
PART 1
—मम्मा, पापा ऊपर वाली बरसाती में छिपे हैं… और रात को बहुत रोते हैं।
3 साल के कबीर की फुसफुसाहट सुनते ही नंदिनी के हाथ से दूध का गिलास छूटते-छूटते बचा। उसने बेटे को सीने से लगाकर उसके माथे पर हाथ रखा। बुखार नहीं था, फिर भी उसकी आंखों में अजीब-सा डर था।
—पापा सिंगापुर में हैं, बेटा। बहुत दूर।
कबीर ने तुरंत सिर हिलाया।
—नहीं। जब आप अस्पताल जाती हो, पापा नीचे आते हैं। मुझे बिस्कुट देते हैं। बोलते हैं, मम्मा को मत बताना, बुरे अंकल उन्हें ढूंढ़ रहे हैं।
नंदिनी की सांस अटक गई।
उसका पति अरविंद पिछले 4 महीनों से सिंगापुर में था। कम-से-कम उसे यही बताया गया था। गुरुग्राम की बड़ी दवा कंपनी आरोग्यजेन बायोटेक ने उसे एक महत्वपूर्ण परियोजना के लिए भेजा था। हर रात उनकी वीडियो कॉल होती। अरविंद होटल का कमरा दिखाता, खिड़की के बाहर चमकती इमारतें दिखाता और कबीर से कहता कि लौटते समय उसके लिए खिलौना ट्रेन लाएगा।
फिर वह उनकी ही छत पर कैसे हो सकता था?
उनके गुरुग्राम वाले दोमंजिला घर में सीढ़ियों के ऊपर एक छोटी बरसाती थी, जिसमें पुराने सूटकेस, दिवाली की लड़ियां और टूटे फर्नीचर रखे थे। उसका दरवाजा बाहर से ताले में बंद रहता था।
उस रात 3 बजे नंदिनी कुर्सी लगाकर ऊपर चढ़ी। ताला धूल से ढका था। उसने कांपते हाथों से चाबी घुमाई और मोबाइल की रोशनी अंदर डाली।
वहां केवल मकड़ी के जाले, डिब्बे और पुरानी लकड़ी की अलमारी थी।
न कोई आदमी।
न कोई आहट।
अगली शाम अरविंद ने हमेशा की तरह फोन किया। धूसर रंग की जैकेट, हाथ में कॉफी और पीछे वही होटल का कमरा।
—तुम थकी हुई लग रही हो, नंदू।
नंदिनी कुछ क्षण उसका चेहरा देखती रही।
—कबीर कह रहा था कि तुम घर में हो।
अरविंद हंस पड़ा।
—उसे मेरी बहुत याद आ रही होगी।
नंदिनी ने अपने डर को बच्चे की कल्पना मान लिया। मगर 5 दिन बाद कबीर ने कहा कि पापा ने उसे स्ट्रॉबेरी वाले बिस्कुट दिए हैं। रसोई की सबसे ऊंची अलमारी में छिपा पैकेट खुला पड़ा था।
कामवाली कमला ने साफ कहा कि उसने कबीर को कोई मिठाई नहीं दी।
अगली सुबह नंदिनी ने कबीर को स्कूल छोड़ा, लेकिन अस्पताल नहीं गई। उसने एक पुराना मोबाइल बैठक में किताबों के बीच छिपाकर रिकॉर्डिंग चालू कर दी और बाहर निकल गई।
दोपहर में लौटी तो वीडियो देखते हुए उसकी उंगलियां सुन्न हो गईं।
सुबह 9 बजकर 41 मिनट पर सीढ़ियों के ऊपर एक दुबली परछाईं दिखाई दी। एक आदमी सावधानी से नीचे उतरा, रसोई में गया और पानी पीने लगा।
चेहरा धुंधला था।
लेकिन उसकी चाल अरविंद की थी।
और उसके पैरों में वही नीली चप्पलें थीं, जो नंदिनी ने उनकी पिछली शादी की सालगिरह पर खरीदी थीं।
PART 2
अगले दिन नंदिनी ने बरसाती के सामने एक छोटा कैमरा छिपा दिया। सुबह 9 बजकर 36 मिनट पर दरवाजा अंदर से खुला। बाहर लगा ताला बंद नहीं था, केवल दिखावे के लिए अटका था।
अरविंद नंगे पैर नीचे उतरा। बढ़ी हुई दाढ़ी, धंसी आंखें, सूखा चेहरा और शरीर पर वही नीला कुर्ता, जिसे नंदिनी ने दिया था। उसने सूखी रोटी खाई, कबीर के कमरे में जाकर उसका खिलौना हाथी सीने से लगाया और फर्श पर बैठकर रोने लगा।
उसी समय नंदिनी के मोबाइल पर सिंगापुर से अरविंद की वीडियो कॉल आई।
स्क्रीन पर उसका पति मुस्करा रहा था।
—आज जल्दी घर आओगी?
नंदिनी को उल्टी आने लगी।
शनिवार को उसने कबीर को सास-ससुर के घर भेजा और अंधेरे में रसोई के पास बैठ गई। आधी रात को कदमों की आहट आई।
रोशनी जलते ही अरविंद के हाथ से गिलास गिर गया।
—मुझे माफ कर दो, नंदिनी।
—फिर मुझे रोज फोन कौन करता है?
अरविंद घुटनों पर गिर पड़ा।
—मैं कभी सिंगापुर गया ही नहीं।
तभी नंदिनी के मोबाइल पर उसी नकली अरविंद की कॉल आई।
इस बार स्क्रीन वाला चेहरा मुस्कराया नहीं।
—24 घंटे में सबूत दे दो, वरना अगली बार तुम्हारा बेटा घर नहीं लौटेगा।
PART 3
नंदिनी ने कांपते हाथों से फोन काट दिया। कुछ क्षण तक रसोई में केवल टूटे गिलास के टुकड़ों पर गिरती पानी की बूंदों की आवाज सुनाई देती रही। सामने बैठा अरविंद इतना कमजोर लग रहा था कि जैसे हल्की हवा भी उसे गिरा देगी।
लेकिन नंदिनी के भीतर दया से पहले गुस्सा उठा।
उसने अरविंद की कमीज पकड़ ली।
—तुमने मुझे 4 महीने तक झूठ में रखा। कबीर तुम्हें छत में छिपा देखकर डरता रहा। कोई हमारे बेटे को मारने की धमकी दे रहा है और तुम्हें लगा कि मुझे कुछ बताना जरूरी नहीं?
अरविंद ने नजरें नीचे कर लीं।
—मुझे लगा था कि सच जानकर तुम खतरे में पड़ जाओगी।
—हम पहले से खतरे में हैं!
नंदिनी की आवाज इतनी तेज थी कि दीवार पर लगी घड़ी तक हिलती हुई लगी।
अरविंद ने बरसाती से एक छोटी काली यूएसबी निकालकर मेज पर रखी। वह साधारण-सी वस्तु थी, मगर उसे देखते समय उसकी आंखों में ऐसा भय था जैसे सामने विस्फोटक पड़ा हो।
आरोग्यजेन बायोटेक एक नई जीन-आधारित दवा तैयार कर रही थी। उसका नाम एजी-17 था। कंपनी दावा कर रही थी कि वह दुर्लभ तंत्रिका रोग से पीड़ित बच्चों के लिए चमत्कार साबित होगी। समाचार चैनलों पर कंपनी के मालिक राघव मल्होत्रा को देश का दूरदर्शी उद्योगपति बताया जा रहा था। मंत्री उसके कार्यक्रमों में जाते थे, अस्पतालों के बड़े डॉक्टर उसके साथ तस्वीरें खिंचवाते थे और विदेशी निवेशक करोड़ों रुपये लगाने वाले थे।
अरविंद उस दवा के परीक्षणों की निगरानी करने वाली टीम में था।
शुरुआती परिणाम भयावह थे। कई मरीजों के हाथ-पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। कुछ की याददाश्त चली गई थी। 6 लोगों की मौत हो चुकी थी, जिनमें 2 किशोर थे।
कंपनी ने रिपोर्ट में उनकी मृत्यु का कारण पहले से मौजूद बीमारियां लिख दिया।
जब अरविंद ने विरोध किया, तो उसके वरिष्ठ अधिकारी ने उसे समझाया था कि इतने बड़े शोध में कुछ मौतें सामान्य मानी जाती हैं। मगर अरविंद ने मरीजों की मूल जांच रिपोर्ट, प्रयोगशाला के आंकड़े और अंदरूनी ईमेल देखे थे। दवा की मात्रा जानबूझकर बढ़ाई गई थी, ताकि परीक्षण जल्दी पूरे किए जा सकें।
राघव मल्होत्रा ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन में बैठे कुछ अधिकारियों तक रिश्वत पहुंचाई थी। मंजूरी मिलते ही कंपनी का मूल्य कई गुना बढ़ जाता।
अरविंद ने सभी मूल आंकड़ों की प्रति बना ली।
इसके बाद उसका पीछा शुरू हुआ।
एक रात उसकी कार का ब्रेक अचानक काम करना बंद कर गया। किसी तरह वह सड़क किनारे बने मिट्टी के ढेर से टकराकर बचा। अगले दिन कबीर के स्कूल की तस्वीर उसके कार्यालय की मेज पर रखी मिली। तस्वीर के पीछे लिखा था—परिवार कमजोर लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी होता है।
तभी अरविंद ने समीर चौहान से संपर्क किया था। समीर पहले सैन्य खुफिया विभाग से जुड़ा था और अब बड़ी कंपनियों के सुरक्षा मामलों में सलाह देता था। उसने योजना बनाई कि दुनिया को विश्वास दिलाया जाए कि अरविंद देश से बाहर चला गया है।
हवाई अड्डे तक अरविंद की कार गई। उसके नाम का टिकट खरीदा गया। नकली यात्रा विवरण तैयार हुआ। एक कलाकार ने अरविंद की चाल, बोलने का तरीका और चेहरे के भाव सीखे। कृत्रिम चेहरे और आवाज की तकनीक से वह हर रात नंदिनी को फोन करता था।
समीर का कहना था कि जब तक वह सबूत पत्रकारों और ईमानदार अधिकारियों तक नहीं पहुंचा देता, अरविंद बिना मोबाइल और इंटरनेट के अपने ही घर की बरसाती में छिपा रहेगा। बाहरी लोग उस जगह की जांच नहीं करेंगे, क्योंकि सभी को विश्वास होगा कि अरविंद सिंगापुर में है।
—तो तुमने सोचा, उसी घर में छिपना सुरक्षित है जहां तुम्हारी पत्नी और बच्चा रहते हैं? नंदिनी ने पूछा।
—समीर ने कहा था कि मुझे कहीं बाहर रखा गया तो निगरानी कैमरों या पहचान पत्र से पकड़ा जा सकता हूं। यहां किसी को शक नहीं होता। उसने कहा था कि 10 दिन में सब खत्म हो जाएगा।
—लेकिन 4 महीने बीत गए।
अरविंद की आंखें भर आईं।
शुरू के दिनों में समीर उसे बरसाती में खाना और दवाइयां छोड़ जाता था। फिर उसके संदेश कम होने लगे। 3 सप्ताह पहले संपर्क पूरी तरह टूट गया। अरविंद के पास केवल एक सुरक्षित फोन था, जिससे वह संदेश प्राप्त कर सकता था, भेज नहीं सकता था।
इधर नकली वीडियो कॉल लगातार आती रहीं।
यानी जिस आदमी को समीर ने अरविंद का रूप दिया था, वह अब किसी और के लिए काम कर रहा था।
नंदिनी को अचानक अपने कॉलेज के मित्र विवेक की बात याद आई। विवेक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ था। कुछ दिन पहले नंदिनी ने उससे अरविंद के एक संदिग्ध संदेश की तकनीकी जानकारी निकलवाई थी। अंतिम सक्रिय संकेत सिंगापुर से नहीं, उनके घर से केवल 2 गलियां दूर मिला था।
किसी ने उनके घर पर नजर रखने के लिए उपकरण लगाया था।
नंदिनी ने तुरंत खिड़की के पर्दे बंद किए। फिर उसने सबसे पहले कबीर के स्कूल में फोन किया। पता चला कि दोपहर में एक अनजान व्यक्ति ने खुद को अरविंद का सहायक बताकर कबीर के बारे में जानकारी मांगी थी।
उसका गला सूख गया।
—कबीर अभी तुम्हारे माता-पिता के घर है, लेकिन वे लोग वहां भी पहुंच सकते हैं।
दोनों ने जल्दी से जरूरी कपड़े, दस्तावेज और कुछ नकद एक बैग में रखा। अरविंद ने कहा कि पुलिस के पास जाना जोखिम भरा है, क्योंकि कंपनी के लोग पहले से कई अधिकारियों को खरीद चुके होंगे।
नंदिनी ने उसकी ओर कठोर नजरों से देखा।
—अब फैसले अकेले तुम नहीं करोगे।
उसने सीधे अपनी बड़ी बहन अदिति को फोन किया, जो दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में सहायक पुलिस आयुक्त थी। नंदिनी ने सब कुछ नहीं बताया। बस इतना कहा कि कबीर की जान को खतरा है और उसे बिना वर्दी वाले भरोसेमंद अधिकारियों की मदद चाहिए।
अदिति ने उसकी आवाज सुनते ही सवाल पूछना बंद कर दिया।
—घर से बाहर मत निकलना। मैं 20 मिनट में पहुंच रही हूं।
लेकिन 20 मिनट बहुत देर साबित हुए।
मुख्य दरवाजे के बाहर किसी वाहन के रुकने की आवाज आई। फिर घंटी बजी।
नंदिनी और अरविंद स्थिर हो गए।
बाहर से एक शांत आवाज आई।
—मैडम, सोसाइटी कार्यालय से आए हैं। पानी की लाइन जांचनी है।
नंदिनी ने दरवाजे के पास लगे कैमरे की स्क्रीन देखी। बाहर 2 आदमी खड़े थे। दोनों ने रखरखाव कर्मचारियों जैसी वर्दी पहन रखी थी, मगर उनके जूते नए और महंगे थे। एक आदमी बार-बार अपने कान में लगे छोटे यंत्र को छू रहा था।
अरविंद ने फुसफुसाकर कहा—
—ये वही लोग हैं।
दूसरी बार घंटी नहीं बजी। सीधे दरवाजे का हैंडल हिलाया गया।
फिर बाहर से धातु काटने जैसी आवाज आने लगी।
नंदिनी ने कबीर के कमरे की खिड़की खोली। पीछे पड़ोसी का छोटा बगीचा था। उसने पहले बैग फेंका, फिर अरविंद को सहारा देकर बाहर उतारा। अरविंद के पैरों में महीनों तक छिपे रहने से ताकत नहीं बची थी।
वे पड़ोसी की दीवार पार करके पिछली गली में पहुंचे। तभी सामने एक सफेद कार आकर रुकी। नंदिनी पीछे हट गई, मगर चालक की सीट से अदिति उतरी।
—जल्दी बैठो!
कार चलाते हुए अदिति ने बताया कि उसने कबीर को उसके दादा-दादी के घर से पहले ही सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है। उसकी टीम ने सोसाइटी के बाहर 2 संदिग्ध गाड़ियां देखी थीं।
वे सीधे पुलिस थाने नहीं गए। अदिति उन्हें दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित एक सरकारी अतिथि गृह के पुराने हिस्से में ले गई, जिसका उपयोग संवेदनशील गवाहों को अस्थायी रूप से रखने के लिए होता था।
वहां पहुंचते ही अरविंद ने यूएसबी अदिति को दे दी।
मगर उसे कंप्यूटर में लगाते ही पासवर्ड मांगा गया।
अरविंद ने पासवर्ड डाला। स्क्रीन पर कोई दस्तावेज नहीं खुला। केवल एक संदेश दिखाई दिया—
“फाइलें 72 घंटे पहले मिटाई जा चुकी हैं।”
अरविंद का चेहरा सफेद पड़ गया।
—यह असंभव है। यह यूएसबी हमेशा मेरे पास थी।
अदिति ने उपकरण को ध्यान से देखा। फिर बोली—
—यह तुम्हारी असली यूएसबी नहीं है।
बरसाती में किसी ने प्रवेश करके उसे बदल दिया था।
नंदिनी को कबीर की बात याद आई—पापा मेरे लिए बिस्कुट लाते हैं। मगर जिस दिन उसने बिस्कुट का पैकेट खुला देखा था, अरविंद ने दावा किया कि वह नीचे आया ही नहीं था।
उस दिन घर में कोई तीसरा आदमी भी मौजूद था।
कमला।
नंदिनी ने तुरंत कामवाली का नंबर मिलाया। फोन बंद था। सोसाइटी के प्रवेश अभिलेख जांचे गए तो पता चला कि कमला का असली नाम कमला देवी नहीं था। उसने नौकरी के समय नकली पहचान पत्र दिया था। वह केवल 5 महीने पहले उनके घर काम करने आई थी—अरविंद की कथित विदेश यात्रा से ठीक 1 महीना पहले।
नंदिनी के मन में पिछले महीनों के दृश्य दौड़ गए। कमला हमेशा ऊपर के गलियारे की सफाई करने पर जोर देती थी। वह कबीर को पार्क ले जाने का समय खुद चुनती थी। घर की चाबियों की जगह उसे पता थी।
वह राघव मल्होत्रा के लोगों की जासूस थी।
अरविंद ने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।
—मैंने असली सबूत खो दिए।
—नहीं, नंदिनी ने कहा, तुमने उनकी एक प्रति बनाई थी। मूल आंकड़े कंपनी की प्रणाली में कभी न कभी मौजूद रहे होंगे। उन्हें पूरी तरह मिटाना आसान नहीं है।
विवेक को अतिथि गृह बुलाया गया। उसने बदली हुई यूएसबी का तकनीकी परीक्षण किया। उसमें दस्तावेज नहीं थे, मगर एक छिपा हुआ निगरानी कार्यक्रम था। जैसे ही उसे किसी इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटर में लगाया जाता, वह उस स्थान का पता भेज देता।
अदिति ने तुरंत वह कंप्यूटर बंद करवाया।
—वे अब जान चुके होंगे कि हम यहां हैं।
उसी क्षण बाहर गोली जैसी तेज आवाज हुई। खिड़की का शीशा टूटकर कमरे में बिखर गया। अदिति ने सबको जमीन पर झुकने को कहा। बाहर तैनात सिपाहियों ने जवाबी कार्रवाई नहीं की, क्योंकि हमला करने वाला केवल चेतावनी देकर भाग गया था।
टूटी खिड़की के पास एक कागज पड़ा था।
उस पर कबीर की स्कूल की तस्वीर चिपकी थी।
नीचे लिखा था—
“सुबह 10 बजे एंबियंस मॉल की भूमिगत पार्किंग। अरविंद अकेला आए। असली आंकड़े नहीं मिले तो बच्चा अगली तस्वीर में मुस्कराता हुआ नहीं होगा।”
नंदिनी की चीख निकल गई।
अदिति ने तुरंत कबीर की सुरक्षा जांची। जिस पुलिसकर्मी को उसकी निगरानी पर लगाया गया था, वह बेहोश मिला। जिस घर में कबीर को रखा गया था, वहां पीछे की खिड़की खुली थी।
कबीर गायब था।
अरविंद दीवार से लगकर नीचे बैठ गया। उसकी आंखों में जीवन समाप्त हो चुका था।
—यह मेरी गलती है।
नंदिनी ने उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा।
—अभी टूटने का समय नहीं है। हमारा बेटा तुम्हारे रोने से वापस नहीं आएगा।
रात भर अदिति की टीम ने कैमरे खंगाले। एक नीली कार कबीर को लेकर पश्चिमी दिल्ली की ओर गई थी। उसकी नंबर प्लेट नकली थी। दूसरी ओर विवेक ने पता लगाया कि नकली वीडियो कॉल करने वाला व्यक्ति हर बार पहले से रिकॉर्ड की गई पृष्ठभूमि का उपयोग कर रहा था। उसकी अंतिम कॉल के दौरान पीछे एक मंदिर की घंटी और रेलगाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया था।
दिल्ली में ऐसी ध्वनि एक साथ कुछ ही इलाकों में सुनाई देती थी।
विवेक ने पुराने ऑडियो से समय और दूरी का अनुमान लगाया। संभावित स्थान नजफगढ़ के पास एक बंद गोदाम निकला, जो आरोग्यजेन की सहायक परिवहन कंपनी के नाम पर था।
अदिति ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी, मगर औपचारिक छापे की अनुमति में समय लगता। तभी उसे पता चला कि राघव मल्होत्रा ने पहले ही समाचार चैनलों पर बयान जारी कर दिया है कि मानसिक तनाव से पीड़ित एक पूर्व कर्मचारी ने कंपनी से गोपनीय जानकारी चुराकर परिवार सहित फरार होने की कोशिश की है।
अरविंद को अपराधी बनाया जा रहा था।
सुबह होने से पहले नंदिनी ने निर्णय लिया।
अरविंद तय समय पर मॉल की पार्किंग जाएगा। बदली हुई यूएसबी उनके लोगों को देगा। उसके कपड़ों में आवाज और स्थान भेजने वाला छोटा यंत्र लगाया जाएगा। साथ ही अदिति की दूसरी टीम गोदाम पर जाएगी।
सुबह 9 बजकर 50 मिनट पर पार्किंग लगभग खाली थी। अरविंद अकेला आगे बढ़ा। नंदिनी और अदिति कुछ दूरी पर बंद गाड़ी में थीं।
दो काली एसयूवी ने अरविंद का रास्ता घेर लिया। 4 आदमी उतरे। उनके बीच से धूसर जैकेट पहने एक व्यक्ति बाहर आया।
नंदिनी ने उसे पहचान लिया।
वही चेहरा जो हर रात उसके मोबाइल पर मुस्कराता था।
वह अभिनेता नहीं, आरोग्यजेन की डिजिटल संचार शाखा का प्रमुख करण सूद था। उसने कृत्रिम चेहरे और आवाज की तकनीक का उपयोग करके अरविंद का रूप बनाया था।
करण ने यूएसबी लेकर लैपटॉप में लगाई। स्क्रीन पर कोई उपयोगी फाइल न देखकर उसका चेहरा कठोर हो गया।
—हमें बेवकूफ समझा है?
—मेरा बेटा कहां है? अरविंद चिल्लाया।
करण मुस्कराया।
—तुम्हारा बेटा उस जगह है जहां समीर चौहान पिछले 3 सप्ताह से था।
नंदिनी की रीढ़ में ठंड उतर गई।
समीर मरा नहीं था। उसे कैद किया गया था।
करण ने अरविंद को गाड़ी में धकेलने का आदेश दिया। तभी पार्किंग के सभी रास्तों पर पुलिस की गाड़ियां आकर रुक गईं। अदिति ने लाउडस्पीकर पर आत्मसमर्पण की चेतावनी दी।
करण के आदमी हथियार निकालने लगे, मगर उसी समय उनके मोबाइल एक साथ बज उठे। समाचार संदेशों में लिखा था कि प्रवर्तन निदेशालय ने आरोग्यजेन के 11 बैंक खाते अस्थायी रूप से रोक दिए हैं और कंपनी के मुख्य कार्यालय पर तलाशी चल रही है।
करण का चेहरा बदल गया।
—यह कैसे हुआ?
एक घायल आदमी पार्किंग की दूसरी ओर से लड़खड़ाता हुआ निकला।
वह समीर था।
उसके माथे पर पट्टी बंधी थी, हाथ में दस्तावेजों का मोटा लिफाफा था और उसके पीछे केंद्रीय जांच दल के अधिकारी चल रहे थे।
—क्योंकि असली सबूत अरविंद की यूएसबी में कभी थे ही नहीं, समीर ने कहा।
अरविंद उसे देखता रह गया।
समीर ने बताया कि शुरुआत से उसे शक था कि कंपनी उनके बीच किसी जासूस को भेजेगी। इसलिए उसने अरविंद से बनवाई गई प्रति को केवल चारे की तरह इस्तेमाल किया। असली आंकड़े उसने 3 अलग स्थानों पर सुरक्षित कर दिए थे। उसके पास रिश्वत की बैंक प्रविष्टियां, अधिकारियों से हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग और मृत मरीजों की मूल चिकित्सा रिपोर्ट थीं।
करण ने उसे पकड़वाकर एक गोदाम में बंद रखा था। मगर पिछली रात गोदाम में बिजली बंद होने पर वह एक सुरक्षा कर्मचारी की मदद से भाग निकला। वही कर्मचारी 2 साल पहले एजी-17 के परीक्षण में अपना छोटा भाई खो चुका था।
करण के आदमियों ने चारों ओर पुलिस देखकर हथियार नीचे रख दिए। उन्हें समझ आ गया था कि राघव के खाते बंद हो चुके हैं और अब कोई उन्हें बचाने नहीं आएगा।
लेकिन कबीर अभी भी नहीं मिला था।
गोदाम पर पहुंची पुलिस टीम को एक बंद कमरा मिला। अंदर कबीर कुर्सी से बंधा था। उसके पास बैठी कमला रो रही थी।
उसने कबीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था।
कमला का असली नाम माया था। उसकी 17 साल की बेटी भी एजी-17 के परीक्षण में शामिल थी और इलाज के 12 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई थी। कंपनी ने माया को पैसे देकर चुप रहने पर मजबूर किया। बाद में करण ने धमकी दी कि अगर उसने अरविंद के घर में नौकरी करके जानकारी नहीं जुटाई, तो उसकी छोटी बेटी को झूठे मामले में फंसा दिया जाएगा।
माया ने यूएसबी बदली थी, मगर कबीर को अगवा करने का आदेश मिलने पर उसका साहस टूट गया। उसने पुलिस के आने तक बच्चे की रक्षा की और गोदाम का पिछला दरवाजा खुला छोड़ दिया, जिससे समीर भाग सका।
जब नंदिनी वहां पहुंची तो कबीर दौड़कर उससे लिपट गया।
—मम्मा, मैंने रोया नहीं। माया आंटी ने कहा था आप जरूर आओगी।
नंदिनी उसे सीने से लगाए जमीन पर बैठ गई। उसके आंसू कबीर के बालों में गिरते रहे। कुछ दूरी पर अरविंद खड़ा था, मगर बेटे के पास जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
कबीर ने खुद हाथ बढ़ाया।
—पापा, अब आप छत में मत जाना।
अरविंद घुटनों के बल गिरा और बेटे को बाहों में भर लिया।
उसी दिन जांच दल ने राघव मल्होत्रा के गुरुग्राम स्थित घर, कंपनी कार्यालय और निजी फार्महाउस पर छापे मारे। रात को उसे दिल्ली हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया, जहां वह निजी विमान से देश छोड़ने की कोशिश कर रहा था।
2 दिन बाद जांच पत्रकार मीरा सेन ने पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की—
“चमत्कारी दवा के पीछे छिपी 6 मौतें और करोड़ों की रिश्वत।”
देशभर में आक्रोश फैल गया। मृत मरीजों के परिवार सामने आए। आरोग्यजेन के परीक्षण रोक दिए गए। रिश्वत लेने वाले अधिकारियों को निलंबित किया गया। करण सूद ने पूछताछ में तकनीकी धोखाधड़ी, अपहरण और धमकियों की बात स्वीकार कर ली।
माया को सरकारी गवाह बनाया गया। अदालत ने उसकी मजबूरी और कबीर की जान बचाने में उसकी भूमिका को ध्यान में रखते हुए उसे सुरक्षा दी।
अरविंद को भी तुरंत नायक घोषित नहीं किया गया। जांच अधिकारियों ने उससे कठिन सवाल पूछे। नंदिनी ने भी उसे आसानी से क्षमा नहीं किया। वह जानती थी कि उसने परिवार को बचाने की कोशिश की थी, लेकिन पत्नी को अंधेरे में रखना और बच्चे को महीनों तक भय के बीच जीने देना सही नहीं था।
कई सप्ताह तक दोनों ने परामर्श लिया। अरविंद ने पहली बार स्वीकार किया कि साहस का अर्थ अकेले सब कुछ सहना नहीं होता। कभी-कभी सच बताना, मदद मांगना और अपने परिवार को निर्णय में शामिल करना भी साहस होता है।
एक महीने बाद वे घर लौटे।
कबीर सबसे पहले सीढ़ियों की ओर भागा। उसने ऊपर बरसाती के दरवाजे को देखा और धीरे से पूछा—
—पापा, वहां बहुत अंधेरा था?
अरविंद उसके पास बैठ गया।
—बहुत अंधेरा था।
—आप डरते थे?
अरविंद की आंखें भर आईं।
—हर दिन।
कबीर ने अपनी छोटी हथेली उसके गाल पर रखी।
—अगली बार मुझे बुला लेना। मैं अपनी टॉर्च ले आऊंगा।
उस एक वाक्य ने अरविंद को तोड़ दिया। उसने बेटे को सीने से लगाकर इतना रोया कि नंदिनी को भी मुंह फेरना पड़ा।
अगले रविवार उन्होंने मजदूर बुलाकर बरसाती का गुप्त दरवाजा बंद करवा दिया। छत पर नया प्लास्टर लगा और पूरे गलियारे को सफेद रंग से रंग दिया गया।
कुछ महीनों बाद अरविंद ने दवा कंपनी की नौकरी छोड़ दी। वह एक स्वतंत्र संस्था के साथ काम करने लगा, जो चिकित्सकीय परीक्षणों में मरीजों के अधिकारों की रक्षा करती थी। नंदिनी ने अस्पताल में उन परिवारों के लिए सहायता समूह शुरू किया, जिनके प्रियजन लापरवाह परीक्षणों का शिकार हुए थे।
राघव मल्होत्रा की चमकदार तस्वीरें धीरे-धीरे समाचारों से गायब हो गईं। उनकी जगह अदालत में झुके उसके चेहरे और न्याय मांगते परिवारों की तस्वीरें दिखाई देने लगीं।
फिर भी नंदिनी के लिए कहानी अदालत के निर्णय पर समाप्त नहीं हुई।
कभी-कभी आधी रात को घर शांत होता, तो वह सीढ़ियों पर बैठकर उस चिकनी सफेद छत को देखती। कोई बाहरी व्यक्ति कभी अनुमान नहीं लगा सकता था कि वहां कभी एक दरवाजा था।
उसी अंधेरे के पीछे उसका पति कई सप्ताह तक सूखी रोटियां खाकर जीवित रहा था। वहीं उसने अपने बेटे के खिलौनों को गले लगाकर रोते हुए हर आहट में मृत्यु की आशंका सुनी थी।
और उसी घर में एक 3 साल का बच्चा सबकी आंखों से छिपी सच्चाई देख रहा था।
कबीर को दवा कंपनियों, रिश्वत, नकली चेहरों या शक्तिशाली उद्योगपतियों की समझ नहीं थी।
वह केवल इतना जानता था कि उसके पापा ऊपर छिपे हैं।
उसके पापा रो रहे हैं।
और जब कोई अपना अंधेरे में रो रहा हो, तो उसकी आवाज छोटी होने पर भी अनसुनी नहीं करनी चाहिए।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.