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“ड्रामा मत करो” — पति ने माँ और बहन को लग्जरी कार में बैठाते हुए पत्नी को बच्चा गोद में देकर सड़क पर छोड़ दिया, पर वह नहीं जानता था कि एक छिपा हुआ नाम उसकी किस्मत पलट देगा।

भाग 1:
ऑपरेशन के 5 दिन बाद, पेट की टांकों में जलन लिए अंजलि अपने नवजात बेटे को सीने से लगाए अस्पताल के गेट पर खड़ी थी, और उसका पति करण अपनी माँ और बहन को उसी मर्सिडीज में बैठा रहा था जो अंजलि के पिता ने शादी से पहले उसे दी थी।

उसने अंजलि की हथेली में 50 रुपये का मुड़ा हुआ नोट और कुछ सिक्के दबाए।

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—इतने में बस मिल जाएगी। जल्दी घर पहुँच जाना। मम्मी को देर हो रही है, हमने खान मार्केट में लंच बुक किया है।

अंजलि को लगा जैसे कानों ने धोखा दे दिया हो। गुरुग्राम के उस महंगे निजी अस्पताल के बाहर गाड़ियाँ आ-जा रही थीं, सिक्योरिटी गार्ड दरवाज़े खोल रहे थे, नर्सें व्हीलचेयर धकेल रही थीं, और वह अपनी सफेद शॉल में अपने 5 दिन के बेटे आरव को छिपाए खड़ी थी। सी-सेक्शन की सिलाई हर साँस के साथ खिंच रही थी, जैसे पेट के अंदर किसी ने गरम लोहे की धार रख दी हो।

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—करण… बस? मैं अभी-अभी डिस्चार्ज हुई हूँ। मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही।

करण ने आँखें घुमाईं, जैसे वह कोई नाटक देख रहा हो।

—अंजलि, ड्रामा मत करो। मेरी बहन प्रिया तो डिलीवरी के 3 दिन बाद ही सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। तुम हर बात को बड़ा बना देती हो।

पीछे से उसकी माँ, सविता मल्होत्रा, लाल साड़ी में सोने की चूड़ियाँ खनकाती हुई आई। उसके साथ करण के पिता महेश और बहन प्रिया थे। तीनों के चेहरे पर अस्पताल से घर लौटने वाली चिंता नहीं, बल्कि रेस्टोरेंट में देर होने वाली बेचैनी थी।

सविता ने बच्चे की तरफ बस एक नजर डाली।

—अरे, सो ही रहा है। करण, चलो अब। टेबल 1:30 बजे की है। देर हुई तो बहुत इंतजार कराएंगे।

प्रिया ने हँसते हुए अपने धूप के चश्मे ठीक किए।

—भाभी को तो वैसे भी आराम चाहिए। घर जाकर लेट जाएँगी। हम लोग जल्दी लौट आएँगे।

अंजलि ने मर्सिडीज की तरफ देखा। वही काली चमचमाती गाड़ी, जिसे उसके पिता ने कहा था, “बेटी, जरूरत पड़े तो कभी किसी पर निर्भर मत रहना।” शादी के बाद करण ने उसे लगभग अपनी बना लिया था। कहता था, “क्लाइंट मीटिंग में इमेज बनती है।” अंजलि चुप रही थी, क्योंकि उसे लगा था पति की तरक्की में उसका साथ देना प्यार है।

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अब वही गाड़ी उसकी आँखों के सामने थी, और वह सड़क किनारे बस का इंतजार करने वाली थी।

—और आरव? —अंजलि ने धीमे से पूछा— वह इतना छोटा है, करण। उसे धूप, भीड़, धक्के…

करण ने बात काट दी।

—बच्चे बहुत मजबूत होते हैं। बस 30 मिनट की बात है। और हाँ, घर पहुँचकर फ्रिज में कल की दाल है, गरम कर लेना। मुझे फोन मत करना, परिवार के साथ बैठा रहूँगा।

अंजलि के चेहरे से रंग उतर गया।

—मैं तुम्हारा परिवार नहीं हूँ?

यह सवाल हवा में लटक गया।

करण ने जवाब नहीं दिया। उसने नर्स के हाथ से छोटा डायपर बैग लिया, उसे मर्सिडीज की पिछली सीट पर फेंका, फिर जैसे एहसान कर रहा हो, बैग वापस निकालकर अंजलि के पैरों के पास रख दिया।

—लो, ये भी ले लो। और रास्ते में रोना मत शुरू कर देना।

सविता कार में बैठते हुए बोली:

—आजकल की लड़कियाँ जरा सा दर्द भी सह नहीं पातीं। हमारे जमाने में तो औरतें बच्चा जनकर अगले दिन चूल्हा संभाल लेती थीं।

प्रिया ने सीट से सिर निकालकर कहा:

—और भाभी, बच्चे को ठीक से पकड़ना। कहीं बस में किसी को लगा दिया तो फिर हमें ही सुनना पड़ेगा।

कार का दरवाजा बंद हुआ। काले शीशे के पीछे करण का चेहरा दिखाई दिया। वह मुस्कुरा रहा था। वह वही मुस्कान थी जो अंजलि ने महीनों से अपने लिए नहीं देखी थी।

मर्सिडीज धीरे-धीरे अस्पताल से बाहर निकली और ट्रैफिक में गायब हो गई।

अंजलि के हाथ में 50 रुपये थे। उसकी हथेली पसीने से भीग रही थी। आरव ने नींद में मुँह थोड़ा सा खोला और फिर उसके सीने से चिपक गया। उसी एक छोटे से स्पर्श ने अंजलि को रोने से रोक लिया।

बस आई तो ड्राइवर ने झटके से ब्रेक लगाया। सीढ़ी चढ़ना उसके लिए युद्ध जैसा था। पहला कदम रखते ही पेट की सिलाई में ऐसा दर्द उठा कि उसकी आँखों के आगे अंधेरा तैर गया। किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। एक बुजुर्ग महिला ने अपनी सीट से जगह देने की कोशिश की, मगर दो कॉलेज लड़के उससे पहले बैठ गए।

आखिर एक सब्जी बेचने वाली औरत ने अपना थैला उठाया।

—बेटी, यहाँ बैठ जा। बच्चा नया है न?

अंजलि ने सिर हिलाया। वह बोल नहीं पाई।

बस धक्के खाती हुई दिल्ली-गुरुग्राम रोड पर आगे बढ़ी। बाहर धूल, हॉर्न, फ्लाईओवर और भागती हुई जिंदगी थी। अंदर अंजलि अपने पिछले 2 साल याद कर रही थी।

करण ने शादी से पहले उसे बहुत प्यार दिखाया था। वह महत्वाकांक्षी था, तेज बोलता था, बड़े सपने देखता था। अंजलि को यह अच्छा लगता था। उसने अपने घर का सच छिपाया था, क्योंकि वह चाहती थी कि कोई उसे उसके नाम से नहीं, उसके दिल से प्यार करे। करण को बस इतना पता था कि उसके पिता देवेंद्र मेहरा जयपुर में “कुछ बिजनेस” करते हैं और परिवार ठीक-ठाक है।

उसे क्या पता था कि देवेंद्र मेहरा, मेहरा ग्रुप के चेयरमैन हैं, जिनका नाम बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मा, रियल एस्टेट और टेक फंडिंग की दुनिया में वजन रखता है।

करण की स्टार्टअप “नेक्साविस्टा” को पिछले 1 साल में जो निवेश मिले थे, उनमें से आधे दरवाजे इसलिए खुले थे क्योंकि लोग फुसफुसाते थे कि करण, मेहरा परिवार से जुड़ा है। करण को लगा वह खुद महान है। वह घमंडी हो गया। उसकी माँ अंजलि को “साधारण लड़की” कहती, प्रिया उसे “करण की किस्मत का बोझ” बोलती, और करण हर बार हँसकर बात टाल देता।

बस लाल बत्ती पर रुकी।

उसी समय बगल की लेन में वही काली मर्सिडीज आकर रुकी। अंदर करण, सविता, महेश और प्रिया हँस रहे थे। प्रिया फोन से सेल्फी ले रही थी। सविता के हाथ में रेस्टोरेंट की बुकिंग का मैसेज चमक रहा था।

करण ने एक बार भी बस की तरफ नहीं देखा।

अंजलि के अंदर कुछ टूट गया।

पर वह टूटना कमजोरी नहीं था।

वह साफ-साफ जागना था।

उसने कांपते हाथ से फोन निकाला। स्क्रीन पर “पापा” लिखा था। उसने यह नंबर अपने दुखों के लिए कभी इस्तेमाल नहीं किया था। वह चाहती थी कि शादी उसकी अपनी दुनिया रहे। लेकिन आज उसके साथ सिर्फ अन्याय नहीं हुआ था। आज उसके बेटे को भी अपमानित किया गया था।

कॉल पहली घंटी में उठ गया।

—अंजलि? सब ठीक है न?

अंजलि ने आरव को और कसकर पकड़ा। उसकी आवाज बहुत धीमी थी, मगर उसमें पहली बार डर नहीं था।

—पापा, करण मुझे अस्पताल से बस में भेजकर चला गया। आरव मेरे साथ है। मैं घर नहीं लौटना चाहती।

दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर देवेंद्र मेहरा की आवाज आई, शांत लेकिन बर्फ जैसी ठंडी।

—तुम जहाँ हो, वहीं बताओ। और ध्यान से सुनो, बेटी… अब तुम उस घर में वापस नहीं जाओगी। न तुम, न मेरा नाती।

अंजलि ने आँखें बंद कर लीं। बस आगे चल पड़ी, लेकिन उसकी पुरानी जिंदगी उसी लाल बत्ती पर छूट चुकी थी।

और करण को अभी पता भी नहीं था कि उसने किस औरत को 50 रुपये देकर बस में भेजा है।

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भाग 2:

अंजलि जब मल्होत्रा अपार्टमेंट के बाहर उतरी तो उसके पैरों में इतनी ताकत नहीं बची थी कि वह सीधा खड़ी रह सके। आरव अब जाग गया था और हल्की-हल्की आवाजें निकाल रहा था, जैसे वह भी माँ की थकान समझ रहा हो। तभी सड़क किनारे एक काली रेंज रोवर रुकी। उससे राघव सूद उतरे, जो देवेंद्र मेहरा के निजी सहायक थे और 22 साल से परिवार के साथ थे। उनके साथ 2 महिलाएँ थीं, एक नियोनेटल नर्स और एक पोस्टपार्टम रिकवरी विशेषज्ञ। राघव ने झुककर कहा कि देवेंद्र साहब ने उन्हें लेने भेजा है। अंजलि ने कोई सवाल नहीं किया। नर्स ने आरव को बहुत सावधानी से लिया, दूसरी महिला ने अंजलि को सहारा दिया, और कुछ ही मिनटों में वह उस कार में बैठी थी जहाँ सीट गरम थी, पानी की बोतल खुली थी और दर्द से काँपती औरत को इंसान की तरह देखा जा रहा था। वे मल्होत्रा घर नहीं गए। वे सीधे छतरपुर फार्महाउस पहुँचे, जहाँ देवेंद्र मेहरा मुख्य दरवाजे पर खड़े थे। उन्होंने पहले बेटी का चेहरा देखा, फिर बच्चे को, फिर उसकी झुकी हुई कमर और दर्द से सफेद पड़े होंठ। उन्होंने उसे गले नहीं लगाया, क्योंकि उन्हें डर था कहीं उसकी सिलाई को चोट न लग जाए। बस इतना कहा कि वह घर आ गई है। उस रात अंजलि को डॉक्टर ने देखा, कमरे में साफ पालना रखा गया, गरम खिचड़ी, सूप और दवाइयाँ आईं, फोन बंद कर दिया गया। जब करण पहली बार घर लौटा और उसे दाल गरम न मिली, तब उसने 19 कॉल किए। फिर मैसेज भेजा कि वह अपनी औकात न भूले और आरव मल्होत्रा है। देवेंद्र ने वह मैसेज पढ़ा, फिर अपने लीगल और फाइनेंस हेड को बुलाया। उसी रात मेहरा ग्रुप ने नेक्साविस्टा से हर अनौपचारिक समर्थन वापस ले लिया। सुबह तक बैंक ने क्रेडिट लाइन रोक दी, एक फंड ने निवेश रद्द किया, 2 बड़े क्लाइंट्स ने कॉन्ट्रैक्ट होल्ड पर डाल दिए और टेक लाइसेंस की ऑडिट शुरू हो गई। करण को लगा यह बाजार की चाल है, पर दोपहर तक उसका सीएफओ पीला पड़कर केबिन में आया और बोला कि यह ऊपर से हुआ है, बहुत ऊपर से। उसी समय करण की माँ का फोन आया। सविता रो रही थी और सिर्फ 1 सवाल पूछ रही थी कि उसने उस औरत के साथ क्या कर दिया।

भाग 3:

अगले 4 दिन अंजलि ने पहली बार बिना डर के साँस ली।

छतरपुर के फार्महाउस में सुबह तुलसी के पास दीप जलता था, रसोई से घी और अजवाइन की खुशबू आती थी, और कमरे में धीमी आवाज में लोरी बजती थी। उसकी माँ, कावेरी मेहरा, हर दोपहर उसके पास बैठतीं, उसके बालों में तेल लगातीं और चुपचाप आरव को देखतीं।

—मैंने तुझे रोका नहीं, क्योंकि बेटी का अपना विश्वास भी जरूरी होता है।

अंजलि ने माँ की तरफ देखा। उसकी आँखें भर आईं।

—मैंने सोचा था वह मुझे मेरे नाम से प्यार करता है।

कावेरी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

—जिस आदमी को प्यार करना होता है, वह नाम नहीं पूछता। जिस आदमी को फायदा उठाना होता है, वह नाम पता चलने तक अभिनय करता है।

अंजलि के भीतर यह बात तीर की तरह लगी, क्योंकि यही सच था। करण ने उसे तब तक सहा जब तक उसे लगा वह साधारण है। उसने उसे नीचे दिखाया ताकि खुद बड़ा महसूस कर सके। और जब वह माँ बनी, जब शरीर कमजोर था और आत्मा थकी हुई थी, तब उसने सबसे बड़ा अपमान किया।

उधर करण की दुनिया बिखर रही थी।

नेक्साविस्टा के ऑफिस में जो स्क्रीन पहले ग्रोथ चार्ट दिखाती थीं, अब लाल चेतावनियों से भरी थीं। बैंक के लोग हर दस्तावेज माँग रहे थे। निवेशक कॉल पर चिल्ला रहे थे। एक पत्रकार ने पूछा कि क्या कंपनी ने निवेश पाने के लिए झूठा पारिवारिक प्रभाव दिखाया था। करण ने फोन पटक दिया।

सविता और प्रिया को असली डर तब लगा जब उन्हें पहली बार पता चला कि अंजलि कौन है।

प्रिया ने इंटरनेट पर “मेहरा ग्रुप” खोजा और स्क्रीन पर देवेंद्र मेहरा की तस्वीर देखकर उसकी हँसी गायब हो गई। वही देवेंद्र मेहरा, जिनके साथ बड़े मंत्री मंच बाँटते थे। वही परिवार, जिसकी चैरिटी अस्पताल चलाती थी, जिसके फंड स्टार्टअप्स को उठाते और गिराते थे। वही नाम, जिसके सामने बैंक अधिकारी कुर्सी से उठकर खड़े हो जाते थे।

सविता ने माथा पकड़ लिया।

—करण ने हमें क्यों नहीं बताया?

महेश ने पहली बार अपनी पत्नी पर चिल्लाया।

—उसे खुद नहीं पता था! तुम लोग बहू को नौकरानी समझकर बोलती रहीं। अब भुगतो।

लेकिन सविता मल्होत्रा जैसी औरतें गलती नहीं मानतीं, वे पहले रोती हैं, फिर दोष बदलती हैं। उसने करण को कहा कि अंजलि को भावुक करके वापस लाओ। प्रिया ने सलाह दी कि बच्चे की कस्टडी की धमकी दो। करण ने पहले गुस्से में, फिर डर में, फिर लालच में कई मैसेज भेजे।

“घर लौट आओ।”

“माँ की तबीयत खराब है।”

“तुम मेरी पत्नी हो।”

“आरव मेरे बिना कैसे बड़ा होगा?”

अंजलि ने कोई जवाब नहीं दिया।

फिर 5वें दिन एक छोटा ट्रक फार्महाउस के गेट पर आया। उसमें अंजलि की कुछ पुरानी चीजें थीं—दवाइयों का डिब्बा, कुछ कपड़े, अस्पताल की फाइलें, टूटा हुआ कंघा, और एक चिट्ठी। राघव ने चिट्ठी उसे दी।

करण ने लिखा था कि वह नाटक बंद करे, दोपहर तक बच्चे के साथ लौट आए, नहीं तो वह कानूनी कदम उठाएगा। उसने यह भी लिखा था कि उसकी माँ और बहन बहुत दुखी हैं, क्योंकि अंजलि ने “परिवार की इज्जत” मिट्टी में मिला दी।

अंजलि ने चिट्ठी पूरी पढ़ी।

फिर उसने उसे दो टुकड़ों में फाड़ा।

—कपड़े दान कर दीजिए। बाकी फेंक दीजिए।

राघव ने सिर झुका दिया।

—जैसा आप कहें।

उस शाम खाने की मेज पर देवेंद्र ने पहली बार खुलकर बात की। वहाँ परिवार के कुछ भरोसेमंद लोग थे, लीगल टीम थी और अंजलि व्हीलचेयर पर बैठी थी, आरव उसकी माँ की गोद में सो रहा था।

देवेंद्र ने फाइल खोली।

—करण की कंपनी के 3 बड़े लोन सिर्फ रिश्तों की हवा पर टिके थे। उसने सीधे झूठ नहीं बोला, पर हर जगह यह भ्रम रहने दिया कि मेहरा परिवार उसके साथ है। अब वह भ्रम खत्म है।

अंजलि ने धीरे से पूछा:

—क्या यह बदला है, पापा?

देवेंद्र ने बेटी को देखा।

—नहीं। बदला तब होता जब हम झूठ गढ़ते। हम सिर्फ सच हटा रहे हैं। जो इमारत झूठ के सहारे खड़ी थी, वह अपने वजन से गिर रही है।

अंजलि ने लंबी साँस ली। उसके अंदर अभी भी दर्द था, लेकिन अब उस दर्द में दिशा थी।

इसी बीच सविता और प्रिया ने नया खेल शुरू किया। उन्होंने एक सोशल मीडिया पेज को कहानी बेची कि एक अमीर बहू ने अपने पति को बर्बाद कर दिया और बच्चे को दादा के पैसों से छिपा लिया। पोस्ट में करण की अस्पताल वाली तस्वीर थी, जहाँ वह सिर्फ 2 मिनट के लिए आरव को गोद में लिए खड़ा था। कैप्शन लिखा था कि एक पिता अपने बच्चे के लिए रो रहा है।

लोगों ने पहले करण का साथ दिया।

“पैसे वाली औरतें ऐसे ही घर तोड़ती हैं।”

“बच्चे को पिता से दूर रखना गलत है।”

“ससुराल में थोड़ा बहुत तो चलता है।”

अंजलि ने फोन रखा। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन इस बार डर से नहीं। वह जानती थी कि चुप्पी की भी सीमा होती है।

देवेंद्र ने उससे पूछा:

—क्या तुम सच दिखाना चाहती हो?

अंजलि ने आरव की तरफ देखा। वह सो रहा था, जैसे दुनिया का कोई झगड़ा उसे छू नहीं सकता।

—हाँ। लेकिन तमाशा नहीं। पूरा सच।

अगले दिन उसी पेज पर एक वीडियो पहुँचा। वह अस्पताल के गेट का सीसीटीवी था। उसमें साफ दिख रहा था कि अंजलि मुश्किल से खड़ी है, करण उसे 50 रुपये देता है, सविता और प्रिया मर्सिडीज में बैठती हैं, और अंजलि बच्चे को सीने से लगाए बस स्टॉप की तरफ जाती है। फिर बस का फुटेज था, जहाँ वह दर्द से चेहरा पकड़कर चढ़ रही थी। फिर करण के मैसेज थे, जिनमें वह खाना, औकात और बच्चे पर अधिकार की बात कर रहा था, लेकिन एक बार भी उसकी तबीयत नहीं पूछ रहा था।

सोशल मीडिया पलट गया।

“यह पति नहीं, जल्लाद है।”

“सी-सेक्शन के 5 दिन बाद बस? शर्म करो।”

“50 रुपये देकर पत्नी और नवजात को भेजा, और अब पिता बनने का नाटक?”

“ऐसी सासों की वजह से घर नरक बनते हैं।”

करण ने उसी शाम फार्महाउस के गेट पर आकर हंगामा किया। वह पहले जैसा चमकदार नहीं दिख रहा था। दाढ़ी बढ़ी हुई, शर्ट मुड़ी हुई, आँखें लाल। उसने गेट पकड़ा और चिल्लाया:

—अंजलि! बाहर आओ! मुझे तुमसे बात करनी है!

गार्ड शांत खड़े रहे।

लगभग 1 घंटे बाद अंजलि ने मिलने का फैसला किया। देवेंद्र ने मना नहीं किया। बस राघव को इशारा किया। करण को मुख्य घर में नहीं, गेट के पास बने सुरक्षा कक्ष में बैठाया गया।

जब अंजलि अंदर आई, करण कुछ सेकंड के लिए उसे देखता रह गया।

वह वही औरत थी, फिर भी नहीं थी। हल्के नीले सूट में, बाल पीछे बंधे हुए, चेहरे पर थकान थी, मगर आँखों में वह टूटन नहीं थी जिसे करण अपना अधिकार समझता था।

—अंजलि… मुझे माफ कर दो।

अंजलि बैठी नहीं। वह खड़ी रही।

—किस बात के लिए?

करण ने गला साफ किया।

—उस दिन… गलती हो गई। मम्मी का दबाव था, प्रिया भी थी, रेस्टोरेंट की बुकिंग थी। मैं परेशान था।

—तुम इतने परेशान थे कि अपनी पत्नी को 50 रुपये देकर बस में भेज दिया?

करण ने नजरें झुका लीं।

—मैंने सोचा नहीं था बात इतनी बड़ी हो जाएगी।

—नहीं। तुमने सोचा नहीं था कि मैं इतनी बड़ी निकलूँगी।

करण ने सिर उठाया। उसके चेहरे पर शर्म से ज्यादा डर था।

—मुझे नहीं पता था कि तुम देवेंद्र मेहरा की बेटी हो।

अंजलि हल्का सा मुस्कुराई। वह मुस्कान दुख से भरी थी।

—यही तो तुम्हारी असली माफी है, करण। तुम्हें दुख इस बात का नहीं कि तुमने मुझे दर्द दिया। तुम्हें दुख इस बात का है कि तुमने गलत घर की बेटी को दर्द दिया।

करण की आँखों में आँसू आ गए।

—मेरी कंपनी खत्म हो रही है। बैंक वाले पीछे पड़े हैं। निवेशक केस कर देंगे। मम्मी और प्रिया पर भी मानहानि का नोटिस आ गया है। तुम बस अपने पापा से कह दो कि सब रोक दें। हम फिर से शुरू कर सकते हैं। आरव को पिता चाहिए।

अंजलि ने पहली बार कुर्सी खींचकर बैठना चुना। वह धीरे-धीरे बोली, जैसे हर शब्द उसकी जिंदगी की आखिरी कमजोरी काट रहा हो।

—आरव को पिता चाहिए, लेकिन ऐसा पिता नहीं जो उसे जन्म के 5 दिन बाद बस की भीड़ में भेज दे। उसे परिवार चाहिए, लेकिन ऐसा परिवार नहीं जहाँ उसकी माँ की सिलाई से ज्यादा रेस्टोरेंट की बुकिंग की चिंता हो। उसे नाम चाहिए, लेकिन ऐसा नाम नहीं जो औरत को सम्मान दिए बिना मर्दानगी का दावा करे।

करण रो पड़ा।

—मैं बदल जाऊँगा।

—तुम्हें बदलने के लिए मेरी वापसी जरूरी नहीं है।

—कम से कम मुझे उसे देखने दो।

—जज फैसला करेगा। हमारे पास फुटेज है, मैसेज हैं, मेडिकल रिपोर्ट है, तुम्हारी धमकियाँ हैं, तुम्हारी माँ और बहन की झूठी पोस्ट है। अगर तुम कोर्ट में लड़ना चाहते हो, तो वहाँ यह भी बताना कि तुमने नवजात बच्चे की डायपर बैग तक उठाने से मना क्यों किया था।

करण ने सिर पकड़ लिया।

अंजलि उठ खड़ी हुई।

—तलाक के कागज तुम्हें कल मिल जाएँगे। मेरी संपत्ति, मेरे बच्चे और मेरे जीवन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। तुम पिता कहलाने का हक अदालत से माँग सकते हो, लेकिन पति कहलाने का हक उसी दिन खत्म हो गया था, जब तुमने मुझे बस स्टॉप पर छोड़ा था।

वह दरवाजे तक पहुँची, फिर रुकी।

—और सुनो, मैं आरव को तुमसे नफरत करना नहीं सिखाऊँगी। मैं उसे बस इतना सिखाऊँगी कि किसी औरत को प्यार के नाम पर अपमान सहना नहीं चाहिए।

दरवाजा बंद हो गया।

करण अकेला रह गया। बाहर फार्महाउस की रोशनियाँ शांत थीं, जैसे दुनिया उसके टूटने पर भी बिना शोर के आगे बढ़ रही हो।

3 महीने बाद तलाक की प्रक्रिया शुरू हो गई। करण की कंपनी लगभग दिवालिया हो गई। कुछ निवेशकों ने धोखाधड़ी और गलत प्रस्तुति के आरोप लगाए। सविता और प्रिया को सार्वजनिक माफी माँगनी पड़ी। उनके सोशल सर्कल ने उन्हें बुलाना बंद कर दिया। महेश चुपचाप अलग कमरे में रहने लगे, जैसे अपनी ही बनाई हुई चुप्पी में सजा काट रहे हों।

अंजलि ने कोई जश्न नहीं मनाया।

उसने कोई लंबा पोस्ट नहीं लिखा।

उसने किसी चैनल को इंटरव्यू नहीं दिया।

एक सुबह वह बगीचे में बैठी थी। आरव उसकी गोद में था। अमलतास के पीले फूल हवा में हिल रहे थे। कावेरी दूर से लोरी गुनगुना रही थीं। देवेंद्र फोन पर किसी मीटिंग को टाल रहे थे, क्योंकि नाती ने पहली बार मुस्कुराया था।

अचानक आरव ने हल्की सी हँसी छोड़ी।

छोटी, साफ, बिल्कुल नई।

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन इस बार वे आँसू हार के नहीं थे। वह समझ गई कि न्याय हमेशा अदालत, चिल्लाहट या बदले में नहीं आता। कभी-कभी न्याय उस पल आता है जब एक औरत अपने बच्चे को सीने से लगाकर तय करती है कि उसकी अगली पीढ़ी अपमान की विरासत नहीं पाएगी।

उसने आरव के माथे को चूमा।

फार्महाउस के बंद गेट के उस पार एक दुनिया थी, जहाँ उसे 50 रुपये में नाप दिया गया था।

इस तरफ उसका बच्चा था, उसका नाम था, उसकी शांति थी।

और पहली बार अंजलि ने मुस्कुराकर महसूस किया कि वह किसी की छोड़ी हुई पत्नी नहीं, अपने बेटे की बची हुई दुनिया है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.