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करोड़पति पिता ने नौकरानी के बेटे को बेटी के साथ नाचते देखा, पर जब बच्ची बोली “मैं रोज अकेली रहती हूं”, उसी रात बंगले का सबसे बड़ा सच खुल गया

भाग 1

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जिस रात आरव मल्होत्रा ने अपने ही बंगले के बैठकखाने में अपनी 6 साल की बेटी तारा को नौकरानी के बेटे के साथ नाचते देखा, उसी रात उसे समझ आ गया कि करोड़ों की दौलत से उसने अपनी बच्ची को सिर्फ महंगा कमरा दिया था, बचपन नहीं।

गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड पर बने उस सफेद संगमरमर वाले बंगले में आमतौर पर शाम को सिर्फ एसी की ठंडी आवाज और दीवारों पर टंगी महंगी घड़ियों की टिक-टिक सुनाई देती थी। आरव 14 घंटे की मीटिंग, निवेशकों की बहस और बोर्डरूम के तनाव से टूटा हुआ घर लौटा था। उसके हाथ में चमड़े का ब्रीफकेस था, चेहरे पर वही थकान थी जो अमीर लोगों के पास भी छिप नहीं पाती।

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लेकिन उस रात दरवाजा खुलते ही उसे सन्नाटा नहीं मिला।

बैठकखाने के बीचोंबीच, कश्मीर के हाथ से बुने महंगे कालीन पर तारा घूम-घूमकर नाच रही थी। उसके सामने एक छोटा लड़का, फटी नहीं मगर पुरानी नीली निकर और साफ धुली सफेद कमीज में, शर्माते हुए उसके कदम मिलाने की कोशिश कर रहा था। सोफे के कोने पर मीरा बैठी थी, वही शांत और मेहनती औरत जो पिछले 10 महीनों से उसका घर संभालती थी। उसने अपनी साधारण सूती साड़ी का पल्लू कंधे पर कसकर डाला हुआ था और हाथ में पुराना हारमोनियम रखकर धीरे-धीरे धुन बजा रही थी। बगल में आरव का ड्राइवर विनोद खड़ा था, जैसे यह सब कोई चोरी नहीं, घर की रोज की खुशी हो।

आरव के हाथ से ब्रीफकेस छूटकर फर्श पर गिरा।

आवाज गूंजी तो सब रुक गए।

तारा ने जैसे ही पिता को देखा, उसका चेहरा खिल उठा। वह चीखती हुई दौड़ी।

—पापा आ गए!

आरव घुटनों के बल बैठ गया और उसे बाहों में भर लिया। उसकी बेटी की छोटी-सी देह उसके सीने से लगी तो उसे महसूस हुआ कि कितने महीनों से उसने उसे ऐसे सचमुच पकड़ा ही नहीं था।

लेकिन वही छोटा लड़का डर से जम गया। मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया। वह तुरंत खड़ी हुई, हारमोनियम लगभग गिराते हुए बोली—

—साहब, गलती हो गई। माफ कर दीजिए। मैं अभी उसे बाहर ले जाती हूं। दोबारा ऐसा नहीं होगा।

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आरव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उसकी आवाज सख्त थी, पर भीतर कुछ कांप रहा था।

—यह बच्चा कौन है?

मीरा ने सिर झुका लिया।

—मेरा बेटा है, कबीर। आज जिसे उसके पास छोड़ती हूं, वह अम्मा बीमार पड़ गईं। छुट्टी लेती तो महीने का राशन नहीं आता। मैंने इसे पीछे वाले स्टोर में चुप बैठने को कहा था, पर बेबी ने सुन लिया…

तारा ने तुरंत कबीर का हाथ पकड़ लिया।

—पापा, उसे मत भगाइए। वह मेरा दोस्त है। मैं रोज अकेली रहती हूं। मीरा आंटी गाना गाती हैं तो घर अच्छा लगता है।

“मैं रोज अकेली रहती हूं।”

ये शब्द आरव के सीने में कील की तरह धंस गए। उसने तारा के कमरे में महंगे खिलौने रखे थे, विदेशी स्कूल में दाखिला कराया था, हर जन्मदिन पर पूरा बैंक्वेट बुक किया था, मगर उसे एक दोस्त तक नहीं दिया था। उसकी पत्नी नंदिता 4 साल पहले एक चिट्ठी छोड़कर चली गई थी—वह मां बनने के लिए नहीं बनी। उस दिन से आरव ने खुद को काम में गाड़ दिया था, यह सोचकर कि पैसा ही सुरक्षा है।

उसने कबीर की तरफ देखा। वह 6 साल का ही होगा, तारा जितना। मगर उसकी आंखों में बच्चे जैसी शरारत से ज्यादा डर था।

विनोद धीरे से बोला—

—साहब, मीरा बहुत ईमानदार है। मजबूरी थी। नौकरी मत लीजिएगा।

मीरा की आंखों से आंसू गिर पड़े।

तारा ने कबीर का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

—पापा, वह खाना खाकर जाएगा ना? मैं भिंडी भी खा लूंगी, सच में।

आरव ने पहली बार अपने घर को देखा—महंगा, बड़ा, चमकदार, मगर अंदर से खाली। फिर उसने मीरा से पूछा—

—तुम्हें महीने की तनख्वाह कितनी मिलती है?

मीरा ने कांपती आवाज में कहा—

—18,000 रुपये, साहब।

आरव के चेहरे पर शर्म उतर आई।

और फिर उसने ऐसा फैसला सुनाया, जिससे मीरा, विनोद और तारा तीनों की सांस रुक गई।

भाग 2

आरव ने धीमे मगर साफ शब्दों में कहा—

—कल से तुम्हारी तनख्वाह 45,000 रुपये होगी।

मीरा जैसे पीछे हट गई।

—नहीं साहब, मैं दया नहीं चाहती।

—यह दया नहीं है, देर से समझ आई इज्जत है।

कमरे में चुप्पी फैल गई। मीरा रोते हुए बोली कि वह 2 महीने से किराया नहीं दे पाई, मकान मालिक रोज दरवाजा पीटता है, और कबीर को कई रात सिर्फ दूध पिलाकर सुलाना पड़ा। यह सुनकर तारा ने कबीर को गले लगा लिया, जैसे वह उसे अपने महंगे घर की दीवारों से बचा सकती हो।

आरव ने विनोद की तरफ देखा। उसकी आंखों में भी नमी थी। साफ था, वह बहुत दिनों से मीरा की मदद छिपकर कर रहा था।

आरव ने खिड़की से बाहर देखा। बंगले के पिछले हिस्से में बना छोटा अतिथि-घर 2 साल से खाली पड़ा था। वहां कभी कोई नहीं रहता था, सिर्फ धूल और बंद खिड़कियां थीं।

—मीरा, तुम और कबीर कल से वहीं रहोगे।

मीरा घबरा गई।

—साहब, लोग क्या कहेंगे?

आरव ने पहली बार बिना गुस्से के मुस्कुराया।

—लोगों ने मेरी बेटी का अकेलापन नहीं देखा। मैं अब उनकी बात नहीं सुनूंगा।

अगले हफ्ते कबीर और मीरा 2 पुराने बैग लेकर अतिथि-घर में आ गए। तारा पूरे दिन कबीर को बगीचे के कोने, झूला, आम का पेड़ और अपने छिपने की जगहें दिखाती रही। घर में पहली बार बच्चों की हंसी गूंजी।

धीरे-धीरे शाम का खाना साथ होने लगा। मीरा रसोई में पराठे बनाती, तारा और कबीर आटा गूंधते, और आरव दरवाजे पर खड़ा यह सब देखता रहता। एक रात तारा ने जिद की कि पापा भी रोटी बेलें। आरव ने कोशिश की तो रोटी भारत के नक्शे जैसी बन गई। मीरा हंस पड़ी। उसने उसका हाथ पकड़कर बेलन सीधा कराया। उस स्पर्श से दोनों कुछ पल के लिए चुप हो गए।

मगर उसी रात बंगले के बाहर एक कार रुकी।

नंदिता वापस आई थी।

और उसने दरवाजे पर खड़े होकर कहा—

—मेरी बेटी किसी नौकरानी के बेटे के साथ नहीं पलेगी।

भाग 3

नंदिता को देखकर तारा की हंसी उसी पल बुझ गई। वह आरव के पीछे छिप गई, जैसे किसी पुराने डर की परछाईं अचानक सामने आ गई हो। 4 साल पहले जिस औरत ने उसे बिना गले लगाए छोड़ दिया था, वही अब रेशमी साड़ी, हीरे के कंगन और चेहरे पर ठंडी अकड़ लेकर खड़ी थी।

मीरा ने तुरंत कबीर को अपने पीछे कर लिया। उसके चेहरे पर वही पुराना डर लौट आया था—गरीबी का डर, अपमान का डर, और उस दुनिया का डर जहां कुछ लोग जन्म से ही दूसरों को छोटा समझते हैं।

नंदिता ने बैठकखाने में कदम रखा और चारों तरफ देखा। बर्तन की हल्की खुशबू, बच्चों की किताबें, फर्श पर पड़ा कबीर का लकड़ी का छोटा ट्रक, तारा की रंगीन पेंसिलें—यह बंगला अब पहले जैसा होटलनुमा नहीं रहा था। यही बात उसे चुभ रही थी।

—आरव, तुम होश में हो? तुमने नौकरानी और उसके बच्चे को अपने घर के अंदर रख लिया?

आरव की आवाज शांत थी।

—अतिथि-घर में। और वे अब सिर्फ कर्मचारी नहीं हैं, हमारे जीवन का हिस्सा हैं।

नंदिता हंस पड़ी।

—हमारे? तारा मेरी बेटी है।

तारा अचानक बाहर आई। उसकी आंखों में आंसू थे, मगर आवाज में कांपता हुआ साहस था।

—जब मैं रात को रोती थी, तब मीरा आंटी आती थीं। जब स्कूल में मुझे मम्मी के बारे में पूछा जाता था, तब पापा चुप हो जाते थे और मीरा आंटी मेरे बाल सहलाती थीं। आप मेरी मम्मी नहीं हैं।

कमरा जम गया।

नंदिता का चेहरा तमतमा उठा।

—तुम्हें इस औरत ने सिखाया है?

मीरा ने हाथ जोड़ लिए।

—मैडम, बच्ची को मत डांटिए। वह जो महसूस करती है, वही कह रही है।

—तुम चुप रहो। तुम्हारी औकात—

आरव की आवाज पहली बार कड़ी हुई।

—बस। मेरे घर में किसी की औकात पैसे से तय नहीं होगी।

नंदिता ने आरव को घूरा।

—तो फिर सुन लो। मैं तारा की कस्टडी के लिए अदालत जाऊंगी। मैं साबित कर दूंगी कि तुमने अपनी बेटी को नौकरों के बीच छोड़ दिया है।

यह धमकी सिर्फ आरव को नहीं, पूरे घर को चीर गई। तारा रोते हुए भागकर मीरा से लिपट गई। कबीर ने तारा का हाथ पकड़ लिया। वह छोटा था, मगर उसकी आंखों में साफ था कि वह अपनी दोस्त को टूटते नहीं देख सकता।

अगले कई हफ्ते घर पर बादल की तरह भारी रहे। वकील आए, कागज बने, पुराने रिकॉर्ड निकाले गए। नंदिता ने समाज में बातें फैलानी शुरू कर दीं—आरव एक कामवाली के चक्कर में है, बेटी बिगड़ रही है, घर की मर्यादा खत्म हो गई है। रिश्तेदारों ने फोन किए। कुछ ने सलाह दी कि मीरा को तुरंत हटाओ, कुछ ने कहा कि बच्चे बड़े होकर शर्मिंदा होंगे। मगर आरव ने पहली बार अपनी जिंदगी में बोर्डरूम की तरह नहीं, दिल की तरह फैसला लिया।

उसने मीरा को काम से मुक्त कर दिया।

मीरा घबरा गई।

—साहब, अगर नौकरी नहीं रही तो मैं कहां जाऊंगी?

आरव ने उसके सामने एक फाइल रखी।

—तुम नौकरी से इसलिए मुक्त हो रही हो क्योंकि मैं तुम्हें बराबरी की जगह देना चाहता हूं। तुम्हें पढ़ना था ना? तुमने कहा था कि 12वीं के बाद फीस न होने से पढ़ाई छूट गई थी। मैंने तुम्हारा दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय के दूरस्थ पाठ्यक्रम में करवा दिया है। और घर? वह तुम्हारा सुरक्षित घर रहेगा, चाहे तुम मेरे जीवन में रहो या नहीं।

मीरा फूटकर रो पड़ी। इतने वर्षों में किसी ने उससे यह नहीं पूछा था कि वह क्या बनना चाहती है। सबने सिर्फ पूछा था कि वह कितना काम कर सकती है।

धीरे-धीरे आरव और मीरा के बीच का रिश्ता बदलने लगा। यह अचानक प्रेम नहीं था। यह रोज की छोटी-छोटी बातों से बना भरोसा था। सुबह चाय के समय बच्चों की स्कूल बस की चिंता। रात को तारा का बुखार। कबीर का स्कूल में दाखिला। मीरा का परीक्षा से पहले घबराना। आरव का देर रात उसे नोट्स समझाना। एक दिन जब मीरा ने पहली बार अच्छे अंकों से परीक्षा पास की, आरव ने पूरे घर में मिठाई बंटवाई। कबीर ने गर्व से कहा—

—मेरी मां सबसे होशियार है।

तारा बोली—

—और सबसे अच्छी भी।

मीरा की आंखें भर आईं।

अदालत का दिन आया तो नंदिता पूरे आत्मविश्वास के साथ पहुंची। उसने महंगे वकील रखे थे। उसने कहा कि आरव ने बेटी को भावनात्मक रूप से अस्थिर माहौल में रखा है। उसने कहा कि मीरा जैसी औरतें अमीर घरों में जगह पाने के लिए बच्चों का इस्तेमाल करती हैं। हर शब्द मीरा के चेहरे पर चोट की तरह गिर रहा था।

फिर न्यायाधीश ने तारा से अकेले में बात की।

तारा बाहर आई तो उसकी आंखें लाल थीं, मगर चेहरा साफ था।

—मैं पापा के साथ रहना चाहती हूं। मीरा आंटी ने मुझे कभी मेरी मां की जगह लेने को मजबूर नहीं किया। उन्होंने सिर्फ मुझे अकेला नहीं रहने दिया। कबीर मेरा भाई जैसा है। अगर मुझे उनसे अलग किया गया तो मैं फिर से वही पुरानी तारा हो जाऊंगी, जो पूरे दिन खिड़की से सड़क देखती रहती थी।

विनोद ने भी गवाही दी। उसने बताया कि कैसे आरव पहले रात देर से लौटता था, कैसे तारा कई बार खाली डाइनिंग टेबल पर सो जाती थी, और कैसे मीरा ने बिना किसी लालच के उस बच्ची को हंसना सिखाया। स्कूल की शिक्षिका ने कहा कि तारा अब पहले से ज्यादा खुली, खुश और आत्मविश्वासी है। डॉक्टर ने बताया कि तारा की पुरानी चिंता की समस्या काफी कम हुई है।

नंदिता से जब पूछा गया कि 4 साल में उसने बेटी से कितनी बार मिलना चाहा, तो उसके वकील भी चुप हो गए। रिकॉर्ड में सिर्फ 3 ईमेल थे—वह भी त्योहारों पर भेजे गए महंगे उपहारों की रसीदों जैसे।

अदालत ने तारा की कस्टडी आरव के पास ही रहने दी। नंदिता को सीमित मुलाकात की अनुमति मिली, वह भी तारा की इच्छा और परामर्शदाता की निगरानी में।

उस दिन अदालत से बाहर निकलते ही तारा ने मीरा को गले लगा लिया।

—आप कहीं मत जाना।

मीरा ने उसके माथे को चूमा।

—जब तक तुम चाहोगी, मैं यहीं हूं।

कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

—अंकल, आपने हमें बचा लिया।

आरव के गले में कुछ अटक गया।

—नहीं बेटा, तुम लोगों ने मुझे बचाया है।

समय बीतता गया। बंगले का अतिथि-घर अब सिर्फ रहने की जगह नहीं था, बल्कि बच्चों का दूसरा अड्डा था। शाम को तारा और कबीर साथ पढ़ते, साथ लड़ते, साथ मनाते। आरव ने कबीर को उसी स्कूल में दाखिला दिलवाया जहां तारा पढ़ती थी। पहले दिन कुछ बच्चों ने उसके पुराने जूतों पर हंसी उड़ाई, तो तारा ने पूरी कक्षा के सामने कहा—

—जो मेरे भाई का मजाक उड़ाएगा, वह मुझसे बात न करे।

कबीर ने उस दिन पहली बार उसे बहन कहा।

मीरा ने पढ़ाई पूरी करते हुए आरव की कंपनी के कर्मचारी कल्याण विभाग में सलाह देना शुरू किया। उसने आरव से पूछा कि आपके दफ्तर में चपरासी की बेटी पढ़ क्यों नहीं सकती? ड्राइवरों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति क्यों नहीं है? महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षित डे-केयर क्यों नहीं है? आरव पहले आंकड़ों में सोचता था, मीरा लोगों में सोचती थी। धीरे-धीरे कंपनी बदलने लगी। सबसे कम वेतन पाने वालों की तनख्वाह बढ़ी। कर्मचारियों के बच्चों के लिए शिक्षा-कोष बना। कार्यालय में बच्चों के लिए कमरा तैयार हुआ। लोग हैरान थे कि कठोर माने जाने वाले आरव मल्होत्रा में इतनी गर्माहट कहां से आ गई।

एक शाम बरसात हो रही थी। तारा और कबीर बरामदे में कागज की नावें चला रहे थे। विनोद रसोई से चाय लेकर आया। मीरा भीगते बगीचे को देख रही थी। आरव उसके पास खड़ा था। दोनों के बीच लंबी चुप्पी थी, मगर वह असहज नहीं थी।

आरव ने कहा—

—तुम्हारे आने से यह घर घर बना।

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

—घर तो पहले से था, साहब। दरवाजे बंद थे।

—मुझे साहब मत कहो।

वह हल्का-सा मुस्कुराई।

—तो क्या कहूं?

आरव ने पहली बार बिना डर के कहा—

—आरव।

उस दिन से उनके बीच एक नई शुरुआत हुई। समाज की बातें खत्म नहीं हुईं। कुछ लोग अब भी फुसफुसाते। कुछ रिश्तेदारों ने रिश्ता तोड़ लिया। मगर बंगले के भीतर जो सच्चाई थी, वह बाहर की आवाजों से ज्यादा मजबूत थी। आरव और मीरा ने जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने बच्चों को समय दिया, खुद को परखा, पुराने डर खोले। मीरा डरती थी कि कहीं उसका सम्मान फिर किसी दया की छाया में न दब जाए। आरव डरता था कि कहीं वह फिर किसी अपने को खो न दे। मगर हर दिन वे थोड़ा और ईमानदार हुए।

ठीक 1 साल बाद, उसी बैठकखाने में जहां आरव ने पहली बार तारा और कबीर को नाचते देखा था, उसने बच्चों को बुलाया। तारा पहले से समझ रही थी। कबीर गंभीर होकर बैठा था। मीरा की हथेलियां पसीने से भीगी थीं।

आरव ने कहा—

—मैं मीरा से शादी करना चाहता हूं। लेकिन यह फैसला सिर्फ हमारा नहीं है। यह घर तुम दोनों का भी है।

तारा उछल पड़ी।

—मुझे पता था!

कबीर ने मीरा को देखा, फिर आरव को। वह धीरे से उठा और आरव के पास जाकर बोला—

—अगर आप मेरी मां को कभी रुलाएंगे तो मैं आपसे बात नहीं करूंगा।

आरव घुटनों के बल बैठ गया।

—मैं वादा करता हूं, तुम्हारी मां की इज्जत मेरी अपनी सांस से भी ज्यादा होगी।

कबीर ने उसे गले लगा लिया।

शादी बहुत बड़ी नहीं हुई। बंगले के बगीचे में गेंदे, मोगरे और सफेद चमेली की मालाएं लगीं। मीरा ने भारी लहंगे की जगह हल्की लाल बनारसी साड़ी पहनी। तारा ने उसके दुपट्टे को बार-बार ठीक किया। कबीर ने अंगूठियों की थाली पकड़ी। विनोद की आंखें पूरे समय नम रहीं। जब आरव ने मीरा के गले में मंगलसूत्र डाला, तो तारा ने तालियां बजाते हुए कहा—

—अब सच में हमारा घर पूरा हो गया।

शादी के बाद मीरा मुख्य घर में आ गई। उसने सफाई का काम पूरी तरह छोड़ दिया और पढ़ाई जारी रखी। उसने व्यापार प्रशासन में डिग्री ली। आरव ने उसे कंपनी में कोई सजावटी पद नहीं दिया, बल्कि वह विभाग दिया जहां लोगों की जिंदगी सचमुच बदल सकती थी—मानव संसाधन। मीरा ने हर नीति में वह दर्द रखा जो उसने खुद जिया था। मातृत्व अवकाश बढ़ा। कर्मचारियों के बच्चों की फीस में मदद शुरू हुई। बीमारी में वेतन काटना बंद हुआ। कंपनी में पहली बार लोग आरव को डर से नहीं, सम्मान से देखने लगे।

कुछ महीनों बाद कबीर ने रात के खाने पर गलती से कहा—

—पापा, नमक देना।

पूरा कमरा शांत हो गया। कबीर खुद चौंक गया। वह शर्म से नीचे देखने लगा। आरव की आंखें भर आईं। उसने धीरे से नमकदानी उसकी तरफ बढ़ाई और बोला—

—लो बेटा।

उस एक शब्द ने बहुत कुछ बदल दिया। जल्दी ही आरव ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की और कबीर को गोद लिया। अदालत में जब न्यायाधीश ने घोषणा की कि कबीर अब कानूनी रूप से आरव का बेटा है, तो मीरा रो पड़ी, तारा ने कबीर को पकड़ लिया, और आरव ने मन ही मन उस दिन को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत मान लिया। उसे लगा, खून रिश्ते शुरू कर सकता है, पर निभाना प्रेम ही सिखाता है।

वर्षों बाद उनके घर में एक और रोशनी आई। मीरा गर्भवती थी। जब उसने आरव को यह खबर दी, वह कुछ पल बोल ही नहीं पाया। फिर वह हंसते-रोते उसे बाहों में भरकर घूम गया। तारा और कबीर ने बच्चे के नामों की सूची बना डाली। 9 महीनों तक पूरा घर एक मीठी प्रतीक्षा में जीता रहा।

एक बरसाती रात मीरा को अस्पताल ले जाना पड़ा। 6 घंटे की पीड़ा के बाद बच्चे की पहली रोने की आवाज कमरे में गूंजी। वह बेटा था। उन्होंने उसका नाम ईशान रखा। तारा ने उसे गोद में लेकर कहा—

—यह हमारा छोटा सूरज है।

कबीर ने तुरंत कहा—

—और मैं इसका बॉडीगार्ड हूं।

ईशान के आने के बाद बंगला फिर बदल गया। रातों की नींद टूटी, दूध की बोतलें खोईं, खिलौने सीढ़ियों पर बिखरे, दीवारों पर रंगीन हाथों के निशान बने। आरव कभी-कभी आधी रात को बच्चे को गोद में लेकर गलियारे में चलता और सोचता कि यही वह शोर है, जिससे वह कभी भागता था, और यही शोर अब उसकी सांस बन गया है।

लेकिन दुनिया फिर भी चुप नहीं रही।

जब तारा 12 साल की हुई, स्कूल में कुछ बच्चों ने कहा कि मीरा उसकी असली मां नहीं, कबीर उसका असली भाई नहीं, और उनका परिवार नकली है। तारा घर आकर कमरे में बंद हो गई। मीरा ने उसे गले लगाया तो तारा फूटकर बोली—

—क्या सच में मैं आपकी बेटी नहीं हूं?

मीरा ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

—मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया, तारा। पर मैंने तुम्हें अपनी आत्मा में रखा है। मां होना सिर्फ जन्म देना नहीं, रोज तुम्हारे टूटे हिस्सों को जोड़ना भी है।

तारा ने उसे कसकर पकड़ लिया। उस दिन उनके बीच बचा हुआ अंतिम डर भी खत्म हो गया।

अगले साल कबीर का अतीत लौट आया। उसका जैविक पिता, जिसने मीरा को गर्भावस्था में छोड़ दिया था, अचानक मिलने आया। कबीर 13 साल का था। आरव अंदर से डर गया कि कहीं वह बेटा, जिसे उसने प्रेम से पाया था, उससे दूर न चला जाए। मगर उसने कबीर से सिर्फ इतना कहा—

—फैसला तुम्हारा होगा। मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूं।

मुलाकात छोटी थी। वह आदमी बूढ़ा, पछतावे से भरा और कमजोर दिख रहा था। उसने माफी मांगी। कबीर ने शांति से सुना। फिर उसने आरव का हाथ पकड़कर कहा—

—मैं आपको माफ करता हूं, लेकिन मेरे पापा ये हैं। मुझे दूसरा पिता नहीं चाहिए।

आरव उस दिन घर लौटकर देर तक अकेले रोया। यह दुख का रोना नहीं था। यह उस प्रेम का भार था, जिसे शब्द कभी पूरा नहीं उठा पाते।

साल नदी की तरह बहते गए। तारा डॉक्टर बनी, बच्चों का इलाज करने वाली। कबीर ने सिविल इंजीनियरिंग पढ़ी और गरीब बस्तियों में सुरक्षित घर बनाने का काम चुना। ईशान संगीत में चला गया, शायद उसे मीरा की वही पहली धुन विरासत में मिली थी। मीरा ने कंपनी को ऐसी जगह बना दिया जहां कर्मचारियों के बच्चे अपने मालिक का नाम डर से नहीं, आभार से लेते थे। आरव धीरे-धीरे व्यापार से पीछे हट गया और जिम्मेदारी मीरा को सौंप दी।

83 साल की उम्र में, एक सर्द सुबह, आरव अपने उसी बैठकखाने में आरामकुर्सी पर बैठा था। दीवारों पर अब महंगी पेंटिंग से ज्यादा परिवार की तस्वीरें थीं। एक तस्वीर में तारा और कबीर कालीन पर नाच रहे थे। दूसरी में मीरा दुल्हन बनी मुस्कुरा रही थी। तीसरी में ईशान छोटा-सा, आरव की उंगली पकड़े था। घर में पोते-पोतियों की आवाज गूंज रही थी।

मीरा उसके पास बैठी थी। उसके बालों में चांदी उतर आई थी, पर आंखों में वही गरमाहट थी जिसने एक खाली बंगले को घर बना दिया था।

आरव ने धीमे से उसका हाथ पकड़ा।

—उस रात अगर मेरा ब्रीफकेस न गिरता, तो शायद मैं अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी नेमत को देख ही नहीं पाता।

मीरा की आंखें भर आईं।

—नहीं, आरव। उस रात तुम्हारा दिल गिरा नहीं था, खुला था।

आरव ने तारा, कबीर, ईशान और उनके बच्चों को देखा। उसे लगा कि उसकी सारी कमाई, सारे सौदे, सारे पुरस्कार इस एक दृश्य के सामने छोटे हैं। उसे देर से समझ आया था कि असली दौलत तिजोरी में नहीं, उन हाथों में होती है जो टूटते वक्त आपको थाम लें।

उसने आंखें बंद कीं तो उसे फिर वही धुन सुनाई दी—हारमोनियम की धीमी आवाज, बच्चों की हंसी, और कालीन पर घूमती 2 छोटी परछाइयां।

कुछ कहानियां खून से नहीं बनतीं।

वे उस दिन बनती हैं, जब कोई अमीर आदमी पहली बार किसी गरीब की मजबूरी में इंसान देख लेता है।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.