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“अंगूठे के निशान” शब्द बाथरूम की दीवारों से किसी भी थप्पड़ से ज़्यादा ज़ोर से टकराए।

वे शब्द—“अंगूठे का निशान”—बाथरूम की दीवारों से किसी थप्पड़ से भी ज़्यादा ज़ोर से टकराए।

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एक पल के लिए मैं साँस भी नहीं ले सकी।

मेरा बेटा।

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मेरा रेयांश।

वही लड़का जिसके पहले कदमों पर मैंने तब तक ताली बजाई थी जब तक मेरी हथेलियाँ जलने नहीं लगी थीं।

और आज वही बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा था, मुझसे ऐसे अंगूठे का निशान माँग रहा था जैसे मैं उसकी माँ नहीं, कोई दस्तावेज़ हूँ।

सुलोचना मेरे बगल में काँप रही थीं। दोनों हाथ उनके मुँह पर थे, मानो वे बरसों के डर को बाहर आने से रोक रही हों।

मैंने दूसरा कागज़ खोला।

मेरी उँगलियाँ अब मेरी अपनी नहीं लग रही थीं।

स्याही फैली हुई थी, जल्दबाज़ी में लिखी गई, जैसे किसी दबाव में लिखी गई हो।

“उन्होंने पिछले महीने अस्पताल में भर्ती होने के दौरान बीमा वाले फ़ॉर्म पर लिए गए आपके जाली दस्तावेज़ों के आधार पर आपके घर पर पहले ही ऋण ले लिया है। उसी फ़ॉर्म पर लिए गए आपके अंगूठे के निशान से प्रक्रिया शुरू की गई थी। आज अंतिम हस्तांतरण है।”

कमरा घूमने लगा।

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अस्पताल का भर्ती फ़ॉर्म।

मुझे याद था।

रेयांश अचानक घर आया था, बहुत तेज़-तेज़ बोलते हुए।

“माँ, यहाँ बस साइन कर दो। यह बीमा क्लेम की पुष्टि के लिए है। बाकी सब मैं संभाल लूँगा।”

मैंने हस्ताक्षर कर दिए थे।

क्योंकि मेरे बेटे ने कहा था।

क्योंकि जब बच्चे कुछ कहते हैं, तो माँएँ पढ़ती नहीं।

वे भरोसा करती हैं।

बाहर से उसकी आवाज़ फिर आई।

इस बार धीमी।

संयमित।

“माँ, इसे मुश्किल मत बनाइए। आप एक बार पहले ही हस्ताक्षर कर चुकी हैं। बस बाहर आ जाइए।”

मैंने सुलोचना की ओर देखा।

उनकी आँखें नम थीं, लेकिन अब स्थिर थीं।

“कोई दूसरा रास्ता है?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।

उन्होंने जल्दी से सिर हिलाया।

पीछे वाले गलियारे का निकास।

लेकिन उनका हाथ मेरे हाथ पर और कस गया।

“वे उसे भी रोक लेंगे। बाहर दो आदमी खड़े हैं। नौकर नहीं। कागज़ लेकर आए हैं।”

बिल्कुल।

यह कोई पारिवारिक भोजन नहीं था।

यह समापन था।

एक ऐसी ज़िंदगी पर आख़िरी हस्ताक्षर, जिसे पहले ही मिटाया जा चुका था।

दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।

कोई जल्दबाज़ी नहीं।

धैर्य से।

फिर रेयांश की आवाज़।

“माँ, मुझे पता है आप डर रही हैं। लेकिन यह हम सबके लिए है। कर्ज़ ख़त्म हो जाएगा। हम सब चैन की साँस ले पाएँगे।”

कर्ज़।

यह शब्द ज़हर की तरह हवा में लटक गया।

मुझे लगभग हँसी आ गई।

मेरे ऊपर अगर कोई कर्ज़ था, तो वह मेरी रीढ़ पर था—सालों तक झुकते रहने का, ताकि मेरा बेटा सीधा खड़ा हो सके।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

एक पल के लिए वह फिर बच्चा बन गया।

लाजपत नगर की गलियों में नंगे पाँव दौड़ता हुआ।

स्कूल की सैर के लिए मुझसे कुछ रुपये माँगता हुआ।

बिजली जाने पर मेरी गोद में सो जाता हुआ।

और इस दरवाज़े के बाहर खड़ी आवाज़…

उस बच्चे से बिल्कुल मेल नहीं खाती थी।

फिर भी…

दोनों एक ही इंसान थे।

मातृत्व की सबसे क्रूर सच्चाई यही है।

कोई भी तुम्हें उस पल के लिए तैयार नहीं करता जब तुम्हारा अपना बच्चा ऐसा इंसान बन जाए जिसे तुम अँधेरे कमरे में पहचान भी न सको।

सुलोचना ने फुसफुसाकर कहा,

“अम्मा… दवा असर करने से पहले शायद हमारे पास सिर्फ़ दो मिनट हैं।”

मैंने मोड़ा हुआ कागज़ और कसकर पकड़ लिया।

“यहाँ सीसीटीवी है?” मैंने पूछा।

उन्होंने सिर हिलाया।

“हर जगह।”

मेरी साँसें धीमी हो गईं।

अच्छा।

तो यह मौत नहीं थी।

यह सबूत था।

बाहर कदमों की आवाज़ बदली।

अब एक से ज़्यादा लोग थे।

विहाना की तेज़ आवाज़ आई।

“रेयांश, बात करना बंद करो। बस दरवाज़ा खोलो।”

फिर एक और पुरुष आवाज़।

“सर, हमें आगे बढ़ना चाहिए। अगर वह सो जाएँगी तो आसान रहेगा।”

आसान।

इस शब्द से मेरा पेट मिचला गया।

मैंने अपनी पीठ सीधी कर ली।

चौंसठ साल तक बोझ उठाने का अचानक एक मतलब निकल आया।

क्योंकि मेरे भीतर कुछ बदल गया।

हिम्मत नहीं।

स्पष्टता।

मैंने सुलोचना की ओर देखा।

“क्या यह दरवाज़ा बाहर से खोला जा सकता है?”

वह झिझकीं।

“हाँ… लेकिन गलियारे का कैमरा सब देखेगा।”

मैंने सिर हिलाया।

“बहुत अच्छा।”

उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गई हूँ।

लेकिन फिर भी उन्होंने कुंडी की ओर हाथ बढ़ा दिया।

बाहर रेयांश की आवाज़ थोड़ी ऊँची हुई।

“माँ, प्लीज़ देर मत कीजिए।”

देर।

जैसे मैं कोई ट्रैफ़िक जाम हूँ।

जैसे मैं उनके कार्यक्रम की एक समस्या हूँ।

टक।

कुंडी खुली।

उसी पल मैंने अपना हाथ सुलोचना की कलाई पर रख दिया।

“पूरा खोल दीजिए,” मैंने फुसफुसाकर कहा। “फिर भाग जाइए।”

उनकी आँखें फैल गईं।

“और आप?”

मैं मुस्कुराई।

एक छोटी-सी।

थकी हुई मुस्कान।

“तुममें और मुझमें फ़र्क बस इतना है,” मैंने धीरे से कहा, “कि मैं तो पहले ही आग के भीतर हूँ।”

दरवाज़ा खुल गया।

रेयांश सामने खड़ा था।

बाल एकदम सधे हुए।

शर्ट बिल्कुल साफ़।

आँखें अधीरता से लाल थीं, भावनाओं से नहीं।

उसके पीछे विहाना पानी का गिलास पकड़े खड़ी थी।

और उनके बगल में दो आदमी, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था, मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई माल हूँ।

एक पल के लिए कोई नहीं हिला।

फिर रेयांश मुस्कुराया।

राहत।

झूठी राहत।

“माँ,” उसने बहुत नरमी से कहा, “आइए। इसे ख़त्म कर देते हैं।”

मैं धीरे-धीरे बाथरूम से बाहर आई।

शांत।

संयमित।

और उस पूरे दिन में पहली बार मैंने बिना किसी ममता के सीधे अपने बेटे की आँखों में देखा।

“क्या ख़त्म करें?” मैंने पूछा।

वह पलक झपक गया।

“कागज़ी काम।”

मैंने सिर हिलाया।

“दिखाओ।”

विहाना भौंहें सिकोड़ते हुए बोली,

“ये फिर समय बर्बाद कर रही हैं।”

उन आदमियों में से एक आगे आया।

“मैडम, अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं है तो हम मदद कर सकते हैं। बस यहाँ अपना अंगूठा लगा दीजिए।”

उसने मुझे एक टैबलेट दिखाया।

डिजिटल फ़ॉर्म।

मेरे घर का पता पहले से भरा हुआ था।

हस्तांतरण तैयार था।

मेरे नाम की जगह आंशिक रूप से मेरे बेटे का नाम पहले ही दर्ज किया जा चुका था।

मेरी साँसें और धीमी हो गईं।

बहुत व्यवस्थित।

उन्होंने यह पहले भी किया था।

उसी समय सुलोचना मेरे पीछे आकर खड़ी हो गईं।

भागीं नहीं।

बस खड़ी रहीं।

और वही काफ़ी था।

क्योंकि उन्हें देखते ही रेयांश के चेहरे पर कुछ काँपा।

डर।

पहचान।

उसे उम्मीद नहीं थी कि वह बाहर आएँगी।

मतलब उन्होंने मुझे सब बता दिया था।

मैंने हल्का-सा मुड़कर कहा,

“रेयांश।”

“जी, माँ?”

“यह सब कब से योजना बना रहे हो?”

चुप्पी।

कमरे में नहीं।

उसके भीतर।

उसका जबड़ा कस गया।

“मैं कोई योजना नहीं बना रहा,” उसने कहा। “मैं आपको बचा रहा हूँ। आप उस घर में अकेली रहती हैं। वह सुरक्षित नहीं है। हम सिर्फ़ संपत्तियों को ठीक से व्यवस्थित कर रहे हैं।”

संपत्तियाँ।

मुझे फिर लगभग हँसी आ गई।

तो अब मैं भी एक संपत्ति थी।

मैंने धीरे से सिर हिलाया।

फिर मैंने वह किया जिसकी उनमें से किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

मैंने अपने ब्लाउज़ की जेब में हाथ डाला।

और अपना पुराना साधारण मोबाइल फ़ोन निकाल लिया।

स्मार्टफ़ोन नहीं।

उनकी किसी प्रणाली से जुड़ा हुआ नहीं।

रेयांश ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“यह क्या है?”

मैंने एक बटन दबाया।

कॉल तुरंत जुड़ गई।

और मैंने साफ़ आवाज़ में कहा,

“सब कुछ रिकॉर्ड करना शुरू कीजिए।”

विहाना का चेहरा बदल गया।

“क्या—”

गलियारे के स्पीकर से एक शांत पुरुष आवाज़ आई।

“रिकॉर्डिंग शुरू हो गई है, मैडम। सभी ऑडियो और सीसीटीवी बैकअप अब आपके कानूनी क्लाउड स्टोरेज से सिंक हो रहे हैं।”

रेयांश जड़ हो गया।

“कौन-सी रिकॉर्डिंग?”

मैंने उसकी ओर बहुत शांत नज़रों से देखा।

“वही, जिसका अस्तित्व तुम भूल जाते हो जब अपने बेटे पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करते हो।”

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

उसके पीछे खड़े आदमियों में से एक पीछे हट गया।

विहाना फुसफुसाई,

“रेयांश… तुमने क्या किया?”

पहली बार उसने उसे कोई जवाब नहीं दिया।

क्योंकि वह मुझे देख रहा था।

सचमुच देख रहा था।

और समझ रहा था कि कुछ बदल चुका है।

मैं नहीं।

कमरा।

संतुलन।

वह नियंत्रण, जिसे वह अपना समझता था।

मैं एक कदम उसके करीब गई।

“मेरे अंगूठे ने,” मैंने धीरे से कहा, “तुम्हारे लिए बहुत-सी चीज़ों पर निशान लगाया है। स्कूल के फ़ॉर्म। ऋण। जीवन बीमा। भरोसा।”

मैं थोड़ी देर रुकी।

“लेकिन आज यह किसी भी चीज़ पर निशान नहीं लगाएगा।”

उसकी आवाज़ हल्की-सी टूट गई।

“माँ… ऐसा मत कीजिए।”

मैंने सिर थोड़ा झुका लिया।

“क्या मत करूँ?”

“सब कुछ बर्बाद मत कीजिए।”

सब कुछ।

जैसे उस घर को मैंने बर्बाद किया हो जिसे मैंने ईंट-ईंट जोड़कर बनाया था।

मैं फिर मुस्कुराई।

इस बार बिना किसी गर्मजोशी के।

“यह सब बर्बाद करना तो तुम बहुत पहले शुरू कर चुके थे,” मैंने कहा।

फिर मैंने हल्का-सा सिर घुमाकर गलियारे के कैमरे की ओर देखा।

“और अब,” मैंने आगे कहा, “तुम सब रिकॉर्ड हो चुके हो।”

उसके बाद जो सन्नाटा छाया, वह खाली नहीं था।

वह ढह रहा था।

उन आदमियों में से एक ने विहाना के कान में कुछ फुसफुसाया।

वह अचानक बहुत छोटी लगने लगी।

रेयांश फिर मेरी ओर बढ़ा।

इस बार धीरे।

“माँ… हम इसे ठीक कर सकते हैं।”

मैंने उसका चेहरा ध्यान से देखा।

उस लड़के को ढूँढ़ते हुए।

वह कहीं था।

बहुत भीतर।

लालच, डर और उधार के आत्मविश्वास के नीचे दबा हुआ।

लेकिन जो चीज़ें दफ़न हो जाती हैं, वे ग़ायब नहीं होतीं।

वे बस जीवित रहना छोड़ देती हैं।

“पच्चीस साल तक मैं तुम्हें सँवारती रही,” मैंने शांत स्वर में कहा। “अब मुझे ठीक करने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”

उसकी साँस काँपी।

एक पल के लिए उसकी आँखें भर आईं।

पछतावे से नहीं।

घबराहट से।

क्योंकि उसे एक ऐसी बात समझ आ गई थी जो पकड़े जाने से भी ज़्यादा भयावह थी।

उसे समझ आ गया था कि अब मुझे उसकी ज़रूरत नहीं रही।

बाहर अभी पुलिस के सायरन नहीं सुनाई दे रहे थे।

लेकिन वे आने वाले थे।

मुझे महसूस हो रहा था।

और उन्हें भी।

मैं उसके पास से निकल गई।

बिना छुए।

बिना माफ़ किए।

बस उस मलबे के बीच से गुज़रती हुई, जो कभी मेरा बेटा हुआ करता था।

मैं हॉल की ओर बढ़ी, जहाँ पानी का गिलास अब भी बिना छुआ रखा था।

और मैंने आख़िरी बार उससे इतना धीमे कहा कि सिर्फ़ वही सुन सके—

“अगर बचपन में तुमने मुझसे कभी सचमुच प्यार किया था,” मैंने कहा, “तो यहीं रुक जाओ। मेरे लिए अपनी सज़ा मत बनो।”

फिर मैं मेज़ तक पहुँची।

गिलास उठाया।

लेकिन इस बार मैंने पानी नहीं पिया।

मैंने उसे रोशनी की ओर उठाया।

और उन सबको उसमें अपना ही प्रतिबिंब देखने दिया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.