
भाग 1
बर्फ टूटी नहीं, चीखी—और उसी चीख के नीचे कालीगंगा की जमी हुई धार में 11 दैत्याकार हिम-भेड़िये मौत से पंजे मार रहे थे।
1342 की वह रात गढ़वाल की नंदा घाटी पर ऐसे उतरी थी जैसे आसमान ने सफेद कफ़न ओढ़ा दिया हो। देवदारों की डालियाँ बर्फ से झुक चुकी थीं, पहाड़ों की दरारों से आती हवा चाकू की तरह चेहरे को काटती थी, और भैरवकुंड गाँव से 2 कोस दूर पत्थर की एक अकेली कुटिया में माहिका रावत अपने टूटे हुए कुल की आखिरी साँस बनकर जी रही थी।
माहिका 24 साल की थी। उसके पिता वीरेंद्र रावत कभी राजदरबार के सबसे बड़े शिकारी और वन-मार्गों के रक्षक थे, पर एक रात उन पर राजद्रोह का इल्जाम लगा, उनका नाम मिट्टी में मिला दिया गया और उन्हें जंगलों में मरने के लिए छोड़ दिया गया। गाँव वाले कहते थे—रावतों ने पहाड़ बेच दिए थे। माहिका जानती थी, यह झूठ था, लेकिन झूठ बोलने वालों के पास मुहरें थीं, और सच बोलने वालों के पास सिर्फ कब्रें।
उस शाम वह कुटिया की खिड़कियाँ बाँध रही थी, तभी नदी की तरफ से ऐसी कराह आई कि उसके हाथ से रस्सी छूट गई। वह आवाज़ किसी साधारण भेड़िये की नहीं थी। उसमें दर्द था, आदेश था, और ऐसा डर था जो शिकारी को भी अंदर तक हिला दे।
माहिका ने पिता की मोटी सन की रस्सियाँ, लोहे के काँटे, पुराना धनुष-यंत्र और औषधियों की थैली उठाई। बाहर बर्फ उसकी पिंडलियों तक धँस रही थी, फिर भी वह दौड़ी। कालीगंगा की खाई पर पहुँचकर उसने देखा—बर्फ की परत बीच से धँस गई थी और नीचे काले, उफनते पानी में विशाल भेड़ियों का झुंड फँसा था।
वे साधारण पशु नहीं थे। हर भेड़िया घोड़े जितना बड़ा था, फर रात जैसा काला, कुछ के माथे पर चाँदी जैसी धारियाँ, आँखों में मनुष्य जैसी बेचैनी। तेज धारा उन्हें बर्फ के नीचे खींच रही थी।
—रुको! —माहिका चीखी, जैसे वे उसकी भाषा समझते हों।
उसने रस्सी देवदार के तने से बाँधी और पहला फंदा धूसर भेड़िये के सीने में डाला। उसके हाथ छिल गए, कंधे जलने लगे, पर उसने खींचा। पहला भेड़िया बाहर आया। उसने हमला नहीं किया, बस काँपते हुए उसे देखता रहा।
फिर दूसरा, तीसरा, चौथा… 11 तक। हर बार माहिका की साँस टूटती, घुटने बर्फ में धँसते, हथेलियों से खून रिसता, लेकिन वह रुकी नहीं। 11वाँ भेड़िया, चेहरे पर पुराने घावों वाला, बाहर आते ही बाकी झुंड के साथ खड़ा हो गया। वे भागे नहीं। वे माहिका के चारों ओर अर्धचंद्र बनाकर खड़े रहे।
माहिका ने समझा सब खत्म हो गया।
तभी नदी के बीच से बर्फ फिर फटी।
एक 12वाँ प्राणी पानी से उठा—बाकियों से दोगुना बड़ा, आधा काला, आधा हिम जैसा सफेद। उसके कंधे में काला रजत-बाण धँसा था और घाव से धुआँ उठ रहा था। उसकी नीली आँखें माहिका से मिलीं।
वे किसी पशु की आँखें नहीं थीं।
वे एक मरते हुए राजा की आँखें थीं।
भाग 2
माहिका को पता था कि अब वह बची तो भी पहले जैसी नहीं रहेगी। उसने अपनी कमर की रस्सी खोली और टूटती बर्फ पर पेट के बल रेंगती हुई उस 12वें प्राणी तक पहुँची। पीछे 11 भेड़िये बेचैनी से कराह रहे थे। उसने दोनों हाथ बर्फीले पानी में डाल दिए। दर्द ऐसा उठा जैसे हड्डियों में आग भर गई हो। उसने उस विशाल भेड़िये की गर्दन के घने फर को पकड़ा और पूरी ताकत से चीखी—खींचो!
तभी घायल चेहरे वाला 11वाँ भेड़िया आगे आया। उसने माहिका की रस्सी दाँतों में पकड़ी। फिर बाकी 10 ने भी रस्सी दबा ली। पूरे झुंड ने एक साथ पीछे झटका मारा। बर्फ टूटी, पानी उछला, माहिका आधी नदी में गिर गई, पर विशाल सफेद-काला भेड़िया किनारे पर आ गिरा।
माहिका की देह सुन्न हो रही थी। तभी चाँदी जैसी मादा भेड़िया ने उसके ऊनी ओढ़ने को दाँतों से पकड़ा और उसे बर्फ से बाहर घसीट लिया। फिर सभी भेड़िये उसके चारों ओर दीवार बनाकर खड़े हो गए। उनके शरीर से ऐसी गर्मी निकल रही थी जैसे कुटिया का चूल्हा जल रहा हो।
किसी तरह माहिका लकड़ी की घसीट-गाड़ी लाई। 11 भेड़ियों की मदद से उसने घायल राजा को कुटिया तक पहुँचाया। अंदर आग जलाई, पिता के औज़ार निकाले और रजत-बाण को लोहे की पकड़ से खींचा। प्राणी गरजा, दीवारें काँपीं, पर माहिका ने बाण निकालकर अंगीठी में फेंक दिया। फिर उसने जड़ी-बूटी का लेप बाँधा और उसके पास ही बेहोश हो गई।
सुबह जब उसकी आँख खुली, फर की जगह कमरे में 11 लंबे, बलवान पुरुष खड़े थे।
और उसकी खाट पर वही नीली आँखों वाला घायल पुरुष बैठा था।
वह बोला—तुमने हिमवंश के राजा रुद्रवीर को मौत से खींचा है, माहिका रावत। अब बताओ, एक निर्वासित शिकारी की बेटी मेरे राज्य और अपने कुल के खून का हिसाब कैसे चुकाएगी?
भाग 3
माहिका की पीठ पत्थर की दीवार से जा लगी। उसकी कुटिया, जो कल तक अकेलेपन, राख और सूखी जड़ों की गंध से भरी रहती थी, अब 12 अजनबियों की साँसों से भारी थी। 11 पुरुष अर्धचंद्र की तरह खड़े थे। कुछ के कंधों पर अभी भी पुराने घावों के निशान थे, कुछ ने उसके संदूक से निकले कंबल अपने शरीर पर बाँध रखे थे, और एक चाँदी जैसी आँखों वाली स्त्री दरवाजे के पास खड़ी थी—माहिका ने उसे पहचान लिया। वही मादा भेड़िया जिसने उसे नदी से खींचा था।
खाट पर बैठा घायल पुरुष बाकियों से अलग था। उसकी देह विशाल, चेहरा कठोर, बाल काले जिनमें कनपटियों पर बर्फ जैसी सफेद लटें थीं। कंधे पर माहिका की बाँधी पट्टी थी। उसकी नीली आँखें सीधी माहिका पर थीं, जैसे वह उसके डर के आर-पार देख सकता हो।
—हिमवंश? —माहिका की आवाज़ फटी—तुम लोग कौन हो?
घायल पुरुष ने धीरे से उठने की कोशिश की, पर घाव खिंचते ही उसका जबड़ा कस गया। चाँदी आँखों वाली स्त्री आगे बढ़ी।
—राजन, अभी मत उठिए।
रुद्रवीर ने हाथ से उसे रोका।
—वह सत्य सुनने की अधिकारी है, लायरा। उसने हमारे प्राण बचाए हैं।
माहिका का दिल धड़क उठा। लायरा। तो हर भेड़िये का नाम था। हर प्राणी कोई था। कोई परिवार, कोई सैनिक, कोई साथी।
घायल चेहरे वाला भारी पुरुष आगे आया। उसकी छाती पर वही तिरछे निशान थे जो नदी किनारे भेड़िये के चेहरे पर दिखे थे।
—मैं गजराज हूँ, हिमवंश का अग्ररक्षक। हमने तुम्हारे पिता का नाम सुना है, माहिका रावत। वीरेंद्र रावत गद्दार नहीं थे।
कमरे की हवा अचानक रुक गई।
माहिका ने जैसे गलत सुना हो।
—मेरे पिता का नाम अपनी जुबान पर सोचकर लेना।
गजराज ने सिर झुका दिया।
—इसीलिए तो कह रहा हूँ। वह हमारे और मनुष्यों के बीच हुए पुराने समझौते के रक्षक थे। उन्होंने 18 साल पहले दरबार को चेताया था कि नंदा घाटी के नीचे की चाँदी की खानों के लिए राजा के लोग जंगल काटेंगे, और अगर हिमवंश को हटाया गया तो पहाड़ों में युद्ध लगेगा। उन्हें चुप कराने के लिए उन्हीं के साले महिपाल भंडारी ने उन पर राजद्रोह का झूठा इल्जाम लगवाया।
माहिका के मुँह से साँस निकल गई।
महिपाल भंडारी।
उसकी माँ का छोटा भाई। वही जिसने पिता की गिरफ्तारी के बाद कुटिया आकर कहा था—“अब से रावत नाम मत लेना, वरना तुझे भी चिता पर चढ़वा दूँगा।” वही जिसने गाँव वालों के सामने उसकी माँ को अपमानित किया था। वही अब दरबार में सेनापति था।
रुद्रवीर ने खाट से एक टूटा हुआ धातु-चिह्न उठाया। वह काले रजत-बाण के साथ उसके घाव से निकला था। उस पर भंडारी कुल की मुहर थी—त्रिशूल के नीचे मुड़ा हुआ नाग।
—हमें पहाड़ ने नहीं हराया, माहिका। हमें धोखे ने खाई में धकेला। महिपाल ने 30 रजत-शिकारी भेजे। वे जानते थे कि नदी की बर्फ अंदर से खोखली है। उन्होंने हमें उत्तर दर्रे से दौड़ाया, रजत-बाणों से घेरा, और कालीगंगा की ओर मोड़ दिया। उन्हें लगा हम सब बर्फ के नीचे डूब जाएँगे।
माहिका का गला सूख गया।
—और अगर वे देखने आए कि तुम मरे या नहीं?
रुद्रवीर की आँखें चमकीं।
गजराज ने खिड़की से बाहर झाँका। बर्फ पर घसीट-गाड़ी के गहरे निशान साफ दिख रहे थे। वे निशान सीधे नदी से कुटिया तक आते थे।
—वे आएँगे, —गजराज बोला।
माहिका ने काँपते हाथ अपनी छाती पर बाँध लिए। कल रात तक वह सिर्फ एक अकेली स्त्री थी, जिसे गाँव वाले मनहूस कहते थे। अब उसके घर में पहाड़ों का छिपा हुआ राजा था, और उसका अपना मामा उसे मरवाने आ रहा था।
लायरा ने धीरे से कहा—
—हम तुम्हें यहाँ से निकाल देंगे। तुम मनुष्य हो। इस युद्ध में तुम्हें नहीं मरना चाहिए।
माहिका की आँखें अचानक तेज हो गईं।
—मनुष्य हूँ, इसलिए भागूँ? मेरे पिता को गद्दार कहा गया। मेरी माँ ने उसी कलंक में दम तोड़ा। गाँव के बच्चे तक मुझे राक्षसों की बेटी कहकर पत्थर मारते थे। अगर महिपाल सचमुच इस सबके पीछे है, तो यह सिर्फ तुम्हारा युद्ध नहीं है।
रुद्रवीर पहली बार उसे अलग नज़र से देखने लगा। उसमें डर था, पर डर से बड़ा क्रोध था। और क्रोध से बड़ा न्याय।
—तुम्हारे पिता ने तुम्हें क्या सिखाया था? —रुद्रवीर ने पूछा।
माहिका ने कुटिया के फर्श के कोने में पड़ी लोहे की अंगूठी पकड़कर खींची। भारी पटरे के नीचे अँधेरा तहखाना खुल गया। अंदर पंक्तियों में धनुष-यंत्र, लोहे के भाले, फंदे, बर्फीली ढलानों पर लगने वाले लकड़ी के जाल, औषधियों की बोतलें और पुराने राजसी दस्तावेज़ रखे थे।
—उन्होंने सिखाया था कि जंगल खाली हाथ वालों को नहीं बचाता।
गजराज के चेहरे पर पहली बार सम्मान झलका। 11 योद्धा तहखाने में उतरने लगे। किसी ने भाला उठाया, किसी ने तलवार, किसी ने चौड़े लोहे की कुल्हाड़ी। लायरा ने 2 छोटे वक्र-चाकू चुने और उन्हें ऐसे पकड़ा जैसे वे उसके हाथों का हिस्सा हों।
रुद्रवीर उठने लगा।
माहिका तुरंत उसके सामने आ गई।
—तुम नहीं लड़ोगे।
कमरे में सन्नाटा छा गया। 11 योद्धाओं ने उसे देखा, जैसे किसी ने बिजली को आदेश दे दिया हो।
रुद्रवीर की भौंह उठी।
—मुझे आदेश दे रही हो?
—हाँ, अगर राजा बेवकूफी करे तो।
गजराज के होंठ दबे, जैसे हँसी रोक रहा हो। लायरा ने गर्दन झुका ली, पर उसकी आँखें मुस्करा रही थीं।
माहिका ने पट्टी पर हाथ रखा।
—रजत का जहर अभी भी तुम्हारे खून में है। अगर तुमने रूप बदला तो तुम्हारा दिल रुक सकता है। और अगर तुम इंसानी देह में लड़े, तो घाव खुल जाएगा। तुम्हें बचाकर मैंने अपना शरीर तोड़ा है। उसे व्यर्थ मत करो।
रुद्रवीर ने उसे लंबे समय तक देखा। फिर धीरे से बोला—
—तुम्हारे पिता की आग तुम्हारे अंदर जिंदा है।
माहिका ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह बाहर निकली और बर्फ में छिपे जालों को तैयार करने लगी। पिता ने कभी कहा था—“ताकतवर दुश्मन को सामने से मत रोकना, उसे अपनी ही चाल में फँसाना।” उसने देवदार के भारी लट्ठे ढलान पर टिकाए, बर्फ के नीचे रस्सियाँ छिपाईं, छत से गरम राख की थैलियाँ बाँधीं, और पिछली खिड़की के पास धनुष-यंत्र जमा दिए।
दोपहर तक आकाश साफ हो गया, पर हवा में खून की गंध आ चुकी थी।
पहली आवाज़ घोड़ों की टापों की थी। फिर लोहे की झंकार। फिर महिपाल भंडारी की आवाज़, जिसने माहिका के बचपन को राख बना दिया था।
—माहिका! दरवाजा खोल। मुझे पता है तूने दरिंदों को छिपाया है।
माहिका ने खिड़की की दरार से देखा। बर्फ पर 30 से अधिक हथियारबंद शिकारी खड़े थे। उनके पीछे महिपाल घोड़े पर बैठा था, रेशमी ऊनी चोगा, माथे पर राजसी पगड़ी, आँखों में वही घमंड। उसके पास लोहे के लंबे तीर-यंत्र थे, जिनमें काले रजत-बाण चढ़े थे।
—बाहर आ जा, —महिपाल चिल्लाया—तुझे दरबार में दया मिल सकती है। वैसे भी तेरे बाप की तरह तू भी जंगल के जानवरों से मिली हुई निकली।
माहिका का हाथ काँपा, पर उसने दरवाजा नहीं खोला।
महिपाल हँसा।
—तेरी माँ रोती रही थी कि बेटी को छोड़ दो। मैंने छोड़ा था। गलती की थी।
रुद्रवीर ने भीतर से धीमी गुर्राहट की। उसकी आँखें नीली नहीं, अब तूफान जैसी हो चुकी थीं।
—वह तुम्हारा रक्त है? —उसने पूछा।
—रक्त नहीं, कलंक, —माहिका ने कहा।
महिपाल ने हाथ उठाया।
पहला रजत-बाण कुटिया की छत के खंभे को चीरता हुआ अंदर आया। लकड़ी फट गई। बाहर शिकारी आगे बढ़े।
माहिका ने फर्श के नीचे छिपी पहली रस्सी खींची।
बर्फ अचानक धँसी। आगे बढ़ते 6 शिकारी कमर तक गड्ढों में गिर गए। अगले ही पल देवदार के लट्ठे ढलान से टूटे और उनके तीर-यंत्र चकनाचूर कर गए। चिल्लाहट उठी। गजराज ने दरवाजा खोला और 11 योद्धा बाहर टूट पड़े।
वे भेड़िये नहीं बने, फिर भी उनका युद्ध मनुष्यों जैसा नहीं था। गजराज ने लोहे की ढाल से 2 शिकारी पीछे फेंके। लायरा बर्फ पर फिसलती छाया की तरह चली और शिकारियों की कलाई से हथियार गिरवाती गई। बाकी योद्धाओं ने कुटिया के चारों ओर दीवार बना ली। वे मारने से अधिक रोक रहे थे, पर जो रजत-बाण उठाता, उसका हथियार हाथ से छूट जाता।
माहिका ने खिड़की से धनुष-यंत्र ताना। उसने एक शिकारी को देखा जो गजराज की पीठ पर बाण साध रहा था। उसने साँस रोकी और तीर छोड़ा। तीर उसके कंधे के कवच में धँसा, वह गिर पड़ा।
महिपाल की नजर खिड़की पर पड़ी।
—अरे वाह, रावत की बेटी! तू सच में अपने बाप जैसी निकली। मगर तेरे बाप की एक कमजोरी थी—उसे लगता था कि सच कागजों में बच जाता है।
माहिका जम गई।
महिपाल ने अपने आदमी से एक पुराना चमड़े का थैला लिया। उसमें से जली हुई मुहरों वाले कागज निकाले।
—ये रहा वह समझौता, जिसके लिए वीरेंद्र मरा। मैंने आधे कागज जला दिए थे। बाकी आज जला दूँगा। फिर कोई साबित नहीं करेगा कि रावत गद्दार नहीं थे।
उसने मशाल कागजों के पास लाई।
माहिका दरवाजा खोलकर बाहर निकल आई।
—नहीं!
रुद्रवीर गरजा—
—माहिका, पीछे हटो!
पर वह पहले ही बर्फ पर थी। महिपाल मुस्कराया। यही वह चाहता था। उसने हाथ से संकेत किया और 2 शिकारी पीछे से माहिका पर झपटे। लायरा बीच में आई, पर तीसरा शिकारी कुटिया की दीवार के पीछे से निकला। उसने माहिका की कलाई पकड़ ली और उसके गले पर छोटा रजत-छुरा रख दिया।
—अब राजा बाहर आएगा, —महिपाल बोला—या लड़की यहीं मर जाएगी।
सारी लड़ाई थम गई।
रुद्रवीर दरवाजे पर खड़ा था। उसका चेहरा पत्थर जैसा था, पर आँखों में ऐसा भय था जो राजा किसी राज्य के लिए नहीं, किसी अपने के लिए महसूस करता है।
—उसे छोड़ दे, —रुद्रवीर ने कहा।
महिपाल हँसा।
—तो सच है। हिमवंश का राजा एक रावत लड़की पर नरम पड़ गया। पहाड़ों की राजनीति भी अजीब है। पहले उसके बाप ने तुम्हें बचाया, अब बेटी बचा रही है। अच्छा हुआ। आज 2 कुल एक साथ खत्म होंगे।
माहिका ने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा—
—तूने मेरे पिता को नहीं समझा, मामा।
महिपाल का चेहरा कस गया।
—मामा मत कह।
—क्यों? क्योंकि खून याद आ जाएगा?
महिपाल ने गुस्से में मशाल उठाई। उसी पल माहिका ने अपने पैर से बर्फ के नीचे छिपी छोटी गाँठ दबाई। कुटिया की छत से बँधी राख की थैली फटी और गरम राख शिकारियों की आँखों पर बिखर गई। जिसने माहिका को पकड़ा था, वह चीखा। माहिका नीचे झुकी, उसकी पकड़ से निकली और कोहनी से उसकी पसली पर वार किया। लायरा बिजली की तरह पहुँची और उसे दूर फेंक दिया।
महिपाल घोड़ा मोड़कर भागना चाहता था, पर गजराज ने रस्सी फेंकी। घोड़े के आगे की बर्फ खिसकी और महिपाल जमीन पर गिर पड़ा। कागज उसके हाथ से छूटकर बर्फ पर बिखर गए।
माहिका दौड़ी। उसने आधे जले कागज उठाए। हाथ काँप रहे थे। कागजों पर पिता की लिखावट थी। वीरेंद्र रावत की मुहर थी। उसमें साफ लिखा था कि नंदा घाटी, कालीगंगा का वन, और हिमवंश की गुफाएँ राजदरबार की संपत्ति नहीं, बल्कि संरक्षित सीमा हैं। किसी भी खान, लकड़ी या सैन्य मार्ग के लिए वहाँ हमला राजद्रोह माना जाएगा।
नीचे 3 गवाहों की मुहरें थीं—वीरेंद्र रावत, पिछले राजा, और हिमवंश के तत्कालीन संरक्षक।
रुद्रवीर धीमे कदमों से पास आया। उसके चेहरे पर दुख की छाया थी।
—तुम्हारे पिता ने मुझे बचपन में बचाया था, —वह बोला—जब मैं 8 साल का था, मनुष्यों के एक दल ने मुझे पकड़ लिया था। वीरेंद्र रावत ने मुझे छोड़ा और कहा, “जिस दिन मेरी बेटी अकेली पड़े, जंगल उसे पहचान ले।” मैं तब बच्चा था। उनका चेहरा याद था, नाम याद था, पर उनकी बेटी तक पहुँचने में देर हो गई।
माहिका की आँखों से आँसू गिर पड़े। इतने सालों में पहली बार किसी ने उसके पिता को गद्दार नहीं, रक्षक कहा था।
महिपाल बर्फ पर घिसटता हुआ पीछे हट रहा था।
—झूठ! सब झूठ! दरबार मेरी बात मानेगा। एक जंगली लड़की और भेड़िया-राजा की नहीं!
तभी पीछे से भैरवकुंड गाँव के लोग दिखाई दिए। शोर सुनकर वे पहाड़ी पर चढ़ आए थे। उनमें गाँव का बूढ़ा पुजारी, लोहार, चरवाहे और वही औरतें थीं जिन्होंने माहिका को बरसों मनहूस कहा था। उन्होंने कागज देखे, महिपाल की मुहर देखी, रजत-बाण देखे, और महिपाल के सैनिकों को बर्फ में पड़े देखा।
बूढ़े पुजारी ने काँपते हाथ से कागज उठाया।
—यह वीरेंद्र की लिखावट है। मैं पहचानता हूँ। उस रात उसने मंदिर में कहा था कि सच एक दिन लौटेगा।
महिपाल चिल्लाया—
—चुप रहो बूढ़े! तुम सब मेरे अधीन हो!
गाँव का लोहार आगे आया।
—अब नहीं।
गाँव वालों ने शिकारियों के हथियार जमा कर लिए। महिपाल को बाँधा गया। वह माहिका को घूरता रहा, पर उसकी आँखों में पहली बार डर था।
रुद्रवीर माहिका के सामने घुटने पर बैठ गया। 11 योद्धा भी उसके पीछे झुक गए। बर्फ पर वह दृश्य ऐसा था जैसे पहाड़ खुद एक लड़की को प्रणाम कर रहे हों।
—माहिका रावत, —रुद्रवीर ने कहा—तुमने मेरे झुंड को बचाया, मेरे जीवन को बचाया, और अपने पिता का सत्य वापस लिया। हिमवंश तुम्हारा ऋणी है। मैं तुम्हें अपने शीत-दरबार में स्थान देता हूँ, रक्षक के रूप में, सम्मानित अतिथि के रूप में… या यदि तुम्हारा मन चाहे, मेरे बराबर के रूप में।
गाँव में साँसें थम गईं।
माहिका ने उसे देखा। यह प्रस्ताव किसी परीकथा की तरह नहीं था। उसमें युद्ध था, खतरा था, राजनीति थी, और ऐसा संबंध था जो मनुष्य और हिमवंश दोनों को बदल सकता था। लेकिन उसके भीतर पहली बार अकेलापन कम हुआ। कल रात जिन 11 भेड़ियों ने उसे गर्मी दी थी, वे अब उसके सामने परिवार की तरह खड़े थे। वह राजा, जिसे उसने मौत से खींचा था, उसे संपत्ति नहीं, बराबरी दे रहा था।
—मैं रानी बनना नहीं जानती, —माहिका ने धीरे से कहा।
रुद्रवीर की आँखों में हल्की मुस्कान आई।
—तुमने 30 रजत-शिकारियों के सामने अकेले खड़े होना जान लिया। दरबार झुकना सीख लेगा।
लायरा आगे आई और माहिका के घायल हाथों पर औषधि बाँधने लगी। गजराज ने पिता के कागज तह करके उसे वापस दिए।
गाँव की एक बूढ़ी औरत, जिसने कभी माहिका को अपशकुनी कहा था, रोते हुए उसके पैरों की ओर झुकी।
—बेटी, हमने तेरे साथ अन्याय किया।
माहिका ने उसे उठाया।
—मेरे पिता कहते थे, देर से समझा सच भी सच ही होता है।
उस शाम कालीगंगा की बर्फ पर सूर्यास्त लाल नहीं, सुनहरा दिखा। महिपाल को दरबार ले जाया गया। शिकारियों को बंदी बनाया गया। वीरेंद्र रावत का नाम मंदिर की दीवार पर फिर से लिखा गया—वन-रक्षक, गद्दार नहीं।
रात को जब माहिका ने अपनी कुटिया की चौखट पर आखिरी बार हाथ फेरा, 11 हिम-योद्धा बाहर खड़े थे। रुद्रवीर ने उसके लिए घोड़ा नहीं, बल्कि वही लकड़ी की घसीट-गाड़ी रखी थी जिससे वह उसे मौत से खींच लाई थी। उस पर अब सफेद ऊनी आसन बिछा था।
—यह क्यों? —माहिका ने पूछा।
रुद्रवीर बोला—
—क्योंकि जिस रास्ते से तुमने मुझे जीवन दिया, उसी रास्ते से मैं तुम्हें सम्मान देकर ले जाना चाहता हूँ।
माहिका की आँखें भर आईं। उसने पिता के कागज अपनी छाती से लगाए, कुटिया की आग बुझाई और शीत-दरबार की ओर चल पड़ी।
पीछे भैरवकुंड के लोग खड़े थे। आगे बर्फीले देवदारों के बीच 11 छायाएँ चल रही थीं—कभी मनुष्य, कभी भेड़िये जैसी मौन, चौकन्नी, वफादार। बीच में घायल राजा था। और उसके पास वह लड़की, जिसे दुनिया ने अकेला समझा था।
पहाड़ों ने उस रात एक नया गीत सुना।
कहते हैं, जब भी कालीगंगा की बर्फ अचानक चरमराती है, लोग डरते नहीं। वे चुपचाप दीप जलाते हैं। क्योंकि उन्हें याद है—एक बार एक बदनाम शिकारी की बेटी ने 11 भेड़ियों को बचाया था, और 12वें में छिपे राजा ने उसके टूटे हुए नाम को अमर कर दिया था।
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