
भाग 1
साँवी राठौड़ की महँगी काली गाड़ी पहाड़ी मोड़ पर अचानक बेकाबू हुई और सड़क किनारे खड़ी पुरानी हरी पिकअप से इतनी जोर से टकराई कि आसपास के चीड़ के पेड़ों पर बैठे पक्षी भी डरकर उड़ गए। वह मुंबई के सबसे ताकतवर कारोबारी परिवार की इकलौती वारिस थी, और उसे आदत थी कि रास्ते उसके लिए साफ किए जाते हैं, रोके नहीं जाते। लेकिन उस दिन उत्तराखंड की उस संकरी सड़क पर एक साधारण-सा आदमी उसके सामने खड़ा था, हाथ में पुराना पीला लिफाफा लिए, जिस पर उसके मर चुके पिता की लिखावट में लिखा था—“साँवी के लिए, जब वह सच सुनने लायक हो।”
साँवी गाड़ी से उतरी तो उसका चेहरा गुस्से और डर से सफेद पड़ा था। ब्रेक ने काम नहीं किया था। स्टीयरिंग खुद मुड़ गया था। लेकिन उसने यह बात किसी से नहीं कही। उसने बस उस आदमी पर चिल्लाकर कहा—“तुम्हारी गाड़ी यहाँ क्यों खड़ी थी? जानते हो मैं कौन हूँ?”
आदमी ने शांत आँखों से उसे देखा। उसका नाम अर्जुन वैद्य था। कंधों पर धूल लगी हुई थी, हाथों में लकड़ी के काम की खुरदरी लकीरें थीं, और कपड़े ऐसे जैसे वह किसी छोटे कस्बे का बढ़ई हो। उसने जवाब दिया—“जानता हूँ। इसलिए खड़ा हूँ।”
थोड़ी देर में पुलिस आई। सिपाही अर्जुन को नाम से जानता था। उसने साँवी से औपचारिक सवाल पूछे, अर्जुन से हालचाल भी। साँवी को यह बात खल गई। मुंबई में लोग उसका नाम सुनकर कुर्सी से उठ जाते थे, यहाँ एक टूटी पिकअप वाला आदमी उससे अधिक भरोसेमंद माना जा रहा था।
टोइंग गाड़ी आने में देर थी, इसलिए अर्जुन ने पास की छोटी चायशाला “पीतल केतली” में इंतजार करने को कहा। अंदर एक बुजुर्ग औरत, कमला मौसी, चूल्हे पर चाय चढ़ा रही थी। उसने अर्जुन को देखते ही समझ लिया कि कुछ बड़ा हुआ है, पर कुछ पूछा नहीं।
साँवी ने अर्जुन को गौर से देखा। वह गरीब नहीं लग रहा था, बस पैसे से दूर लगता था। जब उसने नुकसान की रकम पूछी तो अर्जुन ने इतनी सटीक लागत बताई कि साँवी चौंक गई। लकड़ी, धातु, रंग, मरम्मत, समय—सबका हिसाब जैसे किसी बड़े कारोबारी अनुबंध की भाषा में बोल रहा हो।
तभी एक छोटी लड़की अंदर आई। उसकी उम्र 7 साल रही होगी। हाथ में सूखे पत्तों की कॉपी थी। वह अर्जुन के पीछे छिप गई। अर्जुन ने धीमे से कहा—“मेरी बेटी, तारा।”
साँवी को बच्चों से बात करना नहीं आता था। उसने बस सिर हिलाया। तारा ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई कहानी की टूटी हुई रानी सामने बैठी हो।
साँवी की नजर फिर उस लिफाफे पर गई। पिता की लिखावट वह लाखों कागजों में पहचान सकती थी। उसके पिता, देवेंद्र राठौड़, जिनकी मौत 1 साल पहले दिल का दौरा बताकर बंद कर दी गई थी। उसका गला सूख गया।
वह बोली—“वह लिफाफा मेरा है।”
अर्जुन ने लिफाफा अपनी जैकेट में रख लिया।
—“अभी नहीं।”
—“तुम तय करोगे?”
—“तुम अभी भी सोच रही हो कि मैं तुमसे पैसे चाहता हूँ। जब यह सोचना बंद कर दोगी, तब।”
साँवी गुस्से में वहाँ से चली गई, लेकिन जाते-जाते उसने अपना कार्ड मेज पर रख दिया।
अर्जुन ने कार्ड उठाया भी नहीं। बस इतना कहा—“मैं फोन नहीं करूँगा। अगर लौटना हो, तो खुद आना।”
रात को देहरादून के होटल में बैठकर साँवी ने अपनी निजी वकील को फोन किया और आदेश दिया कि गाड़ी की जाँच कंपनी के लोगों से नहीं, बाहर के स्वतंत्र विशेषज्ञ से करवाई जाए। फिर उसने अपने पिता की पुरानी तस्वीरें खोलीं। 2017 की एक तस्वीर में देवेंद्र राठौड़ के साथ वही अर्जुन खड़ा था, सूट में, किसी निर्माण स्थल पर। उसके साथ एक सुंदर स्त्री भी थी, माथे पर छोटी बिंदी, हाथ में नक्शे।
पीछे बोर्ड पर लिखा था—“राठौड़ सरयू ऊर्जा परियोजना।”
साँवी को उस परियोजना की कोई याद नहीं थी।
अगली सुबह वह फिर उसी कस्बे लौटी। अर्जुन की कार्यशाला में लकड़ी की खुशबू थी, लेकिन वहाँ रखी कुर्सियाँ किसी गाँव के बढ़ई की नहीं थीं। बड़े नेताओं के बंगले, शाही होटलों और विदेशी संग्रहकर्ताओं के नाम पेंसिल से एक दीवार पर लिखे थे।
साँवी के मुँह से निकला—“तुम सच में कौन हो?”
अर्जुन ने औजार नीचे रखा।
—“मैं वह आदमी हूँ जिसे तुम्हारे पिता ने अपनी मौत से 1 रात पहले फोन किया था।”
साँवी के पैरों के नीचे जैसे जमीन हिल गई। उसी पल उसके फोन पर संदेश आया। गाड़ी की शुरुआती जाँच में पाया गया था कि ब्रेक लाइन हाथ से ढीली की गई थी।
और तभी अर्जुन ने पहली बार सचमुच डरकर उसकी तरफ देखा।
भाग 2
राजीव भंडारी, राठौड़ समूह का कार्यकारी अध्यक्ष और देवेंद्र राठौड़ का सबसे भरोसेमंद आदमी, बिना बताए कस्बे पहुँच गया। वह काली कार से उतरा, जैसे पहाड़ भी उसके रास्ते झुक जाएँगे। उसने साँवी को फोन किया और कहा—“उस बढ़ई से जो भी कागज लेना है, आज ले लो। ऐसे लोग पुराने नामों पर सौदे करते हैं।” साँवी ने शांत स्वर में पूछा—“तुम्हें कैसे पता कि मेरी गाड़ी की जाँच हो रही है?” दूसरी तरफ 2 सेकंड की चुप्पी रही। फिर राजीव हँसा—“तुमने ही बताया होगा, याद नहीं होगा।”
उस रात “पीतल केतली” बंद होने के बाद तीनों मिले। कमला मौसी काउंटर के पीछे खड़ी थीं, पर उनकी आँखें हर हरकत देख रही थीं। राजीव ने अर्जुन को देखते ही कहा—“देवेंद्र के नाम पर जो भी है, बेटी को दे दो। तुम्हारा खेल खत्म।” अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा—“देवेंद्र ने कहा था, जब वह सच के लिए तैयार हो। जब तुम बेचैन हो जाओ, तब नहीं।” राजीव की गर्दन तन गई।
साँवी ने धीरे से कहा—“मेरे पिता किस सच से डर रहे थे?”
अर्जुन ने पहली बार राजीव को सीधा देखा—“सरयू ऊर्जा परियोजना। टूटा हुआ मचान। 3 घायल मजदूर। 1 मरी हुई वास्तुकार। और वह रिपोर्ट जिसे दफना दिया गया।”
साँवी ने साँस रोक ली। उस तस्वीर वाली स्त्री।
अर्जुन बोला—“वह मेरी पत्नी मीरा थी।”
साँवी की आँखें भर आईं, पर राजीव हँस पड़ा—“भावनात्मक नाटक से कंपनी नहीं चलती, अर्जुन। तुम 9 साल कानून से बाहर रहे हो।”
—“कानून से बाहर नहीं,” अर्जुन ने कहा, “तुम्हारे झूठ से बाहर।”
राजीव उठा। जाते-जाते उसने साँवी से कहा—“तुम अपने पिता की विरासत जलाने जा रही हो।”
साँवी ने पहली बार जवाब दिया—“शायद मैं वही बचाने जा रही हूँ जो तुमने मार दिया।”
उसके जाने के बाद कमला मौसी अंदर के कमरे से एक छोटा लकड़ी का डिब्बा लेकर आईं। उनकी उंगलियाँ काँप रही थीं। उन्होंने डिब्बा अर्जुन के सामने रखा।
—“मीरा ने यह मुझे दिया था। कहा था, जिस दिन देवेंद्र राठौड़ की बेटी इस रसोई में सच पूछे, उसी दिन देना।”
अर्जुन पत्थर की तरह खड़ा रह गया।
डिब्बे में एक पुरानी छोटी चिप और मुड़ा हुआ कागज था। कागज पर मीरा की लिखावट थी—“मूल संरचनात्मक रिपोर्ट। मैंने प्रति बचा ली है।”
साँवी ने चिप अपने यंत्र में लगाई। फाइल खुली। रिपोर्ट पर मीरा के हस्ताक्षर थे। इंजीनियरों की आपत्तियाँ थीं। और आखिरी संदेश राजीव का था—“आज शाम तक यह रिपोर्ट प्रणाली से हट जानी चाहिए।”
साँवी ने स्क्रीन बंद की। अब उसे समझ आ गया था कि उसके पिता की मौत भी शायद स्वाभाविक नहीं थी।
भाग 3
सुबह अर्जुन साँवी को उस अधूरी परियोजना स्थल पर ले गया, जहाँ 9 साल पहले मीरा की जान गई थी। पहाड़ से उतरती सड़क नदी के किनारे एक वीरान मैदान तक जाती थी। जंग लगे लोहे, टूटी जालियों और काले पड़े कंक्रीट के बीच घास घुटनों तक उग आई थी। उस जगह में कोई आवाज नहीं थी, फिर भी हर तरफ चीखों की परछाई महसूस होती थी।
अर्जुन एक जगह जाकर रुक गया। उसने कहा—“मीरा यहीं खड़ी थी। उसे पता था कि मचान कमजोर है। उसने रिपोर्ट जमा की। 2 इंजीनियरों ने उसके साथ हस्ताक्षर किए। लेकिन राजीव ने रिपोर्ट हटवा दी, क्योंकि परियोजना रुकती तो कंपनी के शेयर गिरते, और देवेंद्र राठौड़ की छवि टूटती।”
साँवी ने धीरे से पूछा—“मेरे पिता को पता था?”
—“शुरू में नहीं। जब पता चला, तब देर हो चुकी थी। उन्होंने मुआवजे देकर मामला दबा दिया, क्योंकि राजीव ने उन्हें समझाया कि सच बाहर आया तो तुम्हारा नाम भी इस शर्म में डूब जाएगा। लेकिन मरने से 1 सप्ताह पहले उन्होंने मुझे फोन किया। बोले, वह अब चुप नहीं रहेंगे।”
साँवी घास पर बैठ गई। उसके पिता की तस्वीरें, उनके भाषण, उनके पुरस्कार—सब अचानक धुंधले लगने लगे। वह पहली बार देवेंद्र राठौड़ को मूर्ति नहीं, गलती करने वाला इंसान देख रही थी।
—“उन्होंने तुम्हें ही लिफाफा क्यों दिया?”
अर्जुन की आवाज भारी हो गई।
—“क्योंकि उन्हें पता था कि मैं बदला लेना चाहता तो 9 साल पहले ले सकता था। लेकिन मीरा चाहती थी कि सच किसी की बर्बादी से नहीं, किसी की जागी हुई आत्मा से बाहर आए। तुम्हारे पिता चाहते थे कि वह आत्मा तुम बनो।”
कस्बे लौटकर साँवी ने आखिर लिफाफा खोला। उसमें पिता की 4 पन्नों की चिट्ठी और 11 नामों की सूची थी। देवेंद्र राठौड़ ने लिखा था कि उन्होंने डर और प्रतिष्ठा के कारण चुप्पी चुनी, लेकिन राजीव ने न सिर्फ रिपोर्ट दबाई, बल्कि हर उस व्यक्ति को खरीदा जिसने सच देखा था। आखिरी पन्ने पर लिखा था—“अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो समझना कि मैं सच बोलने निकला था। अगर मैं बोलने से पहले मर गया, तो मेरी मौत को भी प्रश्न समझना।”
साँवी ने चिट्ठी मेज पर रखी। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। अब वहाँ निर्णय था।
तारा नीचे आई और नींद भरी आँखों से बोली—“पापा, कहानी सुनाओगे?”
अर्जुन ने उसे गोद में उठा लिया। तारा ने साँवी को देखा।
—“आप रो रही थीं?”
साँवी ने सिर हिलाया।
—“अब नहीं।”
तारा ने अपनी पत्तों वाली कॉपी से एक चित्र निकाला। उसमें एक लोमड़ी थी, आधी घायल, आधी आग जैसी चमकती।
—“यह आपके लिए। यह डरती है, पर भागती नहीं।”
साँवी ने चित्र हाथ में लिया। उसे याद नहीं था कि आखिरी बार किसी ने उसे बिना हिसाब, बिना स्वार्थ कुछ दिया हो।
मुंबई लौटने से पहले उसने अपनी निजी वकील को सारी सामग्री दी। गाड़ी की जाँच रिपोर्ट भी साथ थी, जिसमें साफ लिखा था कि ब्रेक लाइन और स्टीयरिंग प्रणाली में जानबूझकर छेड़छाड़ की गई थी। उसने केंद्रीय जाँच एजेंसी को औपचारिक शिकायत भेजी और राठौड़ समूह की आपात बैठक बुलाई।
मुंबई की 42वीं मंजिल पर बनी काँच की बैठक कक्ष में 9 निदेशक बैठे थे। राजीव सिरहाने वाली कुर्सी पर था, जैसे अब भी वही मालिक हो। साँवी ने पहले सामान्य वित्तीय प्रस्तुति शुरू की। राजीव के चेहरे पर राहत आई। उसे लगा, लड़की डर गई है।
फिर साँवी ने स्क्रीन बदली।
पहले पिता की चिट्ठी दिखाई गई। फिर 11 नामों की सूची। फिर मीरा की मूल रिपोर्ट। फिर राजीव का संदेश। कमरे में सन्नाटा इतना भारी था कि एयर-कंडीशनर की आवाज भी तेज लगने लगी।
2 निदेशक उठकर बोलने लगे। साँवी ने उन्हें देखे बिना कहा—“बैठ जाइए। अभी बोलने का अधिकार मेरा है।”
उसने 3 प्रस्ताव रखे। राजीव और नामित निदेशकों का तत्काल हटाया जाना। सरयू परियोजना की सच्चाई सरकारी एजेंसियों और निवेशकों को बताई जाना। और मृतक व घायलों के परिवारों के लिए सार्वजनिक, स्वतंत्र और लेखापरीक्षित सहायता कोष बनाना।
राजीव ने मेज पर हाथ पटका।
—“तुम अपने पिता की विरासत नष्ट कर रही हो।”
साँवी ने उसकी आँखों में देखकर कहा—“मेरे पिता की विरासत वह झूठ नहीं है, जिसे तुमने उनके नाम से बेचा। उनकी विरासत वह सच है, जिसे बोलने से पहले उन्हें मार दिया गया।”
राजीव का चेहरा राख जैसा पड़ गया।
तभी दरवाजा खुला। बाहर 2 अधिकारी खड़े थे। उनके पास गिरफ्तारी आदेश था—दस्तावेज नष्ट करने, न्याय में बाधा डालने, वाहन में छेड़छाड़ और देवेंद्र राठौड़ की मौत की पुनः जाँच से जुड़ी प्राथमिक धाराएँ।
राजीव ने आखिरी बार अर्जुन को देखा। अर्जुन कमरे के कोने में शांत खड़ा था, गहरे रंग का सूट पहने, पर उसकी आँखों में वही पहाड़ों वाली कठोर शांति थी।
—“यह तुम्हारा बदला है?” राजीव ने थूक निगलते हुए पूछा।
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। साँवी ने दिया।
—“नहीं। यह मीरा की रिपोर्ट है।”
मतदान हुआ। 7 पक्ष में, 2 विरोध में। विरोध वही लोग थे जिनके नाम सूची में थे।
राजीव को उसी मंजिल से ले जाया गया, जहाँ कभी वह दूसरों की किस्मत लिखा करता था।
अगले 3 सप्ताह साँवी ने खुद को काम में झोंक दिया। समाचार चैनल, अखबार, निवेशक, विरोधी परिवार—हर तरफ तूफान था। लेकिन उसने एक भी टीवी साक्षात्कार नहीं दिया। वह उन परिवारों से मिली जिनके नाम पुराने समझौतों में दबे थे। 3 घायल मजदूरों में से 1 अब भी छड़ी के सहारे चलता था। मीरा के माता-पिता ने उससे बात करने से पहले 20 मिनट तक उसे दरवाजे पर खड़ा रखा। साँवी ने इंतजार किया। अंदर बुलाए जाने पर उसने कुर्सी पर बैठने से पहले कहा—“मैं माफी माँगने आई हूँ, सौदा करने नहीं।”
कुछ लोगों ने उसे क्षमा नहीं किया। कुछ ने उसका हाथ पकड़ लिया। कुछ बस रोते रहे। वह हर जगह चुपचाप बैठी रही। पहली बार उसके पास जवाब कम और सुनने की क्षमता अधिक थी।
राजीव पर मुकदमा चला। जाँच में यह भी सामने आया कि देवेंद्र राठौड़ की दवाओं में गलत मात्रा मिलाई गई थी। एक पुराना फार्मासिस्ट, जिसे राजीव के लोगों ने पैसे दिए थे, सरकारी गवाह बन गया। 8 महीने बाद राजीव को 24 साल की सजा हुई। राठौड़ समूह से 4 बड़े अधिकारी हटाए गए। कंपनी का संचालन स्वतंत्र मंडल को दिया गया। साँवी ने केवल एक भूमिका रखी—“मीरा वैद्य न्यास” की देखरेख।
वह नाम अर्जुन को पहले नहीं बताया था।
जब उसने बताया, वह लंबे समय तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने बस पूछा—“मीरा को तुम जानती नहीं थीं।”
साँवी ने कहा—“अब जानती हूँ। हर उस परिवार के चेहरे में, जिसे उसने बचाने की कोशिश की।”
अर्जुन की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू पोंछे नहीं।
कस्बे में जीवन धीरे-धीरे बदलने लगा। साँवी हर सप्ताहांत लौटने लगी। पहले वह “पीतल केतली” के ऊपर वाले छोटे कमरे में रुकती थी। फिर उसने मुंबई का समुद्र दिखने वाला अपना घर बेच दिया। लोगों ने कहा, अमीर लड़की पहाड़ों में कितने दिन रहेगी। लेकिन तीसरे महीने उसने कस्बे में एक छोटा कार्यालय खोल लिया। सुबह कमला मौसी उसके लिए अदरक की चाय भेजतीं। शाम को तारा उसे अपने नए चित्र दिखाती।
तारा ने उसे पहले “राठौड़ मैडम” कहा। फिर “साँवी दीदी।” फिर एक दिन बस “साँवी।” अर्जुन ने टोका नहीं। साँवी ने भी नहीं।
अर्जुन ने अपनी पुरानी कार्यशाला के बगल में आधा एकड़ जमीन साफ करनी शुरू की। वह बड़ी, रोशनीदार कार्यशाला बनाना चाहता था, जहाँ ऊपर तारा के लिए चित्र बनाने की जगह हो। साँवी ने पूछा—“कितने पैसे चाहिए?”
अर्जुन मुस्कुराया नहीं।
—“पैसे नहीं। समय। और कोई जो बनते हुए घर को बीच में छोड़कर न जाए।”
साँवी ने उस खाली जमीन को देखा। वहाँ जंगली झाड़ियाँ थीं, पत्थर थे, और एक कोना जहाँ धूप देर तक टिकती थी।
—“मुझे हथौड़ा चलाना नहीं आता।”
—“तुम्हें बस रहना आता हो तो काफी है।”
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। लेकिन अगले दिन वह पुराने कपड़े पहनकर आई, हाथ में दस्ताने थे। तारा ने हँसते हुए कहा—“आप सच में काम करेंगी?”
साँवी ने पहली बार खुलकर हँसा।
—“कोशिश करूँगी। अगर दीवार गिर गई तो तुम्हारे पापा संभाल लेंगे।”
दिन बीतते गए। नई कार्यशाला की लकड़ी की दीवारें उठीं। बड़ी खिड़कियाँ लगीं। छत पर टीन की चादरें चमकीं। बरसात आई तो तीनों ने अधूरी छत के नीचे बैठकर चाय पी। सर्दी आई तो अर्जुन ने पहली बार साँवी के लिए अपनी बनाई कुर्सी पर कंबल रखा। तारा ने इसे देखकर आँखें गोल कीं, पर कुछ बोली नहीं।
नवंबर की एक सुबह अर्जुन साँवी को कब्रिस्तान ले गया। मीरा की कब्र छोटी और सादी थी। पत्थर पर सिर्फ नाम, तारीखें और नीचे एक पंक्ति—“जिसने गिरती चीजों में भी सहारा ढूँढा।”
साँवी 3 कदम पीछे खड़ी रही। उसे लगा, इस जगह उसका आगे जाना अधिकार नहीं, विनम्रता का अपमान होगा।
अर्जुन ने सूखे जंगली फूल रखे और बहुत धीमे कहा—“मैंने वादा निभाया। मैंने सही व्यक्ति का इंतजार किया।”
साँवी ने सिर झुका लिया। हवा में पत्ते खड़खड़ाए। उसे ऐसा लगा जैसे उस चुप्पी में कोई उसे दोष नहीं दे रहा, बस देख रहा है कि वह अब क्या बनना चाहती है।
6 महीने बाद, वसंत में नई कार्यशाला लगभग तैयार थी। लकड़ी की खुशबू, ताजा रंग और खुले पहाड़ी आकाश के नीचे वह जगह किसी नए जीवन की तरह लगती थी। तारा नीचे के पैनल पर रंग कर रही थी। अर्जुन सीढ़ी पर ऊपर की चौखट रंग रहा था। साँवी बीच का हिस्सा रंग रही थी, उसकी आस्तीन पर रंग लगा था और बाल बार-बार चेहरे पर आ रहे थे।
तारा ने अचानक पूछा—“साँवी, आप हमेशा यहीं रहेंगी?”
साँवी का हाथ रुक गया। उसने ऊपर देखा। अर्जुन सीढ़ी से उसे देख रहा था। उसकी आँखों में डर नहीं था, पर कोई पुराना घाव फिर खुल जाने की आशंका थी।
अर्जुन नीचे उतरा।
—“तारा, कमला नानी के पास जाकर नींबू पानी ले आओ।”
तारा समझदार बच्ची की तरह भागी, पर जाते-जाते पीछे मुड़कर मुस्कुराई।
अर्जुन ने धीरे से कहा—“तुम्हें बच्चे से वह वादा नहीं करना चाहिए जो तुमने खुद से नहीं किया।”
साँवी ने ब्रश नीचे रखा।
—“मैं दोनों से कर रही हूँ।”
काफी देर तक कोई नहीं बोला। फिर अर्जुन ने हाथ बढ़ाया और उसके चेहरे से रंग लगा बाल पीछे किया। यह लगभग 1 साल में पहली बार था जब उसने उसे छुआ। न जल्दी, न दावा, न लालच। बस एक स्वीकार।
साँवी पीछे नहीं हटी।
तारा दौड़ती हुई वापस आई और दोनों के बीच खड़ी होकर एक हाथ अर्जुन की कमर पर, दूसरा साँवी की कमर पर रख दिया, जैसे उसे बहुत पहले से पता था कि यही तस्वीर पूरी होनी थी।
शाम को तीनों नई कार्यशाला के बरामदे पर बैठे। पुरानी हरी पिकअप मेपल के पेड़ के नीचे खड़ी थी। वही गाड़ी, जिससे टकराकर साँवी की दुनिया टूटी थी, अब उसी जगह खड़ी थी जहाँ उसका नया घर बन रहा था।
कमला मौसी दरवाजे पर खड़ी आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाईं—“देख लिया न, मीरा? तुम्हारी प्रति बेकार नहीं गई।”
साँवी ने तारा का दिया हुआ सूखा लाल पत्ता अपनी डायरी में रखा। उस पत्ते के नीचे उसने लिखा—“कुछ दुर्घटनाएँ अंत नहीं होतीं। वे छिपे हुए सच का दरवाजा तोड़ती हैं।”
उस रात जब पहाड़ों पर धुंध उतर रही थी, अर्जुन ने बरामदे की बत्ती बुझाई। तारा अंदर सो चुकी थी। साँवी दरवाजे पर खड़ी रही। अर्जुन ने पूछा—“ठंड लग रही है?”
साँवी ने सिर हिलाया।
—“नहीं। बस पहली बार कहीं से भागने का मन नहीं कर रहा।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। इस बार वह मुस्कुराया। धीमे, सच्चे, लंबे समय बाद।
कभी वह एक लिफाफे की रखवाली कर रहा था। कभी वह अपने दुख की राख में अकेला बैठा था। कभी साँवी अपने पिता के नाम के बोझ तले दबे महल में रहती थी। लेकिन एक टूटी हुई ब्रेक लाइन, एक अधूरी चिट्ठी, एक बच्ची का चित्र और एक मरी हुई स्त्री की बचाई हुई प्रति ने 2 टूटे हुए लोगों को वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ कोई सौदा नहीं था, कोई विरासत नहीं थी, कोई झूठ नहीं था।
सिर्फ 1 घर था, जो सच की नींव पर धीरे-धीरे खड़ा हो रहा था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.