सुलोचना माँ: क्या अद्विका को सब पता चल गया, या मैं अब भी यही कहूँ कि मुझे कुछ नहीं पता था?
फ़ोन की स्क्रीन बस इतनी देर तक जलती रही कि वह एक वाक्य मेरी रूह तक उतर गया।
फिर वह बुझ गई।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
नर्स सबूतों वाला पाउच हाथ में लिए जड़ होकर खड़ी थी। राघव फ़ोन को ऐसे घूर रहा था, मानो उसने उसके साथ उससे भी ज़्यादा निर्दयता से विश्वासघात किया हो जितना उसने मेरे साथ किया था। हवा में एंटीसेप्टिक, ख़ून और सच की गंध घुली हुई थी।
मैंने उसकी ओर देखा।
पट्टी की ओर नहीं।
स्लिंग की ओर नहीं।
उसके मुँह के पास सूख चुके ख़ून की ओर भी नहीं।
उसकी ओर।
उस आदमी की ओर जिसने कभी मेरे पिता की चिता के सामने मेरा हाथ थामकर फुसफुसाया था, “अब मैं ही तुम्हारा घर हूँ।”
मुझे लगभग हँसी आ गई।
घर।
राघव जैसे आदमी कभी घर नहीं बनते।
वे दीमक बनते हैं।
सालों तक चुपचाप।
अँधेरे में भूखे।
“तुम्हारी माँ को सब पता था?” मैंने पूछा।
उसके होंठ खुले।
“अद्विका…”
“क्या तुम्हारी माँ को सब पता था?”
नर्स असहज होकर इधर-उधर देखने लगी।
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
वही काफ़ी जवाब था।
मैंने नर्स के हाथ से सबूतों वाला पाउच लिया और कहा, “मुझे कहाँ हस्ताक्षर करने हैं?”
राघव घबरा गया।
“नहीं, मेरा फ़ोन मत ले जाओ।”
मैं धीरे-धीरे उसकी ओर मुड़ी।
“तुम्हारा फ़ोन? वही फ़ोन जिससे अभी तुम्हारी माँ ने पूछा कि क्या उन्हें मुझसे झूठ बोलते रहना चाहिए?”
“वह टूट गया है। अस्पताल को उसकी ज़रूरत नहीं—”
“मुझे है।”
उसने उठने की कोशिश की, दर्द से कराहा और वापस तकिए पर गिर पड़ा।
“अद्विका, प्लीज़। इसे इतना बदसूरत मत बनाओ।”
मेरे भीतर कुछ मुस्कुराया।
मेरे होंठ नहीं।
कुछ और।
कुछ बहुत पुराना।
“इसे बदसूरत तुमने बनाया था। मैं सिर्फ़ इसे सबके सामने ला रही हूँ।”
नर्स ने मुझे फ़ॉर्म दिया।
मैंने पत्नी के रूप में हस्ताक्षर किए।
शायद आख़िरी बार।
फिर मैंने मखमली डिब्बा उसके बिस्तर पर उसके पास रख दिया।
“बधाई हो,” मैंने कहा। “तलाक़ के बाद तुम्हारी असली ज़िंदगी शुरू होगी।”
उसका चेहरा बिखर गया।
“ऐसा नहीं था।”
मैंने सिर थोड़ा तिरछा किया।
“तो फिर कैसा था? क्या यह अंगूठी फ़िज़ियोथेरेपी के लिए थी?”
उसने निगलते हुए कहा।
“यह एक गलती थी।”
“नहीं, राघव। रास्ता भटक जाना गलती होती है। डेढ़ साल का रिश्ता, जिसमें तुम्हारी माँ गवाह बनी रहे—यह गलती नहीं, पूरी योजना होती है।”
नर्स ने नज़रें झुका लीं, लेकिन मैं उसका जबड़ा कसते हुए देख सकती थी।
अच्छा है।
अजनबी भी सच जानें।
बारह साल तक मैंने अपने विवाह को आँधी में जलते दीये की तरह बचाकर रखा।
आज वही लौ परदों को जला दे।
मैं उसका टूटा हुआ फ़ोन और सबूतों वाला पाउच लेकर इमरजेंसी वार्ड से बाहर निकल गई।
वेटिंग एरिया में सुलोचना बिलिंग काउंटर के पास खड़ी थी।
सफेद सूती साड़ी।
लाल आँखें।
हाथ में जपमाला।
आदर्श माँ।
आदर्श अभिनय।
मुझे देखते ही वह मेरी ओर दौड़ी।
“अद्विका! वह कैसा है? मेरा बेचारा बेटा!”
मैंने उसके हाथ में पकड़े फ़ोन की ओर देखा।
फिर उसके चेहरे की ओर।
“क्या अब भी यही कहोगी कि तुम्हें कुछ नहीं पता था?”
मेरे शब्द बिना हाथ उठाए तमाचे की तरह उसके चेहरे पर पड़े।
एक पल के लिए उसकी आँखें फैल गईं।
फिर उसने खुद को संभाल लिया।
“क्या?”
मैंने राघव का टूटा हुआ फ़ोन ऊपर उठाया।
“तुम्हारा संदेश उसकी स्क्रीन पर आ गया था।”
उसने हाथ सीने पर रख लिया।
“मैं घबरा गई थी। मेरा मतलब… मेरा मतलब उसके एक्सीडेंट से था।”
मैं उसे घूरती रही।
“तुम्हें लगा था कि मुझमें समझने की कितनी कमी है?”
उसका चेहरा थोड़ा कठोर हो गया।
उसकी बनावटी नरमी उतरने लगी।
“अस्पताल ड्रामा करने की जगह नहीं है।”
“नहीं। खुलासे करने की जगह तुमने इसे बनाया।”
वह मेरे पास आई और धीमी आवाज़ में बोली,
“उसने जो भी किया हो, वह तुम्हारा पति है। आदमी रास्ता भटक जाते हैं। पत्नी उन्हें वापस ले आती है।”
मैंने इमरजेंसी वार्ड के दरवाज़े की ओर देखा।
“मेहर भी आई है। क्या उसे भी वापस ले आऊँ? आख़िर तुम बहुओं का संग्रह जो कर रही हो।”
सुलोचना की नथुने फूल गए।
“धीरे बोलो।”
“बारह साल तक मैं धीरे बोलती रही। देख लिया तुम्हारे बेटे ने उस ख़ामोशी का क्या किया।”
अब लोग हमारी ओर देखने लगे थे।
खाँसता हुआ बुज़ुर्ग।
बुखार से तपते बच्चे की माँ।
एक सुरक्षा गार्ड।
सुलोचना ने यह देखा और तुरंत रोना शुरू कर दिया।
“देखिए इसे,” उसने ऊँची आवाज़ में कहा। “मेरा बेटा घायल पड़ा है और यह मुझ पर इल्ज़ाम लगा रही है। सबसे पहले मैंने ही इसे फ़ोन किया था। मैंने इसे बेटी की तरह रखा।”
“नहीं,” मैंने कहा। “तुमने मुझे फ़र्नीचर की तरह रखा। काम की चीज़। इधर-उधर खिसकाई जा सकने वाली। चुप रहने वाली।”
उसके आँसू रुक गए।
मैं उसके और करीब गई।
“तुम्हें पता था कि वह दूसरी औरत से कह रहा था कि हमारा अलगाव हो चुका है।”
वह चुप रही।
“तुम्हें पता था कि उसने उसके लिए अंगूठी खरीदी।”
फिर भी चुप।
“तुम्हें पता था कि वह तलाक़ की योजना बना रहा है।”
उसके होंठ कस गए।
फिर उसने वह वाक्य कहा जिसने मेरे भीतर बची आख़िरी ज़िम्मेदारी भी मार दी।
“तुम उसे बच्चा कभी दे ही नहीं पाईं। आखिर वह कितने समय तक इंतज़ार करता?”
पूरा वेटिंग एरिया शांत हो गया।
मेरी उँगलियाँ सबूतों वाले पाउच पर कस गईं।
यही था।
वही घाव जिसे वह वर्षों से पाल रही थी।
हर मंदिर जहाँ वह मुझे ले गई।
हर कड़वा काढ़ा।
हर मेडिकल रिपोर्ट जिसे उसने मुझसे पहले पढ़ा।
हर फुसफुसाहट—
“चिंता मत करो बेटा, अगले महीने भगवान कृपा करेंगे।”
इतने सालों तक वह सिर्फ़ एक बहाना तैयार कर रही थी।
छह साल तक मैं अपने शरीर को दोष देती रही।
और डेढ़ साल तक राघव अपना भविष्य किसी दूसरी औरत को सौंपता रहा।
सुलोचना लगभग संतुष्ट दिख रही थी, जैसे उसने आख़िरकार असली आरोप बोल दिया हो।
मैंने एक गहरी साँस ली।
फिर दूसरी।
“क्या तुमने मेहर से भी यही कहा था?”
उसका चेहरा बदल गया।
मैं बिना गर्मजोशी के मुस्कुराई।
“नहीं? तो उसे भी नहीं पता था कि उसे सिर्फ़ एक कोख के लिए परखा जा रहा था?”
वह जवाब देती, उससे पहले पीछे से एक आवाज़ आई।
“अब उसे पता है।”
मैं मुड़ी।
अस्पताल के प्रवेश द्वार पर मेहर खड़ी थी।
चेहरा पीला था।
लेकिन आँखें स्थिर थीं।
उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।
अस्पताल की नहीं।
नीले रंग का फ़ोल्डर, जिसके किनारे मुड़े हुए थे और जिसमें कागज़ ठूँसकर भरे गए थे।
वह धीरे-धीरे हमारी ओर चली।
सुलोचना के चेहरे पर नफ़रत भर गई।
“तुम फिर आ गई?”
मेहर ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
उसने मेरी ओर देखते हुए कहा,
“मुझे उसकी कार में कुछ मिला। पुलिस ने मुझे इंतज़ार करने को कहा क्योंकि मेरा बैग अंदर रह गया था। कार में कुछ कागज़ थे।”
मेरे दिल की धड़कन बदल गई।
“कौन से कागज़?”
उसने फ़ोल्डर मेरी ओर बढ़ा दिया।
सबसे ऊपर हमारे विवाह प्रमाणपत्र की फ़ोटोकॉपी थी।
उसके नीचे संपत्ति कर की रसीदें।
बैंक के कागज़।
आपसी सहमति से तलाक़ की याचिका का मसौदा।
मेरा नाम साफ़-साफ़ टाइप किया हुआ था।
नीचे मेरे हस्ताक्षर थे।
जबकि मैंने कभी उस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
मेरे पेट में ठंडक उतर गई।
मेहर फुसफुसाई,
“उसने कहा था कि तुम पहले ही मान चुकी हो। बस कानूनी प्रक्रिया बाकी है।”
मैंने अगला पन्ना पलटा।
समझौते की शर्तें।
कोई गुज़ारा भत्ता नहीं।
कोई भरण-पोषण नहीं।
रहने का कोई अधिकार नहीं।
संयुक्त संपत्ति पर कोई दावा नहीं।
वैवाहिक अपार्टमेंट के हस्तांतरण पर कोई आपत्ति नहीं।
आख़िरी पंक्ति पर मेरी नज़र धुँधली हो गई।
वैवाहिक अपार्टमेंट।
इंदिरानगर वाला फ्लैट।
जो मेरे पिता के छोड़े हुए पैसों से खरीदा गया था।
जो शादी से पहले मेरे नाम पर पंजीकृत था।
जिसे मेहमानों के सामने राघव “हमारा घर” कहता था और गुस्से में “तुम्हारा घर।”
अब उसी ड्राफ्ट में ऐसे लिखा था जैसे मैं उसे रहने का अधिकार देने पर सहमत हो चुकी हूँ।
मैंने सुलोचना की ओर देखा।
उसने नज़रें फेर लीं।
वह छोटी-सी हरकत ही उसका इक़बाल-ए-जुर्म थी।
मेहर ने एक और पन्ने की ओर इशारा किया।
“और भी है।”
वह मेडिकल रिपोर्ट थी।
फ़र्टिलिटी स्पेशलिस्ट परामर्श।
रोगी: अद्विका सूर्यवंशी।
मैं कभी उस क्लिनिक गई ही नहीं थी।
मेरे हाथ काँपने लगे।
निदान के नीचे एक पंक्ति को हाईलाइट किया गया था।
ओवरी का रिज़र्व कम। भविष्य की संभावना कम।
नीचे पति को परामर्श दिए जाने के स्थान पर राघव के हस्ताक्षर थे।
और उसके नीचे—
अभिभावक उपस्थित।
सुलोचना प्रताप सूर्यवंशी।
मैं साँस नहीं ले पा रही थी।
मैंने वर्षों तक राघव से साथ में जाँच कराने की विनती की थी।
वह हमेशा कहता था,
“मुझे अपमानित क्यों करना चाहती हो? सब जानते हैं कि पुरुषों में कोई समस्या नहीं होती।”
लेकिन वह जाँच करा चुका था।
मेरे बिना।
अपनी माँ के साथ।
मेरे शरीर पर चर्चा करने।
उस क्लिनिक में जहाँ मैं कभी गई ही नहीं।
मेहर की आवाज़ काँप रही थी।
“उसने मुझसे कहा था कि तुमने इलाज से मना कर दिया। उसने कहा कि तुम्हें बच्चे नहीं चाहिए।”
मैं हँस पड़ी।
इसलिए नहीं कि बात मज़ेदार थी।
बल्कि इसलिए कि कभी-कभी शरीर दर्द के लिए ग़लत रास्ता चुन लेता है।
“मुझे बच्चा इतना चाहिए था कि मैं दुकानों में बच्चों के कपड़े मोड़कर ऐसे देखने लगती थी जैसे सिर्फ़ कपड़े का कपड़ा जाँच रही हूँ।”
मेहर की आँखें भर आईं।
सुलोचना झल्लाकर बोली,
“बस करो यह सब। वे कागज़ निजी हैं।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मेरे जाली हस्ताक्षर अब सार्वजनिक हैं।”
…
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.