
झूठ का स्वाद कड़वा था, लेकिन उसने उसे अपनी ज़ुबान पर थामे रखा।
सावित्री की आँखें सिकुड़ गईं।
—तुम्हारा क्या मतलब है, कहीं जाने की जगह नहीं है?
—बस कुछ दिनों के लिए, अम्मा। मैं बरामदे में सो जाऊँगी। मुझे काम मिल जाएगा। मैं किसी को परेशान नहीं करूँगी।
नेहा हल्के से हँसी, लेकिन उसकी हँसी इतनी तीखी थी कि चीर दे।
—बरामदा? यह कोई धर्मशाला नहीं है।
अनन्या ने उन्हें पार करके घर के अंदर देखा।
संगमरमर का फ़र्श चमक रहा था। परदे महंगे थे। दीवार पर किसी शादी में खिंचवाई गई एक बड़ी-सी पारिवारिक तस्वीर टंगी थी। सावित्री बीच में रानी की तरह बैठी थीं। विक्रम उनके बगल में खड़ा था। नेहा के कानों में हीरे चमक रहे थे और वह मुस्कुरा रही थी।
अनन्या उस तस्वीर में नहीं थी।
न ही उसके बच्चे थे।
वह छोटी-सी अनुपस्थिति उसे उसकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा चुभी।
—विक्रम कहाँ है? उसने पूछा।
—ऑफ़िस में है, नेहा ने जल्दी से कहा। फिर गर्व से जोड़ा, —वह ज़मीन के एक बड़े सौदे को संभाल रहा है। जो भी रोता हुआ आ जाए, उसके लिए वह दरवाज़े तक नहीं दौड़ सकता।
जो भी।
अनन्या ने अपना चेहरा झुका लिया।
—अम्मा, मैंने इतने साल पैसे भेजे। मुझे बस एक कोना चाहिए, जब तक मैं फिर से अपने पैरों पर खड़ी न हो जाऊँ।
सावित्री के होंठ कस गए।
—पैसे? फिर से तुम पैसों का हिसाब गिनने लगी? जो भी तुमने भेजा, वह तुम्हारा फ़र्ज़ था। तुम अपने बच्चों को यहाँ छोड़कर विदेश भाग गई थीं। क्या हमने बदनामी नहीं झेली?
अनन्या की उँगलियाँ उसके बैकपैक की पट्टी पर कस गईं।
—अम्मा, मैं इसलिए गई थी क्योंकि घर में खाने तक को नहीं था। सुरेश के मरने के बाद लेनदार हर दिन आते थे। आपने ही कहा था कि विदेश जाना ही एकमात्र रास्ता है।
—अपने पाप मुझ पर मत डालो, सावित्री ने झिड़कते हुए कहा। —कोई माँ अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर उड़ नहीं जाती।
ये शब्द सीधे अनन्या के सीने में लगे।
उसकी बेटी रिया तब पाँच साल की थी। उसका बेटा कबीर तीन साल का था। उसे याद आया कि बस अड्डे पर उनके छोटे-छोटे हाथ उसके दुपट्टे का किनारा पकड़े हुए थे। उसे याद आया कि उसने वादा किया था कि वह बहुत जल्द लौट आएगी।
लेकिन पहले वीज़ा एजेंट ने उसे धोखा दिया।
फिर कर्ज़ बढ़ता गया।
फिर एक अनुबंध दूसरे में बदल गया।
फिर ज़िंदगी बचाने की जद्दोजहद एक पिंजरा बन गई।
हर बार जब उसने लौटने की कोशिश की, घर पर किसी न किसी को पैसों की ज़रूरत पड़ गई।
अम्मा की सर्जरी।
विक्रम का कारोबार।
रिया का स्कूल में दाख़िला।
कबीर की हॉस्टल फ़ीस।
घर का निर्माण।
कर्ज़ की अदायगी।
त्योहारों का खर्च।
एक के बाद एक आपात स्थिति ने अनन्या के पैरों में रस्सियाँ बाँध दीं।
अब उन्हीं रस्सियों से बना यह घर उसके सामने खड़ा था, और उसके लिए अपने दरवाज़े खोलने से इनकार कर रहा था।
—कम से कम मुझे रिया और कबीर से मिलने दीजिए, अनन्या ने धीरे से कहा।
नेहा का चेहरा कुरूप हो गया।
—अब उनकी याद आई?
सावित्री ने ठोड़ी ऊँची कर ली।
—उन्हें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। वे तुम्हारे बिना बड़े हुए हैं। लोगों ने उन्हें उस औरत के बच्चे कहा जिसने मातृत्व से ज़्यादा विदेशी पैसे को चुना, और उन्होंने बहुत सहा।
अनन्या का गला जलने लगा।
—उन्हें यह सब किसने बताया?
सावित्री की आँखें नहीं झपकीं।
—सच अपने आप सामने आ जाता है।
अनन्या अपनी माँ को देखती रह गई।
यही था।
वह ठंडापन जिसकी पुष्टि करने वह आई थी।
न गरीबी।
न कोई ग़लतफ़हमी।
न बेबसी।
बल्कि एक जानबूझकर गढ़ी गई कहानी।
एक ऐसी कहानी जिसे वर्षों तक ईंट-दर-ईंट उसी तरह बनाया गया था, जैसे यह घर।
नेहा एक कदम बाहर आई और अपनी आवाज़ धीमी कर ली, लेकिन इतनी भी नहीं कि बगल वाले घर में तुलसी को पानी दे रही पड़ोसन उसे न सुन सके।
—सुनिए, दीदी। हमारी भी एक इज़्ज़त है। लोग इस घर को जानते हैं। मेरी बेटी की शादी की बातें चल रही हैं। अगर आप इस हालत में यहाँ खड़ी रहीं, तो सब सवाल पूछेंगे।
—तो मैं कहाँ जाऊँ? अनन्या ने पूछा।
सावित्री ने सड़क की ओर इशारा किया।
—मंदिर के पास शाम को खाना मिलता है। वहीं बैठ जाना। बहुत-सी औरतें वहाँ बैठती हैं।
पड़ोसन का हाथ पानी के लोटे पर ही रुक गया।
एक स्कूटर फाटक के पास आकर धीमा हो गया।
गली अब सुनने लगी थी।
अनन्या ने अपनी माँ की उस उँगली की ओर देखा जो मंदिर की तरफ़ इशारा कर रही थी, फिर उसी हाथ की सोने की चूड़ियों की ओर देखा।
—अम्मा, मैं आपकी बेटी हूँ।
सावित्री सूखी हँसी हँसीं।
—चौबीस साल बाद खाली हाथ लौटने वाली बेटी सिर्फ़ एक बोझ होती है।
यह वाक्य किसी थप्पड़ की तरह लगा।
अनन्या ने अपनी आवाज़ ऊँची नहीं की।
—और अगर मैं पैसे लेकर आती?
सावित्री के जवाब देने से पहले नेहा बोल पड़ी।
—तो कम से कम थोड़ी अक़्ल तो साथ लाती।
सावित्री ने नौकरानी से कहा।
—इसका बैग ठीक से बाहर रख दो। बाद में यह न कहे कि हमने इसका कुछ चुरा लिया।
युवा नौकरानी झिझक गई।
अनन्या ने खुद ही अपना बैकपैक कंधे से उतार लिया।
—ज़रूरत नहीं। मैं अपना सामान खुद उठा सकती हूँ।
उसने एक बार फिर घर के अंदर देखा।
साइड टेबल पर चाँदी के फ़्रेम में सावित्री की एक तस्वीर रखी थी, जिसमें उन्हें स्थानीय महिला संघ से सम्मान प्राप्त करते हुए दिखाया गया था। उस पट्टिका पर लिखा था: मदर ऑफ़ स्ट्रेंथ।
अनन्या लगभग हँस पड़ी।
मदर ऑफ़ स्ट्रेंथ।
एक ऐसी औरत जिसने अपनी बेटी के बलिदान को इस तरह चमका दिया था कि वह उसकी अपनी इज़्ज़त जैसा दिखाई देने लगा।
—अम्मा, मैं आख़िरी बार पूछ रही हूँ। मुझे आज रात यहीं रहने दीजिए।
सावित्री एक कदम पीछे हटीं और दरवाज़े पर एक हाथ रख दिया।
—नहीं। मैं अपने घर में बदकिस्मती को अंदर आने नहीं दूँगी।
मेरा घर।
अनन्या ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
जब उसने उन्हें खोला, तब उनमें आँसू नहीं थे।
सिर्फ़ एक थकी हुई शांति थी।
—ठीक है।
सावित्री को राहत मिली।
नेहा ऐसे मुस्कुराई जैसे उसने दोपहर के खाने से पहले कोई छोटी-सी सामाजिक लड़ाई जीत ली हो।
तभी अंदर से एक आवाज़ आई।
—मम्मीजी, कौन है?
विक्रम पीछे से आता हुआ दिखाई दिया। वह अपनी महँगी घड़ी ठीक कर रहा था। वह पहले से ज़्यादा भारी, ज़्यादा मुलायम और ज़्यादा आत्मविश्वासी हो गया था। उसके बाल पतले हो चुके थे, लेकिन उसका घमंड पूरी तरह भर चुका था।
जैसे ही उसने अनन्या को देखा, उसका चेहरा आधे पल के लिए पीला पड़ गया।
फिर उसने खुद को संभाल लिया।
—दीदी। आने से पहले बता देना चाहिए था।
—क्या तब तुम दरवाज़ा खोलते?
विक्रम ने पड़ोसियों की ओर देखा।
—सड़क पर तमाशा मत करो।
अनन्या हल्का-सा मुस्कुराई।
—मैंने अभी कोई तमाशा शुरू नहीं किया है।
विक्रम एक कदम आगे बढ़ा।
—पैसों की जो भी बात है, बाद में कर लेंगे। अभी के लिए, कृपया यहाँ से चली जाइए। हमारे यहाँ मेहमान आने वाले हैं।
—मेहमान?
नेहा ने तुरंत नज़रें फेर लीं।
विक्रम का जबड़ा कस गया।
—एक बैंक मैनेजर और एक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट। महत्वपूर्ण लोग हैं। इसलिए इस हालत में यहाँ मत खड़ी रहो।
अनन्या की आँखें तेज़ हो गईं।
—प्रॉपर्टी कंसल्टेंट?
सावित्री झल्ला उठीं।
—तुम इतनी पूछताछ क्यों कर रही हो? इस घर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।
पूरी गली में सन्नाटा छा गया।
यहाँ तक कि मोहल्ले के किसी घर से आती प्रेशर कुकर की सीटी की आवाज़ भी मानो थम गई।
अनन्या ने अपना बैकपैक उठा लिया।
उसके निचले हिस्से पर धूल चिपकी हुई थी।
वह फाटक से एक कदम पीछे हट गई।
—आप पूरी तरह निश्चित हैं, अम्मा?
सावित्री का जवाब तुरंत आया।
—पूरी तरह।
अनन्या ने सिर हिलाया।
—तो फिर इस पल को अच्छी तरह याद रखिए।
विक्रम ने भौंहें सिकोड़ लीं।
—इसका क्या मतलब है?
अनन्या कुछ कह पाती, उससे पहले मुख्य सड़क की तरफ़ से इंजनों की आवाज़ उठी।
एक कार नहीं।
कई कारें।
सबसे आगे एक सफ़ेद सरकारी बोलेरो थी, जिसके डैशबोर्ड पर लाल रंग का एक छोटा-सा बोर्ड लगा था।
उसके पीछे एक काली इनोवा क्रिस्टा थी।
फिर एक और कार, जिसके दरवाज़े पर बैंक का लोगो बना था।
वे सभी धीरे-धीरे उस संकरी गली में मुड़ीं, जिससे स्कूटरों को किनारे हटना पड़ा। सड़क से धूल उड़ी और शांति विहार के फाटक के चारों ओर तैरने लगी।
तुलसी को पानी दे रही पड़ोसन पूरी तरह अपने दरवाज़े से बाहर आ गई।
नेहा की मुस्कान गायब हो गई।
सावित्री ने दरवाज़े की चौखट कसकर पकड़ ली।
विक्रम ने गाड़ियों से नज़र हटाकर अनन्या के चेहरे की ओर देखा।
बोलेरो सीधे बंगले के सामने आकर रुकी।
एक न्यायालय अधिकारी सीलबंद भूरे रंग का लिफ़ाफ़ा हाथ में लिए नीचे उतरा।
इनोवा से एक महिला अधिवक्ता सलीके से पहनी हुई सूती साड़ी में, हाथ में मोटी फ़ाइल लिए उतरी।
उसके पीछे बैंक मैनेजर उतरा, जिसके चेहरे पर गंभीरता थी।
फिर अधिवक्ता ने अनन्या की ओर मुड़कर इतनी ऊँची आवाज़ में कहा कि पूरी गली सुन सके—
—मैडम, क्या अब हम कब्ज़ा हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू करें?
विक्रम की महँगी घड़ी उसकी कलाई पर ढीली होकर खिसक गई।
सावित्री फुसफुसाईं—
—किस चीज़ का कब्ज़ा?
अनन्या ने अपनी माँ की ओर नहीं देखा।
उसने सिर्फ़ घर की ओर देखा और कहा—
—उस हर चीज़ का, जिसे वे अपना कहते थे।
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