
PART 1
—3 साल तक अपनी बेटी के लिए 1 रुपया नहीं भेजा, और अब याद आई तो यह गंदी-सी गुड़िया भेज दी?
नंदिनी की चीख जयपुर के मानसरोवर स्थित छोटे-से किराए के घर में गूँज उठी। उसने फटी हुई कपड़े की गुड़िया को पैर से पकड़कर कूड़ेदान की ओर बढ़ाया ही था कि उसकी 5 साल की बेटी मीरा दौड़कर उससे लिपट गई।
—माँ, इसे मत फेंको! यह पापा ने भेजी है!
मीरा गुड़िया को ऐसे सीने से लगाए थी, जैसे वह कोई खिलौना नहीं, उसके खोए हुए पिता का स्पर्श हो।
तलाक के बाद आदित्य राठौड़ ने पलटकर भी नहीं देखा था। वह दिल्ली के एक प्रभावशाली उद्योगपति की बेटी काव्या मल्होत्रा से शादी कर चुका था। अखबारों में उनकी शाही शादी, विदेशी यात्राओं और आलीशान पार्टियों की तस्वीरें छपती रहती थीं। नंदिनी को विश्वास था कि आदित्य ने दौलत के लिए पत्नी और बेटी दोनों को छोड़ दिया था।
उस दिन अचानक एक संदेशवाहक वह मैली गुड़िया देकर गया था। भेजने वाले का नाम आदित्य था।
मीरा के आँसू देखकर नंदिनी का गुस्सा टूट गया। उसने गुड़िया बेटी के पास रहने दी और सोचा कि 2 दिन बाद मीरा खुद उससे ऊब जाएगी।
लेकिन उसी रात लगभग 3 बजे कमरे से कपड़ा फटने जैसी आवाज आई।
सर्र… सर्र…
नंदिनी नंगे पाँव मीरा के कमरे तक पहुँची। दरवाजा खोलते ही उसका शरीर सिहर गया।
मीरा फर्श पर बैठी थी। सड़क की हल्की रोशनी में वह गुड़िया के पेट की उधड़ी सिलाई खोल रही थी। उसके पास एक मुड़ा हुआ कागज और प्लास्टिक की कई परतों में लिपटी कोई चीज रखी थी।
—मीरा?
बच्ची डर गई और सामान पीठ के पीछे छिपाने लगी।
—माँ… पापा ने कहा था इसे चुपके से निकालना। उन्होंने कहा था कि बुरी वाली आंटी को पता नहीं चलना चाहिए।
नंदिनी ने बेटी को सुलाया और काँपते हाथों से कागज खोला। आदित्य की लिखावट टेढ़ी-मेढ़ी थी।
“मुझे बचा लो। काव्या पर भरोसा मत करना।”
प्लास्टिक के भीतर एक काली स्मृति-पेन और पहचान-पत्र की प्रतिलिपि थी। तस्वीर काव्या की थी, लेकिन नाम लिखा था—लता बंजारा, जिला बांसवाड़ा।
नंदिनी ने स्मृति-पेन अपने संगणक में लगाई। पहले ही दृश्य में आदित्य दिखाई दिया। वह हड्डियों का ढाँचा बन चुका था। आँखों के नीचे काले घेरे थे और पीछे पत्थर की दीवार थी।
—नंदिनी, मेरे पास समय नहीं है। जिस औरत से मैंने शादी की, उसने मुझे कैद कर रखा है। वह मुझे ऐसी दवाइयाँ देती है जिनसे मेरी याददाश्त मिट रही है। मेरे माता-पिता की दुर्घटना भी दुर्घटना नहीं थी। उसका असली लक्ष्य राठौड़ परिवार की…
अचानक कदमों की आवाज आई और दृश्य बंद हो गया।
उसी क्षण मुख्य दरवाजे पर इतनी जोरदार चोट पड़ी कि पूरा घर काँप उठा।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
नंदिनी ने झरोखे से बाहर देखा। सामने आदित्य का बचपन का मित्र कबीर खड़ा था। उसके चेहरे से खून बह रहा था।
उसके पीछे गली में एक काली गाड़ी धीरे-धीरे आकर रुक चुकी थी।
PART 2
नंदिनी ने कबीर को भीतर खींचकर दरवाजा बंद कर लिया।
—आदित्य 20 दिन से अपने कार्यालय नहीं गया। काव्या सबको बता रही है कि वह विदेश में है। कल मैं उनकी दिल्ली वाली कोठी में पीछे से घुसा था। वह तहखाने में व्हीलचेयर पर पड़ा था। उसे होश भी नहीं था।
कबीर ने बताया कि आदित्य के माता-पिता की कार दुर्घटना योजनाबद्ध हत्या थी। काव्या चाहती थी कि सारी संपत्ति आदित्य के नाम आए और फिर वह उसे मानसिक रूप से अयोग्य घोषित करवा दे।
तभी नंदिनी का फोन बजा।
—नमस्ते, नंदिनी। गुड़िया का पेट खोल लिया होगा।
काव्या की आवाज शांत थी।
पीछे मीरा की चीख सुनाई दी।
—माँ! मुझे घर ले चलो!
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। विद्यालय से किसी नकली मौसी ने मीरा को उठा लिया था।
—स्मृति-पेन लेकर आमेर की पुरानी राठौड़ हवेली आओ। 1 घंटे में। पुलिस को बताया तो बेटी जीवित नहीं बचेगी।
नंदिनी और कबीर हवेली पहुँचे। आँगन में मीरा रस्सियों से बँधी थी। नंदिनी दौड़ी, लेकिन 2 आदमियों ने उसे पकड़ लिया।
तभी पीछे से किसी ने उसकी गर्दन पर चाकू रख दिया।
नंदिनी ने मुड़कर देखा और स्तब्ध रह गई।
वह उसकी मनोचिकित्सक और सबसे करीबी सहेली डॉ. रिद्धिमा थी।
—आदित्य ने तुम्हें छोड़ा नहीं था, नंदिनी। मैंने उसे तुमसे दूर किया था। काव्या को भी मैंने ही उसके जीवन में भेजा था।
PART 3
नंदिनी के कानों में रिद्धिमा की बात हथौड़े की तरह गूँजती रही।
पिछले 3 वर्षों में यही औरत हर कठिन रात उसके पास बैठी थी। यही उसे समझाती रही थी कि आदित्य स्वार्थी है, उसके लौटने की आशा छोड़ देनी चाहिए। इसी ने तलाक की कार्रवाई जल्दी पूरी करवाने के लिए अपने परिचित वकील से मिलवाया था। नंदिनी जब रोती थी, रिद्धिमा उसके आँसू पोंछती थी। मीरा उसे रिद्धिमा मौसी कहती थी।
अब वही रिद्धिमा मीरा के बाल पकड़कर नंदिनी को हवेली के भीतर धकेल रही थी।
—तुमने ऐसा क्यों किया? —नंदिनी ने काँपती आवाज में पूछा।
रिद्धिमा हँसी।
—क्योंकि राठौड़ परिवार के पास केवल कंपनियाँ और जमीनें नहीं हैं। उनके पूर्वजों ने रियासतों के विलय से पहले सोना, हीरे और कई संपत्तियों के मूल दस्तावेज इसी हवेली में छिपाए थे। आदित्य के दादा ने मरने से पहले जगह बताने से इनकार कर दिया। उसके पिता जानते थे, इसलिए उन्हें रास्ते से हटाना पड़ा।
काव्या उनके पीछे चल रही थी। उसका चेहरा सुंदर था, लेकिन आँखों में बेचैनी थी। नंदिनी ने गौर किया कि वह बार-बार रिद्धिमा की ओर ऐसे देख रही थी जैसे आदेश की प्रतीक्षा कर रही हो।
कबीर को आँगन में ही पीटकर बाँध दिया गया था।
पत्थर की संकरी सीढ़ियाँ नीचे उतरती चली गईं। हवा ठंडी और सीलन भरी थी। नीचे सदियों पुरानी भूमिगत बावड़ी से जुड़ा एक विशाल कक्ष था। बीच में लोहे के खंभे से आदित्य बँधा हुआ था।
मीरा ने उसे देखते ही चीख मारी।
—पापा!
आदित्य ने धीरे से आँखें खोलीं। चेहरा पहचानने की कोशिश में उसकी पुतलियाँ काँप रही थीं। होंठ हिले, लेकिन आवाज नहीं निकली।
मीरा उसकी ओर भागना चाहती थी, पर रिद्धिमा ने उसे खींच लिया।
—तुम्हारा नाटक बहुत हो चुका, आदित्य। अब अपनी बेटी को देखकर शायद तुम्हारी जुबान खुल जाए। बताओ खजाने का रास्ता कहाँ है।
नंदिनी का खून खौल उठा।
—बच्ची को इसमें मत घसीटो!
—तुम्हारी बेटी ही तो हमारी आखिरी चाबी है, —रिद्धिमा ने कहा। —आदित्य ने मार खाई, दवा खाई, भूखा रहा, फिर भी नहीं बोला। शायद बेटी को मरते देखकर बोल पड़े।
नंदिनी ने मीरा को अपनी बाँहों में छिपा लिया।
—तुम चिकित्सक हो। लोगों की जान बचाने की शपथ ली थी।
—शपथ से हवेलियाँ नहीं मिलतीं, नंदिनी।
रिद्धिमा ने आदित्य के पास रखी दवाइयों की शीशी उठाई। उसने स्वीकार किया कि वह महीनों से उसे ऐसी दवाओं का मिश्रण दे रही थी जिससे भ्रम, स्मृति-हानि और शारीरिक निर्बलता होती थी। काव्या को वह लोगों के सामने आदर्श पत्नी बनकर रहने का प्रशिक्षण देती रही। दस्तावेजों में आदित्य की बीमारी को प्राकृतिक मानसिक विकार दिखाया गया था।
काव्या ने धीमे स्वर में कहा—
—तुमने कहा था किसी बच्ची को नुकसान नहीं होगा।
रिद्धिमा ने उसकी ओर घूरा।
—अब तुम्हें दया आ रही है, लता?
काव्या का असली नाम सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।
वह राजस्थान के एक गरीब परिवार से थी। किशोरावस्था में उसे नौकरी का झाँसा देकर दिल्ली लाया गया था। रिद्धिमा ने उसकी पहचान बदलवाई, अंग्रेजी बोलना, अमीरों जैसा व्यवहार और सामाजिक शिष्टाचार सिखाया। बदले में उसे राठौड़ परिवार में प्रवेश करना था।
लेकिन लालच बढ़ते-बढ़ते हत्या तक पहुँच चुका था।
—तुम भी निर्दोष नहीं हो, —नंदिनी ने काव्या से कहा। —तुमने आदित्य को कैद रखा। उसके माता-पिता की हत्या में साथ दिया। मेरी बेटी का अपहरण करवाया।
काव्या का चेहरा कठोर हो गया।
—मैंने गरीब होकर जन्म लिया था। हर दिन लोगों के घरों में बर्तन माँजते हुए उनकी बेटियों को रेशमी कपड़ों में देखा। मुझे लगा था कि एक बार पैसा मिल गया तो सब अपमान खत्म हो जाएगा। फिर पीछे लौटना संभव नहीं रहा।
—पीछे लौटना हमेशा संभव होता है, —नंदिनी बोली, —लेकिन तुमने हर बार आगे बढ़कर किसी और की जिंदगी कुचली।
रिद्धिमा ने झुँझलाकर दीवार में लगी लोहे की मूठ खींची। भारी जाली सीढ़ियों के सामने गिर गई।
अगले ही पल पत्थर की नालियों से तेज रफ्तार में पानी भीतर आने लगा।
—खजाने का रहस्य तुम लोगों के साथ यहीं डूब जाएगा, —रिद्धिमा ने कहा। —सुबह तक सबको लगेगा कि पुरानी बावड़ी की दीवार टूट गई और तुम दुर्घटना में मारे गए।
वह और काव्या जाली के बाहर निकल गईं। काव्या ने एक क्षण के लिए मीरा की ओर देखा, लेकिन रिद्धिमा ने उसे धक्का देकर ऊपर भेज दिया।
पानी कुछ ही क्षणों में नंदिनी के घुटनों तक पहुँच गया।
उसने आदित्य की रस्सियाँ खोलने की कोशिश की, लेकिन गाँठें पानी में भीगकर और कस गई थीं। मीरा उससे चिपकी काँप रही थी।
—माँ, हम मर जाएँगे?
नंदिनी ने बेटी का चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया।
—जब तक माँ साँस ले रही है, तुम्हें कुछ नहीं होगा।
उसके शब्द दृढ़ थे, लेकिन भीतर भय तूफान की तरह उमड़ रहा था।
पानी कमर तक पहुँच गया। आदित्य का सिर बार-बार झुक रहा था। नंदिनी ने उसे थप्पड़ मारकर जगाए रखने की कोशिश की।
—आदित्य! आँखें खोलो! तुम्हारी बेटी यहाँ है!
मीरा ने रोते हुए उसका चेहरा छुआ।
—पापा, मैंने आपकी गुड़िया संभालकर रखी। माँ उसे फेंक रही थीं, लेकिन मैंने नहीं फेंकने दिया।
आदित्य की आँखों में अचानक हल्की चमक आई। उसके सूखे होंठों पर टूटी हुई मुस्कान उभरी।
—मेरी… बहादुर… बेटी…
नंदिनी की आँखें भर आईं। जिस आदमी के प्रति उसने वर्षों तक घृणा पाली थी, वह आज टूटी अवस्था में भी अपनी बेटी को पहचानने की कोशिश कर रहा था।
—गुड़िया तुमने भेजी थी?
आदित्य ने सिर हिलाने का प्रयास किया।
उसने बताया कि हवेली के एक बूढ़े सेवक, रामदीन काका ने उसकी मदद की थी। आदित्य ने दवा के प्रभाव से बाहर आने वाले कुछ मिनटों में स्मृति-पेन तैयार की और उसे गुड़िया में छिपाया। रामदीन ने संदेशवाहक के माध्यम से वह गुड़िया नंदिनी तक पहुँचाई, लेकिन उसी रात वह संदिग्ध रूप से लापता हो गया।
पानी अब नंदिनी की छाती तक था।
आदित्य ने सामने की दीवार की ओर काँपती उँगली उठाई। वहाँ पत्थर पर सूर्यवंशी चिह्न उकेरा हुआ था। बीच में सूर्य की आकृति और उसके नीचे 2 हाथी बने थे।
नंदिनी को अचानक आदित्य की दादी राजेश्वरी देवी की बात याद आई। शादी के दिन उन्होंने उसे पारिवारिक मंदिर में अकेले बुलाकर कहा था—
“जिस दिन पानी राठौड़ वंश की साँसें रोकने लगे, सूर्य की तीसरी किरण दबाना। रास्ता उसी के पीछे जागेगा।”
तब नंदिनी ने इसे बूढ़ी स्त्री की रहस्यमयी बात समझकर भुला दिया था।
उसने दीवार को देखा। सूर्य के चारों ओर पत्थर की 12 किरणें बनी थीं। तीसरी किरण पानी की सतह से कुछ ऊपर थी।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए उसे मीरा को छोड़ना पड़ता।
—मीरा, मेरी गर्दन मजबूती से पकड़ो।
उसने बच्ची को अपने कंधों पर बैठाया और पानी में आगे बढ़ी। फर्श फिसलन भरा था। हर कदम पर पैर काई में धँस रहा था। दीवार तक पहुँचते-पहुँचते पानी उसके मुँह तक आ गया।
उसने तीसरी किरण दबाई।
कुछ नहीं हुआ।
नंदिनी ने पूरी शक्ति लगाई, लेकिन पत्थर नहीं हिला।
पीछे से आदित्य ने टूटी आवाज में कहा—
—सूर्य नहीं… हाथी की आँख… पहले…
नंदिनी ने नीचे पानी में हाथ डाला। उसे हाथी की आकृति टटोलनी पड़ी। साँस रोककर वह पानी में झुकी और पत्थर की आँख दबाई। भीतर कोई पुराना यंत्र खटका।
अब उसने तीसरी किरण दबाई।
भारी गड़गड़ाहट हुई।
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे घूमने लगा। दूसरी ओर बने पुराने निकास में पानी भँवर की तरह खिंच गया। तेज बहाव ने नंदिनी और मीरा को गिरा दिया। नंदिनी ने बेटी की कलाई कसकर पकड़ी। आदित्य खंभे से बँधा रह गया और पानी उसके चारों ओर घूमता रहा।
जब स्तर घुटनों तक आया, नंदिनी वापस दौड़ी। उसे फर्श पर टूटा हुआ लोहे का टुकड़ा मिला। उसने रस्सियाँ काटनी शुरू कीं। हथेलियाँ छिल गईं, नाखून टूट गए, लेकिन वह रुकी नहीं।
आखिर गाँठ खुल गई।
आदित्य अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था। नंदिनी ने उसका एक हाथ अपने कंधे पर रखा, दूसरे हाथ से मीरा को पकड़ा और तीनों घूमी हुई दीवार के पीछे बने संकरे रास्ते में घुस गए।
सुरंग के अंत में पत्थर की सीढ़ियाँ थीं। ऊपर पहुँचने पर वे एक विशाल गुप्त कक्ष में पहुँचे। लकड़ी के पुराने संदूकों में सोने की मोहरें, राजघरानों के आभूषण और जयपुर, दिल्ली, उदयपुर तथा अजमेर की दर्जनों संपत्तियों के मूल दस्तावेज रखे थे।
लेकिन असली रहस्य सोना नहीं था।
एक लोहे की पेटी में राठौड़ परिवार के पुराने लेखे, बहीखाते और पत्र थे। उनमें कई नेताओं, अधिकारियों और व्यापारियों को दिए गए अवैध धन का विवरण दर्ज था। आदित्य के पिता ने मृत्यु से कुछ दिन पहले उन दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ तैयार की थीं। वह अपने ही परिवार के पुराने अपराधों को सार्वजनिक करना चाहते थे।
इसी कारण रिद्धिमा ने उन्हें मरवाया था।
वह केवल खजाना नहीं चाहती थी। वह उन कागजों के सहारे प्रभावशाली लोगों को ब्लैकमेल करके एक विशाल आपराधिक जाल खड़ा करना चाहती थी।
अचानक कक्ष का दरवाजा खुला।
रिद्धिमा हाथ में पिस्तौल लिए खड़ी थी। उसके पीछे काव्या थी, जिसके हाथ काँप रहे थे।
—बहुत अच्छा, नंदिनी। तुमने हमारे लिए रास्ता खोल दिया।
रिद्धिमा ने पिस्तौल मीरा की ओर तान दी।
नंदिनी बेटी के सामने खड़ी हो गई।
—पहले मुझे मारना होगा।
—यही तो करने आई हूँ।
काव्या ने अचानक रिद्धिमा का हाथ पकड़ लिया।
गोली छत में जा लगी।
रिद्धिमा ने उसे धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।
—तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?
—मैंने पैसे के लिए अपराध किए, —काव्या रोते हुए बोली, —लेकिन बच्ची को मारने नहीं दूँगी।
रिद्धिमा ने उसकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी।
उसी समय बाहर से भारी धमाका हुआ। मुख्य दरवाजा टूट गया और आवाज गूँजी—
—राजस्थान विशेष अभियान दल! हथियार नीचे रखो!
दर्जनों अधिकारी कक्ष में घुस आए। रिद्धिमा ने भागने की कोशिश की, लेकिन एक महिला अधिकारी ने उसे दबोच लिया। काव्या ने तुरंत हाथ ऊपर कर दिए।
कबीर ने नंदिनी को देखकर राहत की साँस ली। उसके साथ आदित्य के परिवार के पुराने वकील हरिशंकर व्यास भी थे।
हवेली आते समय कबीर ने उन्हें संदेश भेज दिया था। व्यास ने निजी सुरक्षा नहीं, सीधे राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और केंद्रीय जाँच एजेंसी से संपर्क किया था। आदित्य के वीडियो और पहचान-पत्र की प्रतिलिपि पहले ही सुरक्षित स्थान पर भेजी जा चुकी थी। हवेली के बाहर पुलिस ने रिद्धिमा के कई आदमियों को गिरफ्तार कर लिया था।
रिद्धिमा जमीन पर घुटनों के बल बैठी थी। उसका आत्मविश्वास गायब हो चुका था।
—नंदिनी, मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें सब कुछ दे सकती हूँ। खजाने का आधा हिस्सा…
नंदिनी उसके सामने जाकर खड़ी हुई।
—तुमने मेरी कमजोरी को हथियार बनाया। मेरी बेटी के विश्वास को इस्तेमाल किया। एक चिकित्सक बनकर रोगियों की आत्मा पढ़ी और फिर उनके डर से अपना साम्राज्य बनाया। अब तुम्हारी हर सुबह जेल की सलाखों के पीछे होगी।
आदित्य को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। जाँच में उसके शरीर में लंबे समय तक दी गई कई शक्तिशाली दवाओं के प्रमाण मिले। उसके हाथों और पैरों पर बाँधने के निशान थे। भूख, निर्जलीकरण और मानसिक आघात ने उसके शरीर को गंभीर क्षति पहुँचाई थी।
रामदीन काका भी 3 दिन बाद हरियाणा के एक बंद गोदाम से जीवित मिले। उन्हें रिद्धिमा के आदमियों ने कैद कर रखा था। उनकी गवाही ने पूरे षड्यंत्र की कड़ियाँ जोड़ दीं।
जाँच में सामने आया कि रिद्धिमा ने काव्या की झूठी पहचान तैयार करवाई, आदित्य के वैवाहिक जीवन में जानबूझकर गलतफहमियाँ पैदा कीं और उसे यह विश्वास दिलाया कि नंदिनी केवल उसकी संपत्ति चाहती है। दूसरी ओर उसने नंदिनी को बताया कि आदित्य का काव्या से संबंध बहुत पहले से था।
आदित्य दोषहीन नहीं था। उसने पत्नी की बात सुने बिना, अहंकार और धन के नशे में तलाक स्वीकार किया था। उसने मीरा से दूरी बनाई और काव्या की चमकदार दुनिया को परिवार से ऊपर रखा। लेकिन जब उसे षड्यंत्र का पता चला, तब तक वह फँस चुका था।
लगभग 14 महीने चले मुकदमे ने पूरे देश का ध्यान खींचा।
रिद्धिमा को अपहरण, हत्या की साजिश, हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी, अवैध दवाओं के प्रयोग और संगठित अपराध के लिए आजीवन कारावास मिला। आदित्य के माता-पिता की कार से छेड़छाड़ करने वाले लोग भी पकड़े गए।
काव्या को उसके अपराधों के लिए सजा मिली, लेकिन मीरा की जान बचाने, जाँच में सहयोग करने और सभी प्रमाण देने के कारण न्यायालय ने उसकी भूमिका पर अलग विचार किया। उसे लंबी कैद हुई, पर रिद्धिमा से कम। फैसला सुनते समय उसने सिर झुकाकर नंदिनी से केवल इतना कहा—
—माफी माँगने का अधिकार भी खो चुकी हूँ।
राठौड़ परिवार का छिपा सोना सरकार की निगरानी में लिया गया। जिन संपत्तियों के वैध उत्तराधिकारी आदित्य और मीरा थे, उन्हें न्यायालय ने सुरक्षित न्यास में रख दिया। अवैध लेन-देन से जुड़ी संपत्ति जब्त कर दी गई।
आदित्य का जीवन पहले जैसा नहीं हो पाया।
लगातार दी गई दवाओं से उसकी स्मृति और तंत्रिका तंत्र को स्थायी नुकसान हुआ था। वह अब जयपुर के बाहर एक विशेष पुनर्वास केंद्र में रहता था। कई दिनों तक वह किसी को नहीं पहचानता। कभी-कभी वह एक ही सवाल बार-बार पूछता। कभी घंटों बगीचे में बैठा सूखे पत्ते गिनता रहता।
नंदिनी ने उसे क्षमा कर दिया, लेकिन उसके पास वापस नहीं लौटी।
वह मीरा को महीने में 2 बार उससे मिलाने ले जाती थी।
एक दिन मीरा वही पुरानी कपड़े की गुड़िया ठीक करवाकर अपने साथ ले गई। उसने गुड़िया आदित्य की गोद में रखी।
आदित्य लंबे समय तक उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।
—यह… मेरी बहादुर बेटी की है।
मीरा उसके गले लग गई।
नंदिनी कुछ दूरी पर खड़ी रही। उसके भीतर न प्रेम बचा था, न घृणा। केवल एक गहरी करुणा थी उस आदमी के लिए जिसने अपनी महत्वाकांक्षा से परिवार खोया और फिर दूसरों की महत्वाकांक्षा का शिकार बन गया।
न्यास से मिली वैध राशि के एक हिस्से से नंदिनी ने जयपुर में फूलों और पुस्तकों की छोटी-सी दुकान खोली। दुकान के ऊपर वह और मीरा रहने लगीं। उसने अकेली माताओं और घरेलू हिंसा से बची महिलाओं के लिए कानूनी सहायता कोष भी बनाया।
वर्षों तक जिसे लोग छोड़ी हुई पत्नी कहकर दया दिखाते थे, अब वही स्त्री दूसरी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाती थी।
एक शाम मीरा दुकान की खिड़की के पास बैठी अपनी गुड़िया के लिए नया कपड़ा सिल रही थी। उसने अचानक पूछा—
—माँ, यह गुड़िया गंदी थी, फिर भी आपने इसे क्यों नहीं फेंका?
नंदिनी मुस्कराई।
—क्योंकि कभी-कभी सबसे साधारण और टूटी हुई चीज के भीतर भी सच छिपा होता है।
मीरा ने गुड़िया को सीने से लगा लिया।
बाहर सूरज ढल रहा था। दुकान में गेंदे और चमेली की सुगंध फैली थी। नंदिनी ने बेटी को देखा और समझ गई कि उस रात उसकी जीत खजाना पाने में नहीं थी।
उसकी जीत यह थी कि उसने डर के सामने घुटने नहीं टेके।
धोखा सबसे गहरा तब लगता है, जब वह किसी शत्रु से नहीं, उस व्यक्ति से मिले जो आँसू पोंछते समय कंधे पर हाथ रखता है। लालच इंसान को नाम, चेहरा और रिश्ते बदलने पर मजबूर कर सकता है, लेकिन एक माँ के भीतर अपने बच्चे को बचाने की जो शक्ति होती है, उसे कोई दवा, कोई षड्यंत्र और कोई बंद दरवाजा नहीं मिटा सकता।
जिस गुड़िया को नंदिनी ने कूड़े में फेंकना चाहा था, वही आज उनकी दुकान के सबसे ऊँचे स्थान पर काँच के भीतर रखी थी।
उसके नीचे केवल 1 पंक्ति लिखी थी—
“सच कितना भी फटा-पुराना क्यों न दिखे, एक दिन उसकी सिलाई खुलती जरूर है।”
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.