
भाग 1:
अर्जुन की 1 साल की नन्ही कलाई छूते ही उसकी नानी ने चीखकर हाथ पीछे खींच लिया, जैसे उस बच्चे की त्वचा ने कोई ऐसा राज खोल दिया हो जिसे सुनने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
—उसे मुझसे दूर मत करो, निष्ठा… उसे उससे दूर करो जिसने ये किया है!
निष्ठा का चेहरा सफेद पड़ गया। वह अपने बेटे अर्जुन को पहली बार अपनी माँ सावित्री देवी के घर लेकर आई थी। शादी के बाद से वह गुरुग्राम की एक सोसाइटी में रहती थी, और उसकी माँ पुरानी दिल्ली के एक छोटे लेकिन साफ-सुथरे मकान में अकेली रहती थीं। सावित्री देवी सरकारी अस्पताल में 28 साल तक बच्चों की नर्स रही थीं। उनकी आँखें बुखार, चोट, डर और माँओं की टूटी हुई आवाज़ों को पहचानना सीख चुकी थीं।
अर्जुन अभी बोल नहीं पाता था। वह बस अधखुले होंठों से आवाज़ें निकालता, कभी निष्ठा की साड़ी पकड़ता, कभी उसकी गर्दन में चेहरा छुपा लेता। लेकिन उस दिन जैसे ही सावित्री देवी ने उसके हाथ पर उँगली रखी, अर्जुन का पूरा शरीर सिकुड़ गया। उसने झटके से दोनों हाथ ऊपर कर लिए, जैसे कोई उसे खींचने वाला हो।
—माँ, आप ऐसे क्यों चिल्ला रही हैं? बच्चा डर गया!
—डर तो पहले से है इसमें, निष्ठा। तू बस आज देख पा रही है।
निष्ठा का दिल जोर से धड़का। उसने अर्जुन की कलाई देखी। पहले उसे कुछ समझ नहीं आया। गोरी, मुलायम त्वचा पर बस हल्की-हल्की सफेद रेखाएँ थीं, जैसे किसी ने बहुत पतली डोरी कसकर बाँधी हो और फिर निशान मिटने लगे हों। अंगूठे के पास छोटा सा सूखा हुआ दाग था, इतना छोटा कि निष्ठा ने कभी ध्यान ही नहीं दिया।
—ये तो शायद बिस्तर की चादर से रगड़ लग गई होगी, माँ।
सावित्री देवी ने काँपती साँस भरी।
—चादर कलाई के चारों तरफ बराबर निशान नहीं छोड़ती। और बच्चा छूते ही ऐसे नहीं सिमटता।
अर्जुन ने रोना शुरू कर दिया। उसका रोना तेज नहीं था, बल्कि थका हुआ था, जैसे उसमें आवाज़ निकालने की ताकत भी कम हो। निष्ठा ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखें भर आईं, लेकिन दिमाग अभी भी अपने घर, अपने पति रोहन और उस जीवन को बचाने में लगा था जिसे वह “ठीक” मानती आई थी।
रोहन घर से ही ऑनलाइन अकाउंटिंग का काम करता था। अर्जुन के 4 महीने के होने पर निष्ठा फिर से डेंटल क्लिनिक में नौकरी पर लौट गई थी। सबने कहा था कि वह भाग्यशाली है, पति घर पर है, बच्चा पिता के पास रहेगा, पैसे भी बचेंगे। रोहन भी यही कहता था।
—बाहर की आया पर भरोसा करोगी, या अपने पति पर?
निष्ठा ने भरोसा किया था।
शुरुआत में अर्जुन शाम को उसकी गोद में आते ही सो जाता था। रोहन कहता था कि दिन भर खेलता है, थक जाता है। फिर धीरे-धीरे अर्जुन का सोना अजीब होने लगा। कभी वह शाम 6 बजे तक गहरी नींद में पड़ा रहता, कभी उसकी आँखें भारी रहतीं, कभी बोतल आधी भरी रह जाती और रोहन कहता:
—दाँत निकल रहे हैं। बच्चे ऐसे ही चिड़चिड़े होते हैं।
निष्ठा थकी रहती थी। क्लिनिक, घर, खाना, दूध, डायपर, नींद की कमी… हर दिन एक धुंध बन गया था। जब वह कुछ पूछती, रोहन हँस देता।
—तुम हर बात में ड्रामा क्यों करती हो?
कभी वह कहता:
—तुम्हारी माँ ने ही तुम्हें इतना शक करना सिखाया है।
इसीलिए निष्ठा लगभग 1 साल तक अर्जुन को सावित्री देवी के पास नहीं ला पाई। पहले माँ की खाँसी और कमजोरी का बहाना था, फिर रोहन की नाराज़गी का डर। वह कहता रहता:
—तुम्हारी माँ बच्चा देखते ही बीमारी ढूँढेगी। घर का माहौल खराब करेगी।
अब वही माँ उसके सामने खड़ी थी, और उसकी आँखों में ऐसा भय था जिसे निष्ठा झूठ नहीं कह पा रही थी।
—निष्ठा, इसे आज ही डॉक्टर को दिखाना होगा।
—माँ, आप सीधा-सीधा क्या कह रही हैं?
—मैं कह रही हूँ कि इस बच्चे को सिर्फ प्यार नहीं मिला है। इसकी त्वचा पर पकड़ के निशान हैं। इसके शरीर में कमजोरी है। और इसकी आँखों में डर है।
निष्ठा ने अर्जुन की आँखों में देखा। वह सच में बुझा हुआ लग रहा था। वह खिलौने की तरफ हाथ नहीं बढ़ा रहा था। बस माँ की चुन्नी पकड़े था, जैसे वही उसकी आखिरी दीवार हो।
तभी निष्ठा का फोन बजा। स्क्रीन पर रोहन का नाम चमक रहा था।
“कहाँ पहुँची? माँ के घर ज्यादा देर मत रुकना। अर्जुन को दोपहर की नींद चाहिए।”
निष्ठा ने संदेश पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार।
“नींद चाहिए।”
उसके कानों में रोहन की पुरानी आवाज़ गूँज उठी:
—सोने दो। आखिर शांत तो हुआ।
सावित्री देवी ने उसकी आँखों में उतरता डर पढ़ लिया।
—बेटी, पति की इज़्ज़त बचाने से पहले बच्चे की साँस बचा।
यह वाक्य निष्ठा के भीतर किसी ताले को तोड़ गया।
—अगर मैं गलत निकली तो?
—तो मैं तुझसे माफी माँग लूँगी। लेकिन अगर मैं सही निकली और तू आज भी चुप रही, तो ये बच्चा किससे मदद माँगेगा?
अर्जुन ने अचानक फोन की आवाज़ सुनते ही अपना चेहरा दोनों हाथों से ढक लिया। उस छोटे से शरीर की वह हरकत इतनी साफ थी कि निष्ठा की रीढ़ में ठंड उतर गई। वह बच्चा अभी बोल नहीं सकता था, लेकिन उसका शरीर बोल रहा था।
निष्ठा ने काँपते हाथों से बैग उठाया।
—माँ, अस्पताल चलते हैं।
सावित्री देवी ने बिना एक पल गंवाए अपनी पुरानी शॉल कंधे पर डाली। बाहर गली में दूधवाला साइकिल से गुजर रहा था, पड़ोस की खिड़की से प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई दे रही थी, और दुनिया वैसे ही चल रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन निष्ठा की दुनिया उसी क्षण टूटने लगी थी।
कार में अर्जुन को सीट पर बैठाते हुए उसका हाथ फिर काँपा। सावित्री देवी पीछे बैठीं और उसे धीरे-धीरे थपकी देने लगीं। उन्होंने वही पुरानी लोरी गुनगुनाई जो कभी निष्ठा को सुनाती थीं। अर्जुन पहले तो सिमटा रहा, फिर धीरे से नानी की आवाज़ सुनकर उसकी रुलाई थमने लगी।
फोन फिर बजा।
रोहन का संदेश आया:
“कॉल क्यों नहीं उठा रही? बच्चे को लेकर सीधा घर आना।”
निष्ठा की आँखों में आँसू भर आए। उसने पहली बार जवाब नहीं दिया।
कुछ ही मिनट बाद दूसरा संदेश आया:
“निष्ठा, मुझे मजबूर मत करो।”
सावित्री देवी ने फोन देखा, फिर अपनी बेटी का हाथ पकड़ लिया।
—अब डरना मत। आज अगर तू डर गई, तो ये डर अर्जुन की जिंदगी बन जाएगा।
अस्पताल के रास्ते पर ट्रैफिक रुका हुआ था। हॉर्न, धूल, ऑटो की आवाज़ें, सड़क किनारे गोलगप्पे वाला, लाल बत्ती पर फूल बेचती बच्ची… सब कुछ सामान्य था। लेकिन निष्ठा की गोद में बैठा अर्जुन हर तेज आवाज़ पर काँप रहा था।
अचानक उसने अपनी नन्ही उँगली से निष्ठा का फोन धक्का देकर नीचे गिरा दिया।
निष्ठा उसे उठाने झुकी, तभी स्क्रीन पर रोहन का नया संदेश चमका:
“उसे डॉक्टर के पास ले गई तो याद रखना, घर वापस आना मुश्किल हो जाएगा।”
निष्ठा की साँस रुक गई।
सावित्री देवी ने संदेश पढ़ा। उनके चेहरे पर दुख के साथ वह पुरानी पेशेवर सख्ती लौट आई।
—अब यह सिर्फ शक नहीं रहा।
निष्ठा ने अर्जुन को और कसकर पकड़ लिया। पहली बार उसे लगा कि वह अपने पति से नहीं, किसी ऐसे आदमी से भाग रही है जो उसके घर की दीवारों के भीतर छिपा बैठा था।
और उसी क्षण अर्जुन ने अपनी कलाई नानी की तरफ बढ़ाई, जैसे वह बता रहा हो कि दर्द यहीं से शुरू हुआ था।
कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇
भाग 2:
एम्स के बाल आपातकालीन विभाग में अर्जुन की जाँच इतनी गहराई से हुई कि निष्ठा का हर बहाना टूटता चला गया। डॉक्टर ने उसकी कलाई, पीठ, पसलियों, आँखों की पुतलियाँ और मुँह के अंदर तक देखा। एक नर्स ने छोटे स्केल के साथ निशानों की तस्वीरें लीं। सावित्री देवी चुप खड़ी रहीं, लेकिन उनकी आँखों में वही दर्द था जो उन्होंने वर्षों पहले अस्पताल में घायल बच्चों को देखते हुए सीखा था। डॉक्टर ने पूछा कि बच्चा दिन में किसके साथ रहता है। निष्ठा ने धीमे से रोहन का नाम लिया। फिर खून की जाँच, एक्स-रे और टॉक्सिकोलॉजी टेस्ट लिखे गए। “टॉक्सिकोलॉजी” शब्द सुनकर निष्ठा को लगा जैसे यह किसी और की कहानी है, उसकी नहीं। 2 घंटे बाद रिपोर्ट का पहला हिस्सा आया। डॉक्टर ने बताया कि अर्जुन के शरीर में नींद लाने वाली दवा के अंश हैं, ऐसी मात्रा में जो 1 साल के बच्चे को बिना मेडिकल सलाह के कभी नहीं दी जानी चाहिए। निष्ठा ने तुरंत कहा कि उसने कभी ऐसी दवा नहीं दी। डॉक्टर ने उसकी बात पर शक नहीं किया, बस धीरे से कहा कि अब यह मामला अस्पताल की सुरक्षा टीम और पुलिस को बताया जाएगा। तभी दूसरी रिपोर्ट में पुरानी पसली की चोट दिखी, जो साधारण गिरने से मेल नहीं खाती थी। निष्ठा की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। उसके फोन पर रोहन के संदेश आते रहे: “कहाँ हो?”, “मेरी बात मानो”, “मेरे बेटे को घर लाओ।” उसने “मेरे बेटे” लिखा था, “अर्जुन कैसा है” नहीं। एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता, कविता, ने निष्ठा से पूछा कि क्या उसे घर लौटने में डर लग रहा है। निष्ठा ने अनजाने में कहा कि रोहन बहुत गुस्सा होगा। उसी जवाब ने कमरे की हवा बदल दी। सावित्री देवी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर राणा आए और उन्होंने कहा कि बच्चा अब उस घर में अकेला नहीं जाएगा। तभी सावित्री देवी को याद आया कि रोहन ने जन्म के बाद किसी को अर्जुन को छूने नहीं दिया था और उसने बाल रोग विशेषज्ञ भी बदला था। निष्ठा ने पुराने संदेश खोलकर देखा। एक फोटो में अर्जुन पालने में सो रहा था, उसकी कलाई पर कपड़े की पतली पट्टी बँधी थी। निष्ठा ने तब उसे खिलौने की डोरी समझा था। इंस्पेक्टर राणा ने फोटो देखते ही कहा कि घर की तलाशी जरूरी है, क्योंकि यह सब आज से नहीं, बहुत पहले से शुरू हुआ लगता है।
भाग 3:
निष्ठा उस शाम अपने घर पत्नी बनकर नहीं लौटी। वह माँ बनकर लौटी थी।
सावित्री देवी की कार आगे थी, पुलिस की जीप पीछे। अर्जुन निष्ठा की गोद में था। डॉक्टर ने उसे अस्थायी निगरानी के बाद जाने दिया था, लेकिन साफ निर्देश दिए थे कि वह रोहन के संपर्क में न आए। अर्जुन अब रो नहीं रहा था। वह बस खामोश था, अस्वाभाविक रूप से खामोश। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन वह किसी चीज़ पर टिकती नहीं थीं।
गुरुग्राम की वह सोसाइटी हमेशा की तरह चमक रही थी। गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने सलाम किया। पार्क में बच्चे साइकिल चला रहे थे। किसी फ्लैट से भजन की आवाज़ आ रही थी। किसी बालकनी में तुलसी पर पानी डाला जा रहा था। बाहर सब कुछ सभ्य, सुरक्षित, मध्यमवर्गीय और सम्मानित दिख रहा था। निष्ठा को उल्टी आने लगी। क्या ऐसी ही दीवारों के भीतर उसका बच्चा चुपचाप डरता रहा था?
रोहन ने दरवाजा खुलने से पहले ही खोल दिया। वह टी-शर्ट और ट्रैक पैंट में था। चेहरे पर थकान नहीं, चिढ़ थी। लेकिन जैसे ही उसने पुलिस देखी, उसकी मुस्कान गायब हो गई।
—ये तमाशा क्या है, निष्ठा?
निष्ठा ने जवाब नहीं दिया। उसने अर्जुन को और कसकर पकड़ लिया।
—बच्चा मुझे दो।
रोहन की आवाज़ आदेश जैसी थी। अर्जुन ने वही आवाज़ सुनते ही निष्ठा की साड़ी पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ इतनी कस गईं कि निष्ठा की त्वचा लाल हो गई।
—नहीं।
रोहन ने जैसे यह शब्द पहली बार सुना हो।
—क्या मतलब नहीं? वह मेरा बेटा है।
—वह घायल है।
—बच्चे गिरते हैं। तुम्हारी माँ ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है।
इंस्पेक्टर राणा आगे आए।
—हमें बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कुछ सवाल करने हैं। और घर में बच्चों की दवाइयाँ, बोतलें और उसकी चीज़ें देखनी होंगी।
—बिना वारंट के कुछ नहीं देखोगे।
—वारंट आ जाएगा। लेकिन तब तक बच्चा इस घर में नहीं रहेगा।
रोहन की आँखें निष्ठा पर टिक गईं। उसमें प्यार नहीं था, बस गुस्सा और पकड़े जाने का भय था।
—तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। एक बच्चे की वजह से तुमने मुझे अपराधी बना दिया?
निष्ठा का गला सूख गया। उसे याद आया कि शादी के शुरुआती महीनों में रोहन कितना ध्यान रखता था। चाय बनाना, ऑफिस छोड़ना, फोटो खींचना, हर रिश्तेदार के सामने कहना कि वह “परफेक्ट पति” है। फिर धीरे-धीरे उसने निष्ठा को दोस्तों से दूर किया। खर्चों पर सवाल किए। माँ के घर जाने पर ताने मारे। हर थकान को “नाटक” कहा। हर शक को “माँ की ट्रेनिंग” कहा।
उसने कभी निष्ठा को मारा नहीं था, और इसी वजह से निष्ठा लंबे समय तक हिंसा को पहचान नहीं पाई।
—मुझे सिर्फ अर्जुन का सामान लेना है।
—कुछ नहीं ले जाओगी।
इंस्पेक्टर राणा ने रोहन को पीछे रहने को कहा। सावित्री देवी दरवाजे के पास खड़ी रहीं। निष्ठा बच्चे के कमरे में गई। वही कमरा जिसके लिए उसने नीले बादल वाले वॉलपेपर चुने थे। वही लकड़ी का पालना, वही खिलौने, वही छोटी अलमारी। उसे लगा जैसे कमरे की हर चीज़ उससे पूछ रही हो कि वह इतने दिनों तक अंधी कैसे रही।
उसने डायपर, कपड़े, दूध की बोतल, अर्जुन की छोटी कंबल और कुछ रिपोर्ट फाइल में रखी। तभी अलमारी के निचले हिस्से में एक प्लास्टिक का डिब्बा दिखाई दिया, जो पुराने कपड़ों के पीछे छिपा था। निष्ठा ने उसे खींचा। ढक्कन खोलते ही उसकी उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
अंदर कपड़े की 3 पतली पट्टियाँ थीं। एक छोटी प्लास्टिक की बोतल लगभग खाली थी। दूसरी आधी भरी हुई। दोनों पर नींद लाने वाले एंटीहिस्टामिन का नाम था। एक ड्रॉपर चिपचिपे अवशेषों से भरा था। साथ में एक छोटा नोट भी था जिस पर रोहन की लिखावट में समय लिखा था: “12:30, 3 बूंद। 4:00, सोया।”
निष्ठा के मुँह से चीख निकल गई।
—इंस्पेक्टर साहब!
रोहन दौड़कर आया।
—मेरी चीज़ों को हाथ मत लगाओ!
उसकी आवाज़ अब पूरी तरह बदल चुकी थी। उसमें कोई अभिनय नहीं बचा था। इंस्पेक्टर राणा ने उसे पीछे किया।
—ये बच्चे की अलमारी में क्या कर रहा है?
—आप लोग समझ नहीं रहे। वह बहुत रोता था। निष्ठा घर पर रहती नहीं। मैं अकेला क्या करता?
निष्ठा ने अर्जुन को सावित्री देवी की गोद में दिया और रोहन के सामने खड़ी हो गई।
—तुमने मेरे बच्चे को बाँधा?
रोहन ने पहले चुप्पी साधी। फिर हँसा, जैसे बात छोटी हो।
—हल्का सा पकड़कर रखता था। हर कोई करता है। वरना वह हाथ-पैर मारता था।
—तुमने उसे दवा दी?
—तुम्हें पता है 1 बच्चे को संभालना कितना मुश्किल है? तुम तो नौकरी पर चली जाती थीं। क्लिनिक में मुस्कुराती रहती थीं। मैं यहाँ उसके चिल्लाने से पागल हो जाता था।
—वह 1 साल का बच्चा था, रोहन। वह तुम्हारा दुश्मन नहीं था।
रोहन का चेहरा तमतमा गया।
—तुम्हारे लिए वही सब कुछ हो गया था। उसके बाद मैं क्या था? नौकर? दूध बनाओ, कपड़े बदलो, घर संभालो, और ऊपर से तुम्हारी माँ की सलाह सुनो?
सावित्री देवी ने पहली बार तेज आवाज़ में कहा:
—बाप होने का मतलब बच्चा चुप कराने के लिए उसे बेहोश करना नहीं होता।
रोहन ने उन्हें घूरा।
—आपने ही सब बिगाड़ा है। अगर आप बीच में न आतीं तो सब ठीक था।
—ठीक? —निष्ठा की आवाज़ टूट गई— तुम्हारे लिए ठीक का मतलब था मेरा बच्चा बोल न सके, रो न सके, हिल न सके?
रोहन ने आगे बढ़ने की कोशिश की। इंस्पेक्टर राणा ने तुरंत रोक लिया। रोहन ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, फिर अचानक गुस्से में बोला:
—हाँ, देता था दवा! क्योंकि वह चुप हो जाता था! तुम लोग क्या जानो दिन भर का सिरदर्द?
कमरे में कुछ सेकंड के लिए ऐसी चुप्पी छा गई जैसे हवा भी रुक गई हो।
यह स्वीकारोक्ति थी। यह बहाना नहीं था। यह सच का नंगा चेहरा था।
इंस्पेक्टर राणा ने उसे दीवार की तरफ घुमाया और हथकड़ी लगा दी। रोहन चिल्लाता रहा।
—निष्ठा, तुम पछताओगी! मैं तुम्हें कोर्ट में घसीटूँगा! कोई तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेगा!
लेकिन इस बार उसके शब्द निष्ठा के भीतर नहीं उतरे। पहली बार वह उसे सुन रही थी, मान नहीं रही थी।
बाहर पड़ोसी जमा हो गए थे। वही लोग जो रोहन को “बहुत जिम्मेदार पिता” कहते थे। वही आंटी जो अक्सर कहती थीं कि निष्ठा को इतना अच्छा पति मिला है। उनमें से किसी ने धीमे से कहा:
—लगता तो बहुत शांत लड़का था।
निष्ठा ने वह वाक्य सुना और उसके अंदर कुछ और टूट गया। क्योंकि रोहन सचमुच शांत दिखता था। सभ्य दिखता था। पढ़ा-लिखा दिखता था। अच्छे परिवार का दिखता था। और शायद यही सबसे खतरनाक था।
उस रात निष्ठा और अर्जुन सावित्री देवी के घर रहे। पुलिस ने दवाइयाँ, पट्टियाँ, नोट और फोन रिकॉर्ड जब्त किए। अस्पताल की सामाजिक कार्यकर्ता कविता ने महिला संरक्षण सेल से संपर्क कराया। अर्जुन के लिए मेडिकल फॉलोअप और बाल मनोवैज्ञानिक की सलाह तय हुई।
सावित्री देवी ने अपने कमरे में अर्जुन और निष्ठा के लिए जगह बनाई। उन्होंने पुरानी सूती चादर बिछाई, हल्की रोशनी छोड़ी और रसोई में खिचड़ी बनाई। निष्ठा ने कुछ नहीं खाया। वह बस अर्जुन की कलाई देखती रही। वे निशान बहुत हल्के थे, पर अब उसे वे आग की लकीरों जैसे दिख रहे थे।
अर्जुन नींद में भी चौंक रहा था। दरवाजा बंद होने की आवाज़ पर उसका शरीर सिमट जाता। कोई हाथ पास आता तो वह पहले बचने की कोशिश करता, फिर धीरे-धीरे पहचानकर ढीला पड़ता। सावित्री देवी ने उसे जब गोद में लिया तो वह पहले डर गया, फिर उनकी लोरी सुनकर रोते-रोते सो गया।
निष्ठा पूरी रात जागती रही।
उसके दिमाग में पुरानी बातें लौटती रहीं। रोहन का कहना कि बच्चा बहुत रोता है। उसका बोतल पहले से बनाकर रखना। वीडियो कॉल पर अर्जुन को हमेशा सोता हुआ दिखाना। डॉक्टर की अपॉइंटमेंट टाल देना। पुरानी बाल रोग विशेषज्ञ को “डराने वाली” कहना। निष्ठा को माँ के घर न जाने देना।
सुबह रोहन की माँ का फोन आया। आवाज़ में चिंता नहीं, आरोप था।
—तुमने मेरे बेटे की जिंदगी बर्बाद कर दी।
निष्ठा कुछ पल चुप रही।
—आपके बेटे ने मेरे बच्चे को दवा दी और बाँधा।
—अरे, बच्चे बहुत रुलाते हैं। आदमी परेशान हो जाता है। तुम भी तो माँ हो, समझो।
—माँ होने का मतलब यही समझना है कि परेशान होकर भी बच्चे को चोट नहीं पहुँचाई जाती।
—रोहन बचपन से ही रोने की आवाज़ सहन नहीं कर पाता था।
निष्ठा की पकड़ फोन पर कस गई।
—तो आपने यह बात मुझसे शादी से पहले क्यों नहीं कही?
उधर चुप्पी छा गई।
वही चुप्पी निष्ठा को सारी सच्चाई बता गई। यह सिर्फ रोहन की क्रूरता नहीं थी। यह वह परिवार भी था जिसने उसकी कमजोरी, उसका गुस्सा, उसकी असहिष्णुता छिपाई थी। क्योंकि समाज में बेटा “थोड़ा चिड़चिड़ा” हो सकता है, लेकिन बहू को सब सहन करना चाहिए।
अगले कुछ दिनों में मामला और गहरा गया। पुलिस ने रोहन का लैपटॉप खंगाला। उसमें बच्चों को सुलाने की अवैध खुराकों पर खोजें मिलीं। कुछ फोरम खुले थे जहाँ लोग खतरनाक “ट्रिक” साझा कर रहे थे। एक चैट में उसने अपने दोस्त को लिखा था: “ये बच्चा मेरी जिंदगी खा गया है।” दोस्त ने हँसता हुआ इमोजी भेजकर लिखा था: “कुछ दे दिया कर, सीधा सोएगा।” रोहन ने जवाब दिया था: “तरीका मिल गया।”
निष्ठा ने वह चैट पढ़ी तो उसका शरीर सुन्न पड़ गया। अर्जुन के हर गहरे सोने की तस्वीर अब उसे अपराध जैसी लगने लगी। उसे याद आया कैसे वह क्लिनिक से लौटकर कहती थी कि आज बेटा कितना शांत है, और रोहन गर्व से मुस्कुराता था।
जाँच में यह भी सामने आया कि रोहन ने 2 बार अर्जुन की डॉक्टर अपॉइंटमेंट खुद रद्द की थी। उसने निष्ठा से झूठ कहा था कि डॉक्टर ने तारीख बदली है। एक पड़ोसी ने बयान दिया कि कई बार दोपहर में बच्चे के रोने की आवाज़ अचानक बंद हो जाती थी। उस वक्त किसी ने ध्यान नहीं दिया। सबने सोचा पिता संभाल रहा होगा।
परिवार अदालत में पहली सुनवाई के दिन रोहन सफेद शर्ट पहनकर आया। बाल करीने से सँवारे हुए, चेहरा दुखी बनाने की कोशिश में। उसके वकील ने कहा कि यह “थके हुए पिता की गलती” थी, “पालन-पोषण का दबाव” था, “वैवाहिक तनाव” था।
निष्ठा ने सिर झुका लिया। उसके हाथ काँप रहे थे। फिर जज ने मेडिकल फोटो देखने को कहा। अर्जुन की कलाई के निशान, पसली की रिपोर्ट, दवा के अंश, बरामद पट्टियाँ और रोहन की चैट सामने आईं।
कमरे का माहौल बदल गया।
कोई भी अब इसे सिर्फ “गलती” नहीं कह पा रहा था।
सावित्री देवी ने गवाही दी। उनकी आवाज़ स्थिर थी।
—मैंने 28 साल बच्चों के बीच काम किया है। बच्चे की कलाई पर निशान थे, लेकिन उससे बड़ा निशान उसके डर में था। वह बोल नहीं सकता था, मगर उसका शरीर मदद माँग रहा था।
निष्ठा रो पड़ी।
जज ने अर्जुन की सुरक्षा को प्राथमिक मानते हुए रोहन को बच्चे से दूर रखने का आदेश जारी रखा। आपराधिक प्रक्रिया अलग चलनी थी। निष्ठा को अस्थायी संरक्षकता मिली। रोहन ने बाहर निकलते समय उसे घूरा, लेकिन इस बार निष्ठा ने आँखें नहीं झुकाईं।
कोर्ट से बाहर सावित्री देवी अर्जुन को गोद में लिए खड़ी थीं। अर्जुन उनकी चूड़ियों से खेल रहा था। अचानक वह हँसा। बहुत हल्की, छोटी सी हँसी। मगर निष्ठा के लिए वह किसी मंदिर की घंटी जैसी थी। इतने दिनों बाद उसे लगा कि उसका बच्चा अभी पूरी तरह टूटा नहीं है।
आने वाले महीने आसान नहीं थे। अर्जुन को डॉक्टर के पास बार-बार ले जाना पड़ता। जब भी कोई दवा की बोतल दिखती, वह रोने लगता। कोई उसकी कलाई पकड़ता तो वह झटके से हाथ छुपा लेता। रात में वह अचानक जागकर चीखता। निष्ठा उसे सीने से लगाकर बैठी रहती, जब तक उसका शरीर ढीला न पड़ जाए।
निष्ठा भी थेरेपी में गई। वहाँ उसने पहली बार सीखा कि हिंसा सिर्फ थप्पड़ नहीं होती। पैसे पर नियंत्रण, परिवार से दूरी, डराकर चुप कराना, हर शक को पागलपन कहना, हर सवाल को ड्रामा कहना—ये सब भी हिंसा के चेहरे हैं। उसने सीखा कि थकी हुई माँ गलती कर सकती है, लेकिन अपराधी वह नहीं जो धोखा खा गई, अपराधी वह है जिसने बच्चे को चोट पहुँचाई।
सावित्री देवी ने घर का एक कमरा अर्जुन के लिए बदल दिया। दीवार पर हाथी और पतंगों के स्टिकर लगाए। खिलौने खुले रखे। कोई चीज़ उसकी कलाई से नहीं बाँधी गई। धीरे-धीरे अर्जुन ने चीज़ें पकड़ना शुरू किया। पहले उसने नानी की उँगली पकड़ी। फिर माँ का दुपट्टा। फिर पार्क में एक छोटे बच्चे की गेंद।
हर छोटी हरकत निष्ठा के लिए जीत थी।
1 साल बाद अर्जुन का 2 जन्मदिन आया। कोई बड़ी पार्टी नहीं हुई। बस सावित्री देवी का घर, कुछ भरोसेमंद लोग, सूजी का हलवा, पूड़ी, आलू की सब्जी और छोटा सा केक। केक पर कोई महँगी सजावट नहीं थी, बस एक छोटी नीली कार बनी थी क्योंकि अर्जुन को अब खिलौना कारें पसंद आने लगी थीं।
सावित्री देवी ने उसे गोद में उठाकर मोमबत्ती के पास किया। अर्जुन ने पहले लौ को देखा, फिर हँसकर ताली बजाई। निष्ठा की आँखें भर आईं। उसने सोचा, यही बच्चा कभी आवाज़ से काँप जाता था। आज वह तालियाँ बजा रहा है।
सावित्री देवी ने धीमे से कहा:
—उस दिन तू उसे मेरे पास ले आई, यही उसकी सबसे बड़ी रक्षा थी।
निष्ठा ने सिर हिलाया।
—मैं लगभग नहीं लाती, माँ। रोहन ने मना किया था।
—लेकिन तू आई। और कभी-कभी माँ होना इसी 1 फैसले से शुरू होता है।
निष्ठा ने अर्जुन की कलाई देखी। निशान जा चुके थे। त्वचा फिर से मुलायम थी। लेकिन याद अभी भी थी। वह याद दर्द देती थी, पर उसी ने उसे मजबूत भी बनाया।
उस रात के बाद निष्ठा ने अपने जीवन के कई दरवाजे बंद कर दिए। रोहन के पक्ष में बोलने वाले रिश्तेदार, उसे “घर बचाने” की सलाह देने वाले लोग, यह कहने वाले कि बच्चे पिता के बिना अधूरे होते हैं—सबसे दूरी बना ली। उसने सीखा कि बच्चा पिता के बिना बड़ा हो सकता है, लेकिन डर के साथ नहीं।
समय के साथ अर्जुन बोलना सीखने लगा। उसके पहले साफ शब्दों में “माँ” था, फिर “नानी”। एक दिन उसने अपने छोटे हाथ से सावित्री देवी के गाल को छुआ और बोला:
—ना…नी।
सावित्री देवी वहीं रो पड़ीं। निष्ठा ने उन्हें गले लगा लिया। उस स्पर्श में वह भय नहीं था जो पहले दिन था। उसमें भरोसा था।
और यही उनका सच बन गया।
एक घर टूट गया, लेकिन एक बच्चा बच गया।
एक शादी खत्म हुई, लेकिन एक माँ जाग गई।
एक नानी ने सिर्फ कलाई के निशान नहीं देखे, उसने उस चुप चीख को सुन लिया जिसे दुनिया अक्सर “बच्चे का नखरा” कहकर अनसुना कर देती है।
निष्ठा बाद में अक्सर सोचती थी कि खतरा हमेशा दहाड़ता हुआ नहीं आता। कभी वह अच्छे पति की मुस्कान में आता है। कभी वह जिम्मेदार पिता की तस्वीरों में छिपा होता है। कभी वह कहता है, “मैं मदद कर रहा हूँ।” और कभी वह माँ को ही यकीन दिला देता है कि उसका डर बेवकूफी है।
लेकिन एक बच्चा जो बोल नहीं सकता, वह भी सच बताता है।
थकी हुई आँखों से।
बहुत गहरी नींद से।
छूते ही सिमट जाने से।
कलाई छुपा लेने से।
और उस रोने से जिसे कोई “जिद” कह देता है।
निष्ठा अब हर माँ से यही कहती है कि शक शर्म की बात नहीं, चेतावनी हो सकता है। सवाल पूछना घर तोड़ना नहीं, कभी-कभी जान बचाना होता है। और अगर बच्चे का शरीर किसी इंसान से डरता है, तो उस डर को संस्कार, अनुशासन या नाटक कहकर दबाना नहीं चाहिए।
क्योंकि सबसे बड़ी अंधी माँ वह नहीं जो देर से देखती है।
सबसे बड़ी अंधी माँ वह है जो देख लेने के बाद भी चुप रहती है, ताकि घर की इज़्ज़त बची रहे।
निष्ठा ने देर से देखा, लेकिन फिर चुप नहीं रही। और इसी वजह से अर्जुन की हँसी फिर लौट आई।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.