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“ताबूत मत खोलिए, उन्होंने यही चाहा था” — पत्नी ने रोती माँ को इकलौते बेटे के अंतिम दर्शन से रोका, लेकिन बंद ढक्कन के नीचे दिखी 1 हल्की हरकत ने सबसे बड़ी साजिश हिला दी।

भाग 1:
श्मशान घाट के भीतर बंद ताबूत को मिट्टी में उतारने ही वाले थे कि 67 साल की सावित्री देवी चिल्लाती हुई अंदर घुसीं और सीधे ताबूत पर गिरकर बोलीं—

—अगर मेरे बेटे को मेरी आँखों से देखे बिना दफनाया, तो पहले मुझे भी इसी गड्ढे में डालना पड़ेगा।

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दिल्ली के निगमबोध घाट के उस शांत, भारी माहौल में उनकी आवाज़ बिजली की तरह गिरी। सफेद सूती साड़ी धूल से भरी थी, बाल बिखरे हुए थे, माथे की बिंदी आधी मिट चुकी थी और पैरों की चप्पलें टूटी हुई थीं। वह पूरी रात वाराणसी से ट्रेन और फिर ऑटो बदलती हुई आई थीं, क्योंकि उन्हें अपने इकलौते बेटे आरव मल्होत्रा की मौत की खबर किसी रिश्तेदार ने नहीं, बल्कि उनकी पुरानी पड़ोसन के एक छोटे से संदेश से दी थी।

“सावित्री दीदी, बहुत दुख हुआ आरव बाबू के बारे में। आज उनका अंतिम संस्कार है, आप नहीं आईं?”

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वह संदेश पढ़ते ही उनके हाथ से पीतल का गिलास गिर गया था। उन्होंने आरव को 18 बार फोन किया। कोई जवाब नहीं। बहू नंदिता को फोन किया। फोन बंद। दिल्ली के जिन-जिन लोगों के नंबर उनके पास थे, सबको मिलाया। आखिर एक पुराने ड्राइवर ने काँपती आवाज़ में बताया कि नंदिता ने सब कुछ जल्दी में तय कर दिया है—बंद ताबूत, छोटा सा संस्कार, और तुरंत अंतिम क्रिया।

अब वही नंदिता ताबूत के पास खड़ी थी। काली महंगी साड़ी, हीरे के झुमके, सधे हुए बाल और चेहरे पर ऐसी कठोरता, जैसे वह दुखी पत्नी नहीं, किसी मीटिंग की चेयरमैन हो। उसके पास कंपनी के 2 पार्टनर, एक घबराया हुआ वकील, कुछ कर्मचारी और 1 निजी डॉक्टर खड़ा था जो बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।

सावित्री देवी ने ताबूत की ओर बढ़ना चाहा, लेकिन नंदिता ने हाथ फैलाकर रास्ता रोक लिया।

—माँजी, कृपया तमाशा मत कीजिए। आरव ने खुद कहा था कि उसे कोई इस हालत में न देखे।

सावित्री देवी ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने भगवान के सामने झूठ बोल दिया हो।

—मेरा बेटा बचपन में बुखार होने पर भी मेरे आँचल में मुँह छिपाकर रोता था। वह मरने के बाद अपनी माँ से मुँह छिपाएगा, यह झूठ तुम किसी और को सुनाना।

नंदिता के होंठ कस गए।

—आप और आरव महीनों से बात नहीं कर रहे थे। अब यहाँ आकर माँ बनने की जरूरत नहीं है।

यह बात चुभी, क्योंकि उसमें थोड़ा सच था। शादी के बाद आरव सचमुच दूर हो गया था। नंदिता मुंबई की बड़ी बिजनेस फैमिली से आई थी, तेज, महत्वाकांक्षी और हर चीज को सौदे की तरह देखने वाली। आरव ने अपनी टेक कंपनी “मल्होत्रा इनोवेशन” को खून-पसीने से बनाया था, मगर नंदिता के आने के बाद कंपनी की भाषा बदल गई थी। पहले आरव कर्मचारियों को परिवार कहता था, फिर नंदिता उन्हें लागत कहने लगी। पहले वह हर रविवार माँ को वीडियो कॉल करता था, फिर कॉल कम होते गए, जवाब छोटे होते गए, और एक दिन उसने गुस्से में कहा था—

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—माँ, हर बात में शक मत किया करो। नंदिता मेरी पत्नी है, दुश्मन नहीं।

सावित्री देवी ने तब धीमे से कहा था—

—बेटा, पत्नी वह होती है जो घर बसाए। जो आदमी को उसकी जड़ों से काट दे, वह साथ नहीं, सौदा करती है।

उस दिन के बाद आरव ने 2 महीने तक फोन नहीं किया।

लेकिन 2 महीने की चुप्पी 38 साल की माँ को खत्म नहीं कर सकती थी।

सावित्री देवी ने नंदिता को धक्का दिया। वहाँ खड़े 2 कर्मचारियों ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, मगर वह घायल शेरनी की तरह छूट गईं। वह ताबूत तक पहुँचीं और दोनों हाथ काँपते हुए ढक्कन पर रख दिए।

—इसे खोलो।

नंदिता चीखी—

—नहीं।

—मैंने कहा खोलो।

—आरव की अंतिम इच्छा थी।

—झूठ।

वकील बीच में आया।

—माताजी, कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। मृत्यु प्रमाणपत्र—

सावित्री देवी ने उसकी तरफ उंगली उठाई।

—कानून बाद में दिखाना। पहले माँ को उसका बेटा दिखाओ।

चारों तरफ सन्नाटा फैल गया। कुछ लोग मोबाइल निकालने लगे। नंदिता का चेहरा सफेद पड़ने लगा, लेकिन उसने फिर भी ताबूत पकड़ लिया।

—आपको कोई अधिकार नहीं है।

सावित्री देवी की आँखों में आग भर आई।

—जिसने उसे जन्म दिया, भूखी रहकर उसे खिलाया, दूसरों के घर झाड़ू लगाकर उसे इंजीनियर बनाया, उसे अधिकार नहीं? और जिसे आए 5 साल हुए, उसे सब अधिकार?

यह सुनते ही नंदिता ने धीरे से दाँत भींचे।

—इसी गरीब सोच ने आरव को कमजोर बनाया था।

यह वाक्य जैसे सावित्री देवी के भीतर आखिरी दीवार तोड़ गया। उन्होंने पूरी ताकत से ताबूत का ढक्कन उठाया।

अंदर आरव पड़ा था।

चेहरा पीला, होंठ नीले, गले के पास हल्का नीला निशान, माथे पर चंदन, शरीर पर सफेद कपड़ा। सावित्री देवी की साँस अटक गई। वह झुककर उसके माथे को छूने लगीं।

—आरव… मेरे लाल…

उनकी आवाज़ टूट गई। उन्होंने उसके बाल सहलाए, जैसे वह अब भी वही 8 साल का बच्चा हो जो गणित की कॉपी लेकर उनके पास दौड़ता था।

फिर कुछ हुआ।

बहुत हल्का।

इतना हल्का कि कोई और देखता तो शायद नजरअंदाज कर देता।

आरव की पलक थोड़ी सी काँपी।

सावित्री देवी जम गईं।

उन्होंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।

फिर आरव की छाती बहुत धीमे से उठी।

सिर्फ 1 बार।

लेकिन माँ की आँखें मौत और साँस का फर्क पहचानती हैं।

सावित्री देवी पीछे मुड़ीं और पूरी ताकत से चीखीं—

—मेरा बेटा जिंदा है!

किसी ने जवाब नहीं दिया।

—सुनाई नहीं दे रहा? मेरा आरव साँस ले रहा है!

भीड़ में हलचल मच गई। कोई आगे बढ़ा, कोई पीछे हटा। डॉक्टर के हाथ से फाइल गिर गई। वकील के माथे पर पसीना आ गया। नंदिता 2 कदम पीछे हट गई, जैसे किसी ने उसके राज पर से कपड़ा खींच दिया हो।

सावित्री देवी ने आरव की नाक के पास हाथ रखा। बहुत कमजोर, मगर गर्म साँस उनकी उंगलियों से टकराई।

—अस्पताल बुलाओ! एम्बुलेंस बुलाओ! कोई खड़ा मत रहो!

नंदिता के मुँह से अनजाने में निकला—

—यह कैसे हो सकता है…

सावित्री देवी ने उसकी तरफ देखा।

उस एक वाक्य में डर था, दुख नहीं।

और उसी पल सावित्री देवी समझ गईं कि यह मौत नहीं थी।

यह साजिश थी।

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भाग 2:

एम्बुलेंस आने तक सावित्री देवी आरव के ताबूत के पास बैठी रहीं और उसकी ठंडी उंगलियाँ अपनी हथेली में दबाए रहीं, जैसे उनका स्पर्श ही उसे इस दुनिया से बाँधे हुए हो। नंदिता बार-बार कहती रही कि यह कोई मेडिकल कन्फ्यूजन होगा, मगर उसके चेहरे पर पत्नी का दर्द नहीं, पकड़े जाने का डर था। आरव को एम्स ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि उसकी धड़कन इतनी धीमी थी कि सतही जांच में उसे मृत समझा जा सकता था, लेकिन उसके खून में एक अजीब तरह की दवा के निशान थे जो शरीर को कुछ घंटों के लिए लगभग मृत जैसी अवस्था में डाल सकती थी। पुलिस इंस्पेक्टर विक्रम राणा अस्पताल पहुँचा, क्योंकि घाट पर मौजूद एक कर्मचारी ने वीडियो भेज दिया था। सावित्री देवी ने काँपती आवाज़ में सब बताया—कैसे उन्हें खबर नहीं दी गई, कैसे ताबूत बंद रखा गया, कैसे नंदिता जल्दी अंतिम संस्कार चाहती थी। तभी आरव का पुराना दोस्त कबीर आया, जो कंपनी का शुरुआती पार्टनर था लेकिन 6 महीने पहले अचानक निकाल दिया गया था। उसने पुलिस को बताया कि आरव ने 3 दिन पहले उसे एक मैसेज भेजा था: “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो माँ को बुलाना। नंदिता और विराज खातों में गड़बड़ कर रहे हैं।” विराज वही दूसरा पार्टनर था जो घाट पर लगातार फोन देख रहा था। पुलिस ने तुरंत नंदिता, विराज और निजी डॉक्टर से पूछताछ शुरू की। पहले सबने कहा कि आरव तनाव में था और अचानक गिर पड़ा था, लेकिन सीसीटीवी में दिखा कि मौत से पिछली रात नंदिता ने आरव को दूध में कुछ मिलाकर दिया था। कंपनी के दस्तावेजों में भी खुलासा हुआ कि आरव की कथित मृत्यु से सिर्फ 48 घंटे पहले शेयर, बैंक साइनिंग अथॉरिटी और बीमा पॉलिसी नंदिता के नाम ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब डॉक्टर ने दबाव में मान लिया कि उसने बिना पूरी जांच किए मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किए थे, क्योंकि उसे 25 लाख रुपये दिए गए थे। नंदिता टूटने के बजाय गुस्से में बोली कि आरव भावुक आदमी था, कंपनी को बड़ा बनाने लायक नहीं था, वह कर्मचारियों और अपनी माँ पर पैसा बरबाद करता था, और उसे सिर्फ कुछ घंटों के लिए “चुप” रखना था ताकि कागज पूरे हो सकें। उसी क्षण ICU से डॉक्टर बाहर आई और बोली कि आरव होश में आ गया है, लेकिन वह सिर्फ 1 नाम बार-बार ले रहा है—“माँ।” ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚

भाग 3:

जब सावित्री देवी ICU में दाखिल हुईं, तो आरव मशीनों, तारों और दवाइयों के बीच पड़ा था। उसका चेहरा सूजा हुआ था, होंठ सूखे थे और आँखें आधी खुली हुई थीं। लेकिन जैसे ही उसने माँ को देखा, उसकी पलकें भीग गईं।

—माँ…

बस 1 शब्द था, लेकिन सावित्री देवी का पूरा शरीर काँप गया। वह उसके पास बैठ गईं, उसका हाथ पकड़ा और माथे से लगा लिया।

—मैं यहीं हूँ, बेटा। अब कहीं नहीं जाऊँगी।

आरव ने बोलने की कोशिश की, मगर गला सूखा था। डॉक्टर ने इशारे से कहा कि वह ज्यादा बात न करे, पर आरव की आँखों में जो बोझ था, वह दवा से नहीं उतर सकता था।

—मुझे माफ कर दो, माँ।

सावित्री देवी ने तुरंत सिर हिलाया।

—माँ से माफी नहीं माँगते। माँ के पास वापस आते हैं।

आरव रो पड़ा। वह वही आदमी था जिसकी कंपनी के 400 कर्मचारी थे, जिसकी तस्वीर बिजनेस मैगजीन में छपती थी, जिसे लोग युवा करोड़पति कहते थे। मगर उस पल वह बस एक बेटा था, जिसे अपनी माँ की उंगलियाँ पकड़कर जीने की ताकत मिल रही थी।

अगले दिन इंस्पेक्टर विक्रम राणा ने उसका बयान रिकॉर्ड किया। सावित्री देवी बाहर जाने लगीं, लेकिन आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

—नहीं माँ, इस बार आप सब सुनेंगी। मैंने आपको दूर रखकर बहुत बड़ी गलती की।

विक्रम ने रिकॉर्डर चालू किया।

आरव ने धीमे-धीमे बोलना शुरू किया।

—2 महीने पहले मुझे कंपनी के खातों में गड़बड़ी मिली। कुछ फर्जी कंसल्टेंसी कंपनियों को करोड़ों रुपये भेजे गए थे। पहले मुझे लगा अकाउंटिंग गलती होगी, लेकिन फिर पता चला कि उन कंपनियों के पीछे विराज और नंदिता थे।

सावित्री देवी का चेहरा सख्त हो गया।

—मैंने नंदिता से पूछा तो उसने कहा कि मैं छोटा सोचता हूँ। उसने कहा कि बड़ा बिजनेस नैतिकता से नहीं, ताकत से चलता है। फिर मुझे कुछ दस्तावेज मिले जिन पर मेरी फर्जी डिजिटल साइन थी। अगर मैं मर जाता या कोमा में चला जाता, तो कंपनी का पूरा कंट्रोल नंदिता को मिल जाता।

विक्रम ने पूछा—

—उस रात क्या हुआ?

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

—हमारा बहुत झगड़ा हुआ था। मैंने कहा कि सुबह बोर्ड मीटिंग बुलाऊँगा और पुलिस में शिकायत करूँगा। नंदिता अचानक शांत हो गई। उसने कहा कि हम पति-पत्नी हैं, दुश्मन नहीं। उसने मेरे लिए हल्दी वाला दूध बनाया। मुझे लगा शायद वह सच में पछता रही है।

वह कुछ पल चुप रहा।

—दूध पीने के बाद शरीर भारी होने लगा। मैं फोन उठाकर माँ को कॉल करना चाहता था, लेकिन शर्म आ रही थी। इतने दिन उनसे बात नहीं की थी। सोचा, सुबह फोन करूँगा। फिर सब अँधेरा हो गया।

सावित्री देवी ने होंठ काट लिए।

—जब होश और बेहोशी के बीच था, कुछ आवाजें सुनाई देती थीं। नंदिता कह रही थी कि संस्कार जल्दी होना चाहिए। किसी ने कहा कि माँ को खबर? उसने कहा—“वह बूढ़ी औरत वाराणसी में है, जब तक आएगी सब खत्म हो जाएगा।” मैं चिल्लाना चाहता था, माँ। मगर मेरी आवाज नहीं निकल रही थी। ताबूत बंद हुआ तो मुझे लगा मैं सचमुच मर गया। फिर मैंने आपकी आवाज सुनी।

कमरे में मौजूद हर व्यक्ति चुप हो गया।

आरव ने सावित्री देवी की तरफ देखा।

—आपने मुझे दूसरी बार जन्म दिया।

सावित्री देवी ने उसका हाथ अपने गाल से लगा लिया।

—पहली बार भगवान ने दिया था। इस बार तेरी साँस ने मुझे बुलाया था।

पुलिस की जांच तेज हुई। नंदिता के लैपटॉप से फर्जी कंपनियों के कागज मिले। विराज के फोन से चैट मिली जिसमें लिखा था कि “अंतिम संस्कार से पहले कागज पूरे हो जाने चाहिए।” डॉक्टर के बैंक खाते में 25 लाख रुपये का ट्रांसफर मिला। वकील के पास से एक ड्राफ्ट वसीयत मिली, जिसमें आरव की संपत्ति का बड़ा हिस्सा नंदिता और विराज द्वारा नियंत्रित ट्रस्ट को जाने वाला था।

सबसे खतरनाक खुलासा बीमा पॉलिसी में हुआ। आरव पर 80 करोड़ रुपये का की-मैन इंश्योरेंस था, जिसका दावा कंपनी के नाम पर होना था, लेकिन नंदिता ने फर्जी बोर्ड रेजोल्यूशन से खुद को नियंत्रणकर्ता बना लिया था।

नंदिता की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में फैल गई।

“पत्नी ने पति को जिंदा दफनाने की साजिश रची।”

“माँ ने ताबूत खोलकर बेटे की साँस बचाई।”

“दिल्ली टेक कंपनी का 80 करोड़ का राज।”

लेकिन सावित्री देवी को किसी वायरल खबर से मतलब नहीं था। वह अस्पताल के कमरे में चुपचाप बैठकर आरव को खिचड़ी खिलाती थीं। कभी उसके बाल सहलातीं, कभी रात में उठकर उसका कंबल ठीक करतीं। आरव रातों को डरकर जाग जाता था।

—माँ, दरवाजा खुला रहने दो।

—खुला है, बेटा।

—लाइट बंद मत करना।

—नहीं करूँगी।

—अगर फिर अँधेरा हो गया तो?

सावित्री देवी उसके माथे पर हाथ रखतीं।

—जब तक मैं हूँ, तुझे कोई अँधेरा अकेले नहीं निगलेगा।

आरव की रिकवरी लंबी थी। शरीर कमजोर था, गला बैठा हुआ था और दिमाग में बंद ताबूत की याद बार-बार लौटती थी। वह थोड़ी देर भी बंद कमरे में नहीं रह पाता था। डॉक्टर ने कहा कि उसे समय लगेगा। सावित्री देवी ने कहा—

—समय मेरे पास है। मैंने इसे 38 साल पाला है, अब 38 महीने भी लगें तो बैठी रहूँगी।

1 महीने बाद केस अदालत पहुँचा। कोर्टरूम खचाखच भरा था। मीडिया, कर्मचारी, निवेशक और आम लोग—सब देखना चाहते थे उस औरत को जिसने पति को मौत जैसा बना दिया था, और उस माँ को जिसने मौत को शक से पकड़ लिया था।

नंदिता सफेद कुर्ते में आई। चेहरे पर पछतावा नहीं था, सिर्फ हार का अपमान था। विराज झुकी नजरों से खड़ा था। डॉक्टर ने पहले ही सरकारी गवाह बनने की अर्जी दे दी थी।

सरकारी वकील ने सबूत रखे—सीसीटीवी, बैंक ट्रांसफर, फर्जी दस्तावेज, दवा की रिपोर्ट, डॉक्टर की स्वीकारोक्ति और आरव का आखिरी मैसेज। फिर आरव गवाही देने उठा। वह अभी भी कमजोर था, मगर आवाज में सच्चाई की मजबूती थी।

—मैंने नंदिता से शादी प्यार समझकर की थी। मैंने उसे अपना घर, भरोसा और कंपनी दी। लेकिन उसके लिए मैं पति नहीं, एक साइन करने वाला आदमी था। जब मैंने सच पकड़ लिया, उसने मुझे मिटाने की कोशिश की।

उसने माँ की तरफ देखा।

—मैंने अपनी माँ की बात को पुराने जमाने की सोच समझा। मुझे लगा पैसा, ऑफिस, मीडिया और सफलता ही मेरी दुनिया हैं। लेकिन जब मैं ताबूत में बंद था, उस पूरी दुनिया में से सिर्फ 1 आवाज मुझे वापस जिंदगी में खींच रही थी—मेरी माँ की आवाज।

कोर्ट में कई लोग रो पड़े।

फिर सावित्री देवी को बुलाया गया। वह धीरे से गवाही वाली जगह पर बैठीं। उनके हाथ में कोई महंगा बैग नहीं था, बस पुराना कपड़े का पोटला था जिसमें आरव की बचपन की फोटो रखी थी।

जज ने पूछा—

—आप बताना चाहेंगी कि उस दिन आपको शक कैसे हुआ?

सावित्री देवी ने नंदिता की तरफ देखा, फिर शांत आवाज में बोलीं—

—शक किसी कागज से नहीं हुआ साहब। शक उस जल्दी से हुआ। बेटा मरता है तो घर टूटता है, लेकिन यहाँ सब कुछ बहुत साफ-सुथरा था। फूल महंगे थे, ताबूत बंद था, लोग चुप थे, बहू की आँख सूखी थी। और सबसे बड़ा शक यह था कि माँ को खबर नहीं दी गई।

वह रुकीं।

—मैं गरीब जरूर रही, पर अंधी नहीं। मैंने आरव को भूख में पाला है। बच्चे की साँस कैसी चलती है, बुखार में उसका माथा कैसा जलता है, डर में उसकी उंगली कैसे काँपती है—यह माँ से छिप नहीं सकता। मुझे बस उसकी पलक हिलती दिखी और मैंने जान लिया कि मेरा बेटा अभी गया नहीं है।

नंदिता अचानक बोल पड़ी—

—मैंने भी उस कंपनी को बनाया था। मुझे मेरा हिस्सा चाहिए था।

जज ने कठोर आवाज में कहा—

—हिस्सा माँगा जाता है, किसी को ताबूत में डालकर छीना नहीं जाता।

अदालत ने नंदिता को हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश और भ्रष्ट डॉक्टर से मिलीभगत के आरोपों में 17 साल की सजा सुनाई। विराज को 12 साल की सजा मिली। डॉक्टर का लाइसेंस रद्द हुआ और उसे भी जेल भेजा गया। नंदिता की संपत्ति जब्त हुई, बीमा दावा रद्द हुआ और कंपनी की पूरी ऑडिट अदालत की निगरानी में शुरू हुई।

फैसले के बाद कोर्ट के बाहर पत्रकारों ने सावित्री देवी को घेर लिया।

—आपने उस दिन डर महसूस नहीं किया?

सावित्री देवी ने आरव का हाथ पकड़ा।

—डर तो था। लेकिन माँ का डर माँ को रोकता नहीं, धक्का देता है।

—आप उन बच्चों से क्या कहेंगी जो अपने माता-पिता से दूर हो जाते हैं?

उन्होंने धीरे से कहा—

—दूर जाना गलत नहीं है। पर इतना दूर मत जाओ कि जब गिरो तो तुम्हें याद ही न रहे कि किसे पुकारना है।

आरव की आँखें झुक गईं।

—और आप क्या कहेंगे?

आरव ने माँ की ओर देखा।

—मैंने सीखा कि जड़ें बोझ नहीं होतीं। पेड़ जितना ऊँचा जाता है, जड़ों की उतनी ज्यादा जरूरत होती है।

अस्पताल से निकलने के बाद आरव ने अपनी कंपनी वापस सँभाली, लेकिन वह पहले वाला आदमी नहीं रहा। उसने विराज के सारे लोगों को हटाया, कर्मचारियों की तनख्वाह रोकी नहीं, जिन ग्राहकों को नुकसान हुआ था उनका पैसा लौटाया और कंपनी की दीवार पर एक नया वाक्य लिखवाया—

“विश्वास से बड़ा कोई निवेश नहीं।”

उसने सावित्री देवी को ऑफिस बुलाया। कर्मचारी खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे। वह शर्माकर पीछे हटने लगीं।

—अरे बेटा, मुझे इन बड़े लोगों के बीच क्यों खड़ा कर रहा है?

आरव मुस्कुराया।

—क्योंकि इस कंपनी को बचाने वाली असली चेयरमैन आप हैं।

सावित्री देवी ने उसे आँख दिखाई।

—ज्यादा अंग्रेजी मत झाड़। बस ईमानदारी से काम करना।

पूरे हॉल में हँसी गूँज गई। मगर उसी हँसी में एक नई शुरुआत थी।

कुछ महीनों बाद आरव ने “जड़ें फाउंडेशन” शुरू किया, जहाँ गरीब बच्चों को टेक्नोलॉजी पढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति दी जाने लगी। उद्घाटन के दिन उसने फीता काटने के लिए किसी मंत्री को नहीं बुलाया। उसने अपनी माँ को बुलाया।

सावित्री देवी ने काँपते हाथों से कैंची पकड़ी।

—मैंने क्या किया है बेटा?

आरव ने सबके सामने कहा—

—आपने मुझे सिखाया कि आदमी गरीब पैदा हो सकता है, लेकिन छोटा नहीं। आपने मुझे गिरवी रखे गहनों से स्कूल भेजा, भूखी रहकर फीस भरी, और जब मैं अपनी सफलता में आपको भूल गया, तब भी आपने मुझे नहीं छोड़ा।

सावित्री देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।

—माँ बच्चे को छोड़ती नहीं। बच्चा रास्ता भूल जाए तो इंतजार करती है।

1 साल बाद आरव अपनी माँ को वाराणसी वापस ले गया। वे उसी पुराने मोहल्ले में गए जहाँ वह बड़ा हुआ था। संकरी गली, पुराना नीम का पेड़, पीली दीवारों वाला छोटा घर, और दरवाजे के पीछे पेंसिल की वे रेखाएँ जहाँ सावित्री देवी हर जन्मदिन पर उसकी लंबाई नापती थीं।

आरव ने उन निशानों को छुआ।

—मैं हमेशा सोचता था कि मुझे इस घर से बहुत दूर जाना है।

सावित्री देवी मुस्कुराईं।

—दूर जाना बुरा नहीं था। बुरा यह था कि तूने सोचा, पीछे देखने से तू छोटा हो जाएगा।

आरव ने माँ को गले लगा लिया। लंबे समय तक दोनों कुछ नहीं बोले। गंगा किनारे आरती की घंटियाँ बज रही थीं। हवा में धूप, फूल और पुराने दिनों की खुशबू थी।

उस रात सावित्री देवी ने वही आलू-पूरी बनाई जो आरव बचपन में बहुत पसंद करता था। आरव ने पहला कौर खाते ही कहा—

—इतने सालों में दुनिया भर के होटल खाए, पर यह स्वाद कहीं नहीं मिला।

सावित्री देवी ने हँसते हुए कहा—

—क्योंकि इसमें बिल नहीं, प्यार लगता है।

आरव भी हँस पड़ा, फिर अचानक चुप हो गया।

—माँ, अगर आप उस दिन देर से पहुँचतीं तो?

सावित्री देवी ने उसकी प्लेट में और पूरी रखी।

—तो मैं देर से भी पहुँचती, पर तुझे छोड़ती नहीं।

यह बात सुनकर आरव की आँखें भर आईं।

नंदिता जेल में थी। विराज भुला दिया गया। कंपनी धीरे-धीरे फिर खड़ी हो गई। लोग अब आरव को सिर्फ सफल बिजनेसमैन नहीं, उस बेटे के रूप में जानते थे जिसे उसकी माँ ने बंद ताबूत से वापस खींच लिया था।

लेकिन सावित्री देवी कभी खुद को नायिका नहीं मानती थीं। जब भी कोई उनकी तारीफ करता, वह बस इतना कहतीं—

—मैंने कुछ बड़ा नहीं किया। मैंने अपने बेटे को देखा, उसकी साँस पहचानी, और ताबूत खोल दिया।

आरव हर शुक्रवार वाराणसी आता या माँ को दिल्ली बुलाता। फोन अब कभी इंतजार में नहीं रहता था। मीटिंग के बीच भी वह कॉल उठाता और कहता—

—हाँ माँ, खाना खाया। दवा ली। और हाँ, ऑफिस में दरवाजा खुला है।

सावित्री देवी खिलखिलाकर कहतीं—

—अब तू ठीक है।

इस कहानी को लोग इसलिए याद नहीं रखते कि एक माँ अंतिम संस्कार में देर से पहुँची। लोग इसे इसलिए याद रखते हैं कि दुनिया ने जिसे मौत मान लिया था, माँ ने उसे शक से देखा। सबने ताबूत देखा, उसने बच्चा देखा। सबने कागज देखा, उसने साँस देखी। सबने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, उसने ढक्कन खोल दिया।

क्योंकि माँ हमेशा सही हो, यह जरूरी नहीं।

लेकिन जब माँ का दिल कह दे कि उसका बच्चा अभी जिंदा है, तो मौत भी 1 पल के लिए रुककर सोचती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.