
भाग 1
3 साल की पिहू ने जब विवान मेहरा का कोट पकड़कर धीरे से कहा — “मैं गंदी हूँ,” तो 35 साल के उस अरबपति के हाथ से चाय का प्याला लगभग छूट गया।
मुंबई के मालाबार हिल की उस 42वीं मंज़िल वाली हवेली जैसे घर में सब कुछ चमकता था। संगमरमर का फर्श, कांच की दीवारें, चांदी की थालियां, पूजा के कमरे में ताज़े गेंदे के फूल, और इतने बड़े कमरे कि किसी गरीब की पूरी जिंदगी उनमें खो जाए। मगर उस घर के पीछे बने छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में रीना अपनी बेटी पिहू के साथ रहती थी।
रीना 28 साल की थी, विधवा नहीं थी, लेकिन अकेली थी। पिहू के पिता ने उसके जन्म से पहले ही मुंह मोड़ लिया था। रीना ने कभी किसी से शिकायत नहीं की। सुबह 5:30 बजे उठकर वह पूरे घर की सफाई करती, विवान के लिए नाश्ता बनाती, उसकी मां के आने पर पूजा की थाली सजाती, और रात को सब सो जाने के बाद अपनी बेटी के बालों में तेल लगाकर उसे सुलाती।
विवान मेहरा ने 29 साल की उम्र में अपनी तकनीकी कंपनी बेचकर करोड़ों नहीं, अरबों कमाए थे। अखबारों में उसकी तस्वीरें छपती थीं। लोग उसे सफल, शांत और बेहद अनुशासित कहते थे। वह रीना से बुरा व्यवहार नहीं करता था, लेकिन उसे सच में देखता भी नहीं था। रीना उसके घर की व्यवस्था का हिस्सा थी, जैसे परदे, फर्नीचर और दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स।
पिहू उस घर में सबसे छोटी चीज़ थी, लेकिन उसी की आंखों में सबसे ज़्यादा सच्चाई थी। उसके पास 1 पुराना कपड़े का हाथी था, जिसका नाम उसने गोलू रखा था। वह गोलू को खाना खिलाती, उससे बातें करती और रात में उसके बिना सोती नहीं थी।
विवान की मंगेतर ईशानी राठौड़ उस घर में अक्सर आती-जाती थी। बड़े घराने की बेटी, खूबसूरत चेहरा, महंगे कपड़े, और ऐसा अंदाज़ जैसे दुनिया उसके कदमों के नीचे बिछी हो। विवान की मां उसे पसंद करती थी, समाज उसे पसंद करता था, और खुद विवान को लगता था कि यही रिश्ता उसके जीवन को पूरा करेगा।
लेकिन ईशानी की मुस्कान सबके लिए एक जैसी नहीं थी।
1 दिन पिहू ने ड्राइंग रूम में रखे ईशानी के चमकदार पर्स को छू लिया था। बस उंगलियों से हल्का सा। ईशानी ने तुरंत पर्स खींच लिया।
— दूर हटो। ये तुम्हारे छूने की चीज़ नहीं है।
पिहू डर गई, मगर रोई नहीं।
ईशानी झुकी और उसके कान के पास बोली—
— तुम गंदी हो। अपने कमरे में जाओ।
रीना उस समय रसोई में थी। उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। पिहू ने भी कुछ नहीं बताया। उसने बस गोलू को कसकर पकड़ा और 7 दिन तक चुपचाप वही बात अपने छोटे से दिल में दबाए रखी।
फिर 8वें दिन सुबह, जब विवान सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर खिड़की के पास खड़ा था, पिहू धीरे से उसके पास आई। उसने उसका कोट पकड़ा और फुसफुसाई—
— मैं गंदी हूँ?
विवान घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया।
— किसने कहा ये?
पिहू ने मास्टर बेडरूम की ओर इशारा किया, जहां ईशानी अभी सो रही थी।
विवान का चेहरा पत्थर जैसा हो गया। उसी पल दरवाज़े पर रीना नाश्ते की ट्रे लेकर खड़ी थी, और पहली बार उसे लगा कि इस घर में कोई तूफान आने वाला है।
भाग 2
विवान ने ट्रे को देखे बिना कहा—
— रीना, नाश्ता रहने दो।
रीना के हाथ कांप गए। इतने सालों में उसने विवान की आवाज़ को इतना ठंडा कभी नहीं सुना था।
वह सीधे ईशानी के कमरे की ओर गया। दरवाज़ा हल्का खुला था। ईशानी शीशे के सामने बैठी अपने बाल ठीक कर रही थी। उसने विवान को देखकर मुस्कुराने की कोशिश की।
— इतनी सुबह? क्या बात है?
विवान ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
— तुमने पिहू से कहा कि वह गंदी है?
ईशानी की मुस्कान 1 पल को अटक गई, फिर वह हंस दी।
— अरे विवान, बच्चे तो कुछ भी बोल देते हैं। उसने मेरा पर्स छू लिया था। मैंने बस उसे समझाया था।
— वह 3 साल की है।
— और मैं अपनी चीज़ों की रक्षा कर रही थी। तुम इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहे हो? वह रीना की बेटी है, घर की मालकिन नहीं।
ये वाक्य कमरे में चाबुक की तरह पड़ा।
विवान ने उसे ध्यान से देखा। वही चेहरा, जिससे वह शादी करने वाला था। वही लड़की, जिसके लिए 8 कैरेट की अंगूठी खरीदी गई थी। वही मुस्कान, जो हर समारोह में देवताओं जैसी लगती थी। मगर आज उस मुस्कान के पीछे की घृणा साफ दिख रही थी।
— तुमने रीना को बताया?
— बताने जैसी बात ही क्या थी?
— 7 दिन तक 3 साल की बच्ची खुद को गंदी समझती रही।
ईशानी चिढ़ गई।
— विवान, तुम एक नौकरानी और उसकी बच्ची के लिए मेरे चरित्र पर सवाल उठा रहे हो?
विवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह बाहर आया। रीना अभी भी रसोई के पास खड़ी थी। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
— रीना, बैठो।
— साहब, मुझसे कोई गलती हुई है क्या?
वह शब्द सुनकर विवान के भीतर कुछ टूट गया। जिसे दुख मिला था, वही माफी मांग रही थी।
तभी पिहू अपने हाथी गोलू को लेकर बाहर आई और रीना के पल्लू से चिपक गई।
ईशानी भी पीछे से आ गई। उसने बनावटी नरमी से कहा—
— चलो ठीक है, मैं बच्ची से माफी मांग लेती हूं। बात खत्म।
विवान ने मुड़कर उसे देखा।
— बात खत्म नहीं हुई, ईशानी। बात अभी शुरू हुई है।
भाग 3
उस सुबह के बाद घर में खामोशी अलग तरह की हो गई। पहले खामोशी व्यवस्था की थी, अब खामोशी सच की थी। रीना को लग रहा था कि उसकी नौकरी खत्म हो जाएगी। उसे सबसे ज़्यादा डर अपने लिए नहीं, पिहू के लिए था। वह जानती थी कि मुंबई जैसे शहर में सिर पर छत खोना सिर्फ परेशानी नहीं, जीवन का टूट जाना होता है।
रीना ने उस दिन खाना बनाते समय 3 बार नमक कम डाला, 2 बार चाय उबलकर बाहर आ गई, और पिहू से बार-बार पूछती रही—
— बेटा, किसी ने और कुछ कहा था क्या?
पिहू बस गोलू को पकड़कर चुप बैठी रही। वह अभी भी पूरी बात नहीं समझती थी। उसे बस इतना पता था कि ईशानी दीदी की आंखें उसे देखकर सख्त हो जाती थीं, और आज बड़े साहब उसके लिए ज़मीन पर बैठ गए थे।
विवान अपने कमरे में बंद था। उसका फोन लगातार बज रहा था। ईशानी के संदेश, उसकी मां के संदेश, ईशानी के पिता का फोन, शादी की तैयारी कर रहे इवेंट वालों के फोन। 2 महीने बाद शादी होनी थी। राजस्थान के उदयपुर में 3 दिन का समारोह तय था। अखबारों में खबर जा चुकी थी। बिजनेस जगत, फिल्मी दुनिया और राजनीति से जुड़े मेहमान बुलाए जा चुके थे।
लेकिन विवान के भीतर किसी शादी की धुन नहीं बज रही थी। उसके कानों में सिर्फ पिहू की आवाज़ थी—
— मैं गंदी हूँ?
वह सोचता रहा कि 2 साल से रीना उसके घर में रह रही थी। उसने कभी उसके कमरे को देखा तक नहीं। उसे पता था कि सर्वेंट क्वार्टर है, पर कैसा है, ये जानने की ज़रूरत उसने कभी महसूस नहीं की। उसे पता था कि रीना की बेटी है, पर वह बच्ची कैसी है, क्या खाती है, किससे डरती है, किससे हंसती है—इससे उसका कोई लेना-देना नहीं रहा।
वह बुरा आदमी नहीं था, लेकिन क्या सिर्फ बुरा न होना काफी था?
दोपहर को विवान पहली बार रीना के क्वार्टर तक गया। दरवाज़ा आधा खुला था। उसने दस्तक दी। रीना घबरा गई।
— साहब, अंदर थोड़ा बिखरा है। मैं अभी साफ कर देती हूं।
विवान दरवाज़े पर ही रुक गया। कमरा सचमुच साफ था, लेकिन बहुत छोटा। 1 लोहे का पलंग, फर्श पर पिहू का छोटा गद्दा, 1 नीली बाल्टी, 1 प्लास्टिक की अलमारी, और खिड़की जो खुलती भी थी तो सामने सिर्फ दूसरी इमारत की दीवार दिखती थी।
पिहू अपने गद्दे पर बैठी गोलू को रुमाल ओढ़ा रही थी।
— गोलू को बुखार है? विवान ने पूछा।
पिहू ने गंभीरता से सिर हिलाया।
— उसे चाय नहीं चाहिए, दूध चाहिए।
विवान हल्का मुस्कुराया। रीना ने यह मुस्कान पहली बार देखी थी। वह ऐसी नहीं थी जैसी बिजनेस पत्रिकाओं में छपती थी। यह सचमुच की मुस्कान थी।
— पिहू, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं।
बच्ची ने उसे देखा।
विवान घुटनों के बल बैठ गया।
— तुम गंदी नहीं हो। तुम बहुत प्यारी हो। तुम्हारे कपड़े गंदे हो सकते हैं, हाथ गंदे हो सकते हैं, लेकिन बच्चा कभी गंदा नहीं होता। समझीं?
पिहू ने धीरे से पूछा—
— फिर ईशानी दीदी ने क्यों बोला?
विवान के पास तुरंत उत्तर नहीं था। उसने सच चुना।
— क्योंकि उन्होंने गलत बोला।
रीना की आंखों में पानी भर आया। उसने मुंह फेर लिया, क्योंकि वह रोते हुए दिखना नहीं चाहती थी। जीवन ने उसे सिखाया था कि गरीब औरत के आंसू भी अक्सर उसके खिलाफ इस्तेमाल होते हैं।
शाम को ईशानी अपने पिता के साथ आई। उसके पिता राघव राठौड़ दिल्ली के बड़े उद्योगपति थे। साथ में विवान की मां सावित्री मेहरा भी थीं। तीनों के चेहरे पर अलग-अलग तरह की नाराज़गी थी।
सावित्री मेहरा ने आते ही कहा—
— विवान, ये सब क्या तमाशा है? 3 साल की बच्ची की बात पर रिश्ता तोड़ा नहीं जाता।
राघव राठौड़ ने गंभीर आवाज़ में कहा—
— हमारे परिवार की इज़्ज़त जुड़ी है इस शादी से। ईशानी ने अगर कुछ कह भी दिया तो माफी मांगने को तैयार है। बात यहीं खत्म करो।
ईशानी अब रोने की कोशिश कर रही थी। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ में अभी भी वही अहंकार छिपा था।
— मैं मानती हूं मुझसे गलती हुई। लेकिन क्या मेरी 1 गलती के लिए तुम मुझे सबके सामने अपमानित करोगे?
विवान ने शांत स्वर में कहा—
— गलती तब होती है जब इंसान पैर से किसी का खिलौना तोड़ दे। किसी बच्चे को नीचा समझना गलती नहीं, सोच होती है।
सावित्री ने तेज़ आवाज़ में कहा—
— और वह बच्ची है कौन? घर की नौकरानी की बेटी। तुम उसकी वजह से अपने बराबर के घराने की लड़की को ठुकरा दोगे?
ये सुनकर रीना रसोई के अंदर जम गई। उसने पिहू को अपने पीछे छिपा लिया। उसका सिर झुक गया। वही पुराना डर फिर लौट आया। घर, नौकरी, इज़्ज़त, रोटी—सब किसी और की कृपा पर टिका था।
लेकिन इस बार विवान ने देखा।
पहली बार उसने अपनी मां के शब्दों में भी वही अहंकार पहचाना जो ईशानी की आंखों में था। शायद यह सिर्फ ईशानी की समस्या नहीं थी। यह उस पूरे संसार की बीमारी थी जिसमें लोग इंसान को उसके कपड़ों, काम और जेब से नापते थे।
विवान ने धीरे से कहा—
— मां, रीना इस घर में काम करती है, इसलिए छोटी नहीं हो जाती। और पिहू 3 साल की बच्ची है, इसलिए किसी की दया की मोहताज नहीं हो जाती।
सावित्री सन्न रह गईं।
राघव राठौड़ ने कड़वाहट से कहा—
— तुम बाद में पछताओगे, विवान। ऐसे फैसले भावुकता में नहीं लिए जाते।
विवान ने ईशानी की ओर देखा।
— मैं भावुक होकर शादी नहीं तोड़ रहा। मैं साफ देखकर शादी तोड़ रहा हूं।
ईशानी का चेहरा बदल गया। आंसू गायब हो गए।
— तो सच बोलो, विवान। तुम मुझे उस कामवाली के लिए छोड़ रहे हो?
कमरा चुप हो गया। रीना ने पिहू के कान ढंक दिए।
विवान ने बहुत धीमे, लेकिन साफ शब्दों में कहा—
— मैं तुम्हें रीना के लिए नहीं छोड़ रहा। मैं तुम्हें तुम्हारे लिए छोड़ रहा हूं।
ईशानी ने अंगूठी उतारकर मेज पर फेंक दी। हीरा संगमरमर से टकराकर खनका। वह आवाज़ बहुत छोटी थी, मगर उस दिन पूरे घर ने उसे सुना।
— तुम्हें पछताना पड़ेगा।
विवान ने कहा—
— शायद। लेकिन तुमसे शादी करता तो पूरी जिंदगी पछताता।
उस रात ईशानी चली गई। उसके साथ उसकी महक, उसके महंगे कपड़े, शादी की फाइलें और वह नकली शांति भी चली गई जो इतने महीनों से घर में फैली हुई थी।
रीना ने अगले दिन इस्तीफा देने की कोशिश की।
वह सुबह विवान के सामने खड़ी हुई। हाथ में 1 पुराना लिफाफा था।
— साहब, मैं समझती हूं कि मेरी वजह से बहुत परेशानी हुई। मैं महीने के अंत तक चली जाऊंगी। बस अगर आप पिहू के लिए 2 हफ्ते दे दें तो मैं कोई जगह ढूंढ लूंगी।
विवान ने लिफाफा नहीं लिया।
— तुम्हारी वजह से परेशानी नहीं हुई, रीना। तुम्हारी वजह से सच सामने आया।
— लेकिन लोग क्या कहेंगे?
— लोग हमेशा कुछ कहेंगे। पहली बार मैं खुद से पूछ रहा हूं कि मैं क्या कहूंगा।
रीना ने सिर झुका लिया।
— मैं यहां रहूं तो भी डर लगेगा।
यह बात विवान को चुभी। उसने पहली बार समझा कि किसी को सुरक्षा देना सिर्फ ताला, दीवार और वेतन देना नहीं होता। सुरक्षा वह होती है जिसमें इंसान सांस ले सके।
उसने उसी दिन घर के प्रबंधक को बुलाया। सर्वेंट क्वार्टर बदलवाया गया। रीना और पिहू को घर के पीछे की कोठरी से निकालकर अतिथि कक्ष के पास वाले छोटे लेकिन खुले कमरे में रखा गया, जहां खिड़की से आसमान दिखता था। पिहू के लिए 1 छोटा पलंग आया, रंगीन चादर आई, किताबों की अलमारी आई, और गोलू के लिए भी 1 छोटा तकिया आया।
रीना ने विरोध किया—
— साहब, इतना मत कीजिए। लोग गलत समझेंगे।
विवान ने कहा—
— अभी तक लोग सही समझ रहे थे क्या?
धीरे-धीरे घर का रिवाज़ बदलने लगा। पहले रीना रसोई में खाती थी, पिहू कमरे में। अब सप्ताह में 2 रातें विवान उनके साथ भोजन करने लगा। शुरुआत अजीब थी। रीना प्लेट परोसकर खड़ी हो जाती।
— बैठो, विवान कहता।
— आदत नहीं है, साहब।
— आदत बदल सकती है।
पिहू सबसे जल्दी बदली। वह डाइनिंग टेबल पर गोलू को बिठाती, उसे रोटी का टुकड़ा देती और फिर विवान से पूछती—
— तुम्हारे पास बचपन में गोलू था?
विवान ने कहा—
— नहीं। मेरे पास खिलौने थे, लेकिन गोलू जैसा दोस्त नहीं था।
— इसलिए तुम हमेशा चुप रहते हो?
रीना ने तुरंत डांटा—
— पिहू।
विवान पहली बार खुलकर हंसा।
— शायद।
उस हंसी ने घर की हवा बदल दी।
महीने बीतते गए। ईशानी के परिवार ने बहुत बातें फैलाने की कोशिश की। समाज में कहा गया कि विवान पर नौकरानी ने असर कर दिया है। उसकी मां कई दिनों तक उससे नाराज़ रहीं। रिश्तेदारों ने फोन किए। कुछ ने सलाह दी, कुछ ने ताना मारा, कुछ ने पूछा कि क्या वह पागल हो गया है।
लेकिन विवान का निर्णय नहीं बदला।
उसे रीना में कोई चमकदार बात नहीं दिखी थी। उसे उसमें कुछ और दिखा था—थकान के बावजूद गरिमा, गरीबी के बावजूद साफ मन, डर के बावजूद अपनी बेटी के लिए अडिग प्रेम। और सबसे बड़ी बात, उसने कभी अपनी मजबूरी को हथियार नहीं बनाया।
1 शाम विवान ने देखा कि रीना रसोई में पुरानी कॉपी में कुछ लिख रही थी। उसने पूछा—
— क्या लिख रही हो?
रीना घबरा गई।
— कुछ नहीं। बस खर्चा।
पिहू ने बीच में बोल दिया—
— मम्मा खाना वाली पढ़ाई करना चाहती हैं।
रीना ने तुरंत उसे देखा, लेकिन देर हो चुकी थी।
विवान ने शांत स्वर में पूछा—
— खाना वाली पढ़ाई?
रीना ने झेंपते हुए कहा—
— पोषण विज्ञान। पहले सोचा था कि पढ़ूंगी। 2 बार दाखिला लिया था, लेकिन फीस, पिहू, काम… सबके कारण छोड़ना पड़ा। अब उम्र निकल गई।
— 28 उम्र निकलना नहीं होता।
रीना चुप रही। वह सपने देखने से डरती थी, क्योंकि सपने गरीबों के लिए कई बार नया अपमान बन जाते हैं।
3 महीने बाद रीना के नाम 1 पत्र आया। मुंबई के प्रतिष्ठित पाक-कला और पोषण संस्थान से। 4 साल की पूरी छात्रवृत्ति। फीस, किताबें, आने-जाने का खर्च, सब जमा।
रीना पत्र लेकर विवान के अध्ययन कक्ष में गई। उसकी आवाज़ कांप रही थी।
— आपने किया है?
विवान ने झूठ नहीं बोला।
— हां।
— क्यों?
— क्योंकि तुमने अपने सपने को सिर्फ इसलिए दबा दिया था क्योंकि दुनिया ने तुम्हें जीने का समय ही नहीं दिया।
रीना की आंखें भर आईं।
— मैं एहसान कैसे उतारूंगी?
— इसे एहसान मत बनाओ। इसे पूरा करो।
रीना ने पहली बार उसे नाम से पुकारा।
— विवान जी…
वह रुक गई। जैसे कोई अदृश्य दीवार टूटते-टूटते बची हो।
विवान ने धीरे से कहा—
— सिर्फ विवान भी ठीक है।
रीना मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आंखों में पहली बार डर से अलग कोई रोशनी थी।
पिहू की देखभाल के लिए 1 बुजुर्ग आया रखी गईं, शांता काकी, जो बच्चों को कहानियां सुनाती थीं और गोलू को भी रोज़ प्रणाम करती थीं। रीना सुबह पढ़ाई करने जाती, दोपहर लौटती, शाम को काम संभालती। विवान ने कई बार कहा कि वह नौकरी छोड़ सकती है, लेकिन रीना ने मना कर दिया।
— जब तक मैं अपने पैरों पर पूरी तरह खड़ी नहीं हो जाती, मुझे काम करना है। लेकिन अब सिर झुकाकर नहीं।
उसके इस उत्तर ने विवान को उससे और गहरा सम्मान करना सिखाया।
समय के साथ सावित्री मेहरा का क्रोध भी ढीला पड़ा। 1 दिन उन्होंने पिहू को मंदिर के सामने बैठे देखा। पिहू गोलू के हाथ जोड़कर आरती करवा रही थी।
— भगवान जी, गोलू को चॉकलेट चाहिए।
सावित्री के होंठों पर अनचाही मुस्कान आ गई। पिहू ने उन्हें देखा और पूछा—
— दादी, गोलू गंदा है?
सावित्री का चेहरा उतर गया। उन्हें शायद पहली बार समझ आया कि बड़े लोग जो शब्द यूं ही फेंक देते हैं, बच्चे उन्हें अपने भीतर घर बना लेने देते हैं।
वह धीरे से पिहू के पास बैठीं।
— नहीं बेटा। गोलू भी प्यारा है। तुम भी प्यारी हो।
पिहू ने तुरंत पूछा—
— मम्मा भी?
सावित्री ने रसोई में खड़ी रीना की ओर देखा। कुछ पल लगे। फिर उन्होंने कहा—
— हां, तुम्हारी मम्मा भी।
रीना ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस दिन चाय बनाते समय उसके हाथ नहीं कांपे।
1 साल बाद घर फिर फूलों से सजा, पर इस बार किसी दिखावे वाली शादी के लिए नहीं। रीना ने अपने संस्थान में पहला स्थान पाया था। छोटा सा समारोह रखा गया था। पिहू ने गुलाबी लहंगा पहना था, गोलू के गले में भी रिबन था। विवान ने खुद मिठाई की थाली उठाई। सावित्री ने रीना को आशीर्वाद दिया।
— बहुत आगे जाओ।
रीना ने झुककर उनके पैर छुए, लेकिन इस बार यह डर से नहीं, सम्मान से था।
शाम ढल रही थी। खिड़की के बाहर मुंबई की रोशनियां जलने लगी थीं। विवान सोफे पर बैठा किताब पढ़ रहा था। पिहू दौड़कर उसके पास आई, उसकी किताब बंद की और बहुत गंभीर चेहरे से बोली—
— विवान, तुम मेरे अपने हो।
विवान ने उसे देखा। 1 बच्ची, जिसने कभी खुद को गंदा मान लिया था, अब बिना डरे किसी को अपना कह रही थी। उसके गले में कुछ अटक गया।
— और तुम मेरी अपनी हो।
रीना दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने यह सुना। उसकी आंखें नम थीं, लेकिन इस बार वे आंसू बोझ के नहीं थे। वे उस जीवन के थे जो खत्म नहीं हुआ था, बस देर से खुला था।
विवान ने उस दिन समझा कि इंसान बड़ी कंपनियां बनाकर महान नहीं होता। कभी-कभी महानता तब शुरू होती है जब वह अपने ही घर के सबसे छोटे कमरे का दरवाज़ा खोलता है।
और पिहू ने समझा कि वह गंदी नहीं थी।
गंदगी उस शब्द में थी, जिसने उसे तोड़ने की कोशिश की थी।
उसका दिल तो हमेशा से साफ था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.