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बेटी का हाथ टूटा था, माँ खाना लेकर लौटी तो पिता साली के लिए घर छोड़ चुका था; फिर अपने ही सोफे पर मिला वह सच, जिसने सुनाया—“तुमने हमें नहीं, उसे चुना”, और पूरा परिवार एक रात में हमेशा के लिए बिखर गया

PART 1

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“तुम्हारी बेटी का हाथ अभी-अभी टूटा है,” नंदिनी ने काँपती आवाज़ में कहा, लेकिन राजीव ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, क्योंकि उसकी तलाकशुदा साली मीरा को उस रात उससे “ज़्यादा ज़रूरत” थी।

जयपुर के मानसरोवर वाले उनके घर के बैठक कमरे में 12 साल की परी सोफे पर बैठी रो रही थी। उसके दाएँ हाथ पर सफेद प्लास्टर चढ़ा था, आँखें सूजी हुई थीं और मेज़ पर रखी गरम कचौरी की खुशबू भी उस दर्द को हल्का नहीं कर पा रही थी। नंदिनी के हाथ में कुल्हड़ वाली ठंडी लस्सी थी, जो परी ने अस्पताल से लौटते वक्त माँगी थी। उसने सोचा था, बेटी को थोड़ा आराम मिलेगा, पिता उसके सिर पर हाथ फेरेंगे, और यह डरावनी रात किसी तरह कट जाएगी।

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लेकिन राजीव दरवाज़े के पास खड़ा था, कार की चाबी घुमा रहा था।

“मीरा टूट गई है, नंदिनी,” उसने कहा, जैसे बेटी का टूटा हाथ कोई छोटी बात हो। “उसका अभी-अभी तलाक हुआ है। उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

नंदिनी 40 साल की थी। 18 साल की शादी में उसने बहुत कुछ सहा था—चुप्पियाँ, ताने, अधूरे वादे, ससुराल की इज़्ज़त के नाम पर निगली गई बेइज़्ज़तियाँ। पर उस रात उसे पहली बार लगा कि उसका विवाह सिर्फ थका नहीं, मर चुका है।

मीरा उसकी बड़ी बहन थी। बचपन से मीरा को नंदिनी की हर खुशी से जलन होती थी। स्कूल में नंदिनी कथक सीखती तो मीरा गुरुजी के सामने रो पड़ती कि माँ-बाप उसे कम प्यार करते हैं। नंदिनी की पहली नौकरी लगी तो मीरा ने रिश्तेदारों में फैला दिया कि वह घमंडी हो गई है। नंदिनी की शादी में भी उसने वही गुलाबी साड़ी पहनी थी जो दुल्हन के जोड़े से मिलती-जुलती थी, ताकि हर तस्वीर में निगाह उसी पर जाए।

राजीव से शादी करके नंदिनी ने सोचा था, अब उसका अपना घर होगा। दो बच्चे हुए—14 साल का अर्जुन, चुप लेकिन बेहद समझदार, और परी, जो राजीव को भगवान की तरह मानती थी। पर मीरा धीरे-धीरे उस घर में भी घुस आई। नल खराब हो तो राजीव, बैंक का काम हो तो राजीव, उदासी हो तो राजीव। और राजीव हर बार भागता था।

6 महीने पहले मीरा का अपने पति समीर से तलाक हुआ था। उसने सबको बताया कि समीर बेरहम था। नंदिनी को बात कभी पूरी सच नहीं लगी, पर माँ-बाप ने मीरा पर यकीन किया, जैसे हमेशा करते आए थे।

उस रात परी साइकिल से गिर गई थी। अस्पताल, एक्स-रे, प्लास्टर—सबके बाद वह सिर्फ इतना चाहती थी कि पापा उसके पास बैठें।

नंदिनी ने राजीव से कहा, “मैं 15 मिनट में लौटती हूँ। परी को अकेला मत छोड़ना।”

जब वह लौटी, परी अकेली थी।

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राजीव जैकेट पहन चुका था।

“मुझे जाना होगा,” उसने कहा।

नंदिनी ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखकर कहा, “आज अगर तुम गए, तो यह घर पहले जैसा नहीं रहेगा।”

राजीव ने दरवाज़ा खोल दिया।

“ड्रामा मत करो।”

दरवाज़ा बंद हुआ, और उसी आवाज़ के साथ नंदिनी के भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया।

रात को उसने चुपचाप बच्चों के कपड़े बैग में रखे। अर्जुन दोस्त के घर से लौटा तो माँ का चेहरा देखकर कुछ पूछे बिना बैग उठा लिया। नंदिनी ने अपनी बचपन की सहेली सुनैना को फोन किया।

“आ जा,” सुनैना ने बस इतना कहा।

2 दिन बाद नंदिनी अपनी काम की फाइलें लेने घर लौटी। उसे लगा राजीव साइट पर होगा। उसने चाबी घुमाई, अंदर आई, बैठक की तरफ बढ़ी—

और वहीं जम गई।

उसके अपने सोफे पर राजीव और मीरा साथ बैठे नहीं थे, छिपते पकड़े गए थे।

मीरा ने दुपट्टा खींचकर चेहरा ढका। राजीव का रंग उड़ गया।

नंदिनी ने उस सोफे को देखा, जहाँ परी दर्द से रोई थी।

फिर उसने अपनी बहन को देखा।

और पहली बार समझ गई—मीरा उसकी चीज़ें नहीं छीनती थी।

वह नंदिनी को मिटाना चाहती थी।

PART 2

नंदिनी ने चीखा नहीं। शायद इसलिए कि दर्द इतना गहरा था कि आवाज़ भीतर ही पत्थर बन गई।

“मुझे तलाक चाहिए,” उसने कहा।

राजीव लड़खड़ाकर उठा। “गलती हो गई, नंदिनी। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। बच्चों से भी।”

नंदिनी की हँसी सूखी और डरावनी थी।

“जिस बेटी का हाथ टूटा था, उसे छोड़कर तुम उसी औरत के पास गए थे।”

मीरा ने सिर झुका लिया, पर नंदिनी जानती थी, यह शर्म नहीं थी। वह नया झूठ सोच रही थी।

सुनैना के घर पहुँचकर नंदिनी टूट गई। सुनैना ने सब सुना और उसी शाम दोनों परिवारों को बुला लिया। नंदिनी के माँ-बाप आए, राजीव के माँ-बाप आए, राजीव भी आया।

सुनैना ने सबके सामने सच रखा—परी, अस्पताल, मीरा, सोफा।

तभी उसने कहा, “मैंने समीर से भी बात की है।”

मीरा का नाम सुनते ही नंदिनी की माँ भड़क उठी, “उस आदमी को क्यों घसीटा?”

सुनैना ने फोन में तस्वीरें दिखाईं—समीर के हाथों के निशान, मीरा की धमकियाँ, आवाज़ें, संदेश। मीरा पीड़ित नहीं थी। वह अत्याचारी थी।

कमरा सन्न रह गया।

नंदिनी की माँ अचानक उठीं और नंदिनी को थप्पड़ मार दिया।

“तू बचपन से मीरा से जलती थी!”

उससे पहले कि नंदिनी कुछ कहती, सीढ़ियों से परी उतरी। उसने सब सुन लिया था।

वह राजीव के सामने खड़ी हुई।

“आपने मौसी को चुना, हमें नहीं।”

अर्जुन उसके पीछे आकर बोला, “अब आप हमारे पिता कहलाने लायक नहीं।”

राजीव वहीं रो पड़ा।

लेकिन उस दिन पहली बार किसी ने नंदिनी से कहा—

“अब यह घर तुम्हारा है। वह आदमी बाहर जाएगा।”

PART 3

3 दिन बाद नंदिनी अपने बच्चों के साथ घर लौटी। वही दरवाज़ा, वही तुलसी का गमला, वही नेमप्लेट—“राजीव और नंदिनी शर्मा”—पर अब हर चीज़ में एक अजीब खालीपन था। घर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसमें से आवाज़ें निकाल ली हों।

रसोई में परी का पुराना चित्र लगा था, जिसमें उसने पूरे परिवार को मंदिर के बाहर खड़ा बनाया था। अर्जुन की क्रिकेट ट्रॉफी धूल में पड़ी थी। फ्रिज पर किराने की पर्ची चिपकी थी, जो नंदिनी ने उस रात से पहले लिखी थी। आटा, हल्दी, दूध, परी की पसंद वाली सेवई।

राजीव अपनी चीज़ें ले गया था। कपड़े, घड़ी, कागज़, लैपटॉप। खाने की मेज़ पर उसने शादी की अंगूठी छोड़ दी थी।

नंदिनी ने उसे देर तक देखा।

फिर उसे उठाकर तलाक के कागज़ों वाली फाइल में रख दिया। यादों की डिब्बी में नहीं। सबूतों की फाइल में। क्योंकि वह अब प्रेम की निशानी नहीं थी, बंद होने वाले मुकदमे की चीज़ थी।

बच्चे अपने-अपने कमरों में गए। परी ने अपने बिस्तर पर बैठते ही पूछा, “माँ, क्या पापा सच में मौसी से प्यार करते थे?”

नंदिनी ने झूठ बोलने की कोशिश नहीं की।

“मुझे नहीं पता वह किससे प्यार करते थे,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन उस रात उन्होंने तुम्हें अकेला छोड़ा। इतना सच काफी है।”

परी ने प्लास्टर वाले हाथ को सीने से लगाया और चुप हो गई।

अर्जुन कई दिनों तक लगभग बोला ही नहीं। स्कूल से लौटकर दरवाज़ा बंद कर लेता। खाना आधा छोड़ देता। एक रात नंदिनी ने उसके कमरे के बाहर खड़े होकर सुना—अंदर से दबे हुए रोने की आवाज़ आ रही थी। वह अंदर नहीं गई। बस दरवाज़े के बाहर बैठ गई। कुछ देर बाद अर्जुन ने दरवाज़ा खोला, माँ को फर्श पर बैठे देखा और बिना कुछ कहे उसके कंधे पर सिर रख दिया।

उसी सप्ताह समीर ने नंदिनी को संदेश भेजा।

“मुझे पता है तुम मुझसे बात नहीं करना चाहोगी, लेकिन मीरा के बारे में सच जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी है।”

नंदिनी ने उसे शहर के एक शांत कैफे में मिलने बुलाया। समीर पहले से बैठा था। पहले से ज्यादा दुबला, थका हुआ, लेकिन आँखों में कोई कड़वाहट नहीं। उसने फाइल निकाली। उसमें मीरा के संदेश थे—धमकियाँ, गालियाँ, पैसे की माँग, झूठे आरोप लगाने की चेतावनी। उसने एक पुरानी मेडिकल रिपोर्ट भी दिखाई।

“उसने मुझ पर गिलास फेंका था,” समीर ने अपनी बाँह का निशान दिखाते हुए कहा। “जब मैंने तलाक माँगा, तो बोली, अगर मुँह खोला तो पूरी कॉलोनी में कह दूँगी कि तूने मुझे मारा।”

नंदिनी का गला सूख गया। बचपन की सारी घटनाएँ लौट आईं—कथक की क्लास, झूठा रोना, माँ का मीरा को गले लगाना, नंदिनी को दोषी ठहराना।

उसे पहली बार समझ आया कि वह पागल नहीं थी। वह सच देखती थी, बस किसी ने उसकी बात कभी सुनी नहीं।

समीर ने कहा, “मैं शिकायत दर्ज कराना चाहता हूँ। बदला लेने के लिए नहीं। बस इसलिए कि कागज़ पर कहीं सच लिखा रहे।”

नंदिनी उसके साथ थाने गई।

पहले पुलिसवाले ने समीर की बात सुनकर हल्की हँसी दबाई। शायद उसे लगा, एक आदमी अपनी पूर्व पत्नी से डरने की बात कर रहा है। लेकिन जैसे ही संदेश, तस्वीरें और रिकॉर्डिंग सामने आईं, उसका चेहरा गंभीर हो गया। मामला दर्ज हुआ। समीर को कानूनी सलाह मिली। नंदिनी ने भी अपने वकील को सब बताया।

उधर राजीव ने फोन पर पछतावे की बरसात शुरू कर दी। कभी फूल भेजता, कभी बच्चों के लिए चॉकलेट, कभी कार्ड—“पापा को माफ कर दो।” नंदिनी ने कुछ नहीं फेंका। वह सब एक डिब्बे में रखती और बच्चों से कहती, “यह आया है। फैसला तुम्हारा।”

अर्जुन ने कभी डिब्बा नहीं खोला।

परी कभी-कभी कार्ड पढ़ती, रोती, फिर चुपचाप वापस रख देती।

नंदिनी ने दोनों बच्चों को परामर्श के लिए ले जाना शुरू किया। पहले दिन परी पूरे समय दीवार देखती रही। अर्जुन ने सिर्फ एक वाक्य कहा, “मुझे गुस्सा आता है कि मुझे उनसे प्यार भी था।” डॉक्टर ने धीरे से कहा, “यही दर्द है। प्यार और धोखा एक साथ रह जाएँ, तो बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं।”

नंदिनी ने उस दिन घर लौटकर बहुत रोई। बच्चों के सामने नहीं। बाथरूम में नल खोलकर।

तलाक का मुकदमा शुरू हुआ तो राजीव ने पहले मेल-मिलाप की कोशिश की। उसने अदालत में कहा कि नंदिनी भावुक होकर घर छोड़ गई थी। पर सुनैना गवाही देने आई। अस्पताल की पर्ची आई। परी की प्लास्टर रिपोर्ट आई। और वह दिन भी दर्ज हुआ जब वह बेटी को छोड़कर मीरा के पास गया था।

राजीव के पिता, जो जयपुर में बिल्डिंग मटेरियल का पुराना कारोबार चलाते थे, अदालत में नहीं आए, लेकिन उन्होंने राजीव को कंपनी से अलग कर दिया। उन्होंने नंदिनी को फोन कर सिर्फ इतना कहा, “बहू, बेटे की गलती का बोझ तुम मत उठाना। बच्चों का ध्यान रखना।”

नंदिनी ने पहली बार ससुर की आवाज़ में अपने लिए सम्मान महसूस किया।

फिर वकील ने एक और बात पकड़ी। राजीव ने शादी के दौरान गुप्त खाते में पैसे जमा किए थे। उसी पैसे से उसने शहर के दूसरे छोर पर एक छोटा फ्लैट बुक किया था। कागज़ सामने आते ही उसके चेहरे की रंगत बदल गई।

वकील ने फुसफुसाकर कहा, “अब तस्वीर बदल गई है।”

सचमुच बदल गई।

नंदिनी को घर में रहने का अधिकार मिला। बच्चों की मुख्य देखभाल उसके पास रही। राजीव को उचित भरण-पोषण देना पड़ा और छिपाए गए पैसे भी वैवाहिक संपत्ति माने गए। फ्लैट बेचना पड़ा। राजीव ने अदालत के बाहर एक बार नंदिनी से कहा, “तुम मुझे बरबाद कर रही हो।”

नंदिनी ने शांत स्वर में जवाब दिया, “नहीं। मैं बस तुम्हें तुम्हारे फैसलों से मिलवा रही हूँ।”

मीरा की दुनिया भी जल्दी ढह गई। समीर की शिकायत, पुराने संदेश, मोहल्ले की फुसफुसाहट, राजीव से उसका संबंध—सब मिलकर उसकी बनाई हुई मासूमियत की मूर्ति तोड़ गए। जिस बुटीक में वह काम करती थी, वहाँ से उसे निकाल दिया गया। मकान मालिक ने किराया न मिलने पर कमरा खाली कराया। कुछ महीनों बाद खबर मिली कि वह शहर के बाहरी इलाके में एक छोटे से पीजी में रह रही है।

नंदिनी को दया नहीं आई।

एक शाम वह अचानक घर के गेट पर आ खड़ी हुई। बाल बिखरे हुए, चेहरा सूखा, हाथ में एक मुड़ा हुआ लिफाफा।

“नंदिनी,” उसने धीमे से कहा, “बस कुछ दिन रहने दे। मैं तेरी बहन हूँ।”

नंदिनी ने उसे देखा। उसे बचपन की वह मीरा दिखी, जिसने उसके नृत्य के घुँघरू छिपा दिए थे। वह मीरा दिखी, जिसने माँ से झूठ कहा था कि नंदिनी उसे धक्का देती है। वह मीरा दिखी, जो परी के टूटे हाथ की रात उसके पति को बुला रही थी।

मीरा ने लिफाफा आगे बढ़ाया।

“मैंने सब लिखा है। मुझे तुझसे जलन थी। तू हमेशा संभल जाती थी। मैं कभी नहीं संभल पाई।”

नंदिनी ने लिफाफा लिया, पर दरवाज़ा नहीं खोला।

“तुझे कमरा नहीं चाहिए, मीरा,” उसने कहा, “तुझे नतीजे चाहिए। और अब वे मिल रहे हैं।”

उसने गेट बंद कर दिया।

कुछ महीनों बाद नंदिनी के माँ-बाप ने संपर्क किया। माँ ने कहा, “हमसे गलती हुई होगी। पर खून का रिश्ता खून का रिश्ता होता है।”

नंदिनी उनसे एक रेस्टोरेंट में मिली। पिता ने चाय मँगवाई, माँ ने आँसू निकाले, फिर बात वहीं पहुँची—मीरा अकेली है, राजीव बच्चों का पिता है, परिवार को जोड़ना चाहिए।

नंदिनी ने कप मेज़ पर रखा।

“आप लोगों ने मेरी पूरी ज़िंदगी मुझे उन लोगों को समझने को कहा जिन्होंने मुझे चोट पहुँचाई। अब मैं अपने बच्चों को यह नहीं सिखाऊँगी।”

वह उठी और चली गई।

उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

समीर धीरे-धीरे उनके जीवन का हिस्सा बना, पर किसी खाली जगह को भरने के लिए नहीं। वह रविवार को कभी समोसे लाता, कभी बोर्ड गेम, कभी सिर्फ बच्चों की बातें सुनता। बाद में उसने अपने साथी कबीर से नंदिनी और बच्चों को मिलवाया। उसने बताया कि मीरा के साथ शादी में उसने अपनी असली पहचान छिपाकर रखी थी, क्योंकि मीरा हर कमजोरी को हथियार बना देती थी।

कबीर शांत, हँसमुख और पक्षियों का शौकीन था। परी ने उससे जयपुर के पार्कों में दिखने वाली चिड़ियों के नाम पूछने शुरू किए। अर्जुन ने समीर के साथ फिर से क्रिकेट खेलना शुरू किया। एक दिन समीर ने गेंद फेंकी, अर्जुन ने सीधा छक्का मारा, और परी इतनी ज़ोर से हँसी कि नंदिनी की आँखें भर आईं।

घर फिर घर लगने लगा।

नंदिनी ने खुद को भी वापस ढूँढना शुरू किया। उसने पास के सामुदायिक केंद्र में नृत्य की कक्षा में नाम लिखवाया। पहले दिन जब उसने पैरों में घुँघरू बाँधे, उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। आईने में उसे 15 साल की वह लड़की दिखी जिसे झूठे आरोपों ने मंच से दूर कर दिया था।

गुरुजी ने ताल दी।

नंदिनी ने पहला कदम रखा।

और उस एक कदम में 25 साल की घुटी हुई साँस बाहर आ गई।

परी ने एक दिन माँ से कहा, “मुझे भी सीखना है।”

नंदिनी ने मुस्कुराकर उसके प्लास्टर उतर चुके हाथ को सहलाया। “फिर हम दोनों सीखेंगे।”

अर्जुन ने क्रिकेट अकादमी में दाखिला लिया। कोच ने नंदिनी से कहा, “लड़के में अनुशासन है। सही साथ मिला तो आगे जा सकता है।”

नंदिनी हर मैच में जाती। धूप में बैठती, पानी की बोतलें सँभालती, और जब अर्जुन चौका मारता तो सबसे ज़ोर से ताली बजाती। अर्जुन शर्म से सिर झुका लेता, पर हर बार आँखें उसे खोजती थीं।

राजीव कभी-कभी बच्चों से मिलने आता। शुरू में परी जाती रही, पर एक दिन लौटकर उसने बैग फेंका और कहा, “उन्होंने मुझसे कहा कि अर्जुन को समझाऊँ। उन्हें हमसे नहीं, अपनी छवि से प्यार है।”

उसने भी मिलना बंद कर दिया।

नंदिनी ने बच्चों को रोका नहीं। धक्का भी नहीं दिया। उसने सिर्फ इतना कहा, “तुम्हारे रिश्ते तुम्हारे हैं। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी, फैसला नहीं छीनूँगी।”

कई सालों बाद ज़िंदगी परिपूर्ण नहीं हुई, पर अपनी हो गई।

नंदिनी की नौकरी बेहतर हुई। उसने घर की किस्तें समय पर भरीं। बैठक का वही सोफा बदल दिया गया। पुराने सोफे को बाहर निकलवाते समय वह कुछ देर खड़ी रही। उस पर परी रोई थी। उस पर विश्वास टूटा था। उस पर झूठ पकड़ा गया था।

नए सोफे पर पहली रात बच्चों ने पिज़्ज़ा खाया, समीर और कबीर ने चाय बनाई, सुनैना ने हँसते हुए कहा, “अब इस घर में सिर्फ अपने लोग बैठेंगे।”

नंदिनी ने मन ही मन सोचा—खून से नहीं, कर्म से अपने लोग बनते हैं।

एक शाम अर्जुन के मैच के बाद परी माँ के पास खाली स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठी। सूरज ढल रहा था। अर्जुन मैदान में अकेला अभ्यास कर रहा था।

परी ने पूछा, “माँ, क्या आपको तलाक का अफसोस है?”

नंदिनी ने मैदान देखा। बेटे की गेंद हवा में उठी। बेटी का हाथ अब मजबूत था। उसके अपने पाँवों में घुँघरुओं की हल्की आवाज़ जैसे याद बनकर बज रही थी।

“नहीं,” उसने कहा। “अफसोस सिर्फ इतना है कि मैंने खुद पर भरोसा करने में इतनी देर कर दी।”

परी ने सिर माँ के कंधे पर रख दिया।

“मुझे अफसोस नहीं कि मैंने आपको चुना।”

नंदिनी ने उसे बाँहों में भर लिया। वह वही बच्ची थी जिसका हाथ टूटा था, पर अब उसका दिल पहले से ज्यादा सच पहचानता था। और नंदिनी वही स्त्री थी जिसे सबने बरसों कमजोर समझा था, पर अब वह जानती थी—

कभी-कभी धोखा घर नहीं तोड़ता।

वह सिर्फ उन लोगों को बाहर कर देता है, जिन्हें कभी अंदर होना ही नहीं चाहिए था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.