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“अब तेरी उम्र में कुछ नया नहीं हो सकता” — पति ने घर बेचकर बूढ़ी पत्नी को बेघर किया, पर टूटे करघे के नीचे छिपा पुराना कागज ऐसा राज खोलने वाला था कि पूरा गांव सन्न रह गया

भाग 1
85 साल की शांता देवी को उनके ही पति ने आधी रात को घर से बाहर निकाल दिया, और जाते-जाते यह भी कह दिया कि अगर कहीं मरने की जगह नहीं है तो अपने बच्चों के दरवाजे पर जाकर मर जाओ।

रघुवीर सिंह चौखट के पास रखी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था। उसके सामने पीतल का गिलास, देसी शराब की बोतल और जमीन बेचने के कागज पड़े थे। चूल्हे की आंच बुझ चुकी थी, लेकिन रसोई में अभी भी रोटी और सरसों के साग की गंध थी। बाहर उत्तराखंड के पहाड़ी गांव में जनवरी की ठंड उतर रही थी। हवा इतनी तेज थी कि पुराने मकान की खिड़कियां कांप रही थीं।

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शांता देवी की उम्र 85 थी। सफेद बालों की चोटी पतली होकर कंधे तक रह गई थी। गठिया से उंगलियां मुड़ चुकी थीं। फिर भी वह हर शाम उसी रसोई में खड़ी होकर रघुवीर के लिए रोटी सेंकती थी, जैसे 64 साल पहले ब्याहकर आई नवेली दुल्हन हो।

उसने भीगे हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में पोंछे और धीमे से पूछा—

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—तुमने सच में घर बेच दिया?

रघुवीर ने गिलास उठाया, एक घूंट पिया और बिना आंख उठाए बोला—

—2 हफ्ते पहले बेच चुका हूं। कल सुबह नए मालिक चाबी लेने आएंगे।

शांता देवी को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की मिट्टी सरक गई हो। यही घर था जहां उसके 4 बच्चे पैदा हुए थे। इसी आंगन में उसने तुलसी लगाई थी। इसी दीवार के सहारे उसने अपनी सास की आखिरी सांसें देखी थीं। इसी रसोई में उसने बरसों तक इंतजार किया था कि रघुवीर शराब पीकर लौटेगा, गाली देगा, फिर सो जाएगा।

वह कांपती आवाज में बोली—

—और मैं कहां जाऊंगी?

रघुवीर हंसा। वह हंसी सूखी, ठंडी और काटने वाली थी।

—तूने जिंदगी भर खाया-पीया, अब बच्चों के पास जा। 85 साल की उम्र में और क्या नया करेगी?

यह वाक्य थप्पड़ से भी ज्यादा तेज लगा। रघुवीर ने कभी हाथ कम उठाया था, पर शब्दों से उसने शांता देवी को रोज-रोज तोड़ा था। कभी कहा था कि औरत की कमाई अपशकुन होती है। कभी कहा था कि करघा चलाने वाली औरत बाजारू लगती है। कभी कहा था कि इस घर में जो भी है, सब उसका है।

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उस रात रघुवीर कमरे में खर्राटे भरता रहा और शांता देवी रसोई की देहरी पर बैठी रही। उसने बच्चों को फोन करने का सोचा, पर तुरंत मन बदल लिया। बड़ा बेटा देहरादून में किराए के 2 कमरों में परिवार के साथ रहता था। बड़ी बेटी मेरठ में ऐसे घर में थी जहां उसका अपना सम्मान नहीं था। छोटा बेटा 12 साल से मुंबई में था, बस त्योहार पर संदेश भेज देता था। सबसे छोटी बेटी सिलाई करके मुश्किल से घर चलाती थी।

शांता देवी किसी के घर बोझ बनकर नहीं जाना चाहती थी।

तभी अचानक उसे एक बात याद आई। ऐसी बात जिसे उसने 50 साल से अपने भीतर बंद कर रखा था।

उसकी नानी गंगा देवी की लकड़ी की पुरानी झोपड़ी।

गांव से ऊपर, देवदार के जंगल के भीतर, एक सूखी धार के पास। बचपन में शांता वहीं नानी के साथ ऊन कातना, रंग बनाना और हथकरघे पर शाल बुनना सीखती थी। शादी के बाद रघुवीर ने साफ कह दिया था—

—मेरे घर की बहू बाजार में शाल बेचती घूमेगी, यह मत सोच लेना।

उस दिन के बाद शांता ने करघा छूना छोड़ दिया था।

लेकिन वह झोपड़ी रघुवीर नहीं जानता था। उसके लिए औरतों की चीजें, औरतों की यादें और औरतों की जमीन कभी जमीन नहीं थीं।

सुबह होने से पहले शांता देवी ने एक पुरानी चादर में 2 जोड़ी कपड़े, एक छोटी हांडी, मुट्ठी भर चावल, माचिस, सूखी मिर्च, और नानी की धुंधली तस्वीर बांधी। उसने मंदिर से पीतल की छोटी घंटी उठाई, फिर एक बार घर को देखा।

कभी यह उसका घर था।

अब वह बिना आवाज किए बाहर निकल गई।

पहाड़ की पगडंडी गीली थी। हर कदम पर घुटनों में आग लगती थी। कोहरा चेहरे पर चिपक रहा था। देवदार के पेड़ अंधेरे पहरेदारों की तरह खड़े थे। नीचे नदी की आवाज आती थी। कई बार उसे लगा कि वह गिर जाएगी, लेकिन उसने अपनी लाठी मिट्टी में गाड़कर खुद को संभाला।

दोपहर से पहले वह उस खुली जगह तक पहुंची।

झोपड़ी अब भी वहीं थी।

छत का आधा हिस्सा धंस चुका था। दीवारों की लकड़ी काली पड़ गई थी। दरवाजा एक ही कुंडी पर टेढ़ा लटक रहा था। झाड़ियां आंगन में घुस आई थीं। कोई कहता तो कहता कि यह रहने की जगह नहीं, कब्र है।

शांता देवी ने गठरी जमीन पर रखी और टूटे दरवाजे को छुआ।

—नानी, मैं आ गई।

उसकी आवाज टूट गई।

—सबने छोड़ दिया… बस तुम याद आ गईं।

उसने दरवाजा धकेला। अंदर धूल, बंद हवा और बीते हुए वर्षों की गंध थी। अंधेरा इतना घना था कि पहले कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर धीरे-धीरे उसकी आंखें अभ्यस्त हुईं।

दीवार के सहारे कुछ खड़ा था, ऊपर से सड़ी बोरी ढकी हुई।

शांता देवी घुटनों के बल बैठी। उंगलियां दर्द से कांप रही थीं। उसने बोरी खींची।

नीचे नानी का पुराना करघा था।

लकड़ी सूखकर फट गई थी, रस्सियां ढीली थीं, पर करघा जैसे इंतजार में खड़ा था। जैसे गंगा देवी बस अभी जंगल से घास लेकर लौटेंगी और कहेंगी—

—शांता, धागा बराबर पकड़, बहुत कसोगी तो टूट जाएगा।

शांता ने लकड़ी पर हाथ फेरा। उसकी आंखों में पानी भर आया, पर वह रोई नहीं। उसी समय करघे के नीचे उसे लोहे का एक छोटा संदूक दिखा। काले जंग से भरा, धूल में आधा दबा हुआ।

उसने संदूक बाहर खींचा। कुंडी अटकी थी। उसने पत्थर से मारकर उसे खोला।

अंदर न सोना था, न पैसा, न गहना।

एक पुराना कपड़ा, सूखी हुई बीजों की थैली, छोटी सी काली चाबी और मोड़ा हुआ कागज था।

कागज पर उसका नाम लिखा था।

“शांता के लिए।”

उसके हाथ और तेजी से कांपने लगे। उसने कागज खोला। अक्षर पुराने थे, पर साफ थे। नीचे नानी गंगा देवी और मां कमला के नाम थे।

पहली ही पंक्ति पढ़कर उसका शरीर ठंडा पड़ गया।

“कभी किसी आदमी को वह मत बेचने देना, जो औरतों ने तुम्हारे लिए बचाकर रखा है।”

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भाग 2

शांता देवी ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी, जैसे हर बार अक्षर उसके भीतर कोई नया दरवाजा खोल रहे हों। कागज में लिखा था कि जंगल की यह झोपड़ी और उसके आस-पास की छोटी जमीन गंगा देवी ने अपनी बेटी कमला के नाम छोड़ी थी, और कमला ने उसे अपनी बेटी शांता के लिए सुरक्षित रखा था। यह अदालत की चमकदार फाइल नहीं थी, पर गांव की पुरानी पंचायत की मुहर, 2 गवाहों के नाम और नानी की सख्त लिखावट उसमें दर्ज थी। “यह छत बेटियों की बेटियों के लिए है। पतियों के लिए नहीं। दामादों के लिए नहीं। उन मर्दों के लिए नहीं जो समझते हैं कि औरत को अपने सिर पर छत की जरूरत नहीं।” शांता देवी के सीने में जैसे बुझी राख के नीचे आग जल उठी। पूरी जिंदगी उसने चुप रहना सीखा था। रघुवीर ने करघा छुड़वाया, पैसे छीन लिए, आवाज दबाई, और वह घर बचाने के नाम पर सब सहती रही। पर उसकी नानी ने चुप रहकर भी एक घर छुपा दिया था। उस दिन शांता ने झोपड़ी बुहारी, चूल्हा साफ किया, टपकती छत पर टिन का टुकड़ा टिकाया और देवदार की सूखी लकड़ियां जमा कीं। रात को उसने चावल की पतली खिचड़ी खाई और आग के पास सिकुड़कर सो गई। अगले कई दिन भूख, ठंड और दर्द से भरे थे। पर एक सुबह उसे आंगन के कोने में पुराने राजमा, मडुवा और चौलाई के पौधे मिले, जो बिना किसी देखभाल के फिर भी उग आए थे। उसने बीज बोए। करघा साफ किया। उंगलियां साथ नहीं देती थीं, धागा टूटता था, कमर जलती थी, पर हाथों ने वही याद कर लिया जो मन भूल चुका था। 1 महीने बाद वह नीचे हाट में छोटी ऊनी पट्टी लेकर उतरी। लोग उसे ऐसे देख रहे थे जैसे भूत देख लिया हो। एक दिल्ली से आई महिला ने बिना मोलभाव किए वह पट्टी खरीद ली। शांता ने नमक, चाय, ऊन और 3 बड़ी कीलें खरीदीं। तभी 17 साल की एक लड़की, गाल पर नीला निशान लिए, उसके पास आई। उसका नाम काजल था। सौतेला चाचा उसे 50 साल के दुकानदार से ब्याहकर कर्ज उतारना चाहता था। शांता ने बस इतना कहा—ऊपर ठंड है, पर दरवाजा है। काजल उसके साथ चली गई। फिर आई बिमला, जिसे बेटों ने कमरे से निकाल दिया था। फिर आई रेशमा, जो बहू की मार से बोलना भूल गई थी। झोपड़ी टूटे दिलों से भरने लगी। और नीचे गांव में रघुवीर को खबर लगी कि उसकी पत्नी किसी के घर मरने नहीं गई। वह कमा रही थी। घर उठा रही थी। और लोग उसे “पहाड़ वाली अम्मा” कहने लगे थे। उसी शाम रघुवीर शराब पीकर लाठी टेकता हुआ ऊपर चढ़ा और दरवाजे पर घूंसा मारकर गरजा—शांता, दरवाजा खोल। यह झोपड़ी भी मेरी है, क्योंकि तू मेरी पत्नी है। अंदर सभी औरतों के हाथ करघे पर रुक गए। शांता चाबी लेकर उठी, पर दरवाजा खोलने से पहले काजल ने खिड़की से देखा कि रघुवीर अकेला नहीं आया था।

भाग 3

रघुवीर के पीछे 2 आदमी खड़े थे।

एक था महिपाल साहूकार, जिसके यहां से रघुवीर ने शराब, जुए और दिखावे के लिए कई बार पैसे उठाए थे। दूसरा था रघुवीर का भतीजा नरेश, लंबा-चौड़ा, आंखों में वही अकड़ जो घरों की दीवारों में डर भर देती है। तीनों के जूतों पर कीचड़ लगा था। कोहरा उनके कंधों पर बैठा था, पर चेहरे पर शर्म का एक कतरा भी नहीं था।

रघुवीर ने फिर दरवाजा पीटा।

—खोल शांता। मैं अपनी चीज लेने आया हूं।

अंदर काजल की सांस तेज चल रही थी। बिमला ने चूल्हे के पास रखी लोहे की सलाख पकड़ ली। रेशमा, जो कई दिनों से ठीक से बोली नहीं थी, धीरे से खड़ी हो गई। शांता ने सबको हाथ से शांत किया।

वह डरी हुई थी। डर झूठ नहीं था। 64 साल तक जिस आवाज पर उसने थाली रख दी, पानी गरम कर दिया, जवाब निगल लिया, वह आवाज आज भी शरीर के भीतर कहीं कांपती थी। लेकिन आज उसके पीछे सिर्फ दीवार नहीं थी। उसके पीछे वे औरतें थीं जिन्हें उसने दरवाजा दिया था। उसके पीछे नानी गंगा देवी की लिखावट थी। उसके पीछे वह करघा था जिसने उसकी चुप्पी को धागा बना दिया था।

शांता ने दरवाजा थोड़ा सा खोला।

—यह झोपड़ी तुम्हारी नहीं है, रघुवीर।

रघुवीर ने थूक निगला और हंसा।

—अरे, पत्नी की चीज पति की होती है। कानून नहीं जानती तू?

शांता की आंखें पहली बार नहीं झुकीं।

—तुमने यही समझकर घर बेच दिया। पर यह घर न तुमने बनाया, न खरीदा, न कभी जाना। यह मेरी नानी का था। मेरी मां ने मेरे लिए छोड़ा।

महिपाल आगे आया। उसकी आवाज चिकनी थी, मगर आंखों में हिसाब था।

—रघुवीर ने बताया है कि यहां ऊन है, शाल हैं, पैसा है। उसने मुझसे उधार लिया है। उसका कर्ज चुकाना पड़ेगा।

—उसने तुमसे पैसा लिया था, मैंने नहीं।

—पति-पत्नी एक ही होते हैं।

—जब घर बेचकर शराब पी रहा था, तब उसने मुझसे पूछा नहीं। अब कर्ज में मुझे क्यों याद किया?

महिपाल का चेहरा कस गया।

नरेश ने दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया।

—बुआ, ज्यादा नाटक मत करो। अकेली बूढ़ी औरत हो। दरवाजा खोलो, वरना हम खुद खोल लेंगे।

तभी रेशमा की आवाज निकली। आवाज धीमी थी, पर वह कमरे में रखे हर डर को चीर गई।

—अकेली नहीं हैं।

काजल शांता के बगल में आकर खड़ी हो गई। फिर बिमला आई। फिर रेशमा। फिर 2 और औरतें, जो पिछले ही हफ्ते आई थीं। कोई जवान थी, कोई झुकी हुई, किसी की आंख सूजी थी, किसी के हाथ छिले थे, पर सभी दरवाजे पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो गईं।

रघुवीर ने उन्हें घूरा।

—वाह, तो यह तमाशा बनाया है तूने? छोड़ी हुई औरतों का अड्डा?

शांता के भीतर वह शब्द गिरा, पर इस बार उसने उसे घायल नहीं किया। उसे लगा जैसे कोई पुराना पत्थर पानी में पड़ा और डूब गया।

—मैंने घर बनाया है। वह काम जो तुम 64 साल में नहीं सीख पाए।

रघुवीर का चेहरा लाल हो गया। उसने हाथ उठाया, शायद दरवाजा धकेलने के लिए, शायद अपने पुराने अधिकार की आखिरी कोशिश के लिए। पर शांता ने पल्लू से वह कागज निकाला।

—यह पढ़ो। गंगा देवी ने यह जमीन अपनी बेटी को दी थी। कमला ने मुझे दी। इस पर गांव के 2 गवाहों के नाम हैं, और पुरानी पंचायत की मुहर भी। नीचे चमोली में अभी भी हरीश दत्त जिंदा हैं, वही पटवारी के मुंशी थे तब। वह जानते हैं यह जमीन किसकी है।

महिपाल ने कागज छीनना चाहा।

काजल ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

—हाथ मत लगाना।

काजल की आवाज कांपी नहीं। यही देखकर शांता की आंखें भर आईं। वही लड़की जो पहली रात डर से चूल्हे के पीछे बैठी रही थी, आज साहूकार का हाथ रोक रही थी।

रघुवीर गरजा—

—औरतों के कागज से जमीन नहीं चलती।

शांता ने दरवाजा पूरा खोल दिया, मगर देहरी से हटे बिना बोली—

—तो कल पंचायत में चलेंगे। तहसील भी चलेंगे। थाने भी चलेंगे। पर आज यह देहरी तुम पार नहीं करोगे।

यही बात उन्हें तोड़ गई।

रघुवीर उस औरत को खोज रहा था जो उसके गुस्से की आवाज सुनकर रोटी पर घी लगाना भूल जाती थी। जो गाली सुनकर भी पानी का गिलास पकड़ाती थी। जो कहती थी, “जो ठीक समझो कर लो।” लेकिन वह औरत उस बिके हुए घर में रह गई थी। सामने जो खड़ी थी, वह वही छोटी शांता थी जिसे गंगा देवी ने देवदारों के बीच धागा पकड़ना सिखाया था।

महिपाल ने नरेश को आंख से इशारा किया, पर नरेश भी अब उलझ गया था। दरवाजे पर सिर्फ बूढ़ी औरत नहीं, गवाह खड़ी थीं। गांव में बात फैलती तो मामला उल्टा पड़ सकता था। ऊपर से काजल के चेहरे का निशान, बिमला की उम्र, रेशमा की चुप्पी—ये सब कहानी बन जाते।

तीनों गालियां देते हुए नीचे उतर गए।

रघुवीर ने जाते-जाते कहा—

—कल देख लूंगा तुझे।

अगले दिन उसने सच में पंचायत बुलाई। पर वहां कहानी उसकी इच्छा के हिसाब से नहीं चली। बूढ़े हरीश दत्त को दो लोग सहारा देकर लाए। उन्होंने कागज देखा, मुहर पहचानी और सबके सामने कहा—

—यह जमीन गंगा देवी के नाम थी। फिर कमला के हिस्से में गई। कमला ने इसे शांता के लिए छोड़ा था। गांव ने इसे कभी बेचा नहीं, क्योंकि यह स्त्रियों की परंपरागत छत मानी जाती थी।

भीड़ में खुसर-पुसर शुरू हो गई।

सरपंच ने रघुवीर की ओर देखा।

—जिस घर को तुमने बेचा, उसका हिसाब तुम जानो। इस झोपड़ी पर तुम्हारा कोई हक नहीं।

महिपाल का चेहरा उतर गया। उसने पहली बार रघुवीर को ऐसे देखा जैसे कर्जदार नहीं, मुसीबत हो।

उस दिन रघुवीर गांव के सामने छोटा पड़ गया। वही आदमी जो चौपाल में ऊंची आवाज में कहता था कि उसकी पत्नी बिना उसके पानी भी नहीं पी सकती, अब सबके सामने चुप खड़ा था।

कहानी आग की तरह फैली।

जिस बूढ़ी औरत को पति ने सड़क पर छोड़ दिया था, उसके पास पहाड़ पर अपना घर निकला। जिसे लोग बेचारी कह रहे थे, वह शाल बेच रही थी। जिसे मरने भेजा गया था, वह दूसरों को जीना सिखा रही थी।

शांता की झोपड़ी में अब दिनभर करघे की आवाज गूंजती। काजल ने ऊन कातना सीखा। बिमला जड़ी-बूटियों से रंग बनाती। रेशमा फूलों की महीन कढ़ाई करती। एक और विधवा, देवकी, पुराने लोकगीत गाती, जिनकी ताल पर लड़कियां धागे लपेटतीं। धुएं से काली दीवारों पर धीरे-धीरे रंग लौटने लगा।

हाट में उनकी शालें बिकने लगीं। पहले लोग दया से खरीदते थे, फिर पसंद से खरीदने लगे। फिर शहर से लोग आने लगे। ऋषिकेश से एक दुकानवाली ने 12 शालों का ऑर्डर दिया। दिल्ली की एक महिला ने कहा कि वह इनका काम ऑनलाइन बेचेगी। शांता देवी को ऑनलाइन का अर्थ नहीं पता था, पर इतना समझ गई कि पहाड़ की आवाज बहुत दूर जाएगी।

पहली कमाई से उन्होंने छत की मरम्मत कराई। दूसरी कमाई से 4 खाटें खरीदीं। तीसरी कमाई से अनाज, दवा और एक बड़ा ताला। फिर उन्होंने आंगन में मडुवा, राजमा और चौलाई की खेती बढ़ाई। देवदारों के बीच रंगे हुए धागे सूखने लगे—लाल, नीले, पीले, हरे। कोहरे में वे ऐसे चमकते जैसे किसी ने पहाड़ पर इंद्रधनुष बांध दिया हो।

लोगों ने झोपड़ी का नाम बदल दिया।

अब उसे “दादियों का घर” कहा जाने लगा।

वह सिर्फ रहने की जगह नहीं रही। वह उन औरतों की शरण बन गई जिनके घरों में उनके लिए जगह नहीं बची थी। कोई बहू की गाली से भागकर आती। कोई बेटों की लालच से। कोई जबरन शादी से। कोई दहेज की आग से। शांता दरवाजे पर खड़ी होकर पहले नाम नहीं पूछती थी। बस कहती—

—चाय पी ले। फिर जो बोलना हो, बोलना।

फिर वह उनके हाथ में तकली या धागा पकड़ा देती।

—जुबान थकी हो तो हाथों को बोलने दे।

धीरे-धीरे हाथ बोलते। एक लड़की पहली बार अपनी कमाई गिनती तो हंस पड़ती। एक विधवा पहली बार अपना नाम शाल पर काढ़ती तो रो देती। कोई कहती कि वह बेकार है, तो शांता उसके टेढ़े धागे को देखकर कहती—

—टेढ़ा धागा भी कपड़े में जगह पा लेता है। बस उसे फेंकना नहीं चाहिए।

शांता देवी गुरु बन गई, बिना कभी गुरु कहलाना चाहे।

हर शाम वह करघे के पास बैठती और समझाती—

—धागा बहुत कसोगी तो टूट जाएगा।

—बहुत ढीला छोड़ोगी तो कपड़ा टिकेगा नहीं।

—जिंदगी भी ऐसी ही है। न बेड़ी, न बिखराव। बस अपनी सही पकड़।

समय बीतता गया। काजल अब डरती हुई लड़की नहीं रही। वह गांव की लड़कियों को जबरन शादी से बचाने में आगे रहने लगी। बिमला की कमर झुकी थी, पर आवाज सीधी हो गई थी। रेशमा अब बोलती थी, और जब बोलती थी तो सब सुनते थे।

रघुवीर की हालत गिरती गई। घर बिक गया था, पैसा शराब और कर्ज में खत्म हो गया। जिन लोगों के साथ वह बैठता था, वे भी उससे कतराने लगे। महिपाल ने उसकी बची जमीन पर दावा ठोक दिया। बेटे उसे अपने पास रखने को तैयार नहीं थे। जिस आदमी ने पत्नी को बोझ कहा था, वह खुद हर दरवाजे पर बोझ बन गया।

एक शाम बारिश के बाद कोहरा घना था। शांता आंगन में बैठी धागा सुलझा रही थी। तभी उसने पगडंडी पर एक आकृति देखी। कोई लाठी टेकता हुआ ऊपर आ रहा था। कपड़े गीले, चेहरा धंसा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई।

रघुवीर था।

वह देहरी तक आया, पर इस बार उसने दरवाजा नहीं पीटा। उसने सिर से टोपी उतारी और आंखें नीचे कर लीं।

—शांता… मेरे पास सोने की जगह नहीं है।

अंदर सन्नाटा छा गया। काजल ने शांता की ओर देखा। बिमला के होंठ भींच गए। रेशमा ने करघा रोक दिया।

शांता बहुत देर तक उसे देखती रही।

वही आदमी था जिसने कहा था कि 85 साल की उम्र में कोई नई जिंदगी शुरू नहीं करता। वही जिसने 64 साल की रसोई, सेवा और इंतजार को एक झटके में सड़क पर फेंक दिया था। वही जिसने सोचा था कि पत्नी घर की वस्तु है—पुरानी हो जाए तो निकाल दो।

शांता चाहती तो दरवाजा बंद कर सकती थी। कोई उसे दोष नहीं देता।

लेकिन वह रघुवीर नहीं थी।

वह धीरे से उठी और देहरी पर आई।

—इस घर के अंदर तुम नहीं आओगे।

रघुवीर ने सिर उठाया। उसकी आंखें भीग गईं।

शांता ने शांत आवाज में कहा—

—यह घर उन औरतों का है जो टूटकर यहां आती हैं। तुम्हारी परछाईं उनका डर वापस ले आएगी। मैं वह नहीं करूंगी।

रघुवीर का गला भर आया।

—मैं कहां जाऊं?

—कल काजल तुम्हें नीचे आश्रम तक छोड़ आएगी। वहां बुजुर्गों के लिए बिस्तर है, खाना है। मैं एक मोटी शाल भेज दूंगी। ठंड नहीं लगेगी।

वह रो पड़ा। वह रोना पछतावे से ज्यादा खालीपन का था।

—मुझे माफ कर दे, शांता।

शांता ने आंखें बंद कीं। उसके भीतर से 64 साल की आवाजें उठीं—गालियां, इंतजार, टूटी थालियां, दबे सपने, बंद करघा। फिर उसे नानी की आवाज सुनाई दी—धागा इतना मत कस कि टूट जाए।

उसने आंखें खोलीं।

—मैं अब तुम्हें ढोऊंगी नहीं, रघुवीर। यही बात मैं खुद को माफ करती हूं।

अगले दिन काजल और गांव के 2 लड़के रघुवीर को आश्रम छोड़ आए। शांता ने सच में उसके लिए मोटी शाल भेजी, साथ में गुड़ और भुने चने। न प्रेम में, न कमजोरी में। बस इसलिए कि उसने तय कर लिया था—वह उस आदमी जैसी नहीं बनेगी जिसने उसे तोड़ा था।

सालों बाद शांता देवी की मृत्यु भी उसी घर में हुई।

वह अकेली नहीं थी। उसके बिस्तर पर वही शाल थी जिसमें 12 औरतों ने अपने-अपने धागे जोड़े थे। काजल, अब मजबूत औरत, उसका हाथ पकड़े बैठी थी। बिमला मंत्र बुदबुदा रही थी। रेशमा चुपचाप उसके पैरों पर तेल मल रही थी। बाहर देवदारों के बीच कोहरा उतर रहा था और चूल्हे से धुआं उठ रहा था।

शांता ने आखिरी बार करघे की ओर देखा।

उसकी आंखों में डर नहीं था।

सिर्फ शांति थी।

उसे नानी की झोपड़ी के पास, मडुवा और राजमा के खेत के किनारे दफनाया गया। उसकी कब्र पर किसी ने पत्थर की बड़ी मूर्ति नहीं रखी। वहां सिर्फ तुलसी, चौलाई और ऊन के 3 रंगीन धागे बांधे गए।

दादियों का घर बंद नहीं हुआ।

आज भी जब कोई औरत पीठ पर गठरी, आंखों में नमक और दिल में टूटी हुई आवाज लेकर उस पगडंडी पर चढ़ती है, तो उसे चिमनी से धुआं उठता दिखता है। अंदर चाय गरम होती है। दीवार के पास करघा रखा होता है। और कोई न कोई कहता है—

—पहले बैठ जा। यहां कोई तुझे बोझ नहीं कहेगा।

शांता देवी से उसका घर छीन लिया गया था। उसकी कमाई छीन ली गई थी। उसकी आवाज 64 साल तक दबाई गई थी।

लेकिन उसकी जड़ नहीं छीनी जा सकी।

और जब एक औरत अपनी जड़ पहचान लेती है, तो 85 साल की उम्र में भी मिट्टी फटती है, बीज जागता है, और नया जंगल उग आता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.