुनकर मुस्कुरा देती।
एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर उसका नाम फिर आया। इस बार भी उसने अच्छे अंक पाए। वह घर लौटी तो राजीव ने आराध्या को गोद में लेकर ताली बजाई। “देखो बेटा, तुम्हारी मां फिर जीत गई।”
गौरी ने बच्ची को चूमकर कहा, “मैं इसलिए नहीं पढ़ रही कि लोग मुझे बड़ा समझें। मैं इसलिए पढ़ रही हूं कि मेरी बेटी कभी खुद को छोटा न समझे।”
राजीव ने उसकी तरफ देखा। उसे याद आया वह दिन जब ऑफिस में किसी ने गौरी को उसकी पत्नी मानने से इनकार कर दिया था। उसे कार वाला दिन याद आया, जब गुस्से में उसने गरीब होने का ताना दे दिया था। उसे वह बैग याद आया, जिसमें गौरी ने अपने कपड़े रख लिए थे। और अब वही गौरी उसके घर की धड़कन थी।
उस रात आराध्या सो चुकी थी। गौरी खिड़की के पास बैठी थी। बाहर दिल्ली की रोशनियां चमक रही थीं। राजीव उसके पास आया और धीमे से बोला, “तुम्हें पता है, मैंने तुमसे शादी करके तुम्हें शहर नहीं दिया। तुमने मुझे घर दिया।”
गौरी ने उसकी तरफ देखा। “और आपने मुझे डर से बाहर निकाला।”
राजीव ने उसका हाथ पकड़ लिया। “अब कभी बैग पैक मत करना।”
गौरी मुस्कुराई। “अब नहीं। अब मेरा सामान बहुत बढ़ गया है। पति, बेटी, किताबें, सपने… सब साथ लेकर जाना पड़ेगा।”
दोनों हंस पड़े। कमरे में आराध्या की हल्की सी आवाज गूंजी। राजीव ने उसे उठाया, और गौरी ने किताब बंद कर दी।
उस छोटे से कमरे में उस रात कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ, कोई नाटकीय वादा नहीं किया गया। बस एक आदमी, एक औरत और उनकी बेटी थे। गांव की मिट्टी, शहर की इमारतें, गलती, माफी, पढ़ाई, डर, प्रेम—सब मिलकर एक घर बन चुके थे।
और यही घर गौरी की सबसे बड़ी जीत था।
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