
चाचा लोग पेंशन के नियमों पर चर्चा कर रहे थे।
बच्चे पानी के कैनों के पास दौड़ रहे थे।
रोहन चालीस मिनट देर से आया। उसने धूप का चश्मा, लिनन की शर्ट पहन रखी थी और उसके चेहरे पर वही लापरवाह मुस्कान थी जो उसकी हर नाकामी के बाद भी कभी नहीं बदली थी।
उसने ज़ोर से पापा को गले लगाया।
—मेरे हीरो! आख़िरकार आज़ाद आदमी!
सबने ऐसे ताली बजाई जैसे सिर्फ़ वहाँ पहुँचकर उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया हो।
अम्मा का चेहरा खुशी से चमक उठा।
—देखो, मेरा बेटा आ गया।
मेरा बेटा।
हमारे बच्चे नहीं।
तुम दोनों नहीं।
मेरा बेटा।
मैं मखमली थैली हाथ में लिए साइड टेबल के पास खड़ी थी और नई सजावट के बीच वही पुराना नाटक देख रही थी।
रोहन के दो कारोबार असफल हो चुके थे।
पापा उसे महत्वाकांक्षी कहते थे।
रोहन ने तीन रिश्तेदारों से पैसे उधार लिए थे और किसी को वापस नहीं किए।
अम्मा उसे बदकिस्मत कहती थीं।
एक बार रोहन ने गोवा घूमने जाने के लिए पापा का एटीएम कार्ड इस्तेमाल किया था और कहा था कि यह उसकी “मेंटल हेल्थ ब्रेक” थी।
उन्होंने कहा था कि लड़कों को थोड़ी खुली हवा चाहिए होती है।
लेकिन मैंने प्रमोशन टाल दिए, अपमान सहती रही और आधी रात को पैसे ट्रांसफ़र करती रही, फिर भी मैं बहुत घमंडी, बहुत आधुनिक, बहुत अविवाहित और बहुत दूर रहने वाली बेटी थी।
भाषणों के बाद किसी ने पापा के गले में चंदन की माला डाल दी।
वे भावुक लग रहे थे।
एक पल के लिए मैं सब कुछ भूल गई।
मुझे सिर्फ़ वही आदमी दिखाई दिया जिसने मुझे साइकिल चलाना सीखते समय सीट पकड़कर संभाला था।
वही आदमी जिसने छह साल की उम्र में बुखार होने पर मुझे गोद में उठाकर रखा था।
वही आदमी जिसे मैं अहंकार, पितृसत्ता और निराशा की परतों के नीचे से वापस पाने की कोशिश करती रही।
अम्मा ने मुझे आगे धकेला।
—अब अपना तोहफ़ा दो, उन्होंने फुसफुसाकर कहा। —लोग देख रहे हैं।
मैं मंच पर चली गई।
माइक्रोफ़ोन से तीखी आवाज़ आई।
पापा ने मुझे हल्के आश्चर्य से देखा, जैसे वे भूल गए हों कि मैं भी इस कार्यक्रम का हिस्सा हूँ।
मैंने हाथ जोड़ लिए।
—बधाई हो, पापा। उम्मीद करती हूँ कि आपका रिटायरमेंट का जीवन आपको कुछ सुकून देगा।
फिर मैंने मखमली थैली उनकी हथेली पर रख दी।
उन्होंने उसे खोला।
कार की चाबी पीली मंच की रोशनी में चमक उठी।
तीन सेकंड के लिए मेरे पिता का चेहरा बदल गया।
उनकी आँखें फैल गईं।
उनके होंठ हल्के से खुल गए।
वे बिल्कुल उस छोटे बच्चे जैसे लग रहे थे जिसे इतनी बड़ी चीज़ मिल गई हो कि वह यह दिखावा भी न कर सके कि उसे उसकी चाह नहीं थी।
पूरा हॉल गूँज उठा।
—अरे वाह!
—इनोवा!
—अनन्या ने तो कमाल कर दिया!
—विक्रम, तुम्हारी बेटी तो रानी है!
किसी ने ताली बजानी शुरू की। फिर सबने ताली बजाई।
पापा ने चाबी हल्की-सी ऊपर उठाई।
मैंने मूर्खता से सोचा कि शायद यही वह पल होगा।
प्यार नहीं।
उसकी उम्मीद मैंने बहुत पहले छोड़ दी थी।
बस एक स्वीकार्यता।
एक साफ़-सा वाक्य।
“मेरी बेटी ने मेरे लिए यह किया है।”
बस इतना ही काफ़ी होता।
लेकिन इसके बजाय उन्होंने माइक्रोफ़ोन में मुस्कुराते हुए कहा।
—हाँ, हाँ, यह अच्छी कमाई करती है। कम से कम आज इसे याद तो आया कि इसका भी एक पिता है।
पहले हल्की-सी हँसी सुनाई दी।
फिर वह फैल गई क्योंकि लोग हमेशा कमरे की सबसे ताकतवर आवाज़ का साथ देते हैं।
मैं वहीं स्थिर खड़ी रही।
पापा मज़े लेते हुए आगे बोले।
—पैसा तो है, लेकिन उससे क्या फ़ायदा? बेटी दूसरे शहर में अकेली रहती है, न पति है, न बच्चे, हमेशा काम में व्यस्त। रोहन की तनख़्वाह भले बड़ी नहीं है, लेकिन वही मेरा असली सहारा है। बेटा परिवार के साथ खड़ा रहता है। बेटी पैसे भेज देती है और सोचती है कि उसका फ़र्ज़ पूरा हो गया।
हॉल जगह-जगह से शांत होने लगा।
कुछ रिश्तेदारों ने अपनी प्लेटों की ओर देखना शुरू कर दिया।
अम्मा की मुस्कान जम गई।
रोहन कुर्सी पर पीछे टिक गया और मुस्कुराने लगा।
पापा ने फिर से कार की चाबी ऊपर उठाई।
—खैर, कार यहीं रहेगी। रोहन मुझे चलाकर ले जाएगा। कम से कम मेरा बेटा अपने पिता की सही तरह से देखभाल करना जानता है।
मेरे भीतर कुछ ज़ोर से नहीं टूटा।
बस झुकना बंद हो गया।
इतने सालों तक समझाना।
इतनी रातें उनके बिल भरने से पहले बैंक बैलेंस जाँचते हुए बिताना।
इतने त्योहार जब मैं साड़ियाँ, दवाइयाँ, बीमा का नवीनीकरण और पैसे भेजती रही, जबकि वे लोगों से कहते थे कि मैं “बहुत घमंडी” हो गई हूँ।
सब कुछ अचानक बिल्कुल साफ़ हो गया।
मैं उनके और पास चली गई।
पापा ने माइक्रोफ़ोन नीचे कर लिया।
—क्या?
मैंने उनके हाथ में पकड़ी चाबी की ओर देखा।
फिर उनकी ओर देखा।
—उसे वापस दीजिए।
वे पलकें झपकाने लगे।
—क्या बकवास है?
मेरी आवाज़ शांत रही।
इससे लोग चिल्लाने से भी ज़्यादा असहज हो गए।
—चाबी। वापस दीजिए।
अम्मा जल्दी से मेरी ओर बढ़ीं।
—अनन्या, तमाशा मत करो।
मैं उनकी ओर मुड़ी।
—अम्मा, तमाशा तो पहले ही हो चुका है। मैं सिर्फ़ अपना हिस्सा इससे अलग कर रही हूँ।
पापा का चेहरा गुस्से से भर गया।
—यह मेरा तोहफ़ा है।
—नहीं, पापा। यह आपका तोहफ़ा तब था जब इसे एक पिता को दिया गया था। उस आदमी को नहीं, जो अपनी बेटी से लेता है और अपने बेटे की सिर्फ़ साँस लेने के लिए तारीफ़ करता है।
पूरा हॉल हैरानी से साँस खींच उठा।
रोहन खड़ा हो गया।
—अक्का, बस करो। तुम बहुत घटिया व्यवहार कर रही हो।
मैंने उसकी ओर देखा।
—तो फिर कार तुम खरीद लो।
उसका मुँह बंद हो गया।
एक चाचा खाँसने लगे।
किसी ने मेरा नाम चेतावनी की तरह फुसफुसाया।
पापा ने चाबी और कसकर पकड़ ली।
—तुम मेरे रिटायरमेंट वाले दिन मेरा अपमान करना चाहती हो?
मैं हल्का-सा मुस्कुराई।
—नहीं। यह आपने खुद किया है। मैं तो सिर्फ़ अपना पैसा आपके अपमान से वापस ले रही हूँ।
मैंने हाथ बढ़ाकर उनके हाथ से चाबी निकाल ली।
वे इतने स्तब्ध थे कि मुझे रोक भी नहीं पाए।
फ़ोटोग्राफ़र ने अपना कैमरा नीचे कर लिया।
अम्मा ने मेरी कलाई पकड़ ली।
उनके नाखून मेरी त्वचा में धँस गए।
—ज़रा शर्म करो। लोग देख रहे हैं।
मैंने धीरे से उनका हाथ हटा दिया।
—अच्छा है। एक बार उन्हें पूरी सच्चाई भी देखने दीजिए।
मैं मंच से नीचे उतर गई।
मेरे पीछे पापा की आवाज़ गूँज उठी।
—जाओ! अपनी कार अपने पास रखो! हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए!
मैं हॉल के प्रवेश द्वार के पास रुक गई।
पूरा कमरा मेरी ओर देख रहा था।
यहाँ तक कि बच्चे भी चुप हो गए थे।
मैं मुड़ी।
—कृपया इस बात को सुबह तक याद रखिएगा।
फिर मैं बाहर निकल गई।
बाहर मुख्य सड़क पर शाम का ट्रैफ़िक गरज रहा था।
ऑटो के हॉर्न बज रहे थे।
एक कुत्ता परिसर की दीवार के पास सो रहा था।
मेरे हाथ काँप रहे थे, लेकिन मेरा मन अजीब तरह से बिल्कुल साफ़ था।
मैं कैब में बैठी और अपना बैंकिंग ऐप खोला।
एक-एक करके मैंने सभी स्थायी निर्देश बंद कर दिए।
होम लोन सहायता ट्रांसफ़र।
मेडिकल रिइम्बर्समेंट टॉप-अप।
बिजली और मेंटेनेंस का ऑटो-पे।
रोहन की हर महीने वाली “अस्थायी मदद।”
वह क्रेडिट कार्ड जो मेरे खाते से जुड़ा था लेकिन पापा के बटुए में रखा रहता था।
फिर मैंने अपने वकील को संदेश भेजा।
“फ़ाइल सक्रिय कर दीजिए। पूरी तरह फ़्रीज़। मौखिक पहुँच नहीं। परिवार के लिए भी कोई अपवाद नहीं।”
उन्होंने दो मिनट के भीतर जवाब दिया।
“क्या आपको पूरा यक़ीन है?”
मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर रंग-बिरंगी लाइटों से जगमगाते हॉल की ओर देखा।
खुले दरवाज़े से मुझे पापा अभी भी मंच पर खड़े दिखाई दे रहे थे, गुस्से से लाल चेहरा लिए, और उनके चारों ओर लोग उनकी इज़्ज़त बचाने की कोशिश कर रहे थे।
मैंने टाइप किया:
“हाँ। नोटिस कल सुबह भेज दीजिए।”
अगली सुबह ठीक 6:42 बजे मेरा फ़ोन बजा।
पापा का फ़ोन था।
न अम्मा रो रही थीं।
न रोहन चिल्ला रहा था।
पापा।
मैंने बिना “हैलो” कहे फ़ोन उठाया।
उनकी साँसें भारी चल रही थीं।
ज़िंदगी में पहली बार मेरे पिता की आवाज़ डरी हुई लग रही थी।
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