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“पापा, मत आइए, वे आपको भी मार डालेंगे” कहने वाले बेटे को जब बूढ़े पिता ने नए साल की रात तहखाने में जंजीरों से बंधा देखा, तब धन के लिए मुस्कराता परिवार, झूठी लत और हत्या की पूरी साजिश उजागर हो गई।

PART 1

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“पापा, मत आइए… वे आपको भी मार डालेंगे,” नए साल से 7 दिन पहले आदित्य ने फोन पर इतना ही कहा और कॉल कट गई।

रामप्रताप चौधरी ने दोबारा फोन नहीं किया। 35 साल का उसका बेटा कभी डरकर सहायता माँगने वालों में नहीं था। कॉलेज के दिनों में वह राज्य स्तरीय मुक्केबाज़ रहा था। उसकी टूटी आवाज़ ने पिता की छाती में बर्फ जमा दी।

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जयपुर की पुरानी कॉलोनी में रामप्रताप छोटे मकान में रहता, धुँधली बोलेरो चलाता और पड़ोसियों को बताता कि वह सेवानिवृत्त ट्रक चालक है। किसी को नहीं मालूम था कि राजस्थान, गुजरात और दिल्ली तक फैले 180 ट्रकों, गोदामों और ढुलाई केंद्रों वाले “चौधरी परिवहन समूह” का असली मालिक वही था। उसने सादगी को ढाल बना रखा था।

31 दिसंबर की रात वह आदित्य के आलीशान बंगले से 2 गलियाँ पहले उतर गया। खिड़कियों से रोशनी छलक रही थी। भीतर कबाब, पुलाव, मिठाइयाँ और महँगी शराब सजी थी। आदित्य का ससुर महेंद्र उसकी घड़ी पहने जाम बाँट रहा था। सास विमला ने रामप्रताप की दिवंगत पत्नी की पश्मीना ओढ़ रखी थी। पत्नी रिया काले लहँगे में ऐसे मुस्करा रही थी, जैसे घर और धन सब उसी का हो।

आदित्य कहीं नहीं था।

रामप्रताप गैराज से भीतर घुसकर तहखाने में उतरा। नीचे सीलन, ब्लीच और दवा की गंध थी। मशीनों वाले कमरे में आदित्य फर्श पर पड़ा था। टखने की मोटी जंजीर लोहे की पाइप से बँधी थी। दाहिना घुटना सूजा, नीला और टेढ़ा था। बाँहों पर सुइयों के निशान थे।

—बेटा, आँखें खोल।

आदित्य ने पिता को पहचाना तो बिना आवाज़ रो पड़ा।

—रिया और उसके पिता ने घुटना हथौड़े से तोड़ा। वे मुख्तारनामे, खाते और कंपनियाँ चाहते हैं। मेरे फोन से नशामुक्ति की झूठी पोस्ट डाल रहे हैं। मैं मर गया तो कहेंगे अधिक नशा किया था।

ऊपर पायल बजी। रामप्रताप अँधेरे में छिपकर कैमरा चालू कर चुका था।

रिया नीचे आई, सूखी रोटी फेंकी और बोली—

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—आज हस्ताक्षर कर दो, नहीं तो कल सूरज नहीं देखोगे।

आदित्य चुप रहा। उसने एड़ी घायल घुटने पर दबा दी। फिर फोन पर कहा—

—आज नहीं माना तो आखिरी इंजेक्शन दे देंगे। सबको पहले ही यकीन है कि वह नशेड़ी है।

उसके जाते ही रामप्रताप ने जंजीर, घाव और दवाइयों की तस्वीरें लीं।

—अब मैं सामने के दरवाजे से जाऊँगा।

—पापा, मत जाइए।

रामप्रताप की आँखें ठंडी हो गईं।

—आज उन्हें गरीब बूढ़ा दिखेगा। रात खत्म होने से पहले वे जानेंगे कि उन्होंने किसके बेटे को जंजीर से बाँधा है।

PART 2

10 मिनट बाद रामप्रताप मिठाई का डिब्बा लेकर मुख्य दरवाजे पर खड़ा था। रिया का चेहरा उड़ गया, पर मेहमानों के सामने उसे भीतर आने देना पड़ा।

उसने काँपती आवाज़ में कहा—

—आदित्य के हस्ताक्षर चाहिए। अजमेर सड़क परियोजना में पुश्तैनी जमीन जा रही है। मुआवजा 42 करोड़ है, पर कागज 3 जनवरी से पहले जमा होंगे।

रिया की आँखों में लालच चमका। वह रसोई में गई। दीवार के पीछे रामप्रताप ने महेंद्र की फुसफुसाहट सुनी—

—बूढ़े की चाय में वही दवा डाल दो। अंगूठा लगवाकर कहेंगे दिल का दौरा पड़ा।

रिया गरम चाय लाई। रामप्रताप ने पीने का अभिनय किया और द्रव तुलसी के गमले में उड़ेल दिया। कुछ देर बाद वह लड़खड़ाया।

—शौचालय किधर है?

रिया मुस्कराई। रामप्रताप गलियारे से मुड़कर तहखाने में पहुँचा, आदित्य का बयान रिकॉर्ड किया और प्लास्टिक की चादर, चूने की बोरियाँ तथा नई कुदाल भी कैमरे में ले ली।

बाहर निकलते ही महेंद्र लोहे की छड़ लेकर सामने आ गया।

—बहुत खोजबीन कर ली, बूढ़े?

रामप्रताप पीछे हटा और मोबाइल पर केवल 1 संदेश भेजा—

“मेरे बेटे को निकालो। अभी।”

दूर सड़क पर एक साथ 6 गाड़ियों की हेडलाइटें जल उठीं।

PART 3

सबसे आगे की गाड़ी से सुरक्षा प्रमुख रणवीर उतरा। उसके पीछे निजी अस्पताल की चिकित्सकीय टीम, ताला काटने वाले कर्मचारी, 2 अधिवक्ता और शरीर पर कैमरे लगाए सुरक्षा कर्मी थे। रामप्रताप ने वर्षों पहले अपने कारोबार में नियम बनाया था—पहले जीवन बचाओ, कागज बाद में देखो। उस रात वही नियम उसके बेटे पर लागू हो रहा था।

रणवीर ने ऊँची आवाज़ में कहा—

—घर के नीचे गैस रिसाव की सूचना है। सभी लोग तुरंत बाहर निकलें।

संगीत बंद हुआ। मेहमान घबराकर बाहर भागे, लेकिन रिया, विमला और महेंद्र सीढ़ियों के पास खड़े रहे। महेंद्र ने लोहे की छड़ उठाई। रणवीर ने उसकी कलाई मोड़कर छड़ गिरा दी। हर हरकत कैमरों में दर्ज हो रही थी।

रामप्रताप तहखाने में पहुँचा। चिकित्सक ने आदित्य की नब्ज, आँखें और घायल पैर जाँचा।

—गंभीर संक्रमण है। शरीर में पानी बहुत कम है। कुछ घंटे और बीतते तो पैर काटना पड़ता, शायद जान भी नहीं बचती।

कटर से जंजीर टूटी। आदित्य को स्ट्रेचर पर ऊपर लाया गया तो रिया मुड़ा कागज लेकर सामने आ गई।

—यह मेरा पति है! उसने संपत्ति मेरे नाम कर दी है। आप उसे नहीं ले जा सकते।

अधिवक्ता निखिल मेहता ने फाइल खोली।

—यह बंगला, गाड़ियाँ, खाते और व्यावसायिक संपत्ति “चौधरी परिवहन न्यास” की हैं। आदित्य संचालन निदेशक है, मालिक नहीं। बंदी से लिया हस्ताक्षर कानून में कूड़े से अधिक मूल्य नहीं रखता।

रिया का चेहरा उतर गया। विमला ने इसे घरेलू मामला कहा। महेंद्र ने पुलिस की धमकी दी।

—पुलिस आ रही है—निखिल बोला—लेकिन स्थानीय थाना नहीं। विशेष अपराध शाखा और आंतरिक सतर्कता इकाई। आपका भतीजा निरीक्षक सुरेश 3 महीनों से आदित्य की शिकायतें दबा रहा था।

रिया ने सुरेश को फोन किया। उधर से घबराई आवाज़ आई—

—मुझे दोबारा फोन मत करना। मेरे कार्यालय में जाँच दल बैठा है।

एम्बुलेंस निकलते ही रामप्रताप ने न्यास की संपत्तियों पर उनके प्रवेश अधिकार रद्द कर दिए। फिर रिया से बोला—

—ठंड तहखाने में भी थी। फर्क इतना है कि मेरे बेटे के पास बाहर आने का दरवाजा नहीं था।

रात 4 बजे आदित्य निजी अस्पताल में भर्ती था। उसके खून में तेज शांतिदायक दवाएँ, पशुओं पर इस्तेमाल होने वाला मांसपेशी शिथिलक और संक्रमण के संकेत मिले। उसी समय रिया प्रतीक्षा कक्ष से सामाजिक माध्यम पर सीधा प्रसारण करने लगी।

—मेरे ससुर ने हथियारबंद लोगों से मेरे बीमार पति का अपहरण कराया है। आदित्य नशे का रोगी है। मैं उसे बचा रही थी।

वह रोई, मगर कैमरे से नजर नहीं हटाई। प्रसारण के बीच चाय का भुगतान करने पर उसका कार्ड अस्वीकार हो गया। दूसरा कार्ड भी बंद था। लोग पूछने लगे कि करोड़ों की मालकिन चाय क्यों नहीं खरीद पा रही। उसने प्रसारण बंद किया, पर दृश्य फैल चुका था।

सुबह रिया और विमला बंगले लौटीं। द्वार नहीं खुला। वे गाड़ी में बैठीं तो चोरी-रोधी प्रणाली सक्रिय हो गई। हॉर्न बजने लगा, दरवाजे बंद हुए और इंजन रुक गया। पड़ोसियों ने पुलिस बुला ली।

पुलिस ने वाहन खुलवाया तो पिछली सीट के नीचे महेंद्र का थैला मिला। उसमें शीशियाँ, सुइयाँ, नकली मुहरें, आदित्य के हस्ताक्षर के अभ्यास वाले कागज और 8 लाख रुपये थे। कुछ देर में रिया और विमला हिरासत में थीं। महेंद्र भागते हुए पकड़ा गया।

रामप्रताप ने पुलिस को एक स्मृति उपकरण भी दिया। उसमें तहखाने के वीडियो, रिया की बातचीत, आदित्य का बयान और बंगले के पुराने सुरक्षा तंत्र से निकाला गया 4 महीने का अभिलेख था।

3 महीने बाद जयपुर की सत्र अदालत भरी हुई थी। रिया सफेद सलवार-कुर्ते में आई। बिना आभूषण, झुके कंधे और काँपते होंठ। उसका अधिवक्ता उसे पीड़ित पत्नी की तरह प्रस्तुत कर रहा था।

—आदित्य को नशे के दौरे पड़ते थे। उसने स्वयं कहा था कि उसे बाँध दिया जाए। मेरी मुवक्किल ने कठोर कदम प्रेम में उठाए।

रिया आँसू पोंछते हुए बोली—

—मैंने उसे खाना और दवा दी। उसकी इज्जत बचाने के लिए झूठ बोला। मेरे ससुर को शुरू से मेरा परिवार पसंद नहीं था।

न्यायाधीश ने साधारण सफेद कुर्ते में बैठे रामप्रताप को देखा। वह बड़े व्यापारी से अधिक थका पिता लग रहा था।

निखिल खड़ा हुआ।

—माननीय न्यायालय, मुख्य दृश्य प्रमाण चलाया जाए।

पर्दे पर तहखाना दिखाई दिया। रिया काले लहँगे में नीचे उतरी, सूखी रोटी फेंकी, हस्ताक्षर माँगे और घायल घुटने पर एड़ी दबाई। आदित्य की दबी चीख सुनकर अदालत में सन्नाटा छा गया। उसकी आवाज़ साफ थी—

—मर जाओगे तो सबको राहत मिलेगी। तुम्हारे पिता का पैसा हमारा होने वाला है।

अगले दृश्य में महेंद्र हथौड़ा लिए खड़ा था और विमला दरवाजे पर निगरानी कर रही थी। फिर तीनों प्लास्टिक की चादर तथा चूने की बोरियाँ तहखाने में रखते दिखे।

निखिल ने विषविज्ञान रिपोर्ट रखी।

—पीड़ित के शरीर में किसी मनोरंजक नशीले पदार्थ का प्रमाण नहीं मिला। उसे ऐसी दवाएँ दी गईं जिनसे चेतना, स्मृति और मांसपेशियों का नियंत्रण घटता है। मात्रा इतनी थी कि साँस रुक सकती थी। घायल घुटने का उपचार जानबूझकर रोका गया, ताकि मृत्यु नशे या संक्रमण से हुई लगे।

इसके बाद रिया के मिटाए गए संदेश पढ़े गए। वह आदित्य के पूर्व कारोबारी साझेदार करण मल्होत्रा से संबंध में थी। करण ने बताया था कि समूह का मूल्य 900 करोड़ से अधिक है। दोनों ने योजना बनाई कि आदित्य से अधिकारपत्र बनवाकर उसे अक्षम घोषित किया जाएगा। उसकी मृत्यु के बाद रिया विधवा बनकर संपत्ति पर दावा करेगी और करण नकली कंपनियों में धन घुमाएगा।

रिया का एक संदेश था—“वह हस्ताक्षर नहीं कर रहा। पापा ने घुटना तोड़ दिया, फिर भी नहीं।”

करण ने लिखा था—“अगली खुराक बढ़ाओ। 2 जनवरी से पहले मामला खत्म होना चाहिए।”

निखिल ने दूसरी फाइल खोली। रिया ने शादी के 1 वर्ष बाद अपनी इच्छा से स्थायी गर्भनिरोधक प्रक्रिया कराई थी, पर आदित्य को बीमारी का झूठ बताया। उसने 2 बार झूठे गर्भपात की कहानी बनाकर उससे गहने और पैसे लिए। वह बच्चा नहीं चाहती थी; वह अपराधबोध के सहारे पति पर नियंत्रण चाहती थी।

रिया अचानक खड़ी हो गई।

—हाँ, मुझे पैसा चाहिए था! उसके कारण मेरे परिवार ने ऊँची जिंदगी देखी। उसे केवल हस्ताक्षर करने थे। वह चुपचाप मर जाता तो किसी को परेशानी नहीं होती!

उसका अधिवक्ता उसे बैठाता रह गया। बहुत देर हो चुकी थी।

विमला घबराकर बोली—

—सब रिया ने किया। उसने कहा था सिर्फ डराएँगे!

रिया ने माँ को ऐसे देखा, जैसे पहली बार समझी हो कि लालच के रिश्तों में खून भी गवाही बदल देता है।

न्यायालय ने रिया, महेंद्र और विमला की जमानत रद्द कर दी। करण मुंबई से पकड़ा गया। निरीक्षक सुरेश को साक्ष्य दबाने, रिश्वत लेने और षड्यंत्र में सहायता के आरोप में हिरासत में लिया गया। जाँच में सामने आया कि उसने आदित्य के मित्रों को धमकाया और 3 पुलिस रिपोर्ट बदलवाई थीं।

मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया—ऊपर परिवार नए साल का जश्न मना रहा था, नीचे उसी घर का बेटा जंजीर में पड़ा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।

कारागार पहुँचने के 8 दिन बाद रिया ने रामप्रताप को फोन किया।

—पिताजी, यहाँ बहुत ठंड है। मैं गलती मानती हूँ। मैं गर्भवती हूँ… आपके पोते की माँ बनने वाली हूँ।

रामप्रताप के सामने उसकी चिकित्सकीय फाइल खुली थी।

—रिया, झूठ बोलने से पहले अपने कागज पढ़ लिया करो।

कुछ क्षण चुप्पी रही। फिर उसका स्वर कठोर हुआ।

—मैं बयान बदल सकती हूँ। कह दूँगी कि पापा ने मजबूर किया। आप मुझे बाहर निकलवा दीजिए।

—मेरा बेटा तुम्हें बचाने के लिए नहीं, तुमसे बचने के लिए चलना सीख रहा है।

उसने फोन काट दिया।

इसके बाद धन की परतें खुलीं। पिछले 4 वर्षों में आदित्य के खाते से रिया के 17 रिश्तेदारों को रकम गई थी। किसी के नाम दुकान, किसी के लिए गाड़ी, किसी की विदेश यात्रा और किसी के बेटे की महँगी पढ़ाई। अधिकांश धन झूठ, चोरी किए गए हस्ताक्षरों या घरेलू खर्च के नाम पर निकाला गया था।

न्यास ने वसूली के मुकदमे किए। 3 मकान, 6 गाड़ियाँ, 2 खेत और कई खाते जब्त हुए। रिया का मामा अदालत के बाहर चिल्लाया—

—हमारे बच्चों का क्या होगा? हमें सड़क पर ला दिया!

रामप्रताप ने कहा—

—जब तुम्हारे बच्चों के खिलौने खरीदे जा रहे थे, मेरा बेटा तहखाने में पानी माँग रहा था। तब किसी ने नहीं पूछा कि उसका क्या होगा।

बंगले से तुलसी का वह गमला भी मिला, जिसमें रामप्रताप ने चाय उड़ेली थी। पौधा कुछ घंटों में काला पड़ गया था। मिट्टी में वही शांतिदायक मिश्रण मिला, जो आदित्य के शरीर में था, पर कई गुना अधिक मात्रा में। इससे रामप्रताप की हत्या के प्रयास का अलग मामला दर्ज हुआ।

आदित्य ने 7 महीने अस्पताल और पुनर्वास केंद्र में बिताए। 2 शल्यक्रियाओं के बाद उसका पैर बच गया, मगर घुटना कभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। पहले वह सहारे से खड़ा हुआ, फिर चलने की चौखट पकड़ी और बाद में छड़ी के साथ कदम बढ़ाए।

भीतर का घाव अधिक गहरा था। बंद कमरा देखकर साँस तेज हो जाती। इंजेक्शन से हाथ काँपते। पटाखों की आवाज़ उसे उसी रात में लौटा देती। रामप्रताप हर चिकित्सा सत्र के बाहर चाय का थर्मस लेकर बैठता। जीवन भर भावनाएँ छिपाने वाला पिता अब बेटे के डर से नजर नहीं चुराता था।

1 वर्ष बाद दोनों उदयपुर के पास झील किनारे एक साधारण विश्राम गृह में थे। सुबह धुंध पानी पर झुकी थी। रामप्रताप रसोई में पराँठा जला रहा था।

आदित्य ने छड़ी टिकाकर कहा—

—पापा, इसे पराँठा कहना खाने का अपमान है।

रामप्रताप हँसा।

—35 साल से ऐसा ही बना रहा हूँ।

—इसीलिए माँ आपको रसोई से निकाल देती थीं।

हँसी के बाद रामप्रताप भारी बस्ता मेज पर लाया। उसमें गोदामों, ट्रकों, जमीनों और अनुबंधों की सूची थी।

—तुम समझते रहे कि तुम्हारा पिता बूढ़ा चालक है। चालक मैं सच में था। बाकी सच इसलिए छिपाया, क्योंकि धन रिश्तों की आँख बदल देता है। लेकिन मेरी चुप्पी की सजा तुम्हें मिली।

आदित्य ने पूछा—

—क्या आपने मुझ पर भरोसा नहीं किया?

—मैं दुनिया पर भरोसा नहीं करता था।

पहली बार रामप्रताप की आवाज़ टूट गई।

उसने कहा कि आदित्य चाहे तो कारोबार से दूर रह सकता है। लौटना चाहे तो मालिक की कुर्सी से नहीं, चालकों के साथ मार्ग पर जाकर, कार्यशाला समझकर और मजदूरों की शिकायतें सुनकर शुरुआत करेगा। संपत्ति का एक हिस्सा ऐसे लोगों के लिए न्यास में जाएगा, जिन्हें परिवार ने धन के लिए कैद या प्रताड़ित किया हो।

आदित्य ने सिर हिलाया।

—और दूसरी शादी हुई तो विवाहपूर्व संपत्ति समझौता होगा—रामप्रताप ने कहा।

आदित्य मुस्कराया—

—पहले किसी पर भरोसा करना फिर से सीख लेने दीजिए।

कुछ दिनों बाद कारागार से रिया का पत्र आया। उसने साबुन, गर्म कपड़े और पैसे माँगे थे। आखिरी पंक्ति थी—“इतने साल साथ रहने की कोई कीमत तो होगी।”

आदित्य ने पत्र आधा पढ़कर अंगीठी में डाल दिया। वह तब तक देखता रहा, जब तक अक्षर राख नहीं हो गए।

बाहर झील पर सूरज उतर रहा था। कमरे में जले पराँठे की गंध थी, छड़ी दीवार से लगी थी और मेज पर नया जीवन खुला पड़ा था।

बहुत समय बाद उस घर का मौन डर का नहीं था।

वह उस शांति का मौन था, जो न्याय देर से आने के बाद छोड़ जाता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.