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गोद भराई में जब अजन्मे बच्चे के तोहफे फाड़ दिए गए, सबने भतीजी को बेचारी कहा, मगर पति ने छिपे संदेश पढ़कर जाना, “नफरत बच्ची ने नहीं, उसकी माँ ने बोई थी”, कम्युनिटी लॉन की खुशियाँ मातम में बदल गईं

PART 1

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गोद भराई की भीड़ के सामने 14 साल की भतीजी ने अजन्मे बच्चे के सारे तोहफे फाड़कर फेंक दिए, और उसकी माँ फिर भी कहती रही कि बच्ची बस “थोड़ी उलझी हुई” है।

नोएडा सेक्टर 50 के उस बड़े कम्युनिटी लॉन में नंदिनी मल्होत्रा 8 महीने के पेट पर हाथ रखे खड़ी रह गई। गुलाबी और क्रीम रंग के गुब्बारे हवा में हिल रहे थे, मेहमानों की चूड़ियों की आवाज़ कुछ देर पहले तक संगीत जैसी लग रही थी, लेकिन अब वही जगह किसी तमाशे के बाद की अदालत लग रही थी।

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थोड़ी देर पहले तक सब कुछ सपने जैसा था। नंदिनी की माँ ने अपने हाथ से बेसन के लड्डू बनाए थे, सहेलियों ने फूलों की सजावट की थी, और मल्होत्रा परिवार के करीब 45 लोग पहले बच्चे की खुशी मनाने आए थे। टेबल पर छोटे-छोटे पैकेट रखे थे—नन्हे कपड़े, दूध की बोतलें, खिलौने, पालना, बच्चे की किताबें और सबसे बीच में वह सफेद ऊनी कंबल रखा था जिसे नंदिनी की दिवंगत नानी ने उसके लिए बचाकर रखा था।

वह कंबल सिर्फ ऊन नहीं था। वह नंदिनी के बचपन, उसकी माँ की खुशबू और उस घर की आखिरी निशानी था जहाँ प्यार बिना शर्त मिलता था।

फिर उसकी सहेली प्रिया हाँफती हुई आई।

— नंदिनी, जल्दी चल… सब बर्बाद हो गया।

नंदिनी ने पहले समझा कि कोई पैकेट गिर गया होगा। पर जैसे ही वह टेबल के पास पहुँची, उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। पैकिंग पेपर चिथड़ों में बिखरे थे। दूध की बोतलों के डिब्बे खुले पड़े थे। छोटे कपड़े मिट्टी में फेंके गए थे। पालने की लकड़ी पर गहरी खरोंच थी। खिलौने के कान उखड़े हुए थे।

और नानी का कंबल बीच से फटा पड़ा था।

टेबल के कोने पर रिया खड़ी थी—नंदिनी के पति अर्जुन की 14 साल की भतीजी। उसके हाथ में बच्चे का एक मुलायम खरगोश वाला खिलौना था, जैसे वह कोई सबूत नहीं, अपनी जीत पकड़े हो।

— मैं नहीं चाहती कि उसे मुझसे पहले सब कुछ मिले, उसने काँपती आवाज़ में कहा। जब यह बच्चा आ जाएगा, अर्जुन मामा मुझे भूल जाएँगे।

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

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— रिया, तुमने यह क्या किया?

रिया ने कंधे उचकाए, मगर उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।

— सब उसी की बात कर रहे थे। जैसे मैं अब कोई हूँ ही नहीं।

नंदिनी के पेट में दर्द-सा उठा। वह प्रसव पीड़ा नहीं थी। वह अपमान था। ऐसा अपमान जो शरीर से ज्यादा आत्मा में चुभता है।

तभी कविता, रिया की माँ और अर्जुन की बड़ी बहन, आगे बढ़ी। उसने बेटी को रोकने के बजाय उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

— बस करो, नंदिनी। बच्ची परेशान है। तुम इसे सबके सामने शर्मिंदा कर रही हो।

नंदिनी ने धीरे से उसकी ओर देखा।

— उसने मेरे बच्चे की चीजें तोड़ी हैं।

— वह बच्ची है।

— वह 14 साल की है।

— तुम गर्भवती हो, इसलिए हर बात को बढ़ा रही हो।

यह वाक्य उन फटे पैकेटों से भी ज्यादा गहरा चुभा।

नंदिनी की माँ कंबल उठाकर रो रही थी। प्रिया की मुट्ठियाँ बंध गई थीं। मेहमान नज़रें झुका चुके थे, जैसे सच देखना भी शर्मनाक हो।

नंदिनी ने गहरी साँस ली।

— आप लोग अभी यहाँ से जाइए।

कविता का चेहरा कठोर हो गया।

— शर्म तुम्हें आनी चाहिए। मेरी बेटी दुखी है और तुम उसे घर से निकाल रही हो।

कविता का पति समीर चुपचाप रिया का हाथ पकड़कर बाहर ले गया। रिया रो रही थी, पर उसने माफी नहीं माँगी। कविता ऐसे निकली जैसे अन्याय उसके साथ हुआ हो।

गोद भराई 15 मिनट और चली, सिर्फ औपचारिकता के लिए। फिर मेहमान एक-एक कर चले गए।

रात को नंदिनी और अर्जुन उसी लॉन में अकेले खड़े थे। फटे रिबन, टूटे खिलौने और मिट्टी लगे छोटे कपड़े उनके चारों ओर पड़े थे।

— मैं बात करूँगा, अर्जुन ने धीमे से कहा। वे माफी माँगेंगी। जो बदला जा सकता है, बदलेंगी।

नंदिनी उसे देखती रही। वह विश्वास करना चाहती थी।

अगली सुबह कविता का मैसेज आया।

“तुमने मेरी बेटी का दिल तोड़ा। उसे बाहर निकालने के बजाय गले लगाना चाहिए था।”

नंदिनी ने स्क्रीन को देर तक देखा।

और उसे समझ आ गया कि असली विनाश कल उस टेबल पर शुरू नहीं हुआ था।

वह इस परिवार में बहुत पहले से पल रहा था।

PART 2

2 हफ्ते तक कविता ने नंदिनी से सीधे बात नहीं की। वह अर्जुन को फोन करती, परिवार के ग्रुप में लंबी बातें लिखती और खुद को एक ऐसी माँ बताती जिसकी बेटी को बेरहमी से ठुकरा दिया गया था। उसने यह भी लिखा कि कुछ लोग बच्चे के दिल से ज्यादा सामान की कीमत समझते हैं।

नंदिनी ने चुपचाप सूची बनाई। कपड़े, बोतलें, खिलौने, पालना, फटा कंबल। प्रिया ने तस्वीरें भेजीं। रविवार को अर्जुन ने सबको अपने माता-पिता के घर बुलाया।

जब तस्वीरें सेंटर टेबल पर रखीं, सन्नाटा बदल गया।

— कविता, तुमने कहा था बस कुछ कागज फटे थे, अर्जुन के पिता ने भारी आवाज़ में कहा।

अर्जुन ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।

— हमें सच्ची माफी चाहिए। और सीमाएँ भी।

कविता दरवाजा पटककर चली गई।

कुछ दिन बाद रिया ने आधी-अधूरी माफी की फोटो भेजी। फिर कुछ नए पार्सल आए, बिना गर्मजोशी के।

नंदिनी ने सोचा तूफान थम रहा है।

लेकिन उसका बेटा विराज 2 हफ्ते पहले पैदा हुआ। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दूसरे दिन नर्स आई।

— नीचे कुछ लोग ऊपर आने की जिद कर रहे हैं।

वे कविता, समीर और रिया थे।

रिया के हाथ में बड़ा पोस्टर था—उसकी और अर्जुन की तस्वीरें, दिल बने हुए, और कोने में नंदिनी की सोनोग्राफी चिपकी थी।

उसी पल नंदिनी समझ गई।

यह जलन रिया ने अकेले नहीं सीखी थी।

किसी ने उसे सिखाया था कि यह बच्चा उसका दुश्मन है।

PART 3

नंदिनी ने तुरंत नर्स से कहा कि कमरे में सिर्फ वही लोग आएँगे जिनके नाम उसने लिखे हैं। नर्स ने बिना सवाल किए सिर हिला दिया। अस्पतालों में काम करने वाले लोग अक्सर समझ जाते हैं कि कुछ रिश्तेदार खुशी मनाने नहीं, अधिकार जताने आते हैं।

अर्जुन नीचे गया। वह 10 मिनट बाद लौटा तो उसकी आँखों में शर्म, गुस्सा और थकान सब एक साथ थे।

— कविता दीदी ने रिसेप्शन पर हंगामा किया, उसने धीमे से कहा। कह रही थीं कि हम रिया की खुशी छीन रहे हैं। कि उसे विराज से मिलने का पूरा हक है।

नंदिनी ने बच्चे को सीने से और कस लिया। उसका शरीर अभी कमजोर था, टाँके खिंच रहे थे, आँखों में नींद नहीं थी, लेकिन उस पल उसके भीतर एक माँ जाग चुकी थी।

— जिस बच्चे की चीजें उसने जन्म से पहले तोड़ दीं, उससे मिलने का हक?

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

— सुरक्षा वालों से बात कर ली है। वे ऊपर नहीं आएँगे।

पर डर वहीं रह गया। पूरी रात नंदिनी हर आहट पर जागती रही। विराज पारदर्शी पालने में सोता था और उसे लगता था कि दुनिया ने उसे जन्म के 2 दिन बाद ही बचाव की जरूरत दे दी है।

छुट्टी वाले दिन नंदिनी की माँ अस्पताल के बाहर खड़ी थी। कार में घर का खाना, कपड़े, डायपर और मेथी के लड्डू रखे थे। प्रिया ने घर पर एक टोकरी छोड़ी थी जिसमें दवाइयाँ, नैपकिन, जूस और एक पर्ची थी—“मेरे सामने मजबूत बनने की जरूरत नहीं।”

नंदिनी वह पर्ची पढ़कर रो पड़ी।

अगले 3 दिन कविता फूल, मिठाई और मैसेज भेजती रही। एक कार्ड पर लिखा था—“उन लोगों की तरफ से जो सच में बच्चे को आशीर्वाद देना चाहते हैं।”

नंदिनी ने अर्जुन से कहा कि सब कुछ गार्ड रूम में दे दो।

फिर फोन रुकने का नाम नहीं ले रहा था। बुआ, चाची, ममेरे भाई, दूर के रिश्तेदार। कोई कहता नंदिनी बहुत कठोर है। कोई कहता रिया भावुक बच्ची है। किसी ने लिख दिया कि नंदिनी ने बच्चे को बहाना बनाकर अर्जुन को उसके परिवार से अलग करना शुरू कर दिया है।

अर्जुन ने अपनी माँ को फोन किया।

— अगर ये पारिवारिक अदालत बंद नहीं हुई तो मैं सारे ग्रुप छोड़ दूँगा। मेरी पत्नी ने अभी बच्चा जन्मा है। मेरा बेटा 5 दिन का है। मैं उन्हें परेशान नहीं होने दूँगा।

माँ चुप रहीं।

— मैं बस शांति चाहती थी, उन्होंने कहा।

— माँ, शांति सच दबाकर नहीं आती। आपने टुकड़े देखने से इनकार किया है।

कुछ दिनों बाद रिया के स्कूल से फोन आया। काउंसलर ने सावधानी से बताया कि रिया कई बार क्लास में रो चुकी है और बार-बार कह रही है कि विराज के आने के बाद अर्जुन मामा उसे प्यार नहीं करेंगे।

नंदिनी का पहला मन हुआ फोन काट दे। लेकिन उसके भीतर कहीं यह भी समझ आया कि एक किशोरी का डर किसी बड़े ने सींचा है। डर जब समय पर रोका न जाए तो वह काँटा बन जाता है।

स्कूल ने एक बैठक रखी—अर्जुन, नंदिनी, रिया, उसके माता-पिता और काउंसलर के साथ। नंदिनी ने साफ शर्त रखी।

— यह बैठक किसी घर में नहीं होगी। स्कूल में होगी, नियमों के साथ।

बैठक वाले दिन रिया कुर्सी के कोने पर बैठी थी। उसकी उंगलियाँ एक मुड़े हुए कागज को दबाए थीं। वह अचानक बहुत छोटी लग रही थी। समीर की आँखों के नीचे काले घेरे थे। कविता बाँहें मोड़े बैठी थी, जैसे उसे सजा दी जा रही हो।

काउंसलर ने पहले सीमाओं की बात की। फिर उसने कहा कि प्यार और कब्जे में फर्क होता है। किसी को चाहना अलग है, उसे बाँधकर रखना अलग।

फिर रिया से कहा गया कि वह अपना लिखा हुआ पढ़े।

रिया की आवाज़ काँप गई।

— मैंने सोचा अगर गिफ्ट नहीं रहेंगे तो सब बच्चे की बात करना बंद कर देंगे। मुझे लगा मामा को याद आएगा कि मैं पहले थी। मुझे पता था वह कंबल जरूरी है। फिर भी मैंने खींचा। मुझे अफसोस है।

कमरे में हवा भारी हो गई।

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। कुछ पल बाद वह बोला।

— रिया, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। जब तुम 4 साल की थीं, मैंने तुम्हें कंधे पर बैठाकर मेले में घुमाया था। तुम्हें साइकिल चलाना मैंने सिखाया था। मेरा बेटा पैदा हुआ है, इसका मतलब यह नहीं कि तुम मिट गईं। लेकिन तुम्हें यह हक नहीं है कि अपने डर की परीक्षा दूसरों को चोट देकर लो।

रिया रोने लगी, मगर इस बार उसने कोई बहाना नहीं बनाया।

काउंसलर ने कविता की ओर देखा।

— अब हमें यह सुनना है कि आप माँ के रूप में क्या जिम्मेदारी लेंगी।

कविता ने ठोड़ी ऊपर की।

— मेरी बेटी बहुत संवेदनशील है। नंदिनी ने उसे सबके सामने अपमानित किया। गर्भावस्था में लोग वैसे भी…

— मैं नंदिनी की बात नहीं पूछ रही, काउंसलर ने बीच में काटा। मैं आपकी जिम्मेदारी पूछ रही हूँ।

कविता चुप हो गई।

उसका वह मौन किसी स्वीकारोक्ति से कम नहीं था।

अंत में लिखित समझौता बना। रिया पूरी माफी लिखेगी। 2 छोटे सुधार के काम करेगी। 2 हफ्ते तक कोई दबाव, कोई मैसेज, कोई रिश्तेदारों के जरिए बात नहीं होगी। उसके बाद एक छोटी मुलाकात हो सकती है—बिना फोटो, बिना गोद में लिए, और बिना कविता के।

कविता ने विरोध करना चाहा।

समीर ने पहली बार साफ आवाज़ में कहा।

— इस बार हम वही करेंगे जो सही है।

नंदिनी ने उसे देखा। पहली बार उसके चेहरे पर सिर्फ झेंप नहीं, बहुत पुरानी थकान थी।

पहला सुधार बुधवार को हुआ। अर्जुन रिया को स्कूल से लेकर घर आया। रिया ने चुपचाप चप्पल उतारी, हाथ धोए और नंदिनी के सामने खड़ी हो गई। नंदिनी ने मेज पर बच्चे के कपड़ों की टोकरी रखी थी।

— इन्हें साइज के हिसाब से अलग करो। 0 महीना, 1 महीना, 3 महीना। जो खराब हैं, अलग रखो।

रिया ने सिर हिला दिया।

करीब 1 घंटा वह छोटे कपड़े तह करती रही। जब उसके हाथ में वह कपड़ा आया जिसका गला फटा था, उसने धीमे से पूछा—

— यह मैंने किया था?

— हाँ।

रिया ने उसे खराब चीजों की ढेरी में रख दिया। उसकी आँखें नीचे थीं।

दूसरी बार वह अर्जुन के साथ रसोई में बोतलें धो रही थी। नंदिनी बैठक में विराज को गोद में लिए बैठी थी। तभी उसे धीमी आवाज़ सुनाई दी।

— बच्चा किसी की जगह नहीं लेता, अर्जुन कह रहा था।

रिया ने लगभग फुसफुसाकर कहा—

— मम्मी कहती थीं लेता है।

नंदिनी ने सिर उठाया।

अर्जुन की आवाज़ थम गई।

— मम्मी क्या कहती थीं, रिया?

रिया जम गई। उसने तुरंत कहा—

— कुछ नहीं।

लेकिन वह “कुछ नहीं” पूरे घर में फैल गया।

कुछ दिनों बाद रिया एक लिफाफा लाई। उसमें 500 रुपये और एक छोटा नोट था। उसने अपनी आर्ट टीचर से पूछा था कि नानी वाले फटे कंबल के टुकड़े फ्रेम में कैसे बचाए जा सकते हैं। वह अपने पॉकेट मनी से उसका हिस्सा देना चाहती थी।

नंदिनी ने नोट पढ़ा तो गला भर आया।

यह काफी नहीं था। कुछ चीजें कभी पूरी नहीं लौटतीं। लेकिन पहली बार यह पछतावा रिया का अपना लग रहा था, किसी बड़े की लिखवाई हुई लाइन नहीं।

उधर समीर ने अर्जुन को फोन किया।

— मुझे तुमसे अकेले मिलना है। हमारे घर में बहुत समय से कुछ गलत चल रहा है।

जब अर्जुन वापस आया, नंदिनी ने उसके चेहरे से समझ लिया कि बात भारी थी।

— समीर तलाक की बात कर रहा है, अर्जुन ने कहा।

नंदिनी ठिठक गई।

— हमारी वजह से?

— नहीं। कविता दीदी की वजह से।

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

— समीर को मैसेज मिले हैं। रिया ने भी बताया। दीदी महीनों से उसे कह रही थीं कि विराज उसकी जगह ले लेगा। कि दादा-दादी अब बच्चे को ज्यादा प्यार करेंगे। कि मैं उसे भूल जाऊँगा। उन्होंने कहा था कि ये सारे गिफ्ट साबित करते हैं कि पैदा होने से पहले ही वह बच्चा रिया से ज्यादा कीमती है।

नंदिनी की पीठ में ठंड उतर गई।

— क्या उन्होंने उसे सब तोड़ने को कहा था?

— सीधे नहीं। पर कहा था कि कभी-कभी अपना दर्द दिखाना पड़ता है। अगर लोग दर्द नहीं देखेंगे तो तुम्हें कुचलते रहेंगे।

कमरा शांत हो गया। विराज पालने में सो रहा था, जैसे वह उस नफरत से बिल्कुल अनजान हो जो उसके आने से पहले ही उसके नाम पर बोई गई थी।

— क्यों? नंदिनी ने धीमे से पूछा।

अर्जुन ने जमीन की ओर देखा।

— समीर ने कहा, कविता दीदी कभी दूसरा बच्चा न होने की बात स्वीकार नहीं कर पाईं। सालों इलाज चला, उम्मीदें टूटीं। उन्होंने बोलना बंद कर दिया, मगर भीतर सब जमा रहा। जब तुम गर्भवती हुईं, उन्हें लगा सबकी रोशनी तुम पर चली गई। और विराज उस रोशनी का प्रतीक बन गया।

नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।

वह दर्द समझ सकती थी। अधूरी इच्छाओं का दुख, दूसरों की खुशी से चुभन, खालीपन जिसे समाज नाम भी नहीं देता—वह सब सच था। लेकिन कोई भी दुख इतना बड़ा नहीं हो सकता कि एक माँ अपनी बेटी को हथियार बना दे और फिर उसके आँसुओं के पीछे छिप जाए।

समीर रिया को अपने साथ रहने ले गया। स्कूल ने नियमित काउंसलिंग शुरू कराई। धीरे-धीरे रिया की भाषा बदलने लगी। वह अब नहीं कहती थी कि अर्जुन मामा उसे प्यार नहीं करते। वह कहती—

— मुझे डर लगता है जब आप कई दिन नहीं मिलते।

एक दिन उसने अर्जुन से पूछा—

— क्या स्कूल के बाद सिर्फ हम 2 चाय पी सकते हैं?

अर्जुन ने पहले नंदिनी से बात की।

नंदिनी ने कहा—

— जाओ। यह स्वस्थ है। उसे प्यार चाहिए, कब्जा नहीं।

कविता ने बहुत कुछ खोया। उसने अपने पति का भरोसा खोया, माता-पिता की अंधी तरफदारी खोई और सबसे ज्यादा अपनी बेटी की आँखों में वह जगह खोई जहाँ माँ को सबसे सुरक्षित होना चाहिए। समीर ने मैसेज, ऑडियो और स्क्रीनशॉट दिखाए जिनमें कविता विराज को “वह बच्चा” कहती थी, जैसे वह कोई खतरा हो।

अर्जुन की माँ एक शाम नंदिनी के घर आईं। उनकी आँखें लाल थीं।

— मैं परिवार बचाना चाहती थी, उन्होंने कहा। सच यह है कि मैंने सबको चुप रहने को कहा ताकि कविता अपनी हरकतें जारी रख सके।

नंदिनी ने तुरंत कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से सिर हिलाया।

— अच्छा है आपने अब सच कहा।

नानी के फटे कंबल के टुकड़े काँच के फ्रेम में लग गए। रिया ने खुद उसे पकड़कर दर्जी आंटी के पास दिया था। उसके पास नंदिनी की माँ ने एक नया कंबल रखा—हल्का पीला, हाथ से बुना हुआ। वह पुराना नहीं था। उसमें नानी की खुशबू नहीं थी। पर जब नंदिनी ने उसे विराज पर डाला, उसे लगा कि स्मृतियाँ कभी-कभी नया रास्ता ढूँढ लेती हैं।

एक दोपहर रिया उस फ्रेम के सामने देर तक खड़ी रही।

— काश मैंने यह कभी नहीं किया होता।

नंदिनी ने विराज को कंधे से लगाए हुए उसे देखा।

— काश। लेकिन कुछ चीजें माफी के बाद भी पहले जैसी नहीं होतीं। इसलिए इंसान को चोट पहुँचाने से पहले रुकना सीखना पड़ता है।

रिया ने सिर झुका दिया। इस बार उसने खुद को बचाने की कोशिश नहीं की।

महीने बीत गए। विराज बड़ा होने लगा। वह सबसे महंगी बोतल से दूध पीने से मना करता और अर्जुन के अजीब चेहरों पर खिलखिलाता। रिया जब आती, तो दूर बैठकर किताब पढ़ती। धीरे-धीरे विराज उसकी उंगली पकड़ने लगा।

नियम फिर भी साफ रहे। कोई अचानक मुलाकात नहीं। कोई फोटो नहीं। कोई दबाव नहीं। और कविता नहीं।

नंदिनी ने उस गोद भराई में एक उत्सव खोया था। उसने नानी का कंबल खोया था। उसने यह भोला भरोसा खो दिया था कि परिवार के बड़े हमेशा सच में परिवार बचाते हैं।

लेकिन उसने एक चीज पाई—अपनी आवाज़।

और उसे समझ आया कि परिवार चुप्पी से नहीं बचता।

परिवार तब बचता है जब कोई काँपती आवाज़ में भी कहता है—बस, अब नहीं।

क्योंकि कभी-कभी जो इंसान रिश्तों की एकता की सबसे ऊँची बातें करता है, वही चुपके से किसी मासूम के दिल में सबसे पहला ज़हर डाल चुका होता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.