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शादी के केक के सामने बीमार सास की विग खींचकर दुल्हन हंसती रही, लेकिन पिता ने माइक पर कहा “तुम छिपा हुआ कागज भूल गई” और पूरी महफिल ने बहू के लालच, बेटे की चुप्पी और परिवार की टूटती इज्जत देख ली

PART 1

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शादी के केक के सामने, नंदिनी ने अपनी बीमार सास मीरा मल्होत्रा की विग झटके से खींची और उसे ऐसे हवा में उठा दिया जैसे किसी दुश्मन पर जीत का झंडा फहरा रही हो।

जयपुर के बाहरी इलाके में बने आलीशान शीशमहल रिजॉर्ट की सफेद रोशनियों के नीचे 250 मेहमानों की सांस एक साथ अटक गई। फूलों की महक, ढोल की थाप, कैमरों की चमक और चांदी के बर्तनों की खनक अचानक किसी शर्मनाक सन्नाटे में डूब गई।

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नंदिनी लाल बनारसी लहंगे में बेहद खूबसूरत लग रही थी। माथे पर कुंदन का टीका, हाथों में चूड़ा, होंठों पर महंगा मेकअप और आंखों में घमंड की चमक। उसने हंसते हुए कहा, “जब इतनी दुखियारी मां बनने का शौक है, तो पूरा नाटक दिखना चाहिए न?”

मीरा वहीं खड़ी रह गई।

उसका सिर खुला था। 6 महीनों की कीमोथेरेपी ने उसके घने काले बाल छीन लिए थे। उसने हल्की आसमानी साड़ी पहनी थी, क्योंकि वह बार-बार कहती रही थी कि दुल्हन के दिन वह ज्यादा चमकना नहीं चाहती। मगर उस रात उससे चमक नहीं, उसकी इज्जत छीन ली गई थी।

राघव मल्होत्रा ने कुछ नहीं तोड़ा। न चिल्लाए, न किसी को धक्का दिया। उन्होंने बस धीरे से अपनी चश्मे की डंडी सीधी की, फर्श पर गिरी विग उठाई और मीरा के कंधों पर अपनी शॉल रख दी।

उनके चेहरे पर वह खामोशी थी जिससे बड़े-बड़े व्यापारी डरते थे। दिल्ली और जयपुर में फैले उनके होटल कारोबार ने उन्हें बहुत लोगों के झूठ पहचानना सिखाया था, मगर अपने इकलौते बेटे अर्जुन की चुप्पी आज उन्हें सबसे ज्यादा चुभ रही थी।

अर्जुन नंदिनी के पास खड़ा था। क्रीम शेरवानी, मोती की माला, चेहरे पर घबराहट। उसने अपनी मां को अपमानित होते देखा। उसने अपनी पत्नी को हंसते देखा। फिर भी वह वहीं जड़ बनकर खड़ा रहा।

मीरा ने होंठ खोले, पर आवाज नहीं निकली।

नंदिनी ने आंखें घुमाईं। “अरे बस भी कीजिए। शादी है, मातम नहीं। छोटी सी मस्ती थी।”

राघव ने अर्जुन की ओर देखा। “बोलो।”

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अर्जुन ने गला साफ किया। “पापा, प्लीज तमाशा मत बनाइए।”

यह वाक्य मीरा के चेहरे पर पड़े अपमान से भी ज्यादा गहरा लगा। उसने आंखें बंद कर लीं।

राघव ने धीरे से दोहराया, “तमाशा?”

अर्जुन ने नंदिनी का हाथ पकड़ना चाहा। “नंदिनी ने जानबूझकर नहीं किया। मां जानती हैं कि हम उनसे प्यार करते हैं।”

मीरा ने सिर झुका लिया। उसकी आंख से आंसू गिरा, मगर उसने पोंछा नहीं।

राघव को उसी पल समझ आ गया कि यह शादी सिर्फ गलत रिश्ता नहीं थी। यह अपने ही घर की दीवारों में छिपी दीमक थी।

उन्होंने केक के पास रखा माइक उठाया।

पूरे पंडाल में उनकी सांसों की आवाज गूंज गई।

“मेहमानों,” राघव बोले, “मैं आज अपने बेटे और बहू को आशीर्वाद देने वाला था। लेकिन अब जरूरी है कि कुछ सच इसी मंच से बोले जाएं।”

नंदिनी की मुस्कान आधी रह गई।

राघव ने दरवाजे की ओर इशारा किया। वहां से परिवार के वकील, आनंद मेहता, गहरे भूरे फोल्डर के साथ आगे बढ़े।

राघव ने कहा, “अर्जुन, जिस फार्महाउस में तुम दोनों सोमवार से रहने वाले थे, वह शादी का तोहफा नहीं था। वह मल्होत्रा ट्रस्ट की संपत्ति है। आज सुबह 10 बजे उसका उपयोग अधिकार रद्द कर दिया गया है।”

अर्जुन का रंग उड़ गया। “पापा…”

“और तुम्हारे नए इवेंट कारोबार के लिए दिए गए 30000000 रुपये दान नहीं थे। वह कर्ज था। दस्तखत तुम्हारे हैं।”

नंदिनी के पिता विक्रम बंसल अचानक खड़े हुए। आगरा के बड़े बिल्डर, भारी आवाज और उससे भी भारी अहंकार।

“यह क्या बदतमीजी है? शादी में हिसाब-किताब?”

राघव ने उनकी तरफ देखा। “आपकी बेटी ने मेरी पत्नी की बीमारी को शादी का मजाक बनाया है। हिसाब तो अब शुरू हुआ है।”

नंदिनी हंसी, पर आवाज कांप रही थी। “आप अपने बेटे को मेरे खिलाफ भड़का रहे हैं।”

मीरा ने पहली बार सिर उठाया। “मजाक वह होता है जिसमें किसी की आत्मा न टूटे, नंदिनी।”

नंदिनी झुंझला गई। “आप हर बात में बीमारी ले आती हैं। हर फोटो में उदासी। हर रस्म में सहानुभूति। कोई भी दुल्हन यह नहीं चाहेगी।”

अर्जुन ने धीमे कहा, “नंदिनी, बस करो।”

“तुम चुप रहो,” नंदिनी फट पड़ी। “तुम हमेशा अपने पापा से डरते हो।”

राघव ने फोल्डर से एक कागज निकाला।

“डर की बात निकली है, तो उस छिपे दस्तावेज की भी बात कर लेते हैं, जिसे तुम लोग भूल गए थे।”

पूरा पंडाल पत्थर हो गया।

PART 2

विक्रम बंसल का चेहरा राख जैसा पड़ गया। “राघव जी, सावधान रहिए।”

राघव की आवाज और ठंडी हो गई। “सावधानी 12 दिन पहले रखनी थी, जब आपके वकील ने अर्जुन को वह निजी समझौता भेजा था।”

अर्जुन ने कागज छीना। पंक्तियां पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं।

“यह क्या है, नंदिनी? इसमें लिखा है कि शादी के बाद मेरे हिस्सों का प्रबंधन तुम्हारे पिता की कंपनी संभालेगी?”

नंदिनी चुप रही।

अर्जुन ने और नीचे पढ़ा। “और अगर मां-पापा स्वास्थ्य या उम्र के कारण निर्णय लेने में असमर्थ घोषित किए जाएं, तो संपत्ति संरक्षण के नाम पर नियंत्रण हमारे पास आएगा?”

मीरा की उंगलियां कांप उठीं। “मुझे पागल और कमजोर साबित करना था?”

नंदिनी बोली, “यह अमीर परिवारों में सामान्य सुरक्षा होती है।”

राघव ने कहा, “सुरक्षा इंसानों की होती है। कब्जा संपत्ति पर होता है।”

तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज आई, “और यह सब योजना थी।”

सब मुड़े।

सफेद बालों वाली सावित्री, बंसल परिवार की पुरानी आया, हाथ में फोन लिए खड़ी थी।

नंदिनी चीखी, “सावित्री, बैठ जाओ।”

सावित्री ने कहा, “आज नहीं बिटिया। आज आपकी असली आवाज सब सुनेंगे।”

उसने फोन आनंद मेहता को दिया।

बड़ी स्क्रीन चमकी।

PART 3

स्क्रीन पर दुल्हन का कमरा दिखा। वीडियो थोड़ा कांप रहा था, जैसे दरवाजे की ओट से बनाया गया हो। नंदिनी आईने के सामने बैठी थी। उसके आसपास 4 सहेलियां थीं। मेकअप आर्टिस्ट उसके बालों में गजरा लगा रही थी। मेज पर जूस के ग्लास, गुलाब की पंखुड़ियां और महंगे गहने बिखरे पड़े थे।

नंदिनी की आवाज साफ सुनाई दी।

“वह मीरा आंटी मुझे बहुत परेशान करती हैं। हर जगह अपनी बीमारी लेकर खड़ी हो जाती हैं। आज केक के सामने उनकी विग निकालूंगी। सबको पता चले कि मेरी शादी में कोई और दुख की देवी नहीं बनेगी।”

एक सहेली ने पूछा, “अर्जुन कुछ बोलेगा?”

नंदिनी हंसी। “अर्जुन? वह तो मेरे एक आंसू से डर जाता है। उसे बस पापा से बड़ा आदमी दिखना है। वह मां के लिए आवाज नहीं उठाएगा।”

दूसरी ने कहा, “अगर मीरा आंटी रो पड़ीं तो?”

नंदिनी ने होंठों पर लिपस्टिक लगाते हुए कहा, “तो और अच्छा। लोग 2 मिनट दया करेंगे, फिर मिठाई खाएंगे।”

वीडियो में दरवाजा खुला। विक्रम बंसल अंदर आए।

“नंदिनी, ज्यादा जल्दी मत करना,” उन्होंने धीमे कहा। “पहले अर्जुन से वह समझौता निकलवा लो। शादी के बाद धीरे-धीरे मल्होत्रा की संपत्ति पर पकड़ बनेगी। राघव बूढ़ा है, मीरा बीमार है। दोनों को भावुक, कमजोर और निर्णयहीन साबित करना मुश्किल नहीं होगा।”

नंदिनी ने आईने में खुद को देखते हुए कहा, “अगर अर्जुन पीछे हट गया?”

विक्रम मुस्कुराए। “तुम जानती हो उसे कैसे संभालना है। प्यार, अपराधबोध और आराम की आदत। आदमी वहीं बंधता है जहां उसकी रीढ़ पहले से कमजोर हो।”

वीडियो बंद हो गया।

पंडाल में ऐसा सन्नाटा था कि दूर किचन से गिरती थाली की आवाज भी चाकू जैसी लगी।

अर्जुन ने नंदिनी की तरफ देखा। उसका चेहरा दूल्हे का नहीं, किसी टूटे हुए बच्चे का लग रहा था।

“तुमने सब सोचा था?”

नंदिनी ने पहली बार इनकार नहीं किया। उसने ठोड़ी उठाई। “मैंने हमारा भविष्य सोचा था। तुम कभी कुछ तय नहीं करते। तुम्हारे पापा पैसा देते हैं, तुम्हारी मां रोती हैं, और तुम बीच में खड़े रहते हो। मैंने बस खेल समझ लिया।”

मीरा ने शॉल कसकर पकड़ ली। उसके चेहरे पर दर्द था, मगर इस बार वह झुकी नहीं।

विक्रम बंसल ने गरजकर कहा, “यह वीडियो गैरकानूनी है।”

आनंद मेहता ने शांत स्वर में कहा, “धमकी, षड्यंत्र और वित्तीय दबाव भी गैरकानूनी हैं। बाकी अदालत देख लेगी।”

राघव ने सुरक्षा कर्मियों को इशारा किया। “नंदिनी जी और उनके पिता को बाहर ले जाइए।”

नंदिनी चीखी, “मैं मल्होत्रा परिवार की बहू हूं।”

अर्जुन ने बहुत धीमे कहा, “नहीं।”

वह उसकी ओर मुड़ी। “क्या?”

अर्जुन की आंखों से आंसू गिर रहे थे। “तुम इस घर का नाम नहीं लोगी।”

नंदिनी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “तुम मुझे छोड़ दोगे? मेरे बिना तुम फिर अपनी मां की गोद में छिप जाओगे।”

अर्जुन ने मीरा की ओर देखा। उसके खुले सिर पर रोशनी पड़ रही थी, और उसे लगा जैसे पहली बार उसने अपनी मां को सचमुच देखा हो। केवल मां नहीं, एक स्त्री, एक इंसान, एक घायल आत्मा।

“मैं पहले से छिपा हुआ था,” उसने कहा। “बस मुझे लगा था मैं बड़ा हो गया हूं।”

नंदिनी ने उसे थप्पड़ मार दिया।

आवाज पूरे पंडाल में गूंजी। कोई नहीं हंसा। कोई नहीं बोला।

राघव ने कहा, “बाहर।”

सुरक्षा कर्मियों ने नंदिनी को घेर लिया। उसके लहंगे की भारी कढ़ाई कुर्सी में अटक गई। उसने झटके से खींचा तो कपड़ा फट गया। वही फटने की छोटी सी आवाज उस रात की सारी सजावट से ज्यादा सच्ची लगी।

विक्रम बंसल बाहर जाते हुए भी चिल्लाए, “तुम लोग पछताओगे।”

राघव ने उत्तर नहीं दिया। उन्हें पता था कि कुछ लोगों से बहस करना उनके झूठ को सम्मान देना होता है।

सावित्री वहीं खड़ी रो रही थी। जिस बच्ची को उसने कभी खीर खिलाकर चुप कराया था, वही आज किसी की बीमारी को हथियार बना रही थी।

मीरा उसके पास गई। “आपने बहुत देर से नहीं, सही समय पर बोला।”

सावित्री ने सिर झुका लिया। “मैंने उसे पालते हुए बहुत कुछ छुपाया। शायद वहीं गलती हुई।”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “हर गलती अपराध नहीं होती। मगर हर चुप्पी एक दिन जवाब मांगती है।”

राघव ने फिर माइक उठाया।

“आज की रस्में यहीं समाप्त होती हैं।”

मेहमान उठने लगे, जैसे अचानक सबको याद आ गया हो कि उन्हें कहीं और जाना है। कुछ औरतें पल्लू से आंखें पोंछ रही थीं। कुछ पुरुष सिर झुकाए खड़े थे। जिन लोगों ने अभी कुछ देर पहले मीरा की तरफ दया और असहजता से देखा था, वे अब अपनी ही खामोशी से डर रहे थे।

राघव ने कहा, “जाने से पहले 1 बात सुन लीजिए। मेरी पत्नी बीमारी नहीं है। वह विग नहीं है। वह शादी की तस्वीर खराब करने वाली चीज नहीं है। वह वह स्त्री है जिसने मेरे संघर्ष के दिनों में अपने गहने बेचकर घर चलाया। वह वह मां है जिसने अर्जुन की हर हार को अपनी गोद में छुपाया। वह वह इंसान है जिसने नंदिनी को पहली बार घर बुलाते समय उसके लिए अपने हाथ से केसरिया खीर बनाई थी, क्योंकि उसे याद था कि उसे मीठा पसंद है।”

मीरा की आंखें भर आईं।

“और आज,” राघव की आवाज भारी हो गई, “ज्यादातर लोग बैठे रहे। क्योंकि रोशनी सुंदर थी। खाना महंगा था। परिवार बड़े थे। शायद सबको लगा कि अपमान भी अगर अच्छे कपड़ों में हो तो कम गंदा लगता है।”

किसी ने ताली नहीं बजाई। अच्छा हुआ। तालियां उस शर्म को बहुत जल्दी धो देतीं।

अर्जुन धीरे-धीरे मीरा के सामने आया।

“मां…”

राघव बीच में खड़े हो गए। “आज तुम कुछ मांगने लायक नहीं हो।”

मीरा ने उनके हाथ पर हाथ रखा। “राघव।”

“उसने तुम्हें अकेला छोड़ दिया।”

“मुझे पता है।”

“उसने उसे रोकना भी जरूरी नहीं समझा।”

“मुझे यह भी पता है।”

मीरा ने अर्जुन को देखा। “कोई बहाना मत दो। 1 सच बोलो।”

अर्जुन टूट गया। वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया, दूल्हे की माला उसके सीने पर कांप रही थी।

“मुझे आपकी बीमारी से शर्म आने लगी थी,” उसने रोते हुए कहा। “आपसे नहीं… मैं यही सोचता रहा। लेकिन सच यह है कि मैं लोगों की नजरों से डर गया था। नंदिनी कहती थी कि मुझे मां के आंचल से बाहर आना चाहिए। मैंने आदमी बनने का मतलब मां को अकेला छोड़ना समझ लिया।”

मीरा की सांस अटक गई। सच कभी-कभी थप्पड़ से ज्यादा चोट करता है।

“धन्यवाद,” उसने कहा।

अर्जुन ने सिर उठाया। “आप मुझे धन्यवाद दे रही हैं?”

“क्योंकि गंदा सच भी साफ झूठ से बेहतर होता है।”

“मां, मुझे माफ कर दो।”

मीरा ने आंखें बंद कर लीं। “आज नहीं। अगर आज माफ कर दूं, तो फिर बोझ मैं ही उठाऊंगी, ताकि बाकी सब चैन से सो सकें।”

अर्जुन ने दोनों हाथ जोड़ दिए। “मुझे घर वापस आना है।”

मीरा की आवाज बहुत धीमी थी, पर हर शब्द पक्का था। “घर उन लोगों की शरण नहीं होता जो आग लगाकर लौटते हैं और उसी आग में हाथ सेंकना चाहते हैं।”

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

“तो मैं क्या करूं?”

“पहले समझो कि प्यार शब्द नहीं, जिम्मेदारी है। फिर कभी आना।”

राघव ने एक कर्मचारी को इशारा किया। अर्जुन को धक्का देकर नहीं, बल्कि चुपचाप बाहर तक छोड़ दिया गया। दरवाजे पर पहुंचकर उसने पलटकर कहा, “मां, मैं आपसे प्यार करता हूं।”

मीरा ने कहा, “तो सीखो कि प्यार में खड़े होना पड़ता है, बैठना नहीं।”

वह चला गया।

रात के बाद वे दिल्ली लौटे। कार की खिड़कियों पर हल्की बारिश थपथपा रही थी। मीरा ने विग अपनी गोद में रखी थी, मगर उसे पहना नहीं। राघव गाड़ी चला रहे थे। दोनों के बीच इतने शब्द थे कि कोई भी बोला नहीं जा रहा था।

घर पहुंचकर मीरा सीधे आईने के सामने गई। उसने अपना खुला सिर देखा, सूजी हुई आंखें, गले की पतली नसें, और वह छोटा निशान जहां इलाज की नली लगती थी।

“क्या मैं डरावनी लगती हूं?” उसने पूछा।

राघव उसके पीछे खड़े हुए और उसे बाहों में भर लिया। “तुम मुझे सिर्फ यह याद दिलाती हो कि तुम्हें खोने से मैं कितना डरता हूं।”

उस रात मीरा पहली बार खुलकर रोई। वह चुपचाप बहने वाला आंसू नहीं था। वह 6 महीनों की दबी हुई पीड़ा थी। अस्पतालों की गंध, उल्टियों की रातें, बेटे की दूरी, बहू की तानों भरी मुस्कान, और अपनी ही इज्जत को बचाते-बचाते थक चुकी एक स्त्री का टूटना था।

राघव ने उसे मजबूत बनने को नहीं कहा। वह बहुत लंबे समय से मजबूत थी।

अगले हफ्तों में तूफान थमा नहीं। शादी का वीडियो रिश्तेदारों के फोन से होते हुए समाज के हर व्हाट्सऐप समूह तक पहुंच गया। नंदिनी ने एक लंबा संदेश लिखकर खुद को लालची ससुराल की पीड़ित बहू बताया। मगर लोग उसकी आवाज सुन चुके थे। आवाज अक्सर चेहरे से ज्यादा सच बोलती है।

विक्रम बंसल के 3 बड़े प्रोजेक्ट रुक गए। बैंक ने पुरानी फाइलें खोल दीं। राघव ने किसी से बदला लेने का जश्न नहीं मनाया, पर इस बार उन्होंने किसी को बचाया भी नहीं। उन्हें समझ आ गया था कि सभ्यता और कायरता में बहुत पतली रेखा होती है।

सावित्री 5 दिन बाद मीरा से मिलने आई। हाथ में घर का बना हलवा था।

“मैंने उसे गोद में खिलाया था,” सावित्री बोली। “सोचा था जिद्दी है, पर दिल से बुरी नहीं होगी।”

मीरा ने उसका हाथ थामा। “कुछ लोग प्यार पाकर नरम होते हैं, कुछ उसे अपना अधिकार समझ लेते हैं।”

सावित्री बंसल घर वापस नहीं गई। पहले वह कुछ दिनों के लिए मीरा के पास रुकी। फिर दिन महीनों में बदल गए। वह कहती थी कि मीरा की दवाइयों का ध्यान रखने आई है, पर असल में दोनों एक-दूसरे की टूटी हुई जगहों पर हाथ रखती थीं।

अर्जुन ने पहला पत्र लिखा। मीरा ने नहीं खोला। दूसरा आया। तीसरा आया। राघव ने सब एक लकड़ी के डिब्बे में रख दिए। 2 महीने बाद मीरा ने डिब्बा मांगा।

उसने पूरी रात पढ़ा।

अर्जुन ने फार्महाउस की चाबियां लौटा दी थीं। महंगी गाड़ी बेच दी थी। मल्होत्रा नाम से अलग एक छोटी नौकरी शुरू की थी। वह हर महीने 25000 रुपये कर्ज लौटाने लगा था। रकम बड़ी नहीं थी, मगर पहली बार वह अपने हाथों से कमाकर दे रहा था।

5वें पत्र में उसने लिखा था कि उसे अब समझ आया है, मां को बचाना पिता के डर से बड़ा कर्तव्य था।

8वें पत्र के जवाब में मीरा ने सिर्फ 1 पंक्ति लिखी।

“मैं अभी जिंदा हूं, मेरी जिंदगी को बोझ नहीं, वजन दो।”

अर्जुन ने वह पंक्ति अपने बटुए में रख ली।

1 साल बाद मीरा उससे इंडिया गेट के पास एक शांत बगीचे में मिली। घर में नहीं। पारिवारिक खाने पर नहीं। खुले आसमान के नीचे, जहां कोई यह न कह सके कि सब पहले जैसा हो गया।

राघव थोड़ी दूर खड़े रहे।

अर्जुन सफेद कुर्ते में आया। हाथ में गेंदा और चमेली का छोटा सा गुलदस्ता था, महंगे गुलाब नहीं। वह मीरा के पास बैठा, पर छुआ नहीं।

उन्होंने 48 मिनट बात की। मीरा ने कहा कि वह उससे प्यार करती है, मगर प्यार रबड़ नहीं होता कि हर निशान मिटा दे। अर्जुन ने कहा कि वह जल्दी माफी नहीं चाहता, बस इतना चाहता है कि एक दिन मां उसे देखकर केक, विग और अपनी चुप्पी को याद न करे।

जाते समय मीरा ने 2 सेकंड के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा।

अर्जुन के लिए वह क्षण माफी से भी बड़ा था। वह सीमा भी थी, और अवसर भी।

धीरे-धीरे मीरा का इलाज असर दिखाने लगा। उसके बाल छोटे, हल्के और बेतरतीब लौटे। एक सुबह वह बिना विग के मंदिर गई। हल्की पीली साड़ी, माथे पर छोटी बिंदी, कानों में लाल बालियां। प्रसाद बेचने वाली बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा, “बहूजी, आज बहुत सुंदर लग रही हो।”

मीरा हंसी। “मुझे पता है। पर सुनकर अच्छा लगा।”

कुछ महीनों बाद राघव ने दिल्ली का बड़ा घर बेच दिया। बहुत यादें थीं, पर उनमें बहुत शोर भी था। उन्होंने उदयपुर के पास झील किनारे एक छोटा घर खरीदा। सफेद दीवारें, नीले दरवाजे, तुलसी का चौरा और शाम को पानी पर उतरती सुनहरी रोशनी। सावित्री भी साथ चली आई। वह कहती थी कि पौधों को पानी कौन देगा, मगर सब जानते थे कि वह अब परिवार थी।

नंदिनी उनकी जिंदगी से गायब हो गई। सुना गया कि वह मुंबई चली गई और अब भी लोगों से कहती है कि उसे शक्तिशाली परिवार ने बर्बाद किया। शायद वह सच में यही मानती थी। कुछ लोग जिम्मेदारी से बचने के लिए झूठ में अपना मंदिर बना लेते हैं।

एक शाम मीरा ने पुराना बक्सा खोला। वही विग उसमें रखी थी। वही, जिसे नंदिनी ने सबके सामने उठाया था।

राघव कुछ कहने वाले थे, पर मीरा ने हाथ उठा दिया। “कोई भारी बात नहीं।”

उसने कैंची उठाई और विग को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया। फिर उन्हें कूड़ेदान में डाल दिया।

राघव ने पूछा, “पक्का?”

मीरा ने ढक्कन बंद किया। “उस रात उसने मेरे बाल नहीं छीने थे। उसने मेरी शर्म छीनने की कोशिश की थी। अब मुझे वह शर्म वापस नहीं चाहिए।”

रसोई से सावित्री की आवाज आई। दाल में तड़का पड़ रहा था। दीवार पर नई तस्वीर लगी थी—मीरा झील के किनारे, खुले सिर, हल्की मुस्कान, आंखों में थकान भी और जीवन भी। पास में अर्जुन की एक छोटी तस्वीर थी, थोड़ी दूर खड़े हुए, जैसे परिवार में पूरी जगह अभी नहीं मिली, पर दरवाजे के बाहर भी नहीं छोड़ा गया।

राघव ने मीरा का हाथ थामा। “उस रात मुझे लगा था हमने अपना बेटा खो दिया।”

मीरा ने झील की तरफ देखा। “हमने वह बेटा खो दिया जिसे हमने अपने मन में बनाया था। शायद एक दिन उस बेटे को जानेंगे जो सच में बचा है।”

“और अगर वह काफी न हुआ?”

मीरा ने उसकी उंगलियां दबाईं। “तो हम काफी होंगे।”

बाहर हवा में पानी की गंध थी। घर में दाल, चाय और भीगे लकड़ी के फर्श की महक थी। कुछ भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था। परिवार कभी बिना निशान के नहीं जुड़ते।

लेकिन उस रात मीरा के सिर पर कुछ नहीं था।

न छिपाने को, न साबित करने को।

और राघव ने आखिर समझ लिया कि किसी स्त्री की गरिमा विग गिरने से नहीं गिरती।

वह तब गिरती है, जब उसके अपने लोग बैठे रह जाते हैं।

उस शादी की रात मीरा उठी थी।

और उसके साथ वे सभी लोग भी, जिनके भीतर शर्मिंदा होने लायक दिल अभी बाकी था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.