
PART 1
9 साल की तारा दरवाज़े पर रोती हुई खड़ी थी, दोनों हाथों में चांदी का डिब्बा दबाए, जैसे किसी ने उसकी मासूमियत को पैक करके वापस भेज दिया हो।
उसके गाल आंसुओं से भीगे थे, एक जूते की पट्टी खुली थी, और गुलाबी स्वेटर की चेन आधी अटकी हुई थी। नोएडा की उस सोसाइटी में शाम की आरती की घंटियां बज रही थीं, नीचे बच्चे साइकिल चला रहे थे, लेकिन अदिति शर्मा के लिए दुनिया उसी पल थम गई।
तारा को तो सिर्फ 2 घंटे के लिए नाना-नानी के घर जाना था।
अदिति ने दरवाज़ा खोला तो पीछे लिफ्ट बंद हो रही थी। उसकी मां सावित्री देवी जल्दी-जल्दी मुड़कर जा रही थीं। उन्होंने पीछे देखा भी नहीं। बस मोबाइल पर एक संदेश आया—
“ज़्यादा नाटक मत करना। बच्ची को समझाना ज़रूरी था।”
अदिति की उंगलियां सुन्न पड़ गईं।
उसका पति रोहन उस समय गुरुग्राम के अपने नए प्रोजेक्ट ऑफिस में था। 3 हफ्ते बाद पूरा परिवार पुणे शिफ्ट होने वाला था। रोहन को वहां एक बेहतर नौकरी मिली थी—नियमित समय, अच्छा वेतन, सुरक्षित मोहल्ला और तारा के लिए एक ऐसा स्कूल जहां चित्रकला और कथक दोनों की कक्षाएं थीं। तारा ने पुणे जाने की बात सुनकर अपनी नई जिंदगी का एक बड़ा रंगीन चित्र बनाया था—बालकनी में तुलसी का गमला, पीछे पहाड़, रोहन लैपटॉप पर काम करता हुआ और अदिति चाय की प्याली लिए दरवाज़े पर।
वह चित्र वह अपने नाना-नानी को दिखाना चाहती थी।
पर महेंद्र प्रताप शर्मा, अदिति के पिता, कभी किसी बदलाव को स्वीकार करने वाले इंसान नहीं थे। वह रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर थे। घर में आज भी उनकी आवाज़ आदेश जैसी लगती थी। अदिति के बचपन में अगर वह रोती, तो वह कहते, “कमज़ोर मत बन।” अगर विरोध करती, तो कहते, “बेटी हो, ज़ुबान संभालो।” सावित्री देवी हमेशा मुस्कुराकर कहतीं, “तुम्हारे पापा तुम्हारे भले के लिए बोलते हैं।”
भलाई के नाम पर डर देना अदिति ने बहुत देर से पहचाना था।
जब पुणे जाने की बात उठी, महेंद्र ने साफ कहा था, “तारा कोई सूटकेस नहीं है जिसे उठाकर दूसरे शहर ले जाओ। उस पर हमारा भी हक है।”
अदिति ने पहली बार डटकर कहा था, “तारा मेरी बेटी है। वह अपने माता-पिता के साथ जाएगी।”
इसके बाद परिवार में ठंडा युद्ध शुरू हो गया। महेंद्र ने रिश्तेदारों को फोन किए। सावित्री ने मंदिर, बीमारी, अकेलापन और मोहल्ले की बातें बीच में रखीं। फिर अचानक दोनों नरम पड़ गए। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ तारा से प्यार करते हैं, और जाना हो तो जाने देंगे।
अदिति ने सब नियम लिखित संदेश में भेजे थे—तारा को डराना नहीं, पुणे के खिलाफ कुछ नहीं कहना, उसे रात में नहीं रोकना, स्कूल या सोसाइटी में बिना बताए नहीं आना।
सावित्री ने लाल दिल भेजे थे। महेंद्र ने सिर्फ अंगूठे वाला निशान भेजा था।
रोहन ने मोबाइल देखते हुए कहा था, “मुझे यह शांति अच्छी नहीं लग रही।”
अदिति को भी नहीं लगी थी।
फिर भी उसने तारा को जाने दिया, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि बच्ची दादा-दादी जैसे नाना-नानी से नफरत करना सीखे। तारा ने जाते समय अपना चित्र फाइल में रखा, अपना पुराना सफेद खरगोश वाला खिलौना मांगा, फिर याद आया कि वह तो 4 महीने पहले नानी के घर छूट गया था। सावित्री ने कहा था कि वह मिल नहीं रहा।
शाम 5 बजे तारा वापस आई—अकेली, कांपती हुई, और हाथ में वह चांदी का डिब्बा लिए।
अदिति ने उसे भीतर खींच लिया, दरवाज़ा बंद किया और घुटनों के बल बैठकर उसके चेहरे को थामा।
“क्या हुआ, मेरी जान?”
तारा ने होंठ भींचे। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि अदिति को झुकना पड़ा।
“नानू ने मेरा चित्र फाड़ दिया।”
अदिति की छाती में कुछ टूटकर गिरा।
धीरे-धीरे तारा ने बताया। पहले सब ठीक था। नानी ने आलू पराठा बनाया, दही दिया, प्यार से बाल सहलाए। फिर महेंद्र ने पूछा, “सच-सच बता, तुझे पुणे जाना है या तेरे मां-बाप तुझे मजबूर कर रहे हैं?”
तारा ने कहा, “जहां मम्मी-पापा जाएंगे, मैं वहीं रहूंगी।”
सावित्री ने जवाब दिया, “अच्छी बच्चियां अपने बड़ों को छोड़कर नहीं जातीं।”
जब तारा ने नया घर वाला चित्र दिखाया, महेंद्र ने पूछा, “इस घर में हम कहां हैं?”
तारा ने मासूमियत से कहा, “ये पुणे वाला घर है, नानू। आप लोग मिलने आना।”
महेंद्र ने चित्र उसके हाथ से छीन लिया। बाहर गलियारे में गए। तारा ने कागज़ फटने की आवाज़ सुनी। फिर वह लौटे और उसे चांदी का डिब्बा पकड़ा दिया।
“अपनी मां को देना,” उन्होंने कहा, “ताकि उसे समझ आए कि जड़ें काटने वालों का क्या अंजाम होता है।”
अदिति चीखना चाहती थी। पर तारा उसकी आंखों में सुरक्षा ढूंढ रही थी। इसलिए उसने बस उसे गले लगाया।
तभी डिब्बे के भीतर से हल्की आवाज़ आई।
बीप।
अदिति ने कांपते हाथों से सफेद फीता खोला।
अंदर तारा का फटा हुआ चित्र था, लाल निशानों से बिगाड़ा गया, एक सिलाई किया हुआ सफेद खिलौना था, और नीचे एक मुड़ा हुआ कागज़ था जिस पर अदिति का नाम लिखा था।
फिर वही आवाज़ आई।
बीप।
और अदिति को समझ आ गया कि यह सिर्फ अपमान नहीं था। यह कुछ बहुत बड़ा था।
PART 2
अदिति ने अपनी सहेली नंदिता को बुलाया, जो पारिवारिक मामलों वाले एक वकील के दफ्तर में काम करती थी। नंदिता आते ही बोली, “कुछ मत छूना, पहले सबकी तस्वीर लो।”
तारा सोफे पर बैठी थी, घुटने सीने से लगाए। जब खिलौना निकला, वह सिसक पड़ी। वह वही सफेद खरगोश था जिसे नानी ने खो जाने की बात कही थी। उसका पेट काटकर काले धागे से सी दिया गया था। सिलाई के आसपास लाल मार्कर से घाव जैसा बनाया गया था।
नंदिता ने सावधानी से धागा काटा। भीतर से काले रंग का छोटा उपकरण गिरा।
बीप।
नंदिता का चेहरा सफेद पड़ गया।
“अदिति… यह ट्रैकर जैसा है।”
डिब्बे में 3 तस्वीरें भी थीं—तारा स्कूल के गेट पर, तारा शनिवार की ड्रॉइंग क्लास से निकलते हुए, और तारा रोहन की कार के पास सुपरमार्केट की पार्किंग में।
ये तस्वीरें किसी सोशल मीडिया पर नहीं थीं।
किसी ने बच्ची का पीछा किया था।
नोट में लिखा था—
“तारा को उसकी असली परिवार से दूर मत करो। अगर पुणे गई तो सबको पता चलेगा कि तुम कैसी मां हो। तुम्हारी मानसिक हालत के सबूत हमारे पास हैं।”
अदिति ने पुलिस को फोन किया।
दरवाज़े पर 3 तेज चोटें पड़ीं।
बाहर महेंद्र खड़े थे।
“मुझे पता है तुमने पुलिस बुलाई है,” वह गुर्राए। “दरवाज़ा खोलो, इससे पहले कि पूरी सोसाइटी में तमाशा बने।”
उसी पल रोहन भी आ गया। उसने महेंद्र को देखा और उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“यह यहां भी आ गए?” उसने धीमे से कहा।
अदिति जम गई।
“यहां भी मतलब?”
रोहन ने कांपती आवाज़ में कहा, “आज सुबह ये मेरे ऑफिस आए थे।”
PART 3
रोहन ने दरवाज़े के भीतर आते ही तारा को देखा। बच्ची ने उसे देखते ही दौड़कर उसके पेट से लिपट जाना चाहा, पर बीच में ही रुक गई, जैसे हर बड़े आदमी से डर लगने लगा हो। रोहन वहीं घुटनों पर बैठ गया और बोला, “मैं हूं, बेटा। कोई तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा।”
अदिति ने पहली बार अपने पति की आंखों में ऐसा डर देखा। वह गुस्सा नहीं था। वह उस आदमी की तरह लग रहा था जिसे सुबह से कोई भारी पत्थर सीने पर रखकर चलना पड़ा हो।
दरवाज़े पर पुलिस सब-इंस्पेक्टर कविता यादव पहुंच चुकी थीं। नंदिता ने उन्हें डिब्बा, तस्वीरें, नोट और खिलौना दिखाया। कविता यादव ने कुछ भी हल्के में नहीं लिया। उन्होंने ट्रैकर को प्लास्टिक थैली में रखा, तस्वीरों को अलग किया और तारा से बेहद नरम आवाज़ में पूछा कि क्या वह कुछ बताना चाहती है।
तारा ने बस इतना कहा, “नानू ने कहा था, मम्मी डरेंगी तभी समझेंगी।”
यह वाक्य कमरे में हथौड़े की तरह गिरा।
महेंद्र अभी भी दरवाज़े के बाहर खड़े थे। चेन लगी हुई थी। वह पुलिस को देखकर भी नहीं झुके। बल्कि अपनी पुरानी पुलिसिया अकड़ में बोले, “मैडम, यह घर का मामला है। आजकल बच्चे जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। हमने सिर्फ अपनी नातिन की सुरक्षा के लिए—”
“सुरक्षा के लिए खिलौने में ट्रैकर डालते हैं?” कविता यादव ने काट दिया।
महेंद्र की गर्दन तन गई।
“दुनिया खराब है। मां-बाप गैर-जिम्मेदार हों तो बुजुर्गों को कदम उठाने पड़ते हैं।”
अदिति को लगा जैसे वह फिर 12 साल की बच्ची बन गई है, जिसके पिता गलती करके भी उसे ही दोषी बना देते थे। पर इस बार उसके पीछे तारा थी। वह कांप सकती थी, टूट सकती थी, लेकिन चुप नहीं रह सकती थी।
“और स्कूल के बाहर तस्वीरें?” उसने पूछा। “ड्रॉइंग क्लास के बाहर? सुपरमार्केट में? आप मेरी बच्ची का पीछा करवा रहे थे?”
महेंद्र ने उंगली उठाई। “तुम्हारी बच्ची? तुम्हें याद भी है वह किस खानदान की है?”
रोहन आगे बढ़ा, मगर कविता यादव ने हाथ उठाकर उसे रोका।
“आपने कहा था आप मेरे ऑफिस आए थे,” अदिति ने रोहन से पूछा। “क्या कहा इन्होंने?”
रोहन ने गहरी सांस ली। “सुबह पार्किंग में इंतजार कर रहे थे। बोले, पुणे जाने की गलती मत करना। बोले कि कोर्ट में स्थिरता देखी जाती है, और मेरे पुराने मेडिकल रिकॉर्ड को कोई भी गलत मतलब दे सकता है।”
अदिति की आंखें फैल गईं।
कुछ साल पहले रोहन को एक साइट दुर्घटना के बाद घबराहट के दौरे आते थे। उसने इलाज कराया, दवा ली, काउंसलिंग की और पूरी तरह संभल गया। यह बात सिर्फ घर में थी। सावित्री ने एक रात अदिति की अलमारी से मेडिकल फाइल देख ली थी, पर तब उन्होंने कहा था, “हम परिवार हैं, किसी से क्या छिपाना।”
अब वही बात हथियार बन चुकी थी।
रोहन ने आगे कहा, “इन्होंने कहा कि गुरुवार को तुम जल्दी निकलती हो, तारा 3 बजे स्कूल से आती है, और मैं हर पल उसके साथ नहीं रह सकता। बोले, बच्ची कभी भी अकेली रह सकती है।”
अदिति के कानों में शोर भर गया। इसका मतलब वह सिर्फ भावनात्मक दबाव नहीं था। यह योजना थी। दिनों, समयों और रास्तों की जानकारी थी। तारा की जिंदगी को घेरने की कोशिश थी।
तभी लिफ्ट खुली और सावित्री देवी रोती हुई आईं। उनके हाथ में पूजा की थाली नहीं थी, पर चेहरे पर वही पुरानी पवित्रता का अभिनय था।
“अदिति, बेटा, तूने पुलिस क्यों बुला ली?” वह बिलखती हुई बोलीं। “हमने तो बस डराया था ताकि तू सोच ले। हम तारा से प्यार करते हैं।”
कमरे में सन्नाटा भर गया।
कविता यादव ने तुरंत पूछा, “आप मान रही हैं कि आपने बच्ची और मां को डराने की योजना बनाई?”
सावित्री को जैसे समझ आया कि उनसे गलती हो गई है। उन्होंने महेंद्र की ओर देखा। महेंद्र की आंखें लाल हो गईं।
“चुप रहो,” उन्होंने दांत भींचकर कहा।
पर शब्द निकल चुके थे।
उस रात अदिति ने पहली बार अपनी मां को रोते देखा और कुछ महसूस नहीं किया। पहले वह हर आंसू पर पिघल जाती थी। बचपन से उसे यही सिखाया गया था कि मां दुखी हो तो बेटी दोषी होती है। लेकिन अब उसे सिर्फ तारा की कांपती उंगलियां दिख रही थीं।
पुलिस ने प्रारंभिक शिकायत दर्ज की। ट्रैकर की जांच के लिए उसे भेजा गया। महेंद्र ने बार-बार अपने पुराने विभाग के लोगों का नाम लिया, पर कविता यादव ने साफ कहा, “रिटायरमेंट के बाद भी कानून वही रहता है।”
रात में रोहन ने ताले बदलवाए, जबकि महेंद्र के पास चाबी नहीं थी। अदिति ने स्कूल को ईमेल किया, आपातकालीन संपर्कों से अपने माता-पिता के नाम हटाए, गेट पर तस्वीरें भेजीं। नंदिता देर रात तक बैठी रही। उसने हर चीज़ की सूची बनाई—डिब्बे की तस्वीरें, नोट, ट्रैकर, खिलौना, दरवाज़े की रिकॉर्डिंग, तारा का बयान, रोहन का बयान, और सावित्री की स्वीकारोक्ति का वह हिस्सा जो मोबाइल की रिकॉर्डिंग में आ गया था।
अगली सुबह रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप समूह में महेंद्र का लंबा संदेश आया। उन्होंने लिखा कि अदिति अपने पति के प्रभाव में है, रोहन मानसिक रूप से अस्थिर रहा है, तारा को नाना-नानी से काटा जा रहा है, और पुणे ले जाकर बच्ची को “असली परिवार” से दूर किया जाएगा।
पहले अदिति शायद हर रिश्तेदार को अलग-अलग फोन करती। रोती। सफाई देती। माफी मांगती कि बात बढ़ गई। लेकिन इस बार उसने सिर्फ एक संदेश लिखा—
“जो लोग सच जानना चाहते हैं, वे शाम 6 बजे मौसी के घर आ जाएं। सबूत वहीं दिखाए जाएंगे।”
शाम को मौसी के इंदिरापुरम वाले फ्लैट में पूरा परिवार जमा था। मामा, बुआ, चचेरे भाई, पड़ोस की पुरानी आंटी, सब अपने-अपने अंदाज़ में बैठे थे। कुछ को लगता था बेटी ने बढ़ा दिया, कुछ को लगता था दादा-दादी का प्यार ऐसा ही होता है, कुछ सिर्फ तमाशा देखने आए थे।
महेंद्र साफ इस्त्री किया हुआ कुर्ता पहनकर आए। सावित्री हल्की साड़ी में थीं, चेहरा बुझा हुआ, पर आंसू तैयार।
महेंद्र ने शुरुआत की, “परिवार छोटी गलतफहमियों से नहीं टूटते। हम अपनी नातिन की भलाई चाहते हैं। आजकल की लड़कियां पति के कहने पर मां-बाप को भूल जाती हैं।”
अदिति ने उन्हें रोका नहीं।
फिर रोहन ने दरवाज़े की रिकॉर्डिंग चलाई, जिसमें महेंद्र कह रहे थे कि अदिति परिवार की इज्जत मिट्टी में मिला रही है। नंदिता ने टेबल पर तस्वीरें रखीं। स्कूल गेट की तस्वीर। ड्रॉइंग क्लास की तस्वीर। सुपरमार्केट पार्किंग की तस्वीर। फिर फटा चित्र, लाल निशान, काले धागे वाला खिलौना और ट्रैकर।
कमरे में एक-एक चेहरा बदलने लगा।
मौसी ने सावित्री से पूछा, “दीदी, यह खिलौना आपने बच्ची को दिया?”
सावित्री के होंठ कांपे। “मैंने बस डिब्बा पकड़ा दिया था।”
“और उसे अकेले दरवाज़े पर छोड़ दिया?” अदिति ने पूछा।
सावित्री ने सिर झुका लिया।
महेंद्र ने मेज पर हाथ मारा। “वह मेरी नातिन है!”
अदिति खड़ी हो गई। उसकी आवाज़ कांप रही थी, पर टूटी नहीं।
“नहीं। वह मेरी बेटी है। और आप उसे मेरे खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करेंगे।”
उस दिन परिवार में पहली बार कोई महेंद्र से ऊंची आवाज़ में बोला और कमरे की छत नहीं गिरी। दुनिया खत्म नहीं हुई। कोई देवी-देवता नाराज़ नहीं हुए। सिर्फ एक झूठा डर मर गया।
अगले दिन अदिति और रोहन ने अस्थायी सुरक्षा आदेश के लिए आवेदन दिया। नंदिता के दफ्तर के वकील ने केस संभाला। रिपोर्ट, तस्वीरें, नोट, ट्रैकर, रिकॉर्डिंग, स्कूल के गार्ड का बयान, रोहन के ऑफिस की सीसीटीवी फुटेज—सब जोड़ा गया। तारा का बयान भी दर्ज हुआ। अदिति ने जब कागज़ पर अपनी 9 साल की बच्ची का डर पढ़ा, तो उसका दिल जैसे किसी ने निचोड़ दिया।
लेकिन वह जानती थी—सच को दर्ज करना भी सुरक्षा का हिस्सा है।
महेंद्र और सावित्री को तारा, अदिति, रोहन, उनके घर, स्कूल और ड्रॉइंग क्लास से दूरी बनाए रखने का आदेश मिला। वे किसी रिश्तेदार के हाथ से भी उपहार या संदेश नहीं भेज सकते थे। स्कूल की प्रधानाचार्या ने गेट स्टाफ को साफ निर्देश दिए। जिस दिन उन्होंने तस्वीरें देखीं, एक शिक्षिका ने भी कहा कि उन्होंने महेंद्र की कार 2 बार स्कूल के पास देखी थी।
महेंद्र ने फिर दावा किया कि वह सिर्फ देखभाल कर रहे थे।
पर जब देखभाल में छिपना, पीछा करना और डराना शामिल हो जाए, तो वह प्यार नहीं रहता। वह कब्ज़ा बन जाता है।
पुणे जाने से 10 दिन पहले महेंद्र ने आखिरी गलती की। वह स्कूल के बाहर फूल और एक बड़ा टेडी बियर लेकर पहुंचे। गेट पर बोले, “मैं बस अपनी नातिन को आशीर्वाद देना चाहता हूं।”
गार्ड ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। प्रधानाचार्या ने तुरंत पुलिस को फोन किया। सुरक्षा आदेश के उल्लंघन की रिपोर्ट बनी। इस बार महेंद्र की पुरानी पहचान काम नहीं आई। उन्हें थाने जाना पड़ा। रिश्तेदारों के फोन धीरे-धीरे बंद हो गए। जो लोग “मां-बाप को माफ कर दो” कह रहे थे, वे भी चुप हो गए।
पुणे शिफ्ट होना आसान नहीं था।
नई सोसाइटी साफ-सुथरी थी। खिड़की से दूर पहाड़ी दिखती थी। स्कूल में कला कक्ष बड़ा था। रोहन की नौकरी स्थिर थी। लेकिन तारा हर डोरबेल पर चौंक जाती। किसी भी बंद डिब्बे को खोलने से डरती। उसने अपने सारे खिलौने अलमारी में रख दिए। सफेद खरगोश का नाम आते ही उसका चेहरा पीला पड़ जाता।
अदिति ने उसे मजबूर नहीं किया। उसने हर रात बस वही दोहराया—
“तुमने सच बोला, इसलिए हम सुरक्षित हैं।”
रोहन ने उसके कमरे में छोटा ड्रॉइंग डेस्क लगाया। अदिति ने नया स्केचबुक खरीदा, लेकिन उसे खाली रहने दिया। उसने तारा से यह नहीं कहा कि नया घर बनाओ, खुश रहो, भूल जाओ। क्योंकि डर आदेश से नहीं जाता। वह भरोसे से धीरे-धीरे उतरता है।
तारा ने थेरेपी शुरू की। पहली कुछ बैठकों में वह सिर्फ रंग चुनती रही। फिर उसने दरवाज़े बनाए। बहुत सारे दरवाज़े। कुछ बंद, कुछ खुले, कुछ पर ताले। अदिति बाहर बैठकर चुपचाप इंतज़ार करती। कभी-कभी उसे लगता, एक बच्ची की सुरक्षा के लिए इतना बड़ा युद्ध क्यों लड़ना पड़ा। फिर वह खुद को जवाब देती—क्योंकि कुछ लोग खून के रिश्ते को अधिकार समझ लेते हैं, जिम्मेदारी नहीं।
2 महीने बाद एक दोपहर अदिति रसोई में चाय बना रही थी। घर में हल्की बारिश की खुशबू थी। तारा अपने कमरे में चुप थी। बहुत चुप। अदिति डरते हुए दरवाज़े तक गई।
तारा फर्श पर बैठी चित्र बना रही थी।
कागज़ पर एक घर था। पीछे पहाड़ थे। बालकनी में तुलसी थी। रोहन छोटी सी मेज ठीक कर रहा था। अदिति दरवाज़े पर चाय लेकर खड़ी थी। बीच में तारा थी—इस बार अलग कटी हुई नहीं, किसी से दूर नहीं, बल्कि मां और पापा के बीच।
दरवाज़े के ऊपर उसने बड़े अक्षरों में लिखा था—
“यहां वही आएगा, जिससे मुझे डर नहीं लगेगा।”
अदिति ने मुंह पर हाथ रख लिया। वह रोना नहीं चाहती थी, पर आंसू रुक नहीं पाए। तारा ने पीछे मुड़कर देखा।
“मम्मी, यह पुणे वाला घर है,” उसने धीरे से कहा। “इसमें नानू-नानी नहीं हैं… अभी नहीं।”
अदिति ने उसके पास बैठकर सिर चूमा। “ठीक है। तुम्हारे घर में कौन आएगा, यह तुम तय करोगी।”
उस रात अदिति ने पहली बार पुराने घर की चाबी कूड़ेदान में नहीं, बल्कि एक छोटे डिब्बे में रख दी। याद के लिए नहीं, सबक के लिए। उसे समझ आ गया था कि परिवार सिर्फ जन्म से नहीं बनता। परिवार वह है जो बच्चे को इतना सुरक्षित महसूस कराए कि वह सच बोल सके।
महेंद्र और सावित्री ने डर से उन्हें रोकना चाहा था।
पर उसी डर ने अदिति को दिखा दिया कि अपनी बेटी को बचाने के लिए उसे कितनी दूर जाना होगा।
और इस बार, वह बिना पीछे देखे चली गई।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.