
भाग 1
अर्जुन शर्मा की कलाई पर बना टूटा हुआ कंपास 9 साल पुरानी नशे में की गई एक गलती थी, लेकिन उसी निशान ने उस दिन उसकी शांत जिंदगी को चीरकर रख दिया, जब 3 एक जैसी बच्चियाँ महंगे ऊनी कोट पहने उसके सामने आकर खड़ी हो गईं और बोलीं — हमारी माँ के शरीर पर भी यही निशान है।
मुंबई की उस दोपहर में हवा भारी थी। शिवाजी पार्क के एक कोने में बच्चों की हँसी, ट्रैफिक का शोर और भेलपुरी वाले की आवाजें आपस में घुल रही थीं। अर्जुन लकड़ी की पुरानी बेंच पर बैठा था, हाथ में सस्ती चाय का कागज़ी कप था और आँखें अपने 6 साल के बेटे कबीर पर टिकी थीं, जो रेत में प्लास्टिक का ट्रक गाड़कर उसे “समुद्री जहाज” बना रहा था।
अर्जुन फर्नीचर ठीक करने वाला कारीगर था। अमीर घरों की टूटी हुई कुर्सियाँ, विरासत में मिले पलंग, पुराने झूले और दहेज के संदूक ठीक करते-करते उसके हाथ हमेशा खुरदरे रहते थे। लकड़ी की धूल उसकी उंगलियों में ऐसे बस गई थी जैसे गरीबी उसके जीवन में। वह चेंबूर की एक पुरानी इमारत में रहता था, नीचे ड्राई क्लीनिंग की दुकान थी और ऊपर उसका छोटा-सा किराए का घर।
उस दिन उसने अपनी कमीज़ की बाँहें मोड़ रखी थीं। बाईं बाँह पर काला, टेढ़ा-मेढ़ा कंपास बना था, जिसके ऊपर का उत्तर तारा अधूरा था। यह कोई फैशन वाला निशान नहीं था। वह निशान उसने खुद कागज़ पर बनाया था, 9 साल पहले गोवा की बारिश भरी रात में, एक अजनबी लड़की के साथ, जिसने अपना नाम सिर्फ मीरा बताया था।
अर्जुन ने उस याद को बरसों पहले दफना दिया था।
लेकिन वे 3 बच्चियाँ उस दफन कब्र पर जैसे नंगे पाँव चलती हुई आ गईं।
तीनों की उम्र लगभग 8 साल लग रही थी। तीनों ने गहरे नीले कोट पहने थे, सफेद मोज़े, चमकते जूते और बाल एक जैसी छोटी कटिंग में थे। वे बाकी बच्चों जैसी नहीं लग रही थीं। उनमें अजीब-सी गंभीरता थी, जैसे वे किसी बोर्डरूम से गलती से पार्क में आ गई हों।
बीच वाली बच्ची ने अर्जुन को ध्यान से देखा।
— नमस्ते, अंकल।
अर्जुन ने चौंककर सिर उठाया।
— तुम लोग खो गई हो क्या? माँ-बाप कहाँ हैं?
दाईं तरफ वाली बच्ची ने उसकी बाँह की तरफ इशारा किया।
— आपकी बाँह पर जो कंपास है, हमारी माँ के कंधे पर भी वैसा ही है।
अर्जुन के हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया। उसका गला सूख गया। उसने अपनी बाँह देखी, फिर बच्चियों के चेहरे। तीनों की आँखें धूसर थीं। वही रंग। वही ठंडी चमक। वही आँखें जो उसने 9 साल पहले एक छोटे से गोवा लॉज के कमरे में देखी थीं।
— तुम्हारी माँ का नाम क्या है? — अर्जुन की आवाज़ फट गई।
तभी दूर से एक औरत घबराई हुई दौड़ती आई।
— तारा! नैना! परी! यहाँ क्या कर रही हो?
वह उनकी आया थी। उसने अर्जुन को सिर से पाँव तक देखा, जैसे वह कोई गंदा खतरा हो। फिर बच्चियों को अपने पीछे खींच लिया।
— माफ कीजिए, इन्हें अजनबियों से बात नहीं करनी चाहिए।
— रुको, बस एक बात—
— गाड़ी इंतज़ार कर रही है। मीरा मैडम नाराज़ हो जाएँगी।
मीरा।
वह नाम अर्जुन की छाती में हथौड़े की तरह लगा।
बच्चियाँ मुड़ीं। बीच वाली ने आखिरी बार अर्जुन की बाँह देखी, फिर उसकी आँखों में। काली शीशों वाली बड़ी गाड़ी आई, दरवाज़ा खुला और वे उसमें बैठ गईं।
कबीर रेत से भरे हाथ लेकर दौड़ा आया।
— पापा, आप डर गए क्या?
अर्जुन ने बेटे के कंधे पर काँपता हाथ रखा।
— नहीं बेटा… बस घर चलते हैं।
उस रात अर्जुन ने कबीर को सुलाने के बाद अपना पुराना लैपटॉप खोला। उसने खोजा — “मीरा राठौड़ तीन बेटियाँ”।
कुछ ही पलों में स्क्रीन पर तस्वीरें खुल गईं। राठौड़ लॉजिस्टिक्स की मालिक। देश की सबसे ताकतवर महिला व्यापारियों में से एक। अरबों की कंपनी। निजी जिंदगी पर पहरा। 3 बेटियों की अकेली माँ।
और फिर एक तस्वीर में वह दिखी।
सफेद साड़ी, हीरे, कठोर चेहरा, वही धूसर आँखें।
अर्जुन की साँस अटक गई।
वह वही मीरा थी।
9 साल पहले गोवा में मिली वह लड़की, जिसने कहा था — “48 घंटे के लिए मुझे अपना नाम, घर, दुख सब भूलना है।”
अर्जुन ने अगली तस्वीर खोली। किसी चैरिटी समारोह में मीरा की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। उसके बाएँ कंधे पर वही टूटा हुआ कंपास था। ऊपर का उत्तर तारा गायब।
अर्जुन कुर्सी से पीछे हट गया।
अगर बच्चियाँ 8 साल की थीं, तो हिसाब साफ था।
तारा, नैना और परी शायद उसकी बेटियाँ थीं।
और यही सोचते ही उसके छोटे से घर की दीवारें जैसे उसके ऊपर झुक आईं।
भाग 2
अगली सुबह अर्जुन बांद्रा-कुर्ला परिसर में खड़े काले शीशे वाले राठौड़ टॉवर के सामने था। उसने अपनी सबसे साफ कमीज़ पहनी थी, लेकिन वहाँ चमकते जूतों और महंगे सूटों के बीच वह फिर भी मजदूर ही लग रहा था। रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने पूछा — क्या अपॉइंटमेंट है? अर्जुन ने सिर हिलाया। — बस ऊपर कह दो, अर्जुन आया है। लड़की ने हँसी दबाई। सुरक्षा गार्ड उसके पास आ गया। अर्जुन ने कागज़ माँगा, उस पर लिखा — “मेरे पास कंपास है।” कुछ ही मिनटों बाद रिसेप्शन वाली का चेहरा सफेद पड़ गया। — 72वीं मंजिल। मैडम मिलेंगी। मीरा राठौड़ अपने विशाल कमरे में काँच की दीवार के सामने खड़ी थी। उसके पीछे पूरा शहर छोटा लग रहा था। उसने मुड़कर अर्जुन को देखा। उसके चेहरे पर हैरानी नहीं, डर था। — कितना चाहिए? अर्जुन तिलमिला गया। — मैं पैसा माँगने नहीं आया। मैं जानना चाहता हूँ कि वे 3 बच्चियाँ मेरी बेटियाँ हैं या नहीं। मीरा का चेहरा पत्थर हो गया। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा — हाँ। वे तुम्हारी हैं। अर्जुन की आँखें भर आईं, पर मीरा की आवाज़ ठंडी रही। — 9 साल पहले हम अजनबी थे। तुमने अपना पूरा नाम नहीं बताया, मैंने अपना सच नहीं बताया। जब मुझे पता चला, मैं अकेली थी। पिता मर रहे थे, कंपनी डूब रही थी। मैंने बेटियों को जन्म दिया और अपना साम्राज्य बचाया। उन्हें किसी की जरूरत नहीं थी। — पिता की जरूरत थी, — अर्जुन ने धीमे पर कड़े स्वर में कहा। मीरा ने मेज पर हाथ मारा। — तुम उन्हें क्या दे सकते थे? किराए का घर? टूटे फर्नीचर की धूल? अदालतों में खिंचती जिंदगी? अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा। — शायद महल नहीं, मगर अपना नाम, अपना हाथ और यह सच कि वे छोड़ी नहीं गई थीं। मीरा की आँखें काँपीं, मगर वह तुरंत फिर सख्त हो गई। — आज के बाद उनसे दूर रहो। अर्जुन ने जवाब दिया — अब नहीं। उसी शाम मीरा उसके छोटे से कारखाने में आई। उसने लकड़ी की बुरादे से भरी मेज पर एक मोटा लिफाफा रखा। — 2 करोड़। एक कागज़ पर हस्ताक्षर करो और मेरी बेटियों से कभी मत मिलना। अर्जुन ने लिफाफे को देखा, फिर उसे उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया। मीरा पहली बार सचमुच टूटती हुई दिखी।
भाग 3
मीरा लंबे समय तक उस कूड़ेदान को देखती रही, जैसे उसमें सिर्फ 2 करोड़ का चेक नहीं, उसकी पूरी सोच फेंक दी गई हो। वह औरत जिसने बड़े-बड़े कारोबारियों को मिनटों में चुप करा दिया था, उस दिन एक छोटे से कारखाने में खड़ी थी, जहाँ छत टपकती थी, दीवारों पर बच्चों की ड्रॉइंग लगी थीं और हवा में लकड़ी, गोंद और पसीने की गंध थी। फिर भी पहली बार उसे लगा कि यह जगह उसके काँच के महल से ज्यादा सच्ची है।
— तुम समझते नहीं, अर्जुन, — उसने धीमे स्वर में कहा। — मेरे दुश्मन हैं। व्यापार में, परिवार में, मीडिया में। मेरे पिता के बाद सबने मुझे गिराने की कोशिश की। जब बेटियाँ पैदा हुईं, मेरे अपने चाचा ने कहा था कि बिना पिता की 3 लड़कियाँ राठौड़ नाम पर बोझ बनेंगी। मैंने उन्हें बचाने के लिए दीवारें खड़ी कीं।
— दीवारें बचाती हैं, मीरा, — अर्जुन ने कहा, — लेकिन कभी-कभी बच्चे उसी में कैद हो जाते हैं।
मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, थकान थी। वह थकान जिसे शायद वह सालों से मेकअप, गहनों और आदेशों के पीछे छिपाती रही थी।
— वे बहुत तेज हैं, — मीरा ने फुसफुसाकर कहा। — तारा हर चीज़ पर सवाल करती है। नैना मेरी कंपनी की रिपोर्ट पढ़ती है। परी रात में जागकर पूछती है कि हमारे घर में पिता की तस्वीर क्यों नहीं है। मैंने हर बार कहा कि कुछ रिश्ते किस्मत में नहीं होते।
अर्जुन की आँखें भर आईं।
— और अब?
मीरा ने जवाब नहीं दिया। वह मुड़ी, कार में बैठी और चली गई।
उस रात अर्जुन देर तक सो नहीं पाया। कबीर उसके पास आकर लेट गया।
— पापा, अगर वो मेरी बहनें हैं तो क्या वे मेरे खिलौने तोड़ेंगी?
अर्जुन अनजाने में मुस्कुरा दिया।
— शायद नहीं। शायद वे पहले उनका हिसाब लगाएंगी।
— तो मैं उन्हें अपना लाल ट्रक नहीं दूँगा।
अर्जुन ने कबीर के बाल सहलाए, मगर उसके दिल में तूफान था। उसे डर था कि मीरा फिर कभी फोन नहीं करेगी। वह अदालत भी जा सकता था, पर उसके पास पैसे नहीं थे। वह शोर भी कर सकता था, पर बेटियों की जिंदगी तमाशा बन जाती। वह सिर्फ इंतज़ार कर सकता था, और यही सबसे कठिन था।
3 दिन बाद शाम को उसके फोन पर अनजान नंबर आया।
— रविवार सुबह 10 बजे, रानी बाग के पुराने काँचघर में, — मीरा की आवाज़ थी। — 1 घंटा। कोई वकील नहीं। कोई कैमरा नहीं। कोई वादा नहीं।
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
— मैं आऊँगा।
रविवार को वह बहुत जल्दी पहुँच गया। उसने अपनी सबसे साफ कुर्ता-कमीज पहनी, जूते पॉलिश किए और हाथों को साबुन से इतना रगड़ा कि त्वचा लाल हो गई। फिर भी नाखूनों में लकड़ी की महीन धूल रह गई। वह उसे छिपा नहीं पाया। शायद छिपाना चाहता भी नहीं था।
कबीर उसके साथ था। उसने रास्ते भर पूछा कि 3 बहनें साथ आएँगी तो क्या उसे 3 बार नमस्ते करना पड़ेगा। अर्जुन ने कहा — हाँ, और अगर वे जवाब न दें तो भी करना।
रानी बाग का पुराना काँचघर नम मिट्टी, पत्तों और फूलों की खुशबू से भरा था। अंदर धूप काँच से छनकर पौधों पर गिर रही थी। पानी की पतली धारा की आवाज़ आ रही थी। अर्जुन एक पत्थर की बेंच के पास खड़ा था, हाथ जेब में, दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि उसे लगा मीरा दूर से सुन लेगी।
फिर कदमों की आवाज़ आई।
मीरा हल्के क्रीम रंग के सलवार-कुर्ते में थी। उस पर कोई भारी गहना नहीं था। पहली बार वह कमांड देती हुई मालिक नहीं, 3 बेटियों की माँ लग रही थी। उसके पीछे तारा, नैना और परी थीं। तीनों ने एक जैसी पीली कुर्तियाँ और नीली जींस पहनी थी। शायद casual दिखाने की कोशिश की गई थी, पर उनकी चाल अब भी बहुत सीधी और अनुशासित थी।
कबीर ने धीरे से अर्जुन की उंगली पकड़ी।
मीरा ने गहरी साँस ली।
— लड़कियों, ये अर्जुन हैं। और ये उनका बेटा कबीर है।
तारा ने तुरंत अर्जुन की बाँह देखी। अर्जुन ने जानबूझकर बाँहें मोड़ रखी थीं। टूटा कंपास साफ दिख रहा था।
— आपने पैसे नहीं लिए? — तारा ने पूछा।
अर्जुन का दिल धक से रह गया। उसने मीरा की तरफ देखा। मीरा ने शर्मिंदा होकर नजरें झुका लीं।
— तुम लोगों ने सुन लिया?
नैना ने शांत स्वर में कहा — घर में जो बातें धीमे कही जाती हैं, वे ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।
कबीर ने नैना को हैरानी से देखा।
— तुम बहुत अजीब बात करती हो।
परी ने पहली बार हल्की-सी मुस्कान दी।
अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया ताकि उसकी आँखें बच्चियों की आँखों के बराबर हों। वह उन्हें छूना चाहता था, मगर उसने हाथ अपने पास रखे। उसे डर था कि कहीं वे पीछे न हट जाएँ।
— नहीं, मैंने पैसे नहीं लिए, — उसने कहा। — क्योंकि कुछ रिश्ते खरीदे या बेचे नहीं जाते।
— पर अगर आपको पैसों की जरूरत हो तो? — नैना ने पूछा। — 2 करोड़ से बहुत कुछ बदला जा सकता है।
— हाँ, — अर्जुन ने स्वीकार किया। — मेरा किराया चुक सकता था। कबीर का इलाज हो सकता था। मैं बड़ा घर ले सकता था। लेकिन अगर मैं वह पैसा लेता, तो मुझे हर सुबह शीशे में खुद को देखना पड़ता। और मुझे पता होता कि मैंने 3 बच्चियों से अपना नाम छिपाने की कीमत ले ली।
तारा की आँखें थोड़ी नरम हुईं, पर वह अभी भी सावधान थी।
— क्या आप हमारे पिता हैं?
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
अर्जुन ने झूठ नहीं बोला।
— हाँ। मुझे अभी कुछ दिन पहले पता चला, लेकिन सच यही है।
तीनों बच्चियाँ चुप रहीं। हवा में पत्तों की हल्की सरसराहट थी। कबीर ने इस भारी चुप्पी को बिल्कुल नहीं समझा।
— मैं तुम्हारा भाई हूँ, शायद आधा, लेकिन मेरे पास पूरा ट्रक है। लाल वाला। पर कोई उसे पानी में नहीं डालेगा।
परी ने पूछा — तुम हमेशा ऐसे बोलते हो?
कबीर ने गर्व से कहा — हाँ।
अर्जुन ने अपनी जेब से 3 छोटे कपड़े के पोटले निकाले। उसने उन्हें खोला। अंदर 3 गोल लकड़ी के लॉकेट थे। हर एक पर हाथ से कंपास तराशा गया था। लेकिन यह कंपास अधूरा नहीं था। उसके ऊपर उत्तर तारा पूरा बना था।
— ये मैंने तुम्हारे लिए बनाए हैं, — अर्जुन ने कहा। — चेरी की लकड़ी से। जिस दिन तुम्हारी माँ मेरे कारखाने आई थी, उसी दिन मैं इसी लकड़ी पर काम कर रहा था। मेरे हाथ में पैसे का लिफाफा था, पर दिमाग में तुम 3 थीं। इसलिए मैंने सोचा, अगर कभी मिलो तो तुम्हें टूटा हुआ निशान नहीं, पूरा रास्ता दूँगा।
परी सबसे पहले आगे आई। उसने एक लॉकेट उठाया और उसे सूँघा।
— इसमें धुएँ जैसी खुशबू है।
— लकड़ी की, — अर्जुन ने कहा। — जब उसे घिसते हैं तो ऐसी महक आती है।
कबीर तुरंत बोला — पापा हमेशा ऐसे ही महकते हैं। कभी-कभी गोंद जैसे भी।
तारा ने दूसरा लॉकेट लिया। उसने बहुत सावधानी से उस पर उंगली फेरी।
— अगर आप हमारे पिता हैं, तो आप पहले कहाँ थे?
यह सवाल अर्जुन के दिल पर चाकू की तरह लगा। वह बच सकता था, मीरा पर दोष डाल सकता था, हालात को गाली दे सकता था। लेकिन सामने बच्चियाँ थीं, अदालत नहीं।
— मुझे पता नहीं था, — उसने धीरे से कहा। — और यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा खालीपन रहेगा। अगर मुझे पता होता, तो मैं आता। चाहे कितना भी गरीब होता, चाहे कोई मुझे दरवाजे से बाहर कर देता, मैं फिर भी आता।
मीरा की आँखों से आँसू गिर पड़े। उसने जल्दी से चेहरा मोड़ा, मगर बच्चियों ने देख लिया।
नैना ने तीसरा लॉकेट उठाया।
— मम्मा ने कहा था कि पिता न होना कमजोरी नहीं है।
अर्जुन ने सिर हिलाया।
— तुम्हारी मम्मा सही थीं। पिता न होना कमजोरी नहीं है। लेकिन सच छिपाना दर्द बन जाता है।
मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा —
— मैंने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। शायद खुद को बचाने के लिए भी। मुझे डर था कि कोई तुम्हें मुझसे छीन लेगा। मुझे डर था कि अर्जुन पैसे माँगेगा। मुझे डर था कि मेरा परिवार तुम्हें उसके खिलाफ कर देगा। मैंने सोचा, अगर मैं सब पर नियंत्रण रखूँगी तो कोई चोट नहीं लगेगी।
तारा ने पहली बार अपनी माँ का हाथ पकड़ा।
— लेकिन चोट लगी।
मीरा बैठ गई। वह उसी पत्थर की बेंच पर बैठी जहाँ अर्जुन खड़ा था। उसका चेहरा टूट चुका था।
— हाँ, — उसने स्वीकार किया। — लगी।
अर्जुन ने दूरी बनाए रखी। वह जानता था कि एक मुलाकात से 9 साल वापस नहीं आते। एक लकड़ी का लॉकेट पिता का अधिकार नहीं बन जाता। एक आँसू से मीरा के डर खत्म नहीं हो जाते। यह कोई फिल्मी पल नहीं था जहाँ सब गले लगकर पुराने पाप धो देते। यह शुरुआत थी, और शुरुआत हमेशा असहज होती है।
कबीर ने अचानक दूर तालाब की ओर इशारा किया।
— वहाँ मेंढक है! बहुत मोटा!
तीनों बच्चियों ने एक साथ उसकी ओर देखा।
— असली? — परी ने पूछा।
— हाँ। अगर तुम धीरे चलोगी तो भागेगा नहीं।
तारा ने माँ की तरफ देखा। मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया। तीनों बच्चियाँ कबीर के पीछे-पीछे चलीं। पहले सावधानी से, फिर थोड़ा तेज। कबीर ने रास्ते में नियम बनाए — कोई चिल्लाएगा नहीं, कोई पत्थर नहीं मारेगा, और अगर मेंढक कूदेगा तो नैना रोएगी नहीं। नैना ने तुरंत कहा — मैं नहीं रोती। कबीर बोला — अच्छा, तो तारा रोएगी। तारा ने पहली बार सच में हँस दिया।
वह हँसी सुनकर अर्जुन का सीना भर आया।
मीरा उसे देख रही थी।
— वे कभी ऐसे नहीं हँसतीं, — उसने धीमे कहा।
— बच्चों को कभी-कभी हिसाब नहीं, मिट्टी चाहिए।
मीरा ने उसकी ओर देखा।
— तुम मुझसे नफरत करते हो?
अर्जुन ने लंबी साँस ली।
— करता था। शायद अभी भी थोड़ा करता हूँ। लेकिन उससे ज्यादा दुख है। और उससे भी ज्यादा डर है कि मैं उन्हें खो दूँगा।
— मैं उन्हें तुमसे दूर नहीं रखूँगी, — मीरा ने कहा। — पर धीरे-धीरे। मुझे सीखना पड़ेगा।
— मुझे भी, — अर्जुन ने कहा। — मैं 3 बेटियों का पिता बनना नहीं जानता। मैं तो एक लड़के को भी मुश्किल से संभालता हूँ जो रेत खा सकता है।
मीरा अनचाहे मुस्कुरा दी।
— तारा तुम्हें नियमों की सूची दे देगी।
— और नैना शायद मेरे खर्चे जाँच लेगी।
— परी तुम्हारी लकड़ी की खुशबू याद रखेगी।
दोनों कुछ देर तक चुप रहे। उनके बीच अभी भी 9 साल की दूरी थी। अमीरी और गरीबी की खाई थी। अदालतों, कागज़ों, रिश्तेदारों, सवालों और समाज की जहरीली नजरों का पहाड़ था। मगर दूर तालाब के पास कबीर 3 लड़कियों को झुककर कुछ दिखा रहा था। तारा ने अपना लॉकेट गर्दन में पहन लिया था। नैना उसे रोशनी में घुमा रही थी। परी उसे अपनी मुट्ठी में ऐसे पकड़े थी जैसे कोई खोया हुआ टुकड़ा मिल गया हो।
मीरा ने अपनी दुपट्टे का कोना हटाया। उसके कंधे पर वही पुराना टूटा कंपास दिखा। अर्जुन ने अपनी बाँह देखी। दोनों निशान अधूरे थे। पर बच्चों के गले में लटकते 3 नए कंपास पूरे थे।
— 9 साल पहले हमने कहा था कि हम दोनों को रास्ता नहीं मालूम, — मीरा ने धीरे से कहा।
अर्जुन ने बच्चों की तरफ देखते हुए जवाब दिया —
— शायद रास्ता हमें नहीं मिलना था। शायद रास्ता उन्हें बनाना था।
कबीर अचानक चिल्लाया —
— पापा! यह मेंढक भी हमारा परिवार बन सकता है क्या?
तारा ने गंभीरता से कहा —
— कानूनी रूप से नहीं।
नैना बोली —
— जैविक रूप से असंभव।
परी हँसते-हँसते झुक गई।
अर्जुन और मीरा दोनों ने एक-दूसरे को देखा। पहली बार उनके बीच कोई आरोप नहीं था। सिर्फ थकान, पछतावा और एक बहुत नाजुक-सी उम्मीद थी।
उस दिन कोई अदालत नहीं गई। कोई समझौता कागज़ पर नहीं लिखा गया। कोई वादा ऊँची आवाज़ में नहीं किया गया। बस 4 बच्चे काँचघर की धूप में मेंढक देखते रहे, और 2 बड़े लोग चुपचाप यह समझते रहे कि टूटे हुए कंपास भी कभी-कभी घर का रास्ता दिखा देते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.