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पूरी रात कूड़ेदान के पास बैठा 7 साल का बच्चा चीखता रहा, “मेरी माँ अंदर ज़िंदा हैं,” मगर भीड़ हँसती रही; सुबह एक अमीर आदमी लौटा, ढक्कन खुलवाया और भीतर मिली घायल महिला ने 300 करोड़ के घोटाले का राज खोल दिया।

PART 1

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—अगर किसी ने यह कूड़ेदान नहीं खोला, तो मेरी माँ इसके अंदर मर जाएँगी!

7 साल के कबीर की चीख दिल्ली की आजादपुर मंडी के शोर में दब रही थी। चारों ओर सब्जियों से लदे ठेले, रिक्शों की घंटियाँ, कुलियों की आवाजें और दुकानदारों का मोलभाव था। फटी नीली कमीज पहने कबीर एक बड़े लोहे के कूड़ेदान के पास खड़ा था। उसके नंगे पैरों पर कीचड़ लगा था और सीने से एक पुराना कपड़े का हाथी चिपका हुआ था, जिसकी एक आँख गायब थी।

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लोग रुकते, उसे देखते और आगे बढ़ जाते।

—बेचारा रास्ता भटक गया होगा—एक महिला ने कहा।

—नाटक कर रहा है। पैसे माँगेगा—एक दुकानदार हँसा।

पर कबीर किसी से पैसे नहीं माँग रहा था।

—मेरी माँ अंदर हैं! मामा ने उन्हें बंद किया है! कृपया खोल दीजिए!

तभी एक काली गाड़ी सड़क किनारे रुकी। उससे अरविंद मल्होत्रा उतरा, जो दिल्ली और गुरुग्राम में निर्माण परियोजनाओं का बड़ा कारोबारी था। महँगा सूट, चमकती घड़ी और चेहरे पर ऐसी कठोरता थी, मानो हर भावना उसके लिए समय की बर्बादी हो।

कबीर दौड़कर उसके पास पहुँचा और उसका कोट पकड़ लिया।

—अंकल, आप बड़े आदमी लगते हैं। आप मेरी माँ को बचा सकते हैं।

अरविंद ने झुँझलाकर उसका हाथ हटाया।

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—पुलिस को बुलाओ। मुझे देर हो रही है।

—मैंने सबको बताया, कोई नहीं मान रहा।

अरविंद ने बच्चे की सूजी हुई लाल आँखें देखीं। उनमें झूठ से अधिक भय था। फिर भी वह मुड़ गया।

पास की चाय की दुकान में बैठकर उसने बैठक शुरू की, मगर बाहर से कबीर की आवाज लगातार आती रही—

—माँ, आप डरना मत! मैं यहीं हूँ!

रात को वसंत विहार की विशाल कोठी में अरविंद सो नहीं पाया। उसे अपने बचपन की वह रात याद आई जब उसका पिता अचानक गायब हो गया था। 9 साल का अरविंद पूरी बस्ती में मदद माँगता रहा था, लेकिन लोगों ने उसे झूठा और बिगड़ा बच्चा समझकर भगा दिया था। उसके पिता फिर कभी नहीं मिले।

सुबह होते ही वह मंडी लौट आया।

कूड़ेदान वहीं था।

कबीर भी वहीं बैठा था। ठंड से उसके होंठ नीले पड़ चुके थे। कपड़े का हाथी अब भी उसकी बाँहों में था।

—तुम पूरी रात यहीं थे?—अरविंद ने काँपती आवाज में पूछा।

कबीर ने सिर हिलाया।

—मैं चला जाता तो माँ अकेली हो जातीं।

अरविंद ने तुरंत पुलिस उपायुक्त देवेंद्र राणा को फोन किया। कुछ देर बाद पुलिस पहुँची। अधिकारी मुस्कराते हुए लोहे पर डंडा मारने लगे।

—देख लेते हैं बच्चे की कहानी—एक सिपाही बोला।

कोई आवाज नहीं आई।

कबीर अचानक दौड़ा और दोनों मुट्ठियों से कूड़ेदान पीटने लगा।

—माँ! मैं कबीर हूँ! एक बार जवाब दीजिए!

पूरी मंडी शांत हो गई।

कुछ क्षण बाद अंदर से बहुत धीमी आवाज आई।

ठक।

फिर 2 बार और।

ठक… ठक…

पुलिसवालों के चेहरे उतर गए। ढक्कन तोड़ा गया तो दुर्गंध का तेज झोंका निकला। काली थैलियों और सड़े सामान के बीच एक महिला पड़ी थी। उसकी कलाइयाँ बँधी थीं, चेहरा सूजा हुआ था और साँस लगभग टूट चुकी थी।

कबीर चीखा—

—माँ!

महिला ने बड़ी मुश्किल से आँख खोली।

—कबीर…

अरविंद पत्थर की तरह खड़ा रह गया। पिछली शाम उसकी एक हाँ इस स्त्री को पूरी रात की यातना से बचा सकती थी।

लेकिन जब घायल महिला को बाहर निकाला गया, उसकी मुट्ठी में दबे कागज पर एक नाम देखकर पुलिस उपायुक्त राणा का चेहरा सफेद पड़ गया।

वह नाम कबीर के मामा का नहीं, बल्कि अरविंद मल्होत्रा की अपनी कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी का था।

PART 2

लोकनायक अस्पताल में कबीर अपनी माँ नंदिनी का हाथ पकड़े बैठा रहा। चिकित्सकों ने बताया कि उसे नशीला पदार्थ देकर पीटा गया था और लगभग 30 घंटे कूड़ेदान में बंद रखा गया।

होश आने पर नंदिनी ने टूटती आवाज में कहा—

—यह सब मेरे भाई महेश ने किया… लेकिन वह अकेला नहीं था।

उसके माता-पिता ने रोहिणी का एक मकान कबीर के नाम छोड़ा था। महेश कर्ज में डूबा था और जाली कागजों से मकान हथियाना चाहता था। उन कागजों को अरविंद की कंपनी के वित्त अधिकारी विनय सूद ने तैयार करवाया था।

नंदिनी पुलिस में जाने वाली थी, इसलिए उसे रास्ते से हटाने की योजना बनी।

उसी शाम महेश समाचार चैनलों पर रोता दिखाई दिया। उसने दावा किया कि नंदिनी मानसिक रूप से अस्थिर है और स्वयं घर से भागी थी। नकली चिकित्सकीय प्रमाणपत्र दिखाए गए।

बाल कल्याण समिति ने कबीर को माँ से अलग कर आश्रय गृह भेज दिया।

वहाँ कबीर ने अरविंद से कहा—

—माँ ने कहा था, सब लोग उन्हें झूठा कहें तो मेरे हाथी गोलू को खोलना।

अरविंद ने खिलौने की सिलाई काटी।

अंदर एक छोटी रिकॉर्डिंग मशीन थी।

उसे चलाते ही विनय सूद की आवाज सुनाई दी—

—मकान तो शुरुआत है, नंदिनी। असली धोखा मल्होत्रा समूह के 300 करोड़ का है।

PART 3

रिकॉर्डिंग सुनते ही अरविंद के हाथ से मशीन लगभग छूट गई। गाड़ी के भीतर कुछ क्षण केवल यंत्र की हल्की खरखराहट सुनाई देती रही। फिर महेश की आवाज आई—

—मेरी बहन को कुछ पता नहीं चलना चाहिए था। उसने खाते क्यों देखे?

विनय सूद ने धीमे स्वर में उत्तर दिया—

—क्योंकि वह अनपढ़ घरेलू औरत नहीं है। उसने 6 साल हिसाब-किताब का काम किया है। उसे समझ आ गया कि जिन गरीब परिवारों की जमीनें परियोजना के लिए खरीदी गईं, उनके मुआवजे का आधा पैसा नकली खातों में भेजा गया।

नंदिनी की काँपती आवाज सुनाई दी—

—तुम लोगों ने विधवाओं, किसानों और मजदूरों के पैसे चुराए हैं। मैं सारे प्रमाण अरविंद मल्होत्रा को दूँगी।

विनय हँसा।

—वह तुम्हारी बात क्यों मानेगा? वह सड़क पर रोते बच्चे की बात तक नहीं मानता।

यह वाक्य अरविंद के भीतर किसी हथौड़े की तरह लगा।

रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी।

महेश ने नंदिनी को धमकाया कि वह मकान उसके नाम कर दे और कंपनी के घोटाले पर चुप रहे। बदले में वह कबीर को सुरक्षित छोड़ देगा। नंदिनी ने इंकार किया। फिर थप्पड़, सामान टूटने और कबीर के रोने की आवाज आई। अंत में नंदिनी कह रही थी—

—कबीर, गोलू को कभी मत छोड़ना।

रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

अरविंद ने उसी समय अपनी कंपनी के विधि सलाहकार अधिवक्ता समर खन्ना को बुलाया। उसने पुलिस उपायुक्त राणा को भी रिकॉर्डिंग भेजी, लेकिन राणा ने चेतावनी दी—

—विनय सूद के संबंध बहुत ऊपर तक हैं। अभी गिरफ्तारी की खबर फैली तो प्रमाण गायब हो जाएँगे।

—तो पहले प्रमाण सुरक्षित कीजिए—अरविंद ने कहा—और आश्रय गृह में कबीर की सुरक्षा बढ़ाइए।

अरविंद ने 2 निजी सुरक्षाकर्मी आश्रय गृह के बाहर तैनात किए। उसका डर गलत नहीं था।

उस रात लगभग 2 बजे एक व्यक्ति पिछली दीवार पार करके अंदर घुसा। उसने चेहरे पर कपड़ा बाँध रखा था। वह सीधे उस कमरे तक पहुँचा जहाँ कबीर सो रहा था। उसने बच्चे का मुँह दबाया और उसके हाथ से गोलू छीनने लगा।

—खिलौना दे दे, वरना तेरी माँ अस्पताल से घर नहीं लौटेगी।

कबीर ने पूरी ताकत से उसके हाथ पर काट लिया। उसकी चीख सुनकर सुरक्षाकर्मी दौड़ पड़े। भागते समय वह व्यक्ति पकड़ा गया। उसकी जेब से नकली पहचानपत्र, नींद की गोलियाँ और महेश द्वारा भेजे गए संदेश मिले।

सुबह तक समाचार फैल चुका था कि एक बच्चे पर आश्रय गृह के भीतर हमला हुआ है। वही लोग, जिन्होंने 1 दिन पहले कबीर को झूठा कहा था, अब व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे।

लेकिन नंदिनी के लिए सबसे क्रूर क्षण तब आया जब बाल कल्याण समिति की अधिकारी अस्पताल पहुँची।

—जब तक आपकी मानसिक स्थिति और घर की सुरक्षा की जाँच पूरी नहीं होती, कबीर आपके पास नहीं लौट सकता।

नंदिनी ने बिस्तर से उठने की कोशिश की।

—मैंने उसे बचाने के लिए मार खाई है। आप मुझे उसी बच्चे से दूर कर रहे हैं जिसके लिए मैं जीवित रही?

—हम नियमों से बँधे हैं।

—नियम उस रात कहाँ थे जब मेरा बेटा पूरी मंडी में चिल्ला रहा था?

अधिकारी के पास उत्तर नहीं था।

दरवाजे के बाहर खड़ा अरविंद सिर झुकाए सब सुनता रहा। आखिर वह भीतर आया।

—गलती केवल व्यवस्था की नहीं थी। सबसे पहले मैंने कबीर की आवाज अनसुनी की थी।

नंदिनी ने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर क्रोध नहीं था। वह खालीपन था जो हर उस गरीब व्यक्ति की आँखों में उतर आता है जिसे बार-बार अपनी सच्चाई साबित करनी पड़ती है।

—आप लौट आए, इसलिए मैं जीवित हूँ—उसने कहा—लेकिन हर बच्चे के पास लौटकर आने वाला कोई अरविंद नहीं होता।

इन शब्दों ने अरविंद को भीतर तक बदल दिया।

उसने अपने पूरे समूह के खातों की स्वतंत्र जाँच का आदेश दिया। निदेशक मंडल के कई सदस्यों ने विरोध किया।

—एक घायल महिला की कहानी पर 300 करोड़ की कंपनी को बदनाम मत कीजिए—एक निदेशक चिल्लाया।

अरविंद ने बैठक की मेज पर रिकॉर्डिंग मशीन रख दी।

—कंपनी की प्रतिष्ठा झूठ से नहीं बचेगी। और जो प्रतिष्ठा किसी बच्चे की माँ की जान से बड़ी हो जाए, वह बचने लायक भी नहीं है।

जाँच में भयावह सच सामने आने लगा। विनय सूद ने 4 साल में मुआवजे की रकम से 38 करोड़ रुपये अलग-अलग फर्जी कंपनियों में भेजे थे। कई कंपनियाँ महेश के नाम पर बने खातों से जुड़ी थीं। रोहिणी, सोनीपत और नोएडा की परियोजनाओं में गरीब परिवारों के हस्ताक्षर जाली पाए गए। कुछ लोगों को बताया गया था कि उन्हें पूरा भुगतान मिल चुका है, जबकि वास्तविक राशि का आधा हिस्सा बिचौलियों ने हड़प लिया था।

नंदिनी कभी अरविंद की कंपनी के एक छोटे ठेकेदार के कार्यालय में लेखा सहायक थी। पति की मृत्यु के बाद उसने नौकरी छोड़ दी थी, क्योंकि कबीर बहुत छोटा था। कुछ महीने पहले उसे महेश के बैग में कंपनी के भुगतान विवरण मिले। रकमों में गड़बड़ी देखकर उसने पुराने खातों से मिलान किया। उसे समझ आ गया कि महेश केवल उसके मकान के पीछे नहीं था; वह एक बड़े अपराध में शामिल था।

नंदिनी ने प्रमाण जुटाने शुरू किए। वह सीधे अरविंद तक पहुँचना चाहती थी, लेकिन हर बार विनय के कर्मचारी उसे मुख्य कार्यालय से लौटा देते थे। एक बार उसे सुरक्षाकर्मियों ने बाहर खड़ा रखा, जबकि वह 3 घंटे तक कबीर का हाथ पकड़े प्रतीक्षा करती रही।

अंततः उसने रिकॉर्डिंग मशीन गोलू के भीतर छिपा दी। उसे शक था कि उसके घर की तलाशी ली जा सकती है, मगर किसी को कबीर के टूटे खिलौने में प्रमाण मिलने की आशंका नहीं होगी।

महेश को जब उसके इरादे का पता चला, उसने बहन को समझाने का नाटक किया। वह राखी के पुराने रिश्ते, माता-पिता की याद और परिवार की बदनामी का हवाला देता रहा।

—घर की बातें थाने तक ले जाएगी? लोग क्या कहेंगे?

नंदिनी ने उत्तर दिया था—

—लोग क्या कहेंगे, यह सोचते-सोचते ही अपराधी घर के भीतर मजबूत होते हैं।

इसी इंकार ने महेश को हिंसक बना दिया।

तत्काल न्यायिक सुनवाई में अदालत भरी हुई थी। एक ओर पट्टियों में लिपटी नंदिनी बैठी थी। उसके पास कबीर था, जिसे विशेष अनुमति से आश्रय गृह से लाया गया था। दूसरी ओर महेश साफ सफेद कुर्ते में सिर झुकाकर बैठा था, मानो वह आरोपी नहीं, पीड़ित भाई हो। विनय सूद का वकील दावा कर रहा था कि रिकॉर्डिंग छेड़छाड़ करके बनाई गई है।

अधिवक्ता समर खन्ना ने ध्वनि विशेषज्ञ की रिपोर्ट प्रस्तुत की।

—रिकॉर्डिंग में कोई काट-छाँट नहीं है। पृष्ठभूमि में बजती ट्रेन की आवाज और पास के मंदिर की आरती का समय भी उस रात के क्षेत्रीय अभिलेखों से मेल खाता है।

इसके बाद अस्पताल की परिचारिका सायरा अंसारी को बुलाया गया। उसने बताया कि हमले से 3 दिन पहले उसने महेश को अस्पताल के गलियारे में नंदिनी का रास्ता रोकते देखा था।

—वह कह रहा था, “हस्ताक्षर कर दे। विधवा औरत को इतना अहंकार अच्छा नहीं लगता।”

महेश के वकील ने पूछा—

—आपने उसी समय शिकायत क्यों नहीं की?

सायरा ने दृढ़ता से उत्तर दिया—

—क्योंकि मैंने इसे पारिवारिक झगड़ा समझा। यही मेरी गलती थी। हम सब तब तक चुप रहते हैं जब तक किसी घर का झगड़ा हत्या की कोशिश नहीं बन जाता।

अदालत में बैठे कई लोगों ने नजरें झुका लीं।

फिर पुलिस ने उस व्यक्ति को प्रस्तुत किया जो आश्रय गृह में घुसा था। उसका नाम जीतू था और वह महेश के लिए वसूली का काम करता था। फोन के संदेश, धन का हस्तांतरण और आश्रय गृह की तस्वीरें उसके उपकरण से मिली थीं। उसने स्वीकार किया कि उसे गोलू लाने के बदले 2 लाख रुपये मिलने वाले थे।

महेश की बनावटी शांति टूटने लगी।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पुलिस ने उस निजी मनोचिकित्सक के बैंक खाते दिखाए, जिसने समाचार चैनल पर नंदिनी को मानसिक रूप से अस्थिर बताया था। उसे विनय की फर्जी कंपनी से 8 लाख रुपये मिले थे। नंदिनी कभी उसकी रोगी रही ही नहीं थी।

न्यायाधीश ने कठोर स्वर में कहा—

—किसी महिला को पागल घोषित कर देना हमारे समाज का सबसे पुराना हथियार है, विशेषकर तब जब वह संपत्ति, हिंसा या भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलती है।

नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले। पहली बार किसी अधिकारपूर्ण आवाज ने उसके दर्द को कमजोरी नहीं, प्रमाण माना था।

तभी कबीर ने न्यायाधीश से बोलने की अनुमति माँगी।

वह गोलू को सीने से लगाए गवाही के स्थान तक पहुँचा। उसके पैर काँप रहे थे, पर आवाज साफ थी।

—उस रात मामा घर आए थे। माँ ने मुझे पलंग के नीचे छिपा दिया। मैंने उनके जूते देखे। उन्होंने माँ को मारा और कहा कि कागज पर अंगूठा लगा दो। माँ ने मना किया तो उन्होंने पानी में कुछ मिलाकर पिलाया।

न्यायाधीश ने नरम स्वर में पूछा—

—तुमने आगे क्या देखा?

कबीर ने गोलू को कसकर पकड़ लिया।

—मैं उनके पीछे बाहर गया। उन्होंने माँ को गाड़ी में डाला। मैं ऑटो के पीछे दौड़ता रहा, फिर एक सब्जी वाले की गाड़ी में छिपकर मंडी तक पहुँचा। मामा ने माँ को कूड़ेदान में फेंका। उन्होंने मुझे देख लिया था।

अदालत में सन्नाटा छा गया।

—उन्होंने तुमसे क्या कहा?

कबीर ने महेश की ओर देखा।

—उन्होंने कहा, “चुप रहना, नहीं तो अगली काली थैली में तू होगा।”

नंदिनी सिसक उठी। अरविंद ने मुट्ठियाँ भींच लीं।

कबीर ने आगे कहा—

—सबने कहा माँ अंदर नहीं हैं। किसी ने कूड़ेदान नहीं खोला। मैं पूरी रात वहीं बैठा रहा, क्योंकि माँ हमेशा कहती थीं कि डर लगने पर किसी अपने का हाथ पकड़ना चाहिए। मैं उनका हाथ नहीं पकड़ सकता था, इसलिए कूड़ेदान छोड़कर नहीं गया।

फिर उसने महेश से कहा—

—आपने माँ को चोट पहुँचाई। गोलू को भी फाड़ दिया। लेकिन माँ ने सच उसके अंदर छिपा दिया था। आप सच को कूड़े में फेंक सकते हैं, मार नहीं सकते।

उस छोटे बच्चे की आवाज ने अदालत की कठोर दीवारों को भी मानो हिला दिया।

महेश अचानक उठकर चिल्लाने लगा—

—यह सब अरविंद मल्होत्रा ने कराया है! वह अपनी कंपनी बचाने के लिए मुझे फँसा रहा है!

अरविंद पहली बार सामने आया।

—मेरी कंपनी भी दोषी है। मेरे अधीन काम करने वाले लोगों ने गरीब परिवारों को लूटा और मेरे कार्यालय ने नंदिनी को दरवाजे से लौटाया। मैं अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागूँगा।

उसने न्यायाधीश को एक लिखित घोषणा दी। कंपनी 38 करोड़ की चोरी हुई राशि लौटाएगी, प्रभावित परिवारों को ब्याज सहित भुगतान करेगी और अपनी ओर से अतिरिक्त क्षतिपूर्ति देगी। उसने स्वयं को भी जाँच के लिए प्रस्तुत किया था।

महेश के चेहरे पर भय उतर आया। विनय सूद ने भागने की कोशिश की, लेकिन अदालत के बाहर ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया। महेश पर हत्या का प्रयास, अपहरण, संपत्ति हड़पने की साजिश, जालसाजी, धमकी और बच्चे को नुकसान पहुँचाने के अपराध लगाए गए। विनय पर वित्तीय धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र और प्रमाण नष्ट करने के आरोप लगे। झूठा प्रमाणपत्र देने वाले चिकित्सक का पंजीकरण निलंबित हुआ और उसके विरुद्ध आपराधिक जाँच शुरू हुई।

बाल कल्याण समिति ने नंदिनी को मानसिक रूप से अस्थिर बताने वाला आदेश वापस लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि गरीबी, विधवा होना या हिंसा के बाद भयभीत दिखना किसी माँ को अयोग्य नहीं बनाता।

फिर भी नंदिनी को ठीक होने में कई महीने लगने थे। उसके हाथ की हड्डी जुड़ रही थी, शरीर कमजोर था और रात को बंद जगह का सपना आते ही उसकी साँस रुकने लगती थी।

कबीर को तुरंत किसी सामान्य आश्रय गृह में वापस भेजना उचित नहीं था। जाँच और घर की सुरक्षा पूरी होने तक अदालत ने अरविंद को सत्यापन के बाद अस्थायी संरक्षक के रूप में मान्यता दी। उसकी कोठी के एक ठंडे, खाली कमरे को कबीर के लिए बदल दिया गया। वहाँ किताबें, रंग, एक छोटी मेज और खिड़की के पास तुलसी का पौधा रखा गया।

पहली रात कबीर बिस्तर पर नहीं सोया। वह दरवाजे के पास फर्श पर बैठा रहा।

—क्या हुआ?—अरविंद ने पूछा।

—बड़ा कमरा है। माँ नहीं हैं। नींद आई तो कोई उन्हें फिर ले जाएगा।

अरविंद उसके पास फर्श पर बैठ गया।

—जब तक तुम्हारी माँ लौट नहीं आतीं, मैं जागूँगा।

—पूरी रात?

—जरूरत पड़ी तो पूरी रात।

कबीर ने कुछ देर उसे देखा, फिर गोलू उसकी गोद में रख दिया।

—इसे पकड़िए। माँ कहती हैं, किसी को गोलू देना मतलब उस पर भरोसा करना।

अरविंद की आँखें भर आईं। उसने जीवन में हजारों करोड़ के अनुबंध सँभाले थे, लेकिन उस फटे खिलौने से भारी जिम्मेदारी कभी नहीं उठाई थी।

नंदिनी के स्वस्थ होने पर अरविंद उसे और कबीर को रोहिणी के उसी मकान में वापस नहीं भेजना चाहता था जहाँ हमला हुआ था। पर नंदिनी ने दान लेने से इंकार कर दिया।

—मुझे महल नहीं चाहिए। मुझे सुरक्षित जीवन और अपना सम्मान चाहिए।

अरविंद ने उसकी योग्यता के अनुसार समूह की स्वतंत्र सामाजिक लेखा शाखा में नौकरी की पेशकश की। उसका काम था परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के भुगतान की निगरानी करना। इस बार प्रस्ताव किसी दया के कारण नहीं, लिखित चयन प्रक्रिया और उचित वेतन के साथ था।

नंदिनी ने शर्त रखी—

—मेरी रिपोर्ट सीधे निदेशक मंडल तक जाएगी। कोई अधिकारी उसे दबा नहीं सकेगा।

अरविंद मुस्कराया।

—इसीलिए यह काम आपको चाहिए।

1 साल बाद आजादपुर मंडी के उसी स्थान पर एक सहायता केंद्र खोला गया, जहाँ कबीर पूरी रात बैठा था। वहाँ खोए बच्चों, बेघर महिलाओं और हिंसा से भागे लोगों के लिए चिकित्सकीय सहायता, कानूनी सलाह और पुलिस संपर्क उपलब्ध था। उसके बाहर कोई विशाल तस्वीर या कारोबारी का नाम नहीं था। केवल एक पंक्ति लिखी थी—

“पहले सुनिए, फिर निर्णय कीजिए।”

उद्घाटन के दिन कई पत्रकार आए। किसी ने कबीर से पूछा—

—तुम्हें कैसे विश्वास था कि तुम्हारी माँ जीवित हैं?

कबीर ने नंदिनी का हाथ पकड़कर कहा—

—क्योंकि माँ ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा था। इसलिए मैं भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता था।

कुछ दूरी पर खड़ा अरविंद यह सुन रहा था।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद कबीर उसके पास दौड़ा।

—पापा अरविंद, घर चलते हैं? माँ ने खीर बनाई है।

अरविंद के कदम वहीं रुक गए। कबीर ने पहली बार उसे उस नाम से पुकारा था। उसने नंदिनी की ओर देखा। नंदिनी की आँखों में आँसू थे, पर इस बार उनमें भय नहीं था।

अरविंद घुटनों के बल बैठा और कबीर को बाँहों में भर लिया।

उस दिन किसी कानूनी कागज ने उन्हें परिवार नहीं बनाया। परिवार उस रात बनना शुरू हुआ था जब एक बच्चा गंदे कूड़ेदान के पास बैठकर दुनिया से लड़ रहा था और एक अपराधबोध से भरा आदमी वापस लौट आया था।

दिल्ली जैसी शोर से भरी नगरी में लोग अक्सर सबसे तेज आवाज सुनते हैं, सबसे सच्ची नहीं। लेकिन कबीर की छोटी-सी जिद ने सबको याद दिलाया कि कभी-कभी सत्य साफ कपड़ों, ऊँचे पद या बड़े मंच पर नहीं मिलता।

कभी-कभी वह ठंड से काँपता हुआ, फटा खिलौना पकड़े, कूड़े के ढेर के पास बैठा रहता है—बस इस उम्मीद में कि कोई एक व्यक्ति भीड़ से अलग होकर रुक जाए, उसकी आँखों में देखे और कहे—

—मैं तुम्हारी बात मानता हूँ।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.