
भाग 1:
जज अरविंद त्रिवेदी ने 5 साल की बच्ची पर पूरी अदालत के सामने हँसते हुए कहा, “जिसे बुलाना है बुला लो,” और अगले ही पल उसी फोन से निकली आवाज़ ने उनके 34 साल पुराने घमंड को चूर-चूर कर दिया।
लखनऊ फैमिली कोर्ट की तीसरी मंज़िल पर उस दोपहर अजीब-सी घुटन थी। बाहर बरामदे में चाय वालों की आवाज़ें गूंज रही थीं, वकीलों की काली कोटों की भीड़ इधर-उधर भाग रही थी, और अंदर कोर्ट नंबर 7 में सबकी निगाहें एक नन्ही बच्ची पर टिक गई थीं।
उसका नाम तारा था।
5 साल की तारा, गुलाबी फ्रॉक, दो छोटी चोटियाँ, माथे पर टेढ़ी-सी काली बिंदी और हाथ में एक महंगा मोबाइल। उसके छोटे-छोटे जूते लकड़ी की फर्श को बस हल्का-सा छू रहे थे, जैसे वह अदालत में नहीं, किसी स्कूल के नाटक में खड़ी हो।
लेकिन उसकी आँखें खेल नहीं खेल रही थीं।
वह फोन कान से लगाए खड़ी थी, बिल्कुल शांत, बिल्कुल ज़िद्दी, जैसे उसे पता था कि इस कमरे में सच बोलने की हिम्मत सिर्फ उसी में बची है।
मोबाइल एडवोकेट संदीप मल्होत्रा का था, जो शहर में ऐसे तलाक और कस्टडी केस जीतने के लिए मशहूर था, जहाँ पैसे वाले पिता माँ को कमजोर, पागल या लापरवाह साबित कर देते थे। संदीप अभी अपनी फाइलें पलट ही रहा था कि तारा ने उसकी कोट की जेब से फोन निकाल लिया था। इतना साफ, इतना तेज, जैसे किसी ने उसे यह काम सिखाया हो।
पीछे दूसरी बेंच पर बैठी शालिनी ने बस अपना पल्लू ठीक किया था। वह तारा की नानी नहीं, बल्कि अरविंद त्रिवेदी की पूर्व पत्नी और तारा की नानी जैसी परछाईं थी। असल में वह तारा की दादी नहीं थी, मगर रिश्तों में टूटे हुए लोग अक्सर नाम से नहीं, दर्द से जुड़ते हैं। शालिनी ही तारा को कोर्ट लेकर आई थी, क्योंकि बच्ची बार-बार कह रही थी कि उसे “काले कपड़े वाले बड़े नाना” को कुछ दिखाना है।
जज अरविंद त्रिवेदी ने चश्मे के ऊपर से बच्ची को देखा।
उनकी उम्र 63 थी। सफेद बाल, सख्त चेहरा, भारी आवाज़ और ऐसी प्रतिष्ठा कि कोर्ट में कोई उनकी बात काटने की हिम्मत नहीं करता था। लखनऊ बार में लोग कहते थे कि त्रिवेदी साहब इंसाफ करते नहीं, इंसाफ बनकर बैठते हैं।
उन्हें नहीं पता था कि आज उनका अपना घर कटघरे में खड़ा होने वाला था।
—ये क्या तमाशा है? बच्ची यहाँ कैसे आई?
कोर्ट मुंशी ने घबराकर फाइल बंद कर दी। चपरासी मोहन ने दरवाजे की तरफ देखा, जैसे अभी किसी को बाहर निकालने का आदेश मिलेगा।
तारा ने फोन कान से हटाया भी नहीं।
—मैं कॉल कर रही हूँ।
कुछ वकील हँस पड़े। किसी ने धीरे से कहा, “आजकल के बच्चे भी…”
जज अरविंद ने अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए पूछा:
—किसे कॉल कर रही हो?
तारा ने उनकी आँखों में देखा।
—जिसे मुझे करना है।
इस बार हँसी तेज हो गई।
अरविंद त्रिवेदी भी हँसे। खुलकर। उतना खुलकर जितना वे किसी अपराधी को डाँटते समय भी नहीं हँसते थे। अदालत का तनाव कुछ पल को टूट गया। संदीप मल्होत्रा ने असहज होकर हाथ आगे बढ़ाया।
—माय लॉर्ड, मेरा फोन…
जज ने हाथ उठाकर रोक दिया।
—रहने दीजिए, मल्होत्रा साहब। बच्ची को करने दीजिए कॉल। देखते हैं किसे बुलाती है।
पहली पंक्ति में बैठे राघव मेहता ने जबड़ा भींच लिया। महंगी शर्ट, चमकते जूते, माथे पर दिखावटी चिंता। वही राघव, जो अपनी पत्नी काव्या से बेटी की पूरी कस्टडी माँग रहा था। उसका दावा था कि काव्या मानसिक रूप से अस्थिर है, बच्ची को संभाल नहीं पा रही, कई-कई दिन गायब रहती है, और उसकी बीमारी सिर्फ एक बहाना है।
बीमारी का सच अदालत में अभी तक पूरी तरह नहीं खुला था।
क्योंकि काव्या इस सुनवाई में मौजूद नहीं थी।
राघव की ओर से यही सबसे बड़ा हथियार था।
—देखिए, माय लॉर्ड, यही तो समस्या है। माँ गायब है, बच्ची असुरक्षित है, और परिवार वाले कोर्ट को सर्कस बना रहे हैं।
तारा ने उसे देखा और धीरे से फोन में कहा:
—हेलो?
अदालत में फिर हल्की हँसी उठी।
फिर अचानक फोन से आवाज़ आई।
कमजोर, काँपती हुई, लेकिन जिंदा।
—तारा? मेरी बच्ची? तू है न?
हँसी वहीं मर गई।
जज अरविंद का चेहरा पत्थर हो गया।
वह आवाज़… वह आवाज़ वे 2 साल से नहीं सुन पाए थे। आखिरी बार जब सुनी थी, तब फोन के दूसरी तरफ उनकी बेटी काव्या रो रही थी और कह रही थी कि राघव उसे तोड़ रहा है, बेटी को हथियार बना रहा है, और उसे पिता की मदद चाहिए। तब अरविंद ने कानून की भाषा में जवाब दिया था—“प्रक्रिया का पालन करो, भावुक मत बनो।”
उसके बाद काव्या ने फोन नहीं किया।
न जन्मदिन पर।
न त्योहार पर।
न बीमारी में।
और आज उसकी आवाज़ एक चुराए हुए फोन से, पूरी अदालत के बीच, उनके सामने आ खड़ी हुई थी।
तारा की आँखें चमक उठीं।
—मम्मा, मैं बड़े कमरे में हूँ। यहाँ एक अंकल ऊपर बैठे हैं। वो मुझ पर हँस रहे थे।
कोई नहीं हिला।
शालिनी के होंठ काँपे।
संदीप मल्होत्रा का चेहरा पीला पड़ गया।
राघव अचानक खड़ा हो गया।
—माय लॉर्ड, यह कॉल गैरकानूनी है। यह पूरी कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश है।
अरविंद त्रिवेदी ने पहली बार उसे ऐसे देखा जैसे वह कोई पक्षकार नहीं, बल्कि घर में घुसा हुआ धोखा हो।
—बैठ जाइए।
राघव बैठ गया, मगर उसकी उंगलियाँ मेज पर बेचैनी से थिरकने लगीं।
फोन पर काव्या की साँस टूट रही थी।
—तारा, बेटा… तुम्हारे साथ शालिनी आंटी हैं?
—हाँ। और वो भी हैं।
तारा ने गर्दन उठाकर जज की तरफ इशारा किया।
—मम्मा, ये वही हैं?
काव्या चुप रही।
तारा ने पूछा:
—क्या ये मेरे नाना हैं?
अरविंद त्रिवेदी की उंगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर जम गईं। सालों तक लोग उन्हें “माननीय न्यायमूर्ति”, “त्रिवेदी साहब”, “कड़क जज” कहते रहे थे। लेकिन इस बच्ची ने उनसे एक ऐसा सवाल पूछा, जिसका फैसला किसी अदालत में नहीं हो सकता था।
उन्होंने धीरे से कहा:
—हाँ… मैं हूँ।
तारा ने फोन में कहा:
—मम्मा, नाना मिल गए।
फोन के उस पार कुछ गिरने की आवाज़ आई। शायद स्टील का गिलास। शायद अस्पताल की ट्रे। शायद 2 साल से दबा हुआ भरोसा।
काव्या की आवाज़ आई:
—पापा?
एक शब्द।
और उस एक शब्द में 34 साल की बेटी, टूटे रिश्ते, बचपन की खाली कुर्सियाँ, माँ-बाप का तलाक, और वह आखिरी शाम सब समा गए जब बेटी ने मदद माँगी थी और पिता ने उसे नियम समझाए थे।
अरविंद धीरे-धीरे कुर्सी से उठे। अदालत हैरान थी। उनका काला गाउन उनके कंधों पर भारी लग रहा था। वे नीचे आए, तारा के सामने घुटनों पर बैठे और फोन अपने दोनों हाथों में लिया।
—काव्या…
लंबी चुप्पी।
फिर बेटी की आवाज़ आई:
—आपको याद है मैं आपकी बेटी हूँ?
अरविंद की आँखें भर आईं, मगर उन्होंने खुद को संभाला।
—तुम कहाँ हो? कोर्ट क्यों नहीं आईं? राघव कह रहा है कि तुम…
काव्या ने बात काट दी।
—राघव झूठ बोल रहा है।
राघव उछलकर खड़ा हुआ।
—यह चरित्र हनन है! माय लॉर्ड, आप भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। यह केस तुरंत ट्रांसफर होना चाहिए।
अरविंद ने उसकी ओर देखा भी नहीं।
—काव्या, सच बताओ।
फोन के दूसरी तरफ काव्या ने जैसे बहुत मुश्किल से शब्द निकाले।
—मैं कानपुर कैंसर सेंटर में हूँ, पापा।
अदालत की हवा ठंडी पड़ गई।
तारा ने नाना की बाँह पकड़ ली।
—कैंसर? कौन-सा कैंसर?
अरविंद की आवाज़ इतनी धीमी थी कि कोर्ट मुंशी को सुनने के लिए झुकना पड़ा।
काव्या बोली:
—स्तन कैंसर। स्टेज 2। 5 महीने से कीमोथेरेपी चल रही है।
शालिनी ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
राघव के चेहरे पर एक पल को डर आया, फिर उसने उसे गुस्से में बदल दिया।
—माय लॉर्ड, यह सब सहानुभूति लेने का नाटक है। बच्ची को बीमार माँ के साथ रखना उसकी जिंदगी से खिलवाड़ है।
तारा अचानक चीखी:
—मम्मा बीमार हैं, बुरी नहीं!
पूरी अदालत चुप।
काव्या रो पड़ी।
अरविंद ने पहली बार अपनी नातिन को देखा। सचमुच देखा। उसके छोटे हाथ, काँपती ठुड्डी, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, और कपड़ों पर चिपका अस्पताल का छोटा-सा स्टिकर।
—तारा, तुम अस्पताल गई थी?
तारा ने सिर हिलाया।
—मम्मा के बाल गिर गए। मैंने कहा कोई बात नहीं, मैं अपनी गुड़िया के बाल काट दूँगी।
अरविंद के भीतर कुछ टूट गया।
तभी संदीप मल्होत्रा ने अचानक आगे बढ़कर फोन छीनने की कोशिश की।
—बस बहुत हुआ। यह मेरे क्लाइंट के खिलाफ भावनात्मक षड्यंत्र है।
तारा डरकर पीछे हट गई। फोन अरविंद के हाथ से छूटते-छूटते बचा। चपरासी मोहन आगे बढ़ा। राघव ने मेज पर मुक्का मारा।
—मुझे मेरी बेटी चाहिए! अभी!
तारा भागकर अरविंद के गाउन के पीछे छिप गई।
और उसी पल फोन पर काव्या की आवाज़ काँपी:
—पापा, अगर आप आज भी चुप रहे… तो राघव मेरी बेटी को मुझसे हमेशा के लिए छीन लेगा।
अरविंद त्रिवेदी ने कोर्टरूम में चारों तरफ देखा। कानून, प्रतिष्ठा, पद, डर—सब सामने खड़े थे। फिर उनकी नजर तारा के छोटे हाथ पर पड़ी, जो उनके गाउन को ऐसे पकड़े था जैसे डूबती हुई बच्ची किनारा पकड़ती है।
तभी तारा ने अपनी फ्रॉक की जेब से मोड़ा हुआ एक कागज निकाला और उनके हाथ में रख दिया।
उस पर क्रेयॉन से बना चित्र था—एक अस्पताल का बिस्तर, बिना बालों वाली माँ, दरवाजे पर चिल्लाता हुआ एक आदमी, और बहुत ऊपर सीढ़ियों पर काले कपड़े पहने एक बूढ़ा आदमी।
नीचे टेढ़े अक्षरों में लिखा था:
“नाना नीचे आओ।”
अरविंद का चेहरा राख जैसा पड़ गया।
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भाग 2:
अरविंद त्रिवेदी उसी फर्श पर घुटनों के बल बैठे रह गए, जैसे अदालत की सारी ऊँचाई अचानक उनके पैरों से खिसक गई हो। तारा उनके पीछे छिपी थी और फोन पर काव्या की टूटी हुई साँसें सुनाई दे रही थीं। काव्या ने बताया कि राघव ने उसकी बीमारी को छिपाकर नहीं, बल्कि हथियार बनाकर इस्तेमाल किया था। उसने अस्पताल से निकलती उसकी कमजोर तस्वीरें संदीप मल्होत्रा को भेजी थीं, ताकि अदालत में साबित किया जा सके कि वह माँ बनने लायक नहीं बची। उसने तारा को 2 दिन एक नौकरानी के पास छोड़ दिया था, जबकि वह खुद नोएडा में एक प्रॉपर्टी डील और किसी और औरत के साथ होटल में था। तारा को तेज बुखार हुआ, और काव्या कीमो के बाद उल्टियाँ करते हुए भी रात में 3 घंटे एम्बुलेंस जैसी पुरानी कैब से उसे लेने पहुँची थी। राघव ने चिल्लाकर कहा कि यह सब झूठ है, लेकिन तारा ने धीरे से अरविंद की बाँह पकड़कर कहा कि पापा दरवाजा बंद करके मम्मा को रोने देते थे। शालिनी उठी और उसने अपने बैग से दवाइयों की पर्चियाँ, अस्पताल की फाइलें और तारा की स्कूल डायरी निकाली, जिसमें 4 हफ्तों से टीचर ने लिखा था कि बच्ची डरकर हर तेज आवाज़ पर मेज के नीचे छिप जाती है। संदीप ने अरविंद के कान के पास आकर फुसफुसाया कि अगर उन्होंने खुद को इस केस से अलग नहीं किया तो मीडिया उनके परिवार को नंगा कर देगा। अरविंद ने उसे ठंडी आँखों से देखा और कहा कि उनका करियर पहले ही उनकी बेटी को खा चुका है। उन्होंने तुरंत कार्यवाही स्थगित की, खुद को केस से अलग करने का आदेश लिखवाया और कोर्ट रिकॉर्ड में यह भी दर्ज कराया कि फोन से मिले संदेशों की जाँच हो। तभी राघव ने गुस्से में तारा की तरफ बढ़कर उसका हाथ पकड़ना चाहा। तारा चीखी। मोहन ने रास्ता रोका, लेकिन राघव ने उसे धक्का दे दिया। अदालत में अफरातफरी मच गई। उसी समय तारा के हाथ से कागज गिरा और उसके पीछे छिपी एक छोटी पेन ड्राइव फर्श पर लुढ़क गई। शालिनी ने काँपती आवाज़ में कहा कि यह काव्या ने भेजी थी, मगर कोई सुनने को तैयार नहीं था। अरविंद ने पेन ड्राइव उठाई। उसमें राघव की आवाज़ रिकॉर्ड थी—“काव्या मर भी गई तो बच्ची और फ्लैट दोनों मेरे होंगे।” यह सुनते ही अदालत में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सच का दरवाजा तोड़ दिया हो।
भाग 3:
अगली सुबह लखनऊ फैमिली कोर्ट के बाहर मीडिया की भीड़ थी। कैमरे, माइक, चैनलों के वैन, पुलिस की रस्सियाँ, और बीच में एक खबर जो आग की तरह फैल चुकी थी—वरिष्ठ जज अरविंद त्रिवेदी ने अपनी ही बेटी से जुड़े कस्टडी मामले से खुद को अलग कर लिया था और केस में संभावित धोखाधड़ी, दबाव, धमकी और बच्ची के मानसिक शोषण की जाँच की मांग की थी।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह नहीं थी।
सबसे बड़ी बात वह पेन ड्राइव थी, जो 5 साल की तारा की ड्राइंग के पीछे छिपी मिली थी।
काव्या ने उसे शालिनी को इसलिए भेजा था कि अगर वह इलाज के दौरान बोल न पाए, तो किसी दिन सच आवाज़ बनकर बचा रहे। उसमें सिर्फ 1 रिकॉर्डिंग नहीं थी। उसमें 12 ऑडियो क्लिप थे। राघव की धमकियाँ। संदीप मल्होत्रा की सलाहें। अस्पताल के बाहर भेजे गए फोटो। बैंक अकाउंट से निकाले गए पैसे। तारा की नैनी का बयान। और एक वीडियो, जिसमें राघव फोन पर कह रहा था कि “बीमार औरत अदालत में टिक नहीं पाएगी।”
केस नए जज के पास गया।
जज नीलिमा सक्सेना, जिनकी आवाज़ धीमी मगर धारदार थी, ने पहली सुनवाई में ही स्पष्ट कर दिया कि अदालत बीमारी को मातृत्व की कमजोरी नहीं मानेगी।
काव्या वीडियो कॉल पर मौजूद थी। सिर पर हल्का नीला दुपट्टा, चेहरा पीला, आँखें धँसी हुईं, मगर आवाज़ साफ। तारा शालिनी की गोद में बैठी थी और अपनी छोटी गुड़िया को पकड़े हुए थी। अरविंद पीछे आखिरी बेंच पर बैठे थे। पहली बार वह अदालत में निर्णय देने नहीं, निर्णय सुनने आए थे।
राघव ने सफेद कुर्ता पहन रखा था, जैसे वह खुद को संस्कारी पिता साबित करना चाहता हो। उसके चेहरे पर नकली दर्द था।
—माननीय अदालत, मेरी पत्नी गंभीर रूप से बीमार है। मैं सिर्फ अपनी बेटी की स्थिरता चाहता हूँ।
काव्या ने स्क्रीन पर सीधा देखा।
—मैं बीमार हूँ, गायब नहीं। मैं कमजोर हूँ, लेकिन माँ हूँ। और जिसने बेटी को 2 दिन बुखार में छोड़ा, उसे स्थिरता का मतलब नहीं पता।
राघव ने हँसने की कोशिश की।
—भावुक संवादों से कस्टडी नहीं मिलती।
जज नीलिमा ने फाइल से नजर उठाई।
—धमकी भरी रिकॉर्डिंग से कस्टडी जरूर जा सकती है।
संदीप मल्होत्रा ने तुरंत उठकर आपत्ति की।
—इन रिकॉर्डिंग्स की प्रमाणिकता सिद्ध नहीं हुई है।
तभी कोर्ट कर्मचारी ने तकनीकी रिपोर्ट रखी। फोन डेटा, चैट बैकअप, लोकेशन रिकॉर्ड और होटल बिल सब जुड़ चुके थे। संदीप के अपने मोबाइल से काव्या को भेजे गए संदेश भी निकले थे।
एक संदेश में लिखा था:
“कस्टडी छोड़ दो, वरना अदालत में तुम्हारी बीमारी को असमर्थता की तरह रखा जाएगा।”
जज नीलिमा का चेहरा सख्त हो गया।
—बार काउंसिल को रिपोर्ट भेजी जाएगी। इस अदालत में बीमारी को ब्लैकमेल का सामान नहीं बनाया जाएगा।
राघव के चेहरे से रंग उतर गया।
फिर नैनी का बयान पढ़ा गया। उसने बताया कि तारा रात में डरकर उठती थी, मम्मा को पुकारती थी, और जब राघव शराब पीकर लौटता था तो बच्ची अलमारी के पीछे छिप जाती थी। स्कूल की काउंसलर ने भी रिपोर्ट दी कि तारा पिता के नाम पर काँपती थी।
काव्या स्क्रीन पर चुप रही। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर उसने खुद को टूटने नहीं दिया। तारा ने स्क्रीन की तरफ हाथ हिलाया।
—मम्मा, मैं यहाँ हूँ।
काव्या मुस्कुराई।
—मुझे पता है, मेरी जान।
फैसला उसी दिन अंतरिम रूप से आया। तारा की प्राथमिक देखभाल काव्या को दी गई। जब तक काव्या का इलाज चलता, शालिनी उसके साथ रहेगी। राघव को सिर्फ निगरानी में सीमित मुलाकातें मिलेंगी। संदीप मल्होत्रा के खिलाफ पेशेवर दुराचार की जाँच शुरू होगी। राघव की वित्तीय गतिविधियों और धमकियों पर अलग से पुलिस जाँच होगी।
तारा को “कस्टडी” शब्द समझ नहीं आया।
उसे सिर्फ इतना समझ आया कि मम्मा उससे दूर नहीं जाएँगी।
वह स्क्रीन के पास भागी और अपने छोटे हाथ काँच पर रख दिए।
—मम्मा, हम जीत गए?
काव्या ने रोते हुए सिर हिलाया।
—हाँ बेटा। क्योंकि तूने सच बोला।
पीछे बैठे अरविंद ने आँखें बंद कर लीं।
उन्हें यह जीत चुभ रही थी।
क्योंकि हर जीत यह याद दिला रही थी कि अगर उन्होंने 2 साल पहले बेटी की बात सुन ली होती, तो शायद यह दिन इतना दर्दनाक न होता। शायद तारा को अदालत में फोन नहीं चुराना पड़ता। शायद काव्या को कैंसर से लड़ते हुए पति से भी न लड़ना पड़ता। शायद एक बच्ची को अपने नाना को क्रेयॉन से “नीचे” नहीं बुलाना पड़ता।
सुनवाई के बाद अरविंद बाहर निकले। मीडिया ने घेर लिया।
—सर, क्या आप अपने पद से इस्तीफा देंगे?
—सर, क्या आपको पछतावा है?
—सर, क्या यह पारिवारिक मामला था या न्यायिक चूक?
अरविंद रुके। पहली बार उन्होंने अपने नाम, पद और प्रतिष्ठा के पीछे छिपने की कोशिश नहीं की।
—मैंने कानून की कुर्सी पर बैठकर कई परिवारों की आवाज़ सुनी। मगर अपनी बेटी की आवाज़ नहीं सुनी। यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी।
बस इतना कहकर वह आगे बढ़ गए।
उस शाम वह पहली बार कानपुर कैंसर सेंटर पहुँचे। अस्पताल की गंध उन्हें हमेशा कठोर लगती थी—दवा, सैनिटाइजर, थकान और उम्मीद का मिला-जुला बोझ। काव्या कमरे में लेटी थी। चेहरा कमजोर, हाथ में सलाइन, सिर पर कपड़ा। तारा उसके बिस्तर पर चढ़कर उसके पास बैठी थी और स्टिकर चिपका रही थी।
—ये वाला स्टार वाला है, मम्मा। इससे दवाई जल्दी काम करेगी।
काव्या हल्का-सा हँसी।
दरवाजे पर अरविंद खड़े रहे। अंदर आने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
काव्या ने उन्हें देखा।
—अब भी बाहर ही रहेंगे?
यह ताना नहीं था। यह थकान थी। और शायद थोड़ा-सा खुला दरवाजा।
अरविंद अंदर आए। उनके हाथ में स्टील का डब्बा था।
—तुम्हारी माँ… मतलब शालिनी ने कहा था कि तुम्हें लौकी की सब्ज़ी पसंद थी।
काव्या ने डब्बे को देखा।
—मुझे 14 साल की उम्र में पसंद थी।
अरविंद ने धीमे से कहा:
—मैंने बहुत कुछ 14 साल पर ही छोड़ दिया था।
कमरे में चुप्पी भर गई।
तारा ने तुरंत माहौल बदला।
—नाना, आप कहानी सुनाओ।
अरविंद ने जीवन में हजारों फैसले पढ़े थे, मगर बच्चों की कहानी शायद ही कभी पढ़ी थी। फिर भी उन्होंने बैग से एक किताब निकाली—“छोटी कछुआ और बड़ा तालाब।”
तारा उनकी गोद में बैठ गई। पहले हिचकते हुए। फिर आराम से। काव्या उन्हें देखती रही। उसकी आँखों में गुस्सा था, दुख था, मगर कहीं बहुत भीतर वह बच्ची भी थी जिसने कभी पिता से स्कूल के वार्षिक समारोह में आने की उम्मीद की थी।
अगले 6 महीने अरविंद हर हफ्ते कानपुर गए। वह अब अदालत में कम और अस्पताल में ज्यादा दिखते थे। कभी फल लेकर जाते, कभी तारा के रंग भरने की किताब, कभी काव्या के लिए हल्की खिचड़ी। कई दिन काव्या उनसे बात नहीं करती थी। वह चुपचाप कुर्सी पर बैठते और तारा को होमवर्क कराते।
एक दिन कीमो के बाद काव्या बहुत टूट गई। उल्टियों से बेहाल, आँखों में पानी, हाथ काँपते हुए।
—मैं मरना नहीं चाहती, पापा।
अरविंद का दिल रुक-सा गया।
इतने साल बाद उसने उन्हें पापा कहा था।
उन्होंने उसका हाथ पकड़ा। वह हाथ बहुत पतला था, सुइयों के निशान से भरा हुआ।
—तुम नहीं मरोगी।
काव्या ने कमजोर हँसी हँसी।
—आप जज हैं, डॉक्टर नहीं।
—आज मैं कुछ नहीं हूँ। सिर्फ तुम्हारा पिता हूँ।
काव्या रो पड़ी।
—मुझे तब भी यही चाहिए था।
अरविंद झुक गए। उनके कंधे काँप रहे थे।
—मुझे माफ कर दो। मैंने दूसरों के लिए न्याय किया, अपने घर के लिए बहाने बनाए। मैंने तुम्हें अकेला छोड़ दिया।
काव्या ने तुरंत उन्हें माफ नहीं किया। कहानी इतनी सस्ती नहीं थी। उसने बस हाथ नहीं छोड़ा।
कभी-कभी शुरुआत माफी से नहीं होती, हाथ न छुड़ाने से होती है।
राघव की जिंदगी धीरे-धीरे खुलने लगी। प्रॉपर्टी डील में धोखाधड़ी, काव्या के इलाज के पैसे अपने खाते में मोड़ना, संदीप के साथ मिलकर झूठे मेडिकल निष्कर्ष तैयार करवाना—सब बाहर आने लगा। जिस आदमी ने अदालत में बेटी की स्थिरता का नाटक किया था, वही पुलिस स्टेशन में अपने बयान बदलता रहा। संदीप मल्होत्रा का लाइसेंस निलंबित हुआ। उसके ऑफिस की चमकदार नेमप्लेट उतर गई। वह आदमी जो परिवारों को कागजों में तोड़ता था, अब खुद कागजों के नीचे दब रहा था।
लेकिन काव्या ने बदले को अपनी जिंदगी का केंद्र नहीं बनने दिया।
उसने कहा:
—राघव को सजा कानून देगा। मुझे अपनी बेटी को डर से बाहर निकालना है।
तारा के लिए थेरेपी शुरू हुई। वह धीरे-धीरे तेज आवाज़ से कम डरने लगी। पहले वह दरवाजा बंद होते ही काँप जाती थी। अब वह खुद दरवाजा खोलकर कहती:
—नाना आए?
अरविंद हर बार मुस्कुराते।
—हाँ, नीचे आ गया।
काव्या की सर्जरी हुई। लंबी, कठिन, डरावनी। ऑपरेशन थिएटर के बाहर अरविंद, शालिनी और तारा बैठे रहे। तारा ने वही ग्रे रंग की छोटी पेंसिल पकड़ी थी जिससे उसने पहली ड्राइंग बनाई थी। उसने नया चित्र बनाया—इस बार अस्पताल के बिस्तर के पास मम्मा, नाना, शालिनी और वह खुद थे। दरवाजे पर कोई चिल्लाता हुआ आदमी नहीं था।
जब डॉक्टर बाहर आए, उनके चेहरे पर थकान के साथ राहत थी।
—ऑपरेशन सफल रहा। आगे सावधानी रहेगी, पर अभी हालत नियंत्रण में है।
शालिनी ने रोते हुए भगवान का नाम लिया। अरविंद ने दीवार पकड़ ली। तारा ने पूछा:
—मम्मा ठीक हो जाएँगी?
डॉक्टर झुककर बोले:
—तुम्हारी मम्मा बहुत बहादुर हैं।
तारा ने गर्व से कहा:
—मुझे पता है।
कुछ महीनों बाद रिपोर्ट आई—रिमिशन।
काव्या ने शब्द सुना तो चुप रह गई। जैसे शरीर को विश्वास करने में समय चाहिए था कि मौत का साया थोड़ा पीछे हट गया है। तारा ने पूछा:
—रिमिशन मतलब?
काव्या ने उसे सीने से लगाया।
—मतलब मम्मा अभी बहुत सारी कहानियाँ सुनाएगी।
अरविंद कमरे के कोने में खड़े रो रहे थे। तारा ने उन्हें देख लिया।
—नाना, आप फिर रो रहे हो?
उन्होंने हँसते हुए आँसू पोंछे।
—बुजुर्ग लोग कभी-कभी तब रोते हैं जब भगवान उन्हें वह लौटा देता है, जिसके लायक वे नहीं थे।
काव्या ने पहली बार बिना झिझक उन्हें देखा।
—हर चीज़ भगवान नहीं लौटाता, पापा। कुछ चीज़ें इंसान को खुद वापस कमानी पड़ती हैं।
अरविंद ने सिर झुका लिया।
—मैं कमाऊँगा। जितना समय बचा है, उतना।
साल के अंत तक अरविंद त्रिवेदी ने समय से पहले सेवानिवृत्ति ले ली। जिस चैंबर में कभी बड़े-बड़े कानून की किताबें, सम्मान पत्र और कठोर चेहरा लिए फोटो लगे थे, वहाँ अब तारा की रंग-बिरंगी ड्रॉइंग्स थीं। एक कोने में छोटी साइकिल रखी रहती थी। मेज पर फाइलों की जगह क्रेयॉन, गुड़िया की चाय पार्टी और अधखुली कहानी की किताबें थीं।
शालिनी उनसे दोबारा शादी नहीं करना चाहती थी। उसने साफ कहा:
—कुछ रिश्ते लौटते हैं, लेकिन पुराने नामों में नहीं।
अरविंद ने स्वीकार कर लिया।
अब वे पति-पत्नी नहीं थे। मगर हर शनिवार शाम शालिनी, काव्या, तारा और अरविंद एक ही मेज पर खाना खाते थे। कभी राजमा-चावल, कभी पूरी-सब्ज़ी, कभी काव्या की पसंद की इमली वाली दाल। तारा बीच में बैठती और हर बात में फैसला सुनाती।
—आज नाना बर्तन धोएँगे।
अरविंद तुरंत उठ जाते।
—जजमेंट स्वीकार है।
सब हँस पड़ते।
एक शाम, जब तारा 7 साल की हुई, उसने बरामदे में अरविंद को एक पुराने लकड़ी के बक्से के पास बैठे देखा। बक्से में उनका काला न्यायिक गाउन रखा था। वही गाउन, जिसके पीछे वह अदालत में छिपी थी।
तारा ने पूछा:
—आपको जज बनना याद आता है?
अरविंद ने बहुत देर तक गाउन को देखा। वह कुर्सी, वह हथौड़ा, वह डर, वह सम्मान—सब कभी उनकी पहचान था। फिर उन्होंने तारा को देखा, जिसकी चोटियाँ फिर टेढ़ी थीं और घुटने पर छोटा-सा खरोंच था।
—इतना नहीं, जितना तुम्हें न जान पाना याद आता।
तारा ने अपनी जेब से एक छोटी-सी चिकनी पत्थर निकाली। साधारण, ग्रे रंग की, सड़क से उठाई हुई।
—ये रखो।
—क्यों?
—ताकि आपको याद रहे कि ऊपर ज्यादा देर नहीं बैठना। नीचे लोग रोते हैं।
अरविंद ने पत्थर हथेली पर रखा, जैसे कोई पदक मिला हो।
—अब कभी नहीं भूलूँगा।
उस रात काव्या रसोई में आई। अरविंद बर्तन धो रहे थे। उनकी कमीज़ की बाँहें मुड़ी थीं, चश्मा थोड़ा नीचे खिसका था, और तारा बाहर शालिनी को अपनी स्कूल की कविता सुना रही थी।
काव्या कुछ पल दरवाजे पर खड़ी रही।
फिर वह चुपचाप पीछे आई और अपने पिता को हल्के से गले लगा लिया।
कोई लंबा संवाद नहीं हुआ।
न फिल्म जैसा संगीत।
न बड़ी कसम।
बस एक थका हुआ, सचमुच का, देर से आया हुआ आलिंगन।
अरविंद ने आँखें बंद कर लीं।
उन्हें समझ में आया कि विरासत फैसलों की मोटी फाइलों में नहीं होती। वह रसोई की रोशनी में होती है। बेटी की लौटती हँसी में होती है। नातिन की टेढ़ी ड्रॉइंग में होती है। उस छोटे पत्थर में होती है जो याद दिलाता है कि इंसाफ ऊपर से नहीं, नीचे उतरकर शुरू होता है।
सालों बाद भी लखनऊ की अदालतों में लोग उस दिन की कहानी सुनाते रहे जब 5 साल की एक बच्ची ने वकील का फोन चुराया और एक जज को उसकी अपनी बेटी की आवाज़ सुना दी।
लेकिन अरविंद को उस दिन की शर्म याद नहीं रही।
उन्हें बस वह पल याद रहा जब वे पहली बार अपनी ऊँची कुर्सी से नीचे उतरे थे।
और एक छोटी बच्ची ने उनका गाउन पकड़कर उन्हें घर का रास्ता दिखा दिया था।
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