
भाग 1
रघुवीर चौहान ने अपनी पत्नी की चिता की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं होने दी थी कि उसने 47 परिवारों के सामने अपने 2 नवजात बेटों को ऊपर उठाकर कहा—
—जिसके पास इन्हें पालने की ताकत हो, वह 500 रुपये देकर आज ही ले जाए।
पहाड़ी दर्रे की उस ठंडी सुबह में जैसे हवा ने भी चलना छोड़ दिया। बैलगाड़ियों का घेरा बना हुआ था, बीच में बुझती आग से धुआं उठ रहा था, और किनारे पर सफेद चादर से ढकी गौरी चौहान की देह पड़ी थी। गौरी को मरे अभी 3 दिन भी नहीं हुए थे। उसने उसी बर्फीली यात्रा में 2 जुड़वां बेटों को जन्म दिया था—अर्जुन और करण—और फिर बिना अपने बच्चों को ठीक से देखे दुनिया छोड़ दी थी।
काफिला राजस्थान के सूखे गांवों से निकलकर हिमाचल के पार नए बसने वाले इलाके की ओर जा रहा था। रघुवीर इस काफिले का सरदार था। वही रास्ता जानता था, वही नदी की धार पहचानता था, वही बता सकता था कि किस मोड़ पर पहिया फिसलेगा और किस घाटी में डाकुओं का खतरा है। 47 परिवारों की जान उसी की समझ पर टिकी थी।
पर उस सुबह वह सरदार नहीं लग रहा था। वह सिर्फ एक टूटा हुआ आदमी था, जिसकी बाहों में 2 बच्चे कांप रहे थे।
रुक्मिणी देवी भीड़ के पीछे खड़ी थी। 34 साल की विधवा, सूनी मांग, फीकी साड़ी, आंखों में वह खालीपन जिसे गांव की औरतें “बांझपन का अभिशाप” कहकर चुभाती आई थीं। 15 साल उसने बच्चा मांगा था। पहले मंदिरों में माथा टेका, फिर वैद्यों की कड़वी दवाइयां पीं, फिर तानों को निगला, और आखिर में अपने पति दामोदर को बुखार में खो दिया।
दामोदर की मौत के बाद ससुराल वालों ने कहा था—
—जिस औरत की कोख नहीं खुली, उसका घर में क्या काम?
रुक्मिणी ने अपना छोटा-सा घर बेचा, 2 बैल भोला और बादल खरीदे, और इस काफिले के साथ निकल पड़ी। उसे लगा था कि नए इलाके में शायद कोई उसके खालीपन का हिसाब नहीं मांगेगा। पर उसने यह नहीं सोचा था कि उसकी सूनी गोद का जवाब 2 रोते हुए बच्चों की शक्ल में उसके सामने खड़ा होगा।
भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।
सेठ कैलाश मल्होत्रा आगे आया। उसका ऊनी कोट साफ था, जूते चमक रहे थे, और चेहरे पर वैसी ही ठंडी शांति थी जैसी वह मजदूरों का सौदा करते समय रखता था।
—800 रुपये दूंगा दोनों के लिए, रघुवीर, उसने कहा। मेरे पास अनाज है, नौकर हैं, बड़ा घर है। बच्चे जिंदा रहेंगे। बड़े होकर दुकान संभालेंगे। ऐसे समय में भावुकता नहीं, समझदारी चाहिए।
“दुकान संभालेंगे”—ये शब्द रुक्मिणी के सीने में पत्थर की तरह गिरे। उसने कैलाश के घर की 9 साल की बेटी मीरा को कई बार चुपचाप रोते देखा था। वह बच्ची हंसती भी थी तो डरकर। कैलाश हर रिश्ते को हिसाब-किताब में तोलता था। उसके घर में अर्जुन और करण बेटे नहीं बनते, कर्ज बन जाते।
पास ही दूसरे काफिले से आया एक आदमी, बलदेव ठाकुर, मूंछ ऐंठता हुआ बोला—
—मेरे साथ मंडी तक चलेंगे। खेत हैं, भेड़ें हैं। लड़के बड़े होकर काम आएंगे। बच्चे को रोटी दो तो बदले में हाथ भी मिलना चाहिए।
कई लोग चुप रहे। कुछ औरतों ने आंखें नीचे कर लीं। कोई खुलेआम विरोध करने की हिम्मत नहीं कर रहा था, क्योंकि सब रघुवीर पर निर्भर थे। और शायद सबके मन में डर भी था—2 नवजात बच्चे पहाड़ में सचमुच बोझ बन सकते थे।
रुक्मिणी की नजर गौरी की बैलगाड़ी पर गई। अंदर एक छोटी-सी लकड़ी की पालना रखी थी, जिसमें गौरी ने लाल धागे से 2 मोर काढ़े थे। गौरी ने कभी रुक्मिणी को कहा था—
—दीदी, बच्चा चाहे अपने पेट से आए या भाग्य से, मां का दिल पहले से बना होता है।
उस समय रुक्मिणी ने मुस्कुराकर बात टाल दी थी। आज वही वाक्य उसकी हड्डियों तक उतर गया।
रघुवीर ने बच्चों को फिर ऊपर उठाया। अर्जुन धीमे-धीमे सिसक रहा था, करण जोर से रो रहा था। ठंड में उनके छोटे-छोटे हाथ नीले पड़ रहे थे।
—गौरी ने मरते समय कहा था, अगर मैं इन्हें संभाल न सकूं तो इन्हें अच्छे घर देना, रघुवीर की आवाज टूट गई। मैं अकेला 2 दूधमुंहे बच्चों को लेकर पहाड़ी रास्ता नहीं काट सकता। अगर मैं कमजोर पड़ गया, तो 47 परिवार मरेंगे।
रुक्मिणी के पैर जैसे खुद चल पड़े। वह भीड़ चीरती हुई आगे आई।
—रघुवीर भैया, इन्हें मत बेचो।
कैलाश ने तुरंत हंसकर कहा—
—लो, अब बांझ विधवा उपदेश देगी कि बच्चे कैसे पाले जाते हैं।
भीड़ में कुछ लोगों ने असहज होकर सिर झुका लिया। रुक्मिणी के चेहरे पर चोट साफ दिखी, पर आवाज नहीं कांपी।
—मैं उपदेश नहीं दे रही। मैं कह रही हूं, मुझे दे दो। दोनों को। कीमत लेकर नहीं, वचन लेकर।
रघुवीर उसे घूरता रह गया।
—तू अकेली है, रुक्मिणी।
—6 महीने से अपनी गाड़ी खुद हांक रही हूं। रास्ते में 3 बच्चों की खांसी उतारी, 2 प्रसव कराए, बुखार में पंडित शिवलाल की जान बचाई। मेरे पास थोड़ा पैसा है, दामोदर की बचत है, और भोला-बादल हैं। पर इन सबसे बड़ा मेरे पास एक खाली आंचल है, जो इनके लिए भरा रह सकता है।
कैलाश ने तिरस्कार से कहा—
—आंचल से दूध नहीं उतरता, रुक्मिणी। पहाड़ दया से नहीं पार होते।
रुक्मिणी ने पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखा।
—और बच्चे मुनाफे से नहीं पलते, सेठ जी।
यह सुनकर कई औरतों के चेहरे उठे। मीरा, जो अपनी मां आनंदी के पीछे छिपी थी, धीरे से रुक्मिणी को देखने लगी।
रघुवीर की आंखों में पानी भर आया, पर वह अभी भी डरा हुआ था।
—अगर रास्ते में ये मर गए तो? अगर तू बीमार पड़ गई तो? अगर काफिला रुक गया तो?
—तो मैं सबसे पहले खुद को दोष दूंगी, पर इन्हें किसी के हाथ मजदूरी के लिए नहीं दूंगी। गौरी ने इन्हें बेटे बनाकर जन्म दिया है, सामान बनाकर नहीं।
इतने में करण का रोना तेज हो गया। उसका चेहरा लाल हो गया था। रघुवीर ने उसे संभालने की कोशिश की, पर उसके हाथ इतने अस्थिर थे कि बच्चा और जोर से चीखने लगा। रुक्मिणी आगे बढ़ी।
—मुझे दीजिए।
रघुवीर ने पहले झिझककर देखा, फिर करण उसकी बाहों में रख दिया। रुक्मिणी ने उसे सीने से लगाया, अपने पुराने शॉल में लपेटा, और धीमे-धीमे झुलाने लगी। उसकी आवाज पहाड़ी हवा में बहुत हल्की थी, पर उसमें एक अजीब भरोसा था।
—सो जा, छोटे राजा… सो जा… तेरी मां दूर नहीं गई… बस हवा बनकर यहीं है…
करण का रोना धीरे-धीरे थमने लगा। अर्जुन भी जैसे उस आवाज को पहचानकर शांत हो गया। कुछ औरतों की आंखें भर आईं। रघुवीर के चेहरे पर ऐसा भाव आया जैसे उसने गौरी की परछाईं देख ली हो।
—गौरी ने एक बार कहा था, रघुवीर फुसफुसाया, रुक्मिणी दीदी के हाथ मां जैसे हैं।
रुक्मिणी की पलकें भीग गईं।
—तो मुझे उसकी बात सच करने दीजिए।
कैलाश ने कदम आगे बढ़ाया।
—रघुवीर, तू पागल हो गया है। कल तक लोग इसे अपशकुनी कहते थे। आज तू अपने खून को इसके हवाले करेगा? मेरे पास साधन हैं।
रघुवीर ने जवाब नहीं दिया। उसने अर्जुन को देखा, करण को देखा, फिर उन सफेद पहाड़ों को देखा जिनके पार उनकी मंजिल थी।
—मुझे दोपहर तक समय दो, उसने कहा। मैं सोचूंगा।
दोपहर तक काफिले में जैसे अदालत लग गई। लोगों से पूछा गया कि रुक्मिणी कैसी है। पंडित शिवलाल ने कहा—
—मेरी सांस रुक रही थी, इसने रात भर अंगीठी जलाकर मुझे बचाया।
सरोजिनी बाई ने कहा—
—मेरी बहू को रास्ते में दर्द उठा था। अगर रुक्मिणी न होती तो मां और बच्चा दोनों चले जाते।
छोटी मीरा बहुत देर तक चुप रही। कैलाश की नजरें उस पर थीं। फिर भी वह कांपती आवाज में बोली—
—रुक्मिणी काकी गलती पर डांटती नहीं। समझाती हैं। और जब कोई रोता है, तो पहले पानी देती हैं।
कैलाश का चेहरा कठोर हो गया।
दोपहर में रघुवीर ने सबको फिर बुलाया। हवा और ठंडी हो चुकी थी। गौरी की चादर पर बर्फ के छोटे कण जमने लगे थे।
रघुवीर ने भारी सांस ली।
—मेरे बेटों को अमीर घर नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा घर चाहिए जहां वे किसी के हों। रुक्मिणी, अर्जुन और करण आज से तेरे हुए, अगर तू वचन दे कि उन्हें हमेशा बताएगी—उनकी पहली मां ने उन्हें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया था।
रुक्मिणी ने दोनों हाथ जोड़ दिए।
—मैं वचन देती हूं। वे गौरी को कभी नहीं भूलेंगे।
कैलाश आगे लपका।
—यह फैसला काफिले को महंगा पड़ेगा।
रघुवीर ने पहली बार उसकी ओर गरजकर देखा।
—मेरे बच्चों की कीमत तूने लगाई थी, कैलाश। अब उनकी किस्मत मैं लगाऊंगा।
भीड़ में एक गहरी सांस दौड़ गई। रुक्मिणी ने अर्जुन और करण को सीने से लगाया। उसकी सूनी गोद भर गई थी, पर उसी पल पहाड़ों की तरफ से काली हवा चली। दूर घाटी में बर्फ का बादल उठ रहा था।
तभी बूढ़े चरवाहे नंदू ने कांपते हाथ से चोटी की ओर इशारा किया।
—सरदार… तूफान आज रात नहीं, अभी आने वाला है। और इस बार आधे कमजोर लोग नीचे नहीं उतर पाएंगे।
रुक्मिणी ने बच्चों को और कसकर पकड़ लिया, क्योंकि उसे समझ आ गया—उसकी मां होने की पहली परीक्षा मौत के दरवाजे पर खड़ी थी।
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भाग 2
शाम तक बर्फ ने रास्ते, पहिए, चूल्हे और चेहरों को एक ही सफेद डर में बदल दिया। रुक्मिणी अपनी गाड़ी के भीतर अर्जुन और करण को गौरी की कढ़ी हुई चादर में लपेटकर बैठी थी, जबकि बाहर भोला और बादल रस्सियों में जकड़े कांप रहे थे। दूध कम था, लकड़ी गीली थी, और बच्चों का रोना ठंड से पतला पड़ता जा रहा था। कैलाश ने इसी मौके पर फिर वार किया। वह रघुवीर के सामने आया और ऊंची आवाज में बोला— —सरदार, अब भावुकता छोड़। कुछ गाड़ियां यहीं छोड़नी होंगी। अनाज मजबूत परिवारों के लिए बचाना होगा। विधवा, 2 नवजात और उसके बूढ़े बैल पूरे काफिले को डुबा देंगे। रुक्मिणी बाहर निकली। उसके बालों पर बर्फ थी, होंठ नीले थे, पर आंखें जल रही थीं। —तुम बच्चों को मरने की सलाह दे रहे हो। —मैं 47 परिवारों को बचाने की बात कर रहा हूं। —नहीं, तुम डर को नियम बना रहे हो। उसी समय मीरा बर्फ काटती हुई आगे आई। आनंदी ने उसे रोकना चाहा, पर बच्ची पिता के सामने खड़ी हो गई। —बाबूजी, जब मुझे दाने निकले थे, आपने कहा था मुझे अलग छोड़ दो, कहीं बीमारी न फैले। रुक्मिणी काकी ने कहा था यह साबुन की एलर्जी है, और मुझे बचाया। आप हर कमजोर को हटाना चाहते हैं, क्योंकि आपको डर लगता है। अगर अर्जुन और करण को छोड़ेंगे, तो मैं भी इस काफिले के साथ नहीं चलूंगी। कैलाश का चेहरा राख जैसा हो गया। भीड़ में सन्नाटा था। तभी सरोजिनी बाई ने अपनी पोती को उठाकर कहा— —रुक्मिणी रहेगी तो मेरा परिवार भी रुकेगा। पंडित शिवलाल बोले— —जिसने हमें बचाया, उसे बोझ कहने वाला पहले खुद का हिसाब देखे। रघुवीर ने बर्फ में डंडा गाड़कर आदेश दिया— —कोई पीछे नहीं छूटेगा। कैलाश के अतिरिक्त बैल कमजोर गाड़ियों में लगाए जाएंगे। जवान लोग बर्फ काटेंगे। रुक्मिणी बच्चों और बीमारों का डेरा संभालेगी। कैलाश ने विरोध करना चाहा, पर मीरा की आंखों में इतना टूटता भरोसा था कि उसका मुंह बंद हो गया। तभी अचानक बादल बैल घुटनों के बल गिर पड़ा, और उसी झटके से रुक्मिणी की गाड़ी पहाड़ी ढलान की ओर फिसलने लगी—अंदर अर्जुन और करण अकेले थे।
भाग 3
रुक्मिणी ने जो चीख मारी, वह तूफान से भी तेज निकली।
—मेरे बच्चे!
गाड़ी धीरे नहीं, झटकों से ढलान की ओर खिसक रही थी। पहिए बर्फ पर पकड़ खो चुके थे। अंदर से अर्जुन की हल्की रुलाई आ रही थी, करण शायद डर से चुप हो गया था। रुक्मिणी दौड़ी, पर उसके पैर बर्फ में धंस गए। वह गिर पड़ी, फिर उठी, फिर दौड़ी।
रघुवीर ने रस्सी फेंकी, पर हवा ने उसे मोड़ दिया। दो जवान आदमी पीछे भागे, मगर रास्ता चिकना था। गाड़ी किसी भी पल पलट सकती थी, और नीचे काली खाई थी।
कैलाश वहीं खड़ा था। कुछ क्षणों तक उसका चेहरा जड़ रहा। फिर मीरा ने उसका हाथ झकझोर दिया।
—बाबूजी, कुछ कीजिए!
कैलाश की आंखों में पहली बार गणना नहीं, डर दिखाई दिया। शायद अपनी बेटी का भरोसा खोने का डर। शायद 2 बच्चों को मरते देखने का डर। शायद अपनी ही आत्मा से सामना।
वह अचानक दौड़ा। उसके पास सबसे मजबूत घोड़ी थी—चमेली—जिसे वह हमेशा अपनी मालगाड़ी से भी ज्यादा संभालकर रखता था। उसने चमेली की रस्सी खोली, काठी पर चढ़ा और गाड़ी की तरफ बढ़ गया।
—सेठ जी! उधर मत जाइए! रास्ता टूट रहा है! किसी ने चिल्लाया।
कैलाश ने पहली बार किसी चेतावनी को अनसुना किया।
रघुवीर ने दूसरी रस्सी उसके पीछे फेंकी। कैलाश ने उसे पकड़कर अपनी कमर में बांध लिया और चिल्लाया—
—दूसरा सिरा पकड़े रहना! अगर मैं गिरूं तो खींच लेना!
रुक्मिणी ने सांस रोक ली।
चमेली बर्फ काटती हुई आगे बढ़ी। गाड़ी अब खाई से मुश्किल से 12 हाथ दूर थी। बादल बैल अभी भी घुटनों पर था और भोला पूरी ताकत से पीछे खिंच रहा था, पर जकड़ी रस्सियां गाड़ी को रोकने के बजाय उसे तिरछा कर रही थीं।
कैलाश ने घोड़ी से छलांग लगाई, बर्फ पर फिसला, फिर गाड़ी के पिछले हिस्से से लटक गया। उसके हाथ लकड़ी की पट्टी पर जमे, नाखून टूट गए। उसने पूरी ताकत से गाड़ी को मोड़ने की कोशिश की। रघुवीर और 6 आदमी रस्सी खींच रहे थे। पंडित शिवलाल, सरोजिनी बाई, आनंदी, सब बर्फ में पैर गाड़कर खड़े थे।
रुक्मिणी घुटनों के बल आगे बढ़ती रही।
—अर्जुन! करण! आवाज दो, मेरे लाल!
अंदर से करण रो पड़ा। वह रोना रुक्मिणी के लिए आशा बन गया।
गाड़ी का एक पहिया खाई के किनारे से बाहर लटक गया। लोग चिल्लाए। कैलाश ने भीतर हाथ डालकर पालना पकड़ लिया। उसी पल लकड़ी की दीवार चटक गई। वह अंदर आधा घुसा और दोनों बच्चों की चादर अपनी बांह में फंसाने लगा।
—एक-एक करके दो! रघुवीर गरजा।
कैलाश ने पहले अर्जुन को बाहर निकाला। बच्चा ठंड से नीला था। उसने उसे अपनी छाती से चिपकाकर पीछे फेंकने जैसा किया, पर रघुवीर ने बीच से पकड़ लिया। अर्जुन को तुरंत सरोजिनी बाई ने शॉल में लपेट लिया।
फिर करण की बारी थी।
गाड़ी एक और झटके से नीचे सरकी। कैलाश का पैर खाली हवा में लटक गया। अंदर करण पालने की कपड़े की पट्टी में उलझा था। रुक्मिणी ने यह देखा तो पागल की तरह रेंगते हुए गाड़ी तक पहुंच गई।
—मैं आ रही हूं, मेरे बच्चे!
रघुवीर चिल्लाया—
—रुक्मिणी, नहीं!
पर मां के कान उस समय किसी की नहीं सुनते।
रुक्मिणी ने गाड़ी का किनारा पकड़ा। कैलाश ने करण को छुड़ाने की कोशिश की, पर पट्टी कस गई थी। रुक्मिणी ने अपनी कमर से छोटी चाकू निकाली, जो वह सब्जी काटने के लिए रखती थी। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने कपड़ा काटा, करण को खींचा और अपने सीने से लगा लिया।
उसी पल गाड़ी का पिछला हिस्सा टूटकर खाई में झूल गया।
कैलाश, रुक्मिणी और करण तीनों फिसले।
सारी भीड़ ने एक साथ चीख मारी।
लेकिन रघुवीर की रस्सी कैलाश की कमर में बंधी थी। उसने पूरी ताकत से खींचा। 6 आदमी पीछे गिरे, फिर उठे, फिर खींचते रहे। आनंदी भी दौड़कर रस्सी पकड़े खड़ी हो गई। मीरा रोते हुए चिल्ला रही थी—
—बाबूजी! रुक्मिणी काकी!
आखिरकार कैलाश पहले ऊपर आया। उसकी बांह से खून बह रहा था। उसके पीछे रुक्मिणी निकली, जिसके सीने से करण चिपका हुआ था। बच्चा रो रहा था। वह रोना इस बार किसी को परेशान नहीं कर रहा था। वह जीवन की आवाज थी।
रुक्मिणी बेहोश होकर बर्फ पर गिर पड़ी।
जब उसकी आंख खुली, वह अपनी ही गाड़ी में थी। आग जल रही थी। अर्जुन उसके बगल में सो रहा था, करण उसकी बांह पर था। गौरी की कढ़ी चादर दोनों पर फैली थी। आनंदी उसके माथे पर गरम कपड़ा रख रही थी। सरोजिनी बाई दूध गरम कर रही थीं। बाहर मर्द टूटे पहियों को अलग कर रहे थे।
कैलाश दरवाजे पर खड़ा था। उसका कोट फटा हुआ था। चेहरा खरोंचों से भरा था। वह बहुत देर तक कुछ बोल नहीं पाया। फिर उसने धीरे से कहा—
—मैंने आज पहली बार जाना कि बच्चा पालना खर्च नहीं, विश्वास होता है।
रुक्मिणी ने उसे देखा। उसमें क्रोध होना चाहिए था, पर वह बहुत थक चुकी थी।
—ये बात आज नहीं, तब जाननी चाहिए थी जब तुमने इन्हें 800 रुपये में खरीदना चाहा था।
कैलाश ने सिर झुका लिया।
—मुझे लगा था पैसा ही सुरक्षा है। मैं अपनी बेटी को भी डर से पाल रहा था। आज उसने मुझे मेरे डर से बड़ा होना सिखाया।
मीरा अंदर आई और चुपचाप रुक्मिणी के पास बैठ गई।
—काकी, करण सच में ठीक है?
रुक्मिणी ने बच्चे का चेहरा दिखाया।
—देख, तुझसे भी ज्यादा जिद्दी है।
मीरा हंसते-हंसते रो पड़ी।
तूफान 4 दिन चला। उन 4 दिनों में काफिला पहले जैसा नहीं रहा। कोई किसी का अनाज अलग से नहीं गिन रहा था। जवान लोग बारी-बारी से बर्फ हटाते। औरतें बच्चों को संभालतीं। बूढ़े लोग आग बचाए रखते। रुक्मिणी ने अपनी गाड़ी को छोटे अस्पताल में बदल दिया। अर्जुन और करण को गौरी की चादर और सूखी घास से बनी टोकरी में रखा जाता। वह बीच-बीच में उन्हें दूध पिलाती, फिर किसी का जला हाथ बांधती, किसी बच्चे की खांसी सुनती, किसी बूढ़ी की उंगलियां गरम पानी में डुबोती।
बादल बैल को गहरी चोट लगी थी। वह उठ नहीं पा रहा था। रुक्मिणी उसके सिर पर हाथ फेरकर बैठी रही।
—तू भी मेरे साथ आया था, बादल। तुझे भी नहीं छोड़ूंगी।
रॉबर्ट जैसा कोई यहां नहीं था; इस काफिले में युवक हरनाम और बिशन थे। दोनों ने रस्सियों और लकड़ी से सहारा बनाकर बादल को उठाया। भोला उसके पास नाक रगड़ता रहा। तीसरे दिन बादल खड़ा हुआ तो बच्चों ने ताली बजाई। मीरा ने कहा—
—देखो, रुक्मिणी काकी का बैल भी हार नहीं मानता।
रघुवीर यह सब देखता रहा। उसकी आंखों में अब भी दुख था, पर उसमें शर्म भी जुड़ गई थी। चौथी रात वह आग के पास रुक्मिणी के सामने बैठा।
—मैंने उस दिन बच्चों को बेचने की बात कहकर गौरी से धोखा किया।
रुक्मिणी ने अर्जुन को थपथपाते हुए कहा—
—तुम टूटे हुए थे। टूटे हुए लोग कभी-कभी गलत शब्द बोल देते हैं।
—पर तुमने उन्हें बचाया।
—मैंने अकेले नहीं बचाया। काफिले ने बचाया। और गौरी की बात ने बचाया।
रघुवीर ने जेब से लाल धागे में बंधी छोटी चांदी की पायल निकाली।
—यह गौरी ने बच्चे के लिए रखी थी। उसे नहीं पता था 1 होगा या 2। यह मैं संभालकर बैठा रहा। डरता था कि अगर दे दूंगा तो सच मानना पड़ेगा कि वह नहीं रही।
रुक्मिणी ने पायल हाथ में ली। उसकी आंखें भर आईं।
—इसे दोनों की पालने में बांध देंगे। मां की आवाज बनी रहेगी।
रघुवीर रो पड़ा। वह रोना किसी सरदार का नहीं, एक पति का था जिसने अपनी पत्नी को बर्फीले रास्ते में खो दिया था।
सुबह जब आसमान खुला, पहाड़ों पर धूप उतरी तो जैसे पूरी घाटी ने लंबी सांस ली। काफिले ने 3 जानवर, 2 गाड़ियां, बहुत अनाज और कई औजार खोए थे। पर 47 परिवारों में कोई इंसान नहीं मरा था।
रघुवीर ने सबको दर्रे के पार रोककर कहा—
—हम इसलिए बचे क्योंकि हमने मजबूतों को कमजोरों पर चढ़ाकर रास्ता नहीं बनाया। हम इसलिए बचे क्योंकि किसी ने कहा—बच्चे बोझ नहीं होते। और आज से इस काफिले में कोई किसी को उसकी कोख, गरीबी, उम्र या कमजोरी से नहीं तौलेगा।
कैलाश आगे आया। सबकी नजरें उस पर थीं। पहले वह ऐसे मौकों पर भाषण देता था। आज उसकी आवाज धीमी थी।
—मैंने रुक्मिणी को बांझ कहा, बोझ कहा, और उसके बच्चों की कीमत लगाई। मैं गलत था। मैंने अपनी बेटी को भी डर में रखा। अगर रुक्मिणी मुझे क्षमा न करे, तो भी मैं यह सबके सामने कहता हूं—अर्जुन और करण किसी की दया नहीं, इस काफिले की इज्जत हैं।
रुक्मिणी ने कुछ पल उसे देखा। फिर बोली—
—क्षमा देना आसान नहीं है, सेठ जी। पर मैं अपने बेटों को नफरत की गोद में नहीं पालूंगी। तुम बदलना चाहो तो शुरुआत मीरा से करो।
कैलाश ने मीरा की ओर देखा। पहली बार उसने उसे डांटा नहीं, बुलाया।
—मीरा, आओ।
मीरा धीरे-धीरे आई। कैलाश ने उसके सिर पर हाथ रखा, फिर उसे गले लगा लिया। आनंदी का चेहरा आंसुओं से भीग गया।
काफिला दर्रे के पार उतर गया। यात्रा आसान नहीं थी, पर अब रुक्मिणी अकेली नहीं रही। जब अर्जुन रोता, सरोजिनी बाई उसे उठा लेतीं। जब करण भूखा होता, आनंदी दूध लाती। रघुवीर हर शाम दोनों बच्चों के पास बैठकर गौरी की बातें करता—वह कैसे हंसती थी, कैसे पालना बनाते समय सुई उंगली में चुभा बैठी थी, कैसे उसने कहा था कि यदि बेटा हुआ तो उसे साहसी बनाना और यदि बेटी हुई तो उसे किसी से कम न समझना।
रुक्मिणी सुनती रहती। उसे कभी जलन नहीं हुई। वह जानती थी कि मां का प्रेम मिटाया नहीं जाता, बस उसमें एक और दीपक जोड़ दिया जाता है।
कई हफ्तों बाद काफिला कांगड़ा की घाटी में पहुंचा। वहां देवदारों के बीच एक पुराना सरायनुमा मकान खाली था। रुक्मिणी ने दामोदर की बचत से उसका निचला हिस्सा लिया और छोटी-सी औषधशाला खोल दी। लोग उसे अब “बांझ विधवा” नहीं कहते थे। वे कहते—
—रुक्मिणी वैद्य मां के पास जाओ।
रघुवीर पास ही लकड़ी का काम करने लगा। उसने अपने बच्चों से दूरी नहीं बनाई। वह पिता रहा—रविवार को उन्हें नदी किनारे ले जाने वाला, लकड़ी की छोटी तलवार बनाने वाला, रात में गौरी का नाम लेकर दीप जलाने वाला। पर दिन की मां रुक्मिणी थी—दूध की खुशबू वाली, दवा की कड़वाहट वाली, लोरी की गर्माहट वाली।
5 साल बीत गए।
अर्जुन गंभीर बच्चा बना, जो हर शीशी पर चिपकी पत्ती पढ़ने की कोशिश करता। करण तूफान जैसा था, जो मुर्गियों के पीछे दौड़ता, बादल बैल की पूंछ पकड़ लेता और फिर खुद गिरकर हंसता। भोला बूढ़ा हो चुका था, बादल की चाल थोड़ी टेढ़ी रह गई थी, पर दोनों आंगन में बच्चों के साथी थे।
औषधशाला की दीवार पर कांच के भीतर गौरी की कढ़ी हुई चादर टंगी थी। उसके नीचे छोटी चांदी की पायल थी।
एक शाम बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी। अर्जुन ने दीवार की चादर को देखा और पूछा—
—मां, हमारी पहली मां दुखी होती होंगी कि हम आपके पास हैं?
रुक्मिणी ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया। करण उसके घुटने पर चढ़ गया, अर्जुन उसके कंधे से टिक गया।
—नहीं, मेरे लाल। मां मरकर खत्म नहीं होती। कभी वह याद बनकर रहती है, कभी चादर की कढ़ाई में, कभी पिता की आंखों में, और कभी किसी दूसरी औरत की गोद में, जो वचन देती है कि बच्चों को कभी नहीं छोड़ेगी।
करण ने भोलेपन से पूछा—
—तो हमारी 2 मां हैं?
रुक्मिणी मुस्कुराई, पर आंखें भीग गईं।
—हां। 1 जिसने तुम्हें जन्म दिया, और 1 जिसे तुमने जन्म दिया।
अर्जुन ने माथा सिकोड़कर पूछा—
—हमने आपको कैसे जन्म दिया?
रुक्मिणी ने दोनों को और कसकर चिपका लिया।
—जिस दिन तुम मेरी गोद में आए, उस दिन मेरे भीतर की मरी हुई मां फिर से जी उठी।
दरवाजे पर रघुवीर खड़ा था। उसने यह सुना तो चुपचाप दीपक जलाया और गौरी की चादर के नीचे रख दिया। बाहर कैलाश अपनी बेटी मीरा के साथ औषधशाला के लिए अनाज की बोरी रखकर लौट रहा था। अब वह हर महीने बिना शोर किए कुछ न कुछ भेज जाता था। मीरा पढ़ना सीख रही थी और कहती थी कि वह बड़ी होकर बच्चों की वैद्य बनेगी, ताकि कोई बच्चा “कमजोर” कहकर छोड़ा न जाए।
उस रात अर्जुन और करण रुक्मिणी की गोद में सो गए। बाहर पहाड़ों पर चांद निकला था। हवा में ठंड थी, पर घर के भीतर आग जल रही थी।
रुक्मिणी ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरा और दूर अंधेरे में उस बर्फीले दर्रे को याद किया, जहां 2 नवजात बच्चों की कीमत 500 रुपये लगाई गई थी। दुनिया ने सोचा था कि उसने उन्हें खरीदा है। सच यह था कि उन 2 बच्चों ने उसे वापस जीवन में खरीद लिया था।
और उस घर में, जहां कभी एक औरत को उसकी खाली कोख के लिए अपशकुन कहा गया था, अब हर रात 2 बच्चों की सांसें गूंजती थीं—सबूत की तरह कि मां होना खून से कम, वचन से ज्यादा बनता है।
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