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8:30 बजे पति काली गाड़ी में बैठने ही वाला था, तभी नौकरानी के 10 साल के बेटे ने आस्तीन पकड़कर कहा—“साहब, मत जाइए”… और 82 करोड़ की बीमा साजिश खुलने लगी

भाग 1

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8:30 बजे गेट पर खड़ी काली मर्सिडीज में अगर आरव मल्होत्रा बैठ जाता, तो शाम तक पूरा मुंबई यही सुनता कि देश का बड़ा लॉजिस्टिक्स कारोबारी पहाड़ी मोड़ पर हुई दुर्घटना में मर गया।

आरव अपने जुहू वाले बंगले की संगमरमर की सीढ़ियों से उतर रहा था। हाथ में चमड़े का ब्रीफ़केस था, फोन पर मीटिंग के ईमेल खुले थे, और दिमाग पहले ही नवी मुंबई के बोर्डरूम में पहुंच चुका था। तभी गुलाब की झाड़ियों के पीछे से 10 साल का एक दुबला-पतला लड़का निकला और उसके कोट की आस्तीन पकड़ ली।

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—साहब, मत जाइए।

आरव रुक गया। वह लड़का रोहन था, घर में काम करने वाली सुशीला का बेटा। आरव ने उसे कई बार पीछे के आंगन में स्कूल बैग लिए बैठे देखा था, मगर उससे कभी ठीक से बात नहीं की थी।

—क्या हुआ?

लड़के की आंखें रातभर जागे हुए इंसान जैसी थीं।

—उस गाड़ी में मत बैठिए। गेट वाला आदमी आपका ड्राइवर नहीं है। अगर आप गए तो वापस नहीं आएंगे।

आरव ने गेट की तरफ देखा। काली गाड़ी वही थी, नंबर भी वही लग रहा था। ड्राइवर ने सफेद दस्ताने पहने थे और पिछला दरवाज़ा खोलकर खड़ा था। सब कुछ सामान्य था, बस एक छोटी-सी बात अलग थी। उसके असली ड्राइवर राघव के दाहिने हाथ में हमेशा तांबे का कड़ा रहता था, जो उसकी मां ने उज्जैन से लाकर दिया था। गेट पर खड़े आदमी के हाथ में कोई कड़ा नहीं था।

आरव के भीतर कुछ ठंडा उतर गया।

—तुम्हें कैसे पता?

रोहन ने कांपते हुए कहा—कल रात रसोई के पास मैंने आवाज़ सुनी थी। मेमसाहब किसी आदमी से बात कर रही थीं। उन्होंने आपका नाम लिया था। कहा था कि सुबह 8:30 पर आप गाड़ी में बैठेंगे, फोन देखते रहेंगे, और रास्ते में लोनावला मोड़ के पास सब खत्म हो जाएगा।

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आरव ने पहली बार अपने ही घर की दीवारों को शक की नज़र से देखा।

—मेरे साथ चलो। धीरे। गेट की तरफ मत देखना।

दोनों साइड वाले रास्ते से अमलतास के पेड़ों के पीछे चले गए। वहां पहुंचकर रोहन ने अपनी शर्ट की जेब से पुराना टूटा हुआ फोन निकाला।

—मैंने रिकॉर्ड कर लिया था, साहब। डर लगा कि कोई मानेगा नहीं।

आरव ने फोन लिया। ऑडियो चला। पहले बर्तनों की हल्की आवाज़ आई, फिर उसकी पत्नी काव्या की आवाज़—
—सब कुछ सामान्य दिखना चाहिए। उसे खुद गाड़ी में बैठना होगा। कोई ज़बरदस्ती नहीं। दुर्घटना लगेगी, हत्या नहीं।

फिर एक आदमी बोला—
—बीमा पॉलिसी 82 करोड़ की है। कागज़ साफ हैं। आपके पति की मौत के बाद सब आपके नाम आएगा।

काव्या हंसी। वही हंसी, जो आरव ने शादी के 18 सालों में सैकड़ों बार सुनी थी।

—आज के बाद मैं आज़ाद हो जाऊंगी।

आरव ने फोन बंद कर दिया। उसके हाथ में ब्रीफ़केस था, लेकिन उसे लगा जैसे पूरा जीवन हाथ से गिर गया हो। तभी पीछे के आंगन से काव्या की आवाज़ आई। वह अकेली नहीं थी।

जालीदार दीवार के उस पार काव्या हल्की नीली साड़ी में बैठी थी, और सामने वही आदमी था जिसकी आवाज़ रिकॉर्डिंग में थी। उसने काव्या का हाथ पकड़ा और कहा—

—आज शाम तक तुम्हारा पति सिर्फ खबर बन जाएगा।

भाग 2

आरव ने पहली बार महसूस किया कि 18 साल की शादी कभी-कभी 18 सेकंड में राख बन सकती है। उसने रोहन को पीछे के कमरे में भेजा और अपने असली ड्राइवर राघव को फोन किया। राघव घर पर था; उसे कंपनी के नाम से नकली संदेश मिला था कि उसे 1 हफ्ते की छुट्टी दी गई है। फिर आरव ने अपने पुराने वकील राजीव खन्ना को फोन किया और कहा—किसी को मत बताना, मेरी बीमा पॉलिसी की हर फाइल निकालो।

काव्या ने फोन किया। उसकी आवाज़ मीठी थी, मगर उसमें घबराहट छिपी थी।
—आरव, ड्राइवर कह रहा है तुम गाड़ी में नहीं बैठे। क्या हुआ?
—गाड़ी में कुछ गड़बड़ लगी। मैं दूसरी गाड़ी से निकल गया हूं। राजीव देख रहा है।
—घर वापस आ जाओ, हम साथ में संभाल लेंगे।
—हां, शाम तक आता हूं।

उसने झूठ बोला, क्योंकि सच बोलता तो रोहन मर सकता था।

राघव ने उसे पीछे वाली गली से उठाया। एक छोटे कैफे में राजीव इंतज़ार कर रहा था। फाइलों से पता चला कि 14 महीने पहले आरव की बीमा पॉलिसी 18 करोड़ से बढ़ाकर 82 करोड़ की गई थी। लाभार्थी सिर्फ काव्या थी। दस्तावेज़ पर आरव के जैसे हस्ताक्षर थे, लेकिन उस दिन आरव सिंगापुर में था।

फिर निजी जांचकर्ता मीरा राव का फोन आया। उसने उस आदमी की असली पहचान निकाल ली थी। उसका नाम विक्रम सहगल नहीं था, जैसा काव्या समझती थी। उसका असली नाम आदित्य भसीन था। उसकी 2 अमीर पत्नियां पहले भी “दुर्घटनाओं” में मर चुकी थीं।

राजीव ने धीमे से कहा—काव्या शिकारी के साथ है, मगर शायद उसे पता ही नहीं कि अगला शिकार वही भी हो सकती है।

तभी आरव के फोन पर रोहन का संदेश आया—
“साहब, वह आदमी फिर बंगले में आया है। इस बार वह मेरी मां से पूछ रहा है कि मैंने सुबह आपको कब देखा था।”

भाग 3

आरव ने संदेश पढ़ते ही कुर्सी छोड़ दी। कैफे की खिड़की के बाहर मुंबई का शोर वैसा ही था—हॉर्न, चाय की दुकानों की आवाज़, बारिश के बाद सड़क पर चमकती धूप—लेकिन उसके भीतर सब कुछ एकदम शांत हो गया। वह जान गया कि अब यह सिर्फ उसकी जान का मामला नहीं था। वह बच्चा, जिसने टूटे फोन से सच पकड़ लिया था, अब उसी सच की वजह से खतरे में था।

—राजीव, पुलिस को अभी बताओ।
—अगर अभी गए तो आदित्य बच सकता है, आरव। रिकॉर्डिंग है, इरादा है, लेकिन वह कहेगा यह सब नाटक था।
—और अगर रोहन को कुछ हो गया तो?

राजीव चुप हो गया। फिर उसने मीरा राव को फोन किया। 20 मिनट में बंगले के आसपास बिना निशान वाली 3 गाड़ियां लगा दी गईं। 2 लोग स्टाफ क्वार्टर के पास, 1 आदमी गेट के पास और 1 औरत सब्ज़ी बेचने वाली बनकर गली में खड़ी हो गई।

आरव ने उसी शाम घर लौटने का फैसला किया। राघव ने कहा—
—साहब, आप अंदर जाएंगे तो वे समझेंगे सब ठीक है।
—उन्हें यही समझना है।

शाम 7 बजे आरव बंगले में दाखिल हुआ। काव्या दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके चेहरे पर चिंता थी, मगर आंखों में राहत। शायद उसे लगा था कि उसका पति सिर्फ नकली ड्राइवर से सावधान हुआ है, उससे नहीं।

—तुम ठीक हो? उसने दोनों हाथ पकड़कर पूछा।
—हां। कंपनी जांच कर रही है। शायद किसी ने अपहरण की कोशिश की थी।
—हे भगवान… मैं तो डर गई थी।

आरव ने उसकी आंखों में देखा। वही आंखें, जिनमें कभी शादी की पहली रात सचमुच प्रेम था। वही चेहरा, जो उसकी मां की मौत पर 14 घंटे अस्पताल की कुर्सी पर उसके पास बैठा रहा था। मगर अब उसी चेहरे के पीछे एक हिसाब था—बीमा, संपत्ति, आज़ादी।

रात के खाने में काव्या ने उसकी पसंद की दाल, भरवां भिंडी और जीरा राइस बनवाया। उसने मोमबत्तियां जलाईं। वह बार-बार उसका हाथ छूती रही। आरव मुस्कुराता रहा। भीतर से वह हर स्पर्श को जैसे अंतिम बार पहचान रहा था।

10:45 पर काव्या ऊपर चली गई। आरव 15 मिनट तक ड्राइंग रूम में बैठा रहा, फिर चुपचाप पीछे के रास्ते से स्टाफ क्वार्टर की तरफ गया। सुशीला ने दरवाज़ा खोला तो उसके चेहरे पर डर साफ था।

—साहब, रोहन ने बताया।

अंदर छोटे कमरे में रोहन बिस्तर पर बैठा था। उसके सामने कॉपी खुली थी, मगर पेंसिल उसके हाथ में जमी हुई थी। आरव ने उसके पास बैठकर धीरे से कहा—
—तुमने आज सुबह जो किया, वह कोई बड़ा आदमी भी नहीं कर पाता।
रोहन बोला—
—साहब, वह आदमी मां से पूछ रहा था कि मैं कहां था। उसने मुझे देखा तो मुस्कुराया। मुझे बहुत डर लगा।
—डरना गलत नहीं है। चुप रहना गलत होता।

सुशीला की आंखें भर आईं।
—मेरे बेटे को बचा लीजिए, साहब। मैं नौकरी छोड़ दूंगी। कहीं भी चली जाऊंगी।
—नहीं, तुम कहीं नहीं जाओगी। जाने वाले वे होंगे।

अगले 2 दिन आरव ने अपना जीवन ऐसे जिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वह सुबह चाय पीता, अखबार पलटता, काव्या से सामान्य बातें करता, ऑफिस कॉल पर शांत आवाज़ में निर्देश देता। पर हर कमरे में अब पुलिस के लगाए छोटे उपकरण थे। हर गाड़ी पर नज़र थी। हर कॉल रिकॉर्ड हो रही थी।

तीसरे दिन रात को काव्या और आदित्य की बातचीत रिकॉर्ड हुई। वे पीछे के मंदिर जैसे छोटे कमरे में थे, जहां काव्या कभी दिया जलाती थी। आज वहीं वह अपने पति की मौत की नई तारीख तय कर रही थी।

—पहली बार वह बच गया, आदित्य बोला। इसका मतलब यह नहीं कि योजना खत्म है।
—मुझे डर लग रहा है।
—अब डरने का समय नहीं। शुक्रवार सुबह वह फिर लोनावला जाएगा। इस बार असली ड्राइवर होगा। हम रास्ते में रुकवाएंगे। दुर्घटना वैसी ही लगेगी।

काव्या बोली—
—अगर उसने मुझ पर शक कर लिया तो?
आदित्य हंसा।
—तुम्हारा पति तुम्हें प्यार करता है। प्यार सबसे अच्छी पट्टी है। आंखों पर बांध दो, आदमी खाई भी नहीं देखता।

यह वाक्य सुनकर निगरानी वैन में बैठे आरव ने आंखें बंद कर लीं। यह सच था। उसने काव्या पर भरोसा किया था, इतना कि उसके हस्ताक्षर तक किसी और के हाथ में चले गए और उसे पता नहीं चला।

शुक्रवार सुबह 8:30 बजे आरव फिर तैयार होकर निकला। इस बार काली गाड़ी गेट पर थी, लेकिन उसके पास राघव खड़ा था। उसके हाथ में वही तांबे का कड़ा चमक रहा था। आरव ने रोहन की खिड़की की तरफ एक पल देखा। पर्दे के पीछे से छोटी-सी परछाईं हिली।

काव्या ने दरवाज़े पर उसका टाई सीधा किया।
—सुरक्षित जाना।
—ज़रूर।

वह गाड़ी में बैठ गया। राघव ने शीशे में उसकी तरफ देखा और बहुत हल्का सिर हिलाया। सड़क पर निकलते ही पीछे एक ग्रे होंडा लग गई। 12 किलोमीटर बाद दूसरी गाड़ी भी पीछे आई। मीरा की टीम पहले से तैयार थी।

लोनावला की तरफ जाते हुए सड़क संकरी होने लगी। बारिश की नमी से पहाड़ों पर धुंध थी। नीचे झील का पानी चुपचाप फैला था। वही मोड़, जहां हादसे सचमुच होते थे और जहां हत्या आसानी से दुर्घटना बन सकती थी।

आगे सड़क के किनारे एक सफेद स्कॉर्पियो खड़ी थी। उसके पास नकली ड्राइवर वाला आदमी खड़ा था। उसने जैसे ही आरव की गाड़ी देखी, फोन कान से लगाया। पीछे वाली ग्रे होंडा पास आने लगी।

राघव ने धीमे से पूछा—
—अब?
आरव ने कहा—
—अब।

अगले ही पल सामने से 2 पुलिस वाहन निकले और सड़क रोक दी। पीछे से मीरा की गाड़ी आई। ग्रे होंडा के दरवाज़े खुलवाए गए। 2 आदमी नीचे गिराए गए। सफेद स्कॉर्पियो वाला भागने की कोशिश करता, उससे पहले एक अधिकारी ने उसे पकड़ लिया।

आरव गाड़ी से नहीं उतरा। उसने सिर्फ झील की तरफ देखा। अगर रोहन ने उसे उस सुबह न रोका होता, तो शायद यही पानी उसकी कहानी का अंतिम पन्ना होता।

उसी समय शहर में काव्या को गिरफ्तार करने पुलिस बंगले में पहुंच चुकी थी। वह पूजा के कमरे में बैठी थी। सामने दीपक जल रहा था। जब महिला अधिकारी ने वारंट पढ़ा, काव्या ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर बस इतना बोली—
—उसने कहा था कि वह पहले भी कर चुका है… लेकिन मैंने विश्वास नहीं किया।

काव्या की आवाज़ टूट गई। शायद उस क्षण उसे समझ आया कि वह किसी प्रेमी के साथ नहीं, एक ऐसे आदमी के साथ खड़ी थी जिसने लालच और अकेलेपन को हथियार बनाया था। पर यह समझ देर से आई थी। उसने भी दस्तावेज़ बदले थे। उसने भी मौत का समय तय किया था। उसने भी अपने पति को गाड़ी तक भेजने के लिए मुस्कान पहनी थी।

मुकदमा लंबा नहीं चला। आदित्य भसीन की पुरानी 2 “दुर्घटनाएं” फिर खुलीं। पहली पत्नी शिमला में खाई में गिरी थी। दूसरी पुणे वाले फार्महाउस में आग में मरी थी। दोनों की पॉलिसी में वही पैटर्न था—नया नाम, अकेली लाभार्थी व्यवस्था, हादसे से पहले बदले हुए दस्तावेज़।

काव्या ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने आरव की तरफ देखा भी नहीं। शायद शर्म से, शायद डर से, शायद इसलिए कि कुछ चेहरे एक बार टूट जाएं तो दोबारा देखे नहीं जाते।

आरव ने अदालत के बाहर कोई बयान नहीं दिया। पत्रकार पूछते रहे—
—सर, आपकी पत्नी ने ऐसा क्यों किया?
—सर, बच्चे ने कैसे बचाया?
—सर, क्या आप उसे माफ करेंगे?

आरव चुपचाप गाड़ी में बैठ गया। हर सवाल का जवाब उसके पास था, फिर भी कोई जवाब पूरा नहीं था। कुछ विश्वास ऐसे टूटते हैं कि उनका शोर बाहर नहीं, अंदर होता है।

बंगला बाद में बदल गया। बड़े झूमर हटे नहीं, मगर उनका घमंड चला गया। ड्राइंग रूम अब मेहमानों के प्रदर्शन के लिए नहीं, रहने के लिए खुला रहने लगा। आरव ने स्टाफ क्वार्टर की जगह सुशीला और रोहन के लिए छोटा-सा अलग घर बनवाया, जिसमें बरामदा था, खिड़कियों पर नीले परदे थे और पीछे तुलसी का पौधा।

सुशीला ने पहले मना किया।
—साहब, इतना सब मत कीजिए। बच्चा तो इंसानियत में बोला था।
आरव ने शांत स्वर में कहा—
—इंसानियत आजकल सबसे महंगी चीज़ है, सुशीला। इसका कर्ज़ पैसा चुकाता नहीं, बस रास्ता बनाता है।

रोहन का स्कूल बदला गया। उसकी फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, सब आरव ने संभाला। मगर उसने कभी उसे एहसान नहीं कहा। वह हमेशा कहता—
—यह उस लड़के में निवेश है, जिसने एक आदमी की नहीं, सच की जान बचाई।

6 महीने बाद एक रविवार की सुबह आरव बगीचे में टहल रहा था। बारिश का मौसम जा चुका था। गुलाब की नई क्यारियां लग गई थीं, वही जगह जहां से रोहन उस सुबह निकला था। पत्थर की दीवार पर रोहन बैठा था। उसकी कॉपी खुली थी। वह बंगले का चित्र बना रहा था, मगर इस बार गेट पर खड़ी काली गाड़ी नहीं थी। चित्र में बरामदे पर उसकी मां थी, एक पेड़ के नीचे राघव था, और रास्ते पर आरव खड़ा था।

आरव उसके पास बैठ गया।
—अब भी उस सुबह का चित्र बनाते हो?
—नहीं साहब, यह बाद वाला घर है। पहले वाला घर डर वाला था। यह वाला थोड़ा ठीक है।

आरव ने कॉपी देखी। बच्चे ने घर की खिड़कियां खुली बनाई थीं।

—तुम्हें अब भी डर लगता है? आरव ने पूछा।
रोहन ने कुछ देर सोचा।
—कभी-कभी। जब कोई गाड़ी गेट पर ज्यादा देर खड़ी रहती है। आपको?

आरव ने लंबी सांस ली।
—मुझे भी। कभी-कभी रात में लगता है कि इंजन की आवाज़ आ रही है। फिर याद आता है कि तुमने मेरी आस्तीन पकड़ ली थी।

रोहन ने धीमे से कहा—
—मां कहती है, सही बात बोलने से मुसीबत बढ़ सकती है, लेकिन गलत बात देखकर चुप रहने से आदमी अंदर से छोटा हो जाता है।

आरव मुस्कुराया। पहली सच्ची मुस्कान, जो कई महीनों बाद उसके चेहरे पर आई थी।
—तुम्हारी मां बहुत समझदार है।

कुछ देर दोनों चुप रहे। हवा में चमेली की खुशबू थी। गेट पर राघव की गाड़ी खड़ी थी, उसके हाथ का तांबे का कड़ा धूप में चमक रहा था।

आरव ने रोहन से पूछा—
—बड़े होकर क्या बनोगे?
रोहन ने कहा—
—शायद वकील। या पुलिस वाला। या फिर कोई ऐसा आदमी, जो आवाज़ सुनकर पहचान सके कि कौन झूठ बोल रहा है।

आरव ने उसकी कॉपी बंद नहीं की। उसने बस बगीचे की ओर देखा, जहां कभी धोखा छिपा था और अब गुलाब उग रहे थे।

उस दिन आरव को पहली बार लगा कि जिंदगी उसे वापस नहीं मिली थी, बल्कि किसी छोटे बच्चे ने उसे नए सिरे से सौंप दी थी। मौत गेट पर इंतज़ार कर रही थी, पत्नी मुस्कुरा रही थी, दुनिया हमेशा की तरह चल रही थी—और एक 10 साल के लड़के ने फुसफुसाकर सब बदल दिया था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.