
और उसके हाथ में वही लाल स्वेटर था, जिसे मैं समझती थी कि हमेशा के लिए खो चुका है।
एक पल के लिए बोर्डरूम जैसे गायब हो गया।
काँच की दीवारें, चमकदार मेज़, निवेशक, तिमाही आँकड़े दिखाती प्रोजेक्टर स्क्रीन—सब कुछ धुँधला पड़ गया। मेरी नज़र सिर्फ़ उस छोटे-से लाल स्वेटर पर टिक गई, जिसकी बाँहें बराबर नहीं थीं और जिस पर फूलों के आकार के दो लकड़ी के बटन लगे थे।
कावेरी मासी ने उसे मेरी माँ की आख़िरी सर्दियों में बुना था।
मुझे याद है, मैं रसोई के फ़र्श पर उनके पास बैठी उनकी उँगलियों को जादू की तरह चलते हुए देखा करती थी।
“लाल रंग ही क्यों?” मैंने पूछा था।
उन्होंने हँसकर कहा था, “क्योंकि मेरी मोलू तो किसी गंभीर बूढ़े अकाउंटेंट की तरह घूमती रहती है। बच्चों को ऐसा दिखना चाहिए जैसे उन्होंने धूप निगल ली हो।”
अब वही स्वेटर मेरे पिताजी की बाँह पर किसी स्वीकारोक्ति की तरह रखा था।
वे काँच की दीवार के बाहर खड़े थे। उस आख़िरी तस्वीर से भी ज़्यादा बूढ़े, जो मैंने उनकी देखी थी। पहले से दुबले। कभी बिल्कुल सीधी रहने वाली उनकी पीठ अब उम्र के सामने थोड़ा झुक गई थी। उनके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे।
लेकिन उनकी आँखें वही थीं।
थकी हुई।
सतर्क।
और ऐसी किसी भावना से भरी हुई, जिसे मैं अभी तक माफ़ नहीं कर सकती थी।
“काव्या,” उन्होंने खुले दरवाज़े से कहा।
बोर्डरूम में कोई नहीं हिला।
कावेरी का हाथ मेरे हाथ से छूट गया।
वह इतनी जल्दी पीछे हटीं कि लगभग कुर्सी से टकरा गईं।
“सर…” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।
सर।
इतना सब होने के बाद भी वे उन्हें सर ही कह रही थीं।
मेरा गला जलने लगा।
मेरे पिताजी ने उनकी ओर देखा।
“कावेरी।”
उनके मुँह से उनका नाम टूटा हुआ निकला।
किसी मालिक की तरह नहीं, जो अपनी नौकरानी को बुला रहा हो।
बल्कि ऐसे जैसे कोई आदमी अपनी ही खोदी हुई कब्र को देख रहा हो।
मैं धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ी।
“यह आपके पास कैसे है?”
उन्होंने नीचे स्वेटर की ओर देखा।
उनकी उँगलियाँ उस पर और कस गईं।
“मैं इसे लौटाने आया हूँ।”
“बीस साल बाद?”
उनके चेहरे पर दर्द की एक लहर दौड़ गई।
निवेशक एक-दूसरे को देखने लगे। मेरे सीएफ़ओ ने असहज होकर करवट बदली। एचआर अपनी नोटबुक पर आधी उठी हुई कलम के साथ जड़ हो गई। युवा सुपरवाइज़र मानव बोर्डरूम के बाहर इतना पीला पड़ गया था कि मानो दीवार में ही समा जाए।
मेरे पिताजी की नज़र पूरे कमरे पर घूमी।
“क्या हम अकेले में बात कर सकते हैं?”
मैं एक बार हँसी।
वह हँसी दयालु नहीं थी।
“निजता वही लोग माँगते हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से सच नहीं बोला होता।”
“काव्या…”
“नहीं।” मैंने कावेरी की ओर इशारा किया। “इन्हें सबके सामने अपमानित किया गया था। इन्हें हमारे घर के फाटक से सबके सामने निकाला गया था। इन्होंने मेरी ही इमारत में सबके सामने शौचालय साफ़ किए हैं। अब आप यहीं बात करेंगे।”
कावेरी ने मेरा हाथ छुआ।
“बेटा, प्लीज़। मेरी वजह से मत लड़ो।”
मैं उनकी ओर मुड़ी।
“मैं आपकी वजह से नहीं लड़ रही। मैं इसलिए लड़ रही हूँ क्योंकि आपके लिए कभी कोई नहीं लड़ा।”
उन्होंने अपनी नज़रें झुका लीं।
उसी ने मुझे सबसे ज़्यादा तोड़ दिया।
मेरे पिताजी धीरे-धीरे बोर्डरूम के भीतर आए। किसी ने उन्हें रास्ता देने के लिए नहीं कहा, फिर भी सब लोग अपने-आप हट गए। उम्र अब भी जगह बनवा देती है, चाहे सच न बनवा पाए।
उन्होंने स्वेटर मेज़ पर रख दिया।
वह असंभव रूप से छोटा लग रहा था।
मैं कभी उसमें समा कैसे जाती थी?
और मेरा पूरा बचपन का दुख इतनी छोटी-सी चीज़ में कैसे समा गया था?
“मैंने इसे संभालकर रखा,” उन्होंने कहा।
“क्यों?”
उन्होंने निगला।
“क्योंकि यह उसी की आख़िरी निशानी थी।”
कावेरी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
मैं उन्हें देखती रही।
“आपने मुझसे कहा था कि वह अपने गाँव लौट गई।”
“हाँ।”
“आपने कहा था कि उसने कोई पता नहीं छोड़ा।”
“हाँ।”
“आपने मुझे यक़ीन दिला दिया कि उसने मुझे छोड़ दिया।”
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
“हाँ।”
वह एक शब्द पूरे बोर्डरूम को चीरता हुआ निकल गया।
न कोई बहाना।
न कोई सफ़ाई।
बस—
हाँ।
मेरी छाती कस गई।
“क्यों?”
बिना किसी निमंत्रण के वे बैठ गए। उनका हाथ स्वेटर के पास काँप रहा था।
“क्योंकि मैं कायर था।”
कमरे में किसी ने साँस तक नहीं ली।
कावेरी फुसफुसाईं,
“सर…”
उन्होंने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
“नहीं, कावेरी। आज नहीं।”
फिर उन्होंने मेरी ओर देखा।
“तुम्हारी माँ के जाने के बाद मैं जीना ही भूल गया था। दफ़्तर जाता था, घर लौटता था, कागज़ों पर हस्ताक्षर करता था, बिल भरता था… लेकिन ज़िंदा नहीं था। तुम्हारी माँ का परिवार सब सँभालने आ गया। मेरी बहन आई। तुम्हारी बुआ। तुम्हें याद है?”
मुझे याद था।
वसुधा बुआ।
तेज़ इत्र।
उससे भी तेज़ ज़ुबान।
माँ के जाने के बाद वही हमारी रसोई सँभालने लगी थीं और मुझसे कहती थीं,
“ज़्यादा रोने वाले बच्चे बदसूरत हो जाते हैं।”
मैं उनसे नफ़रत करती थी, बिना यह जाने कि क्यों।
“उन्होंने कहा कि घर में अनुशासन चाहिए,” पापा ने आगे कहा। “उन्होंने कहा कि लोग बातें कर रहे हैं। एक विधुर, एक जवान कामवाली और बड़ी होती बेटी। उन्होंने कहा कि कावेरी तुम्हारी ज़िंदगी में ज़रूरत से ज़्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है।”
“वह महत्वपूर्ण थीं।”
“मुझे पता है।”
“फिर आपने उन्हें जाने दिया?”
उनके होंठ काँप उठे।
“उस रात मैं देर से घर लौटा। वसुधा ने कहा कि कावेरी अपनी तनख़्वाह लेकर चली गई। उसने कहा कि मैंने वेतन बढ़ाने से मना कर दिया, इसलिए वह नाराज़ होकर चली गई। उसने यह भी कहा कि कावेरी ने तुम्हारी माँ के बारे में बुरा कहा था।”
कावेरी का सिर झटके से ऊपर उठा।
“नहीं,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।
पापा उनकी ओर मुड़े।
“अब मुझे सच पता है।”
उनका चेहरा बिखर गया।
उन्होंने फिर मेरी ओर देखा।
“मैंने उस झूठ पर यक़ीन कर लिया, क्योंकि यह मानना आसान था कि मैं अपनी बेटी की रक्षा करने वाली इंसान की रक्षा करने में असफल रहा।”
मैंने कुर्सी की पीठ कसकर पकड़ ली।
“आपने मुझसे पूछा तक नहीं?”
“तुम बारह साल की थीं। तुमने अभी-अभी अपनी माँ को खोया था।”
“और फिर आपने मुझसे कावेरी को भी छीन लिया।”
उनकी आँखें भर आईं।
“हाँ।”
यह शब्द लगभग सुनाई ही नहीं दिया।
कावेरी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे।
“मैं कई बार आई थी,” उन्होंने धीरे से कहा।
पूरा कमरा उनकी ओर मुड़ गया।
मेरे पिताजी ने उन्हें अविश्वास से देखा।
“क्या?”
उन्होंने सिर हिलाया, लेकिन अब भी उनकी ओर नहीं देखा।
“तीन बार। पहले हफ़्ते। फिर एक महीने बाद। फिर काव्या के जन्मदिन पर।”
मेरी साँस रुक गई।
“मेरे जन्मदिन पर?”
उन्होंने पहली बार मेरी ओर देखा।
“मैं नारियल की बर्फ़ी लाई थी। तुम्हें कोने वाले टुकड़े पसंद थे।”
मेरे घुटने जवाब देने लगे।
“मुझे कभी नहीं मिली।”
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “चौकीदार ने कहा कि मैडम का आदेश है। मुझे फाटक के पास आने की भी अनुमति नहीं थी।”
पापा ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
“वसुधा…”
कावेरी बोलती रहीं। अब उनकी आवाज़ काँप रही थी, जैसे बीस साल का दर्द एक साथ बाहर निकल रहा हो।
“आख़िरी बार मैं शाम तक बाहर इंतज़ार करती रही। आप कार से आए थे, सर। मैंने आपको आवाज़ देने की कोशिश की। लेकिन आपकी बहन ने मुझे आपके देखने से पहले ही अलग खींच लिया। उसने कहा कि अगर मैं फिर लौटी तो वह मेरे ख़िलाफ़ चोरी की शिकायत दर्ज करवा देगी। उसने कहा कि मेरे जैसी ग़रीब औरतें सिर्फ़ इसलिए ज़िंदा रहती हैं क्योंकि अमीर लोग उन पर दया करते हैं। उसने कहा कि वह मुझे पूरे पुणे के हर घर से ग़ायब करवा सकती है।”
मेरे हाथ मुट्ठियों में बदल गए।
“और आपने मान लिया कि वह ज़्यादा वेतन के लिए चली गई?” मैंने पापा से पूछा।
उन्होंने हाथ नीचे कर लिए।
“मैं एक साफ़ झूठ पर यक़ीन करना चाहता था, बजाय एक गंदे सच का सामना करने के।”
मैंने स्वेटर की ओर देखा।
“आपने इसे क्यों संभालकर रखा?”
उन्होंने उसे बहुत सावधानी से उठाया।
“उसके जाने के एक हफ़्ते बाद मुझे यह तुम्हारी अलमारी में मिला। तुम हर रात इसे पकड़कर सोती थीं। इसके अंदर तुमने एक पर्ची छिपा रखी थी।”
मेरा दिल जैसे रुक गया।
“कौन-सी पर्ची?”
उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला, जिसके किनारे पीले पड़ चुके थे।
उसे भी उन्होंने संभालकर रखा था।
मेरे बचपन की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट पूरे कागज़ पर फैली हुई थी।
कावेरी मासी,
मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ। वापस आ जाइए।
मैंने आज दो रोटियाँ खाई हैं। आपको मुझ पर गर्व होगा।
माँ भगवान के पास चली गई हैं। आप भी मत जाइए।
— मोलू
पूरा बोर्डरूम धुँधला पड़ गया।
मुझे याद आ गया कि मैंने यह लिखा था।
मुझे याद आ गया कि मैंने इसे स्वेटर के अंदर इसलिए रख दिया था क्योंकि मुझे लगता था कि स्वेटर अपने बनाने वाले का घर जानते हैं।
मैंने अपना मुँह ढँक लिया।
कावेरी के मुँह से एक टूटी हुई आवाज़ निकली। उन्होंने कागज़ लेने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर खुद ही रोक लिया।
पापा ने वह पर्ची उनके हाथों में रख दी।
“मुझे माफ़ कर दो,” उन्होंने कहा।
पहली बार मेरे पिताजी ने उनके सामने हाथ जोड़ दिए।
न किसी नाटक की तरह।
न दिखावे के लिए।
बल्कि ऐसे जैसे कोई आदमी आख़िरकार उस इंसान के सामने खड़ा हो जिसने उसकी वजह से सबसे ज़्यादा दुख सहा हो।
“कावेरी, मुझे माफ़ कर दो।”
वे उन्हें देखती रहीं। आँसू उस पर्ची पर गिरते रहे।
“आपको उस बच्ची से पूछना चाहिए था,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। “बच्चे जानते हैं कि उनसे कौन प्यार करता है।”
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
मेरे भीतर फिर ग़ुस्सा उठा।
“आज क्यों आए?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“क्योंकि पिछले महीने वसुधा की मौत हो गई।”
यह नाम पत्थर की तरह गिरा।
“वह कुछ कागज़, चिट्ठियाँ और पुराने हिसाब छोड़ गई। मुझे बैंक के ऐसे भुगतान मिले जो उसने कावेरी के जाने के बाद घरेलू कर्मचारियों के ख़र्च के नाम पर निकाले थे। मैं समझता रहा कि वह देखभाल करने वालों को पैसे दे रही है।”
कावेरी उलझन में उन्हें देखने लगीं।
पापा की आवाज़ कड़वी हो गई।
“उसने तुम्हें हटाया, फिर एजेंसी से आधी तनख़्वाह पर काम करने वाले लोगों को रखा और बाक़ी पैसे खुद रखती रही।”
मैं उस कुरूपता पर लगभग हँस पड़ी।
इतना सरल।
इतना साधारण।
एक औरत ने सिर्फ़ एक बच्ची से उसका प्यार नहीं छीना था।
उसने उस खालीपन से मुनाफ़ा भी कमाया था।
“लेकिन इससे स्वेटर की बात नहीं समझ आती,” मैंने कहा।
उन्होंने सिर हिलाया।
“वसुधा के संदूक में कावेरी की एक चिट्ठी भी थी।”
कावेरी जड़ हो गईं।
“मेरी चिट्ठी?”
उन्होंने उनकी ओर देखा।
“तुमने मुझे लिखा था?”
उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
“जब मुझे धमकी दी गई थी। मैंने आख़िरी बार आपको लिखा था। वह चिट्ठी मैंने आपके दफ़्तर के चौकीदार को दी थी।”
“मुझे कभी नहीं मिली।”
“उन्हें मिल गई थी,” मैंने कहा।
पापा ने मुझे एक और कागज़ थमा दिया।
लिखावट सँभली हुई थी, लेकिन असमान। साफ़ दिख रहा था कि लिखने की आदत कम थी, फिर भी लिखने वाली ने पूरी चिट्ठी लिखने का निश्चय किया था।
सर,
मैं पैसे के लिए नहीं गई। मैंने मैडम के बारे में कोई बुरी बात नहीं कही। मैंने काव्या को अपनी बेटी की तरह पाला, क्योंकि अस्पताल में आपकी पत्नी ने मुझसे कहा था—“अगर मैं चली जाऊँ, तो मेरी बच्ची को उसके अपने घर में कभी अकेला मत होने देना।”
अगर आप मुझे वापस नहीं बुलाना चाहते तो मैं ज़ोर नहीं दूँगी। लेकिन कृपया काव्या को बता दीजिए कि मैं उसे बिना प्यार के छोड़कर नहीं गई। उसे कहिए खाना खाया करे। उसे कहिए बुखार से न डरे। उसे कहिए कि उसका लाल स्वेटर हमेशा मेरी आँखों में बसा रहेगा।
आपकी सेविका,
कावेरी
आपकी सेविका।
मुझे इन शब्दों से नफ़रत हो गई।
मुझे उनसे नफ़रत हो गई कि उन्होंने यह लिखा।
मुझे उस दुनिया से नफ़रत हो गई जिसने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि प्यार को भी अपनी पहचान सेविका लिखकर देनी पड़ती है।
पापा की आवाज़ टूट गई।
“मुझे यह दो हफ़्ते पहले मिला। मैंने उन्हें ढूँढ़ना शुरू किया। थोड़ा समय लगा। एजेंसी के रिकॉर्ड से पता चला कि वह यहाँ काम करती हैं।” उन्होंने पूरे बोर्डरूम की ओर देखा। “जब मैं नीचे पहुँचा तो लोगों ने बताया कि वह इकतीसवीं मंज़िल पर सफ़ाई कर रही हैं।”
कावेरी ने चिट्ठी अपने सीने से लगा ली।
“आपने मुझे ढूँढ़ा?”
“हाँ।”
“अब क्यों?”
उन्होंने अपना बचाव नहीं किया।
“बहुत देर हो चुकी है… लेकिन मेरे पास अब सिर्फ़ यही समय बचा है।”
इस एक वाक्य ने पूरे कमरे को शांत कर दिया।
एक पल के लिए मैंने उन्हें उस पिता की तरह नहीं देखा जिसने मुझे निराश किया था।
मैंने उन्हें एक बूढ़े आदमी की तरह देखा, जो अपने ही फ़ैसलों के मलबे के बीच खड़ा था, जिन्हें अब वह कभी बदल नहीं सकता था।
लेकिन दुख सिर्फ़ इसलिए माफ़ी में नहीं बदल जाता क्योंकि वह पुराना हो चुका हो।
मैंने एचआर की ओर देखा।
“नियुक्ति-पत्र तैयार कीजिए।”
मेरे सीएफ़ओ ने फिर गला साफ़ किया।
“काव्या, शायद हमें संरचना पर चर्चा करनी चाहिए। डायरेक्टर स्तर की नियुक्ति बिना—”
मैंने उसकी ओर देखा।
“एक शब्द और बोले, तो फिर मैं तुम्हारी संरचना पर चर्चा करूँगी।”
उसने तुरंत चुप्पी साध ली।
कावेरी ने सिर हिलाया।
“नहीं, बेटा। मैं दफ़्तर में नहीं बैठ सकती। लोग हँसेंगे।”
“हँसने दो,” मैंने कहा। “फिर उन्हें सिखाएँगे कि उन्हें हँसना क्यों नहीं चाहिए।”
वे डरी हुई लग रही थीं।
“मुझे तो बस खाना बनाना, सफ़ाई करना, बच्चों, बुज़ुर्गों और बीमारों की देखभाल करना आता है। मुझे पता चल जाता है कि किसने खाना नहीं खाया। कौन झूठ बोल रहा है कि वह ठीक है। कौन-सा कर्मचारी बुखार छिपा रहा है क्योंकि उसकी तनख़्वाह कट जाएगी।”
“यही तो वजह है,” मैंने कहा।
मैं निवेशकों की ओर मुड़ी।
“आप सब यहाँ एक ऐसी कंपनी में निवेश करने आए हैं जो पूरे देश में सामान पहुँचाती है। लेकिन आज मुझे याद आया कि एक कंपनी सिर्फ़ सामान नहीं, लोगों को भी ऊपर उठाती है, नीचे गिराती है, बाहर कर देती है, या उन्हें अदृश्य बना देती है। हमने पैकेजों को ट्रैक करने का सॉफ़्टवेयर तो बना लिया, लेकिन इंसानी गरिमा को नहीं। आज से यह बदलेगा।”
कोई कुछ नहीं बोला।
मैंने काँच के बाहर खड़े मानव की ओर देखा।
“तुम।”
वह काँपता हुआ अंदर आया।
“जी… मैडम।”
“तुम इनसे माफ़ी माँगोगे।”
वह कावेरी की ओर मुड़ा।
“मुझे माफ़ कर दीजिए।”
“ढंग से,” मैंने कहा।
उसकी आँखों में डर भर गया।
“मुझे माफ़ कर दीजिए, कावेरी जी। मैंने आपके बारे में ग़लत बातें कहीं। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
कावेरी असहज हो गईं।
“कोई बात नहीं।”
“नहीं,” मैंने नरमी से कहा। “कोई बात नहीं, ऐसा नहीं होता। आप चाहें तो माफ़ कर सकती हैं। लेकिन किसी को भी सच मिटाने का अधिकार नहीं है।”
उन्होंने मुझे कुछ देर तक देखा।
फिर मानव की ओर मुड़ीं।
“आगे से किसी से भी इस तरह बात मत करना,” उन्होंने धीरे से कहा। “ख़ासकर उन लोगों से, जिनके काम की वजह से तुम्हारे जूते साफ़ रहते हैं।”
मानव ने जल्दी-जल्दी सिर हिलाया।
“जी, कावेरी जी।”
कमरे में कुछ बदल गया।
इतना नहीं कि दुनिया बदल जाती।
लेकिन इतना ज़रूर कि महँगी कुर्सियों पर बैठे लोगों ने हाउसकीपिंग की साड़ी पहने उस औरत की ओर देखा और समझा कि जिस फ़र्श पर वे बैठे हैं, उसकी भी एक कहानी है।
मेरे पिताजी धीरे-धीरे खड़े हुए।
“काव्या, मुझे माफ़ी की उम्मीद नहीं है।”
“अच्छी बात है,” मैंने कहा।
उन्होंने यह बात स्वीकार कर ली।
“मेरे पास एक और चीज़ है।”
उन्होंने लाल स्वेटर के पास एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा रख दिया।
“यह पुणे वाले पुराने घर के कागज़ हैं।”
मेरा दिल कस गया।
“हमारा घर?”
“हाँ। मैंने उसे कभी बेचा नहीं।”
मैं उन्हें देखती रह गई।
मुझे हमेशा लगा था कि वह घर बिक चुका है। मेरे कॉलेज जाने के बाद किसी अपार्टमेंट या दुकान में बदल गया होगा।
“वह अब भी है?”
“हाँ। बंद है। एक देखभाल करने वाला उसकी देखरेख करता है। मैं उसमें रह नहीं पाया। बेच भी नहीं पाया।”
उन्होंने कावेरी की ओर देखा।
“तुम्हारा कमरा भी वैसा ही है।”
कावेरी ने अपना मुँह ढँक लिया।
उनका कमरा।
रसोई के पास छोटा-सा कमरा।
एक खिड़की, जो तुलसी के पौधे की ओर खुलती थी।
बुरे सपने आने पर मैं चुपके से वहीं चली जाती थी।
वह मुझे डाँटने का नाटक करतीं, फिर अपनी पतली-सी गद्दी पर मेरे लिए जगह बना देतीं।
पापा ने लिफ़ाफ़ा मेरी ओर बढ़ाया।
“मैंने वह घर तुम्हारे नाम कर दिया है।”
मैंने उसे हाथ नहीं लगाया।
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारी माँ चाहती थीं कि वह तुम्हारा हो। और अगर तुम अनुमति दो… तो मैं चाहता हूँ कि उसका एक हिस्सा वैसा बन जाए जैसा तुम्हारी माँ के जाने के बाद बनना चाहिए था।”
“क्या?”
उन्होंने फिर कावेरी की ओर देखा।
“ऐसी औरतों के लिए एक जगह, जिन्हें परिवार उनका प्यार इस्तेमाल कर लेने के बाद बाहर निकाल देते हैं।”
पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
कावेरी फुसफुसाईं,
“सर…”
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “इससे मेरा किया हुआ ठीक नहीं होगा। कुछ भी उसे ठीक नहीं कर सकता।”
मैंने लाल स्वेटर की ओर देखा।
चिट्ठियों की ओर देखा।
कावेरी के फटे हुए हाथों की ओर देखा।
अपने पिता के झुके हुए कंधों की ओर देखा।
उन निवेशकों की ओर देखा जो विस्तार की योजना पर चर्चा करने आए थे, लेकिन अब किसी और तरह की नींव रखी जाती देख रहे थे।
सालों तक मैंने एक कंपनी बनाई क्योंकि मुझे लगता था कि सफलता मेरे बचपन के खालीपन को भर देगी।
वह नहीं भर सकी।
लेकिन शायद वह एक दरवाज़ा खोल सकती थी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठा लिया।
“हम इसका नाम मोलू हाउस रखेंगे,” मैंने कहा।
कावेरी ने हल्की-सी साँस खींची।
मेरे पिताजी रो पड़े।
मैंने उन्हें कभी रोते नहीं देखा था।
न माँ की अंतिम यात्रा पर।
न जब मैं घर छोड़कर गई।
न तब भी जब मैंने उन्हें फ़ोन करना बंद कर दिया।
आज वे रो रहे थे क्योंकि मेरे बचपन का एक नाम उन सभी बड़ों से ज़्यादा मज़बूत निकला, जिन्होंने उसे निराश किया था।
कावेरी आँसुओं के बीच सिर हिलाने लगीं।
“नहीं, नहीं। यह बहुत ज़्यादा है।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आपने एक बार मुझसे कहा था कि डरना ठीक है, लेकिन होमवर्क करना भी ज़रूरी है। यह मेरा होमवर्क है, मासी।”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“दफ़्तर में मुझे मासी मत कहना,” उन्होंने अचानक संकोच से कहा।
मैं मुस्कुराई।
“ठीक है… डायरेक्टर कावेरी।”
उस दिन पहली बार वे खुलकर हँसीं।
हल्की-सी।
आँसुओं से भीगी हुई।
ज़िंदा।
पूरे बोर्डरूम ने जैसे एक साथ साँस छोड़ी।
मेरी एचआर हेड खड़ी हो गई।
“नियुक्ति-पत्र मैं खुद तैयार करूँगी।”
एक बुज़ुर्ग महिला निवेशक, जो अब तक चुप थीं, उन्होंने अपना चश्मा उतारकर आँखें पोंछीं।
“मोलू हाउस का प्रस्ताव मुझे भेजिए,” उन्होंने कहा। “मेरा फ़ंड उसका समर्थन करेगा।”
मेरे सीएफ़ओ ने जैसे विरोध करना चाहा, फिर समझदारी से सहानुभूति सीखने का निर्णय ले लिया।
बैठक बिना किसी स्लाइड के समाप्त हो गई।
अब किसी को उनकी परवाह नहीं थी।
शाम तक पूरी इमारत को सब पता चल चुका था।
कुछ कहानियाँ ग़लत थीं।
कुछ लोगों ने कहा कि मुझे अपनी बचपन की आया मिल गई।
कुछ ने कहा कि मैंने एक सफ़ाईकर्मी को डायरेक्टर बना दिया।
कुछ ने कहा कि सीईओ बोर्डरूम में रो पड़ी।
तीनों बातें अपने-अपने ढंग से सच थीं।
एचआर जब कावेरी के लिए आपातकालीन अलमारी से एक साधारण सूती साड़ी लेकर आई, तो उन्होंने मेरे दफ़्तर के वॉशरूम में अपनी हाउसकीपिंग वाली साड़ी बदल ली। जब वह बाहर आईं तो वह गरिमामयी भी लग रही थीं और डरी हुई भी, जैसे सम्मान एक नया जूता हो जो अभी तक पैरों में चुभ रहा हो।
मैंने उन्हें अपनी कुर्सी पर बैठाया।
उन्होंने तीन बार मना किया।
चौथी बार मैंने कहा,
“बैठिए… फिर खाना खाइए।”
वे फिर हँस पड़ीं।
“अब भी उतनी ही ज़िद्दी हो।”
“आपने ही बनाया है।”
उन्होंने मेरे बालों को छूना चाहा, फिर हाथ रोक लिया क्योंकि कर्मचारी देख रहे थे।
मैंने खुद अपना सिर उनकी हथेली की ओर झुका दिया।
उन्हें यह भी देखने दो।
सूरज डूबते समय मेरे पिताजी जाने के लिए तैयार हुए।
वे अपनी छड़ी के सहारे मेरे दफ़्तर के दरवाज़े पर खड़े थे।
“काव्या,” उन्होंने धीरे से कहा, “क्या मोलू हाउस खुलने पर मैं वहाँ आ सकता हूँ?”
मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा।
मेरे भीतर की बच्ची ‘नहीं’ कहना चाहती थी।
मेरे भीतर की बड़ी औरत समय माँगना चाहती थी।
दोनों बातें सच थीं।
“आप आ सकते हैं,” मैंने आख़िरकार कहा। “लेकिन मालिक बनकर नहीं। उद्धारकर्ता बनकर नहीं। एक स्वयंसेवक बनकर।”
उन्होंने सिर हिलाया। उनकी आँखों में आँसू थे।
“ज़रूरत पड़ी तो मैं फ़र्श भी साफ़ करूँगा।”
कावेरी ने उनकी ओर देखा।
“तो ठीक से साफ़ कीजिएगा,” उन्होंने कहा। “कोनों में सबसे पहले धूल जमती है।”
एक पल के लिए हम तीनों मुस्कुरा दिए।
न पूरी तरह ठीक हुए थे।
न पूरी तरह माफ़ किया था।
लेकिन पहली बार एक ही कमरे में बिना झूठ के खड़े थे।
उनके जाने के बाद मुझे लगा कि आज जितना सच सामने आ सकता था, आ चुका है।
मैं ग़लत थी।
रात 9 बजकर 15 मिनट पर, जब दफ़्तर लगभग खाली हो चुका था और कावेरी दोनों हाथों से पेपर कप पकड़कर मेरे केबिन में चाय पी रही थीं, मेरा फ़ोन बजा।
अनजान नंबर।
मैंने कॉल उठाई।
एक आदमी की आवाज़ आई।
“क्या मैं मिस काव्या नायर से बात कर रहा हूँ?”
“जी।”
“मैं एडवोकेट सागर कुलकर्णी बोल रहा हूँ। मैंने श्रीमती वसुधा नायर की संपत्ति से जुड़े कागज़ात संभाले थे।”
बुआ का नाम सुनते ही मेरा शरीर ठंडा पड़ गया।
“क्या बात है?”
“पुणे वाला घर खोलने से पहले आपको एक बात जाननी चाहिए।”
कावेरी ने मेरी ओर देखा।
मेरी उँगलियाँ फ़ोन पर कस गईं।
“क्या?”
वकील कुछ पल रुका।
“वसुधा मैडम के संदूक में, कावेरी जी की चिट्ठी के साथ, हमें एक और सीलबंद पैकेट मिला। उस पर आपकी माँ का नाम लिखा है।”
“मेरी माँ?”
“जी। और उस पर एक निर्देश भी लिखा हुआ है।”
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
“क्या लिखा है?”
उन्होंने धीरे-धीरे पढ़ा।
“अगर कावेरी कभी काव्या के पास लौट आए, तो उन दोनों को मेरी मृत्यु से एक रात पहले की पूरी सच्चाई बता देना।”
कावेरी इतनी तेज़ी से खड़ी हुईं कि चाय कालीन पर गिर गई।
माँ की मृत्यु से एक रात पहले।
वही रात जब मुझे तेज़ बुखार था और कावेरी मेरे कमरे के बाहर सोई थीं।
वही रात जब पिताजी ने कहा था कि माँ बोलने की हालत में नहीं थीं।
वही रात जिसके बाद सब कुछ बदल गया।
मैंने कावेरी की ओर देखा।
वे काँप रही थीं।
मेरे काँच वाले दफ़्तर के बाहर, इकतीसवीं मंज़िल की शीशे की दीवारों में हमारे चेहरे लौटकर दिखाई दे रहे थे—एक सीईओ, एक देखभाल करने वाली, एक जीवित बची हुई, एक बेटी—जो शोक से भी पुराने एक रहस्य के सामने खड़े थे।
और मेरी दराज़ में लाल स्वेटर फिर से तह करके रखा था। अब वह खोया हुआ नहीं था, लेकिन अचानक यादों से भी ज़्यादा भारी हो गया था।
अगर आज रात कावेरी मासी ने आपका दिल छू लिया है, तो बताइए—आपको क्या लगता है, काव्या की माँ ने अपनी मृत्यु से पहले क्या छिपाया था? और जुड़े रहिए, क्योंकि अगला सच शायद यह बताएगा कि कावेरी को सिर्फ़ उस घर से निकाला ही नहीं गया था, बल्कि एक मरती हुई औरत से किया गया आख़िरी वादा निभाने से पहले उन्हें चुप भी करा दिया गया था।
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