
PART 1
—पीछे हटो, अनन्या, वरना मैं आरव को छोड़ दूँगा।
रोहन की आवाज़ में पति वाला अपनापन नहीं था, जैसे किसी अजनबी ने उसके चेहरे पर उसका नाम चिपका दिया हो। अनन्या दरवाज़े पर जमी रह गई। उसके हाथ में सब्ज़ी और दूध का थैला था। दूध की बोतल फर्श पर गिरकर लुढ़की, लेकिन उसकी आँखें बालकनी से हट ही नहीं रही थीं।
गुरुग्राम के उस 12वें माले के फ्लैट की बालकनी में रोहन अपने 9 महीने के बेटे आरव को पायजामे से पकड़े खड़ा था। बच्चे का आधा शरीर रेलिंग के बाहर झूल रहा था। ठंडी हवा में उसके छोटे-छोटे पैर काँप रहे थे और रोते-रोते उसकी साँस अटक रही थी।
—रोहन… उसे अंदर ले आओ। भगवान के लिए।
रोहन हँसा नहीं। उसकी आँखें लाल थीं, मगर उनमें शराब से ज़्यादा कोई और ज़हर था।
—भगवान को बीच में मत लाओ। पहले अपने पाप मानो।
अनन्या के गले में शब्द अटक गए। पिछले 2 महीनों से रोहन बदल गया था। वह उसके मोबाइल में झाँकता, उसके कार्यालय के बाहर अचानक खड़ा मिल जाता, हर संदेश पर शक करता, हर देर से आने पर सवालों की आग लगा देता। अनन्या ने सोचा था व्यापार का घाटा, बैंक से ऋण न मिलना, घर की किस्तों का दबाव और बच्चे की रात-रात भर की रोने की आदत ने उसे तोड़ दिया है।
लेकिन आज वह टूटा हुआ आदमी नहीं लग रहा था।
वह तैयार होकर आया हुआ आदमी लग रहा था।
—तुम चाहते क्या हो? अनन्या ने काँपते हुए पूछा।
रोहन ने खाने की मेज़ पर रखे उसके मोबाइल की तरफ इशारा किया।
—आदित्य को बुलाओ।
—तुम्हारे छोटे भाई को?
—हाँ। मेरे भाई को। तुम्हारे प्रेमी को।
यह शब्द अनन्या पर थप्पड़ की तरह पड़ा। आदित्य रोहन का छोटा भाई था, दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में काम करने वाला शांत, शर्मीला युवक। वह आरव को गोद में खिलाता था, घर की छोटी-मोटी मरम्मत कर देता था, और परिवार के हर झगड़े में सबसे पहले चुप हो जाता था। अनन्या ने उसे हमेशा देवर की तरह ही देखा था।
—तुम पागल हो गए हो, रोहन। ऐसा कुछ नहीं है।
रोहन ने आरव को और नीचे झुका दिया। बच्चे की चीख से फ्लैट की दीवारें काँप गईं।
—फोन करो।
अनन्या की उँगलियाँ सुन्न थीं। फिर भी उसने नंबर मिलाया।
—आदित्य… तुरंत आओ। आरव… रोहन… जल्दी आओ।
अगले 14 मिनट नर्क जैसे थे। रोहन बालकनी से हिला नहीं। वह पुराने त्योहारों, शादी की तस्वीरों, होली के दिन की हँसी, दीवाली की रात आदित्य के साथ खिंची परिवार वाली फोटो, हर चीज़ को गुनाह की तरह गिनाता रहा।
—करवा चौथ पर वह तुम्हें पानी क्यों दे रहा था?
—क्योंकि तुम नीचे पार्किंग में थे।
—माँ के जन्मदिन पर तुम दोनों रसोई में अकेले क्यों थे?
—मैं मिठाई निकाल रही थी, वह प्लेट दे रहा था।
—झूठ। सब झूठ।
जब आदित्य दरवाज़ा खोलकर अंदर आया, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
—भैया, बच्चे को अंदर ले आइए। वह आपका बेटा है।
रोहन ने गुर्राकर कहा—
—मोबाइल। तुम दोनों के। अभी।
अनन्या और आदित्य ने मोबाइल मेज़ पर रख दिए। रोहन ने संदेश देखे, तस्वीरें देखीं, कॉल सूची देखी। वह इतने शांत तरीके से खोज रहा था जैसे कोई हिसाब-किताब मिलान कर रहा हो। कुछ नहीं मिला।
तभी उसके चेहरे की आग बुझ गई।
और वही शांति सबसे डरावनी थी।
—बहुत सफाई से मिटाया है तुम दोनों ने।
—कुछ था ही नहीं मिटाने को, आदित्य ने धीमे से कहा।
रोहन ने जेब से मुड़ा हुआ कागज़ निकाला। उस पर एक बैंक खाता लिखा था।
—अगर आरव को वापस चाहते हो, तो सब पैसा इसमें भेजो। अनन्या, तुम्हारी बचत। बीमा। चालू खाता। सब। आदित्य भी।
अनन्या ने उसे अविश्वास से देखा।
—तुम अपने ही बच्चे को पैसे के लिए इस्तेमाल कर रहे हो?
—नहीं। मैं तुम्हें तुम्हारी औकात दिखा रहा हूँ।
अनन्या ने 86,00000 रुपये कई सालों में जमा किए थे। आरव के भविष्य, छोटे घर और सुरक्षित जीवन के लिए। आदित्य के पास 28,00000 रुपये थे। रोहन की आँखों और आरव की झूलती देह के बीच, दोनों ने एक-एक करके रकम भेजी। हर पुष्टि के साथ अनन्या का एक हिस्सा टूटता गया।
आखिरी संदेश आते ही रोहन ने लंबी साँस ली।
—अब तुम जानोगे, सब कुछ छिनना कैसा लगता है।
उसने हाथ ढीला कर दिया।
अनन्या की चीख पूरे फ्लैट में फट पड़ी। वह बालकनी की ओर भागी, लेकिन रोहन ने उसे मेज़ से टकरा दिया। आदित्य ने उसे पकड़ना चाहा, तो रोहन ने उसके चेहरे पर मुक्का मारा और चाबी उठाकर भाग गया।
अनन्या नंगे पाँव सीढ़ियाँ उतरती गई। उसे लगा नीचे आरव टूटा पड़ा होगा।
लेकिन नीचे कुछ नहीं था।
न बच्चा।
न खून।
न रोहन।
बस पार्किंग के पास एक छोड़ा हुआ कंबल और सीसीटीवी कैमरे की काली आँख।
गार्ड ने फुटेज चलाया। स्क्रीन पर बालकनी के ठीक नीचे एक औरत मोटा रज़ाईदार कपड़ा फैलाए खड़ी थी। आरव उसमें गिरा, वह पीछे हटकर बच्चे को सीने से चिपकाती हुई एक सफेद कार की तरफ भागी।
औरत ने एक पल ऊपर देखा।
अनन्या की साँस रुक गई।
वह रोहन की माँ, सविता देवी थीं।
PART 2
रात भर गुरुग्राम पुलिस, बाल संरक्षण इकाई और साइबर शाखा ने शहर खंगाल दिया। कार 9 दिन पहले नकली पहचान पर किराए पर ली गई थी। जिस खाते में पैसे गए थे, वह किसी झूठे सेवा ट्रस्ट के नाम पर खुला था और रकम कुछ घंटों में नोएडा, फरीदाबाद और मानेसर से नकद निकाल ली गई।
अनन्या अपनी सहेली नाज़िया के घर बैठी रही। आरव का छोटा तकिया उसकी गोद में था, जैसे वह उसी से बच्चे की साँस सुनना चाहती हो।
जाँच अधिकारी ने एक-एक बात जोड़ी। सविता देवी का बार-बार कहना कि नौकरी करने वाली माँ बच्चे बिगाड़ देती है। उनका आरव को कुछ दिनों के लिए अपने पास रखने का ज़िद करना। रोहन का अचानक पैसों की जानकारी पूछना। आदित्य पर आरोपों का दबाव।
फिर सविता की पुरानी पड़ोसन ने फोन किया।
—उनकी एक बेटी थी, मीरा। बचपन में बाल कल्याण वालों ने उसे घर से हटाया था। सविता कहती थीं, एक दिन भगवान उन्हें फिर बच्चा देगा।
रोहन ने कभी बहन का ज़िक्र नहीं किया था।
सुबह आदित्य की कार जयपुर राजमार्ग के पास मिली। खाली। मोबाइल बंद। पुलिस ने उसके मेल खोले।
सच और भयानक था। रोहन 2 महीनों से उसे धमका रहा था कि मीरा की मौत का दोष उसी पर डाल देगा। मीरा की सड़क दुर्घटना में आदित्य गाड़ी चला रहा था, जबकि रिपोर्ट ने उसे निर्दोष माना था। उसका अपराधबोध अब भी जिंदा था।
रात 3:12 पर नाज़िया के फोन पर अनजान नंबर आया।
—भाभी… मैं आदित्य। आरव जिंदा है। वे लोग नीमराना के पास एक पुराने फार्महाउस में हैं। माँ कह रही हैं बच्चा अब उनका है। रोहन शराब पी रहा है।
फिर उसकी टूटी आवाज़ आई—
—वे 15 मिनट में निकलने वाले हैं।
PART 3
निरीक्षक कविता राणा ने अनन्या को आँखों से चुप रहने का इशारा किया। नाज़िया के ड्राइंग रूम में रखा फोन अब सिर्फ फोन नहीं था, वह आरव तक पहुँचने वाली आखिरी डोर था। कमरे में कोई हिल नहीं रहा था। नाज़िया के पति समीर ने परदे कसकर बंद कर दिए थे, जैसे बाहर की हवा भी इस कॉल को तोड़ सकती हो।
—आदित्य, ध्यान से सुनो, निरीक्षक कविता ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। कोई पहचान बताओ। सड़क, बोर्ड, मंदिर, पेट्रोल पंप, कुछ भी।
दूसरी तरफ से हाँफने की आवाज़ आई। फिर हल्की खड़खड़ाहट।
—बाहर पीले रंग का बंद ढाबा है। नाम शायद राजस्थानी रसोई लिखा है। पीछे सूखा कुआँ है। फार्महाउस की दीवार नीली है। माँ ने आरव को कार सीट में बैठा दिया है। एक नीला बैग भी है।
अनन्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं। आरव कार सीट में था। आरव जिंदा था। कहीं वही बच्चा, जिसे वह रातों में अपने सीने से चिपकाकर सुलाती थी, शायद इस वक्त उसकी गंध ढूँढ रहा था।
—भैया आ रहे हैं, आदित्य ने फुसफुसाकर कहा।
लाइन खुली रही।
कुछ सेकंड तक बस कदमों की आवाज़ आई। फिर रोहन की भारी आवाज़ सुनाई दी।
—कहाँ था तू?
—बाथरूम में।
—फोन किससे कर रहा था?
—समय देख रहा था।
एक तेज़ थप्पड़ की आवाज़ आई। अनन्या का हाथ अपने मुँह पर चला गया। नाज़िया रो पड़ी, मगर समीर ने उसके कंधे को कसकर पकड़ लिया।
सविता देवी की आवाज़ आई। अजीब नरम, मगर ज़हरीली।
—रोहन, बच्चे के सामने तमाशा मत करो। उसे शांति चाहिए। उस औरत ने इसे जन्म दिया होगा, पर माँ बनना उसे आता नहीं।
उस औरत।
अनन्या के भीतर कुछ जल उठा। उनके लिए वह आरव की माँ नहीं थी। वह एक बाधा थी, एक कमाने वाली मशीन, एक ऐसी औरत जिसे झूठ, शर्म और पैसे के नीचे दबाया जा सकता था।
पुलिस ने लोकेशन मिलाई। राजमार्ग के पुराने कैमरों, टोल बूथ और आदित्य की बताई जगहों से फार्महाउस 22 मिनट में पहचान लिया गया। अनन्या दौड़ना चाहती थी, पर कविता राणा ने उसका रास्ता रोक लिया।
—आप वहाँ गईं तो वे घबरा जाएंगे। अभी आरव को बचाना है, बदला लेना नहीं।
इन शब्दों ने अनन्या को वहीं रोक दिया। उसने दीवार पकड़ी और धीरे-धीरे नीचे बैठ गई।
पुलिस की गाड़ियों ने सायरन बंद रखे। फार्महाउस के पास खेतों में धुंध थी। सुबह होने से पहले की वह नीली अँधेरी घड़ी थी, जब दुनिया सबसे कमजोर लगती है। रेडियो से टूटे-फूटे संदेश आ रहे थे।
—सफेद कार दिखाई दी।
—एक पुरुष बाहर।
—औरत बच्चे को पकड़े हुए।
—रुकिए, आदेश का इंतज़ार कीजिए।
अनन्या ने दोनों हाथ जोड़ लिए। उसने कोई मंत्र पूरा नहीं बोला, कोई वादा नहीं माँगा। बस एक ही शब्द उसके भीतर घूमता रहा।
आरव।
फिर रेडियो पर आवाज़ गूँजी—
—पुलिस! वहीं रुक जाओ!
इसके बाद सब कुछ एक साथ हुआ। सविता की चीख, रोहन की गाली, कार का दरवाज़ा, भागते कदम, और किसी धातु के गिरने की आवाज़। रोहन कार की तरफ भागा था, लेकिन पुलिस ने उसे बोनट पर दबोच लिया। वह चिल्लाता रहा कि अनन्या बच्चे को छोड़कर आदित्य के साथ भाग गई थी और वह बेटे को “बचाने” की कोशिश कर रहा था।
आदित्य दरवाज़े से बाहर निकला। उसका होंठ फटा था, आँख सूजी हुई थी। उसने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।
—बच्चा अंदर है… माँ के पास…
सविता देवी आरव को सीने से चिपकाए अंदर भागी और एक छोटे कमरे में बंद हो गईं। बाहर से उनकी आवाज़ आती रही।
—यह मेरा बच्चा है! तुम लोगों ने मीरा छीनी थी। अब आरव नहीं छीनोगे।
एक वार्ताकार को बुलाया गया। 31 मिनट तक वह दरवाज़े के बाहर बैठकर उनसे बात करता रहा। उसने कहा कि बच्चे को चारपाई पर रख दीजिए। हाथ दिखाई देते हुए बाहर आइए। बच्चा रो रहा है, उसे पानी चाहिए। सविता कभी रोतीं, कभी लोरी गातीं, कभी कहतीं—
—अनन्या को नौकरी से प्यार है, बच्चे से नहीं।
—मैंने इसे इंतज़ार करके पाया है।
—मेरी कोख खाली कर दी थी तुम सबने।
अनन्या नाज़िया के घर में रेडियो से चिपकी बैठी थी। उसे सिर्फ टुकड़े सुनाई दे रहे थे, पर हर टुकड़ा उसकी छाती में काँटे की तरह धँस रहा था। उसने कल्पना की कि सविता की उँगलियाँ आरव के छोटे हाथों को कितना कसकर पकड़े होंगी। उसका दूध पीने का समय निकल चुका था। उसकी नींद टूट चुकी थी। वह अजनबी आवाज़ों में अपनी माँ को ढूँढ रहा होगा।
अचानक एक भारी आवाज़ आई, जैसे अंदर कुछ गिरा हो।
रेडियो कुछ पल चुप रहा।
अनन्या के शरीर से आवाज़ निकलनी बंद हो गई।
फिर एक अधिकारी की आवाज़ आई—
—बच्चा बरामद। जीवित। चिकित्सक बुलाइए।
नाज़िया सबसे पहले रोई। अनन्या नहीं रोई। वह जैसे अपने शरीर में रह ही नहीं गई थी। उसके कानों में सिर्फ “जीवित” शब्द गूँज रहा था।
जब पुलिस आरव को लेकर गुरुग्राम लौटी, तब सूरज निकल चुका था। बच्चे ने किसी पुराने स्वेटर में शरीर लपेटा था। उसकी आँखें सूजी थीं, होंठ सूखे थे, गाल पर खरोंच थी। डायपर गलत तरह से बाँधा गया था। वह माँ को देखकर मुस्कुराया नहीं।
वह उसे वैसे देख रहा था जैसे कोई बच्चा किसी अनजान औरत को देखता है।
यही पल अनन्या को लगभग मार गया।
उसने खुद को रोककर धीरे से हाथ बढ़ाए।
—आरव… बेटा… माँ आ गई।
आरव पहले चुप रहा। फिर उसकी ठोड़ी काँपी। फिर वह ऐसे चीखा, जैसे उसके छोटे से शरीर ने पिछले 3 दिनों का डर एक साथ बाहर फेंक दिया हो। कविता राणा ने उसे अनन्या की बाँहों में दिया तो बच्चे ने उसकी कुर्ती को दोनों मुट्ठियों से पकड़ लिया।
अनन्या पुलिस थाने के फर्श पर बैठ गई।
—मैं यहीं हूँ। मैं यहीं हूँ। मैं यहीं हूँ।
वह तब तक दोहराती रही जब तक उसकी आवाज़ फट नहीं गई।
अस्पताल में डॉक्टरों ने बताया कि आरव को हल्का निर्जलीकरण था, कान में संक्रमण था, जाँघों पर जलन थी और बाँहों पर कसकर पकड़े जाने के निशान थे। कोई चोट स्थायी नहीं थी, लेकिन बाल मनोवैज्ञानिक ने कहा कि बच्चे के शरीर ने भय दर्ज कर लिया है। उसे समय, सुरक्षा और धैर्य चाहिए होगा।
अनन्या ने सिर हिलाया। उसकी आँखें आरव से हटती ही नहीं थीं।
रोहन पर नाबालिग के अपहरण, जबरन वसूली, घरेलू हिंसा, जीवन को खतरे में डालने, अवैध बंधक बनाने और आपराधिक साज़िश के आरोप लगे। सविता देवी पर भी वही गंभीर आरोप लगे। आदित्य को पहले शक के घेरे में रखा गया, फिर उसके मेल, रिकॉर्डिंग और कॉल से पता चला कि उसे महीनों से धमकाया जा रहा था। उसने वह सारे संदेश पुलिस को दिए जिनमें रोहन ने योजना लिखी थी।
एक संदेश में रोहन ने लिखा था—
—अनन्या आरव को हवा में देखकर खाते खाली कर देगी। बाद में बोलेंगे वह आदित्य के साथ भाग गई। लोग औरत पर ही शक करेंगे।
दूसरे में सविता देवी का जवाब था—
—बच्चा मेरे पास आ गया तो वह औरत उसकी जिंदगी से मिट जाएगी।
अनन्या ने यह रिकॉर्डिंग सिर्फ 1 बार सुनी। उसके बाद वह अदालत के शौचालय में उल्टी करती रही। उसे लगा पैसे चोरी नहीं हुए, उसके माँ होने के अधिकार पर हमला हुआ है।
रकम का बड़ा हिस्सा वापस नहीं मिला। 114,00000 रुपये नकद निकाले जा चुके थे। नकली दस्तावेज़, किराए की कारें, रास्ते में मदद करने वाले लोग, सबमें पैसा बिखर गया था। जाँच अधिकारी ने कहा कि संपत्ति जब्ती और वसूली में सालों लग सकते हैं।
अनन्या ने उस छोटे घर के बारे में सोचा जिसके लिए उसने ऑनलाइन परदे चुने थे। उसने आरव के कमरे की हल्की पीली दीवारें सोची थीं। उसने लकड़ी का पालना चुना था, जो कभी खरीदा नहीं गया।
फिर उसने देखा, आरव नाज़िया की गोद में सो रहा था और उसकी मुट्ठी नाज़िया के दुपट्टे में फँसी हुई थी।
घर बाद में बन सकता था।
बच्चा साँस ले रहा था।
अगले कई महीने असली परीक्षा थे। आरव दरवाज़ा ज़ोर से बंद होते ही रो पड़ता। किसी पुरुष की ऊँची आवाज़ सुनकर उसका शरीर अकड़ जाता। वह दादा-दादी जैसी उम्र के लोगों को देखकर माँ की गर्दन से चिपक जाता। अनन्या हर रात खिड़की 7 बार देखती, बैंक संदेश 5 बार पढ़ती, दरवाज़े की कुंडी बार-बार खींचती। कभी-कभी उसे लगता रोहन अभी भी सीढ़ियों से ऊपर आ रहा है।
नाज़िया ने अपने छोटे कमरे को अनन्या और आरव के लिए बना दिया। समीर ने दरवाज़े पर अतिरिक्त ताला लगवाया, बिना कोई सलाह दिए, बिना कोई दया दिखाने वाला वाक्य कहे। हर रात वह खाने की प्लेट रख देता, चाहे अनन्या कहे कि भूख नहीं है।
एक रात नाज़िया ने उससे कहा—
—तुझे हर समय मजबूत नहीं बनना। बस कल सुबह तक जिंदा रहना है।
अनन्या उसके कंधे पर सिर रखकर बच्चे की तरह रोई।
आदित्य ने 1 महीने बाद मिलने की विनती की। अनन्या ने पहले मना कर दिया। फिर वह निरीक्षक कविता के कार्यालय में उससे मिली। आदित्य बहुत दुबला लग रहा था। आँख के पास पट्टी थी, आवाज़ टूटी हुई।
—मैं माफी माँगने नहीं आया, भाभी। मेरा हक नहीं है।
अनन्या ने उसे लंबे समय तक देखा।
—तुम्हें पता था रोहन कुछ कर रहा है।
—मुझे लगा वह मुझे फँसाएगा। आरव को नहीं। इतनी दूर नहीं जाएगा, मैंने सोचा।
—तुम चुप रहे।
आदित्य की आँखें भर आईं।
—क्योंकि मैं डरपोक हूँ। क्योंकि मीरा की मौत के बाद से मैं खुद को माफ नहीं कर पाया। रिपोर्ट ने कहा मेरी गलती नहीं थी, पर मेरे मन ने कभी नहीं माना। रोहन जानता था कि मुझे कहाँ से तोड़ना है।
उसने मेज़ पर एक लिफाफा रखा। 7,50000 रुपये। बची हुई थोड़ी रकम, जो वह रोहन के हाथ लगने से पहले छिपा पाया था।
—आरव के इलाज के लिए। तुम्हारी माफी खरीदने के लिए नहीं।
अनन्या ने लिफाफे को तुरंत नहीं छुआ।
—अभी तुम आरव की जिंदगी में वापस नहीं आओगे।
—मैं समझता हूँ।
—जब वह बड़ा होगा, उसे सच पता चलेगा। यह भी कि तुमने चुप्पी रखी। यह भी कि आखिरी वक्त फोन किया।
आदित्य ने सिर झुका लिया। उसके आँसू मेज़ पर गिरते रहे।
अनन्या ने लिफाफा उठा लिया। आदित्य के लिए नहीं। आरव की चिकित्सा, उसकी नींद, उसकी सुरक्षा के लिए।
मुकदमा 9 महीने बाद शुरू हुआ। अदालत में रोहन सफेद कुर्ते में बैठा था, चेहरे पर वही गंदी शांति। जैसे यह सब किसी गलतफहमी का कागज़ी मामला हो। सविता देवी ने सफेद साड़ी पहन रखी थी और हर किसी को ऐसे देख रही थीं जैसे उनसे उनका अधिकार छीन लिया गया हो।
अनन्या गवाही के लिए खड़ी हुई तो उसके हाथ काँप रहे थे। उसने रेलिंग पकड़ी और सब बताया। बालकनी। आरव का पायजामा। हवा में झूलते पैर। बैंक हस्तांतरण। फिर रोहन का हाथ खोलना।
रोहन के वकील ने इसे मानसिक दबाव, व्यापारिक असफलता और पति की गलतफहमी बताया। वह बार-बार “ईर्ष्या” शब्द का इस्तेमाल कर रहा था।
अनन्या ने जज की ओर देखा।
—ईर्ष्या में आदमी किराए की कार नकली कागज़ पर नहीं लेता। ईर्ष्या में आदमी अपनी माँ को बालकनी के नीचे कंबल लेकर खड़ा नहीं करता। ईर्ष्या में आदमी पत्नी का बैंक खाता खाली कराने के लिए बच्चे को हथियार नहीं बनाता।
अदालत में सन्नाटा फैल गया।
सविता देवी ने अपनी बारी में कहा कि उन्होंने सिर्फ “एक बच्चे को बचाने” की कोशिश की। उन्होंने कहा अनन्या बहुत काम करती थी, बच्चे को नौकरानी की तरह पालती थी, माँ होने का मतलब नहीं जानती थी। फिर उन्होंने मीरा का नाम लिया और कहा कि समाज ने उनसे 1 बेटी छीनी थी, इसलिए भगवान ने उन्हें आरव दिया।
उनके अपने वकील ने भी नज़रें नीची कर लीं।
विशेषज्ञों ने माना कि सविता देवी मीरा के खोने से जुनून में थीं, लेकिन उन्हें सही-गलत की समझ थी। वे योजना बना सकती थीं, झूठ बोल सकती थीं, नकली पहचान इस्तेमाल कर सकती थीं, बच्चे को छिपा सकती थीं। यानी वे जानती थीं कि आरव उनका बच्चा नहीं था।
आदित्य ने तीसरे दिन गवाही दी। उसने मीरा की दुर्घटना, रोहन की धमकियाँ और अपनी कमजोरी सब स्वीकार किया।
—उसने कहा था कि अगर मैं उस रात नहीं गया, तो वह बोलेगा मैंने आरव को अनन्या के साथ मिलकर गायब किया। उसे पता था मैं पहले से खुद से नफरत करता हूँ।
रोहन ने एक बार भी आँखें नहीं झुकाईं।
फैसला देर शाम आया। रोहन को 30 साल की सख्त कैद हुई। सविता देवी को 22 साल। अदालत ने कहा कि यह अचानक गुस्से का अपराध नहीं था, बल्कि सोच-समझकर रची गई क्रूर साज़िश थी, जिसमें 9 महीने के बच्चे की जान को हथियार बनाया गया।
अनन्या ने मुस्कुराया नहीं।
न्याय खोई हुई रातें वापस नहीं देता। बच्चे की पहली सुरक्षित हँसी वापस नहीं देता। चोरी गए पैसे, टूटे विश्वास और घर की पवित्रता वापस नहीं देता।
लेकिन वह एक दरवाज़ा बंद करता है।
रोहन और सविता अब आरव तक नहीं पहुँच सकते थे।
1 साल बाद अनन्या दिल्ली के द्वारका में एक छोटे से किराए के फ्लैट में रहने लगी। फ्लैट पहली मंज़िल पर था, बालकनी नहीं थी। खिड़कियों पर सुरक्षा जाली थी, दरवाज़े पर 2 ताले थे और मोबाइल में बैंक के हर लेन-देन की सूचना आती थी। यह वह जिंदगी नहीं थी जिसका उसने सपना देखा था, पर यह उसकी अपनी जिंदगी थी।
उसने नौकरी फिर से शुरू की। पहले आधे दिन, फिर पूरा दिन। नाज़िया बुधवार को आरव को संभाल लेती। समीर वह पहला पुरुष बना जिसके सामने आरव ने फिर से काँपना बंद किया।
एक शाम आरव ने अपनी छोटी खिलौना कार समीर की तरफ बढ़ाई।
—लो।
समीर ने उसे बहुत सावधानी से लिया, जैसे किसी ने उसके हाथ में सोना रख दिया हो।
अनन्या रसोई की तरफ मुड़ गई, ताकि कोई उसके आँसू न देखे।
आरव धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। उसे बालकनी याद नहीं थी। फार्महाउस याद नहीं था। बंद कमरा याद नहीं था। लेकिन उसका शरीर बहुत देर तक डरता रहा। हर पूरी नींद, हर खुलकर हँसी, हर बार किसी भरोसेमंद बड़े की गोद में जाना, अनन्या के लिए किसी युद्ध की जीत था।
आरव के 3 साल के जन्मदिन पर उसने केक चेहरे पर लगा लिया और खिलखिलाकर हँसा। कमरे में गुब्बारे थे, छोटी प्लेटें थीं, नाज़िया थी, समीर था, कुछ सच्चे लोग थे जो भागे नहीं थे।
अनन्या ने उस हँसी को देखा और मन ही मन रोहन और सविता के बारे में सोचा। उन्हें लगा था कि वे एक बच्चा, एक माँ, एक भविष्य चुरा सकते हैं।
उन्होंने 3 दिन छीने। 114,00000 रुपये छीने। दुनिया पर भरोसा करने का एक हिस्सा छीना।
लेकिन वे आगे की कहानी नहीं छीन पाए।
उस रात आरव सो गया तो अनन्या उसके बिस्तर के पास बैठी रही। उसने उसकी पीठ पर हाथ रखा और उसकी नियमित साँसों को महसूस किया। फिर वह उठी।
इस बार उसने खिड़की 7वीं बार नहीं जाँची।
बैठक में बर्तन रखे थे, कपड़े सूख रहे थे, मेज़ पर बिल पड़े थे। कुछ भी असाधारण नहीं था। कोई नाटकीय दृश्य नहीं। कोई चमत्कार नहीं।
बस एक सामान्य जीवन।
और जिस औरत से सब कुछ छीनने की कोशिश की गई थी, उसके लिए यही सामान्य जीवन सबसे बड़ा चमत्कार था।
अनन्या ने गलियारे की बत्ती बंद की।
बहुत समय बाद, घर की खामोशी ने उसे डराया नहीं।
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