भाग 1:
81 साल की बीमार माँ ने 12 साल से सेवा कर रही नर्स को रोते हुए घर से निकाल दिया और उसी शाम एक काले चमड़े की जैकेट पहने, हाथों पर टैटू वाला भारी-भरकम बाइक सवार उसके कमरे में बैठकर उसे खिचड़ी खिलाने लगा।
—अगर यह आदमी इस घर में रहा, तो मैं आपकी बेटी नहीं रहूँगी।
रिया ने यह बात गुस्से में कही थी, लेकिन उसे क्या पता था कि कुछ ही घंटों बाद वही आदमी अस्पताल के कॉरिडोर में उसकी माँ को “माँ” कहकर पुकारेगा और उसकी अपनी टाँगों से जैसे जान निकल जाएगी।
रीया 42 साल की थी। वह दिल्ली के एक छोटे अकाउंट ऑफिस में काम करती थी, जहाँ दिन भर लोगों की फाइलें, टैक्स के कागज, बिजली के बिल और बकाया रकम के हिसाब उसके सामने पड़े रहते थे। लेकिन असली हिसाब तो उसके घर में था, जहाँ उसकी माँ सावित्री देवी पिछले 12 साल से बिस्तर पर थीं। पुरानी हवेली जैसी वह दोमंजिला मकान बाहर से ठीक दिखती थी, पर अंदर हर कमरे में दवा की गंध, कपूर की महक, पुरानी लकड़ी की नमी और अधूरी बातों की खामोशी बसी रहती थी।
रीया सुबह 6 बजे उठती, माँ की शुगर चेक करती, ब्लड प्रेशर मशीन लगाती, दवा की डिब्बी खोलती, गरम पानी करती, दलिया बनाती, फिर जल्दी-जल्दी ऑफिस के लिए निकलती। शाम को मेट्रो से लौटते हुए वह डायपर, दवाइयाँ, बिना चीनी वाले बिस्किट, नारियल पानी और कभी-कभी माँ की पसंद की इलायची वाली चायपत्ती ले आती। उसके पास खुद के लिए न रविवार बचा था, न दोस्त, न शादी का कोई सपना। मोहल्ले की औरतें अक्सर कहतीं कि बेटी होकर उसने बेटे से बढ़कर सेवा की है। रिया यह सुनकर बस हल्का सा मुस्कुरा देती, क्योंकि तारीफ से थकान कम नहीं होती थी।
माँ की देखभाल के लिए दिन में मीना आती थी। मीना नर्स नहीं थी, पर 12 साल में उसने नर्स से ज्यादा काम सीख लिया था। वह माँ को नहलाती, बाल सँवारती, दवा देती, चादर बदलती और रिया के लौटने तक घर संभालती। हर सुबह उसका वही सवाल होता।
—फिर रात भर नहीं सोई न?
रीया हमेशा वही जवाब देती।
—नींद हो गई थी।
मीना सिर हिलाकर चुप हो जाती, क्योंकि दोनों जानती थीं कि यह झूठ है।
एक दिन सुबह चाय चढ़ी हुई थी और गली से दूधवाले की घंटी की आवाज आ रही थी। मीना ने रसोई में आकर धीरे से कहा।
—दीदी, अम्मा कुछ छिपा रही हैं।
रीया ने थकी आँखों से उसकी तरफ देखा।
—इस उम्र में क्या छिपाएँगी माँ?
—कल मुझे कमरे से बाहर कर दिया। बोलीं, फोन पर बात करनी है। दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। जब मैं वापस गई तो रो रही थीं।
रीया ने हल्की हँसी से बात टालनी चाही।
—किसी पुराने भजन का वीडियो देख लिया होगा। माँ को वैसे भी मोबाइल चलाना नहीं आता।
मीना ने तुरंत सिर हिलाया।
—नहीं दीदी, बात कुछ और है। मैंने पूछा तो कहने लगीं, “कुछ पाप और कुछ प्यार औरत अपने साथ चिता तक ले जाती है, अगर हिम्मत न हो।”
रीया के हाथ में रखा कप रुक गया।
वह तुरंत माँ के कमरे में गई। सावित्री देवी सफेद चादर में छोटी सी लग रही थीं। माथे पर हल्की झुर्रियाँ, आँखों में उम्र की थकान, लेकिन उस दिन उन आँखों में कुछ अजीब था। डर भी, उम्मीद भी। जैसे किसी ने बहुत साल बाद बंद खिड़की खोली हो।
—माँ, आप किससे बात कर रही थीं?
सावित्री देवी ने धीमी मुस्कान दी।
—बूढ़ी औरतों के भी राज होते हैं।
—राज तब तक ठीक हैं जब तक मीना रोती हुई मेरे पास न आए।
—मीना हर बात पर रो देती है।
—मुझसे मत छिपाइए।
सावित्री देवी ने आँखें फेर लीं।
—हर बात बेटी को बताई जाए, ऐसा कोई नियम नहीं होता।
रीया को यह बात चुभी। 12 साल से वह माँ के शरीर का हर दर्द जानती थी। किस दवा से नींद आती है, किस मौसम में घुटने फूलते हैं, किस करवट में कमर कम दुखती है—सब। फिर भी माँ की आवाज में जैसे कोई दीवार खड़ी हो गई थी।
अगले कुछ हफ्तों में सावित्री देवी बदलने लगीं। वह शाम 5 बजे से पहले बाल सँवारने को कहतीं। कभी हल्का इत्र माँगतीं। गली में बाइक की आवाज आते ही उनकी गर्दन दरवाजे की तरफ मुड़ जाती। फोन अपने तकिए के नीचे रखने लगीं। एक दिन रिया ने मजाक में पूछा।
—बिस्तर पर पड़ी-पड़ी इत्र लगाकर किसे इंप्रेस करना है?
सावित्री देवी ने आँखें बंद कर लीं।
—खुद को। कभी-कभी इंसान को याद दिलाना पड़ता है कि वह अभी जिंदा है।
रीया चुप हो गई। उसे लगा शायद माँ मौत से डर रही हैं, शायद अकेलेपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया है। वह खुद को डाँटती कि इतने सालों की बीमारी ने माँ को सिर्फ मरीज बना दिया था, और वह भूल गई थी कि माँ कभी जवान भी रही होंगी।
लेकिन 2 महीने बाद दोपहर में, जब रिया ऑफिस में एक व्यापारी की बैलेंस शीट देख रही थी, उसका फोन काँपा। स्क्रीन पर मीना का नाम था। रिया ने कॉल उठाई तो दूसरी तरफ सिर्फ सिसकियाँ थीं।
—दीदी, अभी घर आ जाइए।
—क्या हुआ? माँ गिर गईं?
—अम्मा ने मुझे निकाल दिया।
रीया कुर्सी से उठ खड़ी हुई।
—क्या मतलब निकाल दिया?
—कहती हैं अब मेरी जरूरत नहीं। किसी और को बुला लिया है। एक आदमी है घर में। बहुत बड़ा, दाढ़ी वाला, हाथों पर टैटू, काली जैकेट, बाहर बुलेट खड़ी है। दीदी, अम्मा ने उसे ऐसे अंदर बुलाया जैसे बरसों से इंतजार कर रही थीं।
रीया के भीतर ठंडी आग दौड़ गई।
वह बिना अनुमति ऑफिस से निकली। ऑटो पकड़ा। रास्ते में ट्रैफिक था, हॉर्न था, धूल थी, लेकिन उसके कानों में सिर्फ मीना की आवाज गूँज रही थी। एक बूढ़ी, बिस्तर पर पड़ी महिला, घर में अकेली, और एक अनजान बाइक वाला आदमी। उसे हजार डर घेरने लगे। कहीं धोखेबाज तो नहीं? कहीं संपत्ति के कागज? कहीं माँ के गहने? कहीं कोई पुराना अपराधी?
घर पहुँचकर उसने देखा कि मुख्य दरवाजा आधा खुला था। यह देखकर उसका गुस्सा डर से बड़ा हो गया। वह अंदर भागी। आँगन खाली था। मंदिर की घंटी हवा से हल्की हिल रही थी। घर में अजीब शांति थी।
वह माँ के कमरे की तरफ बढ़ी और बिना दस्तक दिए दरवाजा खोल दिया।
सामने जो दृश्य था, उसने उसे जड़ कर दिया।
एक भारी-भरकम आदमी माँ के बिस्तर के पास बैठा था। उसकी सफेद-मिश्रित दाढ़ी थी, बाजुओं पर गहरे टैटू थे, कलाई में लोहे का कड़ा, गले में पुरानी चेन, पैर में धूल भरे बूट। पर उसके हाथ अजीब तरह से कोमल थे। वह सावित्री देवी को चम्मच से खिचड़ी खिला रहा था, और सावित्री देवी उसे ऐसे देख रही थीं जैसे कई जन्मों का सूखा एक पल में टूट गया हो।
—यह कौन है?
उस आदमी ने चम्मच नीचे रखा। सावित्री देवी की मुस्कान बुझ गई।
—रीया, धीरे बोल।
—मैं धीरे बोलूँ? 12 साल तक जिस मीना ने आपका मल-मूत्र साफ किया, उसे निकाल दिया आपने? और यह आदमी… यह आदमी आपके कमरे में बैठा है?
आदमी खड़ा हुआ। उसकी लंबाई से कमरा छोटा लगने लगा।
—नमस्ते। मेरा नाम अर्जुन है।
—मैंने आपका नाम नहीं पूछा।
सावित्री देवी ने कमजोर आवाज में कहा।
—वह यहीं रहेगा।
यह वाक्य रिया के सीने पर पत्थर की तरह गिरा।
—माँ, आपको समझ नहीं आ रहा। यह आदमी कौन है? इसे किसने भेजा? क्या इसके कागज देखे? पुलिस वेरिफिकेशन? कुछ भी?
—वह अपराधी नहीं है।
—आपको कैसे पता?
सावित्री देवी ने खिड़की से बाहर खड़ी काली बुलेट की तरफ देखा।
—क्योंकि वह मेरे लिए अजनबी नहीं है।
रीया की आँखें फैल गईं।
—मतलब?
सावित्री देवी ने होंठ भींच लिए।
—आज नहीं।
अर्जुन ने धीरे से कहा।
—मैं बाहर बैठ जाता हूँ। चाय आपकी मेज पर रख दी है।
सावित्री देवी के मुँह से निकला।
—धन्यवाद, बेटा।
कमरे में जैसे बिजली गिर गई।
रीया ने माँ को देखा। फिर उस आदमी को। “बेटा” शब्द इतना सहज था कि वह चीखना चाहती थी। अर्जुन बाहर चला गया, लेकिन उसके बूटों की आवाज रिया के भीतर गूँजती रही।
—आपने उसे बेटा क्यों कहा?
—भारत में प्यार से बहुतों को बेटा कहते हैं।
—मुझे बच्ची मत समझिए।
—तो मुझे पागल बूढ़ी मत समझो।
उस दिन से घर युद्धभूमि बन गया, लेकिन तलवारों की जगह खामोशी थी। अर्जुन हर सुबह आता। वह माँ की दवाइयाँ समय पर देता, दालिया बनाता, तकिया ठीक करता, कमरे की खिड़की खोलता, आँगन की सूखी तुलसी में पानी डालता। उसने घर के टूटे नल को ठीक कर दिया, पंखे की आवाज बंद कर दी और माँ के लिए पुराने रेडियो पर भजन लगाने लगा। माँ उसके सामने खाना खातीं, उसके सामने हँसतीं, उसके सामने सो जातीं।
यही बात रिया को सबसे ज्यादा तोड़ती थी।
12 साल से उसने अपने जीवन को माँ के बिस्तर के नीचे रख दिया था। शादी के रिश्ते आए, चले गए। दोस्तों ने बुलाना बंद कर दिया। रिश्तेदारों ने बस सलाह दी, मदद नहीं। और अब एक टैटू वाला आदमी अचानक आया था और माँ की आँखों में वह चमक ला रहा था जो रिया कभी नहीं ला सकी।
एक रात रिया पानी लेने उठी तो उसने देखा कि अर्जुन बरामदे में बैठा चमड़े की पुरानी डायरी में कुछ लिख रहा है। उसे देखकर उसने डायरी जल्दी से जैकेट में रख ली।
—क्या छिपा रहे हैं?
—सावित्री जी की बातें।
—मेरी माँ की हर बात मुझे जानने का हक है।
अर्जुन ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
—हर बात नहीं, रिया जी।
यह सुनकर रिया के भीतर ज्वाला भड़क उठी।
उसी रात, जब सब सो गए, वह दबे पाँव गेस्ट रूम में गई। अर्जुन की काली जैकेट कुर्सी पर टँगी थी। उसने काँपते हाथों से जेबें टटोलीं। डायरी मिली। उसके साथ एक पुरानी पीली तस्वीर भी थी।
तस्वीर में एक बहुत कम उम्र की लड़की अस्पताल के बिस्तर पर थी। उसकी गोद में नवजात बच्चा था। चेहरा साफ नहीं था, पर हाथ साफ दिख रहे थे। पतली उंगलियाँ। अंगूठे के पास गहरा काला तिल।
रीया का गला सूख गया।
वह तिल उसकी माँ के हाथ पर था।
तभी माँ के कमरे से जोर की आवाज आई।
रीया भागी। सावित्री देवी का शरीर काँप रहा था। मुँह से झाग निकल रहा था। रिया चीखी। अर्जुन नंगे पैर भागता हुआ आया। उसने सावित्री देवी को बाँहों में थामा, उनका सिर संभाला और टूटी आवाज में बोला।
—माँ, आँखें खोलो। प्लीज माँ, मुझे फिर से मत छोड़ो।
रीया वहीं जम गई।
उसने “सावित्री जी” नहीं कहा।
उसने “आंटी” नहीं कहा।
उसने “माँ” कहा।
और उसी पल रिया को समझ आ गया कि इस घर में जो झूठ छिपा था, वह उसकी 12 साल की सेवा से भी बड़ा था।
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भाग 2:
अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में रिया बार-बार वही पीली तस्वीर अपनी मुट्ठी में दबा रही थी, और अर्जुन कॉरिडोर के कोने में सिर झुकाए बैठा था, जैसे कोई 60 साल का आदमी अचानक 6 साल का बच्चा बन गया हो। डॉक्टर ने 2 घंटे बाद आकर कहा कि सावित्री देवी की हालत स्थिर है, लेकिन बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी है और अब उन्हें अकेला छोड़ना खतरनाक होगा। रिया की नजर डॉक्टर पर नहीं, अर्जुन पर थी। उसे याद आया कि कैसे वह आदमी माँ का मुँह पोंछता था, दवा की शीशी पढ़ता था, रात को हर 30 मिनट में उठकर चेक करता था कि माँ की साँस ठीक चल रही है या नहीं। वह धोखेबाज दिखता था, पर डर उसकी आँखों में सचमुच का था। रिया उसके पास गई और तस्वीर उसके सामने कर दी। —सच बताइए, आप कौन हैं? अर्जुन ने तस्वीर देखते ही आँखें बंद कर लीं। —उन्होंने मना किया था। —मेरी माँ बिस्तर पर पड़ी हैं, आपने मीना को हटाया, घर में घुसे, डायरी छिपाई, और अब उन्हें माँ कहते हैं। अब कोई राज नहीं रहेगा। अर्जुन ने गहरी साँस ली और बोला। —मेरा नाम अर्जुन मल्होत्रा है। मेरी उम्र 60 है। मैं करोल बाग में मोटरसाइकिल गैराज चलाता हूँ। मेरी 2 बेटियाँ हैं, 3 नाती-पोते हैं। और 1 साल पहले मुझे पता चला कि मुझे जन्म देने वाली औरत का नाम सावित्री था। रिया पीछे हट गई। उसे लगा अस्पताल की सफेद दीवारें घूमने लगी हैं। अर्जुन ने डायरी खोली। उसमें पुराने जन्म रिकॉर्ड, एक अनाथालय का कागज, अदालत की कॉपी, कुछ प्रिंटेड मैसेज और कई सवाल लिखे थे—“क्या आपने मुझे कभी जन्मदिन पर याद किया?”, “मेरे पिता कौन थे?”, “क्या मेरी आँखें आपकी जैसी हैं?”, “क्या आपने मुझे सच में छोड़ा था या आपसे छीन लिया गया था?” अर्जुन ने कहा कि सावित्री 19 साल की थीं, अविवाहित थीं, परिवार ने बदनामी के डर से उन्हें एक निजी क्लिनिक ले जाकर बच्चा छीन लिया था, और दादा ने जबरन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए थे। सावित्री को बस 4 मिनट बच्चे को छूने दिया गया था। बाद में उनकी शादी कर दी गई, फिर रिया हुई, और वह पूरी जिंदगी उस पहले बच्चे का नाम लिए बिना रोती रहीं। रिया ने टूटे स्वर में कहा। —तो आपने यह सब मुझसे क्यों छिपाया? अर्जुन ने धीमे से जवाब दिया। —क्योंकि उन्हें डर था कि तुम सोचोगी मैं तुम्हारी जगह लेने आया हूँ। उसी समय वार्ड से नर्स भागती हुई निकली और बोली कि सावित्री देवी होश में आते ही बस 1 नाम पुकार रही हैं—अर्जुन। रिया ने दरवाजे की तरफ देखा, और पहली बार उसे समझ आया कि उसकी माँ ने उसे धोखा नहीं दिया था, बल्कि 60 साल तक एक जिंदा घाव छिपाया था। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3:
वार्ड के अंदर सावित्री देवी ऑक्सीजन मास्क के साथ पड़ी थीं। उनकी आँखें खुली थीं, पर उनमें शरीर से ज्यादा पछतावा जाग रहा था। रिया दरवाजे पर खड़ी रही। अर्जुन उसके पीछे था, लेकिन भीतर आने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। जिस आदमी को देखकर रिया ने खतरा समझा था, वह अब दहलीज पर खड़ा ऐसा लग रहा था जैसे किसी मंदिर में प्रवेश करने से डरता हुआ भक्त।
सावित्री देवी ने बहुत धीरे हाथ उठाया।
—रीया।
रीया उनके पास गई। उसने उनका हाथ पकड़ा। वही हाथ, जिसके अंगूठे के पास वह तिल था। वही हाथ जिसने उसे बचपन में खाना खिलाया था। वही हाथ जिसने कभी किसी और बच्चे को 4 मिनट पकड़कर फिर हमेशा के लिए खो दिया था।
—माँ, यह सच है?
सावित्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
—हाँ।
कमरे में मशीन की बीप आवाज कर रही थी। बाहर अस्पताल के कॉरिडोर में लोगों की भागदौड़ थी, पर उस कमरे में 60 साल की चुप्पी बैठी थी।
—आपने मुझे क्यों नहीं बताया?
सावित्री देवी ने मास्क थोड़ा हटाने की कोशिश की। रिया ने डॉक्टर की हिदायत याद कर उसे हल्का सा ठीक किया। माँ ने टूटी साँसों के बीच कहा।
—क्योंकि मैं डर गई थी।
—मुझसे?
—तुझसे नहीं… उस दिन से, उस घर से, उस समाज से जिसने मुझे सिखाया था कि लड़की की गलती नहीं देखी जाती, बस उसकी इज्जत जलाई जाती है।
रिया चुप रही। अर्जुन अब भी दरवाजे पर खड़ा था।
सावित्री देवी ने नजर उसकी तरफ मोड़ी।
—अंदर आ जा।
अर्जुन के पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।
—अगर रिया जी नहीं चाहें तो मैं बाहर रहूँगा।
रीया ने उसकी तरफ देखा। यह वही आदमी था जिसके हाथों पर टैटू थे, जिसकी बाइक की आवाज से वह डर गई थी, जिसकी जैकेट में उसे राज मिले थे। लेकिन उसकी आँखों में कोई लालच नहीं था। सिर्फ एक बच्चे का डर था, जिसने जिंदगी भर सोचा था कि उसकी माँ ने उसे चाहा भी था या नहीं।
—आ जाइए।
अर्जुन धीरे-धीरे भीतर आया। वह बिस्तर के दूसरी तरफ खड़ा हो गया। सावित्री देवी ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। उसके बड़े हाथ माँ की हथेली में आते ही काँप गए।
—मुझे माफ कर दे।
अर्जुन की आँखें भर आईं।
—आपने मुझे छोड़ा था?
सावित्री देवी ने सिर हिलाया।
—नहीं। मुझे तुझसे अलग किया गया था। मैं 19 साल की थी। तेरे नाना ने कहा था कि अगर मैंने मुँह खोला, तो मुझे घर से निकाल देंगे। तेरी नानी रोती रहीं, पर कुछ बोल नहीं पाईं। मेरे हाथ में तू था, और नर्स ने कहा, जल्दी करो, बाहर लोग खड़े हैं। मैंने तेरे कान के पास सिर्फ इतना कहा था—बेटा, मुझे भूल मत जाना। फिर उन्होंने तुझे ले लिया।
अर्जुन की आवाज फट गई।
—मैंने तो आपको जाना ही नहीं था, माँ। कैसे नहीं भूलता?
सावित्री देवी ने रोते हुए आँखें बंद कर लीं।
—मैंने हर साल तेरे लिए दीपक जलाया। हर करवाचौथ पर सब समझते थे मैं तेरे पिता के लिए व्रत रखती हूँ, पर मैं उस बच्चे के लिए भी प्रार्थना करती थी जिसे बिना नाम दिए खो दिया था। जब रिया पैदा हुई, तो पहली बार लगा भगवान ने मुझे फिर से जीने की वजह दी है। लेकिन तेरी जगह खाली रही। खाली और जलती हुई।
रीया के भीतर कुछ टूट भी रहा था और जुड़ भी रहा था। उसे याद आया कि बचपन में कई बार माँ अचानक किसी बच्चे को देखकर रो पड़ती थीं। 10 मई जैसे किसी तारीख पर चुप हो जाती थीं। राखी के दिन खिड़की के बाहर देखती रहती थीं। जब भी कोई कहता कि बेटा न हो तो बुढ़ापा मुश्किल होता है, माँ तड़पकर रिया को सीने से लगा लेती थीं।
रीया ने सोचा था कि माँ कमजोर हैं। असल में माँ हर दिन एक अदृश्य लाश लेकर जी रही थीं।
—फिर आप लोग मिले कैसे?
अर्जुन ने आँसू पोंछे। उसने अपनी चमड़े की डायरी खोली। इस बार उसने उसे छिपाया नहीं। वह रिया और सावित्री दोनों के बीच रख दी।
—मेरी पालने वाली माँ बहुत अच्छी थीं। उन्होंने मुझे कभी कमी नहीं दी। लेकिन मरने से पहले उन्होंने एक डिब्बा दिया। उसमें अनाथालय का पुराना कागज था और एक चिट्ठी थी। उसमें लिखा था कि मुझे लेने से पहले एक लड़की बहुत रोई थी। मैं उसी दिन से खोज में लग गया। 1 साल तक रिकॉर्ड ऑफिस गया, कोर्ट गया, पुराने क्लिनिक का पता लगाया, फिर एक संस्था के जरिए सावित्री जी का नाम मिला। पहली बार फोन किया तो इन्होंने 5 मिनट कुछ नहीं बोला। बस रोती रहीं।
सावित्री देवी ने हल्की हँसी के साथ रोते हुए कहा।
—उसकी आवाज सुनकर मुझे लगा मेरे अंदर का मरा हुआ हिस्सा जाग गया है।
रीया के होंठ काँपे।
—और मुझे क्यों नहीं बताया?
सावित्री देवी ने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
—क्योंकि तूने मुझे 12 साल उठाया, नहलाया, खिलाया, बचाया। जब मेरा शरीर मेरा साथ छोड़ गया, तू मेरी छत बन गई। मुझे डर था कि अगर कहूँगी कि मेरा एक बेटा और है, तो तू सोचेगी कि तेरी सेवा कम पड़ गई। तू सोचेगी कि मैं तुझे बाँट रही हूँ। बेटी, माँ का प्यार संपत्ति नहीं होता कि हिस्से कम-ज्यादा हों।
रीया की आँखें भर आईं।
—पर मुझे लगा आप मुझे बदल रही हैं।
—मैं तुझे कैसे बदलती? तू मेरी आखिरी साँस का सहारा है। वह मेरी पहली चीख का जवाब है।
कमरा शांत हो गया। इन 2 वाक्यों ने रिया के सारे गुस्से को खोलकर रख दिया। उसे लगा जैसे उसने इतने दिनों तक अपने डर को माँ की धोखेबाजी समझ लिया था। उसे डर था कि 12 साल का त्याग अचानक किसी अजनबी के सामने छोटा हो जाएगा। लेकिन अर्जुन उसके त्याग को मिटाने नहीं आया था। वह तो उस कहानी का पहला पन्ना था जिसे माँ ने कभी किसी को पढ़ने नहीं दिया।
तभी सावित्री देवी ने कमजोर स्वर में कहा।
—मीना को वापस बुला लेना। मैंने उसे बहुत दुख दिया।
रीया ने सिर हिलाया।
—बुला लूँगी।
अर्जुन ने तुरंत कहा।
—अगर मेरी वजह से घर में परेशानी है, तो मैं नहीं आऊँगा। बस कभी-कभी मिलने दे दीजिएगा।
सावित्री देवी का चेहरा डर से भर गया।
—नहीं।
रीया ने पहली बार अर्जुन की तरफ बिना शक के देखा।
—आप आएँगे। लेकिन नियम मेरे होंगे। दवाइयाँ समय पर, डॉक्टर की बात माननी होगी, और माँ को ज्यादा भावुक नहीं करना।
अर्जुन ने हल्के से सिर झुका दिया।
—जो आप कहें।
रिया ने डायरी उठाई और उसे वापस उसके हाथ में दी।
—और यह मत छिपाइए। मुझे भी जानना है कि मेरी माँ की जिंदगी में मुझसे पहले क्या था।
अर्जुन ने डायरी पकड़ी तो उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
—आप सुन पाएँगी?
रीया ने माँ की तरफ देखा।
—अब नहीं सुनूँगी तो शायद कभी सच में इन्हें जान ही नहीं पाऊँगी।
उस दिन के बाद सब आसान नहीं हुआ। घर लौटने पर मोहल्ले वालों की आँखें सवाल करती थीं। किसी ने कहा बूढ़ी औरत को बाइक वाले ने फँसा लिया है। किसी ने कहा संपत्ति का मामला है। एक रिश्तेदार ने फोन पर रिया से पूछा।
—कहीं वह आदमी मकान पर दावा तो नहीं करेगा?
रीया ने पहली बार ठंडे स्वर में जवाब दिया।
—वह माँ पर दावा करने नहीं आया। वह अपने बचपन का जवाब लेने आया है।
मीना 3 दिन बाद लौटी। उसके हाथ में बेसन के लड्डू थे और आँखों में शर्म।
—अम्मा, आपने तो मुझे भगा ही दिया था।
सावित्री देवी रो पड़ीं।
—माफ कर दे।
मीना ने उनकी चादर ठीक की और अर्जुन की तरफ देखते हुए बोली।
—अगर सच में बेटे हो, तो सीख लो कि दवाई वाली नीली डिब्बी रात की है और लाल डिब्बी सुबह की। यहाँ सिर्फ बाइक चलाने से काम नहीं चलेगा।
अर्जुन पहली बार जोर से हँसा। सावित्री देवी भी हँसते-हँसते खाँसने लगीं। रिया ने पानी दिया। उस पल घर में पुराने दर्द के बीच एक नई जगह बनती दिखाई दी।
अर्जुन ने धीरे-धीरे घर को अपना नहीं, अपना हिस्सा मानना शुरू किया। वह कभी खाली हाथ नहीं आता। कभी ताजे फल, कभी माँ के लिए रुई का मुलायम दुपट्टा, कभी अपने नाती की बनाई हुई ड्राइंग। उसकी 2 बेटियाँ पहले झिझकते हुए आईं। उन्हें भी समझ नहीं आता था कि उनके पिता की अचानक एक जन्म देने वाली माँ कैसे हो सकती है। पर जब सावित्री देवी ने उनके सिर पर हाथ रखा, तो दोनों रो पड़ीं। बच्चों ने उन्हें “बड़ी नानी” कहना शुरू कर दिया।
रीया शुरू में दूरी बनाए रही। उसे अपनी जगह खोने का डर आसानी से नहीं गया। पर धीरे-धीरे उसने देखा कि अर्जुन रात में माँ के पैर दबाते हुए खुद भी चुपचाप रोता है। वह हर बार जाते हुए दरवाजे के पास मुड़कर माँ को देखता है, जैसे डरता हो कि अगली बार वे मिलेंगी या नहीं। उसने कभी पैसे की बात नहीं की, कभी मकान की बात नहीं की, कभी अधिकार की आवाज नहीं उठाई। वह बस समय माँगता था—वह समय जो उससे 60 साल पहले छीन लिया गया था।
एक शाम बारिश हो रही थी। बिजली चली गई। रिया ने मोमबत्ती जलाई। माँ बिस्तर पर थीं, अर्जुन फर्श पर बैठा था, मीना दवाई की शीशी पकड़े खड़ी थी। सावित्री देवी ने धीमे से कहा।
—अर्जुन, वह पुराना गीत सुना।
अर्जुन ने शर्माते हुए पूछा।
—कौन सा?
—जो फोन पर पहली बार सुनाया था।
अर्जुन ने बहुत धीमी आवाज में पुराना हिंदी गीत गाना शुरू किया। उसकी भारी आवाज साफ नहीं थी, सुर भी बहुत पक्के नहीं थे, पर सावित्री देवी की आँखें चमक रही थीं। रिया दरवाजे से टिककर खड़ी रही। उसे अचानक महसूस हुआ कि वह अपनी माँ को पहली बार एक मरीज नहीं, एक अधूरी प्रेम और पीड़ा से भरी औरत के रूप में देख रही है।
कुछ महीने बाद डॉक्टर ने साफ कह दिया कि अब समय ज्यादा नहीं बचा। सावित्री देवी का शरीर कमजोर होता गया। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब शांति आने लगी। वह अब फोन छिपाती नहीं थीं। डायरी खुले में रहती। उसमें रिया ने भी कुछ पन्ने जोड़े—माँ को कौन सी चाय पसंद थी, सर्दियों में कौन सा कंबल, किस दवा से पेट खराब होता, किस बात पर वह झूठ-मूठ गुस्सा करतीं। अर्जुन ने हर बात ध्यान से सीखी, जैसे कोई खोया हुआ बेटा अपनी माँ का बचा हुआ जीवन रट रहा हो।
सावित्री देवी ने मरने से 10 दिन पहले रिया और अर्जुन को पास बुलाया।
—मेरे बाद झगड़ा मत करना।
रीया ने तुरंत कहा।
—माँ, ऐसी बात मत कीजिए।
—सुन ले। जिंदगी ने पहले ही बहुत देर कर दी है। रिया, तूने मुझे शरीर से सँभाला। अर्जुन, तूने मेरी आत्मा का अधूरा कोना भर दिया। तुम दोनों एक-दूसरे से लड़ोगे तो मेरी मौत सच में बेकार हो जाएगी।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—मैं रिया जी की इज्जत करूँगा।
रीया ने उसकी ओर देखा।
—रिया जी नहीं। बस रिया।
अर्जुन की आँखों में पानी आ गया।
—ठीक है… रिया।
सावित्री देवी ने दोनों के हाथ अपने हाथों पर रख दिए।
—अब मेरी 2 संतानें एक ही कमरे में हैं। भगवान ने देर की, पर मुझे खाली नहीं भेजा।
7 महीने बाद, एक ठंडी सुबह, सावित्री देवी ने अंतिम साँस ली। उनके एक हाथ में रिया की उंगलियाँ थीं और दूसरे हाथ में अर्जुन की। मीना दरवाजे पर रो रही थी। बाहर अर्जुन की बुलेट खड़ी थी, लेकिन उस दिन उसकी आवाज नहीं गूँजी।
अंतिम संस्कार के दिन रिश्तेदार फुसफुसा रहे थे। कुछ चेहरों पर दया थी, कुछ पर जिज्ञासा, कुछ पर वही पुराना समाज जो औरत की पीड़ा से ज्यादा उसकी “इज्जत” का हिसाब रखता है। लेकिन इस बार रिया चुप नहीं रही।
जब पंडित ने अंतिम क्रिया से पहले परिवार को आगे आने को कहा, एक चाचा ने धीमे से टोका।
—बेटी, यह आदमी कौन से रिश्ते से खड़ा है?
रीया सीधी खड़ी हुई। उसकी आवाज शांत थी, लेकिन पूरे आँगन में फैल गई।
—मेरी माँ के 2 बच्चे थे। मुझे उन्होंने अपनी बाँहों में पाला। इन्हें उन्होंने अपनी आत्मा में 60 साल तक रोया। आज कोई भी इन्हें बाहर खड़ा नहीं करेगा।
सब चुप हो गए।
अर्जुन ने चेहरा छिपा लिया, पर उसके कंधे काँप रहे थे। रिया ने उसके पास जाकर उसके हाथ में अग्नि की लकड़ी रखी। कुछ लोगों ने हैरानी से देखा, पर वह पीछे नहीं हटी।
—यह अधिकार छीना गया था। आज लौट रहा है।
अर्जुन ने काँपते हाथों से माँ को अंतिम प्रणाम किया।
उस दिन के बाद रिया को कई बातें समझ आईं। त्याग कभी-कभी इंसान को अधिकारवादी बना देता है। सेवा करते-करते वह भूल जाती है कि जिस व्यक्ति की सेवा की जा रही है, उसका अतीत भी उसका अपना होता है। माँ केवल माँ नहीं होती; वह कभी लड़की रही होती है, कभी डरी हुई बेटी, कभी मजबूर औरत, कभी ऐसी प्रेम से भरी आत्मा जिसे समाज ने बोलने नहीं दिया।
मकान बाद में भी वही रहा। वही पुराना आँगन, वही तुलसी, वही लकड़ी की अलमारी, वही कमरा जहाँ दवाइयों की गंध धीरे-धीरे कम होती गई। लेकिन अब वहाँ हर रविवार बच्चे आते। अर्जुन अपनी बेटियों के साथ आता। मीना चाय बनाती और रिया माँ की डायरी निकालकर कभी-कभी पढ़ती। उसमें एक आखिरी पन्ना था, जिसे सावित्री देवी ने मरने से कुछ दिन पहले लिखवाया था।
“जिस दिन मेरे दोनों बच्चे एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराएँगे, उस दिन समझना कि मैं मरी नहीं, पूरी हुई हूँ।”
एक रविवार अर्जुन की छोटी नातिन ने रिया से पूछा।
—आप हमारी क्या लगती हैं?
रिया ने कुछ पल सोचा। पहले उसके पास इस रिश्ते का नाम नहीं था। फिर उसने बच्ची को गोद में उठाया।
—मैं तुम्हारी रिया मौसी हूँ।
अर्जुन ने चुपचाप उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में वह खालीपन अब थोड़ा कम था।
शाम को जब सब चले गए, रिया माँ के कमरे में अकेली बैठी रही। खिड़की से हवा आई। तकिए पर अब कोई सिर नहीं था, पर कमरे में माँ की उपस्थिति अजीब तरह से जीवित थी। उसने माँ का पुराना दुपट्टा उठाया, चेहरे से लगाया और पहली बार 12 साल में उसे यह नहीं लगा कि उसने माँ को खो दिया है।
उसे लगा जैसे उसने माँ को पूरा जान लिया है।
और बाहर गली में खड़ी काली बुलेट अब उसे डरावनी नहीं लगती थी। वह एक देर से आया हुआ शोर था, जिसने घर की 60 साल पुरानी खामोशी तोड़ दी थी।
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