
PART 1
70वें जन्मदिन की शाम, शकुंतला देवी के अपने ही बच्चों ने उनके सामने बचे हुए सूखे ब्रेड, खट्टी मलाई और टूटे बिस्कुटों से बना केक रख दिया, जिस पर टेढ़े अक्षरों में लिखा था—“अब तुम बस जगह घेरती हो।”
लखनऊ के पुराने चौक इलाके की वह हवेली उस पल किसी श्मशान जैसी ठंडी हो गई। बाहर गली में चाट की खुशबू थी, मंदिर की घंटियां बज रही थीं, पड़ोस की औरतें छतों से झांक रही थीं, लेकिन अंदर शकुंतला देवी की सांस जैसे छाती में अटक गई।
वह 70 साल की थीं। सफेद बालों को हमेशा करीने से जूड़े में बांधतीं, हल्की सूती साड़ी पहनतीं और हर मेहमान को चाय पूछे बिना बैठने नहीं देतीं। उनके पति हरिनारायण अग्रवाल को गुजरे 5 साल हो चुके थे। कभी दोनों ने इसी घर के आंगन में अचार और पापड़ बेचकर अपनी छोटी सी किराना दुकान शुरू की थी। फिर वही दुकान बढ़कर अमीनाबाद में 2 मंजिला जनरल स्टोर बनी। उसी कमाई से बच्चों की पढ़ाई हुई, शादियां हुईं, गाड़ियां आईं, फ्लैट खरीदे गए।
पर पति के जाने के बाद बच्चों की आवाज बदल गई थी।
बड़ा बेटा विनय अब हर मुलाकात में कहता, “मां, उम्र हो गई है, कागज साफ कर दो।”
बेटी कविता मिठास लगाकर पूछती, “मम्मी, गहने लॉकर में रखना सुरक्षित नहीं है, मेरे पास रख दो।”
छोटा बेटा रोहित हंसते हुए बोलता, “हवेली खाली पड़ी रहती है, इसे बेचकर सबको हिस्सा मिल जाए तो अच्छा रहेगा।”
शकुंतला देवी हर बार मुस्कुरा देतीं। उन्हें लगता, खून के रिश्ते थोड़े लालची हो जाएं तो भी टूटते नहीं। शायद बच्चे व्यस्त हैं। शायद बहुएं समझाती होंगी। शायद वक्त बदल गया है।
उस दिन सुबह से उन्होंने घर सजाया था, जबकि बच्चों ने कहा था कि सब इंतजाम वे करेंगे। उन्होंने चांदी की थाली निकाली, हरिनारायण की तस्वीर के आगे गेंदे के फूल रखे और मन ही मन सोचा, “आज बच्चे सच में साथ बैठेंगे।”
शाम को तीनों बच्चे अपनी-अपनी पत्नियों, पति और बच्चों के साथ आए। किसी ने पैर छूए, पर आंखों में अपनापन नहीं था। खाना बाहर से आया था। प्लास्टिक के डब्बों में छोले, बासी पूरियां, ठंडी टिक्की और सस्ती मिठाई। फिर भी शकुंतला देवी ने शिकायत नहीं की।
खाने के बाद रोहित ने लाइट बंद की। विनय ने ताली बजाई। कविता एक थाली लेकर आई। उसी में वह अपमान पड़ा था—केक नहीं, जैसे किसी ने उनकी पूरी जिंदगी को कचरे में मिलाकर सामने रख दिया हो।
पोते-पोतियां चुप हो गए। बहुएं होंठ दबाकर हंसने लगीं। रोहित मोबाइल उठाकर रिकॉर्ड करने लगा।
“दादी का रिएक्शन देखो,” उसने कहा, “आज तो धमाका होगा।”
विनय ने केक की तरफ इशारा किया। “मां, आप ही तो कहती थीं खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए।”
कविता बोली, “और आपकी उम्र में स्वाद का क्या फर्क पड़ता है?”
शकुंतला देवी ने केक नहीं काटा। उन्होंने बस उस वाक्य को देखा। “अब तुम बस जगह घेरती हो।”
उनकी आंखों में आंसू नहीं आए। शायद अपमान जब सीमा पार कर जाए, तो आंखें भी साथ छोड़ देती हैं।
धीरे से उन्होंने हरिनारायण की तस्वीर की तरफ देखा। फिर बच्चों की तरफ।
“आज समझ में आ गया,” उन्होंने शांत आवाज में कहा, “कि मैंने जिनके लिए जिंदगी काट दी, वे मेरी जिंदगी का हिसाब मेरे जीते जी लगाने लगे।”
रात में सब लोग हंसते, बातें करते, गंदे बर्तन छोड़ते हुए चले गए। वह सड़ा हुआ केक मेज पर पड़ा रहा। शकुंतला देवी ने घर का दरवाजा बंद किया, अलमारी से पुरानी डायरी निकाली और अपने पति के पुराने वकील राजीव मेहरा का नंबर मिलाया।
आधी रात थी, पर उनकी आवाज बिल्कुल साफ थी।
“मेहरा जी,” उन्होंने कहा, “कल सुबह वसीयत बदलनी है।”
फोन के उस पार कुछ पल सन्नाटा रहा।
और उसी सन्नाटे में शकुंतला देवी ने तय कर लिया कि अब इस घर की दीवारें सिर्फ खून के रिश्तों की गवाही नहीं देंगी।
PART 2
अगली सुबह शकुंतला देवी नीली फाइल लेकर राजीव मेहरा के दफ्तर पहुंचीं। उनके कदम धीमे थे, लेकिन फैसला पत्थर जैसा मजबूत था।
मेहरा जी हरिनारायण के दोस्त रहे थे। उन्होंने दोनों को पापड़ बेचते देखा था, दुकान बनते देखी थी, और यह भी देखा था कि शकुंतला देवी ने अपने बच्चों के लिए कितनी बार अपनी दवाइयां तक टाल दीं।
“भाभी जी, पक्का सोच लिया?” उन्होंने पूछा।
शकुंतला देवी ने पुराने कागज मेज पर रख दिए।
पुरानी वसीयत में हवेली, दुकान का हिस्सा, बैंक की रकम और गहने विनय, कविता और रोहित में बराबर बंटने थे। मेहरा जी ने पढ़ा, फिर उनका चेहरा बुझ गया।
“क्या हुआ?”
शकुंतला देवी ने सब बता दिया—सड़ा केक, लिखी हुई बात, बच्चों की हंसी, मोबाइल की रिकॉर्डिंग।
मेहरा जी ने धीमे से कहा, “यह मजाक नहीं था। यह अपमान था।”
शकुंतला देवी बोलीं, “और अपमान को विरासत नहीं मिलती।”
नई वसीयत बनी। हर बच्चे को 1 रुपया। बाकी संपत्ति वृद्धाश्रम, विधवा सहायता केंद्र और उस सामुदायिक रसोई के नाम, जहां शकुंतला देवी महीनों से चुपचाप सेवा करती थीं।
लेकिन असली मोड़ 3 हफ्ते बाद आया।
रोहित ने वही वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिया था। लोग हंस नहीं रहे थे। लोग जल रहे थे गुस्से से।
अब बच्चे मां से माफी नहीं, अपनी इज्जत बचाने आ रहे थे।
PART 3
रविवार की दोपहर हवेली के बाहर अचानक 3 गाड़ियां आकर रुकीं। पहले विनय उतरा। उसके माथे पर पसीना था, जबकि मौसम बादलों भरा था। उसके पीछे उसकी पत्नी नीलम थी, जो हमेशा सोने की चूड़ियों की खनक से घर में अपनी हैसियत जताती थी। फिर कविता उतरी, बड़े चश्मे और कांपते होंठों के साथ। उसका पति दूर ही खड़ा रहा, जैसे विवाद से उसका कोई लेना-देना न हो। सबसे आखिर में रोहित आया, मोबाइल हाथ में था, चेहरा पीला था।
शकुंतला देवी आंगन में तुलसी को पानी दे रही थीं। उन्होंने दरवाजा खुला छोड़ रखा था, पर दिल बंद कर लिया था।
विनय बिना नमस्ते किए अंदर आया।
“मां, यह सब क्या चल रहा है?”
शकुंतला देवी ने लोटा नीचे रखा। “तुम्हारे घर में घुसने का तरीका भी तुम्हारे संस्कार जैसा हो गया है।”
नीलम बोली, “मम्मी जी, बात को बढ़ाइए मत। समाज में हमारी थू-थू हो रही है।”
“समाज में?” शकुंतला देवी ने उसकी तरफ देखा। “जिस दिन तुम सबने मेरी मेज पर वह केक रखा था, उस दिन यह घर समाज से छोटा नहीं था।”
रोहित ने जल्दी से कहा, “मां, मैंने वीडियो हटा दिया है। गलती हो गई। आजकल लोग हर बात को गलत ले लेते हैं।”
“लोगों ने गलत लिया?” शकुंतला देवी ने पूछा। “या पहली बार किसी ने सही देखा?”
कविता रोने लगी। “मम्मी, आप समझती क्यों नहीं? बच्चों ने भी देख लिया। स्कूल में उनसे सवाल हो रहे हैं।”
शकुंतला देवी का चेहरा कठोर नहीं था, पर उसमें वह पुरानी नरमी भी नहीं बची थी जिसे बच्चे हमेशा हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे।
“जब मेरे पोते-पोतियों ने मुझे अपमानित होते देखा था, तब तुम्हें उनकी चिंता नहीं हुई?”
विनय ने आवाज ऊंची की। “अब एक केक के लिए इतना तमाशा? हम आपके बच्चे हैं।”
शकुंतला देवी ने धीरे-धीरे सोफे पर बैठते हुए कहा, “बच्चे? मेरे बच्चे वे थे, जिन्हें मैंने बुखार में रात भर गोद में रखा। जिन्हें पढ़ाने के लिए मैंने अपनी शादी की साड़ी तक बेच दी। जिनकी फीस भरने के लिए तुम्हारे पिता ने दुकान में 18 घंटे खड़े होकर काम किया। पर जो लोग अपनी 70 साल की मां को ‘जगह घेरने वाली’ कहकर हंसते हैं, वे कौन हैं, यह मैं अब तक समझ रही हूं।”
कमरे में सन्नाटा गिर गया।
विनय ने बात मोड़ने की कोशिश की। “मां, हमें पता चला है कि आप मेहरा जी के पास गई थीं। क्या बदला है आपने?”
शकुंतला देवी ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।
“वसीयत।”
कविता ने रोना बंद कर दिया।
रोहित का मोबाइल हाथ से लगभग छूट गया।
नीलम आगे बढ़ी। “मम्मी जी, गुस्से में ऐसे फैसले नहीं लेते। इतनी बड़ी हवेली है, दुकान है, बैंक बैलेंस है। आखिर यह सब किसके लिए है?”
“उनके लिए,” शकुंतला देवी बोलीं, “जिन्हें सच में छत, दवा और गरम खाना चाहिए। जिनके बच्चे उन्हें रेलवे स्टेशन पर छोड़ जाते हैं। जिन विधवाओं से किराया मांगकर मकान मालिक सामान बाहर फेंक देते हैं। जिन बूढ़ों की थाली में सब्जी से ज्यादा इंतजार होता है।”
विनय का चेहरा लाल हो गया। “मतलब?”
“मतलब,” शकुंतला देवी ने साफ कहा, “तुम 3 लोगों को 1-1 रुपया मिलेगा।”
कविता ने सांस खींची जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मार दिया हो।
रोहित फुसफुसाया, “मां, आप ऐसा नहीं कर सकतीं।”
“कर चुकी हूं।”
विनय खड़ा हो गया। “यह घर पापा का था। हमारा भी हक है।”
शकुंतला देवी की आवाज पहली बार कड़ी हुई। “यह घर तुम्हारे पिता और मैंने खरीदा था। उस समय तुम स्कूल की कॉपी खोकर रोते थे। यह दीवारें मेरे हाथ की मेहंदी से नहीं, मेरी मेहनत के पसीने से बनी हैं। हक उसी को मिलता है जो रिश्ता निभाता है, केवल जन्म प्रमाणपत्र दिखाने से नहीं।”
कविता धीरे से बोली, “पापा होते तो आपको रोकते।”
यह वाक्य हवा में तीर की तरह गया। शकुंतला देवी की उंगलियां कांपीं, पर वह टूटीं नहीं।
“तुम्हारे पापा आखिरी रात अस्पताल में तुम्हें बुला रहे थे,” उन्होंने कहा। “विनय व्यापार मीटिंग में था। कविता किटी पार्टी में थी। रोहित गोवा में छुट्टी मना रहा था। मैंने झूठ बोला था उनसे कि बच्चे रास्ते में हैं। वे तुम्हारा इंतजार करते हुए चले गए। आज उनका नाम लेकर मेरी शर्म ढकने की कोशिश मत करो।”
विनय की नजर झुक गई, पर पछतावे से नहीं, पकड़े जाने की जलन से।
तभी दरवाजे पर खांसी की आवाज आई। पड़ोस की रेखा आंटी खड़ी थीं, वही जो सालों से शकुंतला देवी के घर आकर हाल पूछती थीं। उनके साथ सामुदायिक रसोई के संचालक अमरजीत सिंह और 2 बुजुर्ग महिलाएं भी थीं।
विनय भड़क गया। “अब बाहरी लोगों को भी बुला लिया?”
शकुंतला देवी बोलीं, “नहीं। ये लोग हर रविवार आते हैं। हम लोग आज वृद्धाश्रम की नई रसोई की योजना देखने वाले थे।”
अमरजीत सिंह ने विनम्रता से हाथ जोड़े। “माता जी ने किसी से बदला नहीं लिया। उन्होंने बस अपनी मेहनत को सही जगह लगाने का फैसला किया है।”
नीलम तंज से हंसी। “बहुत अच्छा। अब हमारी मां समाजसेवी बनेंगी और हम खलनायक।”
रेखा आंटी ने सीधा जवाब दिया, “बेटी, खलनायक बनने के लिए किसी को धक्का नहीं देना पड़ता। कई बार बस मां की आंखों में देखकर हंसना काफी होता है।”
कविता अब सचमुच कांप रही थी। शायद उसे पहली बार समझ आया कि यह बात सिर्फ पैसों की नहीं रही। यह उस चेहरे की थी जो उसने अपने बच्चों के सामने खो दिया था।
“मम्मी,” उसने धीमे से कहा, “हमसे गलती हुई।”
शकुंतला देवी ने उसे देखा। “गलती तब होती है जब चाय में चीनी ज्यादा पड़ जाए। तुम लोगों ने योजना बनाई थी। केक बनाया, वाक्य लिखा, लाइट बंद की, मोबाइल लगाया। फिर अपलोड किया। यह गलती नहीं थी। यह फैसला था।”
रोहित अचानक घुटनों पर बैठ गया। “मां, प्लीज। मैंने मजाक में किया था। मुझे लगा लोग हंसेंगे। ब्रांड डील मिल जाएगी। सब कहते हैं भावुक वीडियो चलते हैं। मुझे लगा दादी वाला कंटेंट चलेगा।”
शकुंतला देवी की आंखों में पहली बार नमी आई। “तूने अपनी मां को कंटेंट बना दिया, रोहित?”
रोहित ने सिर झुका लिया।
विनय ने झुंझलाकर कहा, “रोने-धोने से कुछ नहीं होगा। मां, आप चाहें तो हमें सजा दे दीजिए, पर सब किसी ट्रस्ट को देना पागलपन है। हमारे बच्चों का क्या?”
“तुम्हारे बच्चों का?” शकुंतला देवी ने कहा। “उन्हें विरासत में घर नहीं, यह दृश्य याद रहेगा। कि उनकी दादी ने अपमान सहकर भी अपनी इज्जत बेची नहीं।”
मेहरा जी भी उसी समय आ पहुंचे। उनके हाथ में फाइल थी। शायद शकुंतला देवी ने उन्हें पहले ही बुला लिया था।
उन्होंने विनय की तरफ देखते हुए कहा, “कानूनी रूप से वसीयत पूरी तरह वैध है। शकुंतला जी मानसिक रूप से सक्षम हैं। मेडिकल प्रमाणपत्र भी संलग्न है। गवाहों के हस्ताक्षर हैं। कोई दबाव नहीं।”
विनय ने गुस्से से कहा, “हम केस करेंगे।”
मेहरा जी शांत रहे। “कर सकते हैं। लेकिन वीडियो अदालत में जाएगा। बैंक रिकॉर्ड जाएगा। अस्पताल के रिकॉर्ड जाएंगे। वह सब संदेश भी जाएंगे जिनमें आपने बार-बार संपत्ति के कागज मांगे हैं।”
कमरे में हर चेहरा बदल गया।
शकुंतला देवी ने मेज से एक छोटा डिब्बा उठाया। उसमें हरिनारायण की शादी की अंगूठी थी।
“बस एक चीज मैं अपने साथ ले जाऊंगी,” उन्होंने कहा, “यह अंगूठी। बाकी सब अब उन लोगों का होगा जिनके पास मां होती तो शायद वे सड़क पर नहीं होते।”
कविता धीरे-धीरे उनके पास आई। “क्या हमारे लिए कुछ भी नहीं बचा?”
शकुंतला देवी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। वह स्पर्श ठंडा नहीं था, लेकिन कमजोर भी नहीं था।
“बचा है,” उन्होंने कहा, “तुम्हारे लिए वक्त बचा है। अगर सच में पछतावा है तो आओ, रसोई में सेवा करो। किसी बूढ़ी औरत की थाली परोसकर देखो। शायद समझ आ जाए कि मां सिर्फ संपत्ति का दरवाजा नहीं होती।”
विनय ने तिरस्कार से मुंह फेर लिया। “चलो यहां से।”
नीलम सबसे पहले बाहर निकली। विनय उसके पीछे। रोहित ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले। कविता दरवाजे पर रुक गई। उसने पीछे मुड़कर देखा। शकुंतला देवी ने उसे रोका नहीं।
कई महीने बीत गए।
वीडियो की आग धीरे-धीरे ठंडी हुई, पर उसकी राख तीनों बच्चों की जिंदगी पर जम गई। विनय के व्यापारिक साझेदारों ने दूरी बना ली। लोग कहते, “जो मां का न हुआ, सौदे का क्या होगा?” कविता की सहेलियां अब उसके सामने मां की सेवा पर बातें करतीं और वह चुप हो जाती। रोहित के चैनल पर लोग हर नए वीडियो के नीचे वही लिखते—“दादी को जगह चाहिए थी, इज्जत नहीं?”
पर हवेली में पहली बार अजीब सी शांति थी।
शकुंतला देवी ने घर का पिछला हिस्सा सामुदायिक रसोई के लिए खोल दिया। हर मंगलवार और शुक्रवार 50 से ज्यादा बुजुर्गों को खाना मिलने लगा। आंगन में बड़ी देग चढ़ती। खिचड़ी, सब्जी, रोटी, कभी-कभी हलवा। दीवार पर हरिनारायण की तस्वीर के पास एक नई पट्टिका लगी—
“यह घर उन लोगों के लिए है जिन्हें खून के रिश्तों ने छोड़ा, पर इंसानियत ने अपनाया।”
पहले दिन खाना परोसते हुए शकुंतला देवी के हाथ कांप रहे थे। एक दुबली सी वृद्धा, कमला बुआ, ने उनका हाथ पकड़कर कहा, “बहन, आज बहुत दिनों बाद गरम रोटी मिली है।”
बस इतना सुनते ही शकुंतला देवी की आंखें भर आईं। इस बार आंसू अपमान के नहीं थे। इस बार उनमें एक अजीब हल्कापन था, जैसे किसी ने बरसों से रखा पत्थर हटा दिया हो।
धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतें भी जुड़ने लगीं। कोई दाल दे जाती, कोई आटा, कोई पुरानी चादर। डॉक्टर निखिल, जो सामने वाली गली में क्लिनिक चलाते थे, महीने में 2 बार मुफ्त जांच करने लगे। अमरजीत सिंह ने रसोई का नाम रखा—“हरि-शकुन्त आश्रय भोजनालय।”
एक दिन कविता चुपचाप आई। उसने सूती साड़ी पहनी थी, गहने नहीं। हाथ में सब्जियों का थैला था। शकुंतला देवी ने उसे देखा, कुछ नहीं कहा। कविता रसोई में गई, प्याज काटने बैठी और रोते-रोते बोली, “मम्मी, मुझे काटना ठीक से नहीं आता।”
शकुंतला देवी ने बस चाकू उसके हाथ से लिया और कहा, “सीख सकती हो।”
उस दिन कोई माफी का बड़ा दृश्य नहीं हुआ। कोई गले लगकर नाटकीय रोना नहीं हुआ। सिर्फ 2 औरतें थीं—एक मां, एक बेटी—और उनके बीच कटे हुए प्याज की गंध, जो आंसुओं को छिपाने के लिए काफी थी।
रोहित 1 महीने बाद आया। उसने मोबाइल जेब में रखा हुआ था, बाहर नहीं निकाला। उसने बुजुर्गों की थालियां उठाईं, जूठे बर्तन धोए। रात को जाते वक्त बोला, “मां, आज पहली बार लगा कि वीडियो बनाना जरूरी नहीं था।”
शकुंतला देवी ने कहा, “कुछ बातें कैमरे के लिए नहीं होतीं, बेटा। कुछ बातें आत्मा के लिए होती हैं।”
विनय सबसे देर से आया। लगभग 8 महीने बाद। उसके व्यापार में नुकसान हुआ था। चेहरे का घमंड कम हो गया था, लेकिन पूरी तरह टूटा नहीं था। उसने आकर कहा, “मां, मैं अभी भी आपके फैसले से सहमत नहीं हूं।”
शकुंतला देवी ने शांति से पूछा, “फिर क्यों आए?”
विनय ने लंबी सांस ली। “नींद नहीं आती।”
यह सुनकर शकुंतला देवी ने पहली बार उसे गौर से देखा। बड़ा बेटा, जिसे उन्होंने कभी गोद में उठाकर स्कूल छोड़ा था, अब आदमी कम और अपनी ही लालच से घायल बच्चा ज्यादा लग रहा था।
उन्होंने कहा, “नींद पैसे से नहीं आती। कभी मन साफ करके देखो।”
विनय उस दिन रसोई में नहीं गया। पर जाते-जाते उसने दरवाजे पर रखी राशन की बोरी अंदर रख दी। यह माफी नहीं थी। पर शायद शुरुआत थी।
वसीयत नहीं बदली।
शकुंतला देवी ने उसे बदलने की जरूरत भी नहीं समझी। प्यार का मतलब यह नहीं कि हर चोट के बाद वही गलती दोहराई जाए। उन्होंने बच्चों को घर से नहीं निकाला, पर अपनी मेहनत को उनके लालच से बचा लिया।
1 साल बाद उनके 71वें जन्मदिन पर हवेली में फिर से लोग जमा हुए। इस बार कोई सड़ा केक नहीं था। रसोई की औरतों ने सूजी का हलवा बनाया। कमला बुआ ने कांपते हाथों से उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाया। कविता ने थाली सजाई। रोहित ने मोबाइल नहीं निकाला। विनय थोड़ा दूर खड़ा था, पर उसकी आंखों में इस बार हंसी नहीं थी।
शकुंतला देवी ने हरिनारायण की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।
फिर उन्होंने सबको देखा और धीरे से कहा, “जिस दिन मेरे बच्चों ने मुझे कहा था कि मैं जगह घेरती हूं, उसी दिन भगवान ने मुझे दिखाया कि मेरी जगह कितनी बड़ी हो सकती है।”
आंगन में बैठे बुजुर्ग चुप हो गए। हवा में हल्दी, घी और पुराने घर की मिट्टी की महक थी।
उस शाम शकुंतला देवी ने केक नहीं काटा। उन्होंने 71 थालियों में खाना परोसा।
और जब आखिरी थाली एक अकेले बूढ़े आदमी के हाथ में गई, उसने कांपती आवाज में कहा, “मां, थोड़ा और दाल मिलेगी?”
शकुंतला देवी मुस्कुराईं।
वह शब्द, “मां”, अब उन्हें चुभता नहीं था।
क्योंकि उन्होंने जान लिया था—मां होना सिर्फ जन्म देने से नहीं, सम्मान देने और पाने से पूरा होता है। और कभी-कभी अपनी ही औलाद से दरवाजा बंद करना किसी नफरत का नहीं, आत्मसम्मान का सबसे पवित्र निर्णय होता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.