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“मां को बेटी से कोई दूर नहीं कर सकता” — 15 साल बाद लौटी औरत ने शादी के मंडप में पीड़ित पिता को दोषी ठहराया; लेकिन लाल कपड़े में लिपटा पुराना संदूक उसकी सबसे छुपी सच्चाई खोलने वाला था।

भाग 1
दुल्हन के जयमाला से ठीक पहले, वह औरत 15 साल बाद मंडप के दरवाज़े पर खड़ी हो गई और चिल्लाई—

—मेरी बेटी की शादी है, कोई मुझे रोककर दिखाए!

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पूरे बैंक्वेट हॉल में जैसे एक साथ सन्नाटा गिर पड़ा। दिल्ली के छतरपुर वाले उस बड़े से फार्महाउस में सफेद फूलों की खुशबू, शहनाई की आवाज़ और कैमरों की चमक के बीच अचानक इतनी कड़वाहट भर गई कि मेहमानों के चेहरे तक जम गए।

राजीव वर्मा ने अपनी बड़ी बेटी अनन्या का हाथ थाम रखा था। अनन्या लाल बनारसी लहंगे में किसी रानी जैसी लग रही थी, मगर उसकी आंखों में वह चमक नहीं थी जो हर दुल्हन की आंखों में होनी चाहिए। उसकी पलकें एक पल को कांपीं, फिर उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

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दरवाज़े पर काव्या खड़ी थी।

वही काव्या, जिसने 15 साल पहले इसी शहर की एक छोटी-सी किराए की कोठी का दरवाज़ा बंद करते हुए राजीव से कहा था—

—मैं 6 बेटियों की आया बनकर नहीं जी सकती।

उस रात राजीव की सबसे छोटी बेटी मीरा सिर्फ 8 महीने की थी। अनन्या 13 साल की थी। सिया 10 साल की। और तीनों जुड़वां बेटियां, राधिका, नेहा और परी, बस 5 साल की थीं। घर में दूध उबलकर चूल्हे पर गिर रहा था, मीरा रो रही थी, और काव्या 2 सूटकेस भर रही थी।

राजीव ने उसके सामने हाथ जोड़ दिए थे।

—काव्या, तू मुझसे नाराज़ है तो मुझसे लड़ ले। पर बच्चियों को मत छोड़।

काव्या ने आईने में अपना चेहरा देखा, होंठों पर लाल लिपस्टिक लगाई और बोली—

—मैं गरीब आदमी की पत्नी बनकर मरना नहीं चाहती।

—ये गरीब घर नहीं है, ये तेरी बेटियों का घर है।

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—घर? यहां हर महीने स्कूल की फीस के लिए रोना पड़ता है। बिजली का बिल देखकर तेरे चेहरे का रंग उड़ जाता है। मैं ऐसी जिंदगी के लिए पैदा नहीं हुई।

सीढ़ियों पर बैठी अनन्या ने कांपती आवाज़ में पूछा था—

—मम्मी, हम भी बोझ हैं क्या?

काव्या ने उसे देखा तक नहीं।

—बड़े होकर समझोगी, औरत को अपने लिए भी जीना पड़ता है।

फिर वह चली गई थी। अपने बॉस विक्रम मल्होत्रा के साथ। वही विक्रम, जो गुरुग्राम की एक बड़ी रियल एस्टेट कंपनी का मालिक था। महंगी गाड़ियां, फार्महाउस, दुबई की यात्राएं, डिजाइनर साड़ियां, हीरे के सेट और वह दुनिया, जिसकी चमक में काव्या ने अपने 6 बच्चों की आंखों का अंधेरा नहीं देखा।

उसके बाद राजीव ने अकेले 6 बेटियों को पाला। सुबह 5 बजे उठकर टिफिन बनाता, बालों में चोटी करता, यूनिफॉर्म प्रेस करता, ऑटो वालों से झगड़ता, रात को बुखार में जागता, स्कूल की मीटिंग में अकेला बैठता। लोग पूछते—

—मां नहीं आती?

वह मुस्कुराकर कहता—

—काम में व्यस्त है।

झूठ बोलना उसने मजबूरी से सीखा था, क्योंकि सच उसकी बेटियों के दिल काट देता।

काव्या ने कभी जन्मदिन पर फोन नहीं किया। कभी रिजल्ट नहीं पूछा। मीरा जब 7 साल की उम्र में डेंगू से अस्पताल में भर्ती थी, तब भी उसने राजीव के 6 संदेशों का जवाब नहीं दिया। सिया ने पहली बार डांस प्रतियोगिता जीती, अनन्या ने कॉलेज टॉप किया, राधिका ने नेशनल स्कॉलरशिप पाई, नेहा ने पेंटिंग में अवॉर्ड जीता, परी ने अपने स्कूल की डिबेट जीती, मगर किसी मंच पर उनकी मां नहीं थी।

और आज वही काव्या, हीरे का हार पहने, सुनहरी कांजीवरम साड़ी में, विक्रम मल्होत्रा के साथ, अनन्या की शादी में खड़ी थी।

सुबह ही उसका संदेश आया था।

“मैं अपनी बेटी की शादी में आ रही हूं। विक्रम भी साथ होंगे। उम्मीद है तुम कोई गरीब बाप वाला ड्रामा नहीं करोगे।”

राजीव ने वह संदेश 3 बार पढ़ा था। उसकी उंगलियां हल्दी के दाग से भरी थीं क्योंकि वह खुद लड्डू के डिब्बे सजवा रहा था। अनन्या ने जब पूछा—

—पापा, किसका मैसेज है?

राजीव ने मोबाइल उसकी तरफ बढ़ा दिया था।

अनन्या ने पढ़ा। उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।

—“मेरी बेटी” लिख रही है?

राजीव चुप रहा।

—पापा, आपने जवाब दिया?

—मैं मना कर दूंगा।

—नहीं। आने दीजिए।

—बेटा, आज तेरा दिन है।

—आज मेरा ही दिन है, इसलिए झूठ को भी सामने बैठकर सच सुनना पड़ेगा।

राजीव ने डरते हुए कहा—

—अनन्या, बदला शादी में अच्छा नहीं लगता।

अनन्या ने शांत आवाज़ में जवाब दिया—

—बदला नहीं पापा, हिसाब है। और हिसाब भी तभी, जब वह झूठ बोलेगी।

राजीव जानता था कि वह किस हिसाब की बात कर रही है। उसके कमरे की पुरानी अलमारी में एक लोहे का संदूक रखा था। उसमें 15 साल की वापिस आई चिट्ठियां थीं। जन्मदिन के निमंत्रण, स्कूल फंक्शन के कार्ड, त्योहारों पर बच्चों के बनाए ग्रीटिंग कार्ड, फोटो, अस्पताल की रिपोर्ट, ईमेल प्रिंटआउट, कोरियर की रसीदें, और वे लिफाफे जिन पर काव्या की अपनी लिखावट में लिखा था—“स्वीकार नहीं।”

राजीव ने वह संदूक बदले के लिए नहीं रखा था। उसने उसे इसलिए रखा था कि अगर कभी उसकी बेटियां पूछें कि क्या उसने मां से रिश्ता बचाने की कोशिश की थी, तो वह कह सके—हां, मैंने दरवाज़ा बंद नहीं किया था।

पर अब दरवाज़ा खुद चलकर शादी में आ गया था।

हॉल में काव्या ने दोनों हाथ फैलाए और आगे बढ़ी।

—अनन्या! मेरी गुड़िया! आखिर मां आ ही गई!

कई मेहमानों की नजरें राजीव पर टिक गईं। कुछ रिश्तेदार फुसफुसाने लगे। विक्रम मल्होत्रा बहुत आत्मविश्वास से चल रहा था, जैसे वह किसी बोर्ड मीटिंग में आया हो। उसके पीछे उसकी पहली शादी के 2 बड़े बच्चे और उसकी बहन रितु भी थीं। सबके चेहरे पर एक अजीब-सा तिरस्कार था, जैसे वे पहले से राजीव को दोषी मानकर आए हों।

काव्या ने अनन्या के गाल को छूना चाहा।

अनन्या ने हल्के से सिर पीछे कर लिया।

—आप आ गईं, अच्छा है।

काव्या की मुस्कान एक पल को अटक गई, फिर वह कैमरे की तरफ देखकर बोली—

—मां के आशीर्वाद के बिना बेटी की शादी अधूरी रहती है।

सिया की मुट्ठियां कस गईं। राधिका ने नेहा का हाथ पकड़ लिया। परी की आंखें भर आईं। मीरा, जो अब 16 साल की थी, राजीव के पीछे खड़ी हो गई।

—पापा, मुझे उनसे मिलना पड़ेगा?

राजीव ने उसके सिर पर हाथ रखा।

—नहीं। खून का रिश्ता किसी को तेरे गले लगने का हक नहीं देता।

मंडप के पास दूल्हा आरव खड़ा था। उसने अनन्या की तरफ देखा। उसकी आंखों में सवाल नहीं, भरोसा था।

रस्में शुरू हुईं। पंडित ने पूछा—

—कन्यादान कौन करेगा?

राजीव ने हाथ आगे बढ़ाया, पर अनन्या ने पहले ही साफ आवाज़ में कहा—

—मुझे उस आदमी ने जीवन दिया है, जिसने मुझे पाला है। वही मेरा हाथ आरव को सौंपेगा।

हॉल में एक हल्की सनसनी फैल गई।

काव्या का चेहरा उतर गया।

वह मुस्कुराने की कोशिश करती रही, पर उसकी आंखों में चुभन साफ दिख रही थी। शायद उसने सोचा था कि वह आते ही दुल्हन को रोते हुए गले लगाएगी, लोग ताली बजाएंगे, कैमरे उसकी “ममता” कैद करेंगे, और राजीव फिर किनारे खड़ा रह जाएगा।

लेकिन अनन्या ने उसे मंच नहीं दिया था।

कुछ देर तक सब सामान्य रहा। जयमाला हुई। फूलों की बारिश हुई। आरव ने अनन्या का हाथ थामा। राजीव ने आंखें पोंछीं। 6 बेटियां अपने पिता के आसपास ऐसे खड़ी थीं जैसे किसी पुराने बरगद की छाया में 6 दीपक जल रहे हों।

लेकिन खाना शुरू होते ही काव्या का असली चेहरा लौट आया।

विक्रम की बहन रितु ने पूछा—

—काव्या, इतनी सारी बेटियों से दूर रहना कितना मुश्किल रहा होगा न?

काव्या ने गहरी सांस ली, जैसे कोई बड़ा दर्द छुपा रही हो।

—क्या बताऊं रितु दी, एक मां का दिल हर दिन मरता है, जब उसे उसके बच्चों से दूर कर दिया जाए।

राजीव का हाथ थाली पर रुक गया।

सिया ने तेज आवाज़ में कहा—

—किसने दूर किया आपको?

काव्या ने सिया की तरफ दर्दभरी नजर डाली।

—बेटा, तुम छोटी थीं। तुम्हें वही बताया गया जो तुम्हारे पिता चाहते थे।

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

—आपको हमारा फोन नंबर पता था?

काव्या ने तुरंत आंखें नम कर लीं।

—मुझे तुम लोगों से बात करने ही नहीं दी गई।

राजीव ने धीमे से कहा—

—काव्या, बस करो।

काव्या खड़ी हो गई।

—नहीं राजीव, आज मैं चुप नहीं रहूंगी। 15 साल से मुझे खलनायिका बनाया गया। मेरी बेटियों को मुझसे नफरत करना सिखाया गया। मैं मां थी, हूं और रहूंगी।

कुछ मेहमानों ने सहानुभूति से उसे देखा। राजीव को वही पुराना दर्द महसूस हुआ—जैसे किसी ने उसकी 15 साल की मेहनत पर कीचड़ फेंक दिया हो।

काव्या ने वेटर से माइक मांग लिया।

अनन्या तुरंत सीधी खड़ी हो गई।

काव्या ने माइक हाथ में लिया और बोली—

—आज मेरी बेटी की शादी है। मैं जानती हूं कुछ लोग नहीं चाहते कि मैं बोलूं, लेकिन एक मां का आशीर्वाद कोई रोक नहीं सकता। अनन्या, मेरी बच्ची, अगर मैं हर जन्मदिन पर नहीं आ सकी, हर बुखार में तेरे पास नहीं बैठ सकी, तो इसलिए नहीं कि मैं नहीं चाहती थी। मुझे रोका गया। मेरे खिलाफ कहानियां बनाई गईं। मुझे तुमसे छीन लिया गया।

राजीव कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

—बस!

लेकिन अनन्या उससे पहले मंडप के बीच आ गई।

—रुकिए, मां। आपके भाषण से पहले मेरा भी एक तोहफा है।

काव्या मुस्कुराई, जैसे उसे लगा कोई भावुक पल आने वाला है।

—मेरे लिए?

अनन्या ने इशारा किया। राधिका और नेहा स्टेज के पीछे से लाल कपड़े में लिपटा वही लोहे का संदूक लेकर आईं। सिया ने उसे काव्या के सामने रख दिया।

राजीव का चेहरा पीला पड़ गया।

—अनन्या…

अनन्या ने बिना मुड़े कहा—

—आज नहीं पापा। आज झूठ को भी मेहंदी लगे हाथों से जवाब मिलेगा।

काव्या ने संदूक की कुंडी खोली। ऊपर सबसे पहला लिफाफा रखा था। उस पर उसकी अपनी लिखावट थी—“स्वीकार नहीं।”

उसकी मुस्कान वहीं मर गई।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇.

भाग 2

काव्या की उंगलियां कांप गईं, मगर उसने तुरंत चेहरा संभालने की कोशिश की। पूरे हॉल की नजरें उस संदूक पर टिक चुकी थीं। अनन्या ने पहला लिफाफा उठाया और माइक अपने हाथ में ले लिया। उसने कहा कि यह उसके 14वें जन्मदिन का निमंत्रण था, जिसे राजीव ने उस पते पर भेजा था जहां काव्या विक्रम के साथ रहती थी। अंदर एक कार्ड था, जिस पर छोटी अनन्या ने लिखा था—“मम्मी, गिफ्ट मत लाना, बस आ जाना।” कार्ड बंद का बंद लौट आया था। सिया ने दूसरा लिफाफा उठाया, जिसमें उसके स्कूल डांस की फोटो थी। राधिका ने तीसरा निकाला, जिसमें मदर्स डे प्रोग्राम का पास था। नेहा ने बताया कि उस दिन वह सूरजमुखी बनी थी और मंच से नीचे उतरकर 20 मिनट तक रोती रही थी क्योंकि सब बच्चों की मां आई थी, उसकी नहीं। परी ने अस्पताल की रिपोर्ट निकाली, मीरा के डेंगू की। राजीव ने काव्या को 6 बार संदेश भेजे थे। जवाब में काव्या ने सिर्फ इतना लिखा था—“मुझे भावुक ब्लैकमेल मत करो।” मीरा का चेहरा टूट गया। विक्रम ने काव्या की ओर देखा। उसने धीमे से कहा कि उस हफ्ते तो वे जयपुर में रिसॉर्ट पर थे, विदेश में नहीं, जैसा काव्या ने सबको बताया था। काव्या ने गुस्से से उसे चुप कराया, मगर अब देर हो चुकी थी। रितु ने पीछे हटते हुए पूछा कि क्या यह सच है कि उसने जानबूझकर चिट्ठियां लौटाईं। काव्या चिल्लाई कि राजीव ने उसे गरीब घर में कैद किया था और वह अपनी जिंदगी बचा रही थी। तभी हॉल के बाहर से तेज शोर उठा। विक्रम का बेटा आदित्य, जो अब तक शराब के नशे में था, राजीव पर झपट पड़ा और बोला कि उसके पिता को बदनाम करने की हिम्मत कैसे हुई। आरव और उसके दोस्त बीच में आए। कुर्सियां खिसकीं, प्लेटें गिरीं, मीरा चीख पड़ी। उसी अफरा-तफरी में अनन्या के हाथ से संदूक की सबसे निचली फाइल फर्श पर गिर गई। उसमें से एक पुराना कानूनी कागज बाहर फिसला। राजीव उसे छुपाने दौड़ा, लेकिन काव्या ने कागज उठा लिया। उसने पढ़ा, और पहली बार उसके चेहरे पर डर नहीं, सदमा उतर आया। वह कागज तलाक का नहीं था। वह 15 साल पुरानी उस रात की पुलिस शिकायत की कॉपी थी, जिसमें लिखा था कि काव्या घर से जाते समय बेटियों के नाम की बचत भी निकालकर ले गई थी।

भाग 3

हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सारी आवाज़ें कांच के डिब्बे में बंद कर दी हों। शहनाई बंद हो चुकी थी। कैमरे नीचे झुक गए थे। फूलों से सजा मंडप अचानक अदालत जैसा लगने लगा था।

काव्या के हाथ में वह पुलिस शिकायत कांप रही थी। उसके होंठ खुले, मगर शब्द नहीं निकले। विक्रम ने कागज छीनकर पढ़ा। उसकी आंखें हर लाइन के साथ छोटी होती गईं।

अनन्या ने पिता की तरफ देखा।

—पापा, यह क्या है?

राजीव ने आंखें बंद कर लीं। इतने सालों तक उसने यह सच अपनी बेटियों से छुपाया था। वह नहीं चाहता था कि उनकी मां सिर्फ छोड़ने वाली औरत नहीं, चोरी करके जाने वाली मां भी बन जाए। उसने सोचा था कि कुछ सच्चाइयां बच्चों के दिल पर बोझ बन जाती हैं।

लेकिन सच जब खुद चलकर मंडप में आ जाए, तो उसे फिर से संदूक में बंद नहीं किया जा सकता।

राजीव ने धीरे से कहा—

—तुम लोगों की पढ़ाई के लिए जो छोटी-छोटी एफडी थीं… जो दादी ने रखी थीं… वह सब उसी रात टूट गई थीं।

सिया पीछे हट गई।

—मतलब… हमारे स्कूल की फीस के पैसे?

—हां।

राधिका की आंखों में आग भर गई।

—और आप चुप रहे?

—क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम लोग अपनी मां से नफरत करते हुए बड़ी हो।

नेहा रोते हुए बोली—

—पर हम तो वैसे भी उसके इंतज़ार में बड़ी हुईं।

परी ने संदूक से और कागज निकाले। बैंक स्टेटमेंट, एफडी तोड़ने की रसीद, एटीएम निकासी, एक पुराने वकील का नोटिस, और राजीव की लिखी हुई चिट्ठी जिसकी शुरुआत थी—“काव्या, बच्चियों के पैसे लौटा दो, मैं अपने लिए कुछ नहीं मांग रहा।”

उस पर भी वापस लौटा हुआ निशान था।

काव्या अचानक फट पड़ी।

—हां, लिए थे पैसे! तो क्या हुआ? मैं भी उस घर में रहती थी! मेरा भी हक था!

राजीव ने पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखा।

—तुझे अपने गहने ले जाने का हक था। अपने कपड़े ले जाने का हक था। मुझे छोड़ने का भी हक था। लेकिन 6 बच्चियों की फीस, किताबें और दवाइयों का पैसा ले जाने का हक नहीं था।

काव्या हंसी, मगर वह हंसी टूटे कांच जैसी थी।

—और तुमने क्या किया? महान पिता बन गए? लोगों से सहानुभूति लेते रहे?

अनन्या ने तीखी आवाज़ में कहा—

—नहीं। इन्होंने रात में कैब चलाई, सुबह स्कूल की बस पकड़ी, दोपहर में अकाउंटेंट की नौकरी की, शाम को ट्यूशन पढ़ाई और रात को हमारे बालों से जुएं निकालीं। अगर सहानुभूति से फीस भरती, तो पापा इतना बूढ़े नहीं दिखते।

यह सुनते ही हॉल में कई लोगों की आंखें झुक गईं।

आरव की मां, जो अब तक चुप बैठी थीं, आगे आईं। उन्होंने अनन्या के सिर पर हाथ रखा।

—बेटा, आज तेरी शादी है। तू चाहे तो यह सब यहीं रोक सकती है।

अनन्या ने आंसू पोंछे।

—नहीं आंटी। यही तो दिन है जब मुझे नई जिंदगी शुरू करनी है। झूठ की राख लेकर नहीं जाऊंगी।

विक्रम ने काव्या से पूछा—

—तुमने मुझसे कहा था कि तुम्हें राजीव ने घर से निकाला था। तुमने कहा था कि बेटियां तुम्हारे खिलाफ कर दी गईं। यह सब क्या है?

काव्या ने घबराकर कहा—

—विक्रम, तुम मेरी बात सुनो। उस समय मैं टूट चुकी थी। राजीव मुझे छोटा महसूस कराता था। वह मुझे हमेशा गरीब रखता था।

राजीव ने थके हुए स्वर में कहा—

—मैं गरीब था, काव्या। लेकिन मैंने तुझे कभी छोटा नहीं कहा।

विक्रम की बेटी, जो अब तक अपनी मां जैसी महिला काव्या को आदर्श मानती थी, आगे आई।

—आपने हमें बताया था कि आपने अपनी बेटियों के लिए बहुत लड़ा।

काव्या ने उसे देखा।

—मैंने लड़ा था।

सिया ने तंज से कहा—

—किससे? जन्मदिन के कार्ड से?

मीरा अब तक चुप थी। वह धीरे-धीरे आगे आई। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, मगर हर किसी ने सुनी।

—मुझे याद नहीं है कि आपने मुझे छोड़ा था। मैं बहुत छोटी थी। पर मुझे यह याद है कि स्कूल में सब बच्चे मदर्स डे पर कार्ड बनाते थे और मैं खाली पन्ना लेकर बैठी रहती थी। टीचर पूछती थीं, “मीरा, किसे दोगी?” मैं कहती थी, “घर जाकर सोचूंगी।” पापा रात को वह कार्ड अपने तकिए के नीचे रख लेते थे। कहते थे, “जब मां आएगी, उसे दे देंगे।” आपको पता है, मैंने 8 कार्ड बनाए थे। एक भी आप तक नहीं गया क्योंकि आप आई ही नहीं।

काव्या के चेहरे पर एक पल को अपराधबोध आया, लेकिन तुरंत उसने उसे गुस्से से ढक दिया।

—मुझ पर भावनात्मक हमला मत करो। तुम सबको मेरी जिंदगी नहीं पता।

अनन्या ने कहा—

—हमें आपकी जिंदगी नहीं चाहिए थी। हमें बस मां चाहिए थी।

काव्या ने चारों तरफ देखा। लोग अब उसे दया से नहीं, साफ नफरत से नहीं, बल्कि भयानक समझ के साथ देख रहे थे। जैसे किसी का मुखौटा उतरने के बाद चेहरे से ज्यादा डर मुखौटे का सच देता है।

वह अचानक राजीव की तरफ मुड़ी।

—तुमने यह सब प्लान किया था?

राजीव ने सिर हिलाया।

—मैंने तो तुझे आने से रोकना चाहा था। अनन्या ने कहा था कि अगर तू सच बोलेगी तो संदूक नहीं खुलेगा।

अनन्या ने काव्या की आंखों में आंखें डालकर कहा—

—आपने चुना, मां। जैसे 15 साल पहले चुना था।

काव्या का चेहरा तमतमा गया। उसने संदूक को पैर से ठोकर मार दी। चिट्ठियां फर्श पर बिखर गईं। छोटी-छोटी हथेलियों से बने ग्रीटिंग कार्ड, रंगीन पेंसिल से बनाए घर, स्कूल की फोटो, अस्पताल की पर्चियां, रक्षाबंधन की तस्वीरें, गणेश चतुर्थी की मिट्टी की मूर्ति के साथ 6 बच्चियों की फोटो—सब मेहमानों के पैरों के पास फैल गए।

राजीव झुककर उन्हें उठाने लगा।

तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे हॉल को रुला दिया।

6 बेटियां एक साथ झुक गईं।

अनन्या ने जन्मदिन वाला कार्ड उठाया। सिया ने मदर्स डे का पास उठाया। राधिका ने स्कूल की फोटो। नेहा ने वह तस्वीर जिसमें वह सूरजमुखी बनी थी। परी ने अस्पताल की रिपोर्ट। मीरा ने अपना खाली मदर्स डे कार्ड।

फिर 6 बेटियां अपने पिता के चारों ओर खड़ी हो गईं।

अनन्या ने माइक उठाया।

—यह सब हमारी मां के खिलाफ सबूत नहीं हैं। यह हमारे पिता के पक्ष में गवाही हैं।

सिया बोली—

—जिस आदमी ने कभी हमें मां को गाली देना नहीं सिखाया।

राधिका ने कहा—

—जिसने हर त्यौहार पर 7 दीये जलाए, क्योंकि कहता था एक दीया मां के लौटने के लिए भी।

नेहा ने रोते हुए कहा—

—जिसने कभी नई शर्ट नहीं खरीदी, ताकि हम 3 बहनों को एक जैसे फ्रॉक मिल सकें।

परी ने कहा—

—जिसने हमारे टूटे दिलों को ऐसे जोड़ा जैसे अपनी सिलाई मशीन से यूनिफॉर्म सिलता था।

मीरा ने कार्ड सीने से लगाकर कहा—

—और जिसने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मेरा जन्म गलती था।

राजीव अब रो रहा था। वह खुलकर रो रहा था, शायद 15 साल में पहली बार। उसने हमेशा अपनी बेटियों के सामने मजबूत रहने की कोशिश की थी। मगर उस पल वह सिर्फ एक पिता था, जिसकी सारी थकान उसकी आंखों से बह रही थी।

आरव आगे आया। उसने राजीव के पैर छुए।

—पापा, आज से मैं भी आपकी बेटी का ही नहीं, आपका भी बेटा हूं।

राजीव ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

हॉल में हल्की तालियां बजने लगीं। फिर वे तालियां तेज हो गईं। कोई नारे नहीं, कोई तमाशा नहीं, बस एक पिता के लिए सम्मान था, जिसने बिना घोषणा के 15 साल युद्ध लड़ा था।

काव्या ने यह देखा तो उसका चेहरा और कठोर हो गया।

—बहुत अच्छा नाटक है। अब सब खुश? मुझे डायन बना दिया?

विक्रम ने धीमे स्वर में कहा—

—तुम्हें किसी ने डायन नहीं बनाया, काव्या। तुमने एक मां बनने से इनकार किया। फर्क है।

काव्या उसकी तरफ मुड़ी।

—तुम भी?

—मैं भी सच देख सकता हूं।

—मैंने तुम्हारे लिए सब छोड़ा था!

विक्रम ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया।

—नहीं। तुमने अपनी बेटियों को छोड़ा था। मेरे लिए नहीं, अपने लिए। और फिर मुझसे भी झूठ बोला।

काव्या की आंखों में डर लौट आया।

—विक्रम, हमारा घर, हमारा नाम, हमारा सर्कल…

—मेरे नाम का इस्तेमाल करके तुमने 15 साल अपनी कहानी बेची। आज पहली बार मैं असली कहानी सुन रहा हूं।

विक्रम के बेटे आदित्य ने भी सिर झुका लिया। कुछ देर पहले जो राजीव पर चढ़ दौड़ा था, अब वह शर्मिंदा था।

—अंकल… मुझे माफ कर दीजिए। मुझे सच नहीं पता था।

राजीव ने थकी मुस्कान दी।

—बेटा, गुस्सा सच नहीं बदलता। बस अगली बार किसी का दर्द सुनने से पहले फैसला मत करना।

काव्या ने देखा, उसका अपना बनाया हुआ साम्राज्य उसके हाथ से फिसल रहा था। वह अनन्या के करीब आई।

—तू मेरी बेटी है। तू मुझे ऐसे सबके सामने गिरा नहीं सकती।

अनन्या ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर धीरे से कहा—

—मैंने आपको नहीं गिराया। मैं तो आज भी चाहती थी कि आप बस आएं, चुपचाप आशीर्वाद दें और चली जाएं। पर आपको मां बनकर नहीं, पीड़ित बनकर आना था।

काव्या की आंखें भर आईं।

—मुझे मौका दो।

मीरा ने तुरंत सिर उठाया। उसके चेहरे पर इतनी पुरानी भूख थी कि राजीव का दिल कांप गया। बच्चा चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मां के एक “मौका दो” में बचपन की सारी प्रतीक्षा जाग जाती है।

अनन्या ने मीरा की तरफ देखा, फिर अपनी बहनों की तरफ।

—मौका माफी से शुरू होता है, झूठ से नहीं।

काव्या ने होंठ भींचे।

—ठीक है। माफ कर दो।

सिया कड़वाहट से हंसी।

—यह माफी नहीं, बचाव है।

काव्या चिल्लाई—

—तो क्या चाहती हो? मैं सबके सामने घुटनों पर बैठ जाऊं?

राजीव ने शांत स्वर में कहा—

—नहीं। कोई तमाशा मत कर। बस एक सच बोल दे। एक बार। अपनी बेटियों से झूठ मत बोल।

काव्या के चेहरे पर लंबी लड़ाई चली। उसका अहंकार, उसका डर, उसका सामाजिक चेहरा, उसका झूठ, सब एक-दूसरे से लड़ रहे थे। फिर उसने माइक उठाया। उसकी आवाज़ पहली बार सजाई हुई नहीं थी।

—मैं चली गई थी… क्योंकि मुझे यह जिंदगी छोटी लगती थी। मैं थक गई थी। मुझे लगा बेटियां राजीव के साथ ठीक रहेंगी। मैंने सोचा बाद में लौट आऊंगी। फिर शर्म आई। फिर डर लगा। फिर मैंने खुद को समझाया कि गलती मेरी नहीं थी। हर साल जब कार्ड आया, मैंने उसे खोला नहीं। क्योंकि अगर खोलती, तो मुझे लौटना पड़ता। और मैं लौटना नहीं चाहती थी।

हॉल में किसी ने सांस खींची।

काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

—मैंने पैसे भी लिए थे। मुझे लगा मेरी नई जिंदगी शुरू करनी है। मैंने सोचा राजीव किसी तरह संभाल लेगा। वह हमेशा संभाल लेता था।

राजीव ने धीरे से कहा—

—मैंने संभाला। पर बच्चियां चीजें नहीं थीं, काव्या।

काव्या ने पहली बार सिर झुका लिया।

—मुझे माफ कर दो।

कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं हुई।

फिर अनन्या ने कहा—

—आज नहीं।

काव्या ने सिर उठाया।

अनन्या की आवाज़ कांप रही थी, मगर उसमें अजीब-सी मजबूती थी।

—माफी कोई शादी का रिटर्न गिफ्ट नहीं है कि आते ही मिल जाए। आपने 15 साल लिए हैं हमें तोड़ने में। हमें भी समय लगेगा तय करने में कि हम आपको अपनी जिंदगी में जगह देना चाहते हैं या नहीं।

मीरा रो पड़ी, पर उसने भी सिर हिलाया।

—मैं आपको जानना चाहती थी… लेकिन अब मैं खुद को खोकर नहीं जानूंगी।

सिया ने कहा—

—अगर कभी सच में पछतावा हो, तो पापा से नहीं, हम 6 से अलग-अलग माफी मांगना। बिना कैमरे, बिना विक्रम अंकल, बिना हीरों के।

काव्या ने चारों तरफ देखा। उसकी आंखें खाली हो गई थीं। वह शायद पहली बार समझ रही थी कि वह शादी में बेटी को लेने नहीं, अपना हिसाब देने आई थी।

विक्रम ने अपनी बहन और बच्चों को इशारा किया।

—हम जा रहे हैं।

काव्या ने उसका हाथ पकड़ा।

—मुझे अकेला मत छोड़ो।

विक्रम ने उसका हाथ धीरे से हटाया।

—तुमने अकेला छोड़ना 15 साल पहले चुना था। आज बस तुम्हें उसका मतलब समझ आ रहा है।

वह चला गया। उसके पीछे उसके बच्चे भी।

काव्या वहीं खड़ी रह गई। कुछ पल बाद उसने अनन्या की तरफ देखा।

—एक फोटो… बस एक फोटो अपनी 6 बेटियों के साथ?

अनन्या की आंखें भर आईं। उसने धीरे से सिर हिला दिया।

—नहीं। जिन तस्वीरों के लिए हम बचपन में तरसे, वे आज सजावट के लिए नहीं मिलेंगी।

यह वाक्य काव्या के लिए किसी थप्पड़ से बड़ा था।

वह बिना कुछ कहे मुड़ी। उसके कदम भारी थे। दरवाज़े तक पहुंचते-पहुंचते उसका हीरों वाला पल्लू एक फूलों की सजावट में अटक गया। पहले वह ऐसी चीज़ पर गुस्से से नौकर बुलाती। आज उसने खुद उसे छुड़ाया। दरवाज़ा खुला, बाहर रात थी। वह चली गई।

दरवाज़ा बंद हुआ।

वही आवाज़।

राजीव के शरीर में एक झटका-सा लगा। 15 साल पहले भी यही आवाज़ आई थी। उस रात इसके बाद 6 बच्चियों का रोना था। आज इसके बाद सन्नाटा था, फिर धीरे-धीरे शहनाई की धुन वापस लौट आई।

अनन्या ने गहरी सांस ली।

—पापा, मेरी शादी अभी खत्म नहीं हुई।

राजीव ने आंखें पोंछीं।

—बेटा, मैं नहीं चाहता था कि तेरे दिन पर यह सब हो।

—मेरे दिन पर सच हुआ। इससे अच्छा क्या हो सकता है?

आरव ने पंडित से कहा—

—पंडित जी, फेरे शुरू करें?

पंडित ने भी आंखें पोंछते हुए सिर हिलाया।

फेरे शुरू हुए। हर फेरे पर अनन्या का हाथ आरव के हाथ में था, मगर उसकी नजर बार-बार अपने पिता पर जाती। राजीव उसके सामने नहीं, उसके पीछे खड़ा था—जैसे हमेशा। बिना शोर, बिना दावा, लेकिन पूरी ताकत से।

जब विदाई का समय आया तो 6 बहनें एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़ीं। राजीव ने अनन्या के सिर पर हाथ रखा।

—खुश रहना।

अनन्या ने रोते हुए कहा—

—आपने हमें सिर्फ पाला नहीं पापा। आपने हमें सिखाया कि घर दीवारों से नहीं, किसी के न छोड़ने से बनता है।

राजीव कुछ कह नहीं पाया।

मीरा ने उसके हाथ में वह खाली मदर्स डे कार्ड रखा।

—पापा, इसे अब खाली मत रखना।

राजीव ने कार्ड खोला। अंदर मीरा ने जल्दी-जल्दी लिखा था—“जिसने मां की जगह नहीं ली, बल्कि पिता होने को ही पूरा आसमान बना दिया।”

राजीव ने कार्ड सीने से लगा लिया।

रात के अंत में, जब मेहमान जा चुके थे और फूलों की पंखुड़ियां फर्श पर बिखरी थीं, अनन्या ने अपनी शादी की आखिरी तस्वीर खिंचवाई। उसमें वह और आरव बीच में थे। एक तरफ राजीव था, दूसरी तरफ उसकी 5 बहनें। किसी ने पूछा—

—दुल्हन की मां को फोटो में नहीं रखना?

अनन्या ने कैमरे की तरफ देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा—

—परिवार वही है जो फोटो खिंचवाने के दिन नहीं, फोटो लौटाए जाने के दिन भी साथ रहे।

फ्लैश चमका।

उस तस्वीर में कोई खाली जगह नहीं थी।

क्योंकि 15 साल बाद पहली बार उन 6 बेटियों ने समझा कि वे अधूरी नहीं थीं। वे कभी अनाथ नहीं थीं। उनकी जिंदगी से एक मां गई थी, मगर एक पिता ने अपना पूरा जीवन 6 हिस्सों में बांटकर उन्हें दे दिया था।

और राजीव ने उस रात आसमान की तरफ देखा तो उसे लगा, जैसे उसके बरसों से दबे दिल ने पहली बार कहा हो—वह हार नहीं गया था।

जिसने छोड़ दिया, वह याद बन गई।

जो रुका रहा, वही घर बन गया।

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