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पति की प्रेमिका ने गर्व से खाने की तस्वीर डालकर लिखा, “अब वह जानता है उसका सच्चा प्यार कौन है,” लेकिन उसी थाली में छिपी थी पत्नी की मौत की साजिश, और कुछ मिनट बाद प्यार का दिखावा अदालत का सबसे बड़ा सबूत बन गया।

PART 1

जब उसके पति की प्रेमिका ने दोपहर के खाने की तस्वीर डालकर लिखा, “अब उसे समझ आ गया है कि उसका सच्चा प्यार कौन है,” तब मीरा कपूर को अंदाज़ा भी नहीं था कि वह अपनी ही हत्या की कोशिश का सबूत देख रही है।

मोबाइल स्क्रीन पर मुंबई के बांद्रा वाले एक महंगे जापानी रेस्टोरेंट का चमकदार डिब्बा खुला पड़ा था। उसमें टेरियाकी सालमन, मिसो सूप, करीने से रखे हुए सुशी रोल और कांच के गिलास से टिकाकर रखी एक क्रीम रंग की छोटी पर्ची दिख रही थी। पर्ची पर अर्जुन कपूर की लिखावट थी।

“सुबह के लिए माफ कर दो। यह लंच तुम्हारे लिए है। सब खत्म कर देना, मेरी जान। अर्जुन।”

मीरा जुहू के अपने पुराने बंगले की रसोई में जड़ हो गई। उसके हाथ में फोन था, गाल दांत के दर्द से सूजा हुआ था और दिल 7 महीनों की चुप्पियों से थक चुका था। 39 साल की मीरा ने 12 साल तक जिस आदमी को अपना घर, अपना नाम और अपनी विरासत दी थी, वही अब हर बात पर उसे “ड्रामा करने वाली औरत” कहकर चुप करा देता था।

उस सुबह भी मीरा ने जल्दी उठकर अदरक वाली चाय, आलू पराठे और अर्जुन की पसंद की हरी चटनी बनाई थी। कभी यही नाश्ता देखकर अर्जुन मुस्कुरा देता था। आज उसने प्लेट को छुआ तक नहीं।

“इतना सब करने की जरूरत नहीं थी,” उसने घड़ी देखते हुए कहा।

मीरा ने धीमे से कहा, “मैं बस चाहती थी कि हम 10 मिनट साथ बैठें।”

अर्जुन ने सांस छोड़ी, जैसे मीरा कोई बोझ हो।

“यही तो दिक्कत है। तुम्हारे साथ 10 मिनट भी अदालत बन जाते हैं। मेरी इन्वेस्टर्स मीटिंग है। तुम्हारी भावनाओं की मरम्मत करने का समय नहीं है मेरे पास।”

मीरा चुप रह गई। बंगला मीरा का था। नासिक की 2 दुकानों से आने वाला किराया भी उसका था। उसके माता-पिता ने जिंदगी भर कपड़ों का कारोबार खड़ा किया था और उनके गुजरने के बाद सब कुछ मीरा के नाम आया था। अर्जुन लोगों के सामने इसे “हमारा साम्राज्य” कहता था, पर अकेले में जब मीरा किसी कागज पर हस्ताक्षर करने से डरती, तो वह ताना मारता, “तुम्हारे पुराने हिसाब-किताब ने मेरी सांस रोक रखी है।”

घर से निकलते समय मीरा ने आदत से उसकी जैकेट पकड़ा दी।

“आज फोन मत करना,” अर्जुन बोला। “मैं बहुत व्यस्त रहूंगा।”

उसने मीरा के माथे को छुआ तक नहीं।

दरवाजा बंद हुआ तो मीरा सीढ़ियों के पास लगी शादी की तस्वीर को देखती रही। तस्वीर में अर्जुन उसे ऐसे देख रहा था जैसे दुनिया में उससे सुंदर कुछ नहीं। मीरा ने लगभग शर्माते हुए फुसफुसाया, “हम कहां खो गए?”

उसे नहीं पता था कि उसी वक्त कार में बैठा अर्जुन तारा मल्होत्रा का वॉइस मैसेज सुन रहा था।

“अर्जुन, आज रात तक फैसला करो। या तो मीरा को छोड़ो, या मैं तुम्हारे पार्टनर और इनकम टैक्स वालों को सारे फर्जी बिल, शेल कंपनियां और ट्रांसफर दिखा दूंगी। मुझे बेवकूफ समझना बंद करो।”

अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया। तलाक का मतलब था बंगला खोना, पैसा खोना, समाज में इज्जत खोना। तारा उससे शादी, पाली हिल में फ्लैट और खुली पहचान मांग रही थी। मीरा के कोई बच्चे नहीं थे। सही कागजों, बीमा और कुछ पावर ऑफ अटॉर्नी के सहारे अर्जुन को लगता था कि अगर मीरा अचानक मर जाए, तो वह सब अपने हाथ में ले सकता है।

11:48 पर उसने कार एक जापानी रेस्टोरेंट के सामने रुकवाई। वह जगह मीरा को शादी के शुरुआती सालों में बहुत पसंद थी। उसे टेरियाकी सालमन बहुत पसंद था। अर्जुन जानता था कि महीनों की बेरुखी के बाद एक छोटी सी माफी भी मीरा के भीतर पुराना प्यार जगा सकती है।

12:06 पर वह बैग लेकर कार में लौटा। ड्राइवर रमेश पिछले 2 साल से उसके साथ था। अर्जुन ने कार के काले पर्दे खींचे, ब्रीफकेस खोला और ठंडे हाथों से खाने में वह खतरनाक चीज मिलाई, जो उसने एक संदिग्ध आदमी से “गोदाम के चूहों” के नाम पर खरीदी थी। उसे पूरा विज्ञान नहीं पता था, बस इतना मालूम था कि मौत अचानक फूड पॉइजनिंग जैसी दिख सकती है।

उसने डिब्बा बंद किया, पर्ची लिखी और बैग रमेश को पकड़ा दिया।

“घर जाकर दे आओ। उस औरत को देना जो हमेशा मेरा इंतजार करती है। और देखना, वह इसे गरम-गरम खाए। जब खाना शुरू करे, मुझे मैसेज करना।”

रमेश ने पूछा, “कौन सा घर, साहब?”

अर्जुन झुंझला उठा। “घर, रमेश। जहां वह औरत मेरा इंतजार करती है। बेकार सवाल मत करो।”

लेकिन अर्जुन भूल गया था कि 7 महीनों से रात 8 के बाद जब वह कहता था “घर चलो”, कार जुहू नहीं जाती थी। वह लोखंडवाला की एक ऊंची इमारत में जाती थी, जहां तारा अक्सर नीचे आकर उसका इंतजार करती थी।

रमेश ने पर्ची पढ़ी। “मेरी जान।” उसके दिमाग में मीरा का शांत चेहरा आया, जो बारिश में उसे चाय दे देती थी। फिर तारा याद आई, जिसके महंगे बैग कार में छूटते रहते थे।

उसके लिए आदेश साफ था।

कार जुहू नहीं मुड़ी।

वह लोखंडवाला की तरफ बढ़ गई।

PART 2

तारा ने दरवाजा खोला तो सफेद रेशमी कुर्ते में उसका चेहरा रोने से लाल था, पर आंखों में जीत चमक रही थी। रेस्टोरेंट का बैग और पर्ची देखते ही उसके होंठ कांप उठे।

“मैं जानती थी,” उसने खुद से कहा, “वह आखिर मेरे पास लौटेगा।”

रमेश ने कहा, “साहब ने कहा है अभी खाना है। पूरा खत्म करना है।”

तारा ने खाना टेबल पर रखा, सही रोशनी में तस्वीर खींची और स्टोरी डाल दी।

“जब आदमी को अपना सच्चा प्यार समझ आ जाता है, तो वह लौट ही आता है।”

फिर उसने सूप पी लिया।

नीचे खड़े रमेश ने अर्जुन को मैसेज किया, “मैडम को लंच मिल गया। बहुत खुश हैं। खाना शुरू कर दिया।”

मीटिंग में बैठे अर्जुन ने जवाब लिखा, “अच्छा। सब खत्म करवाना।”

उधर मीरा खाना नहीं खा रही थी। वह अपनी पुरानी मददगार शांता के साथ गरीब बस्ती के लिए राशन के डिब्बे पैक कर रही थी। दांत के दर्द के कारण उसने शाम तक कुछ न खाने का फैसला किया था।

कुछ ही मिनटों बाद तारा के पेट में आग सी उठी। वह कुर्सी से गिरी, फोन फर्श पर खिसक गया। उसने अर्जुन को 2 बार कॉल किया। कोई जवाब नहीं आया।

दरवाजे तक रेंगते हुए वह सिर्फ इतना कह पाई, “बचाओ…”

जब एम्बुलेंस आई, डिब्बे के पास वही पर्ची पड़ी थी।

PART 3

इमारत के चौकीदार ने तारा को फर्श पर पड़ा देखा तो उसका गला सूख गया। खुले डिब्बे से सूप फैलकर लकड़ी के फर्श पर बह रहा था। तारा का चेहरा राख जैसा सफेद था। उसके हाथ पर्ची की तरफ बढ़े हुए थे, जैसे आखिरी पल तक वह उस लिखे हुए प्यार को पकड़ना चाहती हो।

रमेश नीचे खड़ा था। एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ियां देखकर उसके पैर कांपने लगे। जब एक अधिकारी ने पूछा, “यह खाना कौन लाया था?” तो उसने हाथ उठा दिया।

“मैं लाया था। पर यह अर्जुन साहब ने भेजा था।”

पुलिस ने डिब्बा सील किया, पर्ची की तस्वीर ली और तारा का फोन उठाया। स्क्रीन पर अर्जुन का आखिरी मैसेज चमक रहा था।

“अच्छा। सब खत्म करवाना।”

रमेश ने कांपते हाथों से मीरा को फोन लगाया।

“मैडम… मुझसे शायद बहुत बड़ी गलती हो गई।”

मीरा ने राशन का डिब्बा पकड़ रखा था। उसकी उंगलियां सफेद पड़ गईं।

“शांत होकर बोलो, रमेश। हुआ क्या?”

रमेश ने सब बताया। रेस्टोरेंट, बैग, पर्ची, अर्जुन का आदेश, लोखंडवाला, तारा और एम्बुलेंस। मीरा ने न चीखा, न रोई। उसने बस पूछा, “मेरे पति ने ठीक-ठीक क्या कहा था?”

“उन्होंने कहा था, ‘उस औरत को देना जो हमेशा मेरा इंतजार करती है।’ फिर कहा था, ‘जब वह खाना शुरू करे, मुझे मैसेज करना।’”

लंबी चुप्पी छा गई। फिर मीरा की आवाज आई, टूटी हुई, पर बिल्कुल साफ।

“वह खाना तारा के लिए नहीं था।”

अस्पताल में अर्जुन को खबर मिली कि तारा मल्होत्रा गंभीर हालत में भर्ती है और उसके फोन में अर्जुन का नंबर आखिरी कॉल में है। वह मीटिंग से ऐसे उठा कि कुर्सी गिर गई। लिफ्ट में उसका माथा धातु की दीवार से टिक गया।

“नहीं… नहीं…”

अस्पताल के इमरजेंसी कॉरिडोर में उसने रमेश को 2 पुलिस वालों के बीच बैठा देखा। पास ही मीरा खड़ी थी। जिंदा। शांत। इतनी शांत कि अर्जुन के भीतर डर की ठंडी लहर दौड़ गई।

एक पुलिस अधिकारी ने पर्ची वाली पारदर्शी थैली दिखाई।

“अर्जुन कपूर, आप समझा सकते हैं कि आपने इस महिला से पूरा खाना खत्म करवाने को क्यों कहा?”

अर्जुन ने मीरा को देखा। एक ही पल में उसे समझ आ गया कि वह सब समझ चुकी है।

“यह रेस्टोरेंट की गलती है,” उसने हकलाते हुए कहा। “मैंने बस एक प्यार भरा इशारा किया था।”

“यह खाना किसके लिए था?” अधिकारी ने पूछा।

अर्जुन चुप रह गया। अगर वह तारा कहता, तो रिश्ता सामने आता। अगर मीरा कहता, तो गलत पते पर पहुंची मौत की सच्चाई खुल जाती।

“यह सरप्राइज था,” उसने कहा। “रमेश ने गलत जगह दे दिया।”

रमेश अचानक खड़ा हो गया।

“मैंने पूछा था कौन सा घर! आपने मुझे डांटा था! आपने कहा था जहां वह औरत इंतजार करती है!”

“चुप रहो, रमेश।”

“और आपने कहा था कि वह सब खा ले!”

अर्जुन का चेहरा गुस्से से बिगड़ गया।

“तुमने सब खराब कर दिया।”

कॉरिडोर जम गया।

अधिकारी ने धीमे से पूछा, “क्या खराब कर दिया, अर्जुन जी?”

अर्जुन ने तुरंत संभलने की कोशिश की।

“मेरा मतलब… मेरा सरप्राइज।”

उसी समय डॉक्टर बाहर आईं। उनके चेहरे पर वह थकान थी जो किसी की आखिरी खबर लेकर आती है।

“तारा मल्होत्रा के परिवार से कौन है?”

अर्जुन आगे बढ़ा। “मैं… मैं करीबी हूं।”

डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

“हमने पूरी कोशिश की। शरीर में गए जहरीले पदार्थ ने दिल और सांस दोनों पर असर किया। कुछ मिनट पहले उनका निधन हो गया।”

मीरा ने आंखें बंद कर लीं। वह तारा से नफरत करती थी। उन रातों से, जब अर्जुन की शर्ट पर किसी और की खुशबू होती थी। उन रसीदों से, जिनमें गहने खरीदे जाते थे पर कभी उसके हाथ तक नहीं आते थे। पर तारा एक औरत थी, जो प्यार समझकर मौत खा गई थी। कोई धोखा इतनी सजा के लायक नहीं होता।

अर्जुन दीवार से टिक गया।

“रेस्टोरेंट… यह रेस्टोरेंट की वजह से हुआ होगा।”

पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम रेस्टोरेंट भी देखेंगे। आपकी कार, ऑफिस, फोन, खरीदारी और ब्रीफकेस भी।”

“ब्रीफकेस” सुनते ही अर्जुन का चेहरा पत्थर हो गया। वह उसे मीटिंग रूम की मेज के नीचे छोड़ आया था।

1 घंटे से कम समय में जांच अधिकारी तस्वीरें लेकर लौटे। तस्वीरों में अर्जुन का ब्रीफकेस खुला था। अंदर बिना लेबल की शीशी, दस्ताने, सॉस के निशान, मेडिकल सिरिंज जैसा एक छोटा उपकरण और कुछ वित्तीय कागज पड़े थे।

“किसी ने रखा होगा,” अर्जुन बोला।

अधिकारी ने बिना आवाज ऊंची किए कहा, “यह आपकी कुर्सी के नीचे था। कैमरों में आपकी कार रेस्टोरेंट से निकलने के बाद कई मिनट तक बंद पर्दों के साथ खड़ी दिखती है।”

मीरा धीरे से उसके पास आई।

“मेरी तरफ देखो।”

अर्जुन ने नजरें चुरा लीं।

“अभी नहीं।”

“अभी ही। यही आखिरी वक्त है जब तुम सच बोल सकते हो।”

“तुम समझ नहीं रही हो।”

“मैं सब समझ रही हूं। खाना मेरे लिए था। वह सालमन, जो मुझे पसंद था। वह पर्ची, क्योंकि तुम जानते थे कि मैं तुम्हारी माफी पर विश्वास करना चाहूंगी। तुमने मेरा नाम इसलिए नहीं लिया ताकि आदेश सहज लगे। तुमने कहा, ‘वह औरत जो इंतजार करती है।’ बस तुम भूल गए कि अब तुम्हारा इंतजार मैं नहीं, तारा करती थी।”

अर्जुन की गर्दन तन गई।

“बंद करो यह नाटक।”

मीरा की आंखों में आंसू थे, पर आवाज पत्थर जैसी थी।

“तुमने सोचा था मैं खा लूंगी, क्योंकि मैं अब भी तुम्हें चाहती थी। तुम्हें यह तक नहीं पता था कि दांत के दर्द की वजह से मैंने खाना छोड़ रखा है। तुम मुझे मारने लायक भी मुझे जान नहीं पाए।”

अर्जुन एक कदम बढ़ा, पुलिस तुरंत बीच में आ गई।

“सब तुम्हारा था!” वह फट पड़ा। “बंगला, दुकानें, बैंक खाते, तुम्हारे पिता का कारोबार। मेरी हैसियत तुम्हारे हस्ताक्षर के बिना कुछ नहीं थी। तुमने मुझे अपने ही घर में मेहमान बना दिया था।”

मीरा ने उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो।

“मैंने तुम्हें घर दिया। कारोबार में जगह दी। भरोसा दिया। और तुमने उसे अपमान समझा?”

“तुम नहीं समझोगी कि पत्नी की दौलत के नीचे दबकर जीना क्या होता है।”

“नहीं। मैं यह समझती हूं कि पति जब पत्नी की उदारता को कर्ज बना दे, तो अपमान किसे कहते हैं।”

अर्जुन का चेहरा टूटने लगा।

“तारा मुझे धमका रही थी। उसके पास फाइलें थीं। वह सब खोल देती। मैं बर्बाद हो जाता।”

जांच अधिकारी ने तुरंत पूछा, “कौन सी फाइलें?”

अर्जुन ने होंठ भींच लिए। “मैंने कुछ नहीं कहा।”

लेकिन वह बहुत कुछ कह चुका था।

अगले कुछ दिनों में पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा ने अर्जुन के लैपटॉप, फोन और ऑफिस सील कर दिए। फर्जी कंपनियों को भेजे गए पैसे, तारा को छिपाकर किए गए भुगतान, जहर जैसे पदार्थों पर इंटरनेट खोज, संदिग्ध आदमी से चैट, पावर ऑफ अटॉर्नी के ड्राफ्ट, विरासत के हिसाब और 3 महीने पहले लिया गया बीमा सब सामने आ गया। उस बीमे में अर्जुन मुख्य लाभार्थी था।

जुहू वाले घर के स्टडी रूम में जांच के दौरान मीरा को नीले रंग की एक फाइल दिखी।

“उसने पिछले हफ्ते मुझे यही साइन करने को कहा था,” वह बुदबुदाई। “कह रहा था टैक्स प्लानिंग आसान हो जाएगी।”

अधिकारी ने फाइल खोली। उसमें ऐसे कागज थे जिनसे मीरा के माता-पिता की मेहनत का बड़ा हिस्सा अर्जुन की संयुक्त नियंत्रण वाली कंपनियों में जा सकता था।

मीरा कुर्सी पर बैठ गई। जैसे शरीर से सारी हड्डियां निकल गई हों।

शांता ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“दीदी, यह आपकी गलती नहीं है।”

“मैं उसके साथ रहती थी। उसी के बगल में सोती थी। उससे वापस आने की विनती करती थी, और वह मेरी मौत लिख रहा था।”

“आपने पति से प्यार किया था। गलती उस आदमी की है जिसने उसी प्यार को हथियार बना लिया।”

तब मीरा रोई। अर्जुन के लिए नहीं। केवल तारा के लिए भी नहीं। वह उन सभी रातों के लिए रोई जब उसने खुद को दोष दिया था। उन डिनरों के लिए, जिनमें वह जवाब का इंतजार करती रही। उन सुबहों के लिए, जब उसने अपमान को थकान समझकर माफ किया। वह उस मीरा के लिए रोई, जो धीरे-धीरे अपनी ही जिंदगी से गायब हो गई थी।

अगली सुबह उसने वकील को फोन किया, ताले बदले, सारी पावर ऑफ अटॉर्नी रद्द करवाई, नोटरी को सूचना दी और पुलिस से साफ कहा कि वह इस मामले को “परिवार की इज्जत” के नाम पर दबने नहीं देगी। उसे समझ आ गया था कि चुप्पी अक्सर पीड़ित को नहीं बचाती, अपराधी को बचाती है।

पहली सुनवाई में तारा की मां, सुनीता मल्होत्रा, अदालत आईं। वह पतली, सधी हुई और भीतर से टूटी हुई महिला थीं। ब्रेक में वह मीरा के पास आईं।

“मेरी बेटी ने आपका घर तोड़ा,” उन्होंने ठंडे स्वर में कहा। “लेकिन वह मरने लायक नहीं थी।”

मीरा ने आंखें नहीं झुकाईं।

“नहीं। किसी औरत को किसी मर्द की कायरता की सजा मौत से नहीं मिलनी चाहिए।”

सुनीता का चेहरा कांप गया।

“मैंने सोचा था शायद आपको सब पता था। मुझे शर्म आई ऐसा सोचकर।”

“आपने बेटी खोई है। दर्द सांस लेने के लिए दोषी ढूंढ़ता है।”

सुनीता ने हाथों को देखा।

“वह कहती थी अर्जुन उसे चुनेगा।”

मीरा ने लंबे मौन के बाद कहा, “मैं सोचती थी वह मुझसे प्यार करता है।”

दोनों औरतें आमने-सामने खड़ी रहीं। दोस्ती की कोई जगह नहीं थी, पर नफरत की जरूरत भी खत्म हो चुकी थी। सुनीता ने मीरा का हाथ पकड़ लिया। वह स्पर्श कुछ ठीक नहीं कर सकता था, लेकिन अर्जुन को अपनी जेल से भी उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने से रोकता था।

मुकदमे में बचाव पक्ष ने दावा किया कि खाना तारा के लिए था, गलती रेस्टोरेंट की थी और वित्तीय कागजों का मौत से कोई संबंध नहीं था। पर कार की रिकॉर्डिंग ने सब मिटा दिया। उसमें रमेश की आवाज साफ थी।

“कौन सा घर, साहब?”

फिर अर्जुन की आवाज।

“घर। जहां वह औरत मेरा इंतजार करती है। सवाल मत करो। देखना वह गरम-गरम खाए।”

सरकारी वकील ने कहा कि यह धुंधलापन गलती नहीं था। अर्जुन मीरा का नाम नहीं लेना चाहता था, ताकि आदेश घरेलू और सहज लगे। लेकिन उसकी दोहरी जिंदगी ने मौत को गलत पते पर भेज दिया और सच अदालत तक पहुंचा दिया।

विशेषज्ञों ने बताया कि रेस्टोरेंट के बाकी खाने सुरक्षित थे। कैमरों ने कार में छेड़छाड़ दिखाई। तारा के संदेशों ने धमकी दिखाई। बीमा ने लालच दिखाया। इंटरनेट खोज ने इरादा दिखाया। और पर्ची ने भावनात्मक जाल दिखाया।

अर्जुन को तारा मल्होत्रा की हत्या, मीरा कपूर की हत्या की कोशिश और वित्तीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। सजा सुनते वक्त उसने हथकड़ियों वाले हाथ जोड़ दिए।

“मीरा… माफ कर दो।”

मीरा ने उसे लंबे समय तक देखा। कभी यही चेहरा उसे पिघला देता था। उस दिन उसे सिर्फ एक ऐसा आदमी दिखा, जो दया मांग रहा था क्योंकि वह पकड़ा गया था।

“तुम माफी उनसे मांगते हो जो जिंदा हैं और तुम्हारे खिलाफ गवाही दे सकती हैं,” उसने धीरे से कहा।

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

अदालत के बाहर पत्रकारों ने पूछा, “क्या आपको राहत मिली?”

मीरा ने मुंबई की नम हवा में सांस भरी।

“एक औरत मर गई। दूसरी औरत ने जाना कि उसका पति उसकी मौत की तैयारी कर रहा था। राहत तब होगी जब औरतें समझेंगी कि हिंसा दिखने से पहले भी उन्हें घर छोड़ने का अधिकार है।”

कुछ महीनों बाद मीरा ने नासिक की अपनी एक दुकान को आर्थिक और मानसिक हिंसा झेल रही महिलाओं के लिए सहायता केंद्र बना दिया। वहां वकील, काउंसलर, चाय, साफ कुर्सियां और दरवाजे पर एक पंक्ति थी।

“किसी पर भरोसा करने की कीमत जान नहीं होनी चाहिए।”

रमेश एक दिन उससे माफी मांगने आया।

“मैडम, अगर मैं समझ जाता…”

मीरा ने उसे रोका।

“तुम भी उसी आदमी के झूठ में फंसे थे। तुम्हारी गलती ने मेरी जान बचाई, पर तारा की मौत का बोझ तुम्हारे साथ रहेगा। इसे किसी सही काम में बदलो।”

मीरा ने उसके इलाज और काउंसलिंग का खर्च उठाया। बाद में रमेश ने कई सभाओं में गवाही दी कि सभ्य घरों के भीतर छिपी हिंसा कितनी खामोश होती है।

एक सर्द शाम मीरा जुहू वाले घर लौटी। घर शांत था, पर अब वह चुप्पी इंतजार की नहीं, शांति की थी। सीढ़ियों के पास शादी की तस्वीर उलटी रखी थी। मीरा ने उसे उठाया, उन 2 जवान चेहरों को देखा जो कभी हमेशा साथ रहने का वादा समझते थे, फिर तस्वीर को एक डिब्बे में रख दिया।

शांता ने मेज पर गरम सूप और रोटी रख छोड़ी थी।

मीरा बैठी और धीरे-धीरे खाने लगी। किसी ने उसके चम्मच पकड़ने पर टिप्पणी नहीं की। किसी ने उसे ज्यादा संवेदनशील, ज्यादा शांत या ज्यादा मौजूद होने का दोष नहीं दिया। खिड़कियों से आती हल्की रोशनी मेज पर फैल रही थी।

उसे क्रीम रंग की पर्ची याद आई।

“सब खत्म कर देना, मेरी जान।”

अर्जुन ने सोचा था प्यार को चारे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। उसने सोचा था नकली कोमलता किसी औरत को मौत तक ले जाएगी। पर झूठ ने अपना पता खुद चुन लिया।

“वह औरत जो इंतजार करती है” वाली पंक्ति ने बता दिया कि वह हर रात कहां जाता था। और जिस पर्ची से वह पत्नी को धोखा देना चाहता था, वही उसके अपराध की मुहर बन गई।

मीरा ने चम्मच रखा, खुले परदों की तरफ देखा और समझ गई कि बच जाना कोई कोमल चमत्कार नहीं होता। कई बार बच जाना मलबे के बीच खड़े रहना होता है, खिड़कियां खोलना होता है और वहां रोशनी आने देना होता है जहां किसी ने अंधेरा तैयार किया था।

अर्जुन ने चाहा था कि सब कुछ एक बंद डिब्बे में खत्म हो जाए।

वह कभी समझ ही नहीं पाया कि बुराई हमेशा उसी रास्ते से वापस नहीं लौटती, जो अपराधी चुनता है।

कभी वह गलत दरवाजा खटखटा देती है।

कभी वह निशान छोड़ देती है।

और कभी, किसी औरत को मिटाने की कोशिश में, वह आखिरकार उस मर्द का असली चेहरा दुनिया के सामने खोल देती है।

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