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दुल्हन बनने आई लड़की को 17 चिट्ठियों के सहारे सूने स्टेशन पर छोड़ दिया गया, लेकिन जब सच खुला कि वह आदमी पहले से शादीशुदा था, उसके बाद घर की पूर्व वाली खिड़की ने सब बदल दिया

भाग 1

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जिस आदमी से नंदिनी 6 महीने से विवाह के सपने बुन रही थी, वह उसे मरुभूमि के सूने रेल ठहराव पर अकेला छोड़कर कभी आया ही नहीं।

नंदिनी बनर्जी ने अपनी नीली पोटली में बंधे 17 पत्रों को ऐसे पकड़ा हुआ था, जैसे वे कागज नहीं, किसी नए जीवन की चाबी हों। कोलकाता की भीगी गलियों, पुराने मकान की काली दीवारों और रिश्तेदारों की दया भरी नजरों से दूर वह राजस्थान के एक छोटे कस्बे रतनगढ़ आई थी। माता-पिता के जाने के बाद उसके पास बस थोड़ी सी जमा पूंजी, सिलाई का हुनर और एक वैवाहिक विज्ञापन का साहस बचा था।

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“शांत स्वभाव की शिक्षित युवती, गृहकार्य व हिसाब-किताब में निपुण, ईमानदार गृहस्थ पुरुष से विवाह हेतु पत्राचार चाहती है।”

इसी विज्ञापन का उत्तर राघव प्रताप सिंह ने दिया था। उसके पत्रों में बड़े-बड़े वादे नहीं थे। वह लिखता था कि उसके पास खेत हैं, 2 ऊंट, 6 गायें, एक पुरानी हवेली और ऐसा रसोईघर है जिसकी खिड़की पूर्व की ओर खुलती है। उसने लिखा था, “सुबह की पहली धूप तुम्हारी रोटियों पर पड़ेगी।”

यही पंक्ति नंदिनी के मन में घर बना गई थी।

10 जून की दोपहर, जब रेल धूल उड़ाती हुई रतनगढ़ के छोटे से ठहराव पर रुकी, नंदिनी का दिल पसलियों से टकराने लगा। उसने हल्की सादी साड़ी ठीक की, संदूक उतरवाया और भीड़ में राघव को ढूंढने लगी। पर वहां भीड़ थी ही नहीं। एक टूटी बेंच, बंद खिड़की वाला छोटा दफ्तर, दूर रेत में कांपते कीकर के पेड़, और फैलती हुई चुप्पी।

वह देर से आ रहा होगा, नंदिनी ने खुद को समझाया। गांव में बैल छूट गया होगा। कुएं पर कोई काम अटक गया होगा। रास्ता खराब होगा।

पर सूरज पहाड़ी के पीछे उतर गया। धूप राख हो गई। हवा में ठंडक उतर आई। दफ्तर का बूढ़ा कर्मचारी ताला लगाकर चला गया। जाते-जाते उसने बस इतना पूछा, “बेटी, कोई लेने नहीं आया?”

नंदिनी ने सिर हिला दिया, पर आवाज नहीं निकली।

रात घिरने लगी। तभी दूर से बैलगाड़ी की चरमराहट सुनाई दी। एक लंबा, सांवला, मजबूत कंधों वाला आदमी उतरा। उसके साथ 2 बैल और पीछे बंधी बोरियों में अनाज था। उसने नंदिनी को देखा, उसके संदूक को देखा, फिर खाली अंधेरे रास्ते को।

“आखिरी रेल जा चुकी है,” उसने धीमे स्वर में कहा।

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नंदिनी ने कांपती आवाज में उत्तर दिया, “मुझे पता है।”

उसने कोई बेइज्जत करने वाला सवाल नहीं पूछा। बस बोला, “कस्बे तक रास्ता अकेली लड़की के लिए ठीक नहीं है। कमला देवी की सराय साफ-सुथरी है। चाहें तो आपका संदूक मैं पहुंचा दूं।”

“आप कौन हैं?”

“देवेंद्र चौहान। पास के खेतों में रहता हूं।”

नंदिनी ने अपने पत्रों की पोटली कसकर पकड़ ली। उसी क्षण उसे लगा कि राघव ने सिर्फ उसे धोखा नहीं दिया, बल्कि उसकी पूरी उम्मीद को चौराहे पर निर्वस्त्र कर दिया है।

देवेंद्र ने संदूक गाड़ी पर रखा। वे दोनों बिना ज्यादा बोले कस्बे की ओर चल पड़े। सराय के दरवाजे पर पहुंचकर उसने कमला देवी से कहा, “इस बेटी को 7 दिन कमरा दे दीजिए। खर्च मेरे खाते में लिख लेना।”

नंदिनी कुछ बोल पाती, उससे पहले वह बैलगाड़ी मोड़ चुका था।

पर उसी रात, जब नंदिनी कमरे में अकेली रो रही थी, कमला देवी के आंगन में कोई आदमी चुपके से आया और धीमे से पूछा, “वह लड़की कहां ठहरी है?”

कमला देवी ने खिड़की से झांका, और उनका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

भाग 2

सुबह नंदिनी की नींद दरवाजे पर तेज दस्तक से टूटी। कमला देवी ने अंदर आते ही कुंडी चढ़ा दी और फुसफुसाईं, “बेटी, कल रात कोई तुम्हारे बारे में पूछ रहा था। नाम नहीं बताया, पर चेहरा छुपा रहा था।”

नंदिनी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। क्या राघव आया था? या वह कोई और था? उसके भीतर उम्मीद और भय दोनों एक साथ उठे।

7 दिन तक वह सराय में रही। कमला देवी डाकघर भी संभालती थीं, इसलिए कस्बे की हर खबर उन्हीं तक आती थी। नंदिनी रसोई में हाथ बंटाती, हिसाब लिखती, और हर शाम दरवाजे की ओर देखती। राघव का कोई संदेश नहीं आया।

7वें दिन देवेंद्र फिर आया। वह कमरे में नहीं, नीचे बैठक में खड़ा रहा। उसके हाथ में पुरानी खाता-बही थी।

“कमला देवी ने बताया कि तुम्हारा हिसाब अच्छा है,” उसने कहा। “मेरे खेतों का लेखा 3 साल से बिगड़ा पड़ा है। मुझे किसी भरोसेमंद हाथ की जरूरत है। मजदूरी दूंगा, रहने-खाने का खर्च अलग। काम चाहो तो चल सकती हो।”

नंदिनी ने पहली बार उसके चेहरे को गौर से देखा। उसमें दया नहीं, सम्मान था। यही बात उसे छू गई।

देवेंद्र का घर कस्बे से 5 कोस दूर था। मिट्टी और पत्थर से बना पुराना आंगन, गौशाला में 6 गायें, एक बूढ़ी भैंस, 2 शांत बैल और रसोई की खिड़की सचमुच पूर्व की ओर खुलती थी। यह वही दृश्य था जो राघव ने पत्रों में लिखा था, पर घर किसी और का था।

नंदिनी ने बिखरी रसीदें, उधारी के कागज, बीज और अनाज का हिसाब संभालना शुरू किया। हर सुबह उसकी मेज पर गरम चाय रखी मिलती। देवेंद्र कभी नहीं कहता कि उसने रखी है। वह बस खेत चला जाता।

धीरे-धीरे घर बदलने लगा। रसोई में फिर सुगंध आने लगी। आंगन में तुलसी आई। टूटी अलमारी सुधरी। देवेंद्र के फटे कुर्तों पर टांके लगे। नंदिनी के भीतर भी कुछ जुड़ने लगा था।

फिर एक दिन डाक छांटते हुए कमला देवी ठिठक गईं।

“राघव प्रताप सिंह… यह पत्र उसकी पत्नी सावित्री के नाम है। वह तो अजमेर में रेल विभाग में काम करता है। हर महीने पत्नी को पत्र भेजता है।”

नंदिनी के कानों में जैसे आग भर गई।

उसी शाम वह देवेंद्र के आंगन में पहुंची। उसके हाथ में राघव के 17 पत्र थे। उसने सारे पत्र देवेंद्र के सामने रख दिए और कहा, “जिस आदमी से विवाह करने आई थी, वह पहले से विवाहित है।”

देवेंद्र की आंखों में पहली बार शांत आग भड़क उठी।

भाग 3

देवेंद्र ने 17 पत्रों को हाथ भी नहीं लगाया। वे मिट्टी के चौके पर रखे रहे, जैसे किसी मृत संबंध की राख हो। नंदिनी उसके सामने खड़ी थी, सीधी, पर भीतर से टूटती हुई। वह रो नहीं रही थी। शायद रोने का अधिकार भी राघव ने उससे छीन लिया था।

देवेंद्र ने धीरे से पूछा, “तुम्हें कब पता चला?”

“आज। कमला देवी डाक छांट रही थीं। उसकी पत्नी का नाम सावित्री है। वह अजमेर में नौकरी करता है। उसने मेरे साथ खेल किया।”

देवेंद्र ने जबड़े भींच लिए। उसकी निगाह आंगन से आगे अंधेरे खेतों में टिक गई। हवा में बाजरे की बालियां हिल रही थीं। पास की गौशाला में बूढ़ी भैंस सांस खींच रही थी। सब कुछ वैसा ही था, पर नंदिनी को लगा कि दुनिया का नक्शा बदल गया है।

“इस पर शिकायत हो सकती है,” देवेंद्र ने कहा। “डाक से झूठे वादे, विवाह का छल, धन खर्च कराकर बुलाना… पंचायत, थाने, अदालत, सब जगह बात उठ सकती है। वह बच नहीं पाएगा।”

नंदिनी ने लंबी सांस ली। “और फिर पूरा कस्बा क्या कहेगा? कि कोलकाता की लड़की किसी विवाहित पुरुष के पत्रों में बहककर चली आई। लोग उस पर नहीं, मुझ पर हंसेंगे। मेरी मूर्खता गिनेंगे। मेरा अकेलापन नापेंगे।”

“लोगों को बोलने दो,” देवेंद्र की आवाज भारी थी।

“नहीं,” नंदिनी ने पहली बार कठोरता से कहा। “मैंने बहुत दिनों तक दूसरों की दया खाई है। अब अपनी इज्जत किसी चौपाल पर चर्चा बनने के लिए नहीं दूंगी। वह आदमी मेरा जीवन नहीं है। वह बस रास्ते में पड़ा कीचड़ था।”

देवेंद्र ने उसकी ओर देखा। उस क्षण उसे पहली बार समझ आया कि नंदिनी कमजोर नहीं थी। वह तो आग में रखी उस धातु जैसी थी, जो लाल होकर और मजबूत हो जाती है। वह 23 साल की थी, पर उसकी आंखों में उन औरतों की थकान थी जो समय से पहले बड़ी हो जाती हैं।

उस रात नंदिनी ने पत्रों को फिर से नीली पोटली में नहीं बांधा। उसने उन्हें आंगन के चूल्हे में डाला। एक-एक पन्ना आग पकड़ता गया। “पूर्व की खिड़की” वाली पंक्ति कुछ पल तक काली होती रही, फिर राख बन गई। देवेंद्र पास खड़ा रहा। उसने न रोका, न कोई उपदेश दिया।

अगली सुबह नंदिनी ने तय किया कि वह देवेंद्र का हिसाब पूरा करके चली जाएगी। कहीं और काम ढूंढेगी। शायद जयपुर। शायद बनारस। शायद वापस कोलकाता, जहां कम से कम अपमान परिचित था। पर जब वह रसोई में गई, तो खिड़की से आती धूप आटे पर गिर रही थी। वह हाथ रोककर बहुत देर तक उसे देखती रही।

देवेंद्र उस दिन जल्दी नहीं गया। वह द्वार पर खड़ा होकर बोला, “आज खेत देर से देख लूंगा। तुम्हें बाजार जाना हो तो बैलगाड़ी तैयार है।”

“नहीं,” नंदिनी ने कहा। “काम बहुत है।”

“काम तो हमेशा रहेगा।”

“मुझे भी शायद नहीं रहना चाहिए।”

यह सुनते ही देवेंद्र का चेहरा कुछ पल के लिए सूना हो गया। फिर उसने सामान्य होने की कोशिश की। “जहां तुम्हें सम्मान मिले, वहां जाना चाहिए।”

“यहां मिला है,” नंदिनी ने धीमे से कहा। “इसीलिए डर लगता है।”

देवेंद्र कुछ न बोला। वह बाहर चला गया। नंदिनी ने पूरे दिन खाता-बही में सिर गड़ाए रखा, पर अंकों की पंक्तियां बार-बार धुंधली हो जातीं। 3 साल की बिखरी देनदारी, उधारी, मजदूरी, अनाज की बिक्री, दूध का हिसाब—सब उसके सामने खुलता गया। उसे समझ आया कि देवेंद्र जमीनदार नहीं, संघर्ष करता किसान था। पिता के जाने के बाद उसने अकेले खेत बचाए थे। मां की मृत्यु के बाद घर से आवाजें चली गई थीं। उसे पढ़ना आता था, पर लेखे की बारीकी नहीं आती थी। कई व्यापारियों ने उसका फायदा उठाया था।

एक जगह नंदिनी को पता चला कि कस्बे के बनिए ने बीज के दाम दोगुने लिखे थे। दूसरी जगह दूध मंडी वाले ने 4 महीने का भुगतान दबा रखा था। उसने सारे कागज अलग किए। शाम को जब देवेंद्र लौटा, उसने उसके सामने हिसाब रखा।

“तुम्हें कम से कम 312 रुपये और मिलने चाहिए,” उसने कहा। “और यह बनिया तुम्हें 2 साल से लूट रहा है।”

देवेंद्र ने खाता देखा, फिर उसे। उसके चेहरे पर शर्म, आश्चर्य और कृतज्ञता साथ-साथ आए। “मैं खेत समझता हूं। कागज नहीं।”

“कागज भी खेत जैसे होते हैं,” नंदिनी ने कहा। “जहां ध्यान न दो, वहां कोई और फसल काट लेता है।”

देवेंद्र के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। वही पहली मुस्कान थी जो नंदिनी ने उसके चेहरे पर देखी।

दिन बीतने लगे। नंदिनी ने जाने की बात फिर नहीं की, पर दोनों के बीच वह बात चुपचाप बैठी रही। वह अब केवल हिसाब नहीं करती थी। उसने अनाज का भंडार ठीक किया, गौशाला की दवा लिखी, दूध बेचने का नया हिसाब बनाया। बूढ़ी भैंस, जिसे देवेंद्र “गौरी” कहता था, उसके पीछे-पीछे चलने लगी। 2 बैल—काली और मोती—उसे पहचानने लगे। वह गायों को नाम से पुकारती, तो वे गर्दन उठा देतीं।

देवेंद्र इन छोटे बदलावों को चुपचाप देखता। घर, जो पहले सिर्फ दीवारों का ढांचा था, अब सांस लेने लगा था। सुबह चाय के साथ कभी गुड़ रखा मिलता, कभी भुने चने। नंदिनी ने भी एक दिन उसके लिए मोटी बाजरे की रोटी पर घी ज्यादा लगा दिया। दोनों में से किसी ने इसे स्वीकारोक्ति नहीं कहा, पर दोनों समझते थे।

एक रविवार कमला देवी अचानक आईं। उनके साथ कस्बे के 2 लोग भी थे। चेहरों पर बनावटी चिंता थी।

“बेटी,” कमला देवी ने सावधानी से कहा, “कस्बे में बातें चल रही हैं। अकेली युवती का किसी अविवाहित पुरुष के घर आना-जाना… लोग जीभ तो चलाएंगे।”

नंदिनी का चेहरा तमतमा गया। जो समाज एक लड़की को सूने ठहराव पर अकेला छोड़ देता है, वही उसके बच जाने पर सवाल करता है।

उनमें से एक आदमी बोला, “इज्जतदार घरों में ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं। देवेंद्र, तुम्हें भी सोचना चाहिए। कल को कोई कहेगा कि तुमने मजबूरी का फायदा उठाया।”

देवेंद्र ने पहली बार खुले आंगन में गरजती आवाज में कहा, “जिस दिन यह लड़की रात को अकेली पड़ी थी, तुममें से कोई उसे लेने नहीं आया था। उस दिन तुम्हारी इज्जत सो रही थी क्या?”

आदमी चुप हो गया।

देवेंद्र ने आगे कहा, “यह मेरे घर में मजदूरी पर आई है, सम्मान से। इसके हाथ ने मेरा बिखरा घर संभाला है। जिसने इस पर उंगली उठानी है, पहले अपना चेहरा धोकर आए।”

कमला देवी की आंखें भर आईं। नंदिनी ने देवेंद्र को देखा। उसके भीतर कोई गांठ खुली। वह आदमी जो कम बोलता था, आज उसके लिए पूरे कस्बे के सामने दीवार बनकर खड़ा था।

उस रात आकाश में धूल थी। तारे धुंधले दिख रहे थे। नंदिनी आंगन में तुलसी को पानी दे रही थी। देवेंद्र ने पास आकर कहा, “आज जो हुआ, उसके लिए क्षमा चाहता हूं।”

“आपने क्या गलत किया?”

“मुझे पहले समझना चाहिए था कि तुम्हारा नाम किसी की जुबान पर आने से पहले मुझे रास्ता साफ कर देना चाहिए।”

नंदिनी ने लोटा नीचे रखा। “हर रास्ता पुरुषों से साफ नहीं करवाया जाता। कुछ रास्ते औरतें खुद बनाती हैं।”

देवेंद्र ने सिर झुका दिया। “ठीक कहती हो।”

कुछ देर बाद उसने धीमे से कहा, “पर अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे साथ वह रास्ता चलना चाहता हूं।”

नंदिनी की सांस रुक सी गई।

देवेंद्र ने कठिनाई से शब्द चुने। “मैं बड़े-बड़े पत्र नहीं लिख सकता। मुझे सजावटी बातें नहीं आतीं। मेरे पास खेत हैं, कर्ज भी है। 6 गायें हैं, एक बूढ़ी भैंस है, 2 बैल हैं, और यह घर है जो बहुत साल खाली रहा। जब तुम आई, तो पहले मुझे लगा तुम मेरे हिसाब ठीक कर दोगी। फिर समझ आया कि तुमने हिसाब से ज्यादा ठीक किया है।”

नंदिनी की आंखें भर आईं।

“मैं तुम्हें दया से नहीं रोकना चाहता,” उसने कहा। “दया से बना रिश्ता अपमान होता है। मैं तुम्हें इसलिए रोकना चाहता हूं क्योंकि तुम्हारे बिना यह घर फिर घर नहीं रहेगा। अगर तुम चाहो, तो… मेरी पत्नी बनकर रहो।”

हवा थम गई। दूर कहीं सियार ने आवाज दी। रसोई की पूर्व वाली खिड़की से चांदनी भीतर गिर रही थी।

नंदिनी ने कोई तुरंत उत्तर नहीं दिया। वह आंगन से रसोई तक गई। वहां वही खिड़की थी, जिसके सपने ने उसे धोखे तक पहुंचाया था। पर इस बार खिड़की झूठे पत्र में नहीं, सचमुच की दीवार में थी। उसने पीछे मुड़कर देवेंद्र को देखा। उसके चेहरे पर डर था, पर वह डर स्वार्थ का नहीं था। वह उस आदमी का डर था जो पहली बार किसी को खोने से सचमुच घबरा रहा था।

“मैंने 6 महीने कागज पर लिखे वादे पढ़े,” नंदिनी ने कहा। “उनमें धूप थी, खेत थे, घर था, पर सच नहीं था। आपने 1 भी वादा नहीं किया। फिर भी हर सुबह चाय रखी। हर शाम दरवाजा खुला रखा। मुझे दया नहीं, काम दिया। छत नहीं, सम्मान दिया।”

देवेंद्र ने सांस रोके उसे देखा।

“मैं रहूंगी,” नंदिनी ने कहा। “पर किसी धोखे से भागकर नहीं। अपने मन से।”

देवेंद्र के गंभीर चेहरे पर जो मुस्कान फैली, वह इतनी उजली थी कि नंदिनी को लगा जैसे सुबह समय से पहले आ गई हो।

विवाह बहुत सादा हुआ। न कोई ऊंचा मंडप, न बैंड, न दिखावा। कस्बे के छोटे मंदिर में, तुलसी और गेंदे की माला के बीच, नंदिनी ने हल्दी रंग की साड़ी पहनी। देवेंद्र ने साफ सफेद धोती-कुर्ता। कमला देवी ने कन्यादान नहीं किया, क्योंकि नंदिनी ने कहा, “मैं किसी की वस्तु नहीं, अपना निर्णय हूं।” कमला देवी ने बस उसके माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।

कस्बे वालों में से कुछ आए, कुछ नहीं आए। जिनकी जुबान तेज थी, वे दूर खड़े रहे। पर जब नंदिनी ने देवेंद्र के साथ अग्नि के फेरे लिए, तो उसे पहली बार लगा कि वह किसी घर में लाई नहीं जा रही, वह खुद अपना घर चुन रही है।

विवाह के बाद भी जीवन कहानी जैसा आसान नहीं हुआ। खेत में सूखा पड़ा। बनिए ने पुराने हिसाब पर झगड़ा किया। दूध मंडी वाले ने भुगतान रोकने की कोशिश की। नंदिनी देवेंद्र के साथ पंचायत गई। उसने खाता खोला, तारीखें पढ़ीं, रसीदें दिखाईं। जो लोग उसे “बेचारी” समझते थे, वे पहली बार उसकी आवाज में धार सुन रहे थे।

एक दिन वही बनिया बड़बड़ाया, “औरतें अब खाता भी सिखाएंगी?”

नंदिनी ने शांत स्वर में कहा, “जब मर्द गलत लिखेंगे, तो औरतें सही पढ़ेंगी।”

चौपाल में हंसी फूटी, पर इस बार हंसी नंदिनी पर नहीं थी।

धीरे-धीरे देवेंद्र का खेत संभलने लगा। अनाज सही दाम पर बिकने लगा। गायों का दूध सीधे शहर भेजा जाने लगा। नंदिनी ने आंगन में छोटी पाठशाला भी शुरू की, जहां गांव की लड़कियां शाम को पढ़ने आने लगीं। वह उन्हें अक्षर, गिनती और अपना नाम साफ लिखना सिखाती। हर लड़की से कहती, “जिस दिन तुम अपना नाम खुद लिखोगी, उस दिन कोई तुम्हारी कहानी तुम्हारे बदले नहीं लिख पाएगा।”

राघव प्रताप सिंह फिर कभी सामने नहीं आया। पर उसका झूठ पूरी तरह बेअसर भी नहीं गया। एक वर्ष बाद अजमेर से खबर आई कि उसकी पत्नी सावित्री ने उसे छोड़ दिया है। कारण खुला नहीं बताया गया, पर कमला देवी ने कहा कि सावित्री को भी कुछ पुराने पत्र मिले थे। नंदिनी ने उस खबर पर न खुशी मनाई, न दुख। उसने बस गौरी भैंस के लिए चारा काटते हुए कहा, “हर झूठ एक दिन अपने घर लौटता है।”

समय के साथ नंदिनी और देवेंद्र का जीवन गहरा होता गया। प्रेम उनके बीच गीत गाकर नहीं आया था। वह सुबह की चाय, खेत से लौटे आदमी के लिए पानी, थकी स्त्री के पास बिना शोर बैठने, और कठिन दिनों में एक-दूसरे की चुप्पी समझने के रूप में आया।

5 साल बाद उसी घर की सुबह अलग थी। रसोई की पूर्व वाली खिड़की से धूप भीतर गिर रही थी। आटे की परात में सुनहरी चमक तैर रही थी। नंदिनी के पास 4 साल का बेटा अर्जुन बैठा था, जो आटे की छोटी-छोटी गोलियां बनाकर उन्हें गायों का लड्डू कह रहा था। 2 साल की बेटी मीरा आंगन में मोती बैल की रस्सी पकड़ने की जिद कर रही थी, और देवेंद्र दूर से डांटने का अभिनय कर रहा था।

“मीरा, मोती तुम्हें लेकर खेत चला जाएगा,” उसने कहा।

मीरा खिलखिलाई और और जोर से रस्सी पकड़ ली।

नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखा। वही धरती, वही धूप, वही हवा। पर अब वह उस लड़की जैसी नहीं थी जो सूने रेल ठहराव पर बैठी थी, हाथ में झूठे पत्र और आंखों में डर। वह अब इस घर की धड़कन थी।

देवेंद्र भीतर आया। उसके बालों में हल्की धूल थी। उसने अर्जुन के सिर पर हाथ फेरा और नंदिनी से पूछा, “आज धूप अच्छी है?”

नंदिनी मुस्कुराई। यह प्रश्न धूप का नहीं था। वह दोनों जानते थे।

“बहुत अच्छी,” उसने कहा। “पर यह धूप उस पत्र वाली नहीं है।”

देवेंद्र ने उसकी ओर देखा।

“वह धूप झूठ में लिखी थी,” नंदिनी ने परात पर हाथ फेरते हुए कहा। “यह धूप हमने कमाई है।”

देवेंद्र ने चुपचाप उसका हाथ थाम लिया। उसकी हथेली अब भी कठोर थी, पर पकड़ में वही सावधानी थी जो 5 साल पहले सूने ठहराव से संदूक उठाते समय थी।

आंगन में अर्जुन गाय के पीछे भाग रहा था। मीरा हंस रही थी। गौरी भैंस सुस्त आंखों से सब देख रही थी। काली और मोती खूँटे के पास शांत खड़े थे। घर में चूल्हे की गंध, बच्चों की आवाज, पशुओं की सांस और सुबह की रोशनी घुली थी।

नंदिनी ने सोचा, एक झूठ ने उसे रास्ते पर धकेला था, पर सच ने उसे घर दिया। कभी-कभी जीवन दरवाजा बंद नहीं करता, बस गलत आदमी को आने से रोक देता है, ताकि सही आदमी बिना शोर किए बैलगाड़ी लेकर अंधेरे से बाहर आ सके।

उसने देवेंद्र का हाथ दबाया।

रसोई की पूर्व वाली खिड़की से धूप अब भी भीतर आ रही थी। पर अब वह किसी पत्र का वादा नहीं थी। वह नंदिनी की अपनी सुबह थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.