
PART 1
जिस औरत ने कभी अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी काव्या से कहा था, “तुम जैसी अपशकुनी औरत माँ कहलाने लायक नहीं,” वही औरत लखनऊ के अमीनाबाद बाजार में घुटनों के बल बैठी लोगों से खिचड़ी खरीदने के लिए पैसे माँग रही थी।
काव्या ने उसका चेहरा बाद में पहचाना, काँपती आवाज पहले पहचान ली।
वह उसकी पूर्व सास शारदा देवी थी। मैले आँचल से आधा चेहरा ढका था, पैरों की चप्पल टूट चुकी थी और हाथ में सिक्कों से भरा प्लास्टिक का छोटा डिब्बा था।
3 वर्ष पहले काव्या का संसार उसी परिवार ने उजाड़ दिया था। गर्भावस्था के 7वें महीने में ससुराल की सीढ़ियों से गिरने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया था। होश आने पर पति रोहन ने बताया था कि उनका बेटा नहीं बचा। उसी शाम उसने तलाक के कागज काव्या के सामने रख दिए थे।
दवाओं के नशे और बच्चे की मृत्यु के सदमे में डूबी काव्या ने बिना पढ़े हस्ताक्षर कर दिए थे।
शारदा देवी ने तब उसकी कलाई से पारिवारिक कंगन उतारते हुए कहा था—
—तुमने हमारे वंश का चिराग बुझा दिया। अब इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं।
काव्या ने 3 वर्षों में स्वयं को किसी तरह सँभाला था। वह अब एक वकील के कार्यालय में दस्तावेज तैयार करती थी और एक छोटे किराए के मकान में अकेली रहती थी।
फिर भी शारदा देवी को भूखा देखकर वह उन्हें पास की भोजनशाला में ले गई।
गरम खिचड़ी सामने आते ही शारदा देवी इतनी तेजी से खाने लगीं कि काव्या की आँखें भर आईं।
—रोहन और उसकी बहन नंदिनी कहाँ हैं? उन्होंने आपको इस हालत में कैसे छोड़ दिया?
शारदा देवी की उँगलियाँ कटोरे पर जम गईं।
—अब मेरा कोई बेटा नहीं है।
इतना कहकर वह उठीं तो उनके कपड़े का थैला नीचे गिर गया। उसमें बच्चों की खाँसी की दवा, दूध का छोटा डिब्बा, बिस्कुट, एक जोड़ी नन्हे मोजे और नीले रंग की टूटी खिलौना कार थी।
काव्या का दिल अनजाने भय से धड़क उठा।
—ये सामान किस बच्चे के लिए है?
शारदा देवी ने थैला छीनकर सीने से लगा लिया।
—कुछ मत पूछो। जितना सह चुकी हो, उतना ही बहुत है।
काव्या ने उनके खाते में ₹25000 भेज दिए। संदेश देखते ही शारदा देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
—आज उसे भूखा नहीं सोना पड़ेगा… उसकी दवा भी आ जाएगी।
—किसकी?
शारदा देवी बिना उत्तर दिए बाजार से निकल गईं। काव्या कुछ दूरी बनाकर उनके पीछे चलती रही। संकरी गलियों से गुजरते हुए वे एक जर्जर मकान तक पहुँचीं।
दरवाजे के भीतर से किसी छोटे बच्चे की खाँसी सुनाई दी।
फिर शारदा देवी ने अत्यंत कोमल आवाज में पुकारा—
—जुगनू, दादी आ गई।
काव्या की साँस रुक गई।
“जुगनू” वही नाम था जिससे वह गर्भ में पल रहे अपने बेटे को पुकारती थी।
PART 2
अँधेरे कमरे से लगभग 3 वर्ष का दुबला बच्चा लड़खड़ाता हुआ बाहर आया। उसके माथे पर तेज बुखार था।
—दादी, बहुत भूख लगी है।
काव्या दरवाजे की ओट में जम गई। बच्चे की नाक रोहन जैसी थी, पर आँखें बिल्कुल उसकी थीं। बाईं कलाई पर वही भूरा जन्मचिह्न था जो काव्या और उसकी माँ की कलाई पर था।
शारदा देवी ने उसका पसीना पोंछा तो गले में लटकी चाँदी की तख्ती दिखाई दी। उस पर खुदा था—“जुगनू”।
वही तख्ती काव्या ने गर्भावस्था में खरीदी थी। अस्पताल वालों ने कहा था कि वह खो गई।
काव्या ने दरवाजा धकेल दिया।
—मुझसे कह दीजिए कि मैं गलत समझ रही हूँ। कहिए कि मेरा बच्चा सच में मर गया था।
शारदा देवी उसके पैरों में गिर पड़ीं।
—वह नहीं मरा था। समय से पहले पैदा हुआ था, लेकिन बच गया। रोहन किसी और औरत से विवाह करना चाहता था। उसने कहा कि तुम्हें सच पता चला तो तुम तलाक पर हस्ताक्षर नहीं करोगी। हमने तुम्हें बेहोशी की हालत में धोखा दिया।
काव्या काँपते हुए बच्चे के पास बैठी।
—मैं… तुम्हारी माँ हूँ।
बच्चे ने उसे कुछ क्षण देखा, फिर उसके गले से लिपट गया।
उसी समय बाहर गाड़ी रुकी।
रोहन की आवाज गूँजी—
—माँ, दरवाजा खोलो! मुझे पता है बच्चा यहीं है।
PART 3
दरवाजा इतनी जोर से खुला कि उसकी पुरानी कुंडी दीवार से टकराकर टूट गई। रोहन के साथ नंदिनी और 2 भारी शरीर वाले आदमी भीतर आए। उनके चेहरे पर वह कठोरता थी जो बातचीत करने नहीं, किसी को दबाने के लिए लाई जाती है।
काव्या ने जुगनू को अपनी छाती से कसकर लगा लिया।
रोहन ने उसे देखकर आश्चर्य नहीं दिखाया। उसके चेहरे पर केवल झुँझलाहट थी, जैसे कोई छिपी वस्तु गलत व्यक्ति के हाथ लग गई हो।
—बच्चे को नीचे उतारो, काव्या।
काव्या की आँखों में 3 वर्षों का शोक एक साथ जल उठा।
—तुमने मुझसे कहा था कि वह मर गया।
—जो हो गया, उसे बदल नहीं सकते। उसे मुझे दे दो।
—तुमने मेरा जीवित बच्चा मुझसे छीन लिया और अब कह रहे हो कि जो हो गया, उसे भूल जाऊँ?
नंदिनी ने अपने थैले से कुछ कागज निकालकर जमीन पर फेंक दिए।
—भावुक नाटक बंद करो। इन कागजों पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं। तुमने बच्चे की जिम्मेदारी छोड़ दी थी।
काव्या ने पहला पन्ना उठाया। वह अभिभावकीय अधिकार छोड़ने का कथित सहमति-पत्र था। नीचे उसका हस्ताक्षर था, पर तारीख वही थी जब वह अस्पताल में दर्द की दवाओं और नींद के इंजेक्शन के प्रभाव में थी।
उसे याद आया कि नंदिनी ने तब उसका हाथ पकड़कर कहा था—
—भाभी, अस्पताल से छुट्टी के कागज हैं। यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।
काव्या का शरीर क्रोध से काँपने लगा।
—तुम लोगों ने मेरे सदमे को दस्तावेज बना दिया। मेरी बेहोशी को सहमति और मेरी चुप्पी को कमजोरी समझ लिया।
रोहन ने अपने साथ आए आदमियों की ओर देखा।
—बच्चा ले लो।
एक आदमी आगे बढ़ा तो जुगनू भय से चीख उठा।
—माँ, मुझे मत छोड़ना!
काव्या के लिए वह केवल एक पुकार नहीं थी। वह उन 3 वर्षों की हर रात का उत्तर था जिनमें उसने अपने मरे हुए बच्चे से मन ही मन क्षमा माँगी थी। उसने पास रखी लकड़ी की कुर्सी उठाकर आगे कर दी।
—एक कदम और बढ़ाया तो मैं पुलिस बुलाऊँगी।
—तुम्हारे पास कोई प्रमाण नहीं है —रोहन ने कहा— और कानून के सामने यह बच्चा मेरा है।
शारदा देवी अचानक उन आदमियों के बीच खड़ी हो गईं।
—नहीं, कानून के सामने नहीं। केवल तुम्हारे झूठे कागजों में।
रोहन की आँखें लाल हो गईं।
—आप चुप रहिए, माँ। इसी बच्चे के कारण मैंने आपको घर से निकाला और फिर भी आपकी अक्ल नहीं आई।
—तुमने मुझे इसलिए निकाला क्योंकि मैंने इसे बेचने नहीं दिया!
कमरे में एक पल के लिए भयानक सन्नाटा छा गया।
काव्या ने शारदा देवी की ओर देखा।
—बेचने?
रोहन ने अपनी माँ को जोरदार थप्पड़ मार दिया। वह दीवार से टकराकर नीचे गिर गईं। उनके माथे से खून की पतली धार निकल आई।
जुगनू रोने लगा। रोते-रोते उसे तेज खाँसी आई। उसका छोटा शरीर अचानक अकड़ गया और होंठ नीले पड़ने लगे।
—जुगनू! —काव्या चीखी।
उसने बच्चे को जमीन पर लिटाया। उसकी साँस टूट रही थी। शारदा देवी घबराकर उसकी छाती सहलाने लगीं।
—इसे फिर दौरा पड़ गया… इसकी दवा…
काव्या ने रोहन की ओर देखा।
—गाड़ी निकालो! इसे अस्पताल ले जाना है!
रोहन वहीं खड़ा रहा।
—पहले कागजों पर बात होगी।
काव्या ने पहली बार समझा कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति केवल निर्दयी पति नहीं था। वह ऐसा आदमी था जिसके लिए उसके अपने बच्चे की साँस भी किसी सौदे से कम मूल्यवान थी।
वह जुगनू को गोद में उठाकर बाहर भागी। गली में दौड़ते हुए उसने सहायता के लिए आवाज लगाई। पड़ोसी दुकानदार सलीम चाचा ने अपनी मोटरसाइकिल रोकी, लेकिन बच्चे की हालत देखकर पास खड़ी गाड़ी वाले को रोक लिया।
—सीधे बाल चिकित्सालय ले चलो!
शारदा देवी भी गाड़ी में बैठ गईं। पीछे रोहन चिल्लाता रहा कि बच्चा उसका है, लेकिन काव्या ने मुड़कर नहीं देखा।
अस्पताल पहुँचते ही चिकित्सकों ने जुगनू को आपातकालीन कक्ष में ले लिया। काव्या दरवाजे के बाहर नंगे पैरों खड़ी रही। बाजार से खरीदी सब्जियाँ गली में ही छूट चुकी थीं, उसका दुपट्टा कहीं गिर गया था और हाथों पर बच्चे के पसीने की गंध थी।
कुछ समय बाद हृदय रोग विशेषज्ञ बाहर आए।
—बच्चे के हृदय में जन्म से गंभीर विकार है। लगता है लंबे समय से उपचार अधूरा रहा है। अभी स्थिति नियंत्रित है, लेकिन शीघ्र शल्यक्रिया करनी होगी।
—जो भी करना पड़े, कीजिए —काव्या ने कहा— मेरे पास जितनी बचत है, सब ले लीजिए।
चिकित्सक ने प्रश्न किया—
—आप बच्चे की माँ हैं?
काव्या के होंठ काँपे।
—हाँ… लेकिन इसे प्रमाणित करने के लिए मुझे लड़ना पड़ेगा।
शारदा देवी पास की कुर्सी पर बैठी थीं। उनके माथे पर पट्टी बँधी थी। वह काव्या के सामने हाथ जोड़कर रोने लगीं।
—मेरी वजह से तुम्हें यह दिन देखना पड़ा। मैं सच जानती थी, फिर भी चुप रही।
काव्या का स्वर कठोर हो गया।
—सब कुछ बताइए। एक शब्द भी छिपाया तो मैं आपको भी उनके साथ जेल भेजूँगी।
शारदा देवी ने सिर झुका लिया।
रोहन के पिता महेंद्र प्रताप का कपड़ों का बड़ा कारोबार था। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले वसीयत में लखनऊ का पुश्तैनी मकान और ₹6 करोड़ का निवेश परिवार के पहले पोते के नाम किया था। शर्त थी कि बच्चा 5 वर्ष की आयु पूरी करे। तब तक उसके कानूनी अभिभावक को संपत्ति की देखभाल का अधिकार मिलना था।
जुगनू के समय से पहले जन्म लेने के बाद चिकित्सकों ने बताया था कि उपचार से उसकी जान बच सकती है। उसी दौरान रोहन का संबंध रिया नाम की महिला से चल रहा था। रिया नहीं चाहती थी कि काव्या या बच्चा उनके नए जीवन का हिस्सा बने।
रोहन ने योजना बनाई कि काव्या को बच्चे की मृत्यु की झूठी खबर देकर तलाक ले लिया जाए। अस्पताल के एक लालची कर्मचारी की सहायता से दस्तावेज बदले गए। बच्चे को दूसरे नाम से निजी उपचार केंद्र में रखा गया और काव्या को अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिए गए।
शारदा देवी ने यह सब इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उनके मन में वंश, उपनाम और पोते को लेकर अहंकार था।
—मुझे लगता था कि बेटा हमारे घर का है, केवल तुम्हारा नहीं —उन्होंने कहा— मैंने सोचा था तुम्हें निकालकर भी मैं उसे राजकुमार की तरह पालूँगी। लेकिन रोहन ने कुछ ही महीनों में उसे नौकरानी के भरोसे छोड़ दिया। दवाओं के पैसे रोक देता था। उसके लिए जुगनू बच्चा नहीं, वसीयत की चाबी था।
—फिर आप उसे लेकर क्यों भागीं?
—मैंने रोहन और नंदिनी की बातचीत सुन ली थी। रोहन कर्ज में डूब चुका है। उसने सट्टेबाजी और गलत कारोबार में बहुत पैसा गँवाया। कुछ लोगों ने उसे कहा कि बच्चा 5 वर्ष का हो जाए, संपत्ति उसके नियंत्रण में आ जाए, फिर उसे ऐसे लोगों को सौंप दिया जाए जो बच्चों की पहचान बदलकर बाहर भेजते हैं। वह कह रहा था कि बाद में बीमारी से मृत्यु का प्रमाणपत्र बनवा देगा।
काव्या के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
—उसने अपने बेटे की कीमत लगा दी?
—हाँ। मैंने विरोध किया तो उसने मुझे पीटा। जुगनू को लेकर रात में भागी तो मेरे सारे खाते बंद करवा दिए। पिछले 7 महीनों से हम अलग-अलग जगह छिपते रहे। मेरी जमा पूँजी खत्म हो गई। इसकी दवाएँ खरीदने के लिए मैं मंदिर और बाजार के बाहर बैठने लगी।
काव्या के भीतर दया और घृणा दोनों टकरा रहे थे। शारदा देवी ने उसके साथ जो किया था, वह क्षमा से परे था। लेकिन यही स्त्री अब जुगनू को बचाने के लिए भूखी रह रही थी।
अचानक अस्पताल के गलियारे में एक गर्भवती महिला लड़खड़ाती हुई आई। उसके चेहरे पर चोट के निशान थे।
वह रिया थी, रोहन की दूसरी पत्नी।
काव्या उसे पहचानती थी। तलाक से पहले कई बार रोहन के दूरभाष पर उसी का नाम देखा था।
रिया ने आते ही कमरे का दरवाजा बंद किया और अपने कपड़ों के भीतर छिपाया छोटा स्मृति-यंत्र बाहर निकाला।
—इसमें रोहन की सारी बातचीत है। वह मेरा बच्चा भी बेच सकता है।
रिया 5 महीने की गर्भवती थी। जाँच में बेटी होने की संभावना सुनने के बाद रोहन ने उसे पीटा था। उसने कहा था कि बेटी किसी काम की नहीं और उसे ऐसा उत्तराधिकारी चाहिए जिसके नाम पर नई संपत्ति आ सके।
—मैंने तुम्हारा घर टूटते देखा और चुप रही —रिया ने काव्या से कहा— मैं मानती रही कि रोहन तुमसे दुखी था। बाद में पता चला कि उसने तुम्हारे बच्चे की मृत्यु का झूठ बोला था। तब तक मैं डर चुकी थी। कल रात मैंने उसे नंदिनी से कहते सुना कि जुगनू मिलते ही उसे दूसरे शहर भेज देंगे। मैंने उनकी बातचीत रिकॉर्ड कर ली।
स्मृति-यंत्र में कई ध्वनि अभिलेख थे। एक में रोहन किसी साहूकार से कह रहा था—
—बस 2 वर्ष और बच्चा जीवित रहना चाहिए। 5 का होते ही पैसा मेरे हाथ में होगा। उसके बाद वह रहे या न रहे, क्या फर्क पड़ता है?
दूसरी बातचीत में नंदिनी जाली दस्तावेज तैयार कराने की बात कर रही थी। एक वीडियो में रोहन अस्पताल के पूर्व कर्मचारी को पैसे देते दिख रहा था।
काव्या ने उसी वकील अर्पिता सिन्हा को बुलाया जिसके कार्यालय में वह काम करती थी। अर्पिता ने दस्तावेज देखकर तुरंत पुलिस की महिला अपराध शाखा और बाल संरक्षण इकाई से संपर्क किया।
—अभी हमारे पास गंभीर प्रमाण हैं —अर्पिता ने कहा— लेकिन बच्चे की सुरक्षा और पुराने अस्पताल के अभिलेख आवश्यक होंगे। रोहन को ऐसा महसूस होना चाहिए कि तुम समझौते के लिए तैयार हो। तभी वह अपने मुँह से अपराध स्वीकार करेगा।
काव्या पहले डर गई। जुगनू शल्यक्रिया से पहले अस्पताल में था। वह एक पल के लिए भी उससे दूर नहीं जाना चाहती थी।
लेकिन जुगनू ने उसका हाथ पकड़कर धीमे स्वर में पूछा—
—माँ, दादी कहती थीं तुम तारे के पास रहती हो। क्या अब तुम फिर चली जाओगी?
काव्या उसके बिस्तर के पास बैठ गई।
—नहीं। अब तुम्हारी माँ कहीं नहीं जाएगी।
—पापा आएँगे तो मुझे छिपा लेना। वह मुझे अच्छे नहीं लगते।
उस मासूम वाक्य ने काव्या का भय समाप्त कर दिया।
अगले दिन उसने रोहन को संदेश भेजा कि वह पुलिस में नहीं जाएगी। उसने लिखा कि यदि रोहन जुगनू की शल्यक्रिया के पैसे दे और उसे ₹50 लाख देकर शहर छोड़ने दे, तो वह बच्चा वापस करने और चुप रहने के लिए तैयार है।
रोहन ने तुरंत उत्तर दिया।
मुलाकात शारदा देवी के पुराने मकान में तय हुई। कमरे में छिपे उपकरण लगा दिए गए। बाहर सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी, अर्पिता और बाल संरक्षण अधिकारी प्रतीक्षा करने लगे।
काव्या अकेली मेज के सामने बैठी थी। उसके भीतर तूफान था, पर चेहरा शांत था।
रोहन और नंदिनी आए। रोहन ने पैसों से भरा थैला मेज पर रखा।
—समझदारी दिखाने में तुम्हें 3 वर्ष लग गए।
—मुझे लिखित आश्वासन चाहिए कि पैसे मिलने के बाद तुम जुगनू को नुकसान नहीं पहुँचाओगे।
रोहन हँस पड़ा।
—तुम अभी भी उसे अपना बेटा समझ रही हो? तुमने तो अस्पताल में ही अधिकार छोड़ दिए थे।
—मैं बेहोश थी।
—तो क्या हुआ? हस्ताक्षर तुम्हारे हैं। चिकित्सक, कर्मचारी और कागज सब हमारे थे। तुम अदालत में क्या सिद्ध करती?
काव्या ने अपनी मुट्ठी कस ली।
—तुम जानते थे कि वह जीवित है, फिर भी मुझे उसकी मृत्यु की खबर दी।
—जानता था। तुम्हें सच बताते तो तुम तलाक नहीं देतीं और रोज अस्पताल में बैठी रहतीं। मुझे रिया से विवाह करना था।
—तुमने उसे केवल संपत्ति के लिए रखा?
—मेरा पिता पैसा उसके नाम कर गया था। अपने ही परिवार का पैसा वापस लेना अपराध नहीं है।
—और 5 वर्ष का होने के बाद?
रोहन की आँखें सिकुड़ गईं।
—तुम्हें जितना जानना चाहिए, उससे अधिक जान चुकी हो। कागजों पर हस्ताक्षर करो। बच्चा कुछ लोगों के पास चला जाएगा। वहाँ जीवित रहे या मर जाए, तुम्हारी समस्या नहीं होगी।
नंदिनी ने चेतावनी दी—
—जल्दी करो। अस्पताल से उसे निकालना भी है।
काव्या ने पूछा—
—यदि मैं मना कर दूँ?
रोहन मेज पर झुक गया।
—तब तुम भी सुरक्षित नहीं रहोगी और वह बीमार बच्चा भी नहीं। पिछली बार तुम्हें सीढ़ियों से गिरना दुर्घटना लगा था। अगली बार कोई भ्रम नहीं रहेगा।
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
3 वर्ष से वह मानती आई थी कि सीढ़ियों पर उसका पैर फिसला था। अब उसे याद आया कि गिरने से ठीक पहले पीछे किसी का हाथ उसकी पीठ से टकराया था।
—तुमने मुझे धक्का दिया था?
रोहन मुस्कराया।
—तुम बहुत प्रश्न पूछती हो।
उसी क्षण बाहर का दरवाजा खुल गया। महिला पुलिस अधिकारी अपनी टीम के साथ भीतर आईं।
—रोहन प्रताप, अब बाकी प्रश्न थाने में पूछे जाएँगे।
रोहन भागने के लिए मुड़ा, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ लिया। नंदिनी का दूरभाष जब्त हुआ। उसमें जाली प्रमाणपत्र, अस्पताल कर्मचारी को भुगतान और बच्चे को दूसरे राज्य भेजने की बातचीत मौजूद थी।
रोहन चीखता रहा कि रिकॉर्डिंग झूठी है। तभी रिया और शारदा देवी सामने आ गईं।
अपनी माँ को देखकर वह चिल्लाया—
—आपने अपने बेटे को फँसाया!
शारदा देवी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
—नहीं। मैंने उस राक्षस को रोका है जिसे अपने अहंकार से मैंने स्वयं बनाया था।
जाँच में पुराने अस्पताल के अभिलेख प्राप्त हुए। एक परिचारक ने धन लेकर बच्चे की पहचान बदलने की बात स्वीकार की। काव्या की कथित सहमति पर किए गए चिकित्सकीय परीक्षण से सिद्ध हुआ कि हस्ताक्षर के समय उसके शरीर में तेज बेहोशी की दवाएँ थीं। डीएनए जाँच ने प्रमाणित कर दिया कि जुगनू काव्या का पुत्र था।
अदालत ने काव्या को तत्काल संरक्षण और अभिभावकीय अधिकार दिए। रोहन, नंदिनी, अस्पताल कर्मचारी तथा उनके सहयोगियों पर बच्चे के अपहरण, दस्तावेज की जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र, घरेलू हिंसा, संपत्ति हड़पने और बाल तस्करी के प्रयास के आरोप लगे।
रिया को भी सुरक्षा दी गई। उसने रोहन के विरुद्ध बयान दिया और अपने गर्भ में पल रही बेटी को अकेले पालने का निर्णय लिया।
जुगनू की शल्यक्रिया का दिन आया तो काव्या पूरी रात अस्पताल के मंदिर के बाहर बैठी रही। उसने भगवान से कोई चमत्कार नहीं माँगा। वह केवल बार-बार कहती रही—
—उसे 3 वर्ष मेरे बिना जीना पड़ा। अब उसे मुझसे मत छीनना।
शारदा देवी कुछ दूरी पर जमीन पर बैठी थीं। उन्होंने काव्या के पास आने का साहस नहीं किया।
6 घंटे बाद चिकित्सक बाहर निकले।
—शल्यक्रिया सफल रही।
काव्या वहीं फर्श पर बैठकर रो पड़ी। यह वैसा रोना नहीं था जैसा बच्चे की झूठी मृत्यु पर रोई थी। उस समय उसकी बाँहें खाली थीं। आज उसके आँसुओं के पीछे लौटती हुई साँस थी।
अगले कई महीनों तक जुगनू को दवाओं, सावधानी और नियमित जाँच की आवश्यकता रही। काव्या ने काम के साथ उसकी देखभाल की। रात में वह अचानक जागकर बच्चे की छाती पर हाथ रखती और उसकी धड़कन महसूस करती।
शारदा देवी प्रतिदिन अस्पताल आतीं। कभी दवा लातीं, कभी घर का हल्का भोजन। उन्होंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए और अदालत में अपने अपराध की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार की।
काव्या ने उन्हें तुरंत क्षमा नहीं किया।
एक दिन शारदा देवी ने कहा—
—तुम मुझे दादी कहने का अधिकार मत देना। बस उसके आसपास रहने देना ताकि जितना बिगाड़ा है, उसका थोड़ा भार उठा सकूँ।
काव्या ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
—पश्चाताप बीते हुए अपराध को मिटाता नहीं है। लेकिन सच स्वीकार करने वाला व्यक्ति कम से कम नया अपराध रोक सकता है। जुगनू बड़ा होकर स्वयं तय करेगा कि आपको क्या स्थान देना है।
शारदा देवी ने सिर झुका लिया।
लगभग 1 वर्ष बाद अदालत ने रोहन और नंदिनी को दोषी ठहराया। पुश्तैनी संपत्ति जुगनू के नाम सुरक्षित कर दी गई, लेकिन उसके उपयोग का अधिकार स्वतंत्र न्यास को सौंपा गया ताकि कोई रिश्तेदार उसका दुरुपयोग न कर सके।
काव्या ने वह बड़ा पुश्तैनी मकान अपने लिए नहीं लिया। उसने उसका एक हिस्सा जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित गरीब बच्चों के अस्थायी निवास के लिए दान कर दिया।
वसंत की एक शाम काव्या जुगनू के साथ गोमती नदी के किनारे चल रही थी। बच्चा अब स्वस्थ था। वह नीली खिलौना कार हाथ में लिए दौड़ता, फिर लौटकर काव्या की उँगली पकड़ लेता।
अचानक उसने पूछा—
—माँ, क्या लोग फिर कहेंगे कि मैं उनका हूँ?
काव्या उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
—तुम किसी की संपत्ति नहीं हो, जुगनू। तुम अपने हो। मैं तुम्हारी माँ हूँ और मेरा काम तुम्हें बाँधना नहीं, तुम्हारी रक्षा करना है।
—और अगर कोई मुझे फिर ले जाने आए?
काव्या ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी हथेली के नीचे बच्चे का हृदय मजबूती से धड़क रहा था।
—तो उसे पहले तुम्हारी माँ से गुजरना पड़ेगा।
जुगनू मुस्कराया और उसके गले में बाँहें डाल दीं।
काव्या ने कभी सोचा था कि सबसे बड़ा दुख अपने बच्चे को दफनाना होता है। बाद में उसे पता चला कि उससे भी बड़ा दुख यह जानना था कि उसका बच्चा जीवित रहा, बीमार रहा, भूखा रहा और रिश्तों के नाम पर सौदे की वस्तु बना दिया गया।
लेकिन उस भयावह सत्य ने उसे एक और बात भी सिखाई।
परिवार केवल खून, उपनाम और वसीयत से नहीं बनता। परिवार वह होता है जो किसी कमजोर हाथ को लाभ के लिए पकड़ता नहीं, बल्कि गिरने से बचाने के लिए थामता है। और जिस माँ ने अपने बच्चे को मृत्यु की झूठी खबर के पार से वापस पाया हो, उसे संसार की कोई धमकी दोबारा खामोश नहीं कर सकती।
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