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मेरी सास मंदिर के फूल, स्टील के संदूक और ऐसी मुस्कान लेकर आईं जो किसी धारदार हथियार की तरह चुभती थी। फिर उन्होंने मेरी बेटी को उसके अपने ही कमरे से बाहर निकल जाने का आदेश दिया, लेकिन मेरे पति के हाथ में मौजूद एक फ़ाइल ने उनके घमंड को पल भर में खामोशी में बदल दिया।

एक महीने उसे किसी पारिवारिक समारोह के लिए गहने चाहिए होते।

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अगले महीने उसके दोनों बेटों की स्कूल फीस।

फिर अगले महीने नया फ़ोन, क्योंकि उसका पुराना फ़ोन “उसकी इमेज खराब कर रहा था।”

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मैंने कई बार उसकी मदद की थी।

इसलिए नहीं कि मुझे इस्तेमाल होना अच्छा लगता था।

बल्कि इसलिए कि मेरे पति अर्जुन का मानना था कि परिवार की रक्षा करनी चाहिए, चाहे परिवार खुद तूफ़ान की तरह व्यवहार करे।

लेकिन इस बार बात पैसों की नहीं थी।

यह मेरी बेटी की बात थी।

और जिस पल उन्होंने मेरी बेटी की गरिमा को छुआ, मेरे भीतर बचा हुआ सारा धैर्य चुपचाप मर गया।

—अनाया, वहाँ कोई और है?

—बुआ का ड्राइवर। और दो सामान ढोने वाले लड़के। दादी ने उन्हें मेरी पढ़ाई की मेज़ बाहर निकालने को कहा है।

मुझे ज़ोर से कुछ गिरने की आवाज़ सुनाई दी।

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फिर अनाया हाँफ उठी।

—मम्मा, उन्होंने मेरा साइंस मॉडल गिरा दिया।

उस मॉडल को बनाने में उसे पूरे दो हफ़्ते लगे थे।

उसने स्कूल के लिए जल संरक्षण का एक काम करने वाला मॉडल बनाया था, जिसमें अपनी छोटी-छोटी उँगलियों से नीली नदियाँ और भूरे पहाड़ रंगे थे।

मैंने एक सेकंड के लिए आँखें बंद कर लीं।

जब उन्हें खोला, मैं अब काँप नहीं रही थी।

मैं हिसाब लगा रही थी।

—बेटा, फ़ोन स्पीकर पर लगा दो, लेकिन अपने पास ही रखना। मैं चाहती हूँ कि उन्हें पता चले कि मैं सब सुन रही हूँ।

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

—ठीक है।

फिर मैंने सावित्री को बाथरूम के दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से थपथपाते हुए सुना।

—अनाया! अभी दरवाज़ा खोलो। अपनी माँ जैसी मत बनो। ज़्यादा पढ़ाई ने तुम दोनों को घमंडी बना दिया है।

मैंने इतनी ऊँची आवाज़ में कहा कि वह सुन सके—

—माँजी, मेरी बेटी के दरवाज़े से दूर हट जाइए।

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर सावित्री हँसी।

—अच्छा, तो मैडम अकाउंटेंट सुन रही हैं। बहुत बढ़िया। घर आओ और खुद देख लो। हम तो बस व्यावहारिक व्यवस्था कर रहे हैं।

—आप मेरी अनुमति के बिना मेरे घर में घुस आईं।

—तुम्हारा घर?

उसकी हँसी और तेज़ हो गई।

—यह मेरे बेटे का फ़्लैट है। मेरे बेटे का खून। मेरे बेटे का परिवार। तुम यहाँ इसलिए रह रही हो क्योंकि उसने तुम्हें रहने दिया है।

मेरे नाखून मेरी हथेली में धँस गए।

—अनाया की किसी भी चीज़ को हाथ मत लगाइए।

—तुम मुझे बताओगी कि मैं अपने बेटे के घर में क्या छू सकती हूँ?

बेडरूम की तरफ़ से पूजा की आवाज़ आई।

—भाभी, बात को बदसूरत मत बनाइए। मैं गर्भवती हूँ। डॉक्टर ने कहा है कि मुझे तनाव कम लेना चाहिए। मेरे बेटे हॉल में नहीं सो सकते। यह कमरा बिल्कुल सही है। अनाया आप लोगों के साथ सो जाएगी। आख़िर वह सिर्फ़ एक लड़की ही तो है।

सिर्फ़ एक लड़की।

इन शब्दों से मेरी आँखों के सामने धुंध छा गई।

आँसुओं से नहीं।

गुस्से से।

—पूजा, इस कमरे से अगली जो चीज़ बाहर जाएगी, वह तुम्हारा अपना संदूक होगा, वापस लिफ्ट तक।

वह तिरस्कार से हँसी।

—पहले अपने पति से पूछ लो। उन्हें सब पता है।

मैंने फ़ोन काट दिया, इससे पहले कि मेरा गुस्सा ऐसे शब्दों में बदल जाता जिनका मुझे पछतावा होता।

फिर मैंने अर्जुन को फ़ोन किया।

उसने दूसरी घंटी पर ही फ़ोन उठा लिया।

—निशा, मैं साइट इंस्पेक्शन में हूँ। क्या मैं बाद में—

—तुम्हारी माँ और बहन हमारे फ़्लैट में सामान से भरे संदूक लेकर आई हुई हैं। उन्होंने मेरी बेटी को डर के मारे एक कमरे में बंद कर रखा है और उसके कमरे का सामान निकाल रही हैं। क्या तुमने इसकी अनुमति दी थी?

उसके आसपास का शोर जैसे गायब हो गया।

—क्या?

उसकी आवाज़ बदल गई।

हैरान नहीं।

खतरनाक रूप से शांत।

—क्या। तुमने। इसकी। अनुमति। दी थी?

—नहीं।

एक शब्द।

सीधा।

तुरंत।

मैंने उस पर विश्वास किया क्योंकि अर्जुन की अपने परिवार को लेकर कई कमज़ोरियाँ थीं, लेकिन उसने कभी उस लहज़े में झूठ नहीं बोला था।

—तुम्हारी माँ ने अनाया से कहा कि तुमने हाँ कर दी है।

मैंने उसे गहरी साँस लेते हुए सुना।

—तुम घर के लिए निकलो। मैं सीधे वहीं आ रहा हूँ।

—अर्जुन, वे सामान उठाने वाले लड़कों को भी साथ लाई हैं।

कुछ पल की चुप्पी रही।

फिर उसने कहा—

—मेरे पहुँचने से पहले उन्हें जाने मत देना।

मैंने अपना बैग उठाया, अपने मैनेजर की आवाज़ को अनसुना किया और ऑफ़िस से बाहर निकल गई।

लिफ्ट में मेरा अपना प्रतिबिंब मुझे अजीब लगा।

नीले कुर्ते में एक औरत।

ऑफ़िस का आईडी कार्ड अब भी गले में।

बाल करीने से बँधे हुए।

चेहरा शांत।

बहुत ज़्यादा शांत।

मेरा ड्राइवर छुट्टी पर था, इसलिए मैंने कैब बुक की।

ऐप पर अठारह मिनट का इंतज़ार दिखा।

मैंने बुकिंग रद्द की और इमारत के बाहर ऑटो स्टैंड की ओर दौड़ पड़ी।

ऑटो वाले ने मेरा चेहरा देखा और बिना मोलभाव किए पूछा—

—मैडम, कहाँ?

—कल्याणी हाइट्स। जल्दी।

दोपहर का पुणे ट्रैफ़िक हमेशा की तरह सज़ा था।

बाइकें कारों के बीच से निकल रही थीं।

फेरीवाले ठेले धकेल रहे थे।

एक स्कूल बस ने पूरी लेन रोक रखी थी।

डिवाइडर के पास एक गाय ऐसे खड़ी थी जैसे पूरा शहर उसी का हो।

मैंने फ़ोन अनाया की लाइन पर ही खुला रखा।

हर कुछ मिनट बाद मुझे ऐसी कोई आवाज़ सुनाई देती जिससे मेरा गुस्सा और ठंडा होता जाता।

दराज़ खुलने की आवाज़।

कागज़ फटने की आवाज़।

सावित्री का यह कहना कि मेरी बेटी के पास “बेकार की आर्ट की बहुत सारी चीज़ें” हैं।

पूजा का सामान उठाने वालों से कहना—

—स्टडी टेबल दरवाज़े के पास रख दो। बाद में मेरा बड़ा बेटा इस्तेमाल करेगा।

फिर अनाया फुसफुसाई—

—मम्मा, वे मेरे मेडल ले जा रहे हैं।

मेरा गला भर आया।

वे मेडल सोने के नहीं थे।

महँगे भी नहीं थे।

लेकिन हर एक का अपना मतलब था।

वाद-विवाद प्रतियोगिता।

चित्रकला प्रतियोगिता।

ज़िला विज्ञान मेले का पुरस्कार।

एक शांत बच्ची के अपने अस्तित्व को साबित करने की छोटी-छोटी निशानियाँ।

—बेटा, गहरी साँस लो। मैं बस पहुँचने ही वाली हूँ।

मैं पहुँचने वाली नहीं थी।

लेकिन उसे यही सुनना ज़रूरी था।

जब मैं हमारी इमारत पहुँची, तो देखा कि प्रवेश द्वार पर एक छोटा ट्रक खड़ा था, जिसका पिछला हिस्सा खुला हुआ था।

उसमें दो गद्दे, एक प्लास्टिक का शिशु पालना, तीन स्टील के संदूक और अख़बार में लिपटी पूजा और उसके पति की शादी की एक बड़ी फ़्रेम वाली तस्वीर रखी थी।

सुरक्षा डेस्क के पास हमारा गार्ड रमेश असहज खड़ा था।

मुझे देखते ही उसने तुरंत नज़रें झुका लीं।

उसकी वह नज़र सब कुछ बता गई।

—मैडम, मैंने साहब को फ़ोन करने की कोशिश की थी।

—उन्हें ऊपर किसने जाने दिया?

उसने घबराकर निगल लिया।

—मैडम, सावित्री मैडम ने कहा था कि परिवार का मामला है। उन्होंने कहा कि साहब को सब पता है।

मैंने उससे बहस नहीं की।

अभी नहीं।

मैं लिफ्ट की ओर बढ़ गई।

नौवीं मंज़िल पर लिफ्ट का दरवाज़ा खुला तो मैंने अपनी बेटी की पूरी दुनिया को गलियारे में बिखरा हुआ पाया।

उसका गुलाबी स्कूल बैग।

उसके कैनवस वाले जूते।

उसका क्रिकेट बैट, जो अर्जुन ने तब खरीदा था जब उसने ज़िद की थी कि लड़कियाँ लड़कों से बेहतर बल्लेबाज़ी कर सकती हैं।

उसकी किताबों से भरा गत्ते का डिब्बा।

उसके ऊपर हमारे परिवार की उसकी बनाई हुई फ़्रेम की हुई तस्वीर रखी थी।

मैं।

अर्जुन।

अनाया।

और हमारी बालकनी का तुलसी का पौधा।

उस तस्वीर के शीशे पर किसी ने एक चिपचिपा नोट चिपका रखा था।

“मम्मी-पापा के कमरे में शिफ्ट करें।”

मेरे हाथ बर्फ़ जैसे ठंडे हो गए।

फ़्लैट के भीतर से सावित्री की आवाज़ आई—

—ये फेयरी लाइट्स भी उतार दो। गर्भवती औरतों के आसपास धूल नहीं होनी चाहिए।

मैं दरवाज़े के भीतर चली गई।

मुख्य दरवाज़ा पूरी तरह खुला था, मानो मेरा घर किसी सार्वजनिक गोदाम में बदल गया हो।

दो मज़दूर मेरी बेटी के कमरे में उसकी किताबों की अलमारी खोल रहे थे।

पूजा अनाया के बिस्तर पर बैठी स्टील के डिब्बे से भुना हुआ मखाना खा रही थी, एक हाथ अपने पेट पर रखे हुए, जैसे कोई रानी श्रद्धांजलि स्वीकार कर रही हो।

सावित्री मेरी बेटी की डायरी हाथ में पकड़े खड़ी थीं।

मेरी बेटी की निजी डायरी।

मैं अंदर चली गई।

दो सेकंड तक किसी ने मुझे नहीं देखा।

फिर एक मज़दूर ठिठक गया।

पूजा मुड़ी।

सावित्री ने सिर उठाया।

एक पल के लिए सारी आवाज़ें थम गईं।

मैं सीधी सावित्री के पास गई और उनकी हथेली से डायरी ले ली।

—सब कुछ वापस अपनी जगह रखिए।

उन्होंने ठुड्डी ऊँची कर ली।

—मुझसे इस लहज़े में बात मत करो।

—सब। कुछ। वापस। रखिए।

पूजा धीरे-धीरे उठी।

—भाभी, प्लीज़ मुझे तनाव मत दीजिए। मैं गर्भवती हूँ।

—तो अपने ही घर में बैठो और आराम से गर्भ संभालो।

उसका चेहरा सख्त हो गया।

—यह मेरे भाई का घर है।

मैंने चारों ओर देखा।

मेरी बेटी की उखाड़ी हुई अलमारी।

फ़र्श पर बिखरी उसकी किताबें।

संदूक के नीचे कुचली हुई उसके मेडलों की रिबन।

फिर मैंने सावित्री की ओर देखा।

—मेरी बेटी कहाँ है?

सावित्री बिना किसी शर्म के मुस्कुराईं।

—अब भी बाथरूम में ज़िद करके बैठी है। बिल्कुल तुम्हारी तरह।

मैं बाथरूम के दरवाज़े तक गई और धीरे से दस्तक दी।

—अनाया, मम्मा आई हैं। दरवाज़ा खोलो।

ताला खुला।

वह दोनों हाथों में फ़ोन पकड़े बाहर आई।

उसके गाल आँसुओं से भीगे हुए थे।

उसके होंठ काँप रहे थे।

उसने गलियारे की ओर देखा।

अपने कमरे की ओर देखा।

अपने फर्नीचर को पकड़े खड़े अजनबियों की ओर देखा।

फिर मेरी ओर देखकर फुसफुसाई—

—मम्मा, क्या मैंने कुछ ग़लत किया?

उस एक वाक्य ने मेरे भीतर कुछ तोड़ दिया।

मैं घुटनों के बल बैठ गई और उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया।

—नहीं, बेटा। तुमने कुछ भी ग़लत नहीं किया। बिल्कुल भी नहीं।

मेरे पीछे सावित्री झुँझलाकर बोलीं—

—बहुत हो गया यह भावनात्मक ड्रामा। लड़कियों को समझौता करना सीखना चाहिए। हमारे ज़माने में—

मैं खड़ी हो गई।

—आपके ज़माने में शायद बेटियों को किनारे कर दिया जाता था। मेरे घर में ऐसा नहीं होता।

सावित्री एक कदम आगे बढ़ीं।

—तुम्हारा घर, तुम्हारा घर। सौ बार कह लो। बाहर लगी नेमप्लेट पर अर्जुन मेहरा लिखा है। तुम भूल रही हो कि तुम किसका उपनाम इस्तेमाल करती हो।

मैं जवाब देती, उससे पहले लिफ्ट की घंटी बजी।

हम सबने एक साथ उधर देखा।

अर्जुन बाहर निकला।

वह अब भी अपनी साइट वाली हेलमेट पहने था।

जूते धूल से भरे थे।

आस्तीनें मुड़ी हुई थीं।

और उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।

उसकी नज़र एक बार पूरे गलियारे पर घूमी।

किताबें।

टूटा हुआ मॉडल।

मज़दूर।

अनाया का चेहरा।

फिर उसकी नज़र अपनी माँ पर आकर रुक गई।

—मेरी बेटी के कमरे में आने की अनुमति आपको किसने दी?

सावित्री का आत्मविश्वास एक पल को डगमगाया, लेकिन फिर लौट आया।

—मैं तुम्हारी माँ हूँ। मुझे कब से अनुमति लेने की ज़रूरत पड़ने लगी?

अर्जुन धीरे-धीरे अंदर आया।

न वह चिल्लाया।

न उसने जल्दबाज़ी की।

यही बात मुझे उसकी चीख़ से भी ज़्यादा डरावनी लगी।

पूजा ने कमज़ोर-सी मुस्कान दी।

—भैया, आप आ गए। अच्छा हुआ। भाभी को समझाइए। मैं उस किराए वाले घर में वापस नहीं जा सकती। मेरी हालत—

अर्जुन ने उसकी ओर देखा तक नहीं।

उसने मज़दूरों की ओर देखा।

—किसी भी चीज़ को हाथ मत लगाना।

दोनों आदमी तुरंत पीछे हट गए।

सावित्री ने जीभ से आवाज़ निकाली।

—अर्जुन, बाहरवालों के सामने अपनी बीवी का गुलाम मत बनो।

अर्जुन ने अपने हाथ की फ़ाइल ऊपर उठाई।

—माँ, एक शब्द और कहने से पहले मुझे ठीक-ठीक बताइए कि आपने अनाया से क्या कहा था।

सावित्री ने बाँहें मोड़ लीं।

—सच ही तो कहा। कि एक लड़की को इतना बड़ा कमरा नहीं चाहिए, जब उसकी अपनी बुआ गर्भवती हो। कि परिवार पहले आता है। कि यह फ़्लैट तुम्हारा है, इसलिए आख़िरी फैसला तुम्हारा होगा।

अर्जुन ने फ़ाइल खोल दी।

उसकी आवाज़ और भी ठंडी हो गई।

—बहुत अच्छा। तो फिर आज बात करते हैं कि यह फ़्लैट असल में किसका है।

सावित्री की मुस्कान आधे सेकंड तक बनी रही।

फिर उनकी नज़र अर्जुन के हाथ में मौजूद पहले पन्ने पर पड़ी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.