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चैरिटी गाला में पति ने अपनी प्रेमिका को पत्नी की साड़ी, अंगूठी और सम्मान वाली कुर्सी दे दी, सबने उसे “मिसेज” कहा और वह चुप रहा; 18 साल का बेटा बस फाइल लेकर खड़ा था, क्योंकि उस रात 51% कंपनी का खेल पलटने वाला था…

PART 1

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चैरिटी गाला की चमचमाती शाम में, दिल्ली के सबसे बड़े उद्योगपति अरविंद कपूर ने अपनी पत्नी की जगह अपनी प्रेमिका को बैठाया, उसकी साड़ी पहनाई, उसकी हीरे की अंगूठी उसकी उंगली में डाली और जब मेहमानों ने उसे “मिसेज कपूर” कहा, तो उसने मुस्कुराकर सच को मरने दिया।

स्नेहा कपूर को यह अपमान किसी अखबार, किसी रिश्तेदार या किसी वफादार दोस्त से नहीं पता चला। उसे यह बात अपने ही बंगले के कमरे में, रात 8:12 बजे, सूखे गले और भारी पलकों के साथ तब समझ आई, जब 17 साल से घर संभाल रही शांता बाई उसके सामने कांपते हाथों से पानी का गिलास लेकर खड़ी थी।

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“मेमसाब… वो आपकी बनारसी साड़ी पहनकर चली गई। आपके गहने भी… और साहब उसे ऐसे लेकर गए जैसे वही घर की मालकिन हो।”

स्नेहा ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं। कमरे की सफेद रोशनी चुभ रही थी। चांदी की ट्रे पर रखी ठंडी तुलसी वाली चाय, बिखरी हुई चादरें, खुला अलमारी का दरवाजा—सब कुछ जैसे चिल्ला रहा था कि उसके साथ धोखा हुआ है। उसका शरीर सुन्न था, जैसे किसी ने भीतर की सारी ताकत खींच ली हो।

ड्रेसिंग रूम खाली पड़ा था।

वह पीली काशी बनारसी साड़ी, जिसे उसने आज रात “आशा फाउंडेशन” के गाला के लिए खास बनवाया था, गायब थी। मां के दिए कुंदन के झुमके नहीं थे। नानी का सोने का कड़ा नहीं था। शादी की अंगूठी भी नहीं थी। यहां तक कि टेबल कार्ड भी गायब था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—स्नेहा मेहरा कपूर।

कुछ पल तक वह चुप बैठी रही। इसलिए नहीं कि उसे समझ नहीं आया। बल्कि इसलिए कि उसे सब कुछ बहुत साफ समझ आ गया था।

रिया मल्होत्रा।

कॉलेज की पुरानी सहेली। वही रिया, जो 2 साल पहले रोती हुई उसके घर आई थी—नौकरी गई, रिश्ता टूटा, मकान मालिक ने सामान बाहर फेंक दिया। स्नेहा ने उसे गेस्ट रूम दिया, कपड़े दिए, फिर अरविंद से कहकर कपूर इंफ्रा में पर्सनल असिस्टेंट की नौकरी दिलवाई।

रिया सबके सामने कहती थी, “मैं आज जो हूं, स्नेहा की वजह से हूं।”

लेकिन 2 साल में उसने नौकरी से ज्यादा ले लिया था। उसने स्नेहा का परफ्यूम अपनाया, उसके जैसे ब्लाउज सिलवाए, उसके ड्राइवर से बात करने का अंदाज सीखा, उसके मेहमानों के बीच जगह बनाई। धीरे-धीरे वह अरविंद के ऑफिस में, मीटिंग में, जयपुर और मुंबई की यात्राओं में, परिवार की तस्वीरों के किनारे दिखाई देने लगी। लोग बातें रोक देते थे जब स्नेहा कमरे में आती। पड़ोस की औरतें उसकी आंखों में दया लेकर मुस्कुरातीं।

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स्नेहा ने सब सहा। बेटे के लिए। अपने पिता विनय मेहरा की इज्जत के लिए। उस संस्कार के लिए जिसमें पत्नी को घर बचाने वाली माना जाता है, चाहे घर के भीतर उसका दिल रोज टूटता रहे।

लेकिन आज रिया ने चोरी छिपकर नहीं, खुलेआम उसकी जगह चुरा ली थी।

“उसने कहा आप बीमार हैं,” शांता बाई ने धीरे से कहा। “कह रही थी आपने ही उसे अपनी जगह जाने को कहा, ताकि फाउंडेशन की बदनामी न हो। साहब ने कुछ पूछा भी नहीं।”

स्नेहा का दिमाग आखिरी याद पर अटक गया। रिया कमरे में आई थी। चेहरे पर नकली चिंता थी। हाथ में तुलसी-अदरक की चाय थी।

“तुम बहुत थकी लग रही हो, स्नेहा। बस 1 घंटा आराम कर लो। अरविंद को मैं संभाल लूंगी, तुम जानती हो वह परफेक्शन को लेकर कितना परेशान हो जाता है।”

स्नेहा ने चाय पी ली थी। भरोसे से नहीं। शायद इसलिए कि कुछ धोखे इतने बड़े होते हैं कि इंसान उन्हें सोच भी नहीं पाता, जब तक वे सामने खड़े होकर उसकी जगह पहन न लें।

“आरव बाबू आए थे,” शांता बाई ने कहा। “ये छोड़ गए।”

बेडसाइड टेबल पर एक छोटा-सा शतरंज का मोहरा रखा था। काली रानी। उसके नीचे मोड़ा हुआ कागज था।

स्नेहा ने कांपती उंगलियों से कागज खोला। 18 साल के आरव की लिखावट साफ और ठंडी थी।

“मां, डरना मत। उसने आपकी साड़ी ली है, आपकी जगह नहीं। तैयार रहना।”

नीचे उसने काली रानी को सफेद राजा गिराते हुए बनाया था।

आरव कभी आम लड़कों जैसा नहीं रहा था। 12 साल की उम्र में वह कंपनी के शेयर स्ट्रक्चर के बारे में सवाल पूछता था। 15 साल में उसने एक ऑडिट रिपोर्ट की गलती पकड़ ली थी, जिसे 3 बड़े अधिकारी बिना पढ़े साइन कर चुके थे। अरविंद उसे अक्सर रिश्तेदारों के सामने “बहुत तेज लेकिन लोगों से दूर” कहता था।

वह कभी समझ ही नहीं पाया कि आरव चुप था, अंधा नहीं।

तभी स्नेहा का फोन कांपा। आरव का संदेश था। एक लिंक।

उसने दबाया।

गाला का लाइव प्रसारण खुल गया। पांच सितारा होटल का हॉल झूमरों, गेंदे और सफेद ऑर्किड से चमक रहा था। नेता, उद्योगपति, फिल्मी चेहरे, पत्रकार—सब मौजूद थे। कैमरा मंच से घूमता हुआ अरविंद पर रुका।

काला बंदगला, चमकता चेहरा, शिकारी मुस्कान।

उसके हाथ पर रिया थी।

पीली बनारसी साड़ी उस पर अपमान की तरह चमक रही थी। नानी का कड़ा उसके हाथ में था। स्नेहा की अंगूठी उसकी उंगली में ऐसी चमक रही थी जैसे वह कोई ताज हो।

एक पत्रकार ने पूछा, “मिसेज कपूर, फाउंडेशन के लिए कुछ कहेंगी?”

रिया ने अरविंद की तरफ देखा, जैसे उसे सच बोलने का एक आखिरी मौका दे रही हो।

अरविंद चुप रहा।

रिया मुस्कुराई।

“यह काम मेरे और मेरे पति के दिल के बहुत करीब है।”

स्नेहा के सीने में कुछ टूट गया। मगर आंखों से आंसू नहीं निकले। दर्द से भी ठंडी एक खामोशी भीतर उतर आई।

दरवाजा खुला।

आरव अंदर आया। सफेद शर्ट की बांहें मुड़ी थीं, हाथ में टैबलेट था। चेहरे पर अपने नाना विनय मेहरा जैसी शांति थी—वह शांति जो तूफान से पहले आती है।

“तू गाला में क्यों नहीं है?” स्नेहा ने भारी आवाज में पूछा।

“आप बनकर बैठी एक औरत को ताली बजाने?” आरव ने कहा। “नहीं मां।”

वह उसके पास बैठा और टैबलेट खोल दिया। तस्वीरें। बैंक ट्रांसफर। रिकॉर्डिंग। होटल बिल। कानूनी कागज।

“रिया ने सिर्फ आपकी साड़ी नहीं चुराई। उसने पैसे चुराए, आपके खिलाफ झूठे सबूत बनवाए, एक जासूस लगवाया, और आज रात आपको बेहोश करने की कोशिश की।”

स्नेहा ने बिना पलक झपकाए कहा, “फिर से बोल।”

आरव ने रिकॉर्डिंग चलाई। रिया की आवाज थी—धीमी, बेचैन, पहचानी हुई।

“कुछ ऐसा चाहिए जो निशान न छोड़े। बस वह कमजोर लगे, कन्फ्यूज लगे। ताकि लगे कि उसका दिमाग ठीक नहीं है।”

दूसरी तरफ कोई आदमी मना कर रहा था। रिया दबाव डाल रही थी।

रिकॉर्डिंग बंद हुई।

“कल सुबह वे आपसे तलाक के बदले शेयर छोड़ने वाले कागज पर साइन करवाना चाहते थे,” आरव ने कहा। “2-3 ऐसी घटनाओं के बाद पापा आपको मानसिक रूप से अस्थिर साबित कर देते।”

स्नेहा ने पूछा, “तेरे पिता को पता था?”

आरव 1 पल चुप रहा।

वही चुप्पी जवाब बन गई।

PART 2

“पापा को पता था कि रिया आपको तोड़ना चाहती है,” आरव ने कहा। “नकली तस्वीरों, झूठी अफवाहों और शेयर छोड़ने वाले समझौते के बारे में भी। दवा वाली बात साबित करनी बाकी है।”

स्नेहा ने स्क्रीन पर रिया को हंसते देखा। कोई उसे “स्नेहा जी” कहकर प्रणाम कर रहा था। अरविंद मुस्कुरा रहा था—पछतावे से नहीं, जीत से।

“मुझे उठाओ,” स्नेहा ने कहा।

“आपको जाना जरूरी नहीं।”

“जरूरी है। आज मैं अपना नाम वापस लूंगी।”

आरव की आंखें सख्त हो गईं। “तो जल्दी करना होगा।”

शांता बाई ने उसे नहलाया। स्नेहा ने दूसरी साड़ी नहीं पहनी। उसने काला सूट पहना, सफेद रेशमी कुर्ता, बालों का साफ जूड़ा। आईने में अब टूटी पत्नी नहीं थी। विनय मेहरा की बेटी थी।

उसके पिता ने शादी से पहले अरविंद से ऐसा समझौता साइन करवाया था, जिसे अरविंद ने प्यार या घमंड में ठीक से पढ़ा ही नहीं था। सार्वजनिक बेवफाई, पत्नी को कंपनी से बाहर करने की साजिश या उसकी संपत्ति पर चोट—इनमें से कुछ भी साबित होते ही कपूर इंफ्रा के 51 प्रतिशत वोटिंग अधिकार स्नेहा और उसके बेटे के पास आ जाते।

आरव बोला, “मेहरा अंकल के पुराने वकील होटल में हैं। 2 डायरेक्टर, 1 ऑडिटर और वह बिजनेस पत्रकार भी पहुंच चुकी है, जिसे पापा ने पिछले साल चुप कराया था।”

“तू कब से तैयारी कर रहा था?”

“16 साल की उम्र से।”

“मुझसे छिपाकर?”

“क्योंकि आप अभी भी मानती थीं कि वे वही आदमी बन सकते हैं, जिससे आपने शादी की थी।”

स्नेहा चुप रह गई।

होटल के पीछे कार रुकी। अंदर से तालियां गूंज रही थीं। मंच से आवाज आई—“अब हम आमंत्रित करते हैं मिसेज कपूर को…”

आरव ने मां का हाथ दबाया।

“आप पीछे से आइए। मैं सामने से जाऊंगा।”

“अकेला?”

“नहीं,” वह बोला, “उन सबके साथ जिन्हें उन्होंने दफना दिया था।”

PART 3

आरव होटल के मुख्य दरवाजे से भीतर गया। हॉल में रोशनी इतनी तेज थी कि हर मुस्कान नकली और हर हीरा ज्यादा तीखा लग रहा था। मंच पर रिया खड़ी थी, स्नेहा की बनारसी साड़ी में लिपटी, आंखों में ऐसा आत्मविश्वास लिए जैसे उसने सिर्फ जगह नहीं, इतिहास भी जीत लिया हो।

“अरविंद और मैं हमेशा मानते हैं,” रिया बोल रही थी, “कि सफलता का अर्थ तभी है जब वह समाज के काम आए…”

तभी हॉल के बड़े दरवाजे खुले।

आरव अंदर आया।

तालियों की आवाज अचानक टूट गई। मेहमान मुड़कर देखने लगे। सुरक्षा कर्मी आगे बढ़े, फिर उसे पहचानकर रुक गए। उसके पीछे 3 लोग सूट में थे और एक महिला कैमरा लिए थी। आरव बिना जल्दी किए मंच की ओर बढ़ा, जैसे हर कदम पहले से नापा गया हो।

अरविंद का चेहरा तना। “आरव, अभी नहीं।”

आरव सीढ़ियां चढ़ा, एंकर से माइक्रोफोन लिया और हॉल की ओर देखा।

“नमस्कार। मैं आरव मेहरा, स्नेहा मेहरा का बेटा और अरविंद कपूर का पुत्र हूं। 14 साल की उम्र से मैं अपनी मां का उपनाम इस्तेमाल करता हूं। आज मैं एक ऐसी गलती सुधारने आया हूं, जो बहुत लंबे समय से चल रही है।”

हॉल में फुसफुसाहट फैल गई।

रिया ने जबरन मुस्कुराकर कहा, “आरव, तुम्हारी मां की तबीयत ठीक नहीं है। हम यह बात कल करेंगे।”

आरव ने उसकी ओर देखा। “इसीलिए तो आज करेंगे। मेरी मां की बात।”

अरविंद ने धीमे मगर कड़े स्वर में कहा, “नीचे उतरो।”

“नहीं, पापा। आज हिसाब यहीं होगा।”

वह शब्द पूरे हॉल में थप्पड़ की तरह गूंजे।

आरव ने पहली फाइल खोली।

“पहला दस्तावेज। अरविंद कपूर और रिया मल्होत्रा के 2 साल के संबंधों के प्रमाण—होटल रिकॉर्ड, फ्लाइट टिकट, कंपनी के खर्चों से भरे बिल, कर्मचारियों और ड्राइवरों के बयान।”

मेहमानों के फोन उठने लगे। कुछ औरतों ने एक-दूसरे को देखा। कुछ पुरुष सिर झुकाकर बैठ गए, जैसे अचानक उन्हें भी अपने झूठ याद आ गए हों।

आरव ने दूसरी फाइल उठाई।

“दूसरा दस्तावेज। कपूर इंफ्रा से 8.6 करोड़ रुपये की संदिग्ध निकासी, 4 शेल कंपनियों के जरिए। इनमें से 2 मुंबई में, 1 दुबई में और 1 सिंगापुर के पते पर रजिस्टर्ड हैं। मंजूरी देने वाले हस्ताक्षर अरविंद कपूर के हैं। पैसा जिन खातों में गया, उनसे रिया मल्होत्रा की खरीदारी और निजी खर्च जुड़े हैं।”

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

“झूठ! यह सब झूठ है!” वह चीखी।

आरव की आवाज नहीं बदली।

“तीसरा दस्तावेज। विवाह अनुबंध और शेयरहोल्डर समझौता, 20 साल पहले नोटरी के सामने साइन किया गया। सार्वजनिक व्यभिचार, पत्नी के आर्थिक अधिकारों को खत्म करने की साजिश, या उसके मानसिक अथवा शारीरिक स्वास्थ्य पर जानबूझकर हमला—इन शर्तों में से कोई भी पूरी होने पर अरविंद कपूर कंपनी का प्रभावी नियंत्रण खो देंगे। वोटिंग अधिकार स्नेहा मेहरा और उनके पुत्र को मिलेंगे। आज रात सभी शर्तें पूरी हो चुकी हैं।”

हॉल में शोर फूट पड़ा। पत्रकार खड़े हो गए। फाउंडेशन के अध्यक्ष ने किसी को इशारा किया कि लाइव बंद करो।

आरव ने बिना देखे कहा, “कोशिश मत कीजिए। मुख्य प्रसारण 7:58 बजे से आपकी व्यवस्था से बाहर है। जो भी यहां हो रहा है, बाहर जा चुका है।”

अरविंद का चेहरा बुझ गया।

“तुम नहीं जानते तुम क्या कर रहे हो,” उसने दांत भींचकर कहा।

“जानता हूं। इसलिए आप डर रहे हैं।”

फिर आरव ने साइड दरवाजे की ओर मुड़कर कहा, “जिस महिला के नाम पर यह कुर्सी, यह गहने और यह दान दिखाया जा रहा है, वह महिला यहां है। असली स्नेहा मेहरा कपूर।”

दरवाजा खुला।

स्नेहा अंदर आई।

न कोई भारी गहना, न साड़ी, न चमक। काला सूट, सफेद कुर्ता, शांत चेहरा। मगर उसके भीतर जो गरिमा थी, उसने पूरे हॉल को खड़ा कर दिया। कोई आदेश नहीं था, फिर भी लोग उठते चले गए। जैसे सच सामने आ जाए तो झूठ की कुर्सियां खुद खाली हो जाती हैं।

रिया पीछे हट गई। साड़ी का पल्लू उसके पैर में उलझा। वह गिरते-गिरते बची। किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।

स्नेहा मंच पर आई। आरव ने माइक्रोफोन उसे दिया।

उसने पहले अरविंद को देखा। वह वही पुराना चेहरा लगा रहा था—मुलायम, समझदार, समझौता करने वाला। जैसे हर बार की तरह कह देगा, “घर की बात घर में।” जैसे हर बार वह चुप हो जाएगी।

“स्नेहा,” अरविंद ने धीमे कहा, “इसे निजी तौर पर सुलझा लेते हैं।”

स्नेहा ने माइक्रोफोन उठाया।

“तुमने मुझे सार्वजनिक रूप से मिटाया है। अब मेरी आवाज भी सार्वजनिक ही सुनोगे।”

हॉल में हल्की-सी सहमति की आवाज उठी।

स्नेहा ने रिया की ओर मुड़कर कहा, “मेरी अंगूठी उतारो।”

रिया ने अपना हाथ साड़ी में छिपा लिया। “स्नेहा, बात सुनो…”

“अंगूठी उतारो।”

सन्नाटा भारी हो गया। कैमरों के सामने रिया ने अंगूठी खींचनी शुरू की। उंगली हल्की सूज गई थी। वह अटकती रही। वह छोटा-सा दृश्य इतना लंबा और अपमानजनक था कि कई मेहमानों ने नजरें फेर लीं। आखिर अंगूठी निकली और रिया ने उसे पोडियम पर रख दिया।

“कड़ा भी,” स्नेहा ने कहा। “वह मेरी नानी का है। उन्होंने बंटवारे के समय उससे कम सोना पहना था, जितनी शर्म तुम आज पहनकर खड़ी हो।”

कुछ लोगों की सांस अटक गई। रिया ने गुस्से और बेबसी में कड़ा उतारा।

तभी स्नेहा के वकील, महेश खन्ना, आगे आए। वे विनय मेहरा के पुराने साथी थे, सफेद बाल, तीखी आंखें।

“मैं अधिवक्ता महेश खन्ना हूं,” उन्होंने कहा। “आज प्रस्तुत दस्तावेज प्रमाणित प्रतियां हैं। दोपहर में कोर्ट में कपूर इंफ्रा के खातों और कुछ निजी संपत्तियों पर संरक्षण संबंधी आवेदन दाखिल किया जा चुका है। साथ ही स्नेहा मेहरा को संदिग्ध पदार्थ दिए जाने की सूचना पुलिस को दी गई है। नमूना जांच के लिए सुरक्षित है।”

हॉल में अब फुसफुसाहट नहीं, गुस्सा था।

अरविंद रिया की ओर मुड़ा। “पदार्थ?”

रिया हंसने की कोशिश कर रही थी, पर आवाज टूट गई। “ये लोग हमें बर्बाद करना चाहते हैं।”

आरव ने फोन उठाया।

“मैं वह ऑडियो चला सकता हूं जिसमें तुम कहती हो कि मां कन्फ्यूज दिखनी चाहिए, निशान नहीं छूटने चाहिए। या वह, जिसमें तुम कहती हो कि अगर वह रात 9 बजे तक सोती रही तो अरविंद के पास तुम्हें ले जाने के अलावा रास्ता नहीं बचेगा। कौन-सा सुनना पसंद करोगी?”

रिया के होंठ खुले, पर आवाज नहीं निकली।

अरविंद उसे ऐसे देख रहा था जैसे पहली बार उसे देख रहा हो। उसे लगा था वह एक महत्वाकांक्षी औरत को अपनी पत्नी के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अब उसे समझ आया कि महत्वाकांक्षी औरत उसे भी इस्तेमाल कर सकती है।

“तुमने कहा था वह नाटक करती है,” अरविंद बुदबुदाया।

रिया उसके पास झुकी। “अरविंद, उन्हें मत सुनो। तुम मुझसे प्यार करते हो।”

अरविंद की हंसी सूखी थी। “नहीं। मैंने तुम्हें चुना था। प्यार अलग चीज होती है।”

स्नेहा के भीतर यह वाक्य कहीं गहरा चुभा। क्योंकि उसमें पहली बार थोड़ी सच्चाई थी।

आरव ने फिर माइक्रोफोन लिया।

“अरविंद कपूर और रिया मल्होत्रा के कंपनी एक्सेस कार्ड रात 8 बजे निलंबित कर दिए गए हैं। प्रतिनिधि खर्चों से जुड़े खाते फ्रीज हैं। कल सुबह 9 बजे आपात बोर्ड मीटिंग होगी। तब तक कपूर इंफ्रा से जुड़ा कोई भी निर्णय स्नेहा मेहरा की मंजूरी के बिना वैध नहीं होगा।”

अरविंद तिलमिला उठा। “तुम्हें इसका अधिकार नहीं है!”

स्नेहा ने अपने पिता की काली फाइल उसके सामने रखी।

“अधिकार तुमने ही दिया था, उस दिन जब तुमने यह मानकर साइन किया था कि तुम्हारा वचन कभी तुम्हारे खिलाफ खड़ा नहीं होगा।”

अरविंद ने फाइल को देखा। 1 पल के लिए स्नेहा को अपना पुराना पति दिखा—वह आदमी जो कभी छोटे किराए के ऑफिस से सपने देखता था, जो उसके पिता के सामने nervous होकर बैठा था, जो अपने पहले घर की चाबी हाथ में लेकर रो पड़ा था। फिर वह चेहरा गायब हो गया। सामने सिर्फ वह आदमी बचा जिसने दूसरी औरत को उसकी अंगूठी पहनाई थी।

“तुम मुझे बर्बाद करना चाहती हो?” उसने पूछा।

स्नेहा ने शांत स्वर में कहा, “नहीं। मैं बस तुम्हारे मलबे के आगे खड़े रहना बंद कर रही हूं।”

महेश खन्ना ने दस्तावेज आगे बढ़ाए। तलाक की याचिका। पावर ऑफ अटॉर्नी की वापसी। विश्वासघात और आर्थिक अपराध की शिकायत। पारिवारिक संपत्ति की सुरक्षा। स्नेहा ने कैमरों के सामने साइन किए। उसका हाथ नहीं कांपा।

जब उसने पेन रखा, हॉल में तालियां बज उठीं। वह किसी तमाशे की तालियां नहीं थीं। वह वैसी आवाज थी जैसे लंबे समय तक रोकी गई सांस अचानक बाहर निकले।

स्नेहा मंच से उतरी। आरव उसके साथ था।

कॉरिडोर में अरविंद ने उन्हें रोक लिया। उसका चेहरा फीका था।

“स्नेहा, मैं कसम खाता हूं, मुझे दवा वाली बात नहीं पता थी।”

वह रुकी।

“पर तुम्हें साड़ी का पता था। अंगूठी का पता था। टेबल कार्ड का पता था। तुम्हें पता था कि मैं कमरे में अकेली पड़ी रहूंगी और पूरी दिल्ली उसे मेरी जगह सम्मान देगी।”

अरविंद चुप रहा।

“तुमने शायद मेरी मौत नहीं चाही,” स्नेहा ने कहा, “लेकिन तुमने मेरी अनुपस्थिति की पूरी व्यवस्था की।”

यह वाक्य उसे किसी तमाचे से ज्यादा लगा। वह दीवार से टिक गया।

रिया भी बाहर आई। मेकअप बह चुका था, साड़ी का किनारा गंदा था। अब उसमें न गरिमा थी, न जीत। वह चोरी किए सपने से बाहर धकेली गई औरत लग रही थी।

“अरविंद, कुछ करो। उन्हें बताओ सब झूठ है। तुम मुझे ऐसे नहीं छोड़ सकते।”

उसी समय अरविंद का फोन बजा। उसने कांपते हाथ से उठाया। CFO की आवाज इतनी तेज थी कि स्नेहा तक सुनाई दी।

“सर, बोर्ड आपके तत्काल हटने की मांग कर रहा है। बैंक क्रेडिट लाइन रोक रहे हैं। मीडिया ने सारे दस्तावेज उठा लिए हैं। 2 बड़े निवेशक पीछे हट गए हैं।”

रिया ने यह सब सुन लिया। उसने अरविंद के चेहरे को नहीं, उसकी घड़ी, उसका सूट, उसका गिरता हुआ साम्राज्य देखा। और उसी क्षण उसका कथित प्रेम पैसे के साथ कमरे से बाहर चला गया।

“तुमने कहा था सब तुम्हारा है,” रिया फुसफुसाई।

अरविंद ने उसे घृणा से देखा। “और तुमने कहा था तुम मुझसे प्यार करती हो।”

स्नेहा उन दोनों को वहीं छोड़कर चली गई—सफेद फूलों, सुनहरे कॉरिडोर और सड़े हुए झूठों के बीच।

उस रात वह बंगले में सिर्फ 4 चीजें लेने लौटी—अपने पिता की तस्वीरें, वापस मिले गहने, आरव का जन्म प्रमाणपत्र और वह काली रानी। शांता बाई ने कप को साफ थैली में रख दिया था। सुबह पुलिस उसे ले जाने वाली थी। ड्रॉइंग रूम में अरविंद अंधेरे में बैठा था। रिया जा चुकी थी। वह सूटकेस लेकर निकलना चाहती थी, पर ड्राइवर ने मदद करने से मना कर दिया। कभी-कभी पैसे लेकर आंख बंद करने वाले लोग भी समझ जाते हैं कि कौन-सा दौर खत्म हो चुका है।

“मुझे माफ कर दो,” अरविंद ने कहा।

स्नेहा बिना मुड़े रुकी।

“तुम्हारी माफी भी देर से आई है।”

“मैंने आरव को खोना नहीं चाहा था।”

इस बार वह मुड़ी। आरव दरवाजे पर खड़ा था।

“तुमने उसे आज नहीं खोया,” स्नेहा ने कहा। “तुमने उसे हर उस दिन खोया, जब तुमने उसे बच्चा समझा और मुझे कमजोर।”

अरविंद ने सिर झुका लिया।

स्नेहा को वैसी खुशी नहीं हुई जैसी उसने सोची थी। जिस आदमी से कभी प्यार किया हो, उसकी गिरावट में पूरी जीत नहीं मिलती। उसमें उस इंसान का शोक भी होता है, जो वह बन सकता था।

आरव उसे दक्षिण दिल्ली के एक छोटे, शांत अपार्टमेंट में ले गया। उसने वह जगह 4 महीने पहले मां के नाम पर ली थी। एक उजला कमरा, छोटी-सी रसोई, खिड़की के बाहर अमलतास का पेड़। मेज पर चाय, ब्रेड, मक्खन और सफेद रजनीगंधा रखे थे।

“मुझे नहीं पता था आप कब तैयार होंगी,” आरव ने कहा। “बस चाहता था कि आपके पास सांस लेने की जगह हो।”

तब स्नेहा रोई। जोर से नहीं। फिल्मी अंदाज में नहीं। वह दरवाजे के पास खड़ी रोई, बैग अब भी कंधे पर था, क्योंकि उसे समझ आया कि जब वह जलते घर को बचाने की कोशिश कर रही थी, उसका बेटा ईंट-ईंट जोड़कर बाहर निकलने का रास्ता बना रहा था।

अगले हफ्ते तूफानी थे। अखबारों में “चोरी की अंगूठी वाली प्रेमिका”, “कपूर गाला कांड”, “दिल्ली की सबसे अपमानित पत्नी की वापसी” जैसे शीर्षक छपे। रिया पर धोखाधड़ी, विश्वासघात और स्नेहा को नुकसान पहुंचाने की साजिश के आरोप लगे। जासूस ने बयान दिया। बैंक रिकॉर्ड बोले। कप की लैब रिपोर्ट ने भी ठंडी भाषा में वह सच कह दिया जिसे कोई झुठला नहीं सका।

अरविंद कुछ आरोपों से सबूतों की कमी के कारण बच गया, मगर तलाक, बोर्ड और बेटे की नजरों से नहीं बच सका।

3 महीने बाद कपूर इंफ्रा का नाम बदल दिया गया। स्नेहा ने उस नाम को रखने से इनकार कर दिया, जो चुप महिलाओं और घमंडी पुरुषों पर खड़ा था। कंपनी अब “मेहरा फीनिक्स ग्रुप” कहलाने लगी। आरव ने आईआईएम की तैयारी रोकने से मना किया, पर बोर्ड में रणनीतिक पर्यवेक्षक की भूमिका स्वीकार की। स्नेहा चेयरपर्सन बनी। वही लोग जो उसे पहले सिर्फ साड़ी और मुस्कान समझते थे, अब समझने लगे कि वह अनुबंध पढ़ती है, आंकड़े याद रखती है और बिना आवाज ऊंची किए “नहीं” कह सकती है।

एक शाम, पहली सार्वजनिक बोर्ड मीटिंग के बाद, स्नेहा और आरव ऑफिस की छत पर गए। दिल्ली नीचे फैली थी—शोर, धुआं, रोशनी और हजारों घरों की अपनी-अपनी कहानियां।

“पापा की चिट्ठी आई है,” आरव ने कहा।

“फिर?”

“इस बार 6 पन्ने।”

स्नेहा हल्का मुस्कुराई। “उन्हें हमेशा लगता था कि लंबाई सच की जगह ले सकती है।”

आरव ने जेब से काली रानी निकाली।

“आप रखेंगी?”

स्नेहा ने मोहरे को हाथ में लिया। छोटा-सा लकड़ी का टुकड़ा था, पर उसका वजन रिया के हीरों, अरविंद के कागजों और 20 साल की चुप्पी से ज्यादा था।

“नहीं,” उसने कहा। “यह तुम्हारे पास रहे। खेल तुमने मुझसे पहले देख लिया था।”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं मां। बोर्ड पर वापस आप आई थीं।”

स्नेहा ने अपने बेटे को देखा—वह लड़का जो बहुत जल्दी बड़ा हो गया था, क्योंकि बड़ों ने बहुत गहरा धोखा दिया था। उसने उसके गाल को छुआ, वैसे ही जैसे वह 5 साल की उम्र में डरकर उसके पास आता था।

“मुझे अफसोस है कि तुझे मुझे बचाना पड़ा।”

आरव की आंखें नरम हो गईं।

“मुझे गर्व है कि मैंने आपको आपसे पहले पहचान लिया।”

यह वाक्य हवा में देर तक ठहरा रहा।

स्नेहा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना सिर बेटे के कंधे पर रख दिया। नीचे गाड़ियां भाग रही थीं। कहीं अरविंद शायद अखबार पढ़ रहा था, जहां 20 साल की शादी को एक कांड में समेट दिया गया था। कहीं रिया सीख रही थी कि जगह चुराने से उसे निभाना नहीं आता। और स्नेहा पहली बार बिना माफी मांगे सांस ले रही थी।

बाद में जब किसी ने उससे पूछा कि उस रात वह कैसे बची, जब दूसरी औरत उसकी साड़ी, उसकी अंगूठी और उसका नाम पहनकर बैठी थी, तो स्नेहा ने कभी बदले की बात नहीं की। उसने गरिमा की बात की।

उसने बस इतना कहा कि एक औरत धोखे के घर में बहुत देर तक सो सकती है, लेकिन जिस दिन वह अपने नाम को याद करके उठती है, उस दिन कोई उसे फिर से सुला नहीं सकता।

क्योंकि साड़ी चुराई जा सकती है। गहने चुराए जा सकते हैं। एक शाम की कुर्सी भी चुराई जा सकती है।

लेकिन उस औरत की जगह कभी नहीं चुराई जा सकती, जो आखिरकार उठ खड़ी होती है।

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