
PART 1
“अगर तुम्हारी बेटी प्यार से नहीं सुधरती, तो उसे मिट्टी के नीचे बैठाकर डराना ही पड़ेगा,” यह पहला वाक्य था जो मेजर अर्जुन प्रताप सिंह ने रात के 3 बजे अपने लखनऊ वाले घर का दरवाज़ा खोलते ही सुना।
अरुणाचल सीमा पर तैनाती अचानक रद्द हो गई थी। अर्जुन 3 दिन पहले लौट आया था। उसने पत्नी नंदिनी को खबर नहीं दी, क्योंकि वह अपनी 7 साल की बेटी मीरा को चौंकाना चाहता था।
लेकिन घर में प्रवेश करते ही उसका उत्साह बेचैनी में बदल गया। बैठक में जूठी प्लेटें पड़ी थीं, सोफे पर कपड़े बिखरे थे और मेज़ पर शराब की आधी खाली बोतल रखी थी। मुख्य दरवाज़ा भीतर से बंद भी नहीं था।
ऊपर शयनकक्ष में नंदिनी गहरी नींद में थी। उसके पास खाली गिलास पड़ा था।
अर्जुन सीधे मीरा के कमरे में गया।
बिस्तर अस्वाभाविक रूप से साफ था। मीरा का नीला हाथी वाला खिलौना गायब था। उसकी छोटी गुलाबी चप्पलें भी नहीं थीं।
अर्जुन ने नंदिनी को झकझोरकर उठाया।
—मीरा कहाँ है?
नंदिनी ने घबराकर आँखें खोलीं।
—तुम आज कैसे आ गए? तुम्हें तो शुक्रवार को आना था।
—मैंने पूछा, मेरी बेटी कहाँ है?
—माँ के संस्कार केंद्र में है। मंगलवार से वहीं है।
अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया। नंदिनी की माँ, सावित्री देवी, बाराबंकी के बाहर एक पुराने खेत में “बाल संस्कार आश्रम” चलाती थी। वह दावा करती थी कि वहाँ जिद्दी बच्चों को अनुशासन सिखाया जाता है।
—तुमने उसे वहाँ क्यों भेजा?
—वह बहुत बदतमीज़ हो गई थी। खाना नहीं खाती थी, जवाब देती थी और हर समय तुम्हें बुलाती थी। माँ बच्चों को संभालना जानती हैं।
अर्जुन बिना एक और शब्द बोले निकल गया।
40 मिनट बाद उसकी गाड़ी खेतों से घिरे उस आश्रम के सामने रुकी। पूरी इमारत की बत्तियाँ जल रही थीं। सावित्री देवी दरवाज़े पर पहले से खड़ी थी।
—नंदिनी ने बता दिया था कि तुम आ रहे हो।
—मीरा कहाँ है?
—वह अपने व्यवहार पर विचार कर रही है। सुबह ले जाना।
अर्जुन उसे धकेलकर भीतर घुसा।
—कहाँ है मेरी बेटी?
सावित्री ने पीछे के आँगन की ओर इशारा किया।
अर्जुन मोबाइल की रोशनी में आगे बढ़ा। गीली मिट्टी के बीच उसे किसी बच्चे की सिसकी सुनाई दी।
फिर उसने वह गड्ढा देखा।
कमर से भी गहरे उस संकरे गड्ढे में मीरा भीगी रात की पोशाक पहने काँप रही थी। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे।
—पापा…
अर्जुन नीचे कूद गया और उसे सीने से लगा लिया।
—मैं आ गया हूँ। अब कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।
मीरा उसके गले से चिपक गई।
—नानी ने कहा, बुरी लड़कियाँ मिट्टी में सोती हैं।
अर्जुन उसे ऊपर लेकर आया। तभी मीरा ने उसका चेहरा दोनों हथेलियों में पकड़कर फुसफुसाया—
—पापा, दूसरा गड्ढा मत देखना।
कुछ दूरी पर लकड़ी की पट्टियों से ढका एक और गड्ढा था। अर्जुन ने एक पट्टी हटाई।
भीतर बच्चों के छोटे कपड़े, हड्डियाँ और चाँदी की एक पायल पड़ी थी, जिस पर नाम खुदा था—“काव्या मिश्रा।”
अर्जुन ने काँपते हाथों से तस्वीरें खींचीं।
तभी मीरा रोते हुए बोली—
—पापा, घर के अंदर और भी बच्चे हैं… और नानी ने कहा था कि आज सुबह उनमें से 2 को कहीं भेज दिया जाएगा।
PART 2
पुलिस पहुँचने से पहले अर्जुन ने लोहे का ताला तोड़कर 4 बच्चों को एक अँधेरे कमरे से निकाला। वे पतली चटाइयों पर बैठे थे। किसी ने सहायता के लिए पुकारा तक नहीं। उनके चेहरों पर वह खामोशी थी जो लंबे अत्याचार के बाद पैदा होती है।
तहखाने में 7 और बच्चे मिले। किसी के शरीर पर पुराने नीले निशान थे, किसी को कई दिनों से पूरा भोजन नहीं मिला था। वे “घुटनों वाली प्रार्थना”, “भूखा कमरा” और “अहंकार का गड्ढा” जैसे नाम दोहरा रहे थे।
सुबह तक आँगन से 4 कब्रें मिल चुकी थीं।
चिकित्सक ने बताया कि मीरा को हल्का शीताघात, चोटें और गंभीर मानसिक आघात था। सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के बाद उसने अर्जुन से पूछा—
—क्या मुझे फिर मम्मी के पास जाना पड़ेगा?
अर्जुन की साँस अटक गई।
—क्या तुम्हारी मम्मी जानती थीं कि नानी तुम्हें गड्ढे में डालती हैं?
मीरा ने सिर झुका लिया।
—मम्मी ने कहा था कि नानी मेरा पापा वाला प्यार तोड़ देंगी।
उसी समय पुलिस अधीक्षक का फोन आया।
—अर्जुन, सावित्री ने बयान दिया है। नंदिनी केवल जानती नहीं थी। वह हर बच्चे को आश्रम भेजने के बदले पैसे लेती थी।
PART 3
अर्जुन कुछ क्षण तक फोन कान से लगाए खड़ा रहा। सामने बिस्तर पर मीरा अपने नीले हाथी वाले खिलौने को सीने से लगाए बैठी थी। खिलौना आश्रम के एक बंद संदूक से मिला था। उसकी एक आँख उखड़ी हुई थी और कपड़े पर सूखी मिट्टी चिपकी थी।
—कितने बच्चे? —अर्जुन ने धीमी आवाज़ में पूछा।
पुलिस अधीक्षक विक्रम चौहान ने उत्तर देने से पहले गहरी साँस ली।
—अभी तक 18 परिवारों के नाम मिले हैं। सावित्री का कहना है कि नंदिनी माता-पिता से बात करती थी। उन्हें भरोसा दिलाती थी कि 3 महीने में बच्चा शांत और आज्ञाकारी होकर लौटेगा। हर प्रवेश पर उसे हिस्सा मिलता था।
—सावित्री झूठ भी बोल सकती है।
—हमने नंदिनी के बैंक खाते देखे हैं। पिछले 2 वर्षों में नियमित जमा हुए हैं। रकम कभी 20,000, कभी 35,000 और कभी 50,000 रुपये। भेजने वाले अधिकतर उन्हीं बच्चों के माता-पिता हैं जो आश्रम में रह चुके हैं।
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। वह चाहता था कि यह आरोप झूठा निकले। वह चाहता था कि नंदिनी सिर्फ लापरवाह हो, लालची नहीं; मूर्ख हो, निर्दयी नहीं। लेकिन मीरा का एक वाक्य उसके भीतर हथौड़े की तरह बज रहा था—“मम्मी ने कहा था कि नानी मेरा पापा वाला प्यार तोड़ देंगी।”
वह उसी शाम पुलिस के साथ अपने घर पहुँचा।
नंदिनी बैठक में अपनी बड़ी बहन रश्मि के साथ बैठी थी। उसके चेहरे पर भय था, लेकिन अर्जुन को उसमें पछतावा दिखाई नहीं दिया।
—मीरा कहाँ है? —नंदिनी ने उठते हुए पूछा—मुझे उससे मिलना है।
—तुम उससे नहीं मिलोगी।
—मैं उसकी माँ हूँ।
—माँ वह होती है जो बच्चे को खतरे से बचाती है। तुमने उसे खतरे के हाथों बेच दिया।
रश्मि चौंककर नंदिनी की ओर देखने लगी।
—बेच दिया? अर्जुन, तुम क्या कह रहे हो?
अर्जुन ने मेज़ पर बैंक विवरण फेंक दिया।
—यह पैसे किस बात के थे?
नंदिनी की आँखें कागज़ों पर दौड़ीं। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
—माँ ने दिए थे।
—क्यों?
—घर के खर्चों के लिए।
—हमारे घर का खर्च मेरी तनख्वाह से चलता था। तुम्हारे निजी खाते में 11 लाख रुपये कहाँ से आए?
नंदिनी के होंठ काँपे।
—मैंने कुछ परिवारों को माँ के केंद्र के बारे में बताया था। बस इतना ही।
—कितने परिवार?
—मुझे याद नहीं।
—बच्चों की संख्या कोई सब्ज़ियों की सूची नहीं है कि याद न रहे।
रश्मि ने कठोर स्वर में कहा—
—नंदिनी, सच बोलो।
—शायद 15… या 20।
कमरे में ऐसी चुप्पी छा गई जैसे किसी ने हवा रोक दी हो।
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
—आँगन में 4 बच्चों के अवशेष मिले हैं।
नंदिनी की टाँगें काँपने लगीं। वह कुर्सी पर बैठ गई।
—मुझे मृत बच्चों के बारे में नहीं पता था।
—लेकिन तुम्हें मारपीट के बारे में पता था?
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
—तुम्हें भूखा रखने के बारे में पता था?
नंदिनी ने चेहरा फेर लिया।
—तुम्हें गड्ढों के बारे में पता था?
—माँ उन्हें सिर्फ डराती थीं। उन्होंने कहा था कि बच्चों को कुछ समय मिट्टी में बैठाने से उनका अहंकार टूटता है।
रश्मि ने घृणा से पीछे हटते हुए कहा—
—और तुमने अपनी बेटी को वहाँ भेज दिया?
नंदिनी अचानक चिल्लाने लगी—
—मैं थक गई थी! अर्जुन महीनों घर से बाहर रहता था। मीरा हर बात पर पापा-पापा करती थी। मेरी बात सुनती ही नहीं थी। माँ ने कहा था कि उसका लगाव अस्वस्थ है।
अर्जुन की आवाज़ बहुत शांत हो गई।
—उसने रात के खाने में क्या अपराध किया था?
नंदिनी ने भौंहें सिकोड़ लीं।
—क्या?
—मीरा ने बताया कि उस दिन उसने लौकी खाने से मना किया था और कहा था कि वह मुझे याद कर रही है। क्या यही उसका अपराध था?
नंदिनी रोने लगी।
—मैंने सोचा था माँ उसे 2-3 दिन में ठीक कर देंगी।
—तुम उसे ठीक नहीं कराना चाहती थीं। तुम चाहती थीं कि उसका मन तोड़ दिया जाए, ताकि वह सवाल करना बंद कर दे।
तभी महिला पुलिस अधिकारी आगे बढ़ी और नंदिनी को जाँच में सहयोग करने के लिए थाने चलने को कहा। नंदिनी ने अर्जुन की बाँह पकड़ने की कोशिश की।
—तुम मुझे गिरफ्तार होने दोगे? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ।
अर्जुन ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
—और वह मेरी बेटी है।
जाँच के तीसरे दिन आश्रम के पीछे बने गायों के पुराने बाड़े की फर्श तोड़ी गई। नीचे से काले रंग की 3 डायरियाँ, दर्जनों सहमति-पत्र, नकद भुगतान के हिसाब और बच्चों की तस्वीरें मिलीं।
हर बच्चे के नाम के सामने कारण लिखा था।
“पढ़ाई में कमजोर।”
“मोबाइल चलाता है।”
“माँ की दूसरी शादी का विरोध करता है।”
“पिता के व्यापार के बारे में अधिक जानता है।”
“घर में हुई मारपीट पड़ोसी को बताई।”
मीरा के नाम के सामने लिखा था—
“पिता से अत्यधिक लगाव। माँ की सत्ता स्वीकार नहीं करती। कठोर सुधार आवश्यक। लगाव तोड़ना है।”
अर्जुन ने वह पंक्ति पढ़ी तो उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।
विशेष जाँच दल के अधिकारी कबीर मल्होत्रा ने डायरी बंद कर दी।
—यह केवल अनुशासन केंद्र नहीं था। यहाँ बच्चों को चुप कराने का काम होता था।
कुछ बच्चों को इसलिए भेजा गया था क्योंकि उन्होंने अपने पिता को रिश्वत लेते देखा था। एक 10 साल के लड़के ने अपनी माँ के प्रेम संबंध के बारे में दादा को बता दिया था। एक लड़की जानती थी कि उसके पिता ने नकली दस्तावेज़ों से पुश्तैनी ज़मीन बेची थी। माता-पिता पैसे देकर बच्चों को आश्रम भेजते, जहाँ सावित्री उन्हें भय, भूख और मारपीट से इतना तोड़ देती कि वे घर लौटकर बोलना छोड़ देते।
कई बच्चे लौटे ही नहीं।
उनके परिवारों को बताया गया कि बच्चा भाग गया है या किसी रिश्तेदार को सौंप दिया गया है। शिकायत होने पर आश्रम की फाइलें सरकारी कार्यालयों में दबा दी जाती थीं।
इस संरक्षण के पीछे सावित्री का छोटा भाई, न्यायाधीश महेंद्र अवस्थी था। वह परिवार न्यायालय में वर्षों से पदस्थ था। बाल संरक्षण विभाग से आने वाली हर शिकायत किसी न किसी तकनीकी कमी के कारण बंद हो जाती थी। निरीक्षण से पहले आश्रम को सूचना मिल जाती थी। घायल बच्चों को पीछे के कमरों में छिपा दिया जाता था और सामने साफ कपड़े पहने कुछ बच्चों से भजन गवाए जाते थे।
एक बाल कल्याण अधिकारी फर्जी रिपोर्ट बनाती थी। स्थानीय थाने का एक निरीक्षक शिकायत करने वाले माता-पिता को धमकाता था कि बिना प्रमाण के सम्मानित संस्था पर आरोप लगाने से उन्हीं पर मुकदमा हो सकता है। दिल्ली की एक संस्था के माध्यम से धन को दान की रकम दिखाया जाता था।
अर्जुन समझ गया कि यह किसी एक क्रूर महिला की कहानी नहीं थी। यह ऐसे वयस्कों का जाल था जिन्होंने बच्चों के भय को व्यापार बना दिया था।
नंदिनी ने पूछताछ में दावा किया कि वह अपनी माँ के प्रभाव में थी। उसने कहा कि बचपन में सावित्री ने उसे भी कठोर दंड दिए थे, इसलिए उसे वे तरीके सामान्य लगते थे।
लेकिन मोबाइल से मिली आवाज़ की रिकॉर्डिंग ने उसका बचाव तोड़ दिया।
एक चिंतित माँ ने उससे पूछा था—
—मेरी बेटी वहाँ बहुत रोती है। क्या मैं उसे वापस ले आऊँ?
नंदिनी की आवाज़ आई—
—अभी ले आईं तो वह जीत जाएगी। कुछ बच्चों को पहले पूरी तरह तोड़ना पड़ता है। माँजी जानती हैं कि उनका घमंड कैसे खत्म करना है।
दूसरी रिकॉर्डिंग में वह एक पिता से कह रही थी—
—3 महीने बाद आपका बेटा इतना शांत हो जाएगा कि बिना पूछे पानी भी नहीं पिएगा।
तीसरी बातचीत सबसे भयानक थी। सावित्री ने कहा था—
—मीरा तुम्हारे हाथ से निकल रही है। वह अपने पिता को तुम्हारे ऊपर रखती है।
नंदिनी ने उत्तर दिया था—
—जो करना है कीजिए। बस जब अर्जुन लौटे तो मीरा उससे मेरी शिकायत न करे।
रिकॉर्डिंग सुनते समय अर्जुन के चेहरे पर आँसू नहीं थे। उसके भीतर का दुःख इतना गहरा था कि आँसू भी वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे थे।
हिरासत में नंदिनी ने उससे मिलने की माँग की। अर्जुन केवल इसलिए गया क्योंकि जाँच अधिकारी ने कहा कि शायद वह अन्य बच्चों के नाम बताए।
लोहे की जाली के उस पार नंदिनी थकी और बिखरी हुई बैठी थी।
—क्या मीरा मुझे याद करती है? —उसने पूछा।
—वह रात को दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनकर मेज़ के नीचे छिप जाती है।
नंदिनी रो पड़ी।
—मैं उसकी माँ हूँ। मैंने जानबूझकर उसे चोट नहीं पहुँचाई।
—तुमने उसे ऐसे लोगों को दिया जिनका काम ही चोट पहुँचाना था।
—मुझे लगा था माँ सिर्फ डराएँगी।
—तुमने फोन पर कहा था कि उसे पूरी तरह तोड़ देना।
नंदिनी ने सिर झुका लिया।
—मैं गुस्से में थी।
—एक वयस्क का कुछ मिनट का गुस्सा बच्चे की पूरी उम्र का डर बन सकता है।
नंदिनी ने जाली पकड़ ली।
—मुझे एक मौका दो। मैं सबके खिलाफ गवाही दूँगी।
—गवाही न्यायालय के लिए देना। मीरा तक पहुँचने के लिए नहीं।
बाल हिरासत की सुनवाई बंद कमरे में हुई। मीरा के साथ एक बाल मनोवैज्ञानिक बैठी थी। अर्जुन बाहर प्रतीक्षा करता रहा। उसे अपनी सैन्य सेवा के कठिन अभियान याद आए, लेकिन उस दरवाज़े के बाहर बिताया गया 1 घंटा उन सभी से अधिक भयावह था।
मीरा ने न्यायाधीश को बताया कि उसने नंदिनी से कई बार घर लौटने की विनती की थी। उसने कहा था कि नानी रात को बच्चों को बाहर ले जाती हैं। नंदिनी ने उसका मुँह दबाकर कहा था कि यदि उसने झूठ बोलना बंद नहीं किया, तो उसका खिलौना भी फेंक दिया जाएगा।
मीरा ने यह भी कहा—
—गड्ढे में मुझे लगा पापा मुझे कभी नहीं ढूँढ़ पाएँगे। नानी कहती थीं कि सैनिक पिता देश को बचाते हैं, अपनी बेटियों को नहीं।
अर्जुन ने बाहर बैठकर यह वाक्य सुना तो पहली बार उसका संयम टूट गया। उसने दोनों हथेलियों में चेहरा छिपा लिया।
न्यायालय ने मीरा की पूरी अभिरक्षा अर्जुन को दी। नंदिनी की मुलाकात पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी गई। आगे किसी भी संपर्क का निर्णय मीरा की मानसिक स्थिति और उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर होना था।
नंदिनी पर बाल तस्करी में सहयोग, बच्चों को खतरे में डालने, आपराधिक षड्यंत्र और अवैध धन लेने के आरोप लगे। बाद में उसने सरकारी गवाह बनने का प्रस्ताव स्वीकार किया। बदले में उसने उन परिवारों, अधिकारियों और बिचौलियों के नाम दिए जिन्हें वह वर्षों से जानती थी।
उसकी सज़ा कम हुई, लेकिन समाप्त नहीं हुई। उसे 8 वर्ष का कारावास मिला।
सावित्री देवी ने पूरे मुकदमे में कोई पछतावा नहीं दिखाया। उसने न्यायालय में कहा—
—आजकल के बच्चे कमजोर हैं। हमारे समय में डाँट और मार से चरित्र बनता था। मैंने परिवार बचाए हैं।
तभी मृत बच्ची काव्या की माँ दर्शक दीर्घा से उठ खड़ी हुई। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन शब्द पूरे न्यायालय में गूँज गए—
—मेरी बेटी तुम्हारा प्रयोग नहीं थी। वह मेरा बच्चा थी। उसने मरने से पहले कितनी बार मुझे पुकारा होगा?
सावित्री पहली बार चुप हुई।
न्यायाधीश महेंद्र अवस्थी ने अपने संपर्कों से जाँच रुकवाने का प्रयास किया। कुछ अधिकारियों का तबादला कराने की कोशिश हुई। गवाहों को डराने के लिए अनजान नंबरों से फोन आए। लेकिन तब तक आश्रम की खबर पूरे देश में फैल चुकी थी।
न्यायालय के बाहर मृत बच्चों की तस्वीरें लेकर लोग खड़े होने लगे। माता-पिता माँग करने लगे कि देश भर के निजी सुधार गृहों और कथित संस्कार केंद्रों की जाँच हो। पुराने पीड़ित सामने आए।
एक 19 साल के युवक ने बताया कि वह 12 वर्ष की उम्र में उसी आश्रम में रहा था। उसे 6 दिन तक अँधेरे कमरे में इसलिए रखा गया था क्योंकि उसने अपने पिता को माँ को पीटते देखकर पड़ोसी को बुलाया था।
एक युवती ने कहा कि सावित्री उसे बार-बार समझाती थी—
—परिवार की इज़्ज़त बच्चे की सच्चाई से बड़ी होती है।
उस युवती ने न्यायालय में कहा—
—उन्होंने हमें अनुशासन नहीं सिखाया। उन्होंने हमें यह सिखाया कि सच बोलोगे तो मिटा दिए जाओगे।
एक-एक करके लोग गिरफ्तार हुए। बाल कल्याण अधिकारी, जिसने 23 झूठी निरीक्षण रिपोर्ट बनाई थीं। पुलिस निरीक्षक, जिसने 11 शिकायतें दर्ज नहीं की थीं। संस्था का लेखाकार, जिसने धन छिपाया था। वे माता-पिता जिन्होंने अपने अपराध छिपाने के लिए बच्चों को भेजा था।
2 परिवारों पर ऐसे दंड की माँग करने का आरोप सिद्ध हुआ जिनसे बच्चों की मृत्यु हुई थी।
सावित्री को आजीवन कारावास मिला। महेंद्र अवस्थी को आपराधिक षड्यंत्र, सबूत नष्ट करने, बाल तस्करी और गैर इरादतन हत्या में सहयोग के लिए लंबी सज़ा सुनाई गई। उसकी न्यायिक सेवा समाप्त कर दी गई और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पीड़ित बच्चों के पुनर्वास कोष में जमा कराया गया।
फैसले के बाद बहुत से लोग अर्जुन को नायक कहने लगे, लेकिन वह किसी बधाई को स्वीकार नहीं कर पाया।
उसे बार-बार यही लगता था कि उसने सिर्फ अपनी बेटी को बचाया। काव्या, रोहन, आदित्य और उन दूसरे बच्चों को कोई समय पर बचाने क्यों नहीं आया?
किसी पड़ोसी ने रोने की आवाज़ सुनी होगी। किसी चिकित्सक ने चोटें देखी होंगी। किसी अधिकारी ने फाइल पढ़ी होगी। किसी माता-पिता ने बच्चे की बुझी आँखें देखी होंगी।
फिर भी वर्षों तक सबने चुप्पी चुनी।
मीरा की चिकित्सा धीरे-धीरे शुरू हुई। पहले महीने वह अँधेरे में नहीं सोती थी। ठंडा पानी छूते ही चीख पड़ती थी। मिट्टी की गंध से उसे उल्टी आने लगती थी। जब भी कोई कहता, “अच्छी बच्ची बनो,” उसका चेहरा पीला पड़ जाता।
अर्जुन ने सीखा कि उसे “सब बीत गया” नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मीरा के लिए कुछ भी पूरी तरह नहीं बीता था। उसका शरीर अब भी उस गड्ढे की ठंड याद रखता था।
वह छुट्टी लेकर उसके साथ रहने लगा। सुबह उसके बाल बनाता, विद्यालय तक छोड़ता और कक्षा समाप्त होने से पहले ही बाहर पहुँच जाता। कई बार मीरा दरवाज़े पर खड़े होकर सुनिश्चित करती कि वह सचमुच आया है।
एक दिन शिक्षिका ने अर्जुन से कहा—
—मीरा पढ़ाई में पीछे नहीं है। लेकिन गलती होते ही अपने हाथ जोड़कर माफी माँगने लगती है। उसे लगता है कि गलत उत्तर देने पर उसे कहीं बंद कर दिया जाएगा।
उस रात अर्जुन ने मीरा के साथ बैठकर उसकी अभ्यास-पुस्तिका खोली।
—यह उत्तर गलत है, —उसने मुस्कराकर कहा।
मीरा की आँखों में तुरंत भय उतर आया।
अर्जुन ने लाल पेंसिल एक ओर रख दी।
—और गलत उत्तर का मतलब सिर्फ इतना है कि हम इसे दोबारा सीखेंगे। कोई दंड नहीं। कोई गड्ढा नहीं। कोई ताला नहीं।
मीरा काफी देर उसे देखती रही। फिर उसने काँपते हाथ से रबर उठाई और पहली बार बिना रोए अपनी गलती मिटाई।
कुछ महीनों बाद दोनों लखनऊ के एक छोटे से नए घर में रहने लगे। आँगन में अर्जुन ने मिट्टी की क्यारियाँ बनाईं। शुरुआत में मीरा बाहर नहीं जाती थी। वह खिड़की से देखती रहती।
एक रविवार अर्जुन पौधों के छोटे गमले लेकर आया।
—यह तुम्हारे हैं। जहाँ चाहो लगाओ।
मीरा ने सफेद चमेली चुनी। मिट्टी छूते समय उसकी उँगलियाँ काँपीं, पर अर्जुन ने जल्दी नहीं की। वह चुपचाप उसके पास बैठा रहा।
मीरा ने छोटा सा गड्ढा खोदा, पौधा रखा और मिट्टी भर दी।
—यह वाला गड्ढा बुरा नहीं है? —उसने पूछा।
—नहीं। यह जीवन उगाने वाला गड्ढा है।
मीरा ने पहली बार मिट्टी की ओर देखकर मुस्कराया।
वर्ष के अंत में अंतिम फैसला आया। न्यायालय से निकलते समय पत्रकारों ने अर्जुन और मीरा को घेर लिया।
—क्या आपको लगता है कि अब न्याय मिल गया?
अर्जुन ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
—सज़ा मिलना जरूरी है, लेकिन इससे मृत बच्चे वापस नहीं आएँगे। न्याय उस दिन पूरा होगा जब कोई भी व्यक्ति डर को संस्कार, मारपीट को अनुशासन और बच्चे की चुप्पी को आज्ञाकारिता कहना बंद कर देगा। परिवार की इज़्ज़त किसी बच्चे की सुरक्षा से बड़ी नहीं होती।
उसका बयान पूरे देश में फैल गया। कई राज्यों में निजी बाल केंद्रों की जाँच शुरू हुई। पुराने मामलों को दोबारा खोला गया। वर्षों से चुप लोग अपनी कहानियाँ लेकर पुलिस और बाल आयोग तक पहुँचे।
लेकिन अर्जुन के लिए सबसे बड़ी जीत समाचारों में नहीं थी।
एक शाम मीरा बैठक में चित्र बना रही थी। उसने पीले रंग का घर, 2 मनुष्य और सफेद फूलों से भरा आँगन बनाया।
अर्जुन ने पूछा—
—यह कौन हैं?
—यह मैं हूँ और यह आप।
—और ये फूल?
मीरा ने धीरे से कहा—
—जहाँ पहले गड्ढे थे, वहाँ फूल उग आए।
कुछ देर बाद उसने पूछा—
—मम्मी जेल से कभी बाहर आएँगी?
—हाँ, किसी दिन।
—क्या तब मुझे उनसे मिलना पड़ेगा?
अर्जुन उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
—तुम्हें किसी से मिलने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। जब तुम बड़ी होकर खुद चाहोगी, तभी निर्णय लेना। और अगर कभी नहीं चाहोगी, तो वह भी तुम्हारा अधिकार है।
मीरा की आँखें भर आईं।
—मैं बुरी बच्ची नहीं थी ना?
अर्जुन का गला बंद हो गया। उसने उसे सीने से लगा लिया।
—तुम कभी बुरी नहीं थीं। तुम सिर्फ एक बच्ची थीं, जिसे अपने पिता की याद आती थी। गलती उन वयस्कों की थी जिन्हें तुम्हारी रक्षा करनी चाहिए थी।
उस रात मीरा पहली बार बिना मुख्य बत्ती जलाए सोई। केवल खिड़की के पास छोटी सी रोशनी थी।
सुबह वह नीला हाथी दबाए अर्जुन के कमरे में आई।
—पापा, मैंने फिर उस गड्ढे का सपना देखा।
अर्जुन तुरंत उठ बैठा।
—बहुत डर लगा?
मीरा ने सिर हिलाया।
—नहीं। इस बार आप जल्दी आ गए थे। आपने मुझे बाहर निकाला। फिर हम दोनों ने गड्ढे में चमेली के फूल लगा दिए।
अर्जुन ने उसे बाँहों में भर लिया।
कुछ घाव कभी पूरी तरह मिटते नहीं। वे सपनों, आवाज़ों और शरीर की स्मृतियों में रह जाते हैं। लेकिन जब कोई पिता अपनी बेटी की फुसफुसाहट पर विश्वास करता है, जब बच्चा चुप रहने से इनकार करता है और जब सच परिवार की झूठी इज़्ज़त से बड़ा बन जाता है, तब सबसे अँधेरी मिट्टी में भी फूल उग सकते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.