
PART 1
—तुम्हारे पास 1 घंटा है। इस घर से निकल जाओ… और अगर मेरी माँ से इतना ही प्यार है, तो उसे भी अपने साथ ले जाओ।
सुनैना के हाथ से गुनगुने पानी की बाल्टी छूटते-छूटते बची। जयपुर के वैशाली नगर वाले आलीशान मकान के गलियारे में खड़ी वह कुछ पल अपने पति राघव को देखती रही। उसकी सूती साड़ी का पल्लू भीगा हुआ था और हाथों में दवाइयों की गंध बसी थी।
कमरे के भीतर 68 वर्षीय शारदा देवी लेटी थीं। 1 वर्ष पहले पड़े मस्तिष्काघात ने उनकी आवाज छीन ली थी और शरीर का दायाँ हिस्सा निष्क्रिय कर दिया था। मगर उनकी आँखें अब भी सब समझती थीं।
सुनैना पहले एक निजी अस्पताल में परिचारिका थी। विवाह के 9 वर्षों बाद जब शारदा देवी बीमार हुईं, उसने नौकरी छोड़ दी। वही उन्हें नहलाती, इंसुलिन देती, चम्मच से दलिया खिलाती और रात में हर 2 घंटे बाद करवट बदलती थी।
राघव अपनी माँ के कमरे में शायद ही जाता था।
—वहाँ दवाइयों और बीमारी की गंध आती है। मेरा दम घुटता है—वह कहता था।
उस रात वह अकेला नहीं लौटा था। उसके साथ आधुनिक कपड़ों और महँगे इत्र में डूबी कृतिका थी। उसने कमरे की ओर देखकर नाक सिकोड़ ली।
—राघव, तुमने कहा था आज से यह घर हमारा होगा। मैं किसी बीमार बूढ़ी औरत के साथ नहीं रह सकती।
सुनैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
—यह कौन है?
राघव ने बिना शर्म के कृतिका की कमर में हाथ डाल दिया।
—जिसके साथ मैं अब जीना चाहता हूँ। तुम पत्नी कम, मेरी माँ की नौकरानी ज्यादा लगती हो। इस घर में न खुशी बची है, न जीवन।
—और जिन 9 वर्षों में मैंने तुम्हारा घर सँभाला, उनका क्या?
—तुम अच्छी औरत हो, लेकिन मैं तुम्हारे साथ बूढ़ा नहीं होना चाहता।
कृतिका हँसी।
—और जल्दी करो। मुझे यह अस्पताल जैसा कमरा बिल्कुल पसंद नहीं।
सुनैना की आँखों में आँसू नहीं, आग उतर आई।
—तुम अपनी माँ के बारे में ऐसे बोल रहे हो?
राघव ने कंधे उचका दिए।
—उन्हें कुछ समझ नहीं आता। वह बस साँस ले रही हैं। कहाँ रहेंगी, इससे क्या फर्क पड़ता है?
कमरे के भीतर शारदा देवी की कनपटी से एक आँसू तकिए में समा गया।
—मकान माँ के नाम है, लेकिन सारे कागज और कारोबार मैं संभालता हूँ—राघव बोला—तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं। नीचे एक गाड़ी खड़ी है। चली जाओ।
—तुम्हारी माँ की दवा कौन देगा? रात में उनकी शर्करा गिर गई तो कौन देखेगा?
—किसी को रख लेंगे।
—आज रात?
राघव झुँझला उठा।
—इतनी चिंता है तो उन्हें साथ ले जाओ। वैसे भी तुम उनसे ज्यादा जुड़ी हुई हो।
सुनैना कमरे में गई। उसने झुककर शारदा देवी का आँसू पोंछा।
—माँजी, हमें घर से निकाला जा रहा है।
तभी शारदा देवी के बाएँ हाथ ने उसकी कलाई कसकर पकड़ ली। वह कोई अनियंत्रित हरकत नहीं थी। उनकी आँखों में स्पष्ट विनती थी—
“मुझे उसके पास मत छोड़ना।”
सुनैना ने उनका माथा चूम लिया।
—आप सड़क पर रहेंगी तो मैं भी सड़क पर रहूँगी, लेकिन आपको अकेला नहीं छोड़ूँगी।
2 घंटे बाद किराए की रोगी-वाहिका शारदा देवी को लेकर घर से निकली। ऊपर से संगीत, गिलासों की खनक और कृतिका की हँसी सुनाई दे रही थी।
राघव भूल चुका था कि “राजस्थान मोटर्स एंड स्पेयर”, मकान, गोदाम, गाड़ियाँ और बैंक खाते अब भी शारदा देवी के नाम थे। वह केवल एक अधिकार-पत्र के सहारे सब चला रहा था।
और उस अधिकार-पत्र की अवधि अगली सुबह समाप्त होने वाली थी।
PART 2
सुनैना अपनी सहेली नीलम की मदद से सांगानेर की एक तंग कोठरी में पहुँची। दीवारों पर सीलन थी और शारदा देवी के लिए उधार का बिस्तर लगाया गया था।
सुबह शारदा देवी ने दवा लेने के बजाय दस्तावेजों वाली थैली की ओर इशारा किया। काँपते हाथों से उन्होंने एक कागज निकाला। वही अधिकार-पत्र था।
सुनैना ने तारीख पढ़ी।
—आज इसकी अंतिम तिथि है।
शारदा देवी ने कलम माँगी और टेढ़े अक्षरों में लिखा—
“आज ही रद्द करो।”
फिर दूसरी पंक्ति लिखी—
“राघव चोरी कर रहा है।”
सुनैना स्तब्ध रह गई।
दोपहर तक अधिवक्ता मीरा सक्सेना और एक अधिकृत दस्तावेज अधिकारी वहाँ पहुँचे। शारदा देवी ने लिखित उत्तर देकर अपनी मानसिक स्थिति और इच्छा स्पष्ट की।
उन्होंने राघव का अधिकार समाप्त कर सुनैना को सीमित प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया।
जैसे ही पंजीकरण पूरा हुआ, दरवाजे पर भयानक प्रहार होने लगे।
—दरवाजा खोलो! माँ, कुछ मत लिखना!
राघव ने दरवाजा तोड़ दिया। वह बिस्तर की ओर झपटा, मगर शारदा देवी ने कागज पर केवल 1 शब्द लिखा—
“चोर।”
उसी क्षण मीरा ने कहा—
—अब आपका हर खाता बंद हो चुका है।
राघव की आँखों में भय नहीं था।
वह हत्या जैसी ठंडी नफरत थी।
PART 3
राघव कुछ क्षण तक अपनी माँ को घूरता रहा। उसके चेहरे पर वह दुख नहीं था जो किसी बेटे को माँ का विश्वास खोने पर होना चाहिए था। उसके भीतर केवल हिसाब चल रहा था—कारखाने का पैसा, गोदामों का माल, व्यापारियों को दिए गए खाली हस्ताक्षर वाले धनादेश और वे रकम जिन्हें उसने वर्षों से अपनी निजी संपत्ति समझ रखा था।
वह सुनैना की ओर बढ़ा।
—तुमने माँ को बहकाया है। तुम्हें लगता है अब तुम इस परिवार की मालकिन बन जाओगी?
सुनैना शारदा देवी के सामने खड़ी हो गई।
—मैंने उनसे कुछ नहीं माँगा। तुमने उन्हें घर से निकाला था।
—वह मेरी माँ हैं!
शारदा देवी की आँखों में क्रोध चमका। उन्होंने कलम उठाकर लिखा—
“माँ तभी तक याद थी, जब तक मेरी मुहर चाहिए थी।”
राघव ने कागज छीनने की कोशिश की, लेकिन बाहर जमा पड़ोसी भीतर आ गए। मीरा सक्सेना ने पुलिस को सूचना दे दी थी। पुलिस आने से पहले राघव धमकी देता हुआ चला गया।
—तुम दोनों को सड़क पर लाकर छोड़ूँगा। और सुनैना, तुम्हें जेल भेजे बिना चैन नहीं लूँगा।
उस शाम बैंक से पता चला कि पिछले 3 वर्षों में कंपनी के खातों से भारी रकम निकाली गई थी। कई भुगतान ऐसे लोगों के नाम हुए थे जिनका मोटर-पुर्जों के व्यवसाय से कोई संबंध नहीं था। कृतिका के नाम पर खरीदी गई गाड़ी, उदयपुर के विश्रामगृहों के बिल, आभूषण और सट्टेबाजी से जुड़े लेन-देन भी सामने आने लगे।
राघव को जब खातों तक पहुँच न मिली तो वह वैशाली नगर वाले मकान लौटा। कृतिका बैठक में अपना सामान बाँध रही थी।
—यह क्या कर रही हो?—राघव चिल्लाया।
—जा रही हूँ।
—मैं सब ठीक कर दूँगा। माँ से दोबारा हस्ताक्षर करवा लूँगा।
कृतिका ने तिरस्कार से देखा।
—तुमने कहा था कंपनी तुम्हारी है। अब बैंक वाले कह रहे हैं तुम किसी खाते से 1 रुपया भी नहीं निकाल सकते। मैं तुम्हारी पारिवारिक लड़ाई में क्यों फँसू?
—मैंने तुम्हारे लिए सब छोड़ा!
—तुमने किसी के लिए कुछ नहीं छोड़ा। तुमने बस उस पत्नी को निकाला जो तुम्हारी माँ की सेवा करती थी और मुझे बताया कि तुम बहुत अमीर हो।
वह अपने आभूषणों का डिब्बा और कपड़ों के थैले लेकर चली गई।
राघव खाली बैठक में बैठा शराब पीता रहा। रात गहराने के साथ उसकी घबराहट अपराधी संकल्प में बदल गई। उसे अपनी माँ के कमरे के पीछे बनी गुप्त तिजोरी याद आई। उसमें पुश्तैनी हार, सोने की चूड़ियाँ, पुराने भूमि-पत्र और उसके पिता की कुछ मुहरबंद बहियाँ रखी थीं।
वह लड़खड़ाता हुआ कमरे में गया, अलमारी हटाई और तिजोरी खोली। उसने आभूषणों का लाल मखमली डिब्बा अपने थैले में रखा। फिर दराजें उलट दीं, दस्तावेज फाड़े और कुर्सी की गद्दी चाकू से काट दी।
सुबह उसने पुलिस को बुलाया।
—मेरी माँ के कमरे में चोरी हुई है। करोड़ों के आभूषण गायब हैं। मेरी पत्नी सुनैना माँ को लेकर भागी है। उसी ने सब किया है।
उसने पड़ोसियों के सामने रोने का अभिनय किया।
—वह परिचारिका है। उसे दवाइयों की जानकारी है। उसने मेरी बीमार माँ को अपने नियंत्रण में कर लिया और अब संपत्ति हड़पना चाहती है।
कुछ ही देर बाद उसने सुनैना को फोन किया।
—तुम्हारे खिलाफ चोरी की शिकायत हो चुकी है।
सुनैना के हाथ काँपने लगे।
—मैंने कुछ नहीं लिया।
—पुलिस को यही बताना। एक बेरोजगार औरत, सस्ती कोठरी में रहने वाली, जिसके पास अचानक करोड़ों का अधिकार आ गया। लोग किस पर विश्वास करेंगे?
—तुम कितना नीचे गिरोगे?
—जितना तुम्हें घुटनों पर लाने के लिए जरूरी है। अधिकार छोड़ दो, माँ को वापस भेज दो, वरना तुम जेल जाओगी।
फोन कटते ही सुनैना रो पड़ी। उसने जीवन भर किसी की चीज बिना पूछे छुई तक नहीं थी। अब उस पर उस परिवार के आभूषण चुराने का आरोप था जिसकी सेवा में उसने अपना जीवन लगा दिया था।
शारदा देवी उस समय मीरा की व्यवस्था से एक छोटे अतिथिगृह के सुरक्षित कमरे में थीं। उन्होंने सुनैना को रोते देखा तो पलंग पर हाथ मारा और लिखने की पट्टी माँगी।
“डरो मत। घर चलो।”
—वहाँ पुलिस है।
“अधिवक्ता साथ होगी।”
फिर उन्होंने लिखा—
“सब देखा गया है।”
सुनैना समझ नहीं पाई।
लगभग 1 घंटे बाद वे वैशाली नगर पहुँचीं। शारदा देवी को पहियों वाली कुर्सी पर लाया गया। उनके साथ मीरा, एक चिकित्सक और कंपनी का पुराना लेखाकार घनश्यामलाल था।
बैठक में 2 पुलिस अधिकारी राघव का बयान लिख रहे थे।
सुनैना को देखते ही वह उछल पड़ा।
—यही है! इसने मेरी माँ का अपहरण किया और गहने चुराए हैं!
पुलिस निरीक्षक कविता चौहान ने कठोर स्वर में कहा—
—शांत रहिए। आरोप लगाने से अपराध सिद्ध नहीं होता।
राघव ने सुनैना की ओर उँगली उठाई।
—इसके पास घर की चाबियाँ थीं। माँ के कमरे में अकेली जाती थी। इससे साफ क्या चाहिए?
मीरा आगे बढ़ीं।
—हमें प्रमाण प्रस्तुत करना है।
शारदा देवी ने अपने बाएँ हाथ से बैठक के बड़े दूरदर्शन की ओर इशारा किया। घनश्यामलाल ने उनका चलदूरभाष एक तार से पर्दे से जोड़ दिया।
राघव का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।
पर्दे पर शारदा देवी का कमरा दिखाई दिया। दृश्य ऊपर रखी धार्मिक पुस्तकों के बीच छिपे एक छोटे कैमरे से रिकॉर्ड हुआ था।
राघव रात में कमरे में प्रवेश करता दिखा। उसने अलमारी हटाई, तिजोरी खोली और मखमली डिब्बा निकाला। फिर वह हार को रोशनी में देखकर मुस्कराया और अपने थैले में रख लिया।
अगले दृश्य में वह कमरे की वस्तुएँ तोड़ रहा था।
आवाज बिल्कुल स्पष्ट थी—
—अब देखता हूँ सुनैना कैसे बचती है। माँ बोल नहीं सकती और वह गरीब है। पुलिस उसी को पकड़ेगी।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी।
निरीक्षक कविता ने राघव को देखा।
—यह आप हैं?
—यह नकली है! वीडियो बदल दिया गया है!
—आपका थैला कहाँ है?
राघव पीछे हटने लगा।
एक आरक्षक ने बैठक के कोने में रखा चमड़े का थैला खोला। उसके भीतर वही मखमली डिब्बा था। पुश्तैनी हार, चूड़ियाँ और भूमि-पत्र सुरक्षित रखे थे।
—मैं उन्हें बचाकर रख रहा था—राघव हकलाया—घर में चोरी हुई थी, इसलिए मैंने…
—चोरी की सूचना देने से पहले ही आभूषण आपके थैले में कैसे पहुँचे?—निरीक्षक ने पूछा।
राघव के पास कोई उत्तर नहीं था।
उसे झूठी शिकायत, अपराध की झूठी परिस्थिति बनाने, आभूषण छिपाने और सुनैना को धमकाने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया।
जाते-जाते वह अपनी माँ के सामने घुटनों पर बैठ गया।
—माँ, इन्हें समझाओ। मैं तुम्हारा इकलौता बेटा हूँ।
शारदा देवी ने लिखने की पट्टी उठाई। उनका हाथ काँप रहा था, पर अक्षर स्पष्ट थे—
“मेरा बेटा उस रात मर गया, जब उसने मुझे सामान समझकर घर से निकाल दिया।”
राघव ने उनका पैर पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने अपना पैर पीछे खींच लिया।
कंपनी की जाँच शुरू हुई तो अपराध केवल आभूषणों तक सीमित नहीं रहा। राघव ने नकली आपूर्तिकर्ताओं के नाम पर भुगतान किए थे। कई पुराने कर्मचारियों के भविष्य-निधि का पैसा जमा नहीं कराया गया था। अपने पिता की मृत्यु के बाद उसने शारदा देवी से खाली कागजों पर हस्ताक्षर करवाए और धीरे-धीरे उन्हें कारोबार से दूर कर दिया था।
मस्तिष्काघात के बाद वह उनकी दवाइयों पर होने वाले खर्च से भी चिढ़ने लगा। सुनैना को लगता था कि राघव अपनी माँ की हालत देखकर दुखी है, लेकिन सच्चाई यह थी कि वह उनके जीवित रहने से परेशान था। जब तक शारदा देवी जीवित थीं, संपत्ति पूरी तरह उसके नाम नहीं हो सकती थी।
कृतिका भी पूछताछ के लिए बुलाई गई। उसने स्वीकार किया कि राघव कई महीनों से मकान बेचने की योजना बना रहा था। उसने यह भी बताया कि राघव कहता था—
—माँ को किसी आश्रम में डाल दूँगा। कुछ महीनों में सब अपने आप समाप्त हो जाएगा।
यह सुनकर सुनैना पहली बार समझी कि उसे घर से निकालना केवल विवाहेतर संबंध का परिणाम नहीं था। राघव चाहता था कि शारदा देवी ऐसी जगह पहुँच जाएँ जहाँ उनकी देखभाल बिगड़ जाए और वह बिना बाधा संपत्ति का मालिक बन सके।
मीरा ने शारदा देवी की ओर से संरक्षण याचिका दायर की। अदालत ने आदेश दिया कि राघव उनसे संपर्क नहीं कर सकता। कंपनी के खातों पर स्वतंत्र लेखा-परीक्षक नियुक्त हुआ और सुनैना को केवल चिकित्सा, वेतन तथा आवश्यक व्यापारिक भुगतान करने का अधिकार मिला।
सुनैना ने स्वयं को मालकिन नहीं माना। वह हर निर्णय से पहले शारदा देवी के सामने विकल्प लिखती। शारदा देवी अपनी उँगली से सही विकल्प चुनतीं या काँपते हाथ से निर्देश लिखतीं।
पहला आदेश था—
“किसी कर्मचारी का वेतन मत रोकना।”
दूसरा आदेश था—
“पुराने लेखाकार घनश्यामलाल को वापस बुलाओ।”
तीसरा आदेश था—
“मेरी चिकित्सा से पहले सुनैना की नौकरी का सम्मान लौटाओ।”
सुनैना की आँखें भर आईं।
—माँजी, आपने मुझे पहले ही बहुत दिया है।
शारदा देवी ने लिखा—
“तुमने मुझे जीवन दिया।”
अगले 6 महीने कठिन थे। शारदा देवी की नियमित भौतिक चिकित्सा हुई। हर कदम दर्द से भरा था। कई बार उनका शरीर जवाब दे देता, मगर सुनैना उनका हाथ पकड़कर कहती—
—आज 2 कदम हुए हैं, कल 3 होंगे।
धीरे-धीरे उनके होंठों से अस्पष्ट ध्वनियाँ निकलने लगीं। पहला स्पष्ट शब्द था—
—सु… नै… ना…
सुनैना वहीं फर्श पर बैठकर रो पड़ी। जिस स्त्री की सेवा उसने कर्तव्य समझकर की थी, उसने उसका नाम अपनी लौटती हुई आवाज का पहला शब्द बनाया था।
मामला 8 महीने बाद अदालत पहुँचा। उस दिन न्यायालय के बाहर समाचारवाहक खड़े थे। लोगों ने इस घटना को “वह बेटा जिसने माँ को जीवित रहते विरासत समझ लिया” नाम दे दिया था।
राघव कमजोर और थका हुआ दिखाई दे रहा था। उसके महँगे कपड़े गायब थे। कंपनी ने उसके निजी खर्च बंद कर दिए थे और कृतिका ने उससे हर संबंध तोड़ लिया था।
न्यायाधीश ने पूछा—
—शारदा देवी, क्या आप शिकायत जारी रखना चाहती हैं?
अदालत के द्वार खुले।
सभी की निगाहें उधर उठ गईं।
शारदा देवी पहियों वाली कुर्सी पर नहीं थीं। वह एक छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चल रही थीं। उनके दूसरे हाथ में सुनैना का हाथ था।
राघव अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।
—माँ!
शारदा देवी बिना उसकी ओर देखे गवाही वाले स्थान तक पहुँचीं।
न्यायाधीश ने नरम स्वर में कहा—
—आप बैठ सकती हैं।
उन्होंने सिर हिलाया और खड़ी रहीं।
उनकी आवाज धीमी, टूटी हुई और भारी थी, मगर हर शब्द स्पष्ट था।
—जिस दिन मेरा शरीर आधा निष्क्रिय हुआ, मेरे बेटे ने समझ लिया कि मेरा दिमाग भी मर गया है। वह मेरे सामने मेरी संपत्ति लूटता रहा। मेरी बहू ने मुझे धोया, खिलाया, रात भर जगकर मेरी साँस देखी। और मेरे बेटे ने उसे नौकरानी कहा।
राघव रोने लगा।
—माँ, मुझसे गलती हो गई। कृतिका ने मुझे भड़काया था। व्यापार में नुकसान था। मैं डर गया था।
शारदा देवी ने पहली बार उसकी ओर देखा।
—कृतिका ने तुम्हें अपनी माँ को बोझ कहने के लिए मजबूर नहीं किया। उसने तुम्हें झूठी चोरी रचने के लिए मजबूर नहीं किया। लालच तुम्हारा था। क्रूरता तुम्हारी थी। चुनाव तुम्हारा था।
—मैं बदल जाऊँगा।
—बदलना चाहते हो तो सजा से मत भागो।
उन्होंने कुछ पल रुककर कहा—
—मैं बदला नहीं चाहती। मैं न्याय चाहती हूँ। ताकि कोई बेटा यह न समझे कि बीमार माँ की आवाज चली जाए तो उसका अधिकार भी चला जाता है।
अदालत ने झूठी शिकायत, आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, संपत्ति के दुरुपयोग और आर्थिक अपराधों के आधार पर राघव को कारावास की सजा सुनाई। उसके विरुद्ध कंपनी से निकाली गई रकम की वसूली का आदेश भी हुआ।
राघव को ले जाते समय उसने सुनैना से कहा—
—तुमने मेरा घर छीन लिया।
सुनैना ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
—घर उस दिन टूट गया था, जब तुमने अपनी माँ को उसमें रहने योग्य नहीं समझा।
1 वर्ष बाद शारदा देवी ने कंपनी के संचालन की नई व्यवस्था बनाई। सुनैना को स्थायी प्रबंध न्यासी बनाया गया, मगर प्रत्येक बड़े निर्णय के लिए स्वतंत्र समिति की स्वीकृति आवश्यक रखी गई। घनश्यामलाल वित्त देखता और पुराने कर्मचारियों के बकाया अधिकार लौटाए गए।
कंपनी ने सड़क दुर्घटनाओं में घायल निर्धन लोगों के लिए रोगी-वाहिकाएँ दान कीं। शारदा देवी ने अपने पति के नाम से एक पुनर्वास केंद्र भी खुलवाया, जहाँ मस्तिष्काघात के बाद बोलने और चलने की क्षमता खो चुके बुजुर्गों का कम लागत में उपचार होता था।
उद्घाटन के दिन एक समाचारवाहक ने पूछा—
—आपने अपनी बहू पर इतना विश्वास कैसे किया?
शारदा देवी ने सुनैना का हाथ पकड़ा।
—रिश्ते जन्म से मिल सकते हैं, लेकिन परिवार सेवा, सम्मान और संकट में साथ खड़े रहने से बनता है।
सुनैना ने राघव से तलाक ले लिया। उसने न गुजारा-भत्ता माँगा, न उस मकान में अपना हिस्सा। वह केवल अपनी गरिमा और शारदा देवी का साथ चाहती थी।
2 वर्ष बाद जेल से एक पत्र आया। राघव ने लिखा था कि उसे ठंड लगती है, पैसे की आवश्यकता है और अब वह अपने किए पर पछता रहा है। उसने माँ से क्षमा माँगी और सुनैना को दोष देने के लिए माफी लिखी।
शारदा देवी ने पूरा पत्र पढ़ा। फिर उसे फाड़ा नहीं।
उन्होंने नया लिफाफा मँगाया। उसमें एक ऊनी कंबल, 2 जोड़ी मोजे, कुछ धार्मिक और नैतिक कथाओं की पुस्तकें तथा एक खाली दैनंदिनी भेजी।
सुनैना ने पूछा—
—क्या आपने उन्हें क्षमा कर दिया?
शारदा देवी ने खिड़की के बाहर पुनर्वास केंद्र में चलना सीखते बुजुर्गों को देखा।
—क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अपराध के परिणाम मिटा दिए जाएँ। मैंने उसके लिए अपने मन में नफरत रखना छोड़ दिया है। अब उसे स्वयं लिखना होगा कि उसने लालच में क्या-क्या खोया।
उस शाम दोनों उसी पुराने वैशाली नगर वाले घर की बालकनी में बैठी थीं। अब वहाँ दवाइयों की गंध को कोई अपशकुन नहीं कहता था। कमरे में हँसी थी, पौधे थे और शारदा देवी की धीमी आवाज में पढ़ी जा रही कहानियाँ थीं।
सुनैना ने उनके कंधों पर शॉल रखा।
शारदा देवी ने उसका हाथ थामकर कहा—
—उस रात मेरा बेटा मुझे घर से निकाल रहा था। मुझे लगा था मेरा जीवन समाप्त हो गया। मगर सच यह था कि उसी रात मुझे मेरी बेटी मिली थी।
सुनैना ने सिर उनकी गोद में रख दिया।
जिस स्त्री ने घर छोड़ा था, उसके पास न पैसा था, न भविष्य की कोई गारंटी। उसके साथ केवल एक असहाय वृद्धा, कुछ दवाइयाँ और मानवता बची थी।
लेकिन अगली सुबह सामने आया रहस्य केवल उनकी किस्मत नहीं बदलने वाला था।
उसने यह भी सिद्ध कर दिया था कि कभी-कभी खून का रिश्ता विरासत माँगता है, जबकि सच्चा रिश्ता बिना कुछ माँगे जीवन बचाता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.