Posted in

“बहू नहीं, उसकी मां भी झूठी थी” — बूढ़ी सास ने गर्भवती औरत को सबके सामने नीचा दिखाया, पर बंद तिजोरी, पुरानी डायरी और डॉक्टर को लिखे पत्र ने उस रात रिश्तों की असली कीमत खोल दी।

भाग 1:
ठाकुर अरविंद प्रताप सिंह ने अपनी ही मां को यह कहते सुना कि उसकी गर्भवती पत्नी के बच्चे को जन्म लेते ही घर की वंशावली से मिटा दिया जाएगा।

वह 3 दिन पहले दिल्ली के लिए निकला था, लेकिन चंबल किनारे अचानक आई बारिश ने सड़कें काट दीं और सौदा अधूरा छोड़कर उसे रातोंरात बुंदेलखंड लौटना पड़ा। उसने हवेली में खबर नहीं भेजी। वर्षों से उसकी आदत थी कि बिना बताए लौटे तो घर के असली चेहरे दिख जाते हैं। मगर उस शाम राघवगढ़ हवेली के भीतरी आंगन में जो सुनाई दिया, उसने उसके पैरों से ताकत खींच ली।

Advertisements

भीगे जूतों पर मिट्टी चिपकी थी। सफेद कुर्ते पर रास्ते की धूल थी। हाथ में चमड़े की फाइल थी, जिसमें जमीनों के नए कागज थे। वह पिछली ड्योढ़ी से अंदर आया ही था कि बैठक से राजेश्वरी देवी की ठंडी, काटती हुई आवाज गूंजी।

—अगर यह बच्चा इसी हवेली में पैदा हुआ, तो इसका नाम प्रताप सिंहों की किताब में नहीं लिखा जाएगा।

Advertisements

गौरी खिड़की के पास खड़ी थी। 7 महीने का गर्भ उसकी देह को भारी कर चुका था, पर उसकी गर्दन अभी भी सीधी थी। एक हाथ पेट पर था, दूसरा हाथ गले में पड़े पीतल के पुराने लॉकेट को पकड़े हुए था। वह लॉकेट सूरज के आकार का था, जिसके बीच में छोटी सी दरार थी, जैसे किसी ने उसे कभी जोर से पत्थर पर पटका हो।

—यह बच्चा अरविंद का है, मांजी।

—मुझे मांजी मत कहो।

राजेश्वरी देवी ने चांदी की मूठ वाली छड़ी जमीन पर टिकाई। उनकी उम्र 62 थी, मगर राघवगढ़ में उनकी आवाज आज भी तहसीलदार से ज्यादा चलती थी।

—तुम उस बस अड्डे वाली औरत की बेटी हो, जो बरसात में भीगे चने बेचती थी। तुम इस हवेली में बहू बनकर आई हो, इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारा खून भी ऊंचा हो गया।

गौरी की आंखें सूखी थीं। शायद वह रो-रोकर थक चुकी थी। शायद उसने तय कर लिया था कि अपमान के सामने आंसू दिखाना अपमान करने वाले को जीत देना होता है।

—मेरी मां गरीब थीं, झूठी नहीं।

राजेश्वरी देवी हंसी नहीं। वह मुस्कुराईं भी नहीं। बस पास आईं और इतने धीमे स्वर में बोलीं कि शब्द जहर की तरह भीतर उतरें।

—गरीब औरतों की सच्चाई भी उनके साथ ही मर जाती है। तुम्हारी मां ने भी बहुत बातें की थीं। फिर आखिर में क्या बचा? एक फटा थैला, एक बीमार बच्ची और वही सूरज का टुकड़ा।

Advertisements

अरविंद का दिल धक से रुक गया।

वह 16 महीने से समझता रहा था कि मां और गौरी में बस स्वभाव का फर्क है। वह खेत, मंडी, ठेके, डेयरी और अदालतों में उलझा आदमी था। उसे लगा था, घर की औरतों के बीच थोड़ी खींचतान हर बड़े घर में होती है। उसे यह नहीं दिखा कि उसके जाते ही गौरी का खाना नौकरों के बरामदे में भेजा जाता था। उसे यह नहीं दिखा कि शादी की तस्वीर बैठक से हटाकर अनाज वाले कमरे में रख दी गई थी। उसे यह नहीं दिखा कि पुरानी दाई शांता हर बार उसे देखकर कुछ कहना चाहती थी, पर राजेश्वरी देवी के कदमों की आहट से चुप हो जाती थी।

गौरी उसकी जिंदगी में किसी मेले की रोशनी की तरह आई थी। ओरछा के सावन मेले में उसने पहली बार उसे देखा था। वह अपनी मां कमला के साथ भुने चने और गुड़ की पट्टी बेच रही थी। उसी शाम एक भूखा बच्चा बिना पैसे के उसकी दुकान से गुड़ उठा ले गया था। भीड़ ने चोर कहकर पकड़ना चाहा, पर गौरी ने खुद पैसे गल्ले में डाल दिए और कहा था कि बच्चा भूखा था, चोर नहीं।

अरविंद उस एक वाक्य को भूल नहीं पाया। 5 महीने बाद उसने उससे विवाह किया। उसने गौरी को महंगी साड़ी नहीं, सम्मान दिया था। मगर सम्मान घर की देहरी पार करते ही राजेश्वरी देवी की मुट्ठी में कैद हो गया था।

—जन्म से पहले चली जाओ, गौरी।

राजेश्वरी देवी की आवाज अब और भी धीमी हो गई।

—मैं तुम्हें कुछ पैसे दे दूंगी। भोपाल या कानपुर चली जाना। बच्चा पैदा हो तो अपनी मां का नाम देना। यहां रुकी तो मैं वचन नहीं देती कि प्रसव में कौन बचेगा और कौन नहीं।

गौरी का हाथ पेट पर कस गया।

—आप मुझे डराना चाहती हैं?

—नहीं। समझदार बनाना चाहती हूं। इस हवेली में नाम ही जिंदगी है। और मैं अपने पोते को ऐसी औरत की कोख से पहचान नहीं दूंगी, जिसके घर का अतीत कीचड़ में दबा हो।

अरविंद ने दरवाजा धक्का देकर खोल दिया।

बैठक की हवा जैसे थम गई। दीवार पर लगी पुरखों की तस्वीरों के नीचे 3 लोग खड़े थे, और 3 दिशाओं में टूटती हुई चुप्पी थी।

गौरी ने पहले उसे देखा। उसके चेहरे पर राहत नहीं आई। डर भी नहीं आया। बस ऐसी थकान आई जैसे वह सोच रही हो, काश यह सब उसे पहले दिख गया होता।

राजेश्वरी देवी पहली बार बिना तैयारी के पकड़ी गईं।

—अरविंद… तुम लौट आए?

—शायद देर से लौटा।

उसकी आवाज भारी थी।

—यह सब कब से चल रहा है?

गौरी चुप रही। राजेश्वरी देवी ने छड़ी की मूठ कस ली।

—तुम रास्ते की बात को घर का फैसला मत बनाओ। बहुएं कभी-कभी अपनी जगह भूल जाती हैं।

—और मांएं कभी-कभी इंसानियत?

राजेश्वरी देवी का चेहरा सख्त हो गया।

—तुम मुझसे इस लड़की के लिए सवाल कर रहे हो?

—इस लड़की का नाम गौरी है। मेरी पत्नी है। मेरे बच्चे की मां है।

कमरे में रखी पीतल की थाली में दीपक की लौ कांपी। तभी अरविंद की नजर गौरी के लॉकेट पर पड़ी। वही सूरज, वही दरार। राजेश्वरी देवी भी उसे घूर रही थीं। उनके चेहरे से धीरे-धीरे रंग उतरने लगा।

—यह लॉकेट कहां से आया? —राजेश्वरी देवी ने पूछा।

गौरी ने पहली बार भौहें सिकोड़ीं।

—मेरी मां का था।

—नाम?

—कमला बाई।

राजेश्वरी देवी ने सांस रोकी।

—पूरा नाम।

—कमला रामदीन अहिरवार।

यह नाम सुनते ही राजेश्वरी देवी एक कदम पीछे हट गईं। उनके चेहरे पर घृणा नहीं थी। वह डर था। बहुत पुराना, बहुत गहरा डर।

अरविंद ने मां की आंखों में वह डर साफ देख लिया।

—आप कमला बाई को जानती थीं?

राजेश्वरी देवी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने छड़ी उठाई, पल्लू ठीक किया और बाहर निकलने लगीं।

अरविंद दरवाजे के आगे खड़ा हो गया।

—पहले जवाब दीजिए।

—हर पुरानी बात का जवाब बेटे को नहीं दिया जाता।

—जब पुरानी बात मेरी पत्नी और बच्चे की जान तक आ जाए, तब दिया जाता है।

राजेश्वरी देवी ने पहली बार गौरी को नहीं, अरविंद को देखा।

—तुम्हें सच जानना है? तो अपने पिता की पुरानी तिजोरी खोलो। वही तिजोरी, जिसकी चाबी तुम्हारे पास कभी नहीं आई।

यह कहकर वह चली गईं।

गौरी ने कांपते हाथों से लॉकेट छोड़ा। बाहर बारिश फिर तेज हो गई थी। हवेली के बरामदे में खड़े अरविंद को पहली बार लगा कि यह घर ईंट-पत्थर से नहीं, दबी हुई चीखों से बना है।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇.

भाग 2:

उस रात गौरी ने सब बताया। उसने रोकर नहीं बताया, क्योंकि अपमान ने उसके आंसू बहुत पहले सुखा दिए थे। उसने कहा कि अरविंद के हर सफर के बाद उसके कमरे की चादरें बदल दी जातीं, जैसे वह इस घर की नहीं, किसी सराय की मेहमान हो। रसोई में उसे चांदी की थाली नहीं दी जाती, क्योंकि राजेश्वरी देवी कहती थीं कि गरीब घर की लड़की को स्टील भी बहुत है। शादी की तस्वीर दीवार से उतरी तो गौरी ने समझा शायद सजावट बदल रही होगी, पर शांता दाई ने फुसफुसाकर बताया कि मालकिन ने कहा था, बहू का चेहरा पुरखों के बीच अच्छा नहीं लगता। सुबह होते ही अरविंद पिता की बंद तिजोरी के पास गया। चाबी राजेश्वरी देवी के मंदिर वाले संदूक में मिली, तुलसी की माला और कपूर के डिब्बे के नीचे छिपी हुई। तिजोरी में पुराने बहीखाते, जमीन के नक्शे, सूखे गुलाब और 1 लाल कपड़े में बंधी डायरी थी। डायरी उसके पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह की थी, जिनकी मौत 12 साल पहले दिल के दौरे से हुई थी। उसमें बार-बार 1 नाम आया था: रामदीन अहिरवार। वह आदमी जिसने राघवगढ़ की पहली डेयरी, पहली कुएं की खुदाई और उत्तर वाले 40 बीघे खेतों में पैसा लगाया था। बदले में उसे हिस्सेदारी मिलनी थी। पर उसके मरते ही उसकी पत्नी कमला को चरित्रहीन, झूठी और लालची कहकर गांव से निकाला गया। अरविंद ने तहसील के पुराने मुंशी माधव लाल को बुलाया। बूढ़े मुंशी ने कांपते हाथों से कहा कि असली कागज कभी नष्ट नहीं हुए; उनकी नकल दतिया रजिस्ट्री में हो सकती है। उसी शाम अरविंद दतिया गया। लौटते वक्त उसकी गाड़ी को 2 मोटरसाइकिलों ने अंधे मोड़ पर घेरा, पर ड्राइवर ने किसी तरह जीप खेत में उतार दी। फाइल बच गई, अरविंद बच गया, मगर रात में हवेली आकर उसने राजेश्वरी देवी के कमरे से वह पत्र पाया जिसने उसकी रूह जमा दी: प्रसव कराने वाले डॉक्टर को लिखा था कि अगर स्थिति बिगड़े तो वंश बचाने के लिए मां पर समय बर्बाद न किया जाए। अरविंद ने पत्र मोड़ा, आंखें बंद कीं और उसी पल फैसला कर लिया कि अगली सुबह सच बंद कमरे में नहीं, पूरे गांव के सामने खुलेगा।

भाग 3:

अगले दिन राघवगढ़ पंचायत भवन के बाहर उतनी भीड़ थी जितनी आखिरी बार 8 साल पहले चुनाव के समय दिखी थी। खबर रात में ही फैल गई थी कि ठाकुर अरविंद प्रताप सिंह अपनी मां के खिलाफ पंचायत बुला रहा है। कुछ लोग तमाशा देखने आए थे। कुछ लोग डरते हुए आए थे, क्योंकि राजेश्वरी देवी के खिलाफ खड़ा होना आसान बात नहीं थी। कुछ बूढ़े लोग ऐसे भी थे, जिनके चेहरे पर अजीब बेचैनी थी, जैसे 30 साल पुरानी राख में दबी आग फिर से चमक उठी हो।

राजेश्वरी देवी काले बनारसी सूट में आईं। माथे पर बड़ी बिंदी थी, हाथ में वही चांदी की छड़ी। उनके पीछे 2 पुराने कारिंदे थे। वे ऐसे चलीं जैसे पंचायत भवन भी उनकी हवेली का हिस्सा हो।

गौरी को अरविंद ने अपने बगल में बैठाया। वह हल्की पीली साड़ी में थी। चेहरा थका हुआ था, पर आंखें स्थिर थीं। उसके गले में सूरज वाला लॉकेट साफ दिख रहा था। पेट पर हाथ रखे वह चुपचाप बैठी रही। भीड़ में कई औरतें उसे देख रही थीं। कुछ में दया थी, कुछ में सम्मान, और कुछ में वह डर, जो हर बहू जानती है जब घर की दीवारें उसके खिलाफ हो जाएं।

पंचायत के सरपंच कैलाश त्रिपाठी ने गला खंखारा।

—अरविंद बेटा, घर की बात घर में रहती तो अच्छा था।

अरविंद ने सीधा जवाब दिया।

—जब घर की बात किसी औरत की जान तक पहुंच जाए, तब गांव गवाह बनता है।

यह सुनकर भीड़ में हलचल हुई। राजेश्वरी देवी की आंखें सिकुड़ गईं।

—तुम अपनी मां को कटघरे में खड़ा करोगे?

—नहीं। मैं सच को सामने रखूंगा। जो कटघरे में जाएगा, वह खुद तय करेगा कि उसके हाथ कितने साफ हैं।

सबसे पहले अरविंद ने वह पत्र निकाला। वही पत्र, जो राजेश्वरी देवी ने डॉक्टर सुरेश माथुर को लिखा था। उसने ऊंची आवाज में पढ़ना शुरू किया। हर शब्द पंचायत भवन की दीवारों से टकराकर लौटता रहा।

पत्र में साफ लिखा था कि प्रसव के समय अगर मां और बच्चे में किसी एक को चुनना पड़े, तो परिवार वंश को प्राथमिकता देगा। और अगर निर्णय पर शोर उठे, तो हवेली उसका आर्थिक आभार व्यक्त करेगी।

भीड़ में सन्नाटा छा गया।

गौरी का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने पेट पर हाथ और कस लिया। शांता दाई, जो पीछे बैठी थी, रो पड़ी।

—मैंने रोका था मालकिन को। मैंने कहा था ऐसा पाप मत लिखिए। मगर इन्होंने कहा था कि घर बचाना पाप नहीं होता।

राजेश्वरी देवी बिजली की तरह घूमीं।

—चुप रह, शांता! तूने हमारी रोटी खाई है।

शांता दाई उठ खड़ी हुई। उम्र ने उसकी कमर झुका दी थी, पर उस दिन उसकी आवाज सीधी थी।

—रोटी खाई है, जहर नहीं। बहू को मैंने कई रात अकेले रोते देखा है। अब और चुप नहीं रहूंगी।

भीड़ से धीमी आवाजें उठीं। पंचायत के बाहर खड़े नौजवान मोबाइल पर रिकॉर्डिंग करने लगे। राजेश्वरी देवी ने पहली बार समझा कि वह हवेली के भीतर नहीं थीं, जहां आवाजें खरीदी जा सकती थीं।

फिर अरविंद ने लाल कपड़े में बंधी डायरी खोली।

—यह मेरे पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह की डायरी है। इसमें लिखा है कि राघवगढ़ एस्टेट की उत्तर वाली 40 बीघा जमीन पर रामदीन अहिरवार का हिस्सा था। उन्होंने पैसा लगाया, मजदूर लगाए और कुएं खुदवाए। उनके मरने के बाद उनकी पत्नी कमला बाई ने अपना हक मांगा। उन्हें झूठा कहा गया। बदनाम किया गया। गांव से निकाला गया।

भीड़ में बैठे बूढ़े मुंशी माधव लाल धीरे से उठे। उनके हाथ में पुरानी थैली थी।

—मैंने नकल बचा ली थी।

राजेश्वरी देवी ने उन्हें घूरा।

—तुम भी?

माधव लाल ने थैली से पीले कागज निकाले।

—मैंने 30 साल डरकर काटे। तुम्हारे पति ने दस्तखत किए थे। रामदीन का हिस्सा था। कमला झूठी नहीं थी। हम सब झूठे थे, जो चुप रहे।

गौरी ने आंखें बंद कर लीं। कमला बाई का चेहरा उसके भीतर चमका। वही चेहरा जो बरसात में भीगे चने बेचते हुए भी मुस्कुराता था। वही मां, जो हर बार लॉकेट छूकर कहती थी कि सूरज चाहे बादल में छिप जाए, किसी दिन निकलेगा जरूर। गौरी तब बच्ची थी, समझती नहीं थी। अब समझ रही थी कि उसकी मां सिर्फ जीवन नहीं, सम्मान की राख लेकर जी रही थी।

सरपंच ने कागज हाथ में लिया। पास बैठे वकील महेंद्र सक्सेना ने दस्तावेज देखे। मोहर असली थी। दस्तखत मेल खाते थे। तारीख 1989 की थी। सामने बैठे पटवारी ने भी सिर झुका लिया।

—कागज वैध हैं, —वकील ने कहा।

राजेश्वरी देवी हंसीं, मगर आवाज में वह पुराना बल नहीं था।

—30 साल पुराने कागजों से तुम घर तोड़ोगे, अरविंद?

—घर झूठ से पहले ही टूटा हुआ था। मैं सिर्फ दीवार हटाकर सबको दरार दिखा रहा हूं।

—मैंने यह सब तुम्हारे लिए किया था।

—मेरे लिए? या अपने अहंकार के लिए?

राजेश्वरी देवी का चेहरा तप गया।

—तुम नहीं जानते कमला कैसी औरत थी। वह नीचे घर की थी, मगर बड़े लोगों की बराबरी चाहती थी।

गौरी धीरे से उठी। अरविंद ने उसे बैठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर उसने सिर हिलाकर मना कर दिया। वह भारी कदमों से आगे आई। पूरा पंचायत भवन उसे देख रहा था।

—मेरी मां ने बराबरी नहीं मांगी थी। अपना हिस्सा मांगा था।

राजेश्वरी देवी ने तिरस्कार से कहा।

—तुम्हारी मां ने हमारे दरवाजे पर आकर रो-रोकर भीख मांगी थी।

गौरी की आवाज टूटने को हुई, मगर वह टूटी नहीं।

—तो आपने उसे भीख भी नहीं दी। उसका नाम छीन लिया। उसका घर छीन लिया। और अब आप मेरे बच्चे का नाम छीनना चाहती थीं।

यह वाक्य हवा में देर तक लटका रहा।

तभी अरविंद ने आखिरी कागज खोला। वह डॉक्टर सुरेश माथुर की लिखी प्रतिक्रिया थी, जो पुराने नौकर मंगलू ने रात में चुपचाप अरविंद को दी थी। डॉक्टर ने राजेश्वरी देवी को लिखा था कि वह ऐसे अनैतिक निर्देश नहीं मान सकता। लेकिन उसी पत्र के नीचे राजेश्वरी देवी के कारिंदे भीमसेन का संदेश था: अगर डॉक्टर ने मुंह खोला तो उसका क्लिनिक बंद करा दिया जाएगा।

भीमसेन भीड़ में खड़ा था। उसके माथे पर पसीना आ गया।

सरपंच ने सख्त आवाज में कहा।

—भीमसेन, यह तुम्हारी लिखावट है?

भीमसेन पहले चुप रहा। फिर जमीन देखने लगा।

—मालकिन ने कहा था डराना है। करना कुछ नहीं था।

अरविंद गरज उठा।

—गर्भवती औरत को मारने की योजना को तुम डराना कहते हो?

गौरी ने पेट पर हाथ रखा। भीतर बच्चा जैसे हल्का सा हिला। उसकी आंखें भर आईं। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसका बच्चा जन्म लेने से पहले ही अपनी नानी की लड़ाई, अपनी मां का अपमान और अपने पिता की देर से जागी हुई शर्म ढो रहा है।

राजेश्वरी देवी की पकड़ छड़ी पर ढीली होने लगी। वह कुर्सी पर बैठ गईं। मगर माफी उनके चेहरे पर नहीं थी। बस हार थी।

सरपंच ने पंचायत की तरफ देखा।

—राघवगढ़ की उत्तर वाली जमीन का मामला तहसील में दर्ज होगा। जब तक फैसला न आए, उस हिस्से की आय गौरी बहू के नाम सुरक्षित रखी जाएगी। और डॉक्टर को धमकाने की शिकायत थाने में जाएगी।

भीड़ में एक बुजुर्ग औरत खड़ी हुई।

—कमला बाई उस रात मेरे घर आई थी। बारिश हो रही थी। बच्ची को सीने से लगाए थी। उसने बस इतना कहा था कि मेरी बेटी कभी इस गांव में सिर झुकाकर न लौटे। आज उसकी बेटी सिर उठाकर खड़ी है।

गौरी रो पड़ी। यह पहला आंसू था जो उसने खुले में बहाया। अरविंद उसके पास आया, मगर इस बार उसे सहारा देने नहीं, उसके साथ खड़े होने।

—गौरी, मुझसे गलती हुई। मैंने घर को घर समझा, जेल नहीं। मैंने मां की चुप्पी को अधिकार समझा, अत्याचार नहीं।

गौरी ने उसे देखा। उसके चेहरे पर प्रेम था, पर तुरंत क्षमा नहीं थी।

—गलती तुम्हारी भी थी, अरविंद। जो औरत अकेली अपमान झेलती है, उसका पति सिर्फ बाहर से कमाने वाला नहीं, भीतर से देखने वाला भी होना चाहिए।

अरविंद ने सिर झुका लिया।

—अब देखूंगा नहीं। साथ खड़ा रहूंगा।

राजेश्वरी देवी ने धीरे से कहा।

—और मैं? मुझे इस उम्र में गांव के सामने नीचा दिखाकर तुम्हें चैन मिलेगा?

अरविंद ने उनकी तरफ देखा। उसकी आंखों में पुत्र का दुख भी था और पति का निर्णय भी।

—आपको हवेली से नहीं निकाला जाएगा। लेकिन अब आप हवेली चलाएंगी नहीं। गौरी उस घर की बहू नहीं, मालकिन है। और जो बच्चा जन्म लेगा, उसके नाम में मां का नाम पहले लिखा जाएगा।

राजेश्वरी देवी हिल गईं।

—तुम वंश मिटा दोगे।

—नहीं। पहली बार उसे सच में जन्म दूंगा।

उस दिन पंचायत भवन से लौटते समय भीड़ रास्ता छोड़ती गई। किसी ने ताली नहीं बजाई। कोई जश्न नहीं था। यह वह जीत थी जिसमें बहुत सालों की चुप्पी का शोक मिला हुआ था। हवेली पहुंचते ही अरविंद ने बैठक की दीवार पर लगी अपनी पुरखों की तस्वीरों के बीच गौरी और उसकी मां कमला की छोटी सी तस्वीर लगवाई। कमला की तस्वीर मुश्किल से मिली थी; शांता दाई ने पुराने संदूक से निकाली थी। उसमें कमला जवान थी, माथे पर पसीना था, मगर आंखों में अजीब चमक थी।

राजेश्वरी देवी ने वह तस्वीर देखी तो कुछ नहीं बोलीं। बस अपने कमरे में चली गईं। अगले 2 महीने उन्होंने किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की। हवेली में पहली बार रसोई की थाली सबके लिए समान होने लगी। गौरी का कमरा घर के पिछवाड़े से हटाकर फिर मुख्य हिस्से में कर दिया गया। शादी की तस्वीर वापस बैठक में आई। शांता दाई को अब फुसफुसाना नहीं पड़ता था।

मगर सच उजागर होने के बाद भी डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। गौरी की प्रसव तिथि नजदीक आई तो अरविंद ने झांसी से स्त्री रोग विशेषज्ञ बुलवाई, दतिया से अनुभवी दाई और भोपाल से एंबुलेंस। उसने डॉक्टर के सामने साफ कहा।

—यहां पहले गौरी बचेगी, फिर बच्चा। दोनों को बचाना आपका काम है, चुनाव मेरा नहीं।

गौरी ने दरवाजे से यह सुना। उसकी आंखों में पहली बार नर्म रोशनी लौटी।

प्रसव की रात राघवगढ़ पर फिर बारिश थी। वही बारिश, जैसी कभी कमला बाई की बेइज्जती वाली रात हुई होगी। हवेली के गलियारों में दीपक जल रहे थे। शांता दाई मंत्र बुदबुदा रही थी। अरविंद दरवाजे के बाहर नंगे पैर खड़ा था। हर चीख उसके सीने को काट रही थी।

राजेश्वरी देवी अपने कमरे में थीं। उन्होंने बाहर आने की कोशिश नहीं की। पर जब बच्चे की पहली रोने की आवाज गूंजी, उनके हाथ से माला गिर गई।

सुबह की पहली धूप खिड़की से अंदर आई। गौरी थकी हुई थी, मगर जीवित थी। उसके सीने पर बच्चा रखा था, गुलाबी, मजबूत, मुट्ठियां बंद किए हुए। अरविंद बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया।

—नाम तुम रखोगी, —उसने कहा।

गौरी ने बच्चे के माथे को चूमा।

—कमलवीर।

अरविंद ने दोहराया।

—कमलवीर गौरी प्रताप सिंह।

गौरी ने उसकी तरफ देखा। इस नाम में मां थी, बेटी थी, पिता था, और वह सम्मान था जो 30 साल देर से आया था।

दरवाजे पर राजेश्वरी देवी खड़ी थीं। उनके चेहरे पर कठोरता बची थी, मगर आंखों में पहली बार उम्र दिखाई दे रही थी। उन्होंने बच्चे को देखा, फिर गौरी को। होंठ हिले, पर आवाज नहीं निकली। शायद माफी बहुत देर से याद आई थी। शायद अहंकार अभी भी गले में अटका था।

गौरी ने बच्चे को थोड़ा सा ढक दिया। उसने अपमान की याद नहीं भुलाई थी, पर वह अपने बच्चे की पहली सुबह को नफरत से भरना भी नहीं चाहती थी।

—देखना चाहती हैं तो दूर से देख लीजिए, —गौरी ने शांत स्वर में कहा। —गोद में लेने का अधिकार विश्वास से मिलता है, खून से नहीं।

राजेश्वरी देवी वहीं रुक गईं। यह वाक्य किसी थप्पड़ से ज्यादा गहरा था। उन्होंने सिर झुका लिया और लौट गईं।

3 दिन बाद हवेली के आंगन में छोटा सा पूजन हुआ। गांव की वही औरतें आईं, जिन्होंने कभी कमला बाई की कहानी दबे स्वर में सुनी थी। मुंशी माधव लाल आए। शांता दाई ने बच्चे के माथे पर काजल लगाया। उत्तर वाले खेतों से पहली फसल की मिट्टी लाकर गौरी के चरणों के पास रखी गई।

अरविंद ने सबके सामने कहा।

—यह मिट्टी अब किसी की चोरी नहीं, किसी की वापसी है।

गौरी ने अपने गले से सूरज वाला लॉकेट उतारा। कुछ पल उसे हथेली पर रखा, फिर बच्चे के झूले के पास टांग दिया। दरार वाला सूरज सुबह की रोशनी में चमक रहा था। वह टूटा हुआ था, मगर बुझा नहीं था।

बाहर आम के पेड़ पर 2 मैना बैठी थीं। बारिश थम चुकी थी। राघवगढ़ हवेली की दीवारें वही थीं, दरवाजे वही थे, लोग भी लगभग वही थे। फर्क बस इतना था कि अब उस घर में पहली बार एक गरीब औरत का नाम छिपाया नहीं गया था।

कमला बाई इस दुनिया में नहीं थीं, पर उस दिन उनके हिस्से की धूप उनकी बेटी के कमरे में उतर आई थी।

और कभी-कभी न्याय अदालत के फैसले से नहीं, एक बच्चे के नाम से शुरू होता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.