
PART 1
“अगर भूख लगे तो अपने मामा से कहना, मैंने उन्हें इसी काम के लिए छोड़ा है,” यह पर्ची प्लास्टिक की थैली में रखी थी, और उसके पास 2 बच्चे अरविंद के आँगन में काँप रहे थे।
शनिवार की दोपहर थी। दिल्ली के लाजपत नगर की गर्म हवा दीवारों से टकराकर लौट रही थी। अरविंद सब्ज़ी मंडी से लौटा ही था। उसने थैले मेज़ पर रखे, चप्पल उतारी और तभी रसोई के पीछे से हल्की सी सरसराहट सुनी। आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई चोरी नहीं, छिपना चाहता हो।
उसने झाड़ू का डंडा उठाया और पिछला दरवाज़ा खोला।
सामने 11 साल की अनाया बैठी थी, अपनी पुरानी स्कूल बैग को सीने से लगाए। उसके पास 8 साल का कबीर खड़ा था, आँखें सूजी हुईं, होंठ सूखे, चेहरा धूप से लाल। दोनों ने मोटी हुडी पहनी हुई थी, जबकि जून की गर्मी में साँस लेना मुश्किल था। उनके पास एक थैली थी—कुछ बिस्कुट, 2 कुचले हुए जूस पैक, आधी खाली पानी की बोतल और वही पर्ची।
अरविंद ने अपनी बहन कविता के बच्चों को कई साल से ठीक से नहीं देखा था।
कविता हमेशा घर की लाडली रही थी। माँ-बाप ने उसके हर स्वार्थ को “नाज़ुक दिल” कहकर माफ़ किया था। अरविंद ने बचपन से देखा था कि गलती उसकी हो या कविता की, डाँट उसी को पड़ती थी। वह 21 साल की उम्र में घर छोड़कर अलग रहने लगा था। रिश्ते धीरे-धीरे टूट गए। बस रिश्तेदारों की बातों से पता चला था कि कविता की शादी जयंत से हुई, फिर जयंत की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, और उसके 3 बच्चे हैं—अनाया, कबीर और सबसे छोटी परी।
परी कविता की दुनिया थी।
महंगे फ्रॉक, ब्यूटी कॉन्टेस्ट, नृत्य प्रतियोगिता, चमकदार हेयरबैंड, हर त्योहार पर फोटो। कविता सोशल मीडिया पर लिखती—“मेरी राजकुमारी”, “मेरा गर्व”, “मेरी जीत”। अनाया और कबीर तस्वीरों में कभी पीछे दिखते, कभी आधे कटे हुए, कभी परी का बैग पकड़े।
आज अरविंद को समझ आया कि ऐसा क्यों था।
“मामा…” अनाया की आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे वह माफी माँग रही हो, “मम्मी ने कहा था, आप आएँ तब तक यहीं बैठना।”
कबीर कुछ नहीं बोला। उसने बस अपनी बहन का दुपट्टा पकड़ लिया।
अरविंद ने दोनों को तुरंत अंदर बुलाया। पानी दिया, दाल-चावल गरम किए, पराठे बनाए। कबीर ने पहली रोटी खत्म करने के बाद बहुत डरते हुए पूछा, “एक और ले सकता हूँ?”
अरविंद का गला भर आया।
“जितना खाना है, खाओ।”
कबीर ने तुरंत दरवाज़े की तरफ देखा।
“मम्मी नाराज़ तो नहीं होंगी?”
अरविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।
जब बच्चे सोफे पर बैठे थे, उसने पर्ची पूरी पढ़ी। कविता परी को लेकर गोवा गई थी। एक महीने के लिए। किसी “लिटिल स्टार इंडिया” प्रतियोगिता के बाद समुद्र किनारे आराम करने। उसने लिखा था कि अनाया और कबीर को ऐसे सफर में ले जाने का कोई मतलब नहीं, “वहाँ सुंदर बच्चों का माहौल होता है, रोनी शक्ल वालों का नहीं।”
उसने होटल का नाम नहीं छोड़ा। पैसे नहीं छोड़े। स्कूल की जानकारी नहीं छोड़ी। अनुमति नहीं माँगी।
बस 2 बच्चों को आँगन में छोड़ दिया।
जैसे पुराने सामान रख दिए हों।
अरविंद ने कविता को फोन किया। 1 बार। 5 बार। 12 बार। फोन बंद। अनाया के पुराने मोबाइल में “मम्मी” नाम से नंबर था, वह भी बंद। उसने मौसी, चाचा, पुरानी पड़ोसन, सबको फोन किया। कुछ ने कहा, “कविता तो ऐसी ही है।” किसी ने सचमुच चौंककर नहीं पूछा कि बच्चे कैसे हैं।
तभी अरविंद ने 1098 चाइल्डलाइन पर फोन किया।
शाम तक एक महिला अधिकारी और स्थानीय पुलिस आई। अनाया हर सवाल का जवाब ऐसे दे रही थी जैसे गलती उसी की हो। कबीर सिर झुकाए बैठा रहा। जब अधिकारी ने अलग से पूछा, तब अनाया ने बताया कि माँ सुबह 7 बजे उन्हें ऑटो से लाकर बाहर छोड़ गई थी और कहा था, “दरवाज़ा मत खटखटाना। तमाशा किया तो लौटकर देख लेना।”
उस रात बच्चों को अस्थायी रूप से अरविंद के पास रहने की अनुमति मिली।
कबीर फर्श पर बिछे गद्दे पर सोया, पर दरवाज़े के पास। सोने से पहले उसने पूछा, “मामा, मम्मी हमें लेने आएँगी न?”
अरविंद ने उसके माथे पर हाथ रखा।
“पता नहीं, बेटा। लेकिन तुम दोनों यहाँ सुरक्षित हो।”
रात 2 बजे अरविंद का फोन बजा।
कविता का संदेश था—
“मेरा ट्रिप खराब मत करना। इतना ड्रामा मत कर। सिर्फ अनाया और कबीर ही तो हैं।”
अरविंद स्क्रीन देखता रह गया।
उसे तब नहीं पता था कि उसी वक्त गोवा के उस आलीशान रिसॉर्ट की तरफ कुछ लोग निकल चुके थे—कविता से वह चीज़ छीनने, जिसे वह सच में अपना मानती थी।
PART 2
बाल कल्याण समिति ने कविता को ढूँढ़ने में ज़्यादा समय नहीं लगाया।
गोवा के एक बीच रिसॉर्ट में वह परी के साथ थी। स्पा बुक था, फोटोशूट बुक था, महंगे गाउन बुक थे, और अगले 20 दिनों तक समुद्र किनारे रहने का पूरा भुगतान पहले से हो चुका था।
जब स्थानीय अधिकारी रिसॉर्ट पहुँचे, कविता ने लॉबी में चिल्लाकर कहा, “मेरे बच्चे अपने मामा के पास हैं। यह पारिवारिक बात है, अपराध नहीं!”
लेकिन अपराध उसकी ही लिखी पर्ची में था।
उसमें 1 महीने का सफर था, बिना सहमति के छोड़े गए 2 नाबालिग थे, बंद फोन था और बच्चों का डर था।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अधिकारियों ने कहा कि जाँच पूरी होने तक परी भी कविता के साथ नहीं रह सकती। परी को उसके दिवंगत पिता जयंत के माता-पिता, राजेश और सुनीता मल्होत्रा, के पास भेजा जाएगा।
कविता ने पहली बार अनाया या कबीर का नाम नहीं लिया।
वह सिर्फ चीखी, “मेरी परी को कोई हाथ नहीं लगाएगा!”
उसी शाम अरविंद को सुनीता का फोन आया। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
“बेटा, हमें पता ही नहीं था कि अनाया और कबीर कहाँ हैं। कविता कहती थी तुम खतरनाक आदमी हो।”
अरविंद चुप रहा।
फिर सुनीता ने कहा, “जयंत मरने से पहले अक्सर कहता था—कविता परी को गुड़िया बना रही है, और बाकी 2 बच्चों को नौकर।”
अरविंद के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
असल कहानी अब शुरू हुई थी।
PART 3
कविता गोवा से दिल्ली लौटी तो सीधे बच्चों के पास नहीं गई। उसने पहले अरविंद को 37 ऑडियो संदेश भेजे।
“तू हमेशा से मुझसे जलता था।”
“मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।”
“अनाया और कबीर तेरे पास सुरक्षित थे, फिर तूने तमाशा क्यों बनाया?”
“परी को उसके दादा-दादी के पास भेजकर तूने मेरी जान निकाल दी।”
अरविंद ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने सभी संदेश सुरक्षित रख लिए।
अनाया और कबीर ने उन दिनों माँ के बारे में कम पूछा। मगर जब उन्हें बताया गया कि परी अपने दादा-दादी के पास है, दोनों के चेहरे पर अजीब सा भाव आया—थोड़ी राहत, थोड़ा डर। जैसे उन्हें पहली बार लगा हो कि किसी ने परी को भी उस दुनिया से बाहर निकाला है, जहाँ प्यार हमेशा ताज और कैमरे से मापा जाता था।
राजेश और सुनीता मल्होत्रा नोएडा में रहते थे। राजेश रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे, सुनीता पहले स्कूल में अध्यापिका थीं। उनका घर बड़ा नहीं था, पर साफ था। सबसे बड़ी बात—वहाँ 3 कमरों में 3 अलग बिस्तर लगे थे। परी के लिए महंगा गुलाबी कमरा और बाकी बच्चों के लिए कोना नहीं। बराबरी थी। दीवारों पर कोई ताज नहीं, कोई प्रतियोगिता की ट्रॉफी नहीं, बस परिवार की पुरानी तस्वीरें थीं जिनमें जयंत मुस्कुरा रहा था।
पहली मुलाकात में परी ने अनाया को देखकर कहा, “मम्मी कह रही थीं, तुम दोनों की वजह से हमारी छुट्टी खराब हुई।”
कमरा ठंडा पड़ गया।
कबीर पीछे हट गया। अनाया ने मुट्ठियाँ भींच लीं। अरविंद ने सोचा, वह फट पड़ेगी। लेकिन अनाया ने बस धीरे से कहा, “हमें आँगन में छोड़ा गया था, परी। छुट्टी हमने नहीं खराब की।”
परी चुप हो गई।
शायद पहली बार उस वाक्य ने उसके मन में बिना माँ की आवाज़ के जगह बनाई।
अगले हफ्तों में सब कुछ खुलने लगा। स्कूल के शिक्षक बोले कि अनाया अक्सर बिना प्रोजेक्ट सामग्री आती थी, जबकि परी हर शुक्रवार नई ड्रेस में फोटोशूट के लिए छुट्टी लेती थी। पड़ोसी बोले कि कबीर कई बार बालकनी में खड़ा रोता था, और कविता कहती थी, “लड़के रोते अच्छे नहीं लगते।” घरेलू काम करने वाली मीना ने बताया कि अनाया 10 साल की उम्र से परी का बैग तैयार करती थी, उसके जूते पॉलिश करती थी और कबीर को खाना खिलाती थी, जबकि कविता ऑनलाइन लाइव आकर मातृत्व पर भाषण देती थी।
सबसे दर्दनाक बात कबीर से निकली।
काउंसलर ने पूछा, “तुम खाना जेब में क्यों छिपाते हो?”
कबीर ने धीरे से कहा, “कभी-कभी रात को भूख लगती थी। मम्मी कहती थीं, रसोई बंद है। परी को दूध मिलता था, हमें पानी पीकर सोना होता था।”
सुनीता ने वह सुनकर चेहरा ढक लिया। राजेश कमरे से बाहर चले गए। अरविंद दीवार की तरफ मुड़ गया, क्योंकि उसे डर था कि उसकी आँखों का गुस्सा बच्चों को डरा देगा।
कविता को नियंत्रित मुलाकातों की अनुमति मिली।
पहली मुलाकात में वह एक बड़ा गुलाबी गिफ्ट बैग लेकर आई। उसमें परी के लिए गुड़िया, चमकदार ड्रेस, बालों का सेट, चॉकलेट और एक छोटा मुकुट था। अनाया के लिए एक साधारण कॉपी। कबीर के लिए कुछ नहीं।
अधिकारी ने पूछा, “कबीर के लिए?”
कविता ने होंठ सिकोड़ दिए। “उसे खिलौने सँभालने नहीं आते।”
कबीर ने तुरंत सिर झुका लिया। अनाया ने उसकी हथेली पकड़ ली। परी गिफ्ट बैग देख रही थी, मगर उसके चेहरे पर पुरानी खुशी नहीं थी। उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि जो उसे मिलता था, वह उसके भाई-बहनों से छीनकर आता था।
कविता कुर्सी पर बैठी और परी से बोली, “मेरी रानी, तू जानती है न, मम्मी तुझे सबसे ज़्यादा प्यार करती है? किसी की बातों में मत आना।”
कमरे में खामोशी जम गई।
अनाया उठकर बाहर चली गई। कबीर उसके पीछे भागा। कविता ने मुड़कर भी नहीं देखा।
तीसरी मुलाकात में सब कुछ टूट गया।
कविता ने मौका देखकर परी का हाथ पकड़ा और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। “चल, मेरी बच्ची। तुझे यहाँ रखने का किसी को अधिकार नहीं।”
सुनीता सामने आ गईं। अधिकारी ने कहा, “कविता जी, बच्ची का हाथ छोड़िए।”
कविता चीखी, “यह मेरी बेटी है! मेरी! बाकी बच्चों से मुझे मत सिखाओ माँ होना!”
परी रोने लगी। अनाया दरवाज़े से चिल्लाई, “उसे डराइए मत!” कबीर राजेश के पीछे छिप गया।
पुलिस बुलानी पड़ी।
कविता बाहर जाते हुए भी चीख रही थी, “सब पछताओगे! मैं अपनी परी वापस लेकर रहूँगी!”
उस रात बाल कल्याण समिति की अधिकारी ने अरविंद से कहा, “अब मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं रहा। यह बच्चों की मानसिक सुरक्षा का मामला है।”
अरविंद जानता था।
कविता ने सबके सामने दिखा दिया था कि उसे 3 बच्चे नहीं चाहिए थे। उसे सिर्फ अपनी चमकदार परछाईं चाहिए थी।
सुनवाई एक ठंडी सुबह हुई। कमरा छोटा था, दीवारों पर सरकारी फाइलों की गंध थी। कोई फिल्मी नाटक नहीं हुआ। कोई अचानक टूटकर रोने वाला दृश्य नहीं। सिर्फ कागज़ थे, बयान थे, और सच था—जो धीरे-धीरे कविता की सजाई हुई छवि को काट रहा था।
कविता सलीके से तैयार होकर आई। सफेद कुर्ती, बड़े चश्मे, हाथ में फाइल। उसने कहा कि वह अकेली माँ है, उसे आराम का हक है। उसने कहा कि अरविंद बचपन से उससे जलता था। उसने कहा कि राजेश और सुनीता बच्चों की पेंशन और जयंत की बीमा राशि पर नज़र रखे हुए हैं। उसने कहा कि अनाया नाटकीय है, कबीर कमजोर है, और परी संवेदनशील है।
समिति की अध्यक्ष ने पूछा, “क्या आपने अपने भाई से पहले अनुमति ली थी?”
कविता चुप रही।
“क्या आपने 1 महीने के लिए बच्चों के खर्च, दवा, स्कूल या आपातकालीन संपर्क छोड़ा था?”
कविता ने कहा, “वह उनका मामा है।”
“क्या आपने फोन चालू रखा?”
“मैं छुट्टी पर थी।”
यह वाक्य कमरे में गिरा और बहुत देर तक पड़ा रहा।
अरविंद ने बयान दिया। उसने आँगन का दृश्य बताया। पर्ची दिखाई। कबीर की भूख, अनाया का डर, बंद फोन, 2 बजे का संदेश। उसने कहा, “मैं बच्चों की परवरिश का विशेषज्ञ नहीं हूँ। पर इतना जानता हूँ कि बच्चे सामान नहीं होते।”
कविता ने उसे घूरा, जैसे वह अभी भी सोच रही हो कि कोई आकर उसे बचा लेगा।
फिर सुनीता ने जयंत की पुरानी डायरी जमा की। उसमें कुछ पन्ने थे जहाँ जयंत ने लिखा था कि उसे चिंता है—कविता परी को प्रतियोगिताओं में धकेल रही है, अनाया पर घर का बोझ डाल रही है, और कबीर को “बेकार” कहती है। उसने यह भी लिखा था कि अगर उसे कभी कुछ हो गया तो उसके माता-पिता बच्चों पर नज़र रखें।
कविता का चेहरा पहली बार फीका पड़ा।
वह डायरी शायद उसे याद नहीं थी।
स्कूल रिपोर्ट, पड़ोसियों के बयान, मीना का बयान, बच्चों की काउंसलिंग रिपोर्ट—सब एक-एक करके सामने आए। कोई एक घटना नहीं थी। यह सालों की उपेक्षा थी। रोज़ का छोटा अन्याय, जो बच्चों की हड्डियों में डर बनकर जमा हो गया था।
जब समिति ने कविता से पूछा, “आपके लिए 3 बच्चों में फर्क क्यों था?”
कविता भड़क गई।
“हर बच्चा अलग होता है। परी में प्रतिभा है। वह सुंदर है। उसे मौका देना गलत है क्या? अनाया तो शुरू से उदास रहती है। कबीर हर बात पर रोता है। मैं क्या करूँ?”
कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा।
कभी-कभी इंसान खुद ही अपना फैसला लिख देता है।
निर्णय आया—3 बच्चों की प्राथमिक अभिरक्षा अस्थायी रूप से राजेश और सुनीता को दी गई। मामला परिवार न्यायालय में विस्तृत अभिरक्षा आदेश के लिए भेजा गया। कविता की मुलाकातें निलंबित कर दी गईं, जब तक वह पालन-पोषण परामर्श, मानसिक मूल्यांकन और नियमित थेरेपी पूरी न करे। बच्चों के स्कूल, उपचार और सुरक्षा संबंधी निर्णय दादा-दादी लेंगे। अरविंद को सहयोगी अभिभावक के रूप में दर्ज किया गया, ताकि आवश्यकता पड़ने पर बच्चे उसके पास सुरक्षित रह सकें।
कविता ने कुर्सी पीछे धकेली।
“तुम लोग मेरी जिंदगी बर्बाद कर रहे हो!”
समिति की अध्यक्ष ने शांत स्वर में कहा, “नहीं, कविता जी। हम बच्चों की जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे हैं।”
उस दिन कविता बिना परी को गले लगाए चली गई। उसने अनाया को देखा भी नहीं। कबीर तो जैसे उसके लिए कमरे में था ही नहीं।
बाहर सड़क पर अरविंद ने गहरी साँस ली। उसे जीत जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। बच्चों के मामलों में जीत नहीं होती। बस इतना होता है कि नुकसान वहीं रोक दिया जाए, जहाँ अभी थोड़ा जीवन बचा हो।
अगले महीने कठिन थे।
अनाया रात में उठकर रसोई देखती। सुनीता ने एक दिन उसे पकड़ लिया। लड़की डर गई, जैसे चोरी करते पकड़ी गई हो। सुनीता ने डिब्बा खोलकर कहा, “यह घर है, बिटिया। भूख लगे तो खाना माँगा नहीं जाता, लिया जाता है।”
अनाया रो पड़ी। वह रोना सिर्फ भूख का नहीं था। वह उन सालों का था जब उसे बच्ची होने की अनुमति नहीं मिली थी।
कबीर ने धीरे-धीरे जेब में खाना छिपाना बंद किया। पहले वह पराठे का टुकड़ा रखता, फिर बिस्कुट, फिर सिर्फ आदत से जेब टटोलता। एक दिन उसने खुद कहा, “दादी, आज मैंने कुछ नहीं छिपाया।”
राजेश ने अखबार मोड़कर उसे गले लगा लिया।
परी का सफर सबसे उलझा हुआ था। वह अपनी माँ को याद करती थी। कभी गुस्से में कहती, “मम्मी मुझे स्टार बनाना चाहती थीं, आप लोग मुझे साधारण बना रहे हो।” कभी अनाया के बिस्तर पर आकर सो जाती। कभी कबीर से लड़ती कि उसे ज्यादा चॉकलेट क्यों मिली। बराबरी उसके लिए नई थी, और नई चीजें हमेशा मीठी नहीं लगतीं।
उसके 7वें जन्मदिन पर सुनीता ने घर में छोटी सी पूजा और बच्चों की पार्टी रखी। कोई मेकअप आर्टिस्ट नहीं, कोई कैमरा टीम नहीं, कोई मुकुट नहीं। बस गुब्बारे, समोसे, चॉकलेट केक और स्कूल के 8 बच्चे।
परी ने मेज़ देखा और पूछा, “बस इतना?”
अनाया सिहर गई। कबीर ने प्लेट नीचे रख दी।
सुनीता उसके सामने बैठीं। “हाँ, इतना। और इतना ही पूरा है। यहाँ प्यार गिफ्ट के आकार से नहीं मापा जाएगा।”
परी की आँखें भर आईं।
“तो मैं खास नहीं हूँ?”
राजेश ने धीरे से कहा, “तुम खास हो। पर तुम अकेली खास नहीं हो।”
उस दिन परी बहुत देर तक रोई। वह बिगड़ैल बच्चे की तरह नहीं रोई। वह उस बच्ची की तरह रोई जिसे पहली बार समझ आया कि उसे प्यार के नाम पर अलग-थलग रखा गया था। माँ ने उसे सिंहासन दिया था, बचपन नहीं।
धीरे-धीरे 3 भाई-बहन फिर बच्चे बनने लगे।
अनाया ने चित्र बनाना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे घर, जिनमें दरवाज़े बंद होते थे। फिर बड़े घर, जिनमें खिड़कियाँ खुली होती थीं। फिर एक दिन उसने 3 बच्चों और 3 बराबर बिस्तरों वाला चित्र बनाया। नीचे लिखा—“यहाँ कोई बाहर नहीं छोड़ा जाता।”
कबीर फुटबॉल खेलने लगा। वह मैदान में गिरता, उठता, फिर दौड़ता। हर गोल के बाद वह राजेश की तरफ देखता, जैसे पूछ रहा हो—देखा? मैं बेकार नहीं हूँ। राजेश हर बार ताली बजाते।
परी ने प्रतियोगिताएँ छोड़ दीं। कुछ महीनों तक वह उदास रही। फिर स्कूल के संगीत समूह में शामिल हुई। वहाँ कोई ताज नहीं था, बस बाकी बच्चों के साथ गाना था। पहली प्रस्तुति के दिन उसने चमकदार गाउन नहीं पहना, साधारण पीली फ्रॉक पहनी। मंच से उतरकर उसने अनाया से पूछा, “अच्छा था?”
अनाया ने उसे कसकर गले लगा लिया।
“बहुत अच्छा।”
कविता ने शुरुआत में बहुत धमकियाँ दीं। अदालत जाऊँगी। मीडिया बुलाऊँगी। सबको बदनाम कर दूँगी। फिर उसने थेरेपी की 2 बैठकों के बाद जाना बंद कर दिया। पालन-पोषण कोर्स में 1 दिन गई, फिर कहा कि उसे “गुनहगारों की तरह बैठना पसंद नहीं।” वकील बदला। फिर वकील ने मामला छोड़ दिया। रिश्तेदारों में उसने कहा कि बच्चे उससे छीन लिए गए। मगर जब पर्ची, संदेश और रिपोर्टें सामने आईं, लोग धीरे-धीरे चुप हो गए।
कभी जो लोग कहते थे, “माँ है, गलती हो जाती है,” वही अब आँखें चुराने लगे।
माँ होना ढाल नहीं है।
माँ होना अधिकार से पहले जिम्मेदारी है।
जिस हाथ ने जन्म दिया, वही हाथ अगर बच्चे को भूखा, डरा हुआ और अदृश्य बना दे, तो समाज का काम उस हाथ को रोकना है, चूमना नहीं।
कई साल बाद भी अरविंद के घर की पिछली कुंडी बदली नहीं गई। उसने जान-बूझकर उसे वैसा ही रखा। पर अब वहाँ एक छोटी नेमप्लेट लगी थी—“बच्चों के लिए दरवाज़ा हमेशा खुला है।”
अनाया अब 15 साल की थी। सीधी खड़ी होती, आँखों में बात करती। कबीर 12 का होकर पूरे घर में शोर मचाता। परी अब किसी से “मैं सबसे सुंदर हूँ” नहीं कहती थी। वह कभी अनाया के साथ रंग भरती, कभी कबीर के साथ गेंद खेलती, और कभी सुनीता की रसोई में गोल रोटी बनाने की असफल कोशिश करती।
तीनों पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे।
टूटे हुए बचपन तुरंत नहीं जुड़ते। मगर अब उनके पास समय था। खाना था। कमरा था। कोई सुनने वाला था। और सबसे बड़ी बात—अब किसी बच्चे को प्यार पाने के लिए दूसरे बच्चे से बेहतर साबित नहीं होना था।
एक शाम अरविंद ने अनाया को वही पुरानी पर्ची दिखाई, जो अब केस फाइल की कॉपी में सुरक्षित थी। अनाया ने बहुत देर तक उसे देखा।
“मामा,” उसने पूछा, “आपने इसे फेंका क्यों नहीं?”
अरविंद ने कहा, “क्योंकि कभी-कभी सबसे गंदी चीज़ ही सच का सबसे साफ सबूत बनती है।”
अनाया ने पर्ची मोड़ी और वापस रख दी।
“अच्छा हुआ आपने दरवाज़ा खोला था।”
अरविंद मुस्कुराया नहीं। उसकी आँखें भर आईं।
“नहीं, बिटिया। अच्छा हुआ तुमने इंतज़ार किया।”
कविता ने सोचा था कि उसने 2 बोझ आँगन में छोड़ दिए हैं।
पर उसी दिन उसने अपनी नकली ममता की चाबी भी वहीं गिरा दी थी।
और जब अंत में उसने 3 बच्चों को खोया, तो वह उनके टूटे दिलों के लिए नहीं रोई।
वह इसलिए रोई, क्योंकि पहली बार पूरी दुनिया ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.